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कहानी-- तुम आए तो(भाग-2)--- जयश्री रॉय

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

------------ भोर रात से यहां शोर शुरु हो जाता है. पास के मस्जिद से आती अजान की आवाज़, गुरुद्वारे में बजता हुआ लाउड स्पीकर, किसी न किसी त्योहार में मंदिरों में बजते फिल्मी गाने, देर राततक तबेलों में ग्वालों का कीर्तन... फिर सरकारी नलों पर पानी के लिये औरतों के झगड़े, बर्तनों की उठा-पटक, बच्चों का रोना, फेरीवालों की आवाज़... वह कान पर तकिया दबाकर पड़ी रहती है. भोर रात से ही नींद टूट जाती है. फिर कोशिश करके भी नहीं आती.
           जीवन एक ऐसे मोड़ पर आकर एक दिन ठहर जायेगा उसने सोचा नहीं था. मास कम्युनिकेशन में एम. ए. करने के तुरंत बाद उसे एक अच्छी अख़बार में नौकरी मिल गयी थी. कबीर से मुलाकात भी उससे एक इंटरव्यू के दौरान ही हुई थी. उसे याद है कबीर एक कारखाने के बाहर कई दिनों से अनशन पर बैठा था. अपनी अख़बार की तरफ से वह उसका इंटरव्यू लेने पहुंची थी. मीतादी- पत्रकारिता के क्षेत्र में उसकी पहली टीचर जिसे वह गुरु मैया कहकर पुकारती थी, ने उसे वह पहला मौका दिया था. मीता एक खुर्राट पत्रकार थी. व्यक्तित्व भी वैसा ही जबर्दस्त - मां-बहन की गाली दिये बिना बात नहीं करती, मुंह फाड़कर अट्टाहास करती, बीड़ी के सुट्टे लगाकर मर्दों के बीच ठर्रा, रम, कच्ची, नारंगी, फेनी- जो मिलता पानी की तरह पीती और फिर अपनी बुलेट जिसे वह प्यार से डार्क ब्युटी कहकर बुलाती थी, पर बैठकर रात के दो-दो बजे अपने घर जाती थी. वह मीतादी के दबंग व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थी. बचपन से मामी के कठोर अनुशासन और अत्याचार के साये में जीकर वह बेहद दब्बू किस्म की हो गयी थी. हीन भावना की शिकार. ऊपर से गहरी सांवली, साधारण रुप-रंग की. मामी बात-बातपर ताने देती थीं - तुझे कोई लड़का पसंद नहीं करेगा, तेरी कभी शादी नहीं होगी.ये बातें उसके भीतर घर कर गयी थीं. मीतादी ने उसे अपनापन दिया तो वह उसीकी मुरीद हो गयी. हर बात में उनकी नकल उतारने की कोशिश करती. उनकी तरह फेडेड जींस, खादी का कुर्ता, बंडी, आंखों में ढेर-सा काजल... गाली देकर बात करना उन्हीं दिनों शुरु किया था, साथ में सिगरेट पीना भी. बकौल मीतादी, इसे बिंदास होना कहते हैं!
       कबीर का साक्षात्कार वह बहुत उत्साह से लेने गयी थी, मगर इंटरव्यू शुरु होते ही कबीर ने किसी बात पर उसे बुरी तरह डांट दिया था. सबके सामने वह पानी-पानी हो गयी थी. उसदिन घर आकर वह बहुत रोयी थी. क़सम भी खाई थी फिर कभी काम पर ना लौटने की. मगर इसके दूसरे ही दिन कबीर को देखने सदर अस्पताल दौड़ गयी थी. कबीर पर मैनेजमेंट के गुंडों ने हमला कर दिया था और वह बुरी तरह जख़्मी होकर अस्पताल में दाखिल करवाया गया था. वहां कागज़-क़लम बैग में डालकर कबीर के लिये मौसम्बी का रस निचोढ़ते हुये उसे खुद भी बहुत हैरत हुई थी. इसके बाद वह दिनोंतक अस्पताल के जेनेरल वार्ड में लोगों की भीड़ और घुटन भरे माहौल में कबीर की सेवा-टहल में लगी रही थी. कबीर एक बेहद बदमिजाज़ इंसान था. बात-बातपर उसे सबके सामने झिड़क देता, अपमानित कर देता, मगर इन सबके बावजूद उसे ना जाने उससे कैसा लगाव हो गया था. उसकी हिम्मत, जोशभरी बातें, अन्याय से लड़ने का माद्दा... उसे वह निडर, नैतिक और बहादूर प्रतीत होता. ठिक जैसे फिल्मों के नायक. उसकी बातें, बहसें वह मुग्ध होकर सुनती. उसे लगता एकदिन वह कोई बड़ा आदमी बनेगा. सोचकर उसके प्रति वह सम्मान और प्रेम के भाव से भर जाती. डांट-फटकार के साथ अपनी सेवा का अधिकार देकर कबीर ने जैसे उसे धन्य कर दिया था. उसे सूप पिलाते हुये या अस्पताल के कॉरीडोर में सहारा देकर टहलाते हुये वह स्वयं को बहुत महत्वपूर्ण महसूस करती. डांट-डपट के बीच कबीर भी उसपर हर बात के लिये निर्भर करने लगा था. उसके आते ही कबीर के दोस्त एक-दूसरे को इशारा करके मुस्कराने लगते - लो बॉस! तुम्हारी मीरा आ गयी.... क्यों, आज अपने देवता के लिये चढ़ावे में क्या लाई हो मीरा देवी?... ओह! मूंग का हलवा, साबूदाने की खिचड़ी...वह सबके बीच लाल पड़ जाती और कबीर अवज्ञा से मुस्कराता रहता. हीन ग्रंथि से ग्रसित उसे भी लगने लगा था, कबीर की डांट-फटकार में ही उसके लिये प्यार छिपा हुआ है. और जिस दिन अस्पताल से डिस्चार्ज होते हुये कबीर ने अपने कामरेड्स के सामने यह ऐलान किया था कि वह भी उसके साथ उसके घर में शिफ्ट होनेवाली है,वह दंग रह गई थी. तो कबीर जैसी हस्ती ने उसे स्वीकार ही लिया! कामरेडों ने चिल्लाकर बधाई दी थी - शादी कब?’ कबीर ने सबको घुड़ककर शांत कर दिया था - हम शादी जैसी बकवासों में यकीन नहीं रखते- मोस्ट नॉन प्रोडक्टीव कन्समसन...सुनकर वह सन्न रह गई थी, मगर कबीर के आगे मुंह नहीं खोल पाई थी. कुछ निहायत औरतनुमा सपनों को वह उसी दिन मन के किसी अज्ञात घाट में सिरा आई थी. कबीर जैसे महान लोगों से जुड़ने के लिये ऐसी छोटी-मोटी कुर्बानियां तो देनी ही पड़ेगी!
                 मगर उसका इरादा सुनकर उनके मामाजी को दिल का दौड़ा पड़ गया था. मामी ने खैर राहत की सांस ली थी. अब वह अपने भतीजे को अपना उत्तराधिकार सौंप पायेगी, वर्ना तो उन्हें सालों से यही डर लगा हुआ था कि चांपा सब हथिया लेगी. दूसरी तरफ वह तो बस प्यार, अपनेपन की कुछ बूंदों के लिये कस्तूरी मृग की तरह भागती फिर रही थी.
कबीर के साथ रहते हुये उसके जीवन के ये कई वर्ष एक स्वप्न भंग की-सी अवस्था में बीते हैं. कबीर की डांट-फटकार और उपेक्षा में अपने लिये प्यार ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह अंतत: थक गयी थी. कबीर के लिये दुनिया के बस दो ही बड़े सत्य हैं- एक पेट की भूख और दूसरा जिस्म की भूख. बकौल उसके, इसीसे पूरी सृष्टि संचालित होती हैं. बाकि चीज़ें बकवास है. इस ईंट-पत्थर की दुनिया हो अपनी हाड़-मास की देह से जियो, भोगो और भूल जाओ - जस्ट युज़ एंड थ्रो! प्रेम, आस्था, जन्म-जन्म का रिश्ता- माइ फूट! रिश्ते स्वर्ग में नहीं बनते- बिस्तर पर बनते हैं और वही जिस्म के साथ ख़त्म भी हो जाते हैं. शरीर जब जलता, गलता, सड़ता है, तुमलोगों के दिव्य प्रेम में भी कीड़े पड़ जाते हैं! जो प्रेम स्खलित होगा वही फलित होगा! हवाई प्रेम की नियति हवाई मिठाई जैसी - दो पल में फुस्स... सुन-समझकर वह काठ हो गयी थी. क्रांति का अर्थ सम्पूर्ण ध्वंस होता है, वह नहीं जानती थी. सबसे पहला झटका उसे पहले ही दिन लगा था जब कबीर ने अपने मकान में उसके कृष्ण को आने नहीं दिया था - मेरे घर में तुम्हारे भगवान नहीं आ सकते चांपा! हमारी सबसे बड़ी लड़ाई इन्हीं से है! धर्म और कुछ नहीं, भांग की, ओपियम की गोली है. इनके बहकावे में जाहिल, गवांर आयेंगे, हम जैसे लोग नहीं!उस रात वह बहुत रोई थी. कृष्ण की वह मूर्ति बचपन से उसके साथ थी- उसकी मां की निशानी. उनके वैष्णव परिवार के ईष्ट देवता कृष्ण ही थे. बचपन से अनाथ वह अपनी काली, अंधेरी रातें अपने इसी कृष्ण को सरहाने रखकर काटती आई थी.
           वह कबीर की तरह बुद्धिजीवी नहीं है, मगर डेमोक्रेटीक ज़रुर है. एग्री टु डिसएग्री . सह अस्तित्व में यकीन रखती है, सहिष्णु है. जिनपर यकीन नहीं रखती उन्हें भी स्पेस देने को तैयार रहती है. कबीर तो अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता. जो उससे इत्तेफाक नहीं  रखता वह उसके लिये मूर्ख है, शत्रु है, चिरकुट है!
       कबीर ने उससे शादी नहीं की है, इसलिये उसकी कोई जिम्मेदारी भी उसपर नहीं. मगर न जाने क्यों, उसपर कबीर की सारी जिम्मेदारियां हैं! एक परम्परागत पुरुष की भूमिका में वह स्वयं को नहीं देखता, मगर उससे एक स्त्री के कर्तव्य की अपेक्षा ज़रुर करता है. बात-बातपर उसे काम में सुघढ़ ना होने के ताने देता है, झिड़कता है. उसे खुद अंडा तक उबालना नहीं आता. हर समय अपनी मां के साथ उसके काम की तुलना करता है. वह कभी किसी बात पर टोकने जाती है तो झट कहता है - ज़्यादा बीवी बनने की कोशिश मत करो! यही सब चाहिये होता तो किसी को नौ गजी साड़ी में ब्याहकर लाता.वह सुनकर सोचती रह जाती है - वह रिश्ते की हर बंदिश में जीकर भी कबीर की कोई नहीं लगती. ठगी गयी वह. संबंध नहीं, उसके अधिकार नहीं, बस उसकी जिम्मेदारियां, बोझ... श्रमिकों की बात करते हुये घरेलू स्त्रियों के संबंध में कबीर प्राय: अनपेड लेबररशब्द का इस्तेमाल करता है. वह सोचती है, वह किस श्रेणी में आती है. सबकुछ करके भी उसका कहीं किसी पर अधिकार नहीं! वह अनपेड लेबररकी गिनती में भी नहीं है.
           कबीर के उच्छृंखल स्वभाव ने उसे अंदर से असुरक्षित कर दिया है. उसे लगता है उसने लहरों पर अपना घर बांध लिया है जो किसी भी क्षण ढह सकता है. कबीर के साथ का यह गैर पारम्परिक, बोहेमियन जीवन उसे ना घर का ना घाट का रहने दिया है. मामा, मामी अब उसका चेहरा नहीं देखते, दुनिया की नज़रें भी बदल गई हैं. कबीर या उसके दो-चार अलग नज़रियावाले दोस्तों तक यह दुनिया सीमित नहीं है. यह बहुत बड़ी है... जिस रिश्ते का कोई नाम नहीं, आधार नहीं उसकी कोई गैरेंटी भी नहीं. उसका दिल डूबता रहता है सोच-सोचकर. कबीर कहता है उसे संबंध के नामपर कोई पिंजरा पसंद नहीं. वह तभी तक रुका रह सकता है जब तक जाने का विकल्प खुला है. बढ़ती उम्र के साथ उसके अंदर डर घोंसला डाल रहा है. लग रहा है मुट्ठी से सब कुछ रेत की तरह क्षरता जा रहा है. एक मकान की चार दीवारी के भीतर वह अपना घर ढूढ़ती रहती है, आश्वासन और प्रतिश्रुति ढूंढ़ती रहती है. एक अकेला प्रेम उसके सारे संशय और भय का निराकरण कर सकता था, मगर कबीर की आंखों में उसका नितांत अभाव उसे कहीं से बहुत असुरक्षित कर गया था. प्रेम भी नहीं, समाज की स्वीकृति भी नहीं! वह किस ज़मीन पर खड़ी हो! अपने पांव के नीचे का दलदल उसे हरपल खींचता रहता है. वह सतह पर बने रहने के लिये किसी सहारे की तलाश में अपने हाथ पसारती रहती है, मगर उनमें शून्य के सिवा कुछ नहीं आता.
          दो महीने पहले एक पुरानी डायरी में उसे एक कविता मिल गई थी जो ना जाने कबीर की नज़र से कैसे बच गई थी. बिना सोचे-समझे उसने उसे एक साहित्यिक पत्रिका में भेज दी थी और उसे उस समय सुखद आश्चर्य हुआ था जब उस पत्रिका की तरफ से स्वीकृति सूचना मिली थी. फिर अर्पित - पत्रिका के सब एडिटर से बात हुई थी. एक दिन वह उनकी पत्रिका के दफ़्तर में भी हो आई थी. कितनी तारीफ की थी अर्पित ने उसकी कविताओं की. उसे लगता था कि वह अपनी काबिलियत को जाया कर रही है. उसे नियमित लिखना चाहिये. इतने दिनों तक ना लिखना बहुत बड़ी गलती है उसकी. अर्पित की बातों ने उसे एक नये उत्साह से भर दिया था. बहुत अर्से बाद वह फिर कागज़-कलम लेकर बैठने लगी थी. वह लिखेगी घिरते बादलों पर, सुबह की धूप और दिल की धड़कनों पर कविता... ये भी ज़रुरी हैं, वह हाड़-मास की इंसान है, कोइ रोबोट नहीं!

                     उस दिन शाम घिरते-घिरते अर्पित का फोन आया था. उसने उसे जो नई कवितायें दी थीं, वह उस पर बात करना चाहता था. कपड़े बदलकर वह बाहर निकल आई थी. कबीर रात के बारह बजे से पहले नहीं लौटेगा. अपने मुहल्ले की संकरी गलियों को पार कर वह मुख्य सड़क पर आई थी. इसी रोड पर थोड़ा आगे चलकर एक छोटे-से रेस्तरा में अर्पित उसका इंतज़ार कर रहा था. दोनों अक्सर यही मिलते थे. यहां से अर्पित का दफ़्तर भी करीब था.
              अर्पित का बहुत शालीनता से बोलना, हर बात को बहुत शांति और धैर्य के साथ समझाना. उसे उसकी कवितायें अच्छी लगती है. वह चाहता है वह ज़रुर लिखे. अर्पित के साथ उसे अपने होने का अहसास होता है. लगता है वह रीत नहीं गई है पूरी तरह से. कोई जीवित पराग अब भी उसके भीतर रह गया है किसी सही मौसम के इंतज़ार में. एक दिन उसने बताया था अपने बारे में. उसकी पत्नी का देहांत हो गया है दो साल पहले. एक पांच साल की बेटी है जो अपने ननिहाल में पल रही है. अपनी दिवंगत पत्नी की बात करते हुये वह आज भी संजीदा हो जाता है. उसे अर्पित की संवेदनशीलता अच्छी लगती है. उसका दिल खोलकर हंसना और बात-बात में आंखों का नम हो जाना. अर्से बाद उसे लगा है, बिना डरे या सतर्क हुये भी किसी के साथ हुआ जा सकता है. अर्पित के साथ वह अपने में होती है, निश्चिंत होती है. छोटी-छोटी बातों में भी जीवन का सुख है, यह भी अर्पित ने ही उसे एक बार फिर से याद दिलाया था.
               हम हमेशा युद्ध में नहीं हैं. छोटी चीज़ों से भी बदलाव का आगाज़ हो सकता है... बड़ी बातें तो मैं नहीं समझता, हां! पहला काम मैंने ये किया कि अपना सरनेम छोड़ दिया. दूसरा अपनी पत्नी को कहीं से भी बदलने की कोशिश नहीं की. यह भी मेरे लेखे हिंसा ही है. किसी को वह ना रहने देना जो वह है. एक बात बताऊं कि मेरी बीवी जब एम ए की पढ़ाई कर रही थी, तब एक साल मैने रसोई का काम सम्हाला. किचन में उसका हाथ बंटाना, बेटी को रातों में जागकर देखना... ऐसी ही छोटी-मोटी बातें. बचपन में बाबूजी को अक्सर कहते सुनता था - चैरिटी बिगिन्स ऐट होम, वह बात मुझे सही लगती है.... अर्पित झेंपता हुआ-सा कहता - सबसे पहले मैं खुद को बदलना चाहता हूं. यह सबसे मुश्किल काम है...वह उसे चुपचाप सुनती है. अर्पित को सुनना उसे अच्छा लगता है. जब भी उससे मिलकर लौटती है, खुद को हल्का महसूस करती है. खुश भी.
               रात तीन बजे कबीर लौटता है. आज भी कामरेड लतिका के घर मीटिंग थी. लतिका इनकी मंडली की एक नई सदस्य है. कोलकाता के प्रेसिडेंसी से राजनीति शास्त्र में एम. ए., पी एच. डी. छात्र नेता. बंगाली, इसलिये जन्मजात बुद्धीजीवी! रुप भी वैसा ही - बांह कटा ब्लाउज, तांत की साड़ी, खुले-बिखरे अधपके बाल, कपाल पर बड़ा लाल टीका. एकदम कपाल कुंडला-सा रुप! जैसे धड़ल्ले से अंग्रेज़ी बोलती है, वैसे ही धड़ल्ले से सिगरेट फूंकती है. मार्क्स, स्तालिन, लेनिन को घोंटकर पी रखा है. वह भी अपना घर फूंककर दुनिया गढ़ने निकली है. कबीर उस पर मुग्ध है. बात-बात पर उसका नाम लेता है. उनकी पार्टी की सारी मीटिंगस अब लतिका के घर ही होती हैं. लतिका बहस के साथ सरसो-हिल्सा भी बहुत अच्छा पकाती है. उसके रविंद्र संगीत और आवृति का तो क्या कहना. जब नज़रुल की अग्नि वीणाअपनी ओज भरी आवाज़ में पाठ करती है, सचमुच शिराओं में आग़ लग जाती है! देर राततक लतिका के घर मीटिंग, खाना, गाना, काव्यपाठ आदि करके जब कबीर घर लौटता है, थककर चूर होता है. उससे बात भी की नहीं जाती, बस बिस्तर पर गिरकर सो जाता है. वह बगल में लेटकर कबीर की देह से आती परफ्यूम की सुगंध को महसूस करते हुये चुपचाप रोती रहती है. कबीर कभी किसी तरह का परफ्यूम या बॉडी लोशन इस्तेमाल नहीं करता था. चलो अब उसे पसीने की महक ही नहीं, फूलों की खूशबू भी अच्छी लगने लगी है.
               रोज़ वह चुप रह जाती है, मगर आज उससे रहा नहीं जाता. कबीर के कुर्ते से उठती खूशबू, गिरेबान पर लिपस्टीक के दाग़, मुंह में पान... उसने उसका कुर्ता पकड़कर फाड़ दिया था - मीटिंग से आ रहे हो या किसी कोठे से? सुनकर कबीर ने उसे फर्श पर धकेलकर गिरा दिया था - अपनी औकात में रहो! जहां से भी आऊं, तुम कौन होती हो पूछनेवाली? बीवी बनती हो!
                 गिरने से उसे बहुत चोट आई थी. दायीं कुहनी छील गयी थी और माथे पर गुमड़ निकल आया था. उसकी तरफ देखे बिना कबीर निकलकर चला गया था. वह ज़मीन पर पड़ी-पड़ी सिसकती रही थी.
                दूसरे दिन भी कबीर शाम तक घर नहीं लौटा था. उसका फोन भी नहीं लिया था. कबीर के एक मित्र ने उसे बताया था, कबीर कामरेड लतिका के साथ बस्तर चला गया है. वहां पुलिस के द्वारा आदिवासियों के एक गांव उजाड़ देने के विरोध में एक बहुत बड़ा मोर्चा निकाला जाना है. इसके बाद वह अर्पित के घर चली गई थी.
             अर्पित उसकी हालत देखकर चौंका था. अब तक वह उसके और कबीर के संबंध में बहुत कुछ जानने, समझने लगा था. मगर अपनी तरफ से उसने बढ़कर कुछ नहीं पूछा था. बस उसकी कुहनी को साफ करके, दवाई लगाकर पट्टी कर दी थी. वह चुपचाप देरतक उसके ड्राइंग रूम के सोफे पर सोई रही थी. दूसरे कमरे में सी. डी. पर धीमी आवाज़ में जगजीत सिंह की ग़ज़लें बजती रही थीं - होशवालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है... रसोई से आती बर्तनों की ठुनक, पकते खाने की महक, आंगन में खिले मोगरे की रह-रहकर लपटों में आती सुगंध... अर्पित शायद फोन पर अपनी बेटी से बात कर रहा था. उसका उससे हंस-हंसकर, तुतलाकर बोलना, छोटी-छोटी बातें - उसने होमवर्क किया या नहीं, दूध पिया या नहीं, अगले रविबार उसे घुमाने ले जाने का प्रोग्राम... वह पड़ी-पड़ी तंद्रालस सुनती रही थी. कितने दिनों बाद उसे लगा था, वह किसी मकान में नहीं, घर में है. देर शाम वह उठकर अंदर के बरामदे में बैठी थी. अर्पित चाय बनाकर ले आया था - अदरक, तुलसी वाली! चुपचाप चाय पीते हुये उसने देखा था - आंगन के तुलसी चौरे पर जलते हुये दीये को. ऊपर हरसिंगार का छोटा-सा घना पेड़.उसे तुलसी की तरफ देखते हुये अर्पित ने ना जाने कैसी आवाज़ में कहा था - "मंजरी रोज़ तुलसी पर दीया बालती थी. उसके बाद उसका यह काम मैंने अपने ऊपर ले लिया है... मंजरी की किताबें, मंजरी की प्रिय चीज़ें, उसके भगवान... उसकी अमानत समझकर सम्हालता हूं. उसकी भावनाओं, आस्था का मैं सम्मान करता हूं. वैसे मै खुद एक तरह से नास्तिक हूं कह सकते हैं."
                  अर्पित की बातें सुनते हुये ना जाने क्यों उसकी आंखें भर आई थीं. उसके मनोभावों से अनजान अर्पित एक मोगरे की वेणी रसोई से उठा लाया था - "बहुत मोगरा खिला है तो..."उस वेणी को लेकर वह अर्पित की ओर नज़र उठाकर देख नहीं पाई थी, क्योंकि आंसुओं से उसकी आंखें भरी हुई थी. अर्पित ने ना जाने कैसी इच्छा भरी आवाज़ में उससे कहा था - "अंदर मंजरी के ड्रेसिंग टेबल में देखकर यह अपने बालों में लगा लो..."
बिना कुछ कहे वह अर्पित के पीछे-पीछे कमरे में चली आई थी. मंजरी का ड्रेसिंग टेबल, उस पर सजी चीज़ें... वह देखती रह गई थी - सिंदूर की डिब्बी, ट्रेसेल, थोक में झूलती रंग-बिरंगी चूडियां और शीशे पर चिपकी अनगिन बिंदियां! अनायास उसके अंदर का कोई अदेखा कोना कांच की तरह चिटक उठा था. उसके स्वप्न में अक्सर ये चीज़ें आ-आकर उसे परेशान किया करती थीं.
          अर्पित उसके पीछे खड़ा बोल रहा था - "मंजरी के सारे सामान मैंने सहेज-सम्हाल रखें हैं... उसके बाद घर नहीं रहा, मगर उसका सपना ज़रुर बचाये रखना चाहता हूं. रोज़ सोचता हूं, अपनी बेटी को उसकी मां दे सकूं, उसे अपने घर वापस ला सकूं.. अनाथ की तरह दूसरों के घर पल रही है..."चांपा ने मुड़कर उसकी आंखों में सीधे देखा था - "तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो अर्पित?"उसका सवाल सुनकर अर्पित एक पल के लिये खामोश रह गया था, फिर धीरे से, मगर ठहरी आवाज़ में पूछा था - "मुझसे शादी करोगी चांपा?"
          इससे पहले की चांपा कोई जवाब देती, उसका मोबाईल बज उठा था.फोन के दूसरी तरफ कबीर था, बेहद गुस्से में -"जल्दी घर पहुंचो!कामरेड गोपाल घर के बाहर घंटा भर से खड़ा है. उसे मैंने कुछ पेपर्स लेने वहां भेजा था, मगर तुम्हारा कोई पता ही नहीं! इतनी रात गये कहां हो तुम?"
        कबीर की गुस्सैल आवाज़ और बोलने का बेहूदा लहज़ा सुनकर अचानक उसके अंदर एक विस्फोट-सा हुआ था, मगर अपनी आवाज़ को यथासंभव स्थिर रखते हुये उसने स्वभाविक ढंग से कहा था - "नहीं आ सकती, और कहां हूं यह तुम्हें बताने की ज़रुरत भी नहीं समझती!"
उसका जवाब सुनकर कबीर दहाड़ उठा था - "क्या! क्या कह रही हो तुम?... होश में तो हो?"
"हां! बिल्कुल हूं और तुम भी एक बात कान खोलकर सुन लो - आइंदा मेरा पति बनने की कोशिश मत करना!"
            कह कर उसने कबीर की कोई और बात सुने बिना ही फोन बंद कर दिया था और फिर बड़े इत्मीनान से आईने से चिपकी हुई एक लाल बिंदी उठाकर अपने माथे पर लगाकर शीशे में अर्पित को देखा था, आंखों ही आंखों में मुस्कराते हुये. अर्पित भी उसकी तरफ देखते हुये अपनी आंखों में भर आये आंसुओं को पोंछकर अनायास मुस्कुरा पड़ा था.
***

    
जयश्री राय ने बहुत ही कम समय में हिन्दी के युवा कथाकारों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। हजारीबाग बिहार में पैदा हुयी और गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में गोल्ड मेडलिस्ट जयश्री राय के अब तक तीन कहानी संग्रह(अनकही,तुम्हें छू लूं जरा और खारा पानी),तीन उपन्यास(औरत जो नदी है,साथ चलते हुये,इकबाल) और एक कविता संग्रह(तुम्हारे लिये) प्रकाशितइन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में नियमित कहानियों,कविताओं का प्रकाशन। फ़िलहाल गोवा में निवास और स्वतन्त्र लेखन।
सम्पर्क--मो.09822581137 ई-मे: jaishreeroykathakar@rediffmail.com



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कहानी-- तुम आए तो... --- जयश्री रॉय

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

आज सुबह से उसका मन अजीब-सा हो रहा है. कुछ अच्छा नहीं लग रहा. गर्मी भी बहुत पड़ रही है. धुंआसा आकाश गरम राख की ढेर की तरह दिख रहा है - क‌ई-क‌ई पर्तों में दूरतक जमा हु‌आ. पेड़-पौधे भी एकदम चुप. कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिल रहा. सब जैसे दम साधे पड़े हैं!
        वह खिड़की पर खड़ी रहती है अनमनी-सी. बहुत काम है. पूरा घर ही पड़ा है - बर्तन, कपड़े, रसोई... मगर वह खड़ी है! ढाई बजे तक कबीर आ जायेगा लंच के लिये. व्यस्त, हड़बड़ी में. हमेशा की तरह खीजा हुआ. उसे बहुत काम है... पूरी दुनिया की जिम्मेदारी उसी के सर पर! वह गहरी सांस लेती है. नीचे सड़क पर लोग नदी की तरह बह रहे हैं - गाड़ियां, रिक्शे, पैदल... कितने रंग, कितने रुप, कैसी-कैसी आवाज़ें... देखते हुये जाने कब वह भी उन्ही का एक हिस्सा हो जाती है. सालों पहले वह भी इस जनसैलाब के साथ सुबह से शाम तक इस शहर की सड़कों और गलियों में नामालूम बहा करती थी. तब ज़िन्दगी मुश्किल थी, मगर यूं ठहरी हुई न थी. अब तो सालों से रुके हुये इस पानी से बदबू आने लगी है! कुछ सड़ रहा है उसके भीतर बहुत चुपचाप...वह जानती है, मगर इसका क्या करे सोच नहीं पाती. उसका जी चाहता है, कभी सड़क पर किसी औरत का हाथ पकड़कर पूछे - वह कहां जा रही है, घर या घर से बाहर? इतना क्या काम होता है उसे! उसके चौबीस घंटे तो ख़त्म ही नहीं होते! वह घर के काम करती है, खाना बनाती है, कबीर के अख़बार के दफ़्तर से लाये हुये फाईलों के अंबार सहेजती है, प्रूफ रीडिंग आदि, फिर भी...
           कभी-कभी उसे महसूस होता है, उसके भीतर एक तलहीन कुआं है - सिला, बोसीदा, अंधकार से भरा हुआ! जब भी वह अकेली होती है, वह उसमें डूबने-सी लगती है और ऐसा अक़्सर होता है! उसे बहुत डर लगता है अपनेआप में होने से. वह खुद से निज़ात पाने के तरीके ढूंढ़ती रहती है मगर अंतत: उसे लौटना ही पड़ता है अपनेआप में... खुद से छूटना कभी कहां संभव हो पाता है! जीवन की ये एक बहुत बड़ी त्रासदी है, कम से कम उसके जीवन की!
        वह किचन में आकर बर्तन मांजती है, सामान दुरुस्त करती है और फिर दो दिनों से जमा कचरे की थैली फेंकने के लिये नीचे जाती है. ऐसा करते हुये उसे हमेशा संकोच होता है. नीचे के दो मंज़िलों में दो पंजाबी परिवार रहते हैं. दोनों ही उनसे नहीं बोलते. देखते ही उनके घर की औरतें मुंह फेर लेतीं हैं. यह बहुत अपमानजनक प्रतीत होता है उसे. पहले माले के गुरमीत सिंह की पांच साल की बच्ची चिंकी कभी-कभी उसके पास आ जाती थी. मक्खन की बनी गोल-मटोल गुड़िया जैसी, बहुत प्यारी! अपने अकेलेपन से बेइंतिहां ऊबी हुई वह रोज दोपहर को टॉफियां लेकर उसका इंतज़ार करती थी. एकदिन जब चिंकी उसकी गोद में बैठकर उससे बातें कर रही थी, उसकी मां उसका कान पकड़कर उसे वहां से खींचते हुये ले गयी थी. उसकी दी हुई टॉफियां भी फेंक दी थी - तुझे मना किया था ना यहां आने से!उसदिन उसने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया था. उस बच्ची की बेबस रूलाई ने उसे कहीं से बहुत छोटी कर दिया था. वैसे जब से वह और कबीर साथ रहने लगे हैं, उन्हें, खासकर उसे लोगों की बदतमीजी और ताने बहुधा सहने पड़े हैं. कबीर के पहलेवाले घर में जिसदिन वह अपना सामान लेकर गई थी, उसके दूसरे ही दिन उन्हें वह मकान छोड़ना पड़ा था. इसके बाद दो महीने तक उन्हें कबीर के एक कामरेड दोस्त के घर एक झोपड़पट्टी में रहना पड़ा था. वहां भी आसपास के लोगों का रबैया उनके प्रति रुखा था. लोग उन्हें संशय और अवज्ञा से देखते, पीछे से कानाफूसी करते, मुंह दबाकर हंसते.
         बहुत मुश्किल से आखिर यह एक कमरे का घर मिला था. कबीर के एक और कामरेड का घर. उनकी शादी नहीं हुई है और फिर भी साथ रहते हैं सुनकर सभी मकान किराये पर देने से इंकार कर देते थे. 
        कबीर को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता! वह एक नई दुनिया बनाने में रातदिन मशगूल है. बहुत बड़ा काम है यह. छोटी-छोटी बातों के लिये उसके पास समय नहीं! ज़िन्दगी की छोटी, तुच्छ बातों से जूझने का  झमेला उसने उसके लिये रख छोड़ा है - "तुम औरतें जात और औकात से पूसी बिल्ली ही होती हो. जीवन क एक ही मक़सद - किसी तरह एक मर्द को घेर-घारकर रिश्ते की काल कोठरी में डालना और फिर ज़िन्दगी भर उसका शोषण! इमोशनल अत्याचार! अपनी कीमत वसूलना तुम औरतों को खूब आता है... सो कॉल्ड प्यार, जिस्म, कोख - सबका दाम चाहिये तुम्हें! चूल्हा, हांडी, नून-तेल... इससे आगे ज़िन्दगी को बढ़ने ही नहीं देती! मर्दों को भी इसी में घोंटकर रख देती हो!"
       उसकी बातें सुनकर वह बहुत रोई थी. उसी दिन उसका पहला गर्भपात हुआ था. यह सुनते ही कि वह प्रेगनेंट है, कबीर ने उसके हाथ में कुछ रुपये रख दिये थे अबोर्शन के लिये और साथ में एक चेतावनी और विकल्प - "या तो बच्चा या वह. मुझे क्या पता था तीस साल की औरत को इतनी-सी सावधानी रखनी नहीं आती! जिस्म तुम्हारा है, इसे सम्हालना भी तुम्हें ही है!"
उसने कहने की कोशिश की थी - "एक बच्चा आ जाता तो... मैं बहुत अकेली हो जाती हूं तुम्हारे बाद!"
           सुनकर कबीर बिफरा था - "दुनिया में और भी ग़म हैं बच्चे पैदा करने के सिवा मैडम! समय नहीं कटता तो जाकर झोपड़पट्टी के बच्चों को पढ़ाओ, अनपढ़ औरतों को उनके हक़ और सेहत के बारे में सचेत करो... देखो समय कैसे कटता है! जबतक इस दुनिया में इतनी भूख है, ग़रीबी है, बच्चे पैदा करना ज़ुर्म है! हमारे देश में भी चीन की तरह हर जोड़े को एक ही बच्चा पैदा करने का हक़ मिलना चाहिये. मगर यहां.. हूं! एकबार इंदिरा गांधी ने यह कोशिश की, नसबंदी करवाया तो उसकी खटिया ही खड़ी कर दी  लोगों ने! इसलिये तुमसे कहता हूं चांपा! इतना आत्मकेंद्रित मत बनो! खुद से ऊपर उठो और इस अभागी दुनिय के बारे में भी कुछ सोचो."
          वह क्या कहती! रोती रही थी. इतने दिनों के साथ से वह इतना तो जान ही चुकी थी कि किसी पत्थर को पिघलाना आसान है मगर कबीर को उसके फैसले से डिगाना संभव नहीं. जाते-जाते कबीर कह गया था - "दुबारा मुझे इस जाल में फंसाने की कोशिश मत करना. सेक्स की इतनी बड़ी कीमत चुकाने के लिये मैं तैयार नहीं. इसके लिये तुम्हें दूसरा आसामी देखना पड़ेगा!" वह कहीं से दग्ध होकर रह गई थी. आसामी! कीमत! ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत नियामतों को कैसा भद्दा, बेहूदा नाम दिया है कबीर ने! उसके अंदर की औरत ने तो बस अपने प्यार को एक आकार देना चाहा था, एक मुकम्मल रुप. अहसासें - जिस्म में ढलतीं, शक़्ल अख़्तियार करतीं... वह फिर से रचती कबीर को अपने भीतर, सांचे में ढालती अपने प्यार को! जाने यह कौन-सी विचारधारा है जो हाड़-मास के इंसान को रोबोट में तब्दील करके रख देती है! प्यार कुछ नहीं, आस्था कुछ नहीं... बस भूख, हथियार और प्रतिशोध! जो परिवर्तन लाना है वह लाशों पर चलकर लाना है... दुनिया को तोड़कर गढ़ना है. पुराना कुछ भी न बचे. देखना नहीं है पैरों के नीचे क्या आ रहा है - दिल, रिश्ते, भावनायें... मनुष्यों की दुनिया नहीं, पशुओं की दुनिया जिसमें हृदय नहीं, पेट ही सबसे बड़ा सच होता है. भूख - जठराग्नि में सबकुछ होम होकर रह जाता है, उसीसे संचालित होता है.
         एक खूबसूरत दुनिया वह भी चाहती है, मुस्कराते, खुशहाल चेहरे उसे भी भाते हैं, मगर निर्माण के लिये ध्वंस का ही रास्ता क्यों! प्रेम भी तो एक हथियार हो सकता है! कुछ नया करने के लिये हर पुराने का बहिष्कार करना क्यों ज़रुरी है? वह इन बातों को समझ नहीं पाती है. वह औरत है. संरक्षण उसका स्वभाव है, सृजन उसकी प्रकृति! उसे तोड़ना कुछ नहीं है, बस रचना है, सहेजना है, बचाना है!
       
उसे लगता है, कबीर के साथ उसने बाकी चीज़ों के साथ खुद को भी खो दिया है. बहुत पीछे छूट गया है उसका आप. वह बस कबीर की परछाई बनकर रह गयी है. यह भी तो एक तरह की हिंसा, शोषण है! उसे पूरी तरह से निगल जाना, ख़त्म कर देना! दुनिया भर के शोषण के ख़िलाफ अपनी अख़बार में आवाज़ उठाते हुये क्या कबीर को कभी अहसास होता है कि कहीं न कहीं वह भी इन्हीं शोषकों की जमात में शामिल हो गया है. विडंबना है कि चारों तरफ उजियारा बिखेरते हुये दीपक अपने तल में पनप रहे अंधियारे को भूल जाता है!
           वह एक बार फिर पत्रिका में छपी अपनी कविता देखती है-मेरा होना भी ज़रूरी है मेरे लिये...सीने से एक गहरी सांस निकल आती है. जब से यह पत्रिका हाथ में आई है वह इसी ऊहापोह में है कि इसे कबीर को दिखाये या नहीं. कबीर को उसके लेखन से नफरत है. पहले भी कहता था - स्त्री अस्मिता, दलित चिंतन... तुम्हारी इन कविताओं से एक शाम का खाना जुट सकता है? किसी की भूख मिट सकती है? हां अबतक जो किलो डेढ़ किलो कचरा इकट्ठा किया है उससे एकबार चूल्हा ज़रुर जलाया जा सकता है. मोहतरमा! चांद-सितारों की दुनिया से निकलकर कभी ज़मीन पर भी अपने हसीन पैर रखिये... फिर देखिये, ये कितनी सख़्त है! भरपेट खाकर जिस गोल-मटोल चांद पर आप पलायनवादी साहित्यकार नरम-गुगगुदी कवितायें लिखते हैं न, एक भूखे इंसान को वह एक अधजली रोटी से ज़्यादा कुछ नहीं लगता! जिसके पेट में भूख का सनातन दावानल हो उसे फूल की सुगंध से मतली आती है...

एकबार जब वह दो दिन के लिये कहीं गई हुई थी, कबीर ने उसकी सारी कवितायें रद्दी में बेच दी थी. पूछने पर उल्टा उसपर बिफरा था - ज़्यादा बमकिये मत, कुल मिलाकर चालिस रुपये कीमत की रचनायें... बेचकर एक अदद ठर्रे की बोतल नहीं खरीद सका, इंकलाब तो क्या ख़ाक होता! आपको कहीं ये गुमान तो नहीं हो गया था कि आपने दास कैपिटलटाईप का कुछ कमाल लिख दिया है...
    उसके बाद वह दो दिन तक बिना खाये-पिये रोती रही थी, मगर कबीर ने माफी मांगनी तो दूर, मुड़कर देखा भी नहीं था.जैसे-तैसे काम निपटाकर वह बैठी ही थी कि कबीर आ धमका था. हमेशा की तरह गरम और खीजा हुआ. साथ में दो कामरेड. चूल्हे पर दाल की पतीली चढ़ी हुई देखकर एकदम से आग़बबूला- "अभी तक खाना नहीं बना! करती क्या रहती हो सुबह से?"
उसके हाथ में पत्रिका थमाते-थमाते वह झिझक गई थी - "ये..."
"क्या है यह!" उसने विरक्ति से भरकर कविता पर नज़र दौड़ाई थी- "ओह! कविता... तो अबतक इसका भूत उतरा नहीं तुम्हारे सिर से..." बिना पढ़े उसने पत्रिका मेज़ पर रख दी थी- "दुनिया में और भी ग़म हैं... कविताबाजी के सिवा!"
"मसलन?" अपने आसुओं को किसी तरह जब्त करते हुये उसने पूछा था.
"मसलन समय पर खाना बनाना... दिनभर खटता हूं, घर में बैठे-बैठे यह भी नहीं होता तुमसे कि वक़्त पर दो रोटी ही परोस दो? हद है आलसीपने की. पूरी दुनिया ताक पर रखकर साहित्य साधना हो रही है! कहो, अब कौन-सी नई ज़मीन तोड़ने का इरादा है? फूल तोड़ते जिसकी कलाई लचक जाती है वह रोज़ हथौड़ा उठाकर साहित्य में नई-नई ज़मीनें तोड़ने निकल रही हैं..."
"बस बहुत हो गया..." उसने आसूं पोंछकर सबको खाना परोस दिया था और फिर रसोई में बैठकर गर्मी में सीझती रही थी.  छोटी-सी खिड़की से एक गंदला, धुआंता आकाश दिख रहा है, छत की मुंडेर पर कबूतर का जोड़ा गुटरगूं करता हुआ, बिजली के तारों के गुंझल में अटकी हुई एक बेरंग पतंग... धूल में लिथड़ी उसकी यह दुनिया कितनी तंग, कितनी छोटी हो गई है! इस मकान में एक ही कमरा है - एक कमरा, रसोई और छोटी-सी बैल्कनी. जब भी कबीर के दोस्त आते हैं उसे रसोई में बैठना पड़ता है. कभी-कभी घंटों. सस्ती शराब के घूंट के साथ दुनियाभर के मजलूमों की बातें करते हुये कबीर उसे भूल जाता है. बड़े-बड़े दुखों के आगे उसके इन छोटे-छोटे दुखों के क्या माने है. कुछ भी तो नहीं! कामरेड्स एक-दूसरे के दुख-दर्द बांटते हैं, मिल-जुलकर सबकुछ सांझे में जीते हैं. उनसब के बीच उसकी तकलीफें अकेली, अनकही रह जाती हैं. कुछ कहने जाओ तो कबीर की वही झिड़कियां - बस रातदिन अपना रोना, अपने दुख... कभी खुद से बाहर भी निकलना सीखो! हमारी-तुम्हारी हालत तो बहुत अच्छी है, दो शाम का खाना मिल जाता है. दुनिया में करोड़ों ऐसे हैं जिन्हें एक जून की रोटी नसीब नहीं. अगर हर कोई तुम्हारी तरह अपना ही लेकर बैठ जायेगा तो फिर समाज के तलछट में पड़े, हाशिये में धकेल दिये गये इन बेक़सों के लिये कौन लड़ेगा, कौन इनकी आवाज़ बुलंद करेगा? सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, समाज बनकर भी जीना सीखो... अब इन नून-तेल जैसी बेकार की बातों में मेरा समय जाया मत करो, मुझे सिंगुर आंदोलन के समर्थन में सम्पादकीय लिखना है. एकदम आग़ लगा दूंगा!
      वह ग्लानि से भरकर चुप हो जाती. शायद वह सचमुच स्वार्थी है. अपनी ही परेशानियों में डूबी रहती है. खाना खाते हुये अपने कामरेड्स के साथ गरमागरम बहस के बीच कबीर झल्लाकर पूछता - आज सिर्फ़ दाल-रोटी! सब्जी क्यों नहीं बनी? आदमी खायेगा नहीं तो काम कैसे करेगा?’ वह कैसे बताती कि आज बड़ी मुश्किल से ये दाल-रोटी जुटी है. घर की ज़रुरतों की बात वह कबीर से कर नहीं पाती क्योंकि बकौल कबीर ये तुच्छ बातें हैं, मगर वह जानती है इन तुच्छ बातों के लिये उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. किताबों की प्रूफ रीडिंग, हिन्दी टाइपिंग, ट्युशन... फिर भी घर बड़ी मुश्किल से चलता है! पूरी दुनिया की चिंता करना कबीर का काम है. वह सामाजिक सरोकार का आदमी है. कमाना, घर चलाना, दाल-रोटी की जुगाड़ जैसे छोटे-मोटे काम उसके जिम्मे, क्योंकि वह साधारण स्त्री है. उसका कोई बड़ा लक्ष्य नहीं, महत उद्देश्य नहीं. इतना भी नहीं करेगी तो क्या करेगी! वह पसीने में डूबी रसोई में बैठी-बैठी सुनती रहती है दुनिया को सिरे से बदल डालने की योजनायें, नये समाज का निर्माण, एक आर-पार की लड़ाई... सभी जोश में हैं. इसी जोश में कभी कोई पानी मांग रहा है, कभी कोई कुछ और. सबकी इस जिस्मानी और दिमाग़ी ऊर्जा के लिये ईधन जुटाती हुई वह छीजती हुई सोचना चाहती है, इस आनेवाली क्रांति का जब इतिहास लिखा जायेगा, उसमें उसका नाम कहां होगा!... कहीं भी तो नहीं! दो हाथ तो उसके भी रातदिन ज़िन्दगी से जूझते रहते हैं, पसीना तो उसे भी बहुत आता है. सारे कामरेडों ने मिलकर उसके हिस्से की रोटियां भी खा ली है. आखिर इतने जोश और जुनून खाली पेट तो पैदा नहीं हो सकता... वह पानी पीते हुये समझने की कोशिश करती है, मगर पेट भूख से ऐंठता रहता है.
         उनके जाने के बाद वह बैल्कनी में बैठकर पत्रिका के पन्ने पलटकर अपनी छपी हुई कविता को बार-बार देखती है. कितने सालों बाद उसकी कोई रचना किसी पत्रिका में छपी है! सालों हो गये उसने लिखना छोड़ दिया था. एक तो हालात ऐसे थे, उसपर कबीर के रात-दिन के ताने - तुम लोगों के लिजलिजे सौंदर्यबोध पर वाकई हैरत होती है! पीलियाग्रस्त रोगी की आंख-से पीले चांद पर मरे जा रहे हैं! प्रियतम के होंठ, गाल, ज़ुल्फों पर दोनों जहां कुर्बान... वाह! क्या जज़्बात हैं! जिस धरती पर खड़े हैं उसकी ख़बर नहीं, करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर टिमकते तारों को गिन-गिनकर रात काट रहे हैं. इन्हें खाना नहीं, यार का दीदार चाहिये, पानी नहीं, लबों का सुर्ख प्याला चाहिये... मेरा वश चले तो इन बेतुकी बातों से कागज़ काला करनेवालों को गोली से उड़ा दूं! दे आर दी रीयल पैरासाइटस ऑफ दी सोसायटी. मजदूरों की मेहनत पर जीकर चांद-तारों की दुनिया में सर डाले शुतुरमुर्ग की तरह बेफिक्र बैठे रहते हैं. इनके सर भी एकदिन  गिलोटीन में जायेंगे देखना. रातदिन बैठ-बैठकर अवाम के लिये साहित्य के नामपर भांग घोंटते रहते हैं ये जातिवाद, पूंजीवाद के एजेंट!
वह कमज़ोर-सा प्रतिवाद करना चाहती - तो तुम्हीं सौंदर्य की परिभाषा बतला देते...कबीर उसकी बात लपक लेता - हां, क्यों नहीं! मैडम! सौंदर्य फूल, चांद में नहीं, मजदूरों की मेहनत में है! श्रम के सौंदर्य को पहचानो... पसीने की गंध, हल चलाते किसान की बांहों की मछलियां, उसकी मेहनत से कठोर हुई मांस-पेशियां, धूप-ताप से जली देह... धूल-मिट्टी और पसीने से लिथड़ी मजदूर औरतों का रुप देखा है कभी ध्यान से? तुमलोगों की मधुबाला, ऐश्वर्या से हज़ार गुना ज़्यादा सुंदर और मादक! एक अलग ही तरह की उत्तेजना और नशे से भर देतीं हैं. वर्ग संघर्ष से जो आग़ पैदा होती है, स्फूलिंग उड़ती है, रक्त की नदियां बहती है और अंतत: एक समानता, न्याय और सार्वभौमिक कल्याण की मुकम्मल छवि बनती है उसे शब्द दो, वाणी दो!
         सुन-सुनकर उसके कान पक गये थे. उसके सामने काग़ज-क़लम लेकर बैठने से भी वह कतराने लगी थी. कौन हर बात पर इतने ताने और भाषण सुने. शुरु-शुरु में उसे कुछ लिखते देख वह व्यंग्य से मुस्कराता - क्यों, आज कौन-सी क्रांति करने जा रही हो... अच्छा है इन बुद्धिजीवियों का! बाहर पूरी दुनिया में आग़ लग जाय, ये दरवाज़ा बंद करके विद्रोह के गीत लिखेंगे, हवाई घोड़े पर बैठकर काठ की तलवार भांजेंगे... मगर दरवाज़ा खोलकर एकबार बाहर निकलने बोलो, इनकी नानी मर जायेगी. हां! टी. वी. डिबेट आदि में मुंह भर-भरकर बहस करना या मोमबत्ती लेकर जुलूस निकालन इन्हें खूब आता है. कायर, परजीवी, बिना रीढ़ के रेंगनेवाले केंचुए! इनकी सारी वग़ाबत कागज़ पर! भैंस की तरह खा-पीकर सारा दिन जुगाली- बौद्धिक चर्वण! इन सबको चाबुक मार-मारकर खेतों, कारखानाओं में ले जाना चाहिये जैसे कम्बोडिया के जन विद्रोह में हुआ था. चांद पर  फूलों की फसल उगा रहे हो? चलो, यहां अनाज उगाकर दिखाओ! खुशहाल दुनिया का सपना मत दिखलाओ, कुछ हकीक़त में करो, एक जून की रोटी पैदा करो ज़मीन की सूखी छाती से... फिर देखें आपकी औकात, विश्व प्रेम, मानवतावाद!
                कबीर के जाने के बाद वह फर्श पर चटाई बिछाकर पड़ी रहती है - उनींदी-सी. ऊपर छतपर बिजली का पंखा लंगड़ा-लंगड़ाकर घूम रहा है, मरियल चाल से. घूमने से ज़्यादा शोर कर रहा है. दोपहर के वक्त ऊपरी मंज़िल का यह कमरा भट्टी में तब्दील हो जाता है. बैल्कनी के खुले हुये दरवाज़े से गर्म, सूखी हवा के झोंकें आ रहे हैं. धूल से भरा आसमान पीला दिख रहा है. बहुत ऊपर चक्कर काटती हुई चील की टिहकारी रह-रहकर सुनाई पड़ रही है. वह अपने आसपास को महसूसती है और तंद्रालस पड़ी रहती है. उसे हर समय ऐसा क्यों लगता है कि वह रोना चाहती है. बहुत कोशिश करके उसे हर काम करना पड़ता है. मन नहीं लगता. दौड़ते-भागते अचानक थक जाती है, यहां-वहां ढह पड़ती है, मुंह दबाकर रोने लगती है. सुबह उठकर सोचती है- ओह! एक और दिन... चूल्हा, धुआं, बर्तनों के अंबार के पीछे क्षितिज छिप जाता है. कितने दिन हो गये डूबता सूरज नहीं देखा, चांद का निकलना नहीं देखा... उसे अपने मामा के घर के आंगन में खड़ा बड़े नींबू का छतनार पेड़ याद आता है. बारिश के दिनों में हल्के पीले फूलों से भर जाता था. उनकी तेज़, मादक सुगंध... गहरी बैंजनी संध्या में खिड़की पर अनवरत झड़्ता आकाश और उस गंध से बोझिल भीगी हवा... याद करके वह आज भी सराबोर हो उठती है! इस तंग, छोटी कोठरी में उसे नींबू का वह पेड़, अप्रैल की उलटी-पलटी बहती हवा, बासंती शामें कुछ अधिक ही याद आती हैं.
           जब वहां थी तब कभी ऐसा नहीं लगा था कि ज़िन्दगी के ये दिन खूबसूरत हैं. तब भी तो वह किसी अच्छे दिन के इंतज़ार में इसी तरह खिड़की पर खडी रहती थी. बचपन में मां-बाप गुज़र गये थे. मामा ने ही पाला था. मगर मामी के दुर्व्यवहार से उसका जीवन त्रस्त था. नि:संतान मामी के हृदय में जाने क्यों विधाता ममता देना भी भूल गये थे. उनकी कोख की तरह ही उनका मन भी खाली रह गया था. वह रातदिन उनकी आंखों में खटकती रहती थी. मामा उसे अपनी आड़ में लिये रहते थे, मगर हर समय बचाना उनके लिये संभव नहीं था. हर समय घर के काम करते हुये उसके लिये पढ़ाई-लिखाई के लिये समय निकालना कठिन होता था. मामी की डांट-फटकार और घर भर के काम के बाद वह आंगन के किसी कोने में बैठकर तब भी किसी अच्छे दिन के सपने देखा करती थी. मगर तबके और अबके हालात में एक बहुत बड़ा फर्क ये है कि तब सारी मुसीबतों के बीच भी एक उम्मीद थी - उम्मीद एक दिन सब कुछ ठीक हो जाने की, हालत बदलने की. मगर अब वह उम्मीद भी नहीं बची है. अब लगता है कुछ होना नहीं है, कुछ बदलेगा नहीं! ज़िन्दगी इसी तरह ख़त्म हो जायेगी. सोचकर उसे घबराहट होती है.
         दोपहर के धुआंते आकाश में रंग के रेशे घुल रहे हैं, पश्चिम में सूरज दूर बेडौल ईमारतों के पीछे उतर रहा है. गर्मी से परेशान होकर वह बाहर बैल्कनी में निकल आई है. बाल पसीने से भीगकर कनपट्टियों पर चिपक गये हैं. ब्लाउज भी पीठ की तरफ से पूरी तरह भीगा हुआ है. सुराही में भी अब पानी ठंडा नहीं हो रहा. पानी पीकर लगता है प्यास और बढ़ गयी है. वह अपनी मुसी साड़ी में बैल्कनी में खड़ी सड़क की दूसरी ओर पार्क में खेलते बच्चों को देखती रहती है. बच्चों के दौड़ने से चारों ओर धूल उड़ रही है. पार्क की दीवार से लगकर गोलगप्पे, चिनिया बदाम, हवाई मिठाई, मलाई बरफ, फिरके, बलून आदि बेचनेवालों की भीड़ लगी है. पार्क के दूसरी तरफ पानी की बड़ी टंकी के पास बहुत से लोग गोल होकर भालू का नाच देख रहे हैं. भालूवाला डमरु बजाते हुये गा रहा है - राजा डिस्को जायेगा, राजा डांस करेगा...और बिचारा राजा अपने गंदे बड़े-बड़े बालों में गर्मी से त्रस्त पीछे के दो पंजों पर खड़ा होकर घुर्र-घुर्राते हुये हांफ-हांफकर थप-थप नाच रहा है. नाच की गति धीमी होते ही नाक की नकेल खिंची जाती है और वह तिलमिलाकर तेज़ी से उछलने लगता है. चारों तरफ धूल, धुआं, खुली हुई नालियां, शोर, भैंस का तबेला... शाम घिरते ही माथे पर फनल की तरह मच्छरों का जत्था मंडराने लगा है. उनकी तेज़ भनभनाहट को सुनते हुये उसके भीतर कुछ घुलाता रहता है. यहां बदबू है, घुटन है, गंदगी है... दूर गली के सिरे पर एक टुकड़ा मटमैला आकाश फटी हुई पतंग की तरह अटका हुआ है... ज़रा-सी खुली जगह, हवा और आकाश के लिये उसका मन अकुलाता रहता है. रसोई की धुआंयी दीवार पर लगे कैलेंडर के चित्र को वह बार-बार देखती है. शायद कश्मीर का है - हरी-भरी वादियां, नीली झील और बर्फ से ढंके पर्वत की सफेद चोटियां... वह आंख बंदकर गहरी सांस लेते हुये वहां की हवा को महसूस करने की कोशिश करती है. बहुत बार जब तेज़ गरमी में यह छोटा मकान किसी तंदूर की तरह तपने लगता है, उसका जी चाहता है दरवाज़ा खोलकर वह कहीं भाग जाये - कहीं भी जहां इतनी घुटन, इतनी गर्मी, इतनी गंदगी न हो...(क्रमशः)---------।

जयश्री राय ने बहुत ही कम समय में हिन्दी के युवा कथाकारों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। हजारीबाग बिहार में पैदा हुयी और गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में गोल्ड मेडलिस्ट जयश्री राय के अब तक तीन कहानी संग्रह(अनकही,तुम्हें छू लूं जरा और खारा पानी),तीन उपन्यास(औरत जो नदी है,साथ चलते हुये,इकबाल) और एक कविता संग्रह(तुम्हारे लिये) प्रकाशितइन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में नियमित कहानियों,कविताओं का प्रकाशन। फ़िलहाल गोवा में निवास और स्वतन्त्र लेखन।
सम्पर्क--मो.09822581137 ई-मे: jaishreeroykathakar@rediffmail.com


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विश्व रंगमंच दिवस पर-- हंगामाये वर्कशाप --बोले तो--चाकलेटी बच्चे/खुरदुरे बच्चे

बुधवार, 26 मार्च 2014


                                 
       गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं।गर्मी की छुट्टियों में शहरी बच्चों की तो मौज ही मौज रहती है।सुबह से शाम तक मौज।आप पूछेंगे वो कैसे तो भाई आप देख लीजिये न कोई अखबार उठाकर। हर अखबार में आपको विज्ञापन पढ़ने को मिल जायेगा---अमुक दिनांक से अमुक मुहल्ले के अमुक स्कूल में बच्चों के लिये नाट्य कार्यशाला,पेण्टिंग,नृत्य की कक्षाओं का आयोजन-----।
                  हर शहर में गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों के लिये एक बहार सी आ जाती है।आप कहेंगे ये कौन सी बहार है भैया जो गर्मियों में ही आती है?अरे जनाब ये बहार होती है वर्कशाप यानी कार्यशालाओं की।जिधर देखिये उधर कार्यशालायें।कहीं बच्चों को नाचना सिखाया जा रहा है तो कहीं गाना,कहीं ऐक्टिंग तो कहीं राइटिंग,कहीं पेन्टिंग तो कहीं क्राफ़्ट ।मतलब ये कि गर्मियां आते ही हर शहर कार्यशालामय हो उठता है।
            अभी कल शाम ही मुझे भी एक ऐसी ही वर्कशाप की प्रस्तुति में बतौर दर्शक जाने का सौभाग्य मिला था।ये सौभाग्य मुझे हर साल मिलता है।(शहर के बहुत से धनी महानुभाव कुछ धन का दान करके इन कार्यशालाओं में जज या मुख्य अतिथि भी बन जाते हैं।) कई वर्कशाप होती हैं शहर में।आप भी चाहें तो किसी वर्कशाप में जज बनने क सौभाग्य पा सकते हैं। वास्तविक जीवन में जज बनने का अवसर गंवा चुके लोगों के लिये यह एक सुनहरा मौका होता है।ऐसी वर्कशाप तो आप लोगों के शहरों में भी होती ही होंगी। हर शहर में गर्मी शुरू होते ही जैसे कोई वर्कशाप फ़्लू आ जाता है।जिधर देखो उधर वर्कशाप।चाहे वो लखनऊ हो दिल्ली हो या भारत का कोई और शहर।
                    कुछ भी हो भाई मुझे तो मजा आ गया स्टेज पर हुई प्रस्तुति देखकर।मैं देख तो रहा था स्टेज पर हो रही बच्चों की उछल कूद को लेकिन सोच रहा था उस बुद्धिमान आदमी के बारे में जिसने इन वर्कशापों को इजाद किया होगा।भाई खूब दिमाग लड़ाया होगा उसने…तभी तो इतने काम की चीज खोजी।आप जरा अपने बचपन के दिनों को याद करिये--- या अगर वहां तक नहीं पहुंच पा रहे तो थोड़ा दस साल पीछे चले जाइये---।क्या ऐसी वर्कशाप पहले होती थी कोई?मुझे तो नहीं याद आ रहा---लेकिन धन्य हो इसके खोजकर्ता और धन्य हो सांस्कृतिक कार्य विभाग---जिसकी बदौलत ये वर्कशाप हो रही हैं और हमारे जैसों को जज या मुख्य अतिथि बनने का अवसर मिल जाता है।
                                            अब आइये इन वर्कशापों के फ़ायदों की तरफ़ नजर डाल ली जाय। इन कार्यशालाओं से बच्चों का तो फ़ायदा है ही,अभिभावकों को भी बड़ा भारी लाभ मिलता है। आप पूछेंगे कैसे?अरे भाई सीधी सी बात है … महंगाई का जमाना है। छुट्टी होते ही बच्चे हल्ला करेंगे कि पापा कहीं घुमाओ…अब इतनी महंगाई---रिजर्वेशन की किल्लत---धरना प्रदर्शन---रैलीजाम और आतंकवाद के भय के साये  में बेचारे पापा कहां ले जायें बच्चों को। मान लीजिये किसी तरह सारे भयों पर विजय पा भी लें तो अर्थव्यवस्था---इसका इन्तजाम कहां से होगा?छोटी से छोटी जगह भी ले जायेंगे तो दस हजार का खर्चा।कहां से आयेगा ये पैसा?लिहाजा पापा भी सोचते हैं कौन पचड़े में पड़े?पांच सौ रुपया टिकाया किसी वर्कशापिये को और तीस चालीस दिनों के लिये बच्चे से फ़ुरसत।बच्चा भी व्यस्त …वर्कशाप में … और मां बाप भी पा गये फ़ुर्सत।पापा ट्वेण्टी ट्वेण्टी का मैच देखने और मम्मी किटी पार्टी या फ़िर चबूतरा पंचायत में हिस्सा लेने के लिये।
                            पर एक बड़ी अजीब बात है।जो मेरे दिमाग को बहुत दिनों से मथे जा रही है। हो सकता है मेरी ही तरह आप लोग भी कुछ ऐसा ही सोचते हों।वो बात या मुद्दा यह है कि इन वर्कशापों का फ़ायदा सिर्फ़ शहरी बच्चों और मां बाप के लिये ही है…हमारे गांव की आबादी के बच्चों(जिनकी संख्या शहरी बच्चों से कई गुना ज्यादा होगी) को इन वर्कशापों का सुख नहीं नसीब होता।पता नहीं ये वर्कशापिये गांव के बच्चों को इसके योग्य नहीं समझते या फ़िर गांव के मां बाप में कोई नुस्ख है।लेकिन आप खुद सोचिये कितनी बड़ी विडम्बना है ये कि हमारे देश की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता है और उन गांव के बच्चों के लिये ऐसी कोई वर्कशाप,समर कैम्प,हाबी क्लासेज …कुछ भी नहीं। बेचारे वो गंवई गंवार बच्चे तो इन वर्कशापों के बारे में कुछ जानते भी नहीं।उनको अपने गांव,स्कूल और स्कूल के मास्साब के अलावा कोई बताने वाला भी नहीं।लेकिन इसमें उन बेचारों का क्या दोष? 
                                    दोष तो हमारे आयोजकों(वर्कशापियों)का है।जो शहर के अलावा गांवों का रास्ता जानते ही नहीं। उनकी नजरों में पूरा भारतवर्ष बस कुछ चुनिन्दा शहरों तक सीमित है।जो कुछ भी है वो सब सिर्फ़ शहरी बच्चों के लिये।उन बच्चों के लिये जिनके पास बिजली भी है,टी वी,कम्प्युटर,सिनेमाहाल,चिड़ियाघर,सर्कस,घूमने खेलने  के लिये पार्क सभी कुछ है।गांवों के वो बच्चे जो किसी तरह से स्कूल तक पहुंच पाते हैं,जिनकी दुनिया सिर्फ़ और सिर्फ़ गांवों के स्कूलों और कच्ची पक्की गलियों तक ही सीमित है…क्या उनकी तरफ़ इन वर्कशापियों या समर कैम्प के आयोजकों की नजर नहीं पड़ती? सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से इन वर्कशापों के लिये अनुदान और ग्रान्ट भी दी जाती है…बहुत सी नाट्य संस्थायें तो सरकार से यही अनुदान लेने के लिये ही बच्चों के इन समर कैम्प्स का आयोजन करती हैं…।बाकी के साल भर उनकी कोई गतिविधि नहीं दिखाई पड़ती। मेरा सिर्फ़ ये कहना है कि सांस्कृतिक कार्य विभाग क्यों नहीं इन वर्कशापियों को गांवों की तरफ़ भेजता…वहां जाकर वो लोग गांव के बच्चों के लिये भी तो कुछ काम करें।कम से कम हमारे गांवों के बच्चे भी तो जानें कि नाटक,वर्कशाप,थियेटर,पेन्टिंग,एक्जीबीशन जैसे शब्दों के माने होता क्या है?या सब कुछ शहरों तक ही सीमित रहेगा?मुझे लगता है इस मुद्दे पर हम सभी को सोचने के साथ ही कुछ ठोस निर्णय लेने की भी जरूरत है।
                                 
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ड़ा0हेमन्त कुमार

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“शब्दों,भावनाओं और प्रकृति का अनूठा कोलाज—“उन्मेष”

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

पुस्तक समीक्षा
                                                   
                                     पुस्तक :उन्मेष
कवियत्री:मानोशी


प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन
इलाहाबाद।
मूल्य: रू0200/- मात्र।
प्रथम संस्करण:2013

       आज की हिन्दी कविता सामाजिक सरोकारों से ज्यादा जुड़ी है। इसमें व्यवस्था का विरोध है।आम आदमी की चिन्ताएं हैं।देश,समाज,प्रकृति,पर्यावरण,राजनीति जैसे सरोकारों को लेकर वैश्विक स्तर की सोच है।और इन्हीं सरोकारों,संदर्भों और चिन्ताओं के अनुरूप ही आज की हिन्दी कविता का शिल्प,भाषा और बुनावट भी है। नई कविता की शुरुआत के साथ ही उसके शिल्प,रचनात्मकता,भाषा और बुनावट में भी तरह-तरह के प्रयोग और बदलाव होते रहे हैं। इन प्रयोगों और बदलावों का हिन्दी काव्य पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह का प्रभाव पड़ा। सकारात्मक यह कि कविता के पाठको को नये बिम्ब,नये गठन और शिल्प की प्रयोगधर्मी रचनाए पढ़ने को लगातार मिल रही हैं। नकारात्मक यह कि काव्य से गेय तत्व क्रमशः कम होने लगा। छंदात्मक रचनाए कम लिखी जाने लगी।सपाट बयानी का पैटर्न धीरे-धीरे हिन्दी काव्य पर हावी होने लगा। लोगो में कविता पढ़ने के प्रति रुझान कम होने लगी।
                और आज हिन्दी कविता का जो परिदृश्य है उसमे उन्मेष जैसे काव्य संकलन को पढ़ना अपने आप मे एक बहुत ही कोमल और सुखद अनुभूतियों से रूबरू होना है। कनाडा में  रह रहीं युवा कवियत्री मानोशी के प्रथम काव्य संकलन उन्मेष को पढ़ना हिन्दी कविता की एक अद्भुत यात्रा से गुजरने जैसा है। एक ऐसी यात्रा जिसमें मानवीय संवेदनाएं हैं,प्रेम है,प्रकृति के विभिन्न रंग हैं,नई और ताजी अनुभूतियां हैं तो साथ ही सामाजिक सरोकार और मार्मिकता भी है।
               उन्मेष संकलन में मानोशी ने काव्य के तीन रूपों को संकलित किया है।गीत,गज़ल और छंदमुक्त कविता। इनमें भी गीत और गज़ल अधिक हैं कविताएं कम। संकलन के अंत में कुछ हाइकु,क्षणिकाएं और दोहे भी हैं।
   मानोशी  के गीतों की बात शुरू करने से पहले मैं इस बात का उल्लेख जरूर करना चहूंगा कि लगभग 2008में इंटरनेट से जुड़ने और अपना ब्लाग शुरू करने के दौरान ही मैं उनके ब्लाग मानसी तक पहुंचा था।उस समय इनकी रचनाएं भी ब्लाग पर अधिक नहीं थीं। पर इनके कुछ गीतों को पढ़ कर ही मैंने उसी समय मानोशी से कहा था कि आप की रचनाओं पर छायावाद का काफ़ी प्रभाव है। और आपकी रचनाएं पढ़ते वक्त बार-बार महादेवी जी की याद आती है।
                मानोशी के गीतों में जो नयापन,ताज़गी,प्रकृति के प्रति सम्मोहन है वह आज की युवा कवियत्रियों में कम ही दिखाई पड़ती है। उनका प्रकृति से लगाव और प्रकृति के निरीक्षण की सूक्ष्मता हमें संकलन के पहले ही गीत पतझड़ सी पगलाई धूप में देखने को मिलता है।

पतझड़ सी पगलाई धूप।
भोर भैइ जो आंखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप।
अनमन सी अलसाई धूप।
 अब धूप का पीठ पर लोटना,लम्बी जम्हाई लेना,अलसाना जैसे खूबसूरत बिंब हमारे सामने शब्दों के द्वारा सुबह के समय की धूप,सूरज---का अद्भुत कोलाज बनाते हैं। ऐसा लगता है धूप ने एक मानवीय आकार ग्रहण कर लिया हो और वह कवियत्री के समक्ष अपनी विभिन्न क्रीड़ाओं का प्रदर्शन कर रही हो।
          इसी गीत के अंतिम छंद में फ़ुदक  फ़ुदक खेले आंगन भर---खाने खाने एक पांव पर। पंक्तियों को आप देखिये आप कल्पना करिये कि धूप आंगन में एक-एक खाने पर पांव रख कर फ़ुदक रही है। जैसे बच्चे चिबड्डक या सिकड़ी के खेल में करते हैं। प्रकृति के विभिन्न रूपों,खेलों और छवियों का ऐसा अद्भुत वर्णन ही मानोशी के गीतों को अन्य युवा कवियत्रियों से अलग स्थान प्रदान करता है।
सखि वसंत आया”—गीत को अगर किसी पाठक के सामने एक अलग पन्ने पर लिखकर दिया जाय तो शायद उसे विश्वास ही नहीं होगा कि यह गीत आज की किसी युवा कवियत्री की रचना है। वह इसे निश्चित रूप से छायावादी काल की ही रचना मान बैठेगा।
   मानोशी ने अपने कुछ गीतों गर्मी के दिन फ़िर से आए,पुनः गीत का आंचल फ़हरा,संध्या आदि में जहां प्रकृति को बहुत गहराई तक महसूस करके उनका बहुत सूक्ष्म चित्रण किया है वहीं लौट चल मन,क्या यही कम है,कौन किसे कब रोक सका है,कोई साथ नहीं देता,प्रिय करो तुम याद आदि  गीतों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और प्रेम की घनीभूत अनुभूतियों को अपना विषय बनाया है।मानोशी का प्रेम भी साधारण प्रेम नहीं है। वह पाठकों को हृदय के भीतर गहराई तक आन्दोलित कर जाने वाला प्रेम है।
हूक प्रेम की शूल वेदना
अंतर बेधी मौन चेतना
रोम रोम में रमी बसी छवि
हर कण अश्रु सिक्त हो निखरा
धूमिल धुंधला अंग न बदला।
उनके प्रेम में हमें विरह की वेदना सुनाई पड़ती हैहाय मैं वन वन भटकी जाऊं, तो दूसरी ओर समर्पण और पूर्णता का एक अनोखा रूप भी दिखाई पड़ता है--दीप बन कर याद तुम्हारी—”
       उन्मेष में संकलित मानोशी के तीस गीतों में हमें प्रकृति,मानवीय संवेदनाओं,अनुभूतियों और प्रेम के अनेकों इन्द्रधनुष खिलते बिखरते दिखाई देते हैं।अगर हम गज़लों की बात करें तो इसमें संकलित 21 गज़लों में हमें मानव जीवन के तमाम रंग और रूप दिखाई देते हैं।मानोशी की गज़लों की खास बात इसकी सहजता,सरलता और बोधगम्यता है।गज़लें पढ़ते समय हमें कहीं पर भी उसे समझने या उसका सार ग्रहण करने में कठिनाई नहीं महसूस होती है।
 इस संकलन में 10 मुक्त छंद,कुछ हाइकु,क्षणिकाएं और दोहे भी हैं। मानोशी की इन रचनाओं का भी सरोकार प्रकृति के निरीक्षण,प्रेम और मानवीय संवेदनाओं से ही जुड़ा है। अपनी कविता बेघर में जब मानोशी कहती हैं घुटनों से भर पेट/फ़टे आसमां से ढक बदन/पैबंद लगी जमीन पर/सोता हूं आराम से। तो अचानक ही हमें निराला की भिक्षुक कविता की याद आती है---पेट पीठ दोनों मिल कर हैं एक/चल रहा लकुटिया टेक---।
         कुल मिलाकर उन्मेष में मानोशी ने मानवीय संवेदनाओं,प्रकृति से जुड़ी अनुभूतियों और प्रेम के विविध रंगों को शब्दों में पिरोकर काव्यचित्रों का जो अद्भुत अनोखा संसार सृजित किया है वह कवियत्री के रचनाकर्म की सबसे बड़ी सार्थकता है।
          यहां एक बात मैं और कहना चाहूंगा वह यह कि यद्यपि मानोशी की रचनाएं अभी तक सिर्फ़ अपने ब्लाग मानसी और अंतर्जाल की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में ही प्रकाशित होती रही हैं। लेकिन उन्मेष हमें इस बात के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि मानोशी आने वाले समय में हिन्दी कविता में निश्चित रूप से अपनी एक अलग पहचान बना लेंगी।
                              0000
डा0हेमन्त कुमार


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एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम-----

रविवार, 9 मार्च 2014

आदरणीय नेता जी,
सादर चरणस्पर्श।
        आशा करता हूं अन्य सभी प्रत्याशियों की ही तरह आप भी अपने चुनाव की तैयारी में व्यस्त हो चुके होंगे।लोगों से चन्दा इकट्ठा करने से लेकर हर मुहल्ले,गांव,गलीसभी की यात्रायें आप भी शुरू कर चुके होंगे।घर घर जाकर लोगों से वोट देने की सिफ़ारिश कर रहे होंगे।आखिर पांच सालों के बाद ही लोगों से मुलाकात करने का जो मौका मिलता है।यही तो वो अवसर होता है जब आम जनता के साथ आप अपनी सारी नातेदारियां,सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश करते हैं।बस इस अवसर के बाद तो हमारे मां-बाप,अध्यापक,बड़े बूढ़े,गांव के,शहर के सभी लोग, आपको ढूंढ़ते ही रह जायेंगे---सर्फ़ एक्सेल के दाग की तरह।और आप कहीं नजर ही नहीं आयेंगे।
             अगर आप चुनाव जीत गये तो देश के बहुत सारे महत्वपूर्ण कामों में संलग्न हो जायेंगे।मसलन तरह तरह के घोटाले करने,देश के विकास के लिये इकट्ठा जनता की खून पसीने की कमाई के धन को अपने बैंक एकाउण्ट्स में जमा करवाने,अपने विरोधियों को एक एक कर रास्ते से हटाने,समय समय पर देश के विकास के नाम पर विदेश यात्रायें करने,किसी अबला नारी का शोषण करने और बाद में उसकी हत्या करवाकर अपनी प्रतिष्ठा बचाने-----ऐसे ढेरों काम होंगे आपके पास। भला ऐसे में आपको देश की जनता से मिलने,उसकी खैरियत जानने की फ़ुर्सत कहां मिलेगी?
   खैर यह तो आपकी और देश की जनता की आपसी बात है मैं इस पचड़े में क्यों पड़ूं।मैं अब अपने मूल मुद्दे पर आ रहा हूं।
          मैं आप सभी को यह चिट्ठी खास तौर से यह जानने के लिये लिख रहा हूं कि इन चुनावों में कभी हमारे यानि कि बच्चों की बात को मुद्दा क्यों नहीं बनाया जाता।मुझे बहुत आश्चर्य इस बात पर होता है कि इस देश में चुनाव जीतने के लिये हर पार्टी अपना कोई न कोई  मुद्दा जरूर बनाती है।कोई देश से गरीबी खतम करने का तो कोई बेरोजगारी खतम करने का।कोई पूरे देश में हजारों उद्योग धंधे लगाने को तो कोई गांव गांव तक बिजली,पानी पहुंचाने को।कोई कहता है हम हरित क्रान्ति ला देंगे,तो कोई चिल्लाता है कि हम हर घर के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी की गारण्टी लेते हैं।जितने नेता उतने ही मुद्दे।
  जब देश के विकास के सारे मुद्दे खतम तो मन्दिर मस्जिद का मुद्दा,धर्म सम्प्रदाय का मुद्दा,जाति बिरादरी का मुद्दा,आरक्षण देने का मुद्दा---कहां तक गिनाऊं नेता जी ---आप लोगों के पास तो मुद्दों का कोई खजाना गड़ा हुआ है।चुनाव आया नहीं कि मुद्दे निकलने शुरू।अब वो मुद्दे पूरे होंगे या नहीं इस बात की गारण्टी तो न आप लेते हैं न ही आपकी पार्टी।और फ़िर इनके पूरे होने की जरूरत भी क्या है।ये तो आप लोग सिर्फ़ जनता को रिझाने,उसे भरमाने के लिये ही अपने चुनावी एजेण्डे में डालते हैं। चुनाव खतम आप चुन लिये गये विधायक या मंत्री बन गये बस इन मुद्दों की बात भी खतम।अगले चुनाव में फ़िर नये मुद्दे निकाले जायेंगे।
        लेकिन मेरे सम्माननीय,आदरणीय नेता जी लोग आपसे मैं  इस भारत देश के सारे बच्चों की ओर से पूछना चाहता हूं कि किसी भी चुनाव में आप लोग हमें यानि बच्चों को मुद्दा क्यों नहीं बनाते?क्या हम लोग इस देश में नहीं रहते?या हमारा इस भारत देश से कोई नाता नहीं है?क्या हम यहां के नागरिक नहीं माने जाते?फ़िर क्यों हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है कि देश का कोई भी नेता चुनाव के समय हमें,हमारी बिरादरी,हमारे विकास,हमारे बचपन को मुद्दा क्यों नहीं बनाता है?
     एक तरफ़ तो आप बड़े लोग यह भी कहते हैं कि बच्चे ही हमारे देश के भविष्य हैं,इन्हीं के कन्धों पर कल राष्ट्र का भार आना है,ये ही हमारे देश का नाम रौशन करेंगे---और दूसरी तरफ़----चुनाव के समय हम पूरी तरह से गायब।न ही आप हमारे किसी हित को मुद्दा बना रहे,न ही हमारे भविष्य की बात कर रहे,नही हमारी शिक्षा,हमारे स्वास्थ्य,हमारे अधिकारों,को चुनावी मुद्दा बना रहे।आखिर माजरा क्या है?कहीं यह हमारे खिलाफ़ कोई साजिश तो नहीं रच रहे आप लोग?इसलिये कि हम अबोध हैं,हम आपकी तरह खुद को स्थापित करने के लिये हर तरह के हथकण्डे नहीं अपना सकते,हम कमजोर हैं,हम सच्चे और पवित्र दिल,आत्मा वाले कहे जाते हैं?
       आदरणीय नेता जी,एक अनुरोध मैं सभी बच्चों की तरफ़ से आपसे और करना चाहूंगा किआप भले ही हम बच्चों को अपने चुनाव का मुद्दा न बनायें।यह हमें मंजूर है। लेकिन चुनाव जीत जाने,विधायक या मंत्री संत्री बन जाने के बाद कम से कम आप लोग इतना तो कर ही सकते हैं कि---
(1)      हमारी शिक्षा के लिये आवंटित धन का कुछ हिस्सा तो हमारी शिक्षा पर ही खर्च करवायें।बाकी को अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने,विभाग के अधिकारियों से लेकर सभी हाकिम हुक्कामों की ऐयाशी पर खर्च करें।।
(2)      मुझे आशा है कि आप हमारे स्वास्थ्य की रक्षा के लिये आवंटित कुल धन का सिर्फ़ पचास प्रतिशत ही हमारे ऊपर खर्च करके लाखों की संख्या में मरने वाले हमारे भाई बहनों को जरूर बचा सकते हैं।बाकी का सारा धन आप कहीं भी खर्च करने के लिये स्वतन्त्र हैं।उससे चाहे अपनी कोठियां बनवाइये या फ़िर फ़ार्म हाउस खरीदिये।
(3)      सुना हैविश्व बैंक के अलावा भी युनिसेफ़,यु एन डी पी,डब्ल्यू एफ़ पी, जैसी विश्व स्तर की कई एजेंसियां भी हम बच्चों के विकास,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के लिये बहुत ढेर सारा रूपया देती हैं।आप चुनाव जीतने के बाद जरा पता करियेगा कि आखिर वो सारा रुपया जाता कहां है?कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके ही हाकिम हुक्काम लोग सारा धन आपस में ही बांट लेते हों और आपको खबर भी न लग पाती हो?क्योंकि उस पैसे से जितना विकास हम बच्चों का होना चाहिये वो तो हो नहीं रहा। फ़िर जाता कहां है वो धन?
(4)      माननीय नेता जी,ये तो आप भी जानते होंगे कि शिक्षा ही किसी देश के विकास की असली सीढ़ी है।फ़िर देश की आजादी के इतने बरस बीत जाने के बाद भी आप भारत में पूर्ण साक्षरता क्यों नहीं लागू कर पाये?आज भी देश में इस शिक्षा के लिये तरह तरह के अभियान चलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
(5)      या कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके मन में यह डर कहीं छिपा बैठा हो कि अगर देश के सारे लोग पढ़ लिख लेंगे,अपना भला बुरा समझने लगेंगे,सफ़ेद स्याह का अन्तर जान जायेंगे तो इस देश की हुकूमत आप लोगों के हाथों से निकल जायेगी?यहां कि जनता आपसे आपके द्वारा किये गये एक एक कार्य का हिसाब मांगने लगेगी।
(6)      महोदय, मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि अभी इस देश में ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला जो आपकी हुकूमत छीन सके।बस आप लोग किसी तरह ऐसा पुख्ता बन्दोबस्त कर दें कि इस देश का विकास अगले सौ सालों तक इसी गति से हो जिस गति से आप चाहें।बस आपका काम पूरा।न लोग जागृत होंगे न ही उनमें समझ पैदा होगी न ही आपका राज पाट छीनेगा।
     माननीय महोदय,आशा करता हूं कि आप मुझ अबोध की बातों पर अवश्य ध्यान देंगे।      और अगर इस अबोध ने आपके सम्मान में कुछ गलत कह दिया हो तो उसे भी आप एक        शिशु की नादानी समझ कर माफ़ कर देंगे।अपनी अगली चिट्ठी में मैं आपसे कुछ और भी        बातें करूंगा।सादर।
  आपके गांव का
  एक बच्चा
                               0000
     ड़ा0हेमन्त कुमार

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लघुकथा-- एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें

शनिवार, 18 जनवरी 2014

(फ़ोटो--गूगल से साभार)
शहर का एक प्रमुख पार्क।पार्क के बाहर गेट पर बैठा हुआ एक अत्यन्त बूढ़ा भिखारी।बूढ़े की हालत बहुत दयनीय थी।पतला दुबला, फ़टे चीथड़ों में लिपटा हुआ।पिछले चार दिनों से उसके पेट में सिर्फ़ दो सूखी ब्रेड का टुकड़ा और एक कप चाय जा पायी थी।बूढ़ा सड़क पर जाने वाले हर व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करने के लिये हांक लगाता----खुदा के नाम परएक पैसा इस गरीब कोभगवान भला करेगा।सुबह से उसे अब तक मात्र दो रूपया मिल पाया था,जो कि शाम को पार्क का चौकीदार किराये के रूप में ले लेगा।
               अचानक पार्क के सामने एक रिक्शा रुका।उसमें से बाब कट बालों वाली जीन्स टाप से सजी एक युवती उतरी।युवती कन्धे पर कैमरा बैग भी लटकाये थी।यह शहर की एक उभरती हुयी चित्रकर्त्री थी ।इसे एक पेण्टिंग के लिये अच्छे सब्जेक्ट की तलाश थी।बूढ़े को कुछ आशा जगी और उसने आदतन हांक लगा दी----भगवान के नाम पर----
                युवती ने घूम कर देखा।बूढ़े पर नजर पड़ते ही उसकी आंखों में चमक सी आ गयी।वह कैमरा निकालती हुयी तेजी से बूढ़े की तरफ़ बढ़ी।बूढ़ा सतर्क होने की कोशिश में थोड़ा सा हिला।
        प्लीज बाबा उसी तरह बैठे रहो हिलो डुलो मत।और वहां कैमरे के शटर की आवाजें गूंज उठी।युवती ने बूढ़े की विभिन्न कोणों से तस्वीरें उतारीं।युवती ने कैमरा बैग में रखा और बूढ़े के कटोरे में एक रूपया फ़ेंक कर रिक्शे की ओर बढ़ गयी।
            उसी दिन दोपहर के वक्ततेज धूप में भी बूढ़ा अपनी जगह मुस्तैद था।उसे दूर से आता एक युवक दिख गया ।बूढ़ा एकदम टेपरिकार्डर की तरह चालू हो गया।अल्लाह के नाम पर-------
           पहनावे से कोई कवि लग रहा युवक बूढ़े के करीब आ गया था।युवक ने बूढ़े को देखा।उसका हृदय करुणा से भर गया।ओह कितनी खराब हालत है बेचारे की।सोचता हुआ युवक पार्क के अन्दर चला गया।पार्क के अन्दर वह एक घने पेड़ की छाया में बेंच पर बैठ गया।बूढ़े का चेहरा अभी भी उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।उसने अपने थैले से एक पेन और डायरी निकाली और जुट गया एक कविता लिखने में।कविता का शीर्षक उसने भी भूख रखा।फ़िर चल पड़ा उसे किसी दैनिक पत्र में प्रकाशनार्थ देने।भिखारी की नजरें दूर तक युवक का पीछा करती रहीं।

         जगह वही पार्क का गेट।शाम का समय।पार्क में काफ़ी चहल पहल हो गयी थी ।भिखारी को अब तक मात्र तीन रूपये मिले थे।वह अब भी हर आने जाने वाले के सामने हांक लगा रहा था । अचानक भिखारी ने देखा एक खद्दरधारी अपने पूरे लाव लश्कर के साथ चले आ रहे थे।उसकी आंखो में चमक आ गयी।-----अब लगता है उसके दुख दूर होने वाले हैं।उसने जोर की हांक लगाई।----खुदा के नाम पर --------
                           हांक सुन कर नेता जी ठिठक गये।बूढ़े की हालत देख कर उनका दिल पसीज गया। ओह कितनी दयनीय दशा है देश की----।
         उन्होनें तुरन्त अपने सेक्रेट्री को आर्डर दिया----कल के अखबार में मेरा एक स्टेट्मेण्ट भेज दो हमने संकल्प लिया है देश से भूख और गरीबी दूर करने का। और हम इसे हर हाल में दूर करके रहेंगे।नेता जी भिखारी के पास गये और उसे अश्वासन दिया बाबा हम जल्द ही तुम्हारी समस्या दूर करने वाले हैं------उन्होंने बूढ़े भिखारी के साथ कई फ़ोटो भी खिंचवायी।लाव लश्कर के साथ कार में बैठे और चले गये।बूढ़े की निगाहें दूर तक धूल उड़ाती कार का पीछा करती रहीं।
                       अब तक काफ़ी अंधेरा हो चुका था।पार्क में सन्नाटा छा गया था।बूढ़े ने सुबह से अब तक मिले तीन रूपयों में से दो रूपया पार्क के चौकीदार को दिया।फ़िर नलके से पेट भर पानी पीकर बेन्च पर सो गया-----अगली सुबह के इन्तजार में ।
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डा0हेमन्त कुमार

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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