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समय की आवश्यकता है----पाठ्यक्रम में रंगमंच

शुक्रवार, 2 जून 2017

समय की आवश्यकता है----पाठ्यक्रम में रंगमंच

                इसे सामाजिक विडम्बना ही कहा जाएगा कि आज भी हम बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिये पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं।यह लोकतन्त्र की प्राथमिक आवश्यकता है और हमारा राष्ट्रीय धर्म भी। आज बच्चों को स्कूलों में हर विषय की शिक्षा देने का प्राविधान है।जिसमें संगीत, नृत्य, चित्रकला,खेल-कूद और कम्प्यूटर जैसे विषय सम्मिलित हैं।इन विषयों के लिये स्कूलों में अलग से शिक्षक भी हैं,और अध्ययन की सुविधा भी। परन्तु एक विषय की ओर अभी तक विद्यालयों में ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वह है पंचम वेद के नाम से जाना जाने वाला नाट्यशास्त्र यानि रंगमंच और रंग कर्म। इसे आसान बोलचाल की भाषा में नाटक या थियेटर भी कह सकते हैं।

             मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार बच्चों के सर्वांगीण विकास में रंगमंच का एक बहुत बड़ा योगदान है।यही वह माध्यम है जिसके द्वारा बच्चा एक बड़े समुदाय के साथ जुड़ सकता है।जन सामान्य के सामने अपने को प्रस्तुत करने की उसकी झिझक दूर होती है और उसकी वाक शक्ति का विकास होता है। उसके अंदर समूह में कार्य करने के साथ ही नेतृत्व की क्षमता भी विकसित होती है।
            शिक्षा में रंगमंच की अवधारणा कोई नई बात नहीं है। इसकी आवश्यकता का अनुभव सर्व प्रथम यूरोप में किया गया। जहां सन 1776 में मैडम जेनेसिस ने थिएटर आफ़ एजूकेशन की स्थापना की और बच्चों को प्रशिक्षित करके नाटकों का मंचन किया। इस प्रकार रंगमंच को शिक्षा में लाने की शुरुआत हुई। हमारे देश में भी समय के साथ इसकी आवश्यकता महसूस की गयी। और सन 1965 में शैक्षिक रंगमंच की शुरुआत हुयी।किन्तु यह प्रयास मात्र चर्चाओं और गोष्ठियों का विषय बन कर रह गया। वर्ष 1980 के बाद संगीत नाटक अकादमी,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और भारतेन्दु नाट्य एकेडमी की ओर से किये गये प्रयासों से कुछ चेतना तो आई पर वह अपना कोई स्वरूप नहीं बना पाया।
             बच्चे किसी भी देश के भविष्य होते हैं।बचपन से ही यदि उनमें रंग संस्कार पड़ जायें तो यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होगा।इस माध्यम से बच्चों में कल्पना शक्ति,वाक्शक्ति,अनुभूति प्रदर्शन,अभिव्यक्ति की क्षमता,चलने फ़िरने का ढंग,नेतृत्व क्षमता एवं व्यक्तिगत कौशल का विकास होता है।रंगमंच बच्चों को जिम्मेदार बनाता है।उनमें अनुशासन के साथ साथ समयबद्धता के गुण लाता है। यही वो तत्व हैं जो लोकतन्त्र की नींव हैं और बच्चों को एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।परन्तु यह देखकर दुख होता है कि इस विधा का जितना लाभ बच्चों को मिलना चाहिये उतना लाभ बच्चे उठा नहीं पा रहे हैं।मात्र गर्मी की छुट्टियों और विद्यालयों के वार्षिक उत्सवों तक बाल रंगमंच को सीमित करके कहीं हम उनके विकास में बाधक तो नहीं बन रहे हैं? यह एक चर्चा का विषय है।
          बाल रंगमंच प्रशिक्षक के नाते यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जो नाटक बच्चों के लिये मंचित किये जाते हैं,उन्हें बच्चे बड़ी ही रुचि से देखते हैं।यदि नाटक बच्चों की मानसिकता को ध्यान में रखकर लिखा गया है तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ेगा ही,क्योंकि बच्चों में अनुकरण की अपूर्व शक्ति होती है। दृश्य एवं श्रव्य दोहरा माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव भी दोहरा होता है। वर्तमान समय में व्यक्ति परिवार और समाज की व्यस्तताएं कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी  हैं। जिसके कारण कदम-कदम पर भटकाव बढ़ रहा है। सामाजिक परिवेश प्रदूषित सा हो रहा है।टेलीविजन और इण्टरनेट संस्कृति का दुरुपयोग हमें अपसंस्कृति की ओर ले जा रहा है।इसका प्रभाव बच्चों पर कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है। ऐसे में बाल रंगमंच जैसे सार्वजनिक और सशक्त माध्यम की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। बच्चों की इसमें सीधी सहभागिता होने के कारण बच्चों में आत्मविश्वास,सृजनात्मक क्षमता,संवेदनशीलता और टीम वर्क की भावनाएं स्वतः ही जागृत हो जाती हैं। अपनी वाक्शक्ति के प्रदर्शन से वे आत्मविश्वास से भर जाते हैं।कभी-कभी यह भी देखा गया है कि कुछ ऐसे बच्चे जिनमें हकलाहट की समस्या थी थियेटर ज्वाइन करने के बाद उनकी समस्या खतम हो गयी। उनमें खोया हुआ आत्म विश्वास वापस आ गया। ऐसे  बच्चों में एकाग्रता,स्मरण शक्ति भी बढ़ती है। उनमें एक आंतरिक अनुशासन आता है। यह जागरूकता उन्हें अपने समय और परिवेश के साथ सीधे जोड़ने का काम करती है।
       एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि बच्चा 6 वर्ष की आयु तक 40 प्रतिशत और 18 वर्ष की आयु तक 80 प्रतिशत संस्कार ग्रहण कर लेता है। और ये संस्कार उस बच्चे के साथ जीवन भर चलते हैं।केवल 20 प्रतिशत संस्कार ही आगे जुड़ते हैं या परिवर्तित होते हैं। बच्चों द्वारा खेले जाने वाले बाल मनोविज्ञान पर आधारित नाटक ही सही मायनों में बाल रंगमंच कहलाता है।जटिल से जटिल विषयों को भी रंगमंच के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है। बाल रंगमंच के विकसित न हो पाने का एक कारण और भी है। अधिकांश माता पिता रंगकर्म को पढ़ाई से अलग मानकर उसे पढ़ाई में बाधा मानते हैं। सारा माहौल पढ़ाई और कैरियर पर ही केन्द्रित रहता है। ऐसे में रंगमंच जैसे माध्यम को समझने या अपनाने की न तो कोई इच्छा होती है और न ही इसके लिये अलग से कोई समय।
                बाल रंगमंच का व्यापक और प्रभावी विकास तभी हो सकता है जब इसे स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षा से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। इसकी उपादेयता को स्वीकार तो सभी करते हैं पर शासन द्वारा इस दिशा में कोई प्रयत्न न किये जाने के कारण बात आई-गई रह जाती है।
          विगत दो दशकों से बाल रंगमंच के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। जागरूकता भी आई है। पर यह केवल कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित है। यदि बाल रंगमंच की संभावनाओं को कुछ अधिक व्यावहारिक आधार मिले तो इसका विकास निश्चित ही सम्भव है। इसके लिये शासन,विद्यालय,अभिभावक तथा रंगकर्मियों को मिलकर कुछ ठोस सामूहिक प्रयास कर अपने दायित्व निभाने होंगे।
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लेखक
अभिनव पाण्डेय
मोबाइल-07275866955
युवा रंगकर्मी अभिनव पाण्डेय ने भारतेन्दु नाट्य एकेडमी,लखनऊ से रंगकर्म सीखा है।अभिनव पाण्डेय ने कई टी0वी0 सीरियल्स में सहायक निर्देशक का कार्य करने के साथ ही कुछ डाक्युमेण्ट्री फ़िल्मों का भी निर्माण किया है। टी वी से जुड़ने के बावजूद इनका मन और दिल रंगकर्म में अधिक बसता है,खासकर बच्चों के साथ काम करना इन्हें अधिक प्रिय है। दिल्ली,पुणे, लखनऊ,मुम्बई में काम करने के बाद फ़िलवक्त दिल्ली  में रहकर बच्चों के लिये रंगमंच  की पृष्ठभूमि बनाने का काम कर रहे हैं।
                

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गीतांजलि गिरवाल की कविताएं

शुक्रवार, 26 मई 2017

(युवा रंगकर्मी और कवयित्री गीतांजलि गिरवाल  की कविताओं में एक आग है।आज की  नारी के प्रति वो हमेशा चिंतित रहती हैं।नारी के ऊपर सदियों से पुरुष प्रधान समाज द्वारा जो अत्याचार हो रहे हैं वो उनके अन्तः को उद्वेलित करते हैं और तीक्ष्ण धारदार शब्दों का आकार लेकर एक कविता का रूप लेते हैं।उन्हीं कविताओं में से आज दो कविताएं  आप सभी के लिए ।)         
(1)
भद्र-पुरुष 
कैसे तौलते हो तुम एक नारी को 
ओ भद्र पुरुष

उसके शरीर के भूगोल से 
कि उसके उन्नत उरोजों से
कि गुलाबी गाल या सुनहरे
या काले बालों से
या फिर उसकी लहराती चाल से
क्या पहचान है तुम्हारी आँखों में 
एक नारी की
ओ भद्र पुरुष

उसका सधा गठीला बदन
जो मात्र भोग्या बन तुम्हारी 
कामोत्तेजना को बढ़ा सके
या फिर ये देखते हो कि सब कुछ सह कर
भी वो मुँह ना खोले
सदा चेहरे पर चिरपरिचित मुस्कान
के साथ सुबह से शाम मजदूरी करती रहे
क्या चाहते हो तुम एक नारी से
ओ भद्र पुरूष

तुम्हारा गुणगान गाते रहना
तुम्हारे हर अत्याचार के बाद भी चुप रहना
पैसो के लिए सदा तुम्हारी कृपा पात्र बनना
"
औरतो में दिमाग कहा होता है"
ये सुन सुन कर जीवन बिताना
या तुम्हारे बच्चो की माँ बन
जीवन भर अपनी पहचान को 
तरसना
या फिर अपने मूल्यों से समझौता कर 
समय से पहले मर जाना
इससे आगे कभी जान पाए हो किसी नारी को
ओ भद्र पुरुष

बिस्तर की सलवटों के कभी ऊपर उठ पाये हो
कोशिश की है कभी उसके दिमाग को पढने की
बिना किसी शर्त के उसे बराबर से खड़ा करने की
या फिर अपने पैरों के तले कुचले उसके अस्तित्व को उठाने की
क्या कभी तुमने नारी को नारी की तरह पूरे  सम्मान से देखा है
ओ भद्र पुरुष
०००
(2)
जात 
एक औरत सिर्फ़ एक औरत होती है
ना वो हिन्दू होती है, ना वो मुस्लिम होती है
ना वो सिख होती है, ना वो ईसाई होती है

जब वो चोट खाती है अपनी छाती पर
तब वो चोट औरत की छाती पर नहीं,
पूरी औरत जात पर  लगती है
होता है दर्द एक सा, सभी औरतों का
सिसकती हैं  सभी एक ही तरह
उसमे कोई रंग नहीं होता सियासत का

बच्चा जनने वाली एक औरत ही होती है
जो बनती है औरत से माँ 
गुज़रते दर्द को सह कर एक इंसान का बच्चा जनती है
निःशब्द देखती रहती है तब भी
जब बच्चा रंग दिया जाता है
मज़हब और सियासत के रंग में
उसकी कोई जात नहीं होती 
उसे बाँट दिया जाता है कई टुकड़ो में

वो बंटती चली आ रही है सदियों से
और बंटती चली जायेगी अनंत तक
कभी हिन्दू बन कर, कभी मुस्लिम बन कर,
कभी सिख बन कर, तो कभी ईसाई बन कर
सिर मुंडवाने, दूजे घर बैठाने, चिता में जलाने,
तीन तलाकों से जो गुजरती है 
वो भी औरत ही होती है

कोठो पर जो बिकती है वो भी औरत ही होती है
बलात्कार का दंश जो सहती है वो औरत ही होती है
इस रंग बदलती दुनिया में,
एक औरत सहती है, मरती है, रहती है,
बनती है और बिगड़ती है

जब एक मर्द अत्याचारी होता है
तो वो मात्र अत्याचार का चेहरा होता है
ना वो हिन्दू होता है, ना वो मुस्लिम होता है
ना वो सिख होता है, ना वो ईसाई होता है
तब एक मर्द केवल एक मर्द होता है
और एक औरत केवल एक औरत होती है
0000
कवयित्री
गीतांजलि गिरवाल

युवा कवयित्री गीतांजलि 15 सालों से रंगमंच में अभिनय और निर्देशन में सक्रिय । कालेज में पढाई के समय से ही साहित्य के प्रति रुझान था तभी से लेखन में सक्रिय।ये हमेशा नारी की समस्याओं उनके जीवन उनके हालातों की चिंता करती हैं।और नारी मन के हर भाव,अंतर्द्वंद्व और दर्द को शब्द देने की कोशिश में संलग्न हैं ।     

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युवा कवयित्री नेहा शेफाली की कविताएँ ।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

लालटेन
जली वो पूरी रात
हर मौसम  बेबात
मेरे सपनों को रोशन करती
टकटकी लगाये
कभी कभी किताबें बांचा करती
जल कर काले होते तेल का रंग 
मानों मेरे कल के अंधेरे खींच रहा हो
मैं गाहे-बगाहे जो झपकी ले लूँ 
हवा के साथ चर्र-चूँ कर 
मुझे जगाया करती थी
एक कोने में 
किसी बुढ़िया के जैसे 
उकड़ू बैठी रहती
दीवारों पर उभरती 
डरावनी परछाइयों
से दोस्ती सिखाया करती थी
मेरे सोने तक
खुद की भी आँखें जलाये रखती थी
कुछ कुछ मेरी नानी के जैसे ही थी
मेरी नानी की वो लालटेन
00000
चौका
उसकी माई
चटनी और रोटियों के साथ परोसती थी
राजा रानी के किस्से 
चाँद तारों के नक्शे 
युद्ध-महात्मा की रणनीतियां 
उसकी माई 
जिसके पांव कभी चौके के बाहर 
पड़े ही नहीं थे।
000
ज़रा
ज़रा सा और रुक लेते
तो एक शाम, सदियाँ बन जाती
ज़रा सा कुछ कह देते 
तो ग़िले-शिक़वे भूल जाती
ज़रा मुट्ठी कस के बाँधी होती
एक ख़ुशबू पीछे रह जाती
ज़रा हक़ दिखाते जो तुम
मैं संग तुम्हारे आ जाती
0000
गुलमोहर
बिगड़ रहे हैं लोग 
छोटी-बड़ी बातों पर
बरस रहे हैं मुल्क 
तख़्तों की पासा पलट पर
बिलख रही है ज़मीं
अपने-दूजे खोने पर
बौरा रहा है अंतर्मन 
सपनों पर चलती कुल्हाड़ी पर
बस बांध रहे हैं 
इस आग उगलती दुनिया के ओर-छोर
अपनी आशा से, हर सुबह 
घर के बाहर खिलते
गुलमोहर के कुछ फूल
000
कवयित्री:नेहा शेफ़ाली।

युवा कवयित्री नेहा शेफ़ाली अभी जिन्दगी का गणित सीखने की कोशिश कर रही हैं।महानगर मुम्बई में रिहाइश दौड़ते हांफ़ते आदमियों और कंक्रीट के हुजूम में इनका जेहन चेहरों को पढ़ने की कोशिश करता है।और तभी उपजती है कोई कविता या कहानी।अंग्रेजी,हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं,अखबारों में फ़ुटकर रचनाएं  प्रकाशित।






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फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

         
           फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति

लेखिका-डॉ.ममता धवन
दिल्ली विश्वविद्यालय
इमेल : hindimamta3@gmail.com
                 
                   आजकल का दौर तीव्रता से कहानी कहने का चल रहा है. फिल्म प्रदर्शित करने की समय अवधि कम होती जा रही है. फिल्म के इस कम समय को बनाए रखने का पूरा असर फिल्म में गीतों के स्थान और संख्या पर दिखता है. गीतों के लिए स्थितियां बननी बंद हो गयी हैं. कुछ फ़िल्में तो गीत शून्य आने लगी हैं. ऐसे में दंगल फिल्म में मौजूद तीन गीत अपनी ओर आकर्षित करते हैं. भले ही इनकी संख्या कम है लेकिन अपने विषयों के कारण ये बहुत लोकप्रिय हुए हैं. यह फिल्म बायोपिक फिल्म है जो महावीर सिंह फोगाट की आत्मकथा ‘अखाड़ा’ पर बनी है जिसमें कुश्ती क्षेत्र में अपना नाम करने वाली गीता और बबिता के जीवन और उनके पिता के संघर्ष को शब्द और दृश्य दिए गए हैं. अपने प्लाट और अपने गीतों के माध्यम से यह फिल्म दर्शकों को अपनी तरफ खींचने में बखूबी सफल रही है. इसके अलावा आमिर को पसंद करने वाले दर्शकों का भी अपना एक ख़ासा वर्ग है.
       फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत है – ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है’... इस गीत को अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखा और हरियाणवी तर्ज पर बड़ा ही घुलता-सा म्यूजिक प्रीतम ने दिया है. यह गीत अपने दिलचस्प बोलों के कारण बच्चे-बच्चे की जुबां पर है. पूरा गीत न केवल गीता बबिता बल्कि सभी बच्चों को उनकी अपनी व्यथा कहता-सा लगता है. गीत हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और हरियाणवी शब्दों का बेहतरीन संयोजन है. सेहत, हानिकारक, बापू, हालत, वाहनचालक, जैसे हिंदी शब्दों के साथ टार्चर, टॉफी, टाटा, बॉडी, मोगाम्बो, डिसिप्लिन, पिकनिक जैसे अंग्रेजी शब्द भी सुनाई देते हैं. हरियाणवी शब्दों जैसे कि तन्ने, घना, बापू का प्रयोग पूरे गीत को हरियाणवी भाषा के गीतों के करीब ले जाता है. ख़ुदकुशी और किस्मत जैसे उर्दू शब्द भी गीत में शामिल किया गया है. यह गीत बैकग्राउंड में चलता है. गीता बबिता की रोजमर्रा की निरंतर तैयारी दिखाने के लिए बड़े ही रोचक तरीके से इस गीत को फिल्माया गया और फिल्म में गीत विधा का बेहतरीन प्रयोग किया गया. फिल्म का दर्शक स्क्रीन पर चल रहे इस गीत जो कि गीता बबिता के हिटलर बने बापू की सही तस्वीर प्रस्तुत करता है; से गीता बबिता की शिकायत भरे बोलों का मज़ा भी लेता है, वहीँ अपनी बेटियों के भविष्य को गढ़ते हुए कर्मठ और समर्पित पिता को भी महसूस करता है. महावीर फोगाट अपने आस-पास के स्त्री विरोधी वातावरण की परवाह किये बगैर अपनी बेटियों के भविष्य को बेफिक्री से जब तैयार कर रहा होता है तो तसलीमा नसरीन के ये पंक्तियाँ याद आने लगती हैं -
यह अच्छी तरह याद रखना,
तुम जब घर की चौखट लान्घोगी,
लोग तुम्हें टेढ़ी मेढ़ी नज़रों से देखेंगे.
जब तुम गली से होकर गुज़रोगी,
लोग तुम्हारा पीछा करेंगे, सीटी बजाएंगे,
जब तुम गली पार करके सड़क पर पहुँचोगी, लोग तुम्हें चरित्रहीन कह देंगे.
तुम व्यर्थ हो जाओगी, अगर पीछे लौटोगी
वरना जैसी जा रही हो, जाओ.

          इस गीत का मुखड़ा है – ‘औरों पे करम अपनों पे सितम.. ऐ बापू हम पे ये ज़ुल्म न कर.. ये ज़ुल्म न कर’. यह मुखड़ा 1968 में बनी फिल्म आँखें के गीत; ‘गैरों पे करम अपनों पे सितम...,ऐ जाने वफ़ा ये ज़ुल्म न कर....ये ज़ुल्म न कर....रहने दे अभी थोडा-सा भरम...ऐ जाने वफ़ा ये ज़ुल्म न कर..’ की तुरंत याद दिलाता है. फिल्म दंगल के इस गीत के मुखड़े को रिक्रिएट किया जाना कहा जा सकता है जो इतनी बखूबी और हरियाणवी संस्कृति  के साथ किया गया है कि दर्शक सिनेमा हाल में ताली पीटने और सिटी बजाने को मचल उठता है.
          फिल्म में ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है /हम पे थोड़ी दया करो हम नन्हें बालक हैं,’ गीत को सरवर खान और सरताज खान ने गाया , धाकड़ गीत को रफ़्तार ने अपनी आवाज़ दी, गिलहरियाँ ज्योति गाँधी, दंगल दिलेर मेहँदी ने गाया ,नैना अरिजीत सिंह और इडियट बन्ना ज्योति और सुल्ताना नूरान ने गाया. फिल्म का दूसरा गीत है- ‘ऐसी धाकड़ है ...धाकड़ है... ऐसी धाकड़ है....,रे छोरियां...,ये छोरियां ..,तन्ने चारों खाने चित कर देगी...,तेरे पुर्जे फिट कर देगी....,डटकर देगी तेरे दांव से..... बाँध के पेंच पलट कर देगी.... ,चित कर देगी चित कर देगी’. इस गीत के बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य ने, गाया है रफ़्तार ने और म्यूजिक दिया है प्रीतम ने. कहना चाहिए कि स्त्री के बाहरी सौंदर्य पर गीत रचे जाने की अधिकता में बहुत ही कम या न के बराबर गीत ऐसे मिलेंगे जो स्त्री की कर्मठता तथा उसके भीतर छिपी हुई क्षमता को उजागर करते हैं. ऐसे गीतों को स्त्री के प्रति सामाजिक बदलाव करने की भूमिका में हमेशा याद किया जाता रहेगा. बहुत संभव है कि अब लोग ‘शीला की जवानी’ और ‘बेबी डॉल’ सोने की’ की बजाय अब धाकड़ स्त्रियों को पसंद करने लगेंगे. लड़कियां अब सुंदर दिखने की ही कोशिश में नहीं रहेंगी क्यूंकि यह फिल्म स्त्री की सुन्दरता के नए मानदंडों को गढ़ती है. होंठों पर लिपस्टिक लगा लेना, बाल स्टाइल करवा लेना और स्टाइलिश कपडे पहनकर स्त्री सुंदर नहीं पर उपभोग की वस्तु ज्यादा दिखती है. वही स्त्री सुंदर है जो अपने जीवन का एक उद्देश्य निर्धारित करती है और पूरी ईमानदारी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्पित है. वही स्त्री सुंदर है जो अब अपने जीवन में सफल है. वही स्त्री सुंदर है जो सामाजिक रुढियों से आगे निकलकर नयी पीढ़ी के लिए भी सफलता के रास्ते निश्चित करती है. यह गीत औरत के वीरत्व को शब्द देता है. स्त्री के सौन्दर्य, उसके भाव  से आगे बढ़कर उसमें वीरत्व को दिखने की प्रशंसनीय पहल यह गीत करता है. पुरुष समाज को चुनौती देते इस गीत के आगे के बोल हैं, ‘तेरी अकड की रस्सी जल जाएगी..पकड़ में इसकी आग है..यो इंची टेप से नापेगी..तेरी कितनी ऊंची नाक है..तेरी सांसें अटक जाएंगी ..वो जोर पटक जाएंगी..ऐसी धाकड़ हैं...’ यह गीत रैप वर्ज़न में है और इसे स्वयं आमिर खान ने गाया है. इस से पहले आमिर ने 1998 में बनी  फिल्म गुलाम का ‘आती क्या खंडाला’ गीत गया था जो कि काफी लोकप्रिय हुआ था. आमिर की ये खासियत है कि वो अपनी फिल्म के साथ, अपने लुक के साथ, अपनी भाषा के साथ नए-नये प्रयोग करते रहते हैं. आमिर; शाहरुख़ और सलमान की तरह टाइप्ड हीरो नहीं हैं. वे अपनी हर अगली फिल्म में स्वयं अपनी ही पिछली फिल्म को चुनौती देते नज़र आते हैं. आमिर की प्रतियोगिता उनके अपने आप से है यही कारण है कि वे किसी अवार्ड फंक्शन में नहीं जाते. उनकी फिल्में सामाजिक उद्देश्यों के साथ चलते हुए भी भरपूर मनोरंजन करती हैं.
       पिता और पुत्री के बीच के बड़े ही संवेदनशील रिश्ते को पकड़ने की कोशिश करती है यह फिल्म. महावीर सिंह अपनी बेटियों के भविष्य को गढ़ना चाहता है और देश के लिए कुश्ती में गोल्ड मैडल लाने के लिए उन्हें तैयार करना चाहता है और कोशिश भी करता है. खुद कोच की भूमिका निभाता है और कुश्ती की सभी तकनीकें और चालाकियां अपनी बेटियों को समझाता है. बेटी की इच्छा पर उसे नेशनल स्पोर्ट्स अकादमी भी भेजता है,अपनी नोकरी तक छोड़ देता है. नया कोच, नया वातावरण की ताम-झाम गीता को बेहद आकर्षित करती है. वो देखती है कि इस तरह के वातावरण में भी कुश्ती की तैयारी हो सकती है. उसे लगता है कि चटनी और गोलगप्पे खाकर, सिनेमा देखकर भी कुश्ती की तैयारी की जा सकती है. जब गीता घर वापिस आती है तो अपने पिता को अपने कोच से कमतर आंकती है और अपने बाल बढाकर अनकहा विरोध जताती है. पिता और बेटी के बीच इसी टकराहट से उपजा पिता के भीतर की पीड़ा की पृष्ठभूमि पर बहुत ही भावुक गीत चलता है जिसके बोल लिखे अमिताभ भट्टाचार्य ने और गाया अरिजीत सिंह ने और संगीत दिया प्रीतम ने. बोल हैं...’झूठा जग रेन बसेरा..सांचा दर्द मेरा..मृग तृष्णा-सा मोह पिया..नाता मेरा तेरा..क्यूँ निराशा से है..आस हारी हुई..क्यूँ सवालों का उठा सा ..दिल में तूफ़ान है..’ गीत के आगे के बोल इस तरह हैं..  ’थे आसमान के सितारे..ग्रहण में आज टूट ते हैं यूँ ..कभी जो धूप सेंकते थे...ठहर के छाँव ढूँढ़ते हैं यूँ...’.
        जिस दौर में सीच्युएशनल गीत लिखे जाने बिलकुल खत्म हो गये हों ऐसे में ‘दंगल’ फिल्म अपने गीतों के लिए पर्याप्त स्थितियां भी ढूँढती है और सही तथा उचित समय, भाव, संगीत एवं आवाज़ के साथ फिल्म की लोकप्रियता को बढाती भी है.
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लेखिका ---डॉ.ममता धवन
दिल्ली विश्वविद्यालय
इमेल : hindimamta3@gmail.com




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मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

पुस्तक समीक्षा
पुस्तक

सुविख्यात मनीषी-संवादों के आईने में
लेखक--डा०सुनील केशव देवधर
प्रकाशक--सुभांजलि प्रकाशन ;कानपुर
मूल्य -तीन सौ पचास रूपये।
            
           मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला   
                                                      संचार माध्यमों में साक्षात्कारों का प्रकाशन एवं प्रसारण पाठकों और श्रोताओं के लिए एक बहुत ही आकर्षण का विषय रहा है।संवाद के माध्यम से बहुत कुछ ऐसा बाहर निकालकर आता है ,जो संभवतः किसी अन्य माध्यम से सम्भव नहीं हो पता है।डा०सुनील केशव देवधर एक लंबे समय से प्रसारण माध्यमों और लेखन से जुड़े हुए है।रेडियो प्रसारण पर इनकी कई पुस्तकें भी आ चुकी है।संवादों की इस किताब को पढ़कर मुझे जो बात सबसे अच्छी लगी वह यह कि डा०देवधर ने बात करने के लिए वह चलताऊ फार्मूला नहीं अपनाया कि हम चार -पांच या कुछ ज्यादा भी ,परंपरागत सवाल पहले से तैयार कर लेते है और उनके लिखित उत्तर लेकर, साक्षात्कार जैसा शीर्षक देकर आनन -फानन एक किताब तैयार कर देते है,पर डा० देवधर की इस किताब में ऐसा नहीं है। 
       जिन बारह मनीषियों से देवधर ने संवाद किया है वे अपने -अपने क्षेत्रों की जानी -मानी हस्तियां है ये संवाद प्रायोजित भी नहीं है ,जैसे कि प्रायःराजनीतिज्ञों और "सीकरी"में बसे बड़े -बड़े पदों पर विराजमान साहित्यकारों और कलाकारों के होते है।इन्होंने संवाद के लिए उन संतों का चयन किया है जिन्हें पद,पुरस्कार और सीकरी का कभी आकर्षण नहीं रहा है।ये बारह नाम है---वेद पंडित डा०शंकर अभ्यंकर,कत्थक नृत्यांगना मनीषा साठे,ओंकार साधक डा०जयंत करंदीकर,इतिहासविद निनाद बेड़ेकर ,कवि अग्निशेखर,कश्मीरी शायर प्रेमी रूमानी,रंगकर्मी डी०जे०नारायण,लेखक-अनुवादक निशिकांत ठकार,संत साहित्य अध्येता यू०म०पठान,सामजिक कार्यकर्ता सिंधुताई सकपाल,वैज्ञानिक डा०जयंत नारलीकर और गांधीवादी विचारक नारायण भाई देसाई।                                                                                      मुझे लगता है कि इस पुस्तक में जिन मनीषियों से संवाद स्थापित किया गया है उनसे समय पाना काफी कठिन रहा होगा क्योंकि उनके लिए कर्म ही पूजा है।उदाहरण के लिए प्रख्यात खगोलशास्त्री डा0 जयंत नारलीकर कभी किसी उद्घाटन समारोह में नहीं जाते है।इन संवादों में एकतरफा संवाद नहीं है। बातें होती है और बातों से ही बातें निकलती चली जाती हैं।और बातों -बातों में हमारे सामने देश,दुनियां,धर्म, अध्यात्म,फिल्म, वैदिक परंपरा,संगीत, नृत्य,खगोलशास्त्र,साहित्य,संत परंपरा और गाँधी दर्शन  जैसे न जाने कितने विषय सहज रूप में हमें आनंदित करते हुए ज्ञान की अथाह गंगा में स्नान करते से चलते है। इनमे से अधिकांश मनीषियों का कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र है ,पर इन्होंने विलक्षण प्रतिभा से देश ही नहीं, देश के बाहर भी अपने कर्तत्व का झंडा फहराया है। 
    मेरा मानना है कि डा०देवधर की यह पुस्तक "सुविख्यात मनीषी -संवादों के आईने में "को पढ़कर पत्रकारिता के विद्यार्थी यह जान सकेंगे कि वास्तव में किसी मनीषी से संवाद के माध्यम से कैसे उसके अंतर्मन तक पहुंच जा सकता है, संचार माध्यमों में काम करनेवाले पत्रकार यह जान सकेंगे कि केवल राजनीति के पीछे भागना ही पत्रकारिता नहीं है और सामान्य पाठकों को यह जानकारी मिलेगी कि हमारे देश में मनीषियों की एक ऐसी परंपरा आज भी है ,जो बिना किसी शोर -शराबे और प्रचार -प्रसार के अपने सार्थक उद्देश्यों में निरंतर लगे हुए है।
                             ०००

समीक्षक--



कौशल पाण्डेय 
1310 ,बसंत विहार,           
कानपुर-208021 
मो० --09532455570 


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