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गजल

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009


धूप के छौने भी अब तो ठंढ से शर्मा रहे
आग से दहके थे उपवन राख बनते जा रहे।

स्याह चादर में लिपटते शब्द ढलते जा रहे
गीत के मुखड़े निकल कर धुंध बनते जा रहे।

बंद मुट्ठी से फ़िसल कर छंद निकले जा रहे
शीत के पहरे में बैठे हम तो बस बल खा रहे।

मौन पसरा गांव में जो सुर सभी शरमा रहे
सर्द कुहरे को चिढ़ाते फ़ूल सब इठला रहे।

धुंध का कैदी है सूरज सोच सब घबरा रहे
गोठियों की आग से ही मन को सब बहला रहे।
०००
हेमन्त कुमार

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कहानी कहना ----कहानी सुनाना ---एक कला (भाग -५)

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

( नाच री कठपुतली)
(अपने इस लेख के पिछले चार भागों में मैनें कहानी सुनाने की कला और कहानी सुनाने या प्रस्तुत करने के विभिन्न तरीकों,माध्यमों के विषय में लिखा था।आज मैं कहानी सुनाने के एक और माध्यम कठपुतली के बारे में लिख रहा हूं।)
कहानी को आप श्रोताओं या बच्चों तक कठपुतलियों के माध्यम से भी
पहुंचा सकते । कठपुतलियों को भी कहानी सुनाने के माध्यमों में गिनाया भी जाता है।परन्तु मुझे लगता है कि यह एकदम अलग विधा और कला दोनों ही है। इसमें पहले आपको महारत हासिल करनी होगी बहुत सी कलाओं में।जैसे कठपुतलियां बनाने के लिये मूर्तिकला,पुस्तककला,कठपुतलियों के संचालन,संवाद बोलने की दक्षता में.लेकिन यह कला है सम्प्रेषण का एक सशक्त माध्यम । कठपुतलियों का इस्तेमाल सम्प्रेषण के लिये काफ़ी पहले से हो रहा है। हमारे देश में तो यह कला लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है। पहले नाटकों को प्रस्तुत करने का एक मात्र माध्यम कठपुतलियां ही थीं।आज तो हमारे पास आधुनिक तकनीक वाले कई माध्यम रेडियो,टी वी,आधुनिक तकनीकी सुविधाओं वाली रंगशालायें,मंच सभी कुछ है। लेकिन पहले या तो लोक परंपराओं की नाट्य शैलियां थीं या फ़िर कठपुतलियां।
उत्तर प्रदेश में तो सबसे पहले कठपुतलियों के माध्यम का इस्तेमाल
शुरू हुआ था।शुरू में इनका इस्तेमाल प्राचीन काल के राजा महाराजाओं की कथाओं,धार्मिक,पौराणिक आख्यानों,और राजनैतिक व्यंग्यों को प्रस्तुत करने के लिये किया जाता था।उत्तर प्रदेश से धीरे धीरे इस कला का प्रसार दक्षिण भारत के साथ ही देश के अन्य भागों में भी हुआ।

कठपुतलियों के माध्यम से राजनैतिक व्यंग्यों को जनता के सामने प्रस्तुत करने का प्रचलन यहां मुगल काल के पहले तक तो खूब था।लेकिन मुगलों के आने के साथ ही यह परंपरा बंद कर दी गयी। शायद मुगल शासकों को इस प्रकार से पुतलियों द्वारा दिखाया जाने वाला व्यंग्य पसंद नहीं आया।बाद में इन के माध्यम से राजाओं की वीरता की कहानियां,धार्मिक कहानियां,पौराणिक आख्यान आदि का प्रस्तुतीकरण होने लगा।पहले पुतलियों के कार्यक्रमों का मंचन मेलों,तीज त्योहारों के मौके पर ज्यादा होता था। इसके दर्शकों में बच्चे,बूढ़े,पुरूष,स्त्री सभी रहते थे।इसका इतना आकर्षण था कि मेलों ,त्योहारों के अवसर पर यह पता लगते ही कि कठपुतली का
कार्यक्रम होगा। दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी।
कठपुतली की सबसे खास बात यह है कि इसमें कई कलाओं का सम्मिश्रण है।इसमें लेखन कला,नाट्यकला,चित्रकला,मूर्तिकला,काष्ठकला,वस्त्र निर्माण कला,रूप सज्जा,संगीत,नृत्य जैसी कई कलाओं का इस्तेमाल होता है। इसी लिये सम्भवतः बेजान होने के बाद भी ये कठपुतलियां जिस समय अपनी पूरी साज सज्जा के साथ मंच पर उपस्थित होती हैं तो दर्शक पूरी तरह उनके साथ बंध जाता है। चाहे वह बच्चा हो ,जवान या फ़िर बूढ़ा।
पुतलियों का स्वरूप और आकार प्रकार भी तकनीक के विकास के साथ ही बदलता गया।पहले जहां सिर्फ़ काठ की साधारण पुतलियां थीं।वहीं अब हाथ की दस्ताने वाली पुतलियां(ग्लब पपेट),छड़ वाली पुतलियां(राड पपेट्स),तार या धागे वाली पुतलियां तथा छाया पुतलियां इस्तेमाल की जाती हैं। इसके साथ ही इनके माध्यम से प्रस्तुत होने वाले कार्यक्रमों की तकनीक में भी काफ़ी बदलाव आ चुका है। पहले इनके प्रस्तुतीकरण में जहां कई व्यक्तियों का सहयोग जरूरी था(हर कठपुतली के संचालन,स्वर देनें आदिके लिये) वहीं अब संवाद,संगीत आदि पहले से रिकार्ड कर लिया जाता है।एक ही व्यक्ति एक साथ कई पुतलियों को भी संचालित कर लेता है।इसी लिये इनका प्रस्तुतीकरण भी पहले की अपेक्षा आसान हो गया है।
यद्यपि आज तो संचार के कई माध्यम हमारे आपके मनोरंजन और शिक्षा दोनों के लिये इस्तेमाल हो रहे हैं।लेकिन विशेषकर जब हम बच्चों की बात करते हैं तो उनकी कल्पनाशीलता,उनकी अभिरुचि,उनके मनोविज्ञान के अनुकूल विषयों को उन तक सम्प्रेषित करने का आज भी यह एक सशक्त माध्यम है। वैसे तो कक्षा में किसी भी विषय को पढ़ाते समय हम पुतलियों को माध्यम बना सकते हैं।लेकिन विशेष रूप से कहानी को पढ़ाने में इनका अच्छा उपयोग हो सकता है।
जब हम बच्चों को कोई ऐसी कहानी पढ़ा रहे हों जिसमें जानवर पात्र हों तो उनके संवादों को केवल बोल कर या,उनके क्रिया कलाप को केवल कुछ चित्रों के माध्यम से हम उतनी अच्छी तरह नहीं सम्प्रेषित कर सकेंगे । जितना कि इन कठपुतलियों के माध्यम से।आप खुद कल्पना करके देखिये कि एक शेर ,भालू या घोड़े की कठपुतली को कक्षा में बोलते देखकर बच्चों को कितना आनन्द आयेगा।इनके माध्यम से हम बच्चे की कल्पनाशीलता बढ़ाने के साथ ही उसके अन्दर कठपुतली नाटक में इस्तेमाल होने वाली सभी कलाओं के प्रति रुचि,आकर्षण और एक समाप्त होती जा रही कला को बचाने का जज्बा भी पैदा कर सकते हैं।
0000000
हेमन्त कुमार

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टिप्पणियों में भी गीत रचते-----डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

रविवार, 13 दिसंबर 2009


आदरणीय डा0 रूप चन्द्र शास्त्री जी से हिन्दी का कोई भी ब्लागर,रचनाकार अपरिचित नहीं होगा। शास्त्री जी अपने ब्लागों के अलावा भी कई ब्लाग पर लिखते रहते हैं।इनके लेखन की,कथ्य को प्रस्तुत करने की शैली अपने आप में अनूठी है। आपकी इस शैली भाषा से तो सभी पाठक परिचित ही हैं।
शास्त्री जी की एक और विशेषता है।वह है टिप्पणी देने का अनोखा अंदाज।अनोखा इस मायने में कि इनकी टिप्पणियां भी गीतात्मक बन जाती हैं। आपकी कई टिप्पणियां तो अपने आप में एक पूरे गीत का ही आनन्द देती हैं। इन टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों को आगे लिखने के लिये प्रेरणा मिलती है। मेरे बच्चों वाले ब्लाग फ़ुलबगिया पर आदरणीय शास्त्री जी ने ऐसी कई गीतात्मक टिप्पणियां दी थीं। सबसे मजेदार बात यह कि बच्चे इन टिप्पणियों को गीत के रूप में ही गाते भी हैं।मैं आज उन्हीं टिप्पणियों को यहां प्रकाशित कर रहा हूं। आप भी इन टिप्पणी / बालगीतों का आनन्द उठाइये।
(1) नित्या शेफ़ाली के गीत गुड़िया रानी को पढ़ कर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
नित्या शेफाली भी तो,
प्यारी गुड़िया रानी सी है।
बिल्कुल मेरी पोती जैसी,
सूरत पहचानी सी है।।
रचना करती पाठ पढ़ाती,
मीठे बोल बोलती है।
मधु-रस में भीगी भाषा,
कानों में सुधा घोलती है।।
(2) मेरे बालगीत बरफ़ मलाई को पढ़ने के बाद शास्त्री जी की यह प्रतिक्रिया रही डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
गर्मी में बच्चों को,
अच्छी लगती बरफ-मलाई।
मम्मी-पापा दिलवाते हैं,
उनको, बरफ-मलाई।।
ठण्डी-ठण्डी, बरफ-मलाई,
दादी-अम्मा जी को भाई।
गली-गली में बेच रहे है,
दादा बरफ-मलाई।
सुन्दर बाल गीत लिखने की,
तुमको बहुत बधाई।
(3) मेरे बालगीत भालू पहुंचा मेले में पर शास्त्री जी ने लिखा था-----------
भालू ले कन्धे पे थैला,
चला घूमने को मेला।
बन्दर मामा साथ हो लिया,
बन करके उसका चेला।
चाट पकौड़ी जम कर खाई,
और खाया जम कर खेला।
फिर दोनों आपस मे बोले,
अच्छा लगा बहुत मेला।
(4) मेरे बालगीत गर्मी आई पर शास्त्री जी की कलम से ये शब्द निकल पड़े---------
जाड़ा भागा, गरमी आई।
पंखें-कूलर लेकर आई।
सबकी पहली पसन्द बनी है,
ठण्डी लस्सी और मलाई,
लेकिन बच्चों को गरमी में,
आइसक्रीम लगती सुखदाई
(5) मेरे ही बालगीत प्यारी गाय पर शास्त्र्र जी की प्रतिक्रिया थी----------
जब मैं गैया दुहने जाता,
बछड़ा अम्मा कह चिल्लाता।
सारा दूध नही दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।
थोड़ा ही ले जाना भैया,
सीधी-सादी मेरी मैया
(6) मेरे एक अन्य बालगीत नाचा मोर को पढ़ने के बाद--------डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
शीतल मन्द बयार चली जंगल की ओर,
जंगल में खुश होकर अब नाचा है मोर।
शोर मच गया चारों ओर,
ठुमुक-ठुमुक कर नाचा मोर।
वर्षा से मन हुआ विभोर,
झूम-झूम कर नाचा मोर
(7) मेरी एक बाल कहानी घर की खोज को पढ़ कर शास्त्री जी ने प्रतिक्रिया गीत में ही दिया--------
हाथी दादा चले ढूँढने,
घर अपना प्यारा-प्यारा।
रैन बसेरे की आशा मे,
छान लिया जंगल सारा।।
घर नही पाया ऐसा,
जिसमे तोंद-पैर आ जाते।
थक-कर आखिर अब तक,
पेड़ों के नीचे ही सुस्ताते।
(8) पूनम जी(झरोखा ब्लाग) के बालगीत होली का हुड़दंग पर शास्त्री जी की प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार रही-------
नीम, आम, धनिया गदराया,
होली का मौसम है आया।
बन्दर मामा, भालू दादा,
सबने जम कर भंग चढ़ाई।
सूंड उठा कर हाथी ने भी,
जम कर कीचड़ बरसाई
000000000000
हेमन्त कुमार

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गजल

रविवार, 6 दिसंबर 2009


हर सतह पर इस जमीं के खून के छींटे पड़े हैं,
पांव रखें किस जगह पर पशोपेश में हम खड़े हैं।

कल चले थे शेर बनने आज मांदों में घुसे हैं,
हर किसी के हाथ अब तो सिर्फ़ नारों से रंगे हैं।

भूख आंतों से निकल कर आज संसद में खड़ी है,
पेट की भाषा भी शायद राजनेता बन चुकी है।

दिन यहां अब घाव बन कर हड्डियों से रिस रहे हैं,
दर्द सहने के सभी आदर्श अब पीछे खड़े हैं।

हर दिये को छीन कर तुमने हमें अंधा किया है,
आग का शोला यहां दिल में दबाये हम खड़े हैं।
********
हेमन्त कुमार

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लेबल

‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहाड़ पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. Bअच्चे का विकास। Breast Feeding. Child health Child Labour. Children children. Children's Day Children's Devolpment and art. Children's Growth children's health. children's magazines. Children's Rights Children's theatre children's world. Facebook. Fader's Day. Gender issue. Girls Kavita. lekh lekhh masoom Neha Shefali. perenting. Primary education. Pustak samikshha. Rina's Photo World.रीना पीटर.रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया.तीसरी आंख। Teenagers Thietor Education. Youth

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