
हर चौराहा बन गया,अब नाटक का मंच।
अभिनय उस पर कर रहे ,बगुले बन सरपंच॥
बिका चाय पर आदमी, जला रहा है आंत।
अन्धकार के बीच वह,बीन रहा है तांत॥
पेट सभी भट्ठी हुये,सुलग रही है आग।
सरपंचों के सामने,खेल रहे हैं फ़ाग॥
सभी राम रावण हुये,कौन चलाये राज।
आज द्रौपदी रो रही,कौन बचाए लाज॥
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हेमन्त कुमार
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