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कहां पर बिखरे सपने---कैसे पूरे होंगे सपने--------।

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

               बालश्रम सिर्फ़ हमारे देश की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की एक बड़ी समस्या है।और पिछले दो दशकों में इसे रोकने की दिशा में पूरे संसार के कई देशों ने अच्छी पहल भी की है।दुनिया भर में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं इस अभिशाप को खतम करने की दिशा में काम कर रही हैं। हमारे अपने देश भारत में भी 1974 में ही बच्चों की बेहतरी के लिये बाकायदा एक नीति भी बनाई गई। इस नीति में अन्य बातों के अलावा बच्चों को मजदूरी से हटाने के साथ ही खतरनाक या भारी कामों में लगाने से रोकने की बात भी कही गई है। इसके बाद 1986 में बालश्रम अधिनियम(निषेध एवं नियंत्रण) का निर्माण हुआ। 1987 में इस अधिनियम में कुछ बदलाव किये। अभी हाल में ही मार्च 2010 में भी इस  अधिनियम में बच्चों के हित के लिये कुछ बदलाव हुये। इतना ही नहीं 1992 में ही दुनिया के 159 देशों के साथ ही भारतवर्ष  ने भी बाल अधिकारों के अन्तर्राष्ट्रीय घोषणा पत्र पर भी दस्तखत किये।इन बाल अधिकारों में भी भीतर वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी कराए जाने पर प्रतिबन्ध के साथ ही उन्हें ऐसे कामों से दूर रखने की बात कही गई है जो उनके स्वास्थ्य,शिक्षा और जीवन को हानि पहुंचाएं।
             इतने नियमों,कानूनों के बनने,सरकारी ,गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रयास किये जाने के बावजूद भी हमारे अपने देश भारत में बाल मजदूरों की संख्या में बहुत कमी नहीं आई है। आपको घरों से लेकर पटाखा,माचिस फ़ैक्ट्रियों जैसे खतरनाक उद्योगों में भी बाल मजदूरों की बड़ी संख्या मिलेगी।1971 की जनगणना के अनुसार पूरे भारत में बाल मजदूरों की कुल संख्या लगभग 1,0,753985 थी।जिसमें सबसे कम(97) बाल श्रमिक लक्षद्वीप और सबसे ज्यादा(16,27492) आंध्र प्रदेश में थे।सन 2001 यानि तीस वर्षों के बाद भी जनगणना के आंकड़ों पर ध्यान दें तो यह संख्या बढ़ कर 1,26,66,377 यानि सवा करोड़ से ऊपर पहुंच गई है।मतलब यह कि इन तीस वर्षों में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर होने वाले तमाम प्रयासों,और धन के व्यय के बाद भी बाल मजदूरों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है कमी नहीं हुई।
                         दुख की बात तो यह है कि जितना ही इस दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं,लोगों को जागरूक किया जा रहा है उतना ही बच्चों को मजदूरी के काम में और ज्यादा लगाया जा रहा है।उनके बचपन को खतम किया जा रहा है। उनके सपनों को कुचला और बिखेरा जा रहा है। हम सभी आज बाल मजदूरी खतम करने,इन बच्चों के लिये कल्याणकारी योजनाएं बनाने,उन्हें भी एक सामान्य जीवन जीने का अवसर प्रदान करने की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन शायद बहुत कम लोग ही ये जानते होंगे कि इन बच्चों के सपने कहां टूट और बिखर रहे हैं?वो कौन से काम हैं जिनमें लग जाने पर उनका जीवन नष्ट हो रहा है।इनमें भी कुछ काम ऐसे हैं जहां इन बच्चों का सिर्फ़ शारीरिक,मानसिक और भावनात्मक शोषण होता है।लेकिन कुछ कार्यस्थल ऐसे हैं जिन्हें खतरनाक श्रेणी में रखा गया है।वहां का वातावरण ही इस ढंग का रहता है जिसमें काम करना बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन दोनों के लिये खतरनाक है। आइये पहले हम देखते हैं किन सामान्य कामों में बालश्रमिक लगे हैं।
v      कृषि या खेती मेंहमारे देश के कुल बाल मजदूरों में से 70प्रतिशत से अधिक खेती के काम में लगे हैं।पूरे देश में इनकी संख्या 80-90 लाख होगी।इस काम में कुछ बच्चे तो मजबूरी में अपने मां-बाप की जगह(उनके बीमार हो जाने पर)काम करने जातेशैं। इनसे 10से12घण्टे काम करवा कर भी मजदूरी के रूप में बहुत कम पैसे या अनाज दिया जाता  है।
v      घरेलू नौकरअगर आप अपने अगल-बगल,मुहल्ले में देखें तो बहुत से परिवारों में काम करने वाले बच्चों की उम्र 14 साल से कम है।घरेलू काम करने वाले बच्चों के साथ मार पीट,उनका भावनात्मक यहां तक कि यौन शोषण भी होता है।उन्हीं की उम्र के अपने बच्चों के सामने उनसे काम करवाकर,डांट कर हम उन्हें एक भयंकर मानसिक प्रताड़ना से गुजारते हैं।
v      कूड़ा बीनने का कामआपको रोज सुबह से शाम तक तपती सड़कों पर,चिलचिलाती धूप में कन्धे पर एक बोरा और हाथ में एक छ्ड़ी लिये हुये बहुत से बच्चे दिखते होंगे।इनका काम है पूरे दिन घूम घूम कर कूड़े के ढेर से प्लास्टिक,बोतलें,पालिथिन, और अन्य घरेलू कचरा बीनना।यही इनकी रोजी रोटी है।कचरा बीनने वाले कुल मजदूरों में से 60प्रतिशत से ज्यादा बच्चे हैं।सुबह से शाम तक सड़कों पर कूड़ा बीनने और उसे ठेकेदार तक पहुंचाने के एवज में इन्हें मात्र 10-15 या कहीं कहीं 5 रूपये तक मेहनताना मिलता है। इन्हें औसतन 10-15 किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलना पड़ता है। हमारे देश के महानगरों में ऐसे बच्चों की संख्या हजारों में है।
v      स्कूटर,मोटर वर्कशापहमारे मुहल्लों की  साइकिल रिपेयरिंग की दूकानों,स्कूटर-मोटर की वर्कशाप्स में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनकी उम्र अभी खेलने और स्कूल जाने की है।यहां इनका दोहरा शोषण होता है।एक तो काम सिखाने के नाम पर कम पैसा देना और साथ ही काम करते समय आम आदमी के साथ ही मलिक की गालियां भी सुननी पड़ती है।जरा सी गलती होने पर मालिक या बड़ा मिस्त्री इन्हें मारने से भी नहीं चूकता।
v      ढाबे,चाय की दूकानें---आप बाजार में कभी चाय,काफ़ी पीने या खाना खाने तो जाते होंगे।
वहां निश्चित रूप से आपका साबका ऐसे बच्चों से जरूर पड़ता होगाजो आपकी,आपके बच्चों की जूठी प्लेटें,गिलास,बर्तन धोते हैं। आपको खाना सर्व करते हैं और बदले में दो जून का खाना और दस बीस रूपए के साथ ही ढाबा मालिक की गालियां,थप्पड़ भी पाते हैं।इनके चेहरों से गायब हो चुकी मासूमियत की जगह जगह बना चुकी उदासी,सूनापन या फ़िर विद्रोह का
        भाव भी शायद आपने देखा होगा। महानगरों में ऐसे बालश्रमिकों की भी बड़ी संख्या है।
v      जूता एवं चमड़ा उद्योगउत्तर प्रदेश के आगरा और कानपुर शहरों में ये उद्योग बड़ी संख्या में हैं।यहां पर भी आपको हाथों में काला,भूरा रंग पोते हुये,हाथों में हथौड़ी कील लिये पसीने से लथपथ सूनी आंखों वाले सैकड़ों अबोध बच्चे काम करते दिखाई पड़ जाएंगे।
v      चाय बागान(पश्चिम बंगाल और असम में)केवल पश्चिम बंगाल के डोआर क्षेत्र में ही लगभग सवा लाख से ज्यादा बाल मजदूर काम करते हैं।इन बागानों में काम करने वाले बच्चों में से 70 प्रतिशत से ज्यादा अनियमित रूप से(बिना रजिस्टर में नाम लिखे)काम करते हैं। कितना दुखद है कि 1947 में इन बागानों में बाल मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों की मात्र 17प्रतिशत थी वहीं आज इनकी संख्या लाखों में पहुंच चुकी है।इनमें भी बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषित और एनिमिक (खून की कमी) हैं।
v      मिट्टी के बर्तन बनाने का कामइस उद्योग का प्रमिख केन्द्र उत्तर प्रदेश के खुर्जा शहर में है जहां हजारों बच्चे बहुत कम दर पर मजदूरी कर रहे हैं।
v      रेल्वे स्टेशनों,बस अड्डों पर पान मसाला बेचनायह दूकानदारों,अभिभावकों ने बच्चों के माध्यम से काम करवाने का एक नया जरिया निकाला हैऽअपको देश के हर शहर में चौराहों,रेल्वे स्टेशनों और बस अड्डों पर हाथों में पान मसालों की लड़ियां लटकाए ढेरों बच्चे मिल जाएंगे।जो हमारे आपके नशे का सामान बेचते हैं। वो भी तेज ट्रैफ़िक में रोड क्रास करके,चलती ट्रेनों,बसों में चढ़ उतर कर अपनी जान जोखिम में डालते हुये। इतना ही नहीं पान मसाला बेचते बेचते इनमें से बहुत से बच्चे खुद भी ये जहरीला मसाला खाने के आदी हो जाते हैं।
v      भीख मांगनाआज महानगरों में भिक्षावृत्ति भी आमदनी का एक जरिया बन चुकी है। और इसके लिये भी बाकायदा गैंग बनने लगे हैं,ठेकेदारी होने लगी है। आप जिन ब्च्चों को सड़कों पर विकलांग बनकर,सूरदास बनकर भीख मांगते देखते हैं उनमें सभी जन्मजात विकलांग या अंधे नहीं हैं। बल्कि उन्हें भीख मंगवाकर कमाई करने वाले ठेकेदारों ने इस रूप में पहुंचाया है ताकि वो जनता की सहानुभूति पाकर ज्यादा कमाई कर सकें। और इन बच्चों की कमाई का पूरा फ़ायदा तो गैंग वाला या ठेकेदार उठाता है---इन बच्चों को तो बस दो जून का आधा पेट खाना और गालियां नसीब होती हैं।
        ये तो कुछ ऐसे धन्धे या काम थे जिनमें बच्चों के स्वास्थ्य या जीवन का खतरा कम
    है।आइये अब उन कामों पर दृष्टि डालते हैं जिनमें इन मासूमों के जीवन को सीधेसीधे
    खतरा बना रहता है---वो भी चौबीसों घण्टे।
v      रेशम उद्योगइस व्यवसाय में लगभग साढ़े तीन से चार लाख तक बाल श्रमिक कार्यरत हैं।इन्हें बहुत ही कम मजदूरी पर ज्यादा समय तक काम करना पड़ता है।
v      हथकरघा एवं बिजली करघा उद्योग---यह उद्योग पूरे देश में कई स्थानों पर हो रहा है।इसमें जरी का काम,कढ़ाई और साड़ी बुनने का काम बच्चों से भी लिया जाता है।इस काम की मजदूरी इन्हें इतनी कम दी जाती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। आज से लगभग 15 साल पहले लखनऊ में कुर्तों पर कढ़ाई का काम करने वाले एक व्यवसाई ने बताया था कि बच्चों को प्रति फ़ूल की कढ़ाई का 5पैसा दिया जाता है।मतलब यह कि दिन भर में यदि बच्चे ने 100फ़ूलों वाली एक साड़ी की कढ़ाई की तो उसे मजदूरी के सिर्फ़ 5रूपये मिलेंगे।इस उद्योग में लगे बच्चों की आंखों की रोशनी भी समय से पहले कम होने लगती है।
v      पटाखा एवं माचिस उद्योग-इनके कारखाने ज्यादातर तमिलनाड़ु के शिवाकाशी में हैं। इसके अलावा भी देश के कई स्थानों पर यह काम होता है। शिवाकाशी क्षेत्र में पटाखों के लगभग 1050कारखाने और उनकी हजारों इकाइयां हैं। यहां काम करने वाले मजदूरों में से  लगभग 50प्रतिशत से ज्यादा(लगभग चालीस हजार) बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं।इन कारखानों में से कम से कम 500बिना लाइसेंस के गैरकानूनी ढंग से चलाए जाते हैं। इन्हीं क्षेत्रों में लगभग 3989माचिस बनाने के कारखाने हैं।यहां पर काम करने वाले बच्चों को सांस रोग के साथ ही विस्फ़ोट होने पर मृत्यु का भी खतरा हमेशा बना रहता हैऽइसी खतरनाक जगहों पर काम करके ये मासूम हमारे आपके घरों की दीपावली को शुभ करते हैं।
v      कालीन उद्योग---इसके प्रमुख केन्द्र उत्तर प्रदेश के वाराणसी,मिर्जापुर,भदोही और जम्मू-काशमीर में हैं।इस उद्योग से जुड़े कुल मजदूरों में से 40प्रतिशत से अधिक संख्या बाल श्रमिकों की है।उत्तर प्रदेश में इन बाल मजदूरों की संख्या एक लाख से अधिक होगी।जबकि जम्मू काशमीर में लगभग 80हजार बच्चे इस काम  से जुड़े हैं। यहां पर भी बच्चों का अच्छा खासा शोषण होता है।बहुत सारे बच्चों को काम सिखाने के नाम पर साल साल भर तक बिना कोई मजदूरी दिये ही उनसे काम लिया जाता है। यहां उड़ने वाली धूल और गर्द से बहुत जल्द ही ये ब्च्चे फ़ेफ़ड़ों के रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।12से16घण्टे रोज काम करके भी इन्हें बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है।
v      पीतल उद्योगपीतल का काम मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में होता है। इसमें काम करने वाले कुल मजदूरों में से लगभग 40से50प्रतिशत बच्चे हैं।
v      बीड़ी उद्योगबीड़ी बनाने का अधिकतर काम उत्तर प्रदेश,कर्नाटक और तमिलनाडु में फ़ैला है।यहां भी  भारी संख्या में बच्चे काम कर रहे हैं।इन्हें एक दिन में लगभग 1500बीड़ियां बनाने पर मात्र 9 रूपये का मेहनताना दिया जाता है।जबकि यहां करने पर इनमें तंबाकू सेवन की गन्दी लत लगने के साथ ही इनके फ़ेफ़ड़ों को भी बहुत नुक्सान पहुंचता है।
v      भवन निर्माण---जिन मकानों या अपार्टमेण्ट्स में हम ए0सी0की हवा खाते हुये खुद को काफ़ी महफ़ूज महसूस करते हैं क्या उन्हें बनाने वाले हाथों के बारे में कभी आपने विचार किया है?इन भवनों के निर्माण में भी कितने छोटे,सुकोमल हाथों ने अपने सर पर ईंटें,मसाले का तसला लाद कर ऊपर तक पहुंचाया है। यहां तक कि सीढ़ियों,छतों से गिर कर अपंग हो चुके या फ़िर मौत को गले लगा चुके हैं?शायद नहीं सोचा होगा।लेकिन यह भी हमारे जीवन की एक कठोर सच्चाई है।पूरे देश में ऐसे दैनिक मजदूरी करने वाले बच्चों की संख्या भी लाखों में है।
v       शीशा उद्योगशीशे का काम मुख्य रूप से फ़िरोज़ाबाद में होता है।शायद कभी कोई महिला सोचती भी नहीं होगी किजो रंग बिरंगी चूड़ियां पहन कर वह अपने हाथों में चार चांद लगाती है उन्हें बनाने में कितने मासूमों ने अपने हाथ जलाए हैं। यहां काम करने वाले बच्चों को 1400से1800सेल्शियस तापमान वाली भट्ठियों के पास नंगे पैर खड़े होकर 10-12घण्टे तक काम करना पड़ता है।कितनों के हाथ पैर झुलस जाते हैं।
v      खान और पत्थर तोड़ने का काम----इस समय इस उद्योग में काम करने वाले बच्चों के नवीनतम आंकड़े तो नहीं उपलब्ध हैं।लेकिन 1981के आंकड़ों में इनकी संख्या 27हजार दर्ज़ है।मध्य प्रदेश और आंध्र परदेश में फ़ैले इस व्यवसाय में बच्चों को खतरनाक ढंग से काम करना पड़ता है।इनके ऊपर पत्थर गिरने से अंग भंग होने और मौत तक का खतरा रहता है।साथ ही कार्यस्थल पर उड़ने वाले पत्थर के बारीक कणों और धूल से बहुत जल्द ही ये सांस सम्बन्धी बीमारियों की गिरफ़्त में आ जाते हैं।
v      हीरा चमकाने के काम में---गुजरात में हीरा चमकाने का काम करने वाले कुल मजदूरों में से 25प्रतिशत से जयादा बाल श्रमिक काम करते हैं। इनके काम करने का समय भी काफ़ी ज्यादा होता है।
v      सर्कस में----सर्कस किसी समय हमारे मनोरंजन का एक मुख्य साधन के साथ ही एक बड़ा उद्योग भी था। आज इनकी संख्या कम तो हो गई है लेकिन इनका वजूद तो है ही।सर्कस में बच्चों को बहुत ही छोटी उम्र से भर्ती करके उनसे तमाम तरह के खतरनाक करतब और खेल करवाए जाते हैं।जिसमें उनके गिरने,चोट खाने,गम्भीर रूप से घायल होने के साथ ही मौत का खतरा भी बराबर बना रहता है।इस क्षेत्र में भी बच्चे बहुत बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं।जिनको सर्कस के तीन से चार शो दिखाने के बाद भी खाना कपड़ा और घर भेजने के लिये मात्र एक या दो हजार रूपये महीना मिल पाता है।कभी कभी सर्कस की माली हालत बिगड़ने पर इन्हें दो जून का खाना भी ठीक से नहीं मिलता।
                            इन सभी सामान्य और खतरनाक कामों के अलावा भी बच्चों से गैरकानूनी तरीके से पेट्रोल पंपों,ताला बनाने,पत्थर रंगने जैसे बहुत से काम करवाए जाते हैं। और यह हालत तब है जब कि चौदह साल से कम उम्र वाले बच्चों से काम करवाना कानूनन अपराध घोषित किया जा चुका है। साथ ही तमाम सरकारी,गैर सरकारी संगठनों द्वार बाल श्रम को रोकने और उन्हें भी स्कूल जाने वाले बच्चों की मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं।
                इसके बावजूद आज करोड़ों बच्चों से काम करवाकर हम उनका शारीरिक और भावनात्मक शोषण तो कर ही रहे हैं।साथ ही इनके मासूम चेहरों का भोलापन,उनकी मुस्कान,उनके सपनों को भी छीन रहे हैं।यदि आज भी हमने इस अपराध को रोकने के लिये अपना पूरा जोर नहीं लगाया तो शायद आने वाले कल में हमें इन बाल श्रमिकों के चेहरों पर मुस्कान और भोलेपन की जगहा एक भयंकर विद्रोह और खुरदुरेपन की छाया साफ़ साफ़ देखनी पड़ेगी।
                                000
डा0हेमन्त कुमार

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“देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल।

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

देश भीतर देश
(उपन्यास)
लेखक-प्रदीप सौरभ
वाणी प्रकाशन
4695,21-ए,दरियागंज,
नई दिल्ली--110002    
                                        हमारा देश एक तरफ़ तो बाहरी शक्तियों से जूझ रहा है दूसरी ओर आतंकवाद,जातिवाद,धार्मिक विवादों,जातीय और साम्प्रदायिक दंगों जैसी आन्तरिक समस्याएं भी हमारे देश की जनता का दुर्भाग्य बन चुकी हैं।इन सभी का दुष्परिणा अन्ततः यहां की जनता ही भुगतती है।
    इन सबके साथ ही आज एक और समस्या भी हमारे देश में धीरे-धीरे सर उठाती जा रही है वह है क्षेत्रीयता या प्रादेशिकता की।अगर व्यक्ति तमिलनाडु का है तो उसे दूसरे लोग मद्रासी कहते हैं,आसाम का है तो असमी।इतना ही नहीं वह भी खुद को मद्रासी या असमी ही मानता है भारतीय या हिन्दुस्तानी नहीं।गोया तमिलनाडु या आसाम भारत का एक प्रदेश ना होकर कोई अलग देश हो। आज हर प्रदेश का आदमी खुद को भारतवर्ष से अलग करके देखने की कोशिश कर रहा है। उत्तराखण्ड,झारखण्ड,छत्तीसगढ़ राज्यों का बनना और तेलंगाना,बुन्देलखण्ड,अवध प्रदेश,पश्चिम प्रदेश,पूर्वांचल आदि राज्यों की मांगें इसी अलगाववाद और बढ़ती जा रही क्षेत्रीयता का नतीजा हैं।
                   आम जन के भीतर बढ़ रहे इसी प्रदेशवाद,क्षेत्रीयतावाद और अलगाववाद की भावनाओं का लेखा जोखा है प्रदीप सौरभ का नवीनतम उपन्यासदेश भीतर देश। ऊपरी तौर पर तो यह उपन्यास एक विशिष्ट प्रेम कथा लग सकता है। जिसमें दिल्ली से आसाम ट्रेनिंग पर गये युवा पात्र विनय और एक विशुद्ध असमी युवती मिल्की डेका का प्रेम है,भावनायें हैं,उनका एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव है,संवेदनाएं हैं,साथ ही मिल्की डेका के अंदर की मूल भावनादिल्ली को इंडिया की राजधानी मानने की भावना दिखाई पड़ती है। मिल्की डेका दिल्ली और इंडिया को अपने असम से अलग हट कर एक कोई दूसरा देश मानती है।दरअस्ल यह भावना सिर्फ़ मिल्की की ही नहीं असम के आम आदमी की भावना है।लेकिन हम जितना ही इस उपन्यास की गहराई में उतरते जाते हैं उतना ही यह उपन्यास हमारे सामने अलगाववाद की भावना और उसके पीछे के कारणों की परतें एक एक कर खोलता जाता है।
                  इस उपन्यास के केन्द्रीय पात्र तो विनय और मिल्की डेका ही हैं।लेकिन उपन्यास की कहानी आगे बढ़ने के साथ ही आशीष विश्वास,बुलबुल हजारिका,संगानेरिया परिवार,विनय की फ़ेसबुकिया मित्रबबिता मालवीय,मिलि गुप्ता,मिष्ठी बैनर्जी,कोकोला पात्रा,पूजा कौरआदि अन्य पात्र हमारे सामने एक-एक कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते चलते हैं।
               विनय का गुवाहाटी आफ़िस में ट्रेनिंग पर जाना,बुलबुल हजारिका,मिल्की डेका से उसका परिचय,मिल्की से विनय की निकटता,प्रेम और विवाह ये सब कुछ तो एक बहाना मात्र है।उपन्यास के मुख्य कथानक में तो असम के लोगों की यह पीड़ा कि भारत सरकार उन्हें छल रही है,वहां के लोगों का ये मानना कि यहां आने वाला हर विदेशी मानू सिर्फ़ उन्हें लूटने ही यहां आया है,वहां उत्पन्न हुये तमाम विद्रोही संगठनोंउल्फ़ा,सुल्फ़ा,बोडो भूमिगत संगठन,बोडो स्टुडेणट यूनियन, उनकी मांगें,आन्दोलन,सरकार का उनके प्रति दमनकारी रवैया----सब कुछ हमारे सामने एक-एक कर फ़िल्म के अलग-अलग दृश्यों की तरह उपस्थित होता जाता है। और तब पाठक को यह महसूस होता है कि अरे यह तो सिर्फ़ प्रेम कथा मात्र नहीं है।
           गुवाहाटी में तीन साल का समय बिताने के बाद दिल्ली लौटने पर विनय खुद को एक अजीब बीमारी से ग्रसित पाता है।वह बीमारी है देश भीतर देश देखने की। दरअस्ल यह कोइ बीमारी नहीं बल्कि एक आम व्यक्ति की पीड़ा और मनःस्थिति है जो तीन साल किसी एकदम अनजान  और नये प्रदेश(आसाम) में रहकर,वहां की पूरी सांस्कृतिक,राजनैतिक,आर्थिक और सामजिक परिस्थितियों को अपने अंदर समाहित करके फ़िर से अपनी पुरानी जगह(दिल्ली)वापस लौटा है।प्रवास के इन तीन सालों में उस पात्र (विनय)ने उस पूरे शहर,प्रदेश को भरपूर ढंग से जिया है। अपनी रग रग में वहां की माटी की सोंधी खुशबू,चाय बागानों की हरियाली,जंगलों का प्राकृतिक सौन्दर्य,वहां के आम जन की पीड़ा,उग्रवादी संगठनों की मांगें,उनके ऊपर होने वाले दमन चक्र का दर्द----सभी कुछ अपनी स्मृतियों में साथ लाया है।उसी प्रदेश में उसने अपने प्रेम(मिल्की डेका)के माध्यम से अपने सपनों का महल बनाया और उसे नेस्तनाबूद होते (मिल्की की मृत्यु) हुए भी देखा है।
            उसके प्रेम का इस तरह नेस्तनाबूद हो जाना भी यूं ही एक आम घटना नहीं है।मिल्की डेका का विनय के साथ दिल्ली न आना,उसे वहीं बस जाने का अनुरोध,खुद अपने में ही घुट-घुट कर मर जाना हमारे देश में बढ़ते जा रहे अलगाववाद की भावना का ही नतीजा है।यह एक भोली भाली असमी लड़की का आत्म बलिदान भी है।जो हमारे उस पूरे राजनैतिक हालातों और दमनचक्र पर प्रश्न चिह्न लगाता है जो वहां के उल्फ़ा,सुल्फ़ा,बोडो उग्रवादियों के साथ किया गया।पंजाब कमाण्डो के जवानों के अत्याचार की एक झलक हमें उस समय देखने को मिलती है जब एक जवान तलाशी के दौरान मिल्की डेका के स्तन दबाता है और उसे घसीटकर बाहर तक ले जाता है।मिल्की डेका का विनय के साथ दिल्ली ना जाना एक विरोध भी है उस व्यवस्था के लिये जिसके तहत आम आदमी को यह धारणा बनाने पर मजबूर होना पड़ा कि दिल्ली इंडिया की राजधानी है और इंडिया एक अलग देश है। उस व्यवस्था के प्रति जिसके तहत वहां लोगों की धारणा बन चुकी है कि वहां आने और बसने वाला हर व्यक्ति हमारी हरियाली,हमारी जमीन और हमारे बागानों को लूटने और बटोर कर ले जाने के लिये ही यहां आया  है।
           उपन्यास के बीच में मुख्य पात्र विनय जब भी अपनी विषम मानसिक स्थितियों से त्रस्त हो जाता है तो उसे फ़ेसबुक पर जाकर कुछ समय के लिये ही सही थोड़ा राहत मिलती है।वह अपनी विषम परिस्थितियों से यहां अपने फ़ेस बुक मित्रों से चैटिंग करके थोड़ा निजात पाने की कोशिश करता है। उसकी फ़ेसबुक चैटिंग के माध्यम से भी हमारे समाज के विभिन्न किरदारों बबिता,मिली गुप्ता,मिष्ठी,कोकिला,गार्गी बधवार आदि के दर्शन होते हैं। सभी पात्रों की अपनी अपनी समस्याएं हैं।किसी की पति से अलगाव की तो किसी की चीन के माफ़ियाओं के भय की तो किसी की जायदाद के बंटवारे की। कहने को तो ये पात्र केवल मुख्य पात्र के फ़ेसबुक मित्र हैं लेकिन यदि आप गहराई से पड़ताल करें तो इनमें से हर पात्र अपने में अलग और अनूठा है।आपको अपने चारों ओर ध्यान से देखने पर कई-कई बबिताएं,मिली,मिष्ठी और कोकिला मिल जाएंगी।
                  यदि इस उपन्यास की चर्चा के दौरान प्रदीप सौरभ के पूर्व में प्रकाशित उपन्यासों पर बात नहीं की जायेगी तो शायद इस उपन्यास और लेखक की रचना प्रक्रिया को हम ठीक से समझ नहीं सकेंगे। पिछले तीन वर्षों में प्रदीप सौरभ के लगातार तीन उपन्यास पाठकों के बीच आये हैं।मुन्नी मोबाइल, तीसरी ताली और अब देश भीतर देश।मजेदार बात यह है कितीनों ही उपन्यासों की विषयवस्तु और क्षेत्र एकदम अलग-अलग हैं।मुन्नी मोबाइलदिल्ली महानगर में घरों में काम करने वाली नौकरानी की कहानी है।जो बहुत अधिक महत्वाकांक्षी थी। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये मुन्नी मोबाइल ने जो सफ़र पत्रकार आनन्द भारती के घर से शुरू किया वो काम वालियों की यूनियन,साहिबाबाद के चौधरियों से पंगा,डाक्टरनी के साथ नर्सिंग के अवैध धंधों,गाज़ियाबाद और पहाड़गंज रूट की बसों के फ़र्राटा भरते पहियों के साथ चलता हुआ अंत में कालगर्ल्स के रैकेट और मुन्नी मोबाइल के मर्डर के साथ पूरा होता है।जबकि तीसरी ताली का विषय एकदम अलग हटकर है।यह हमारे समाज के अभिन्न अंग होते हुये भी इसी समाज से परित्यक्त किये गये उन जीवधारियों की गाथा है जिन्हें हमारा समाज बहुत हिकारत और उपेक्षा से देखता है और हिंजड़ा कहकर बुलाता है।इस उपन्यास के कथानक की शुरुआत भी दिल्ली के सिद्धार्थ इन्क्लेव कालोनी से होकर हिंजड़ों की बस्तियों,उनके रीति रिवाजों,समाज में व्याप्त समलैंगिकों,उभयलिंगियों,लेस्बियन्स,गे कल्चर,हिंजड़ों की संस्कृति,उनके बीच गद्दी को लेकर छिड़ने वाले घमासानों का सफ़र तय करता हुआ हिंजड़ों के पवित्र तीर्थ स्थल कुवागम में पूर्णता को पहुंचता  है।और तीसरा ताजा उपन्यास देश भीतर देश की कहानी भी दिल्ली से गुवाहाटी और गुवाहाटी से दिल्ली की यात्राओं के दौरान चलती है।इसका विषय असम,वहां की संस्कृति,आंदोलन,समस्याएं और वहां के आम नागरिक की पीड़ा है।
         इतने कम समय में तीन अलग-अलग विषयों---ऐसे विषयों जिन पर पूरा शोध किये बिना एक कहानी भी न लिखी जा सके---पर उपन्यास लिखना भी एक दुरूह कार्य है। इस दुरूह कार्य को पूरा किया है प्रदीप सौरभ ने।इस मायने में भी लेखक की रचनात्मकता,उसकी सोच,वैचारिक विस्तार,शोध सभी कुछ हमें इन उपन्यासों के हर पृष्ठ पर साफ़-साफ़ दिखाई देता है।
            तीन अलग-अलग विषयों वाले उपन्यास होते हुये भी तीनों के कथानक में हमें कुछ समानताएं भी परिलक्षित होती हैं।सबसे पहली समानता तो है तीनों में ही भारतवर्ष के अंदर अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहे राजनैतिक घटनाक्रमों को लेखक ने बहुत यथार्थपरक शैली में पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।मुन्नी मोबाइल में जहां हम गुजरात दंगों,वहां पर घटित होने वाले भगवा ब्रिगेड के तांडव,मोदी सरकार के अत्याचारों की नंगी सच्चाई से हतप्रभ होते हैं।वहीं तीसरी तालीकिन्नरों के ऊपर केन्द्रित होते हुए भी उनके बीच गद्दी को लेकर होने वाले खूनी संघर्षों,उनके अंदर आ रही राजनैतिक चेतना,उनके सम्मेलनों,राजनैतिक पार्टियों को उनके समर्थन देने के फ़ैसलों के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के खद्दरधारियों तक की कहानियां हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है।ठीक इसी तरहदेश भीतर देशभी हमारे देश के पूर्वोत्तर प्रांतों में होने वाली राजनैतिक हलचलों,उनसे उभरने वाले विद्रोहों,उनके दमन चक्र की कहानियों को प्रस्तुत करता है।यहां भी हमें लेखक के छात्र जीवन से ही राजनीति,विभिन्न संगठनों के आन्दोलनों से जुड़े होने, समय समय पर की गई जेल यात्राओं और साथ ही राजनीति के प्रति उनकी वैचारिक सोच का प्रमाण मिलता है।
               इन तीनों उपन्यासों की दूसरी समानता पत्रकार पात्रों की प्रमुख भूमिका के रूप में हमारे सामने मौजूद है।मुन्नी मोबाइलमें आनन्द भारती, तीसरी ताली में विजय और देश भीतर देशमें बुलबुल हजारिका। यानि लेखक ने तीनों ही उपन्यासों में कहीं न कहीं अपने अंदर के खोजी, बेहद सन्वेदनशील  और सक्रिय पत्रकार की उपस्थिति दर्ज की है।मुन्नी मोबाइल का तो केन्द्रीय पात्र ही आनन्द भारती ही है। ऐसा शायद प्रदीप सौरभ के लंबे पत्रकारिता के जीवन के कारण ही संभव हो सका।
          देश भीतर देश के शिल्प की बात करें तो यह लीक से एकदम हटकर एक नये शिल्प और शैली का उपन्यास है।इस पूरे उपन्यास का ताना बाना लेखक ने दो रेल यात्राओं के माध्यम से बुना है। पहली यात्रा दिल्ली से असम जाने वाली ब्रह्मपुत्र मेल,दूसरी आसाम से दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रेस।पहली यात्रा उपन्यास का मुख्य पात्र विनय तब कर रहा है जब उसे ट्रेनिंग के लिये गुवाहाटी जाना पड़ता है।दूसरी जब वह ट्रेनिंग पूरी करके दिल्ली वापस लौट रहा है।पूरे उपन्यास की सभी घटनाएं विनय की इन्हीं दो यात्राओं के साथ साथ आगे बढ़ती जाती हैं।बीच-बीच में दृश्यों का बदलाव हमें परदे पर चल रही किसी रोचक फ़िल्म देखने का आभास देता है। ऐसा लगता ही नहीं कि हम कोई उपन्यास पढ़ रहे हैं।पाठक को कभी लगता है कि वह कोई फ़िल्म देख रहा है,कभी लगेगा कि
किसी यायावर या घुमक्कड़ व्यक्ति की डायरी के पन्ने पढ़ रहा है।यानि कि इस उपन्यास में पाठक को एक फ़िल्म देखने,डायरी पढ़ने,एक पत्रकार के यात्रा वृत्तान्त सभी का आनन्द के साथ मिलेगा।कथानक के बीच-बीच में विनय का फ़ेसबुकिया सहेलियों से चैट करना उपन्यास को रोचक बनाता है।
          उपन्यास की भाषा में एक कुशल पत्रकार की बेबाक विश्लेष्णात्मक शैली का प्रभाव हमें हर जगह दिखता है।इनके अंदर बैठा कवि और फ़ोटोग्रैफ़र इनके लेखन में शब्दों और घटनाओं का अद्भुत कोलाज बनाता है।प्रदीप सौरभ के पूर्व में प्रकाशित दोनों उपन्यासों की ही तरह देश भीतर देशका विषय भी लीक से एकदम अलग हटकर है।पूर्वोत्तर राज्यों,क्षेत्रों और वहां के आम जन मानस में झांकने की कोशिश अभी तक किसी भी हिन्दी उपन्यास में नहीं की गई है। इस दृष्टि से भी यह उपन्यास पठनीय है और हिंदी साहित्य की निधि तो बनेगा ही।
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        प्रदीप सौरभ: पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में विशेष संवाददाता के रूप में लम्बे समय तक काम किया।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक।मुन्नी मोबाइल, तीसरी ताली उपन्यास काफ़ी चर्चित। कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबाद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार।फ़िलहाल स्वतन्त्र लेखन।
समीक्षा--हेमन्त कुमार
     


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