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नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2)

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

आदरणीय नेता जी,
सादर चरण स्पर्श।
मैंने अपने पिछले पत्र में आप से कुछ बातों का अनुरोध किया था।आशा है आप उन बातों पर तो विचार करेंगे ही। साथ में मैं अपने मित्रों और भाई बन्धुओं की कुछ और बातें भी आज आपके सामने रख रहा हूं। चुनाव जीतने पर आप इन बातों पर भी ध्यान दीजियेगा।
v     आप कभी अपने शहर में ध्यान से देखिये आपको हजारों की संख्या में ऐसी झुग्गी झोपड़ियां मिल जायेंगी जो कूड़े के ढेर के पास,नालों के किनारे या फ़िर किसी बड़ी बिल्डिंग के अगल बगल खाली पड़े मैदानों में बनी हैं।इन्हें आप बड़े लोगों ने स्लम एरिया या मलिन बस्तियों का नाम दिया है।इन बस्तियों में छोटी छोटी झोपड़ियों में हमारा पूरा कुनबा बसता है।इन्हीं में हम रहते हैं।इन्हीं में हम पैदा होते हैं और इन्हीं में मर जाते हैं।
                लेकिन ये हमारे स्थायी निवास नहीं हैं।बस यूं कह सकते हैं कि सर छुपाने का एक ठिकाना मात्र हैं।हर समय हमारे मां बाप के सर के ऊपर एक तलवार लटकती रहती है कि कब हम यहां से उजाड़ दिये आयेंगे।
आदरणीय नेता जी,मेरी उमर सिर्फ़ छः साल है। और इन छः सालों में हमारी झोपड़ी को चार बार शहर के इस कोने से उस कोने में फ़ुटबाल की तरह उछाला गया है।क्या आप चुनाव जीतने के बाद उजाड़े जाने की हमारी इस अन्तहीन यात्रा को रुकवा कर हमारे रहने का कोई पुख्ता इन्तजाम कर सकते हैं?
v     अखबार तो आप भी पढ़ते होंगे। और अक्सर ये खबर भी कि फ़लां गांव में दो साल का राजू बोरवेल के गड्ढे में गिर पड़ा।पूरे देश मैं पिछले तीन चार सालों में हम मासूमों के बोरवेल में गिरने की कम से कम पचास घटनायें तो हुई होगी (संख्या और भी ज्यादा हो सकती है)इनमें कुछ बच्चों को अथक प्रयासों से बच्चा लिया गया . कुछ अभागे नही बच सके। माननीय महोदय क्या इन सब मौतों को रोकने के लिये कुछ कोशिश करेंगे?
v     अखबार में हर दूसरे तीसरे या कभी कभी रोज ही यह समाचार आते हैं कि तीन वर्षीय मासूम(लड़का/लड़की) की दुराचार के बाद हत्या आप हमारे साथ ऐसीपाशविक और घिनौनी हरकत करने वालों से हमें बचाने की दिशा में भी कुछ काम करेंगे क्या?
v     आप सभी बड़े लोग हम बच्चों को मजदूरी करने से रोकने,बाल श्रम को खतम करने की बातें तो बहुत करते हैं---फ़िर आप अपने घर पर ही 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाने,अपनी कार में आठ नौ साल के बच्चे से पंचर जुड़वाने,अपनी कोठियों पर इसी उमर की हमारी बहनों से झाड़ू पोंछा जैसे घरेलू काम क्यों करवाते हैं?इस तरह तो बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में आप लोगों द्वारा बनायी गयी योजनायें कभी पूरी ही नहीं होंगी।
v     नेता जी,हमारे गांव में पिछले दिनों जहरीली शराब पीकर लगभग तीस आदमी(हमारे बापू सहित) मर गये थे। इस तरह सिर्फ़ हमारे गांव में लगभग मेरे जैसे सत्तर बच्चे अनाथ हो गये थे। पूरे प्रदेश और देश में हर साल ऐसे हजारों बच्चे अचानक अनाथ हो जाते हैं।आदरणीय नेता जी क्या आप इस जहर पर भी किसी तरह कोई रोक लगा सकेंगे?
v     चलते चलते एक बात और बता दूं महोदय कि मेरे कुल सात बहनें और दो भाई हैं।मेरे बापू हम सभी को आज तक कभी भर पेट खाना नहीं खिला सके।क्योंकि हमारा कुनबा बहुत बड़ा हो गया।बापू की आमदनी उतनी है नहीं।जरा सोचिए आप मेरे ही बापू की तरह हजारों बापू ऐसे होंगे जो एक अदद बेटे की चाह में कई-कई बेटियों को जन्म देते हैं।भले ही उन्हें भर पेट खाना न खिला सकें।क्या आप हमारे बापू जैसे करोड़ों इन्सानों की बेटा बेटी में फ़र्क करने की इस अमानवीय मानसिकता में बदलाव लाने के लिये कुछ प्रयास करेंगे?
          आदरणीय नेता जी,ये कुछ बातें थीं जो मैं आप तक पहुंचाना चाहता था।
हम बच्चों की इन बातों पर विचार करके,इन्हें दूर करने की दिशा में यदि आप कुछ भी प्रयास करेंगे तो शायद यह देश के हम सभी बच्चों का सौभाग्य होगा। और अपने बचपन का सही आनन्द उठा सकेंगे।
शुभकामनाओं के साथ।
 आपके गांव का
एक बच्चा

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कहानी-- तुम आए तो(भाग-2)--- जयश्री रॉय

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

------------ भोर रात से यहां शोर शुरु हो जाता है. पास के मस्जिद से आती अजान की आवाज़, गुरुद्वारे में बजता हुआ लाउड स्पीकर, किसी न किसी त्योहार में मंदिरों में बजते फिल्मी गाने, देर राततक तबेलों में ग्वालों का कीर्तन... फिर सरकारी नलों पर पानी के लिये औरतों के झगड़े, बर्तनों की उठा-पटक, बच्चों का रोना, फेरीवालों की आवाज़... वह कान पर तकिया दबाकर पड़ी रहती है. भोर रात से ही नींद टूट जाती है. फिर कोशिश करके भी नहीं आती.
           जीवन एक ऐसे मोड़ पर आकर एक दिन ठहर जायेगा उसने सोचा नहीं था. मास कम्युनिकेशन में एम. ए. करने के तुरंत बाद उसे एक अच्छी अख़बार में नौकरी मिल गयी थी. कबीर से मुलाकात भी उससे एक इंटरव्यू के दौरान ही हुई थी. उसे याद है कबीर एक कारखाने के बाहर कई दिनों से अनशन पर बैठा था. अपनी अख़बार की तरफ से वह उसका इंटरव्यू लेने पहुंची थी. मीतादी- पत्रकारिता के क्षेत्र में उसकी पहली टीचर जिसे वह गुरु मैया कहकर पुकारती थी, ने उसे वह पहला मौका दिया था. मीता एक खुर्राट पत्रकार थी. व्यक्तित्व भी वैसा ही जबर्दस्त - मां-बहन की गाली दिये बिना बात नहीं करती, मुंह फाड़कर अट्टाहास करती, बीड़ी के सुट्टे लगाकर मर्दों के बीच ठर्रा, रम, कच्ची, नारंगी, फेनी- जो मिलता पानी की तरह पीती और फिर अपनी बुलेट जिसे वह प्यार से डार्क ब्युटी कहकर बुलाती थी, पर बैठकर रात के दो-दो बजे अपने घर जाती थी. वह मीतादी के दबंग व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थी. बचपन से मामी के कठोर अनुशासन और अत्याचार के साये में जीकर वह बेहद दब्बू किस्म की हो गयी थी. हीन भावना की शिकार. ऊपर से गहरी सांवली, साधारण रुप-रंग की. मामी बात-बातपर ताने देती थीं - तुझे कोई लड़का पसंद नहीं करेगा, तेरी कभी शादी नहीं होगी.ये बातें उसके भीतर घर कर गयी थीं. मीतादी ने उसे अपनापन दिया तो वह उसीकी मुरीद हो गयी. हर बात में उनकी नकल उतारने की कोशिश करती. उनकी तरह फेडेड जींस, खादी का कुर्ता, बंडी, आंखों में ढेर-सा काजल... गाली देकर बात करना उन्हीं दिनों शुरु किया था, साथ में सिगरेट पीना भी. बकौल मीतादी, इसे बिंदास होना कहते हैं!
       कबीर का साक्षात्कार वह बहुत उत्साह से लेने गयी थी, मगर इंटरव्यू शुरु होते ही कबीर ने किसी बात पर उसे बुरी तरह डांट दिया था. सबके सामने वह पानी-पानी हो गयी थी. उसदिन घर आकर वह बहुत रोयी थी. क़सम भी खाई थी फिर कभी काम पर ना लौटने की. मगर इसके दूसरे ही दिन कबीर को देखने सदर अस्पताल दौड़ गयी थी. कबीर पर मैनेजमेंट के गुंडों ने हमला कर दिया था और वह बुरी तरह जख़्मी होकर अस्पताल में दाखिल करवाया गया था. वहां कागज़-क़लम बैग में डालकर कबीर के लिये मौसम्बी का रस निचोढ़ते हुये उसे खुद भी बहुत हैरत हुई थी. इसके बाद वह दिनोंतक अस्पताल के जेनेरल वार्ड में लोगों की भीड़ और घुटन भरे माहौल में कबीर की सेवा-टहल में लगी रही थी. कबीर एक बेहद बदमिजाज़ इंसान था. बात-बातपर उसे सबके सामने झिड़क देता, अपमानित कर देता, मगर इन सबके बावजूद उसे ना जाने उससे कैसा लगाव हो गया था. उसकी हिम्मत, जोशभरी बातें, अन्याय से लड़ने का माद्दा... उसे वह निडर, नैतिक और बहादूर प्रतीत होता. ठिक जैसे फिल्मों के नायक. उसकी बातें, बहसें वह मुग्ध होकर सुनती. उसे लगता एकदिन वह कोई बड़ा आदमी बनेगा. सोचकर उसके प्रति वह सम्मान और प्रेम के भाव से भर जाती. डांट-फटकार के साथ अपनी सेवा का अधिकार देकर कबीर ने जैसे उसे धन्य कर दिया था. उसे सूप पिलाते हुये या अस्पताल के कॉरीडोर में सहारा देकर टहलाते हुये वह स्वयं को बहुत महत्वपूर्ण महसूस करती. डांट-डपट के बीच कबीर भी उसपर हर बात के लिये निर्भर करने लगा था. उसके आते ही कबीर के दोस्त एक-दूसरे को इशारा करके मुस्कराने लगते - लो बॉस! तुम्हारी मीरा आ गयी.... क्यों, आज अपने देवता के लिये चढ़ावे में क्या लाई हो मीरा देवी?... ओह! मूंग का हलवा, साबूदाने की खिचड़ी...वह सबके बीच लाल पड़ जाती और कबीर अवज्ञा से मुस्कराता रहता. हीन ग्रंथि से ग्रसित उसे भी लगने लगा था, कबीर की डांट-फटकार में ही उसके लिये प्यार छिपा हुआ है. और जिस दिन अस्पताल से डिस्चार्ज होते हुये कबीर ने अपने कामरेड्स के सामने यह ऐलान किया था कि वह भी उसके साथ उसके घर में शिफ्ट होनेवाली है,वह दंग रह गई थी. तो कबीर जैसी हस्ती ने उसे स्वीकार ही लिया! कामरेडों ने चिल्लाकर बधाई दी थी - शादी कब?’ कबीर ने सबको घुड़ककर शांत कर दिया था - हम शादी जैसी बकवासों में यकीन नहीं रखते- मोस्ट नॉन प्रोडक्टीव कन्समसन...सुनकर वह सन्न रह गई थी, मगर कबीर के आगे मुंह नहीं खोल पाई थी. कुछ निहायत औरतनुमा सपनों को वह उसी दिन मन के किसी अज्ञात घाट में सिरा आई थी. कबीर जैसे महान लोगों से जुड़ने के लिये ऐसी छोटी-मोटी कुर्बानियां तो देनी ही पड़ेगी!
                 मगर उसका इरादा सुनकर उनके मामाजी को दिल का दौड़ा पड़ गया था. मामी ने खैर राहत की सांस ली थी. अब वह अपने भतीजे को अपना उत्तराधिकार सौंप पायेगी, वर्ना तो उन्हें सालों से यही डर लगा हुआ था कि चांपा सब हथिया लेगी. दूसरी तरफ वह तो बस प्यार, अपनेपन की कुछ बूंदों के लिये कस्तूरी मृग की तरह भागती फिर रही थी.
कबीर के साथ रहते हुये उसके जीवन के ये कई वर्ष एक स्वप्न भंग की-सी अवस्था में बीते हैं. कबीर की डांट-फटकार और उपेक्षा में अपने लिये प्यार ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह अंतत: थक गयी थी. कबीर के लिये दुनिया के बस दो ही बड़े सत्य हैं- एक पेट की भूख और दूसरा जिस्म की भूख. बकौल उसके, इसीसे पूरी सृष्टि संचालित होती हैं. बाकि चीज़ें बकवास है. इस ईंट-पत्थर की दुनिया हो अपनी हाड़-मास की देह से जियो, भोगो और भूल जाओ - जस्ट युज़ एंड थ्रो! प्रेम, आस्था, जन्म-जन्म का रिश्ता- माइ फूट! रिश्ते स्वर्ग में नहीं बनते- बिस्तर पर बनते हैं और वही जिस्म के साथ ख़त्म भी हो जाते हैं. शरीर जब जलता, गलता, सड़ता है, तुमलोगों के दिव्य प्रेम में भी कीड़े पड़ जाते हैं! जो प्रेम स्खलित होगा वही फलित होगा! हवाई प्रेम की नियति हवाई मिठाई जैसी - दो पल में फुस्स... सुन-समझकर वह काठ हो गयी थी. क्रांति का अर्थ सम्पूर्ण ध्वंस होता है, वह नहीं जानती थी. सबसे पहला झटका उसे पहले ही दिन लगा था जब कबीर ने अपने मकान में उसके कृष्ण को आने नहीं दिया था - मेरे घर में तुम्हारे भगवान नहीं आ सकते चांपा! हमारी सबसे बड़ी लड़ाई इन्हीं से है! धर्म और कुछ नहीं, भांग की, ओपियम की गोली है. इनके बहकावे में जाहिल, गवांर आयेंगे, हम जैसे लोग नहीं!उस रात वह बहुत रोई थी. कृष्ण की वह मूर्ति बचपन से उसके साथ थी- उसकी मां की निशानी. उनके वैष्णव परिवार के ईष्ट देवता कृष्ण ही थे. बचपन से अनाथ वह अपनी काली, अंधेरी रातें अपने इसी कृष्ण को सरहाने रखकर काटती आई थी.
           वह कबीर की तरह बुद्धिजीवी नहीं है, मगर डेमोक्रेटीक ज़रुर है. एग्री टु डिसएग्री . सह अस्तित्व में यकीन रखती है, सहिष्णु है. जिनपर यकीन नहीं रखती उन्हें भी स्पेस देने को तैयार रहती है. कबीर तो अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता. जो उससे इत्तेफाक नहीं  रखता वह उसके लिये मूर्ख है, शत्रु है, चिरकुट है!
       कबीर ने उससे शादी नहीं की है, इसलिये उसकी कोई जिम्मेदारी भी उसपर नहीं. मगर न जाने क्यों, उसपर कबीर की सारी जिम्मेदारियां हैं! एक परम्परागत पुरुष की भूमिका में वह स्वयं को नहीं देखता, मगर उससे एक स्त्री के कर्तव्य की अपेक्षा ज़रुर करता है. बात-बातपर उसे काम में सुघढ़ ना होने के ताने देता है, झिड़कता है. उसे खुद अंडा तक उबालना नहीं आता. हर समय अपनी मां के साथ उसके काम की तुलना करता है. वह कभी किसी बात पर टोकने जाती है तो झट कहता है - ज़्यादा बीवी बनने की कोशिश मत करो! यही सब चाहिये होता तो किसी को नौ गजी साड़ी में ब्याहकर लाता.वह सुनकर सोचती रह जाती है - वह रिश्ते की हर बंदिश में जीकर भी कबीर की कोई नहीं लगती. ठगी गयी वह. संबंध नहीं, उसके अधिकार नहीं, बस उसकी जिम्मेदारियां, बोझ... श्रमिकों की बात करते हुये घरेलू स्त्रियों के संबंध में कबीर प्राय: अनपेड लेबररशब्द का इस्तेमाल करता है. वह सोचती है, वह किस श्रेणी में आती है. सबकुछ करके भी उसका कहीं किसी पर अधिकार नहीं! वह अनपेड लेबररकी गिनती में भी नहीं है.
           कबीर के उच्छृंखल स्वभाव ने उसे अंदर से असुरक्षित कर दिया है. उसे लगता है उसने लहरों पर अपना घर बांध लिया है जो किसी भी क्षण ढह सकता है. कबीर के साथ का यह गैर पारम्परिक, बोहेमियन जीवन उसे ना घर का ना घाट का रहने दिया है. मामा, मामी अब उसका चेहरा नहीं देखते, दुनिया की नज़रें भी बदल गई हैं. कबीर या उसके दो-चार अलग नज़रियावाले दोस्तों तक यह दुनिया सीमित नहीं है. यह बहुत बड़ी है... जिस रिश्ते का कोई नाम नहीं, आधार नहीं उसकी कोई गैरेंटी भी नहीं. उसका दिल डूबता रहता है सोच-सोचकर. कबीर कहता है उसे संबंध के नामपर कोई पिंजरा पसंद नहीं. वह तभी तक रुका रह सकता है जब तक जाने का विकल्प खुला है. बढ़ती उम्र के साथ उसके अंदर डर घोंसला डाल रहा है. लग रहा है मुट्ठी से सब कुछ रेत की तरह क्षरता जा रहा है. एक मकान की चार दीवारी के भीतर वह अपना घर ढूढ़ती रहती है, आश्वासन और प्रतिश्रुति ढूंढ़ती रहती है. एक अकेला प्रेम उसके सारे संशय और भय का निराकरण कर सकता था, मगर कबीर की आंखों में उसका नितांत अभाव उसे कहीं से बहुत असुरक्षित कर गया था. प्रेम भी नहीं, समाज की स्वीकृति भी नहीं! वह किस ज़मीन पर खड़ी हो! अपने पांव के नीचे का दलदल उसे हरपल खींचता रहता है. वह सतह पर बने रहने के लिये किसी सहारे की तलाश में अपने हाथ पसारती रहती है, मगर उनमें शून्य के सिवा कुछ नहीं आता.
          दो महीने पहले एक पुरानी डायरी में उसे एक कविता मिल गई थी जो ना जाने कबीर की नज़र से कैसे बच गई थी. बिना सोचे-समझे उसने उसे एक साहित्यिक पत्रिका में भेज दी थी और उसे उस समय सुखद आश्चर्य हुआ था जब उस पत्रिका की तरफ से स्वीकृति सूचना मिली थी. फिर अर्पित - पत्रिका के सब एडिटर से बात हुई थी. एक दिन वह उनकी पत्रिका के दफ़्तर में भी हो आई थी. कितनी तारीफ की थी अर्पित ने उसकी कविताओं की. उसे लगता था कि वह अपनी काबिलियत को जाया कर रही है. उसे नियमित लिखना चाहिये. इतने दिनों तक ना लिखना बहुत बड़ी गलती है उसकी. अर्पित की बातों ने उसे एक नये उत्साह से भर दिया था. बहुत अर्से बाद वह फिर कागज़-कलम लेकर बैठने लगी थी. वह लिखेगी घिरते बादलों पर, सुबह की धूप और दिल की धड़कनों पर कविता... ये भी ज़रुरी हैं, वह हाड़-मास की इंसान है, कोइ रोबोट नहीं!

                     उस दिन शाम घिरते-घिरते अर्पित का फोन आया था. उसने उसे जो नई कवितायें दी थीं, वह उस पर बात करना चाहता था. कपड़े बदलकर वह बाहर निकल आई थी. कबीर रात के बारह बजे से पहले नहीं लौटेगा. अपने मुहल्ले की संकरी गलियों को पार कर वह मुख्य सड़क पर आई थी. इसी रोड पर थोड़ा आगे चलकर एक छोटे-से रेस्तरा में अर्पित उसका इंतज़ार कर रहा था. दोनों अक्सर यही मिलते थे. यहां से अर्पित का दफ़्तर भी करीब था.
              अर्पित का बहुत शालीनता से बोलना, हर बात को बहुत शांति और धैर्य के साथ समझाना. उसे उसकी कवितायें अच्छी लगती है. वह चाहता है वह ज़रुर लिखे. अर्पित के साथ उसे अपने होने का अहसास होता है. लगता है वह रीत नहीं गई है पूरी तरह से. कोई जीवित पराग अब भी उसके भीतर रह गया है किसी सही मौसम के इंतज़ार में. एक दिन उसने बताया था अपने बारे में. उसकी पत्नी का देहांत हो गया है दो साल पहले. एक पांच साल की बेटी है जो अपने ननिहाल में पल रही है. अपनी दिवंगत पत्नी की बात करते हुये वह आज भी संजीदा हो जाता है. उसे अर्पित की संवेदनशीलता अच्छी लगती है. उसका दिल खोलकर हंसना और बात-बात में आंखों का नम हो जाना. अर्से बाद उसे लगा है, बिना डरे या सतर्क हुये भी किसी के साथ हुआ जा सकता है. अर्पित के साथ वह अपने में होती है, निश्चिंत होती है. छोटी-छोटी बातों में भी जीवन का सुख है, यह भी अर्पित ने ही उसे एक बार फिर से याद दिलाया था.
               हम हमेशा युद्ध में नहीं हैं. छोटी चीज़ों से भी बदलाव का आगाज़ हो सकता है... बड़ी बातें तो मैं नहीं समझता, हां! पहला काम मैंने ये किया कि अपना सरनेम छोड़ दिया. दूसरा अपनी पत्नी को कहीं से भी बदलने की कोशिश नहीं की. यह भी मेरे लेखे हिंसा ही है. किसी को वह ना रहने देना जो वह है. एक बात बताऊं कि मेरी बीवी जब एम ए की पढ़ाई कर रही थी, तब एक साल मैने रसोई का काम सम्हाला. किचन में उसका हाथ बंटाना, बेटी को रातों में जागकर देखना... ऐसी ही छोटी-मोटी बातें. बचपन में बाबूजी को अक्सर कहते सुनता था - चैरिटी बिगिन्स ऐट होम, वह बात मुझे सही लगती है.... अर्पित झेंपता हुआ-सा कहता - सबसे पहले मैं खुद को बदलना चाहता हूं. यह सबसे मुश्किल काम है...वह उसे चुपचाप सुनती है. अर्पित को सुनना उसे अच्छा लगता है. जब भी उससे मिलकर लौटती है, खुद को हल्का महसूस करती है. खुश भी.
               रात तीन बजे कबीर लौटता है. आज भी कामरेड लतिका के घर मीटिंग थी. लतिका इनकी मंडली की एक नई सदस्य है. कोलकाता के प्रेसिडेंसी से राजनीति शास्त्र में एम. ए., पी एच. डी. छात्र नेता. बंगाली, इसलिये जन्मजात बुद्धीजीवी! रुप भी वैसा ही - बांह कटा ब्लाउज, तांत की साड़ी, खुले-बिखरे अधपके बाल, कपाल पर बड़ा लाल टीका. एकदम कपाल कुंडला-सा रुप! जैसे धड़ल्ले से अंग्रेज़ी बोलती है, वैसे ही धड़ल्ले से सिगरेट फूंकती है. मार्क्स, स्तालिन, लेनिन को घोंटकर पी रखा है. वह भी अपना घर फूंककर दुनिया गढ़ने निकली है. कबीर उस पर मुग्ध है. बात-बात पर उसका नाम लेता है. उनकी पार्टी की सारी मीटिंगस अब लतिका के घर ही होती हैं. लतिका बहस के साथ सरसो-हिल्सा भी बहुत अच्छा पकाती है. उसके रविंद्र संगीत और आवृति का तो क्या कहना. जब नज़रुल की अग्नि वीणाअपनी ओज भरी आवाज़ में पाठ करती है, सचमुच शिराओं में आग़ लग जाती है! देर राततक लतिका के घर मीटिंग, खाना, गाना, काव्यपाठ आदि करके जब कबीर घर लौटता है, थककर चूर होता है. उससे बात भी की नहीं जाती, बस बिस्तर पर गिरकर सो जाता है. वह बगल में लेटकर कबीर की देह से आती परफ्यूम की सुगंध को महसूस करते हुये चुपचाप रोती रहती है. कबीर कभी किसी तरह का परफ्यूम या बॉडी लोशन इस्तेमाल नहीं करता था. चलो अब उसे पसीने की महक ही नहीं, फूलों की खूशबू भी अच्छी लगने लगी है.
               रोज़ वह चुप रह जाती है, मगर आज उससे रहा नहीं जाता. कबीर के कुर्ते से उठती खूशबू, गिरेबान पर लिपस्टीक के दाग़, मुंह में पान... उसने उसका कुर्ता पकड़कर फाड़ दिया था - मीटिंग से आ रहे हो या किसी कोठे से? सुनकर कबीर ने उसे फर्श पर धकेलकर गिरा दिया था - अपनी औकात में रहो! जहां से भी आऊं, तुम कौन होती हो पूछनेवाली? बीवी बनती हो!
                 गिरने से उसे बहुत चोट आई थी. दायीं कुहनी छील गयी थी और माथे पर गुमड़ निकल आया था. उसकी तरफ देखे बिना कबीर निकलकर चला गया था. वह ज़मीन पर पड़ी-पड़ी सिसकती रही थी.
                दूसरे दिन भी कबीर शाम तक घर नहीं लौटा था. उसका फोन भी नहीं लिया था. कबीर के एक मित्र ने उसे बताया था, कबीर कामरेड लतिका के साथ बस्तर चला गया है. वहां पुलिस के द्वारा आदिवासियों के एक गांव उजाड़ देने के विरोध में एक बहुत बड़ा मोर्चा निकाला जाना है. इसके बाद वह अर्पित के घर चली गई थी.
             अर्पित उसकी हालत देखकर चौंका था. अब तक वह उसके और कबीर के संबंध में बहुत कुछ जानने, समझने लगा था. मगर अपनी तरफ से उसने बढ़कर कुछ नहीं पूछा था. बस उसकी कुहनी को साफ करके, दवाई लगाकर पट्टी कर दी थी. वह चुपचाप देरतक उसके ड्राइंग रूम के सोफे पर सोई रही थी. दूसरे कमरे में सी. डी. पर धीमी आवाज़ में जगजीत सिंह की ग़ज़लें बजती रही थीं - होशवालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है... रसोई से आती बर्तनों की ठुनक, पकते खाने की महक, आंगन में खिले मोगरे की रह-रहकर लपटों में आती सुगंध... अर्पित शायद फोन पर अपनी बेटी से बात कर रहा था. उसका उससे हंस-हंसकर, तुतलाकर बोलना, छोटी-छोटी बातें - उसने होमवर्क किया या नहीं, दूध पिया या नहीं, अगले रविबार उसे घुमाने ले जाने का प्रोग्राम... वह पड़ी-पड़ी तंद्रालस सुनती रही थी. कितने दिनों बाद उसे लगा था, वह किसी मकान में नहीं, घर में है. देर शाम वह उठकर अंदर के बरामदे में बैठी थी. अर्पित चाय बनाकर ले आया था - अदरक, तुलसी वाली! चुपचाप चाय पीते हुये उसने देखा था - आंगन के तुलसी चौरे पर जलते हुये दीये को. ऊपर हरसिंगार का छोटा-सा घना पेड़.उसे तुलसी की तरफ देखते हुये अर्पित ने ना जाने कैसी आवाज़ में कहा था - "मंजरी रोज़ तुलसी पर दीया बालती थी. उसके बाद उसका यह काम मैंने अपने ऊपर ले लिया है... मंजरी की किताबें, मंजरी की प्रिय चीज़ें, उसके भगवान... उसकी अमानत समझकर सम्हालता हूं. उसकी भावनाओं, आस्था का मैं सम्मान करता हूं. वैसे मै खुद एक तरह से नास्तिक हूं कह सकते हैं."
                  अर्पित की बातें सुनते हुये ना जाने क्यों उसकी आंखें भर आई थीं. उसके मनोभावों से अनजान अर्पित एक मोगरे की वेणी रसोई से उठा लाया था - "बहुत मोगरा खिला है तो..."उस वेणी को लेकर वह अर्पित की ओर नज़र उठाकर देख नहीं पाई थी, क्योंकि आंसुओं से उसकी आंखें भरी हुई थी. अर्पित ने ना जाने कैसी इच्छा भरी आवाज़ में उससे कहा था - "अंदर मंजरी के ड्रेसिंग टेबल में देखकर यह अपने बालों में लगा लो..."
बिना कुछ कहे वह अर्पित के पीछे-पीछे कमरे में चली आई थी. मंजरी का ड्रेसिंग टेबल, उस पर सजी चीज़ें... वह देखती रह गई थी - सिंदूर की डिब्बी, ट्रेसेल, थोक में झूलती रंग-बिरंगी चूडियां और शीशे पर चिपकी अनगिन बिंदियां! अनायास उसके अंदर का कोई अदेखा कोना कांच की तरह चिटक उठा था. उसके स्वप्न में अक्सर ये चीज़ें आ-आकर उसे परेशान किया करती थीं.
          अर्पित उसके पीछे खड़ा बोल रहा था - "मंजरी के सारे सामान मैंने सहेज-सम्हाल रखें हैं... उसके बाद घर नहीं रहा, मगर उसका सपना ज़रुर बचाये रखना चाहता हूं. रोज़ सोचता हूं, अपनी बेटी को उसकी मां दे सकूं, उसे अपने घर वापस ला सकूं.. अनाथ की तरह दूसरों के घर पल रही है..."चांपा ने मुड़कर उसकी आंखों में सीधे देखा था - "तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो अर्पित?"उसका सवाल सुनकर अर्पित एक पल के लिये खामोश रह गया था, फिर धीरे से, मगर ठहरी आवाज़ में पूछा था - "मुझसे शादी करोगी चांपा?"
          इससे पहले की चांपा कोई जवाब देती, उसका मोबाईल बज उठा था.फोन के दूसरी तरफ कबीर था, बेहद गुस्से में -"जल्दी घर पहुंचो!कामरेड गोपाल घर के बाहर घंटा भर से खड़ा है. उसे मैंने कुछ पेपर्स लेने वहां भेजा था, मगर तुम्हारा कोई पता ही नहीं! इतनी रात गये कहां हो तुम?"
        कबीर की गुस्सैल आवाज़ और बोलने का बेहूदा लहज़ा सुनकर अचानक उसके अंदर एक विस्फोट-सा हुआ था, मगर अपनी आवाज़ को यथासंभव स्थिर रखते हुये उसने स्वभाविक ढंग से कहा था - "नहीं आ सकती, और कहां हूं यह तुम्हें बताने की ज़रुरत भी नहीं समझती!"
उसका जवाब सुनकर कबीर दहाड़ उठा था - "क्या! क्या कह रही हो तुम?... होश में तो हो?"
"हां! बिल्कुल हूं और तुम भी एक बात कान खोलकर सुन लो - आइंदा मेरा पति बनने की कोशिश मत करना!"
            कह कर उसने कबीर की कोई और बात सुने बिना ही फोन बंद कर दिया था और फिर बड़े इत्मीनान से आईने से चिपकी हुई एक लाल बिंदी उठाकर अपने माथे पर लगाकर शीशे में अर्पित को देखा था, आंखों ही आंखों में मुस्कराते हुये. अर्पित भी उसकी तरफ देखते हुये अपनी आंखों में भर आये आंसुओं को पोंछकर अनायास मुस्कुरा पड़ा था.
***

    
जयश्री राय ने बहुत ही कम समय में हिन्दी के युवा कथाकारों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। हजारीबाग बिहार में पैदा हुयी और गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में गोल्ड मेडलिस्ट जयश्री राय के अब तक तीन कहानी संग्रह(अनकही,तुम्हें छू लूं जरा और खारा पानी),तीन उपन्यास(औरत जो नदी है,साथ चलते हुये,इकबाल) और एक कविता संग्रह(तुम्हारे लिये) प्रकाशितइन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में नियमित कहानियों,कविताओं का प्रकाशन। फ़िलहाल गोवा में निवास और स्वतन्त्र लेखन।
सम्पर्क--मो.09822581137 ई-मे: jaishreeroykathakar@rediffmail.com



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कहानी-- तुम आए तो... --- जयश्री रॉय

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

आज सुबह से उसका मन अजीब-सा हो रहा है. कुछ अच्छा नहीं लग रहा. गर्मी भी बहुत पड़ रही है. धुंआसा आकाश गरम राख की ढेर की तरह दिख रहा है - क‌ई-क‌ई पर्तों में दूरतक जमा हु‌आ. पेड़-पौधे भी एकदम चुप. कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिल रहा. सब जैसे दम साधे पड़े हैं!
        वह खिड़की पर खड़ी रहती है अनमनी-सी. बहुत काम है. पूरा घर ही पड़ा है - बर्तन, कपड़े, रसोई... मगर वह खड़ी है! ढाई बजे तक कबीर आ जायेगा लंच के लिये. व्यस्त, हड़बड़ी में. हमेशा की तरह खीजा हुआ. उसे बहुत काम है... पूरी दुनिया की जिम्मेदारी उसी के सर पर! वह गहरी सांस लेती है. नीचे सड़क पर लोग नदी की तरह बह रहे हैं - गाड़ियां, रिक्शे, पैदल... कितने रंग, कितने रुप, कैसी-कैसी आवाज़ें... देखते हुये जाने कब वह भी उन्ही का एक हिस्सा हो जाती है. सालों पहले वह भी इस जनसैलाब के साथ सुबह से शाम तक इस शहर की सड़कों और गलियों में नामालूम बहा करती थी. तब ज़िन्दगी मुश्किल थी, मगर यूं ठहरी हुई न थी. अब तो सालों से रुके हुये इस पानी से बदबू आने लगी है! कुछ सड़ रहा है उसके भीतर बहुत चुपचाप...वह जानती है, मगर इसका क्या करे सोच नहीं पाती. उसका जी चाहता है, कभी सड़क पर किसी औरत का हाथ पकड़कर पूछे - वह कहां जा रही है, घर या घर से बाहर? इतना क्या काम होता है उसे! उसके चौबीस घंटे तो ख़त्म ही नहीं होते! वह घर के काम करती है, खाना बनाती है, कबीर के अख़बार के दफ़्तर से लाये हुये फाईलों के अंबार सहेजती है, प्रूफ रीडिंग आदि, फिर भी...
           कभी-कभी उसे महसूस होता है, उसके भीतर एक तलहीन कुआं है - सिला, बोसीदा, अंधकार से भरा हुआ! जब भी वह अकेली होती है, वह उसमें डूबने-सी लगती है और ऐसा अक़्सर होता है! उसे बहुत डर लगता है अपनेआप में होने से. वह खुद से निज़ात पाने के तरीके ढूंढ़ती रहती है मगर अंतत: उसे लौटना ही पड़ता है अपनेआप में... खुद से छूटना कभी कहां संभव हो पाता है! जीवन की ये एक बहुत बड़ी त्रासदी है, कम से कम उसके जीवन की!
        वह किचन में आकर बर्तन मांजती है, सामान दुरुस्त करती है और फिर दो दिनों से जमा कचरे की थैली फेंकने के लिये नीचे जाती है. ऐसा करते हुये उसे हमेशा संकोच होता है. नीचे के दो मंज़िलों में दो पंजाबी परिवार रहते हैं. दोनों ही उनसे नहीं बोलते. देखते ही उनके घर की औरतें मुंह फेर लेतीं हैं. यह बहुत अपमानजनक प्रतीत होता है उसे. पहले माले के गुरमीत सिंह की पांच साल की बच्ची चिंकी कभी-कभी उसके पास आ जाती थी. मक्खन की बनी गोल-मटोल गुड़िया जैसी, बहुत प्यारी! अपने अकेलेपन से बेइंतिहां ऊबी हुई वह रोज दोपहर को टॉफियां लेकर उसका इंतज़ार करती थी. एकदिन जब चिंकी उसकी गोद में बैठकर उससे बातें कर रही थी, उसकी मां उसका कान पकड़कर उसे वहां से खींचते हुये ले गयी थी. उसकी दी हुई टॉफियां भी फेंक दी थी - तुझे मना किया था ना यहां आने से!उसदिन उसने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया था. उस बच्ची की बेबस रूलाई ने उसे कहीं से बहुत छोटी कर दिया था. वैसे जब से वह और कबीर साथ रहने लगे हैं, उन्हें, खासकर उसे लोगों की बदतमीजी और ताने बहुधा सहने पड़े हैं. कबीर के पहलेवाले घर में जिसदिन वह अपना सामान लेकर गई थी, उसके दूसरे ही दिन उन्हें वह मकान छोड़ना पड़ा था. इसके बाद दो महीने तक उन्हें कबीर के एक कामरेड दोस्त के घर एक झोपड़पट्टी में रहना पड़ा था. वहां भी आसपास के लोगों का रबैया उनके प्रति रुखा था. लोग उन्हें संशय और अवज्ञा से देखते, पीछे से कानाफूसी करते, मुंह दबाकर हंसते.
         बहुत मुश्किल से आखिर यह एक कमरे का घर मिला था. कबीर के एक और कामरेड का घर. उनकी शादी नहीं हुई है और फिर भी साथ रहते हैं सुनकर सभी मकान किराये पर देने से इंकार कर देते थे. 
        कबीर को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता! वह एक नई दुनिया बनाने में रातदिन मशगूल है. बहुत बड़ा काम है यह. छोटी-छोटी बातों के लिये उसके पास समय नहीं! ज़िन्दगी की छोटी, तुच्छ बातों से जूझने का  झमेला उसने उसके लिये रख छोड़ा है - "तुम औरतें जात और औकात से पूसी बिल्ली ही होती हो. जीवन क एक ही मक़सद - किसी तरह एक मर्द को घेर-घारकर रिश्ते की काल कोठरी में डालना और फिर ज़िन्दगी भर उसका शोषण! इमोशनल अत्याचार! अपनी कीमत वसूलना तुम औरतों को खूब आता है... सो कॉल्ड प्यार, जिस्म, कोख - सबका दाम चाहिये तुम्हें! चूल्हा, हांडी, नून-तेल... इससे आगे ज़िन्दगी को बढ़ने ही नहीं देती! मर्दों को भी इसी में घोंटकर रख देती हो!"
       उसकी बातें सुनकर वह बहुत रोई थी. उसी दिन उसका पहला गर्भपात हुआ था. यह सुनते ही कि वह प्रेगनेंट है, कबीर ने उसके हाथ में कुछ रुपये रख दिये थे अबोर्शन के लिये और साथ में एक चेतावनी और विकल्प - "या तो बच्चा या वह. मुझे क्या पता था तीस साल की औरत को इतनी-सी सावधानी रखनी नहीं आती! जिस्म तुम्हारा है, इसे सम्हालना भी तुम्हें ही है!"
उसने कहने की कोशिश की थी - "एक बच्चा आ जाता तो... मैं बहुत अकेली हो जाती हूं तुम्हारे बाद!"
           सुनकर कबीर बिफरा था - "दुनिया में और भी ग़म हैं बच्चे पैदा करने के सिवा मैडम! समय नहीं कटता तो जाकर झोपड़पट्टी के बच्चों को पढ़ाओ, अनपढ़ औरतों को उनके हक़ और सेहत के बारे में सचेत करो... देखो समय कैसे कटता है! जबतक इस दुनिया में इतनी भूख है, ग़रीबी है, बच्चे पैदा करना ज़ुर्म है! हमारे देश में भी चीन की तरह हर जोड़े को एक ही बच्चा पैदा करने का हक़ मिलना चाहिये. मगर यहां.. हूं! एकबार इंदिरा गांधी ने यह कोशिश की, नसबंदी करवाया तो उसकी खटिया ही खड़ी कर दी  लोगों ने! इसलिये तुमसे कहता हूं चांपा! इतना आत्मकेंद्रित मत बनो! खुद से ऊपर उठो और इस अभागी दुनिय के बारे में भी कुछ सोचो."
          वह क्या कहती! रोती रही थी. इतने दिनों के साथ से वह इतना तो जान ही चुकी थी कि किसी पत्थर को पिघलाना आसान है मगर कबीर को उसके फैसले से डिगाना संभव नहीं. जाते-जाते कबीर कह गया था - "दुबारा मुझे इस जाल में फंसाने की कोशिश मत करना. सेक्स की इतनी बड़ी कीमत चुकाने के लिये मैं तैयार नहीं. इसके लिये तुम्हें दूसरा आसामी देखना पड़ेगा!" वह कहीं से दग्ध होकर रह गई थी. आसामी! कीमत! ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत नियामतों को कैसा भद्दा, बेहूदा नाम दिया है कबीर ने! उसके अंदर की औरत ने तो बस अपने प्यार को एक आकार देना चाहा था, एक मुकम्मल रुप. अहसासें - जिस्म में ढलतीं, शक़्ल अख़्तियार करतीं... वह फिर से रचती कबीर को अपने भीतर, सांचे में ढालती अपने प्यार को! जाने यह कौन-सी विचारधारा है जो हाड़-मास के इंसान को रोबोट में तब्दील करके रख देती है! प्यार कुछ नहीं, आस्था कुछ नहीं... बस भूख, हथियार और प्रतिशोध! जो परिवर्तन लाना है वह लाशों पर चलकर लाना है... दुनिया को तोड़कर गढ़ना है. पुराना कुछ भी न बचे. देखना नहीं है पैरों के नीचे क्या आ रहा है - दिल, रिश्ते, भावनायें... मनुष्यों की दुनिया नहीं, पशुओं की दुनिया जिसमें हृदय नहीं, पेट ही सबसे बड़ा सच होता है. भूख - जठराग्नि में सबकुछ होम होकर रह जाता है, उसीसे संचालित होता है.
         एक खूबसूरत दुनिया वह भी चाहती है, मुस्कराते, खुशहाल चेहरे उसे भी भाते हैं, मगर निर्माण के लिये ध्वंस का ही रास्ता क्यों! प्रेम भी तो एक हथियार हो सकता है! कुछ नया करने के लिये हर पुराने का बहिष्कार करना क्यों ज़रुरी है? वह इन बातों को समझ नहीं पाती है. वह औरत है. संरक्षण उसका स्वभाव है, सृजन उसकी प्रकृति! उसे तोड़ना कुछ नहीं है, बस रचना है, सहेजना है, बचाना है!
       
उसे लगता है, कबीर के साथ उसने बाकी चीज़ों के साथ खुद को भी खो दिया है. बहुत पीछे छूट गया है उसका आप. वह बस कबीर की परछाई बनकर रह गयी है. यह भी तो एक तरह की हिंसा, शोषण है! उसे पूरी तरह से निगल जाना, ख़त्म कर देना! दुनिया भर के शोषण के ख़िलाफ अपनी अख़बार में आवाज़ उठाते हुये क्या कबीर को कभी अहसास होता है कि कहीं न कहीं वह भी इन्हीं शोषकों की जमात में शामिल हो गया है. विडंबना है कि चारों तरफ उजियारा बिखेरते हुये दीपक अपने तल में पनप रहे अंधियारे को भूल जाता है!
           वह एक बार फिर पत्रिका में छपी अपनी कविता देखती है-मेरा होना भी ज़रूरी है मेरे लिये...सीने से एक गहरी सांस निकल आती है. जब से यह पत्रिका हाथ में आई है वह इसी ऊहापोह में है कि इसे कबीर को दिखाये या नहीं. कबीर को उसके लेखन से नफरत है. पहले भी कहता था - स्त्री अस्मिता, दलित चिंतन... तुम्हारी इन कविताओं से एक शाम का खाना जुट सकता है? किसी की भूख मिट सकती है? हां अबतक जो किलो डेढ़ किलो कचरा इकट्ठा किया है उससे एकबार चूल्हा ज़रुर जलाया जा सकता है. मोहतरमा! चांद-सितारों की दुनिया से निकलकर कभी ज़मीन पर भी अपने हसीन पैर रखिये... फिर देखिये, ये कितनी सख़्त है! भरपेट खाकर जिस गोल-मटोल चांद पर आप पलायनवादी साहित्यकार नरम-गुगगुदी कवितायें लिखते हैं न, एक भूखे इंसान को वह एक अधजली रोटी से ज़्यादा कुछ नहीं लगता! जिसके पेट में भूख का सनातन दावानल हो उसे फूल की सुगंध से मतली आती है...

एकबार जब वह दो दिन के लिये कहीं गई हुई थी, कबीर ने उसकी सारी कवितायें रद्दी में बेच दी थी. पूछने पर उल्टा उसपर बिफरा था - ज़्यादा बमकिये मत, कुल मिलाकर चालिस रुपये कीमत की रचनायें... बेचकर एक अदद ठर्रे की बोतल नहीं खरीद सका, इंकलाब तो क्या ख़ाक होता! आपको कहीं ये गुमान तो नहीं हो गया था कि आपने दास कैपिटलटाईप का कुछ कमाल लिख दिया है...
    उसके बाद वह दो दिन तक बिना खाये-पिये रोती रही थी, मगर कबीर ने माफी मांगनी तो दूर, मुड़कर देखा भी नहीं था.जैसे-तैसे काम निपटाकर वह बैठी ही थी कि कबीर आ धमका था. हमेशा की तरह गरम और खीजा हुआ. साथ में दो कामरेड. चूल्हे पर दाल की पतीली चढ़ी हुई देखकर एकदम से आग़बबूला- "अभी तक खाना नहीं बना! करती क्या रहती हो सुबह से?"
उसके हाथ में पत्रिका थमाते-थमाते वह झिझक गई थी - "ये..."
"क्या है यह!" उसने विरक्ति से भरकर कविता पर नज़र दौड़ाई थी- "ओह! कविता... तो अबतक इसका भूत उतरा नहीं तुम्हारे सिर से..." बिना पढ़े उसने पत्रिका मेज़ पर रख दी थी- "दुनिया में और भी ग़म हैं... कविताबाजी के सिवा!"
"मसलन?" अपने आसुओं को किसी तरह जब्त करते हुये उसने पूछा था.
"मसलन समय पर खाना बनाना... दिनभर खटता हूं, घर में बैठे-बैठे यह भी नहीं होता तुमसे कि वक़्त पर दो रोटी ही परोस दो? हद है आलसीपने की. पूरी दुनिया ताक पर रखकर साहित्य साधना हो रही है! कहो, अब कौन-सी नई ज़मीन तोड़ने का इरादा है? फूल तोड़ते जिसकी कलाई लचक जाती है वह रोज़ हथौड़ा उठाकर साहित्य में नई-नई ज़मीनें तोड़ने निकल रही हैं..."
"बस बहुत हो गया..." उसने आसूं पोंछकर सबको खाना परोस दिया था और फिर रसोई में बैठकर गर्मी में सीझती रही थी.  छोटी-सी खिड़की से एक गंदला, धुआंता आकाश दिख रहा है, छत की मुंडेर पर कबूतर का जोड़ा गुटरगूं करता हुआ, बिजली के तारों के गुंझल में अटकी हुई एक बेरंग पतंग... धूल में लिथड़ी उसकी यह दुनिया कितनी तंग, कितनी छोटी हो गई है! इस मकान में एक ही कमरा है - एक कमरा, रसोई और छोटी-सी बैल्कनी. जब भी कबीर के दोस्त आते हैं उसे रसोई में बैठना पड़ता है. कभी-कभी घंटों. सस्ती शराब के घूंट के साथ दुनियाभर के मजलूमों की बातें करते हुये कबीर उसे भूल जाता है. बड़े-बड़े दुखों के आगे उसके इन छोटे-छोटे दुखों के क्या माने है. कुछ भी तो नहीं! कामरेड्स एक-दूसरे के दुख-दर्द बांटते हैं, मिल-जुलकर सबकुछ सांझे में जीते हैं. उनसब के बीच उसकी तकलीफें अकेली, अनकही रह जाती हैं. कुछ कहने जाओ तो कबीर की वही झिड़कियां - बस रातदिन अपना रोना, अपने दुख... कभी खुद से बाहर भी निकलना सीखो! हमारी-तुम्हारी हालत तो बहुत अच्छी है, दो शाम का खाना मिल जाता है. दुनिया में करोड़ों ऐसे हैं जिन्हें एक जून की रोटी नसीब नहीं. अगर हर कोई तुम्हारी तरह अपना ही लेकर बैठ जायेगा तो फिर समाज के तलछट में पड़े, हाशिये में धकेल दिये गये इन बेक़सों के लिये कौन लड़ेगा, कौन इनकी आवाज़ बुलंद करेगा? सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, समाज बनकर भी जीना सीखो... अब इन नून-तेल जैसी बेकार की बातों में मेरा समय जाया मत करो, मुझे सिंगुर आंदोलन के समर्थन में सम्पादकीय लिखना है. एकदम आग़ लगा दूंगा!
      वह ग्लानि से भरकर चुप हो जाती. शायद वह सचमुच स्वार्थी है. अपनी ही परेशानियों में डूबी रहती है. खाना खाते हुये अपने कामरेड्स के साथ गरमागरम बहस के बीच कबीर झल्लाकर पूछता - आज सिर्फ़ दाल-रोटी! सब्जी क्यों नहीं बनी? आदमी खायेगा नहीं तो काम कैसे करेगा?’ वह कैसे बताती कि आज बड़ी मुश्किल से ये दाल-रोटी जुटी है. घर की ज़रुरतों की बात वह कबीर से कर नहीं पाती क्योंकि बकौल कबीर ये तुच्छ बातें हैं, मगर वह जानती है इन तुच्छ बातों के लिये उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. किताबों की प्रूफ रीडिंग, हिन्दी टाइपिंग, ट्युशन... फिर भी घर बड़ी मुश्किल से चलता है! पूरी दुनिया की चिंता करना कबीर का काम है. वह सामाजिक सरोकार का आदमी है. कमाना, घर चलाना, दाल-रोटी की जुगाड़ जैसे छोटे-मोटे काम उसके जिम्मे, क्योंकि वह साधारण स्त्री है. उसका कोई बड़ा लक्ष्य नहीं, महत उद्देश्य नहीं. इतना भी नहीं करेगी तो क्या करेगी! वह पसीने में डूबी रसोई में बैठी-बैठी सुनती रहती है दुनिया को सिरे से बदल डालने की योजनायें, नये समाज का निर्माण, एक आर-पार की लड़ाई... सभी जोश में हैं. इसी जोश में कभी कोई पानी मांग रहा है, कभी कोई कुछ और. सबकी इस जिस्मानी और दिमाग़ी ऊर्जा के लिये ईधन जुटाती हुई वह छीजती हुई सोचना चाहती है, इस आनेवाली क्रांति का जब इतिहास लिखा जायेगा, उसमें उसका नाम कहां होगा!... कहीं भी तो नहीं! दो हाथ तो उसके भी रातदिन ज़िन्दगी से जूझते रहते हैं, पसीना तो उसे भी बहुत आता है. सारे कामरेडों ने मिलकर उसके हिस्से की रोटियां भी खा ली है. आखिर इतने जोश और जुनून खाली पेट तो पैदा नहीं हो सकता... वह पानी पीते हुये समझने की कोशिश करती है, मगर पेट भूख से ऐंठता रहता है.
         उनके जाने के बाद वह बैल्कनी में बैठकर पत्रिका के पन्ने पलटकर अपनी छपी हुई कविता को बार-बार देखती है. कितने सालों बाद उसकी कोई रचना किसी पत्रिका में छपी है! सालों हो गये उसने लिखना छोड़ दिया था. एक तो हालात ऐसे थे, उसपर कबीर के रात-दिन के ताने - तुम लोगों के लिजलिजे सौंदर्यबोध पर वाकई हैरत होती है! पीलियाग्रस्त रोगी की आंख-से पीले चांद पर मरे जा रहे हैं! प्रियतम के होंठ, गाल, ज़ुल्फों पर दोनों जहां कुर्बान... वाह! क्या जज़्बात हैं! जिस धरती पर खड़े हैं उसकी ख़बर नहीं, करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर टिमकते तारों को गिन-गिनकर रात काट रहे हैं. इन्हें खाना नहीं, यार का दीदार चाहिये, पानी नहीं, लबों का सुर्ख प्याला चाहिये... मेरा वश चले तो इन बेतुकी बातों से कागज़ काला करनेवालों को गोली से उड़ा दूं! दे आर दी रीयल पैरासाइटस ऑफ दी सोसायटी. मजदूरों की मेहनत पर जीकर चांद-तारों की दुनिया में सर डाले शुतुरमुर्ग की तरह बेफिक्र बैठे रहते हैं. इनके सर भी एकदिन  गिलोटीन में जायेंगे देखना. रातदिन बैठ-बैठकर अवाम के लिये साहित्य के नामपर भांग घोंटते रहते हैं ये जातिवाद, पूंजीवाद के एजेंट!
वह कमज़ोर-सा प्रतिवाद करना चाहती - तो तुम्हीं सौंदर्य की परिभाषा बतला देते...कबीर उसकी बात लपक लेता - हां, क्यों नहीं! मैडम! सौंदर्य फूल, चांद में नहीं, मजदूरों की मेहनत में है! श्रम के सौंदर्य को पहचानो... पसीने की गंध, हल चलाते किसान की बांहों की मछलियां, उसकी मेहनत से कठोर हुई मांस-पेशियां, धूप-ताप से जली देह... धूल-मिट्टी और पसीने से लिथड़ी मजदूर औरतों का रुप देखा है कभी ध्यान से? तुमलोगों की मधुबाला, ऐश्वर्या से हज़ार गुना ज़्यादा सुंदर और मादक! एक अलग ही तरह की उत्तेजना और नशे से भर देतीं हैं. वर्ग संघर्ष से जो आग़ पैदा होती है, स्फूलिंग उड़ती है, रक्त की नदियां बहती है और अंतत: एक समानता, न्याय और सार्वभौमिक कल्याण की मुकम्मल छवि बनती है उसे शब्द दो, वाणी दो!
         सुन-सुनकर उसके कान पक गये थे. उसके सामने काग़ज-क़लम लेकर बैठने से भी वह कतराने लगी थी. कौन हर बात पर इतने ताने और भाषण सुने. शुरु-शुरु में उसे कुछ लिखते देख वह व्यंग्य से मुस्कराता - क्यों, आज कौन-सी क्रांति करने जा रही हो... अच्छा है इन बुद्धिजीवियों का! बाहर पूरी दुनिया में आग़ लग जाय, ये दरवाज़ा बंद करके विद्रोह के गीत लिखेंगे, हवाई घोड़े पर बैठकर काठ की तलवार भांजेंगे... मगर दरवाज़ा खोलकर एकबार बाहर निकलने बोलो, इनकी नानी मर जायेगी. हां! टी. वी. डिबेट आदि में मुंह भर-भरकर बहस करना या मोमबत्ती लेकर जुलूस निकालन इन्हें खूब आता है. कायर, परजीवी, बिना रीढ़ के रेंगनेवाले केंचुए! इनकी सारी वग़ाबत कागज़ पर! भैंस की तरह खा-पीकर सारा दिन जुगाली- बौद्धिक चर्वण! इन सबको चाबुक मार-मारकर खेतों, कारखानाओं में ले जाना चाहिये जैसे कम्बोडिया के जन विद्रोह में हुआ था. चांद पर  फूलों की फसल उगा रहे हो? चलो, यहां अनाज उगाकर दिखाओ! खुशहाल दुनिया का सपना मत दिखलाओ, कुछ हकीक़त में करो, एक जून की रोटी पैदा करो ज़मीन की सूखी छाती से... फिर देखें आपकी औकात, विश्व प्रेम, मानवतावाद!
                कबीर के जाने के बाद वह फर्श पर चटाई बिछाकर पड़ी रहती है - उनींदी-सी. ऊपर छतपर बिजली का पंखा लंगड़ा-लंगड़ाकर घूम रहा है, मरियल चाल से. घूमने से ज़्यादा शोर कर रहा है. दोपहर के वक्त ऊपरी मंज़िल का यह कमरा भट्टी में तब्दील हो जाता है. बैल्कनी के खुले हुये दरवाज़े से गर्म, सूखी हवा के झोंकें आ रहे हैं. धूल से भरा आसमान पीला दिख रहा है. बहुत ऊपर चक्कर काटती हुई चील की टिहकारी रह-रहकर सुनाई पड़ रही है. वह अपने आसपास को महसूसती है और तंद्रालस पड़ी रहती है. उसे हर समय ऐसा क्यों लगता है कि वह रोना चाहती है. बहुत कोशिश करके उसे हर काम करना पड़ता है. मन नहीं लगता. दौड़ते-भागते अचानक थक जाती है, यहां-वहां ढह पड़ती है, मुंह दबाकर रोने लगती है. सुबह उठकर सोचती है- ओह! एक और दिन... चूल्हा, धुआं, बर्तनों के अंबार के पीछे क्षितिज छिप जाता है. कितने दिन हो गये डूबता सूरज नहीं देखा, चांद का निकलना नहीं देखा... उसे अपने मामा के घर के आंगन में खड़ा बड़े नींबू का छतनार पेड़ याद आता है. बारिश के दिनों में हल्के पीले फूलों से भर जाता था. उनकी तेज़, मादक सुगंध... गहरी बैंजनी संध्या में खिड़की पर अनवरत झड़्ता आकाश और उस गंध से बोझिल भीगी हवा... याद करके वह आज भी सराबोर हो उठती है! इस तंग, छोटी कोठरी में उसे नींबू का वह पेड़, अप्रैल की उलटी-पलटी बहती हवा, बासंती शामें कुछ अधिक ही याद आती हैं.
           जब वहां थी तब कभी ऐसा नहीं लगा था कि ज़िन्दगी के ये दिन खूबसूरत हैं. तब भी तो वह किसी अच्छे दिन के इंतज़ार में इसी तरह खिड़की पर खडी रहती थी. बचपन में मां-बाप गुज़र गये थे. मामा ने ही पाला था. मगर मामी के दुर्व्यवहार से उसका जीवन त्रस्त था. नि:संतान मामी के हृदय में जाने क्यों विधाता ममता देना भी भूल गये थे. उनकी कोख की तरह ही उनका मन भी खाली रह गया था. वह रातदिन उनकी आंखों में खटकती रहती थी. मामा उसे अपनी आड़ में लिये रहते थे, मगर हर समय बचाना उनके लिये संभव नहीं था. हर समय घर के काम करते हुये उसके लिये पढ़ाई-लिखाई के लिये समय निकालना कठिन होता था. मामी की डांट-फटकार और घर भर के काम के बाद वह आंगन के किसी कोने में बैठकर तब भी किसी अच्छे दिन के सपने देखा करती थी. मगर तबके और अबके हालात में एक बहुत बड़ा फर्क ये है कि तब सारी मुसीबतों के बीच भी एक उम्मीद थी - उम्मीद एक दिन सब कुछ ठीक हो जाने की, हालत बदलने की. मगर अब वह उम्मीद भी नहीं बची है. अब लगता है कुछ होना नहीं है, कुछ बदलेगा नहीं! ज़िन्दगी इसी तरह ख़त्म हो जायेगी. सोचकर उसे घबराहट होती है.
         दोपहर के धुआंते आकाश में रंग के रेशे घुल रहे हैं, पश्चिम में सूरज दूर बेडौल ईमारतों के पीछे उतर रहा है. गर्मी से परेशान होकर वह बाहर बैल्कनी में निकल आई है. बाल पसीने से भीगकर कनपट्टियों पर चिपक गये हैं. ब्लाउज भी पीठ की तरफ से पूरी तरह भीगा हुआ है. सुराही में भी अब पानी ठंडा नहीं हो रहा. पानी पीकर लगता है प्यास और बढ़ गयी है. वह अपनी मुसी साड़ी में बैल्कनी में खड़ी सड़क की दूसरी ओर पार्क में खेलते बच्चों को देखती रहती है. बच्चों के दौड़ने से चारों ओर धूल उड़ रही है. पार्क की दीवार से लगकर गोलगप्पे, चिनिया बदाम, हवाई मिठाई, मलाई बरफ, फिरके, बलून आदि बेचनेवालों की भीड़ लगी है. पार्क के दूसरी तरफ पानी की बड़ी टंकी के पास बहुत से लोग गोल होकर भालू का नाच देख रहे हैं. भालूवाला डमरु बजाते हुये गा रहा है - राजा डिस्को जायेगा, राजा डांस करेगा...और बिचारा राजा अपने गंदे बड़े-बड़े बालों में गर्मी से त्रस्त पीछे के दो पंजों पर खड़ा होकर घुर्र-घुर्राते हुये हांफ-हांफकर थप-थप नाच रहा है. नाच की गति धीमी होते ही नाक की नकेल खिंची जाती है और वह तिलमिलाकर तेज़ी से उछलने लगता है. चारों तरफ धूल, धुआं, खुली हुई नालियां, शोर, भैंस का तबेला... शाम घिरते ही माथे पर फनल की तरह मच्छरों का जत्था मंडराने लगा है. उनकी तेज़ भनभनाहट को सुनते हुये उसके भीतर कुछ घुलाता रहता है. यहां बदबू है, घुटन है, गंदगी है... दूर गली के सिरे पर एक टुकड़ा मटमैला आकाश फटी हुई पतंग की तरह अटका हुआ है... ज़रा-सी खुली जगह, हवा और आकाश के लिये उसका मन अकुलाता रहता है. रसोई की धुआंयी दीवार पर लगे कैलेंडर के चित्र को वह बार-बार देखती है. शायद कश्मीर का है - हरी-भरी वादियां, नीली झील और बर्फ से ढंके पर्वत की सफेद चोटियां... वह आंख बंदकर गहरी सांस लेते हुये वहां की हवा को महसूस करने की कोशिश करती है. बहुत बार जब तेज़ गरमी में यह छोटा मकान किसी तंदूर की तरह तपने लगता है, उसका जी चाहता है दरवाज़ा खोलकर वह कहीं भाग जाये - कहीं भी जहां इतनी घुटन, इतनी गर्मी, इतनी गंदगी न हो...(क्रमशः)---------।

जयश्री राय ने बहुत ही कम समय में हिन्दी के युवा कथाकारों में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। हजारीबाग बिहार में पैदा हुयी और गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में गोल्ड मेडलिस्ट जयश्री राय के अब तक तीन कहानी संग्रह(अनकही,तुम्हें छू लूं जरा और खारा पानी),तीन उपन्यास(औरत जो नदी है,साथ चलते हुये,इकबाल) और एक कविता संग्रह(तुम्हारे लिये) प्रकाशितइन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में नियमित कहानियों,कविताओं का प्रकाशन। फ़िलहाल गोवा में निवास और स्वतन्त्र लेखन।
सम्पर्क--मो.09822581137 ई-मे: jaishreeroykathakar@rediffmail.com


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. ‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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