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“नया तमाशा नयी कहानी”

सोमवार, 25 मई 2015

नया तमाशा नयी कहानी
(बाल नाटक)डा0हेमन्त कुमार
(मंद बुद्धि बच्चों के मनोभावों को आप तक पहुंचाने की एक कोशिश)
मैं आज आपके सामने अपने लगभग पूरे हो चुके बाल नाटक नया तमाशा नयी कहानी के दो दृश्य प्रकाशित कर रहा हूं।आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे नाटक को सुधारने/घटाने /बढ़ाने मे मदद करेंगी।
(दृश्य3)
(गनेसी के घर का बराम्दा।नन्हकऊ एक नया पीढ़ा बना रहा है।पास में ही गनेसी बसेहटी खटिया पर पालथी मार कर बैठा मोटर चलाने का अभिनय कर रहा है।उसके हाथ में किसी छोटी साइकिल का टायर है।वह उसी को स्टेयरिंग की तरह इधर उधर घुमा रहा है साथ ही मुंह से तरह तरह की आवाजें भी निकाल रहा है।)
गनेसी:(टायर को स्टेयरिंग की तरह घुमाते हुए) घुल्लघुल्लपोंपोंपींपींपहतो भाई हतोमेली मोतल चल पड़ीहत जाओ बापू सामने छे हत जाओ ---पींपींप---।
(गनेसी की मां पार्वती का प्रवेश।पार्वती के एक हाथ में एक थैला है।दूसरे में गत्ते का एक छोटा डिब्बा।)
पार्वती:(गनेसी से)ले बेटा गनेसीये थैला जरा भीतर रख आ---और इस डिब्बे में कुछ है खा ले।सुबह से भूखा होगा मेरा---लाल।
   (गनेसी के पास जाकर आंचल से उसका मुंह पोंछती है।गनेसी उसी तरहा टायर घुमाता रहता है।जैसे उसने सुना ही न हो।)
गनेसी:पींपींपहत्तो अम्माहज्जाओमेली मोटल आ र्रर्रर्रर्रही है---देखो अम्मा हम ल को र्रर्रर्र बोल दिये---पीं पींप---।
पार्वती:अरे बेटवा---पहिले कुछ खाई ले फ़िर चलाना मोटर।
गनेसी:(टायर घुमाते हुए)मिथाई लाई हो का अम्मा?
पार्वती:मिठाई नहीं तो बाबा जी का ठुल्लू लाए हैं। अरे सबेरे से एक बोरा गेहूं साफ़ किया तो ठकुराइन ने चार ठो बासी पूड़ी औ सब्जी दी है।ले बइठ के खाई ले।
(गनेसी टायर छोड़ कर  बहुत जोर से ताली पीटता है और हंसता है)
गनेसी: हा हाहाहाबाबा जी का थुल्लू।लाओ अम्मा देखें कैसा होता है बाबा जी का थुल्लू?मीठा होता है का--?
(पार्वती उसके सामने दफ़्ती का डिब्बा रख कर माथा पकड़ कर बैठ जाती है।नन्हकऊ अपने काम में लगा रहता है।गनेसी गत्ते का डिब्बा लेकर नन्हकऊ के सामने जाता है।)
गनेसी:(नन्हकऊ से)बापूबापू लो तुम भी खा लोअम्मा बाबा जी का थुल्लू लाई हैं।
(नन्हकऊ बोलता नहीं अपने काम में लगा रहता है।)
गनेसी:बापू,कभी खाए हो बाबा जी का थुल्लू?
(नन्हकऊ गुस्से में एक बार गनेसी की तरफ़ देखता है फ़िर उसे कस कर एक झापड़ मारता है।गनेसी हतप्रभ हो जाता है।)
नन्हकऊ:भाग साले इहां सेपागल कहीं काकाम नहीं करने दे रहा।सबेरे से घुरुर घुरुर लगाए है।इस्कुलवौ में बैठते नहीं बनताजा भाग।
(गनेसी हक्का बक्का हो कर नन्हकऊ को करुणा भरी निगाहों से देखता है।फ़िर पूड़ियों का डिब्बा नन्हकऊ की तरफ़ फ़ेंक कर हंसता हुआ तेजी से बाहर की ओर भागता है।)
गनेसी:हाहाहाबाबा जी का थुल्लू---थुल्लू---।
(पार्वती उसे आवाज देती है)
पार्वती:अरे रुक जा बेटापूड़ी खा ले फ़िर जा---।
    (गनेसी रुकता नहीं तेजी से भाग जाता है।)
पार्वती:क्यों मार दिया बिचारे को?पूड़ी तो खा लेने दिये होते उसको----।
नन्हकऊ:(गुस्से में)मारें न तो का पूजा करें?साला पागलढपोंग का पंडवा होइ गया।इसकी उमर के बच्चे काम धाम करके कमा रहे हैं।ई ससुरा सबेरे से घरवै में कोहराम मचाए रहता है।मर भी नहीं जाता साला।
पार्वती:(करुण स्वरों में)काहे कोस रहे हो बिचारे को---अब भगवान ने कम बुद्धि दे के भेजा है तो ऊ का करै?कहां से हो जाए और लड़कन की तरहबिचारे को पूड़ी भी नहीं खाए दिये---।
(नन्हकऊ गुस्से में पीढ़ा हथौड़ी पटक कर बाहर की तरफ़ निकल जाता है।करुण संगीत।दृश्य यहीं  फ़ेड आउट होता है।)
दृश्य-7
(गांव का ही दृश्य।मंच पर हल्का प्रकाश।मंच के एक तरफ़ से गनेसी,गुड़िया,शंकर और तीन चार अन्य मंद बुद्धि बच्चे कतार बद्ध होकर बहुत धीरे-धीरे आते हैं।मंच के बीचोबीच रुक जाते हैं।दर्शकों की तरफ़ मुंह करके उन्हें संबोधित करते हैं।)
गनेसी:(हाथ उठाकर दुखी स्वरों में)
            हम हैं बड़े अभागे बच्चे
            हम हैं बड़े उपेक्षित बच्चे
            कुछ भी कह लें आप सभी पर
            आखिर हम भी आप के बच्चे।
            फ़िर भला हमारी क्या है गलती
            क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
गुड़िया:(दर्शकों की तरफ़ झुक कर)
             फ़िर भला हमारी क्या है गलती
             क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
बच्चा(तीन):   घरों पे मिलती हमें उपेक्षा
             स्कूल भी दोस्त नहीं क्यूं सच्चा
             हमें चिढ़ाता क्यूं हर बच्चा
             शिक्षक कहते पगला बच्चा।
             फ़िर भला हमारी क्या है गलती
             क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
बच्चा(चार):   हम भी कभी थे प्यारे बच्चे
            गोल मटोल बबुओं के जैसे
            बढ़ता गया आकार हमारा
            दिखता गया विकार हमारा।
            फ़िर भला हमारी कहां थी गलती
            क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
(पूरे मंच पर अंधकार।केवल एक स्पाट लाइट मंच के बीच बैठे गनेसी के ऊपर पड़ेगी।गनेसी मंच के बीच में उकड़ूं बैठ कर दोनों पांवों के बीच अपना सर छुपा लेता है।बाकी सारे बच्चे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उसके चारों ओर घूमते रहते हैं।)
सारे बच्चे(सामूहिक स्वर में):
         आखिर हमने क्या की गलती
         रोज हमें क्यूं मिलती झिड़की।
(बच्चों के घूमने की गति तेज होती है।तेजी से घूमने के साथ ही सारे बच्चेआखिर हमने क्या--।
गाते रहते हैं।बीच में गनेसी और अधिक सिकुड़ कर बैठता जाता है।गनेसी सिसकता भी हैऽन्त में सारे बच्चे गनेसी के ऊपर झुक जाते हैं। दृश्य यहीं फ़्रीज होकर फ़ेड आउट हो जाता है।)
         (यह अन्त नहीं एक शुरुआत है…)


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भजन-(8)-वाल्मीकि आश्रम प्रकरण

शुक्रवार, 8 मई 2015

नाथ सदा तुम साथ  मेरे बस  बिनती यही है हमें ना बिसरइहो।
तुम बिन सिय आधार कहां, निज सिय को चरन सदा बइठइहो।।

छोड़ अवधपुर निर्जन वन में दरसन को यह मन है रोता,
कैसे होगे मम रघुराई बस हर पल हिय में यही है होता,
अवध से त्यागे निज सिय को प्रभु हिय से सिय को नाहिं हटइहो।
नाथ सदा तुम साथ  मेरे, बस बिनती यही है हमें ना बिसरइहो।।

कन्द मूल खा भूमि शयन कर एक एक दिन कटि जइहें,
विरह बियोग शोक दुख सारे  प्रभु देह साथ चलि जइहैं
जब तक प्राण रहे तन में इस आंखिन माहिं सदा बसि रहिहो।
नाथ सदा तुम साथ  मेरे, बस बिनती यही है हमें ना बिसरइहो।।

आपन तो सुध चैन नहिं मन आवत मेरे प्रभु कस होइहें,
यहि सोच एक एक दिन बीतत कुशल क्षेम कस पइहें,
सूर्यवंश कुलदीप महाप्रभु बस बिनती यही मन भीतर  रहिहो।
नाथ सदा तुम साथ  मेरे, बस बिनती यही है हमें ना बिसरइहो।।
000
राजेश्वर मधुकर
       शैक्षिक दूरदर्शन लखनऊ में प्रवक्ता उत्पादन के पद पर कार्यरत श्री राजेश्वर मधुकर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।मधुकर के व्यक्तित्व में कवि,लेखक,उपन्यासकार और एक अच्छे फ़िल्मकार का अनोखा संगम है।सांझ की परछांई(बौद्ध दर्शन पर आधारित  उपन्यास),आरोह स्वर(कविता संग्रह),घड़ियाल(नाटक), छूटि गइल अंचरा के दाग(भोजपुरी नाटक) आदि  इनकी  प्रमुख कृतियां हैं। इनके अतिरिक्त मधुकर जी ने अब तक लगभग एक दर्जन से अधिक टी वी सीरियलों का लेखन एवं निर्देशन तथा सांवरी नाम की भोजपुरी फ़ीचर फ़िल्म का  लेखन,निर्देशन एवं निर्माण भी किया है।आपके हिन्दी एवं भोजपुरी गीतों के लगभग 50 कैसेट तथा कई वीडियो एलबम भी बन चुके हैं। 
 मो0 9415548872    


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रंगबाजी करते राजीव जी

बुधवार, 6 मई 2015

           


एक ठो हमारे मित्र हैं।नाम है पंडित राजीव मिश्र।बहुत नामचीन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के रंगबाज।जब देखो तब रंग बाजी—सुबहदोपहर-शाम रंगबाजी हम उनको बहुत समझाते हैं कि भैया हर वक्त की रंगबाजी अच्छी नहीं तो बोलेंगे कुछ नहीं मुस्कुरा भर देंगे। पर उनकी वही कातिलाना मुस्कराहट ही तो बड़ी बड़ी लैलाओं को घायल कर देती है और बड़े से बड़े मजनूं उनके मुरीद हो जाते हैं।आखिर उन्होंने इश्क भी किया है रंगों से और जिन्दगी भर रंगबाजी करने की कसम खायी है।
   एक बार का वाकया बतायेंहम लोग चाय पीने निशातगंज गये थे।दोपहर का वक्त गरमी के कारण सड़कों पर सन्नाटा।मैंने कहा यार ये तो मरघट हो गया है शहर। पँडित राजीव बोले गुलजार कर दूं अभी? मैंने कहा कर दो भैया। पंडित जी ने तपाक से एक  जेब से एक फ़ुलस्केप कागज निकाला इंक पेन निकाली और चाय वाले को बोले कुर्सी पर बैठ जाओ।वो उनकी शकल देखने लगा। और पंडित जी चालू हो गये एक किताब पर कागज रख कर उसका लाइव पोर्ट्रेट बनाने में।मैं देखने लगा।चाय के सारे ग्राहक देखने लेगे उनका काम।थोड़ी देर में साइकिल,रिक्शा और पैदल वाले भीड़ लगा लिये। अन्ततः
ट्राफ़िक जाममच गयी पोंपोंटींटीं। और निशतगंज पुलिस चौकी से दीवान जी दौड़े आये।क्या मामलाभीड़ काहे कीदेखा यहां तो पंडितजी की रंगबाजी चल रही।कुछ बोले नहीं बेचारेपहले डंडा फ़टकारा भीड़ हटायीफ़िर संकोच से बोले साहब एक मेरा भी पोर्ट्रेट बना दें ड़राइंग रूम की शोभा बढ़ेगी।----तो ये तो एक छोटा सा नमूना पेश किया मैंने पंडित राजीव मिश्र की रंगबाजी का।
      राजीव जी एक प्रतिष्ठित चित्रकार,संगीतकार,मूर्तिकार होने के साथ ही एक बेहतरीन इन्सान भी हैं।चित्रकारी की हर विधा में उनकी अच्छी पकड़ हैऽउर जिसको कहते हैं साधना ---उन्होंने पेण्टिंग के हर माध्यमवाश,एक्रेलिक,क्रेयान्स,पेन इंक,कलर पेंसिल,डाट पेन,आयल कलर से हजारों की संख्या में पेण्तिंग्स की हैं।राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पेण्टिंग की प्रदर्शनियां हुयी हैं।
     राजीव जी आजकल एक बड़ी एग्जीबीशन की तैयारी में लगे हैं।इस प्रदर्शनी की तारीख और स्थान की सूचना वो जल्द ही आपको देंगे।फ़िलवक्त उनकी मूर्तिकारी और चित्रकारी,रंगबाजी के कुछ नमूने देखिये।








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डा0हेमन्त कुमार   

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भजन-(7)-सीता का त्याग

सोमवार, 4 मई 2015

माता को पुत्र कैसे निर्जन में छोड़ आये, बिनती हमारी नाथ ऐसा ना कीजै।
चैदह बरस दिन कांटों में बीता है, फिर घूमें वन वन प्रभु ऐसा ना कीजै।।

ऐसा विधाता खेल कैसे तू खेलता है, इतना निठुर हिया कैसे हो जाता है,
फूलों में रहने वाली काटों में सोये, कहते हुए हिय कांप नहीं जाता है,
नन्हीं  चिनगारी कहीं अवध को जला न जाये,अवसर अभी है विचार प्रभु कीजै।
माता को पुत्र कैसे निर्जन में छोड़ आये, बिनती हमारी नाथ ऐसा ना कीजै।।

राजा है आप मुझे मृत्यु दंड दे दें,लेकिन मैं ऐसा आदेश नहीं मानूंगा।
गंगा समान मां ममतामयी को साथ ले,जंगल में छोड़नें ना जाऊँगा॥
दया की भीख आज सेवक को दे दें नाथ, मैया सिया के साथ ऐसा ना कीजै।
चौदह बरस दिन कांटों में बीता है, फिर घूमें वन वन प्रभु ऐसा ना कीजै।।
                                  00000

राजेश्वर मधुकर
शैक्षिक दूरदर्शन लखनऊ में प्रवक्ता उत्पादन के पद पर कार्यरत श्री राजेश्वर मधुकर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।मधुकर के व्यक्तित्व में कवि,लेखक,उपन्यासकार और एक अच्छे फ़िल्मकार का अनोखा संगम है।सांझ की परछांई(बौद्ध दर्शन पर आधारित  उपन्यास),आरोह स्वर(कविता संग्रह),घड़ियाल(नाटक), छूटि गइल अंचरा के दाग(भोजपुरी नाटक) आदि  इनकी  प्रमुख कृतियां हैं। इनके अतिरिक्त मधुकर जी ने अब तक लगभग एक दर्जन से अधिक टी वी सीरियलों का लेखन एवं निर्देशन तथा सांवरी नाम की भोजपुरी फ़ीचर फ़िल्म का  लेखन,निर्देशन एवं निर्माण भी किया है।आपके हिन्दी एवं भोजपुरी गीतों के लगभग 50 कैसेट तथा कई वीडियो एलबम भी बन चुके हैं। 

 मो0 9415548872    

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक संस्कृति लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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