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बाजू वाले प्लाट पर

रविवार, 11 दिसंबर 2011

कुछ बच्चे रहते हैं
मेरी बिल्डिंग के
बाजू वाले प्लाट पर
प्लाट पर बनी झोपड़ियों में
बन्द है उनका
अनोखा अद्भुत संसार।

झोपड़ी के एक कोने में है
उनका किचेन
दूसरा कोना बेडरूम
तीसरा ड्राइंग रूम
बाहर का मैदान है उनका
ओपेन टायलेट
जहां वे हगते मूतते
और नाक छिनकते हैं।

इसी झोपड़ी में खोलते हैं
वे आंखें
इसी में खेलते हैं
लड़ते हैं झगड़ते हैं
करते हैं धमाचौकड़ी
उठा पटक और लत्तम पैजार।

फ़िर निकल पड़ते हैं
कन्धे पर एक फ़टा बोरा
और हाथ में एक छड़ी लेकर
पूरे दिन भर के सफ़र पर
शहर की सड़कों की लम्बाई नापने
कूड़े के ढेर से पालीथिन बीनने
और जिन्दगी का गणित
समझने कए लिये।

लम्बी लम्बी सड़कों पर भागता ट्रैफ़िक
गली के नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर
शहर की ऊंची बिल्डिंगों का हुजूम
सिनेमा के बड़े बड़े पोस्टर
मल्लिका की देह,ऐश्वर्या के उभार
चाय की चुस्की,बीड़ी का सुट्टा
यही सब है
इन बच्चों का ओपेन स्कूल।

ये बच्चे
देखते हैं बड़ी हसरत भरी निगाहों से
रोज सबेरे हमारे बच्चों को
स्कूल जाते हुये
शाम को घूमने जाते हुये
रात में बर्थ डे पार्टियों में
ठुमके लगाते हुये।

ये बच्चे झांकते हैं
कभी कभी
हमारी बिल्डिंग के भीतर भी
पर नहीं आते अंदर कभी
शायद नहीं पसन्द है उन्हें
अपनी झोपड़ी के
अनोखे अद्भुत संसार को
छोड़ना या उससे बिछुड़ना।
0000
हेमन्त कुमार

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वह सांवली लड़की

रविवार, 4 दिसंबर 2011

(चित्र साभार--युनिसेफ़)

याद आती है अक्सर मुझे
मेरे मोहल्ले की वह साँवली-सी लड़की।
तंग कोठरी में बंद
जिसकी उदास आँखों में
सारा आकाश होता था
मगर सपनों का कहीं कोई रेश नहीं...
न जाने क्यों अनकहे ही मुझे
उसकी चुप्पी सुनाई देती थी बहुत बार।

...जब वह गूंगी आँखों से,
संवाद करती थी हवा और धूप से
और अनायास ठिठक कर,
आकाश में उड़ती किसी पतंग को,
निर्निमेष ताकने लगती थी...
तब पर तोलती-सी लगती थीं उसकी पलकें...
ऐसे में मुझे प्रतीत होता था
उसके सारे रूमानी शब्द भीग गए हैं
उसी के अंदर बहती किसी नमकीन नदी में...।

इच्छा के किसी तरल-से क्षण में
मेरा मन करता था
आकाश के नील में हथेली डुबोकर
उसका फीका-सा जीवन रंग दूँ और-छोर
और मुस्कान की एक सुनहरी तितली
उसके उदास होंठों पर रख दूँ
न जाने कितनी बार उसके लिए
इन्द्रधनुष तोड़ लाया था
आषाढ की नीली संध्या से
मगर कभी उसे दे न सका।

जेब में लिए फिरता रहा
उस क्षण की प्रतीक्षा में
जब वह मेरी तरफ देखेगी
तब मैं थमाऊँगा उसे
वे मुस्कराहट, गीत और स्वप्न
जो अपने हिस्से से उसके लिए,
अब तक बचा रक्खे थे।

मगर ऐसा हो न सका
वह अपने अँधेरे से निकलकर
जिंदगी पर अपना हक़ जताने कभी आ न सकी
और एक दिन ना मालूम खो गयी
अपने सूनेपन में
आहों और आंसुओं की विरासत लिए
ठीक जैसे हमारी लड़कियां
खो जाती है अक्सर
बचपन के आँगन से
ससुराल की जलती अंगीठी में
या फिर अपनी माँ की कोख से...
याद आती है अक्सर मुझे...।
000
कवियत्रीजयश्री राय
                                                        जयश्री राय हिन्दी की चर्चित कहानीकार हैं।गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन।हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां,कविताएं प्रकाशित।एक कहानी संग्रह एवम एक कविता संग्रह प्रकाशित एवम तीन पुस्तकें प्रकाशनाधीन।कुछ समय तक अध्यापन कार्य।सम्प्रति स्वतन्त्र लेखन।

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पहले कभी-----

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

पहले तो कभी
नहीं हुआ था
ऐसा हादसा
कि सारी गौरैया
हो गयी हों अचानक फ़ुर्र
आंगन से
और गंगा बाबू
बैठे रहे हों मुट्ठी में चावल लिये
आंगन में अकेले
सारा सारा दिन।

पहली बार हुआ
ऐसा कि
इन्कार कर दिया
कौवों ने
श्राद्ध पक्ष में
पितरों को दिया
दूध भात खाने से ।

कि रमुआ कलुआ
और गांव के सारे बच्चे
सारे सारे दिन भटकते रहें
खेतों की मेंड़ पर
वीर बहूटी की तलाश में
और वीर बहूटी उन्हें न मिल पाये
ख्वाबों की भरी बरसात में  भी।

ऐसा अजूबा हुआ पहली बार
मेरी जिन्दगी में
कि जाड़ा पूरा का पूरा बीत गया
और काका काकी
सारा सारा दिन दुबके रहे
रजाई के भीतर
एक टुकड़ा धूप
के इन्तजार में।
पहले तो कभी
नहीं हुआ ऐसा हादसा।

करवाचौथ पर
गांव की सारी औरतें
हाथों में पूजा की थालियां लिये
करती रहीं चांद का इन्तजार
और धूल धुयें के गुबार से
ढके चांद ने
टूटने ही नहीं दिया व्रत।

पहले तो कभी
नहीं हुये ऐसे हादसे
कि गांव के सारे पुरुष
हलों की फ़ाल पर साम धराये
करते रहे इन्तजार बादल का
और प्रचण्ड धूप लू के थपेड़ों ने
सावन में भी
नहीं पहुंचने दिया
उन्हें खेतों की मेड़ तक।

पहले तो कभी
नहीं हुये ऐसे हादसे
हमारी धरती पर
फ़िर आज ही क्यों
जब कि हम
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
को जानने के लिये
धरती के गर्भ को
मथ रहे हैं
टनों इस्पात से बनी मथानी से
और कर रहे हैं कोशिश
हर उस अज्ञात को
जानने की
जो जड़ देगा एक तमगा और
हमारे सीने पर
एक नई ईजाद का।
   0000
हेमन्त कुमार

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कथा,काव्य,यात्रावृत्त और दर्शन का अद्भुत संगम----‘देख लूं तो चलूं’।

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

पुस्तक

देख लूं तो चलूं
लेखक:समीर लाल समीर
प्रकाशक:शिवना प्रकाशन
पी0सी0लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेण्ट
बस स्टैण्ड,सिहोर(म0प्र0)
भारत
मूल्य रू0-100/मात्र


कथा,काव्य,यात्रावृत्त और दर्शन का अद्भुत संगम----देख लूं तो चलूं

                    साहित्य में हर विधा की पुस्तक पढ़ने का अपना अलग आनन्द होता है। कहानी,कविता,नाटक,उपन्यास,व्यंग्य,यात्रा वृत्तान्त सभी विधाओं की अपनी खूबियां होती हैं। सबका अलग अलग प्रभाव और आनंद होता है। और सबसे बड़ी बात यह कि सभी विधाओं के पाठक भी अलग अलग अभिरुचि के होते हैं। किसी पाठक को कविता आनन्दित करती है तो किसी को कथा साहित्य,किसी कू नाटक तो किसी को व्यंग्य। ज्यादातर पाठक किसी एक विधा के लिये ही एक किताब खरीदता और पढ़ता है। इसका कारण यह भी है कि बहुत कम ही पुस्तकें ऐसी मिलेंगी जिनमें आपको हर विधा का रसास्वादन मिल सके।लेकिन हाल ही में प्रकाशित समीर लाल समीर की पुस्तक देख लूं तो चलूं’ इस विषय में अपवाद है।अपवाद इसलिये कि यह उन गिनी चुनी किताबों की श्रेणी में रखी जा सकती है जिसमें आपको साहित्य की अलग अलग विधाओं की रसानुभूति हो सकेगी।यानि कि इसे पढ़ते समय आपको कहानी,कविता,उपन्यास,यात्रावृत्त सभी का आनन्द मिलेगा। मेरी एक आदत है। मैं कोई भी पुस्तक बहुत आराम से पढ़ता हूं। यानि कि ब्रेक लगा लगाकर। लेकिन इस मामले में भी यह किताब अपवाद सिद्ध हुई। यानि कि आदत के विरुद्ध मैं इसे एक ही बैठक में पढ़ गया। जबकि ऐसा मेरे साथ बहुत कम ही हुआ है। कुछ गिनी चुनी किताबें हैं जिन्हें मैं सारा काम छोड़कर पढ़ने लगा था।देख लूं तो चलूं भी उन्हीं किताबों की सूचि में शामिल हो गयी।जबकि इस पुस्तक की कहानी इतनी मात्र है कि लेखक को अपने किसी मित्र के घर गृह प्रवेश की दावत में पहुंचना है। और वह कार से कनाडा के एक हाइवे पर यात्रा कर रहे हैं। सिर्फ़ इतने छोटे से कथ्य को लेकर एक उपन्यासिका लिख देना कलम के एक मजे हुये खिलाड़ी के बूते की बात है। और इस मामले में में समीर जी बधाई के पात्र हैं।
  अपने घर से निकलकर मित्र के घर पहुंचने की इस पूरी यात्रा के दौरान समीर जी ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ दो देशों,दो संस्कृतियों,रीति रिवाजों,दो देशों की राजनैतिक स्थितियों,राजनेताओं,जनता के स्वभाव के अन्तर,आदि को बड़े करीने से शब्दों में बांधा है।इस पुस्तक में जहां आपको प्रवासी भारतीयों का दर्द,उनके वतन छूटने की पीड़ा,उनके मन में चल रही उथल पुथल पढ़ने को मिलेगी वहीं दूसरी ओर भारतवर्ष में उनके रिश्तेदारों,उनके हम वतन मित्रों के मन में चलने वाले विचार भी पढ़ने को मिलेंगे। एक मां बाप जिनका बेटा कनाडा,फ़्रांस,जर्मनी,टोक्यो या अन्य किसी देश में नौकरी करने चला गया है।उस मां पिता के मन की छटपटाहट,बेटे के वापस आने की प्रतीक्षा में जाग जाग कर पूरी रात बिताना,आपस की बातचीत में हर वक्त उस बेटे/बहू/बच्चों की चर्चा मन को कहीं गहराई तक आन्दोलित कर जाती है।
         उपन्यासिका का हर प्रसंग अपने आप में एक अलग कहानी होते हुये भी आपस में इस तरह जुड़ा है कि पाठक किताब शुरू करने के बाद समाप्त करके ही छोड़ेगा।चाहे वो प्रवासी हो गये बेटे के इन्तजार में बातों में रात काटने की कोशिश कर रहे वृद्ध दम्पत्ति हों,जर्मनी में समलैंगिकों की पार्टी की घटना हो,ट्रेन में प्रेमी युगल के किसिंग का दृश्य हो,भारतवर्ष में मित्र के पिता के निधन का प्रसंग हो या इस ढंग के अन्य प्रसंग।जिस तरह आप किसी बहुत सुन्दर मकान में प्रवेश करें और उसके कमरे दर कमरे में प्रवेश करते जा रहे हों---और हर दरवाजा आपको एक अलग खूबसूरत कमरे में पहुंचा रहा होएक दरवाजे के अंदर दूसरा,दूसरे के अंदर तीसरा,चौथा और हर बार आपके मुंह से निकले वाहअरेअद्भुतकुछ ऐसा ही अनुभव आप पायेंगे इस पुस्तक को पढ़ते हुये।छोटी छोटी घटनाओं ,प्रसंगों को समीर जी ने जिस प्रकार अपनी हाइवे की कार यात्रा के साथ संयोजित किया है वह अद्भुत है। हर घटना,प्रसंग पढ़कर पाठक चमत्कृत, अभिभूत होता हुआ आगे बढ़ता है। इसमें एक तरफ़ भारत देश है,यहां के गांव हैं,मध्य प्रदेश की यादें हैं तो दूसरी तरफ़ कनाडा है,वहां की संस्कृति है,वहां के लोग हैं,उनका व्यवहार है।
        यहां आपको भाषा और शिल्प का ऐसा अद्भुत अनोखा सामंजस्य मिलेगा जो प्रायःगद्य में कम पढ़ने को मिलता है। भाषा इतनी सहज और प्रवाहमयी कि ऐसा नहीं लगता है कि हम पुस्तक पढ़ रहे हैं।सारे दृश्य एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने से गुजरते जाते हैं। और दृश्यों का यही गुजरते जाना ही इस उपन्यासिका की शैली की सबसे बड़ी विशेषता है। यह किताब पढ़ते हुए मुझे एक और उपन्यास बार बार याद आ रहा था। वो उपन्यास है प्रख्यात समाजवादी चिंतक,आलोचक एवं भूतपूर्व अध्यक्ष,हिन्दी विभाग इलाहाबाद युनिवर्सिटी मेरे गुरु डा0 रघुवंश जी का उपन्यास तन्तुजाल।रघुवंश जी के तन्तुजाल का नायक भी ट्रेन की लम्बी यात्रा में है। और उसकी पूरी यात्रा के साथ घटनाओं,संवेदनाओं, और व्यक्तियों का समूह लेखक से लगभग चार सौ पृष्ठ लिखवा डालता है। पूरी यात्रा में ट्रेन की खटर खट्ट,----सीटी,  स्टेशन,चायवाले वेण्डर,कुली---और उनके बीच से निकलता नायक का चिन्तन ,उसकी सोच,समाज,देश के प्रति उसकी चिन्ताएंऔर भी बहुत कुछ। हां यह बात जरूर है कि रघुवंश जी की भाषा अपेक्षाकृत थोड़ा कठिन और बोझिल है।लेकिन इसके बावजूद वह उपन्यास मैंने कई बार पढ़ा है।
             समीर जी की इस उपन्यासिका में उनके कवि मन,यायावरी प्रवृत्ति, और छोटी छोटी चुटकियां लेकर अपनी बात बढ़ाने की विशेष कला स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। और उनकी यही चुटकियां,व्यंग्यात्मक शैली उन्हें अन्य लेखकों से अलग करती है।
                         एक और विशेषता इस पुस्तक की जो बहुत प्रभावित करती है कि हर प्रसंग की शुरुआत तो समीर जी बहुत ही मजेदार और हंसमुख वातावरण से करते हैं।पर वह प्रसंग समाप्त होते होते वो पूरे दार्शनिक हो जाते हैं। इतना ही नहीं प्रसंग की समाप्ति पर पहुंच कर तो हमें मानव जीवन की उन सच्चाइयों,उन आदर्शों,उन रास्तों से रूबरू कराते हैं जिन पर यदि दुनिया चले तो शायद धरती की रंगत ही बदल जाय। देशों,सम्प्रदायों,धर्मों,जातियों के सारे विवाद ही समाप्त हो जायं।लेकिन ऐसा संभव हो  तब न…?कुल मिलाकर अगर मैं यह कहूं कि देख लूं तो चलूं घटनाओं,कथ्यों,शब्दों और भाषा का ऐसा अद्भुत कोलाज है जिसे पाठक बार बार पढ़ना चाहेगा।
                        0000
हेमन्त कुमार


समीर लाल समीर
दुनिया में हिन्दी का भला कौन सा ब्लागर,पाठक होगा जो समीर जी से अपरिचित होगा।जबलपुर, मध्य प्रदेश में जन्मे समीर जी अपनी पढ़ाई पूरी करके कनाडा पहुंच गये।जबलपुर से कनाडा तक की इस यात्रा,देश छूटने की पीड़ा,अपने देश भारत के लिये कुछ करने की तमन्ना उनके लेखन में हमें परिलक्षित होती है। कनाडा के प्रतिष्ठित बैंकों में तकनीकी सलाहकार।उड़न तश्तरी ब्लाग के साथ मोहे बेटवा न कीजो(लघुकथा संग्रह),बिखरे मोती(काव्य संग्रह),और देख लूं तो चलूं(उपन्यासिका)
साथ ही 2007 का विश्व के सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का सम्मान आपके खाते में है।

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सपने दर सपने

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

हम भी दौड़ाते हैं रेल
कभी एक्स्प्रेस कभी सुपर फ़ास्ट
कभी लोकल
अपने कुनबे के सपनों को
नन्हीं सी ढोल में बन्द करके।

अम्मा बापू के सपने
हमारे सपने
सबके सपने
बन्द हैं हमारी छोटी सी ढोल में।
सबके सपनों का बोझ
भूख से कुलबुलाती अंतड़ियां
अलस्सुबह खींच ले जाती हैं हमें
भारतीय रेल की पटरियों पर।

किसी भी एक्स्प्रेस/पैसेंजर ट्रेन
के साथ दौड़ पड़ता है
हमारे सपनों का महल
पहियों की खड़र भड़र
पटरियों की खटर पटर
के साथ मिल जाती है
हमारी ढोल की थाप।

मेरी छोटी बहन
दिखाती है कलाबाजियां
सारे खतरों और भय को
करके दरकिनार
हमारे गले से निकलता बेसुरा
पर बेहद सुरीला गाना
मुन्नी बदनाम हुयी-----
यात्रियों की वाह वाह
फ़रमाइश सहानुभूति के बीच
फ़ैला हुआ हमारा हाथ
हाथों पर गिरते
रूपये एक दो के सिक्के
किसी टीनेजर के कैमरे की
चमकती फ़्लैश
बना देते हैं अनूठा अद्भुत कोलाज
हमारे चारों ओर।

इस कोलाज में बन्द हैं
अम्मा बापू छोटी बहन
हम सभी के सपने
सपनों के साकार होने की उम्मीद में
हम भी दौड़ाते हैं रेल
लखनऊ से मुम्बई
मुम्बई से इटारसी
फ़िर मुम्बई से इटारसी
सुबह से शाम
शाम से रात
सबके सपनों को बन्द करके
अपनी नन्हीं सी ढोलक
की थाप में।
000
हेमन्त कुमार

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जागो लड़कियों

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बालिका दिवस पर दुनिया की सभी बालिकाओं को  समर्पित मेरी यह
कविता---तथा सभी पाठकों/पाठिकाओं को हार्दिक शुभकामनायें।

जागो लड़कियों

जागो लड़कियों जागो
बना दो अपने हस्ताक्षर
इतिहास के सीने पर।

हर गांव गली चौराहों पर
गूंजें बस
तुम्हारे ही गाये हुये गीत
बता दो इस पूरी दुनिया को
कि तुमने भी
सजा लिया है
वक्त की रफ़्तार को
अपनी सुकोमल लेकिन
धारदार हथेलियों पर।

हवाओं से कह दो
वो भी गुनगुनायें
तुम्हारे गीत और राग
हर दिशा में
झरनों की अठखेलियां भी
अब मिला लें ताल
तुम्हारी ही इजाद की हुई
अनोखी नृत्य मुद्राओं से।

बता दो आज पूरी दुनिया को
कि अब नहीं धड़कता है तुम्हारा सीना
खामोश आंगन की चहारदिवारियों में अकेला
अब तुम्हारी
हर धड़कन के साथ है
चिड़ियों का कलरव
झरनों का संगीत
हवाओं की सरसराहट
फ़ूलों की खुशबू
पर्वतों की ऊंचाइयां
और सागर की उत्ताल तरंगों की
गम्भीर गर्जना।

जागो लड़कियों जागो
बना दो हस्ताक्षर
इतिहास के सीने पर।
000
हेमन्त कुमार

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आने वाली किताब---

शनिवार, 13 अगस्त 2011


बेंगाली गर्ल्स डोण्ट----

लेखिकाएल0ए0शेरमन
प्रकाशक-अमेजन बुक्स
                       www.amazon.com
     किसी ऐसी लेखिका,जिसकी आंखें ही बमों के धमाकों,सैनिकों की क्रूरता और अत्याचार तथा निहत्थे लोगों के चीत्कार के बीच खुली होंके अनुभवों को उसी के शब्दों में पढ़ना अपने आप में एक अलग किस्म का अनुभव होगा। अलग इसलिये क्योंकि लेखिका शिशु होने के नाते इन अनुभवों से खुद भले ही नहीं गुजरी है।लेकिन उसने इन अनुभवों को अपने माता पिता,सगे सम्बन्धियों
  परिजनों से सुना और गहराई से उन परिस्थितियों  को महसूस किया है।
  मैं आज आपको एक ऐसी ही आत्मकथात्मक पुस्तक के बारे में बता रहा हूं।बेंगाली गर्ल्स डोण्ट शीर्षक से यह किताब टाम्पा,फ़्लोरिडा की रहने वाली लेखिका,माडल और अभिनेत्री एल0ए0शेरमन ने लिखी है।
          लकी शेरमन की यह आत्मकथा अमेजन बुक्स ने ई बुक के रूप में प्रकाशित की है। और जल्द ही इसका प्रिण्ट वर्जन भी आने वाला है। यद्यपि मैंने अभी इसका कुछ अंश ही पढ़ा है।लेकिन इसकी कहानी कुछ ऐसी है जो निश्चित रूप से हर वर्ग के पाठक को पूरी पुस्तक पढ़ने के लिये आकर्षित करेगी।
        कहानी की शुरुआत 1971 में पाकिस्तान के विभाजन और बांग्ला देश के निर्माण के साथ होती है। उस समय पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा बांगला देश में जो अत्याचार किये गये, निहत्थों का खून बहाने के साथ ही महिलाओं के साथ जिस क्रूरता के साथ बलात्कार और फ़िर हत्या जैसे जघन्य काण्ड किये गये,बच्चों तक को जिस पाशविकता के साथ मारा गया उन सब का यथावत वर्णन आपको इस पुस्तक में मिलेगा।
          इस आत्मकाथात्मक पुस्तक में आपको एक ऐसी लड़की की कहानी पढ़ने को मिलेगी जिसका पूरा परिवार पाकिस्तानी सैनिकों की पाशविकता का शिकार होकर अपनी जन्मभूमि यानि बांग्लादेश छोड़ने को मजबूर हो गया। शेरमन का पूरा परिवार ब्रिटेन चला गया। वहां उस परिवार का जन्मभूमि छोड़ने का दर्द,स्थापित होने का संघर्ष सब कुछ लिखा गया है इस आत्मकथा में।
       15 साल की उम्र में पिता द्वारा जबर्दस्ती बंगलादेश ले जाकर अपनी(पिता की)उम्र के एक व्यक्ति से शादी और फ़िर वहां की घुटन, उससे मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ना,अमेरिका जाकर वहां लेखिका द्वारा खुद अपनी पहचान बनाने और नये जीवन की शुरुआत करने का संघर्ष ये सभी घटनायें पुस्तक को रोचक बनाती हैं।शेरमन की इस पुस्तक में आपको बंगाली एवम मुस्लिम संस्कृति दोनों की झलक मिलेगी।
          साथ ही लेखिका द्वारा जीवन के हर पल में खुशी की खोज के साथ ही अपने परिवार के साथ सन्तुलन बनाने का उल्लेख उनके संघर्षशील जीवन का परिचायक है। जीवन के प्रति यह जिजीविषा निश्चित ही पाठकों को कहीं न कहीं प्रभावित करेगी।
           यद्यपि यह किताब अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी है फ़िर भी मुझे नहीं लगता कि थोड़ा भी अंग्रेजी की समझ रखने वाले पाठकों को इसे पढ़ने में दिक्कत आयेगी। क्योंकि परिस्थितियों के अनुकूल शब्दों का चयन और भाषा का प्रवाह शेरमन की लेखन शैली की विशेषता है।
                मुझे लगता है कि जीवन संघर्ष,पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों तथा बंगला देश के मुक्ति आन्दोलन को जानने ,समझने और पढ़ने वाले पाठकों को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिये।
                                     ----
हेमन्त कुमार





लेखिकाएल0ए0शेरमन
लेखिका होने के साथ ही एक कुशल माडल और अभिनेत्री हैं। बेंगाली गर्ल्स डोण्टइनकी दूसरी पुस्तक है।



  

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रिमझिम पड़ी फ़ुहार

बुधवार, 3 अगस्त 2011


 रिमझिम पड़ी फ़ुहार
भीग उठा बादल के नीचे
पूरा घर संसार।

डूबा आंगन छप्पक छैया
बच्चे ढूंढ़ें छोटी नैया
मेढक कूदें ताल तलैया
इंद्र्धनुष में पंख पसारे
दिखते रंग हजार ।
रिमझिम पड़ी फ़ुहार…।

हल की फ़ाल में साम धराने
धरती का सोंधापन पाने
खाद बीज का जुगत लगाने
बैलों की घंटी सजवाने
निकले सब बाजार ।
रिमझिम पड़ी फ़ुहार-----।

बंसवारी में बोले झींगुर
हंसी दामिनी कड़क कड़क कर
गोरी सहमी घूंघट के भीतर
सपने बादल के पंखों पर
लेके आये बहार ।

रिमझिम पड़ी फ़ुहार
भीग उठा बादल के नीचे
पूरा घर संसार ।
00000
हेमन्त कुमार

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कटघरे के भीतर

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

खून से रंगी सडकों पर
अपने कदमों के निशान बनाते हुए
निकल पड़े हैं
हजारों लाखों बच्चे
पूरी दुनिया के घरों से.

इनके हाथों में हैं मशालें
चेहरे हैं आंसुओं से तर बतर
मन में समाया है एक खौफ
कानों में गूँज रही है धमाकों की आवाजें
और आँखों में चस्पा हैं तमाम सवाल
जिनका जवाब देना है
हमें/आपको/हम सब को.

इन बच्चों की लाल पड़ गई सूनी ऑंखें
जानना चाहती हैं
अपने पैदा होने का कसूर
की क्यों वे सभी बना दिए गए अनाथ
चंद मिनटों में
कुछ उन्मादियों द्वारा की गयी हैवानियत से
की क्या होगा उनका भविष्य
की कैसे मिटेगा उनके चेहरों पर
छाया हुआ खौफ
की कैसे वे उबर सकेंगे पूरे जीवन भर
रात में दिखने वाले भयावह सपनों के प्रहार से
की कौन बुलाएगा अब उन्हें बेटा कह कर
की किसके आँचल में छुप सकेंगे वे
उनींदी आँखों से भयावह काली आकृतियाँ देख कर
की कैसे वे भी बिता सकेंगे एक सामान्य बच्चे का जीवन.

ये सभी सवाल पूछ रहे हैं
ये सारे बच्चे
हम सभी से
सोचिये जरा सोचिये
कुछ थोड़ा बहुत तो बोलिए
क्या जवाब है आपके हमारे पास
इनके सवालों का?

हम सब खड़े होकर कटघरों में
गीता पर हाथ रख कर
सच बोलने की शपथ तो खा सकते हैं
परन्तु क्या दे सकते हैं
कोई आश्वासन..कोई सबूत..कोई प्रमाण
इन बच्चों को
इनके बचपन को सुरक्षित रखने का.

आप भी जरा विचारिये
डालिए अपने दिमाग पर कुछ जोर
की क्या जवाब देना है इन बच्चों को
कब तक चलता रहेगा
दहशतगर्दी का ये खेल
कब तक बारूद के धमाकों
और संगीनों के साये में
खौफनाक मंजर की तस्वीरों से
आतंकित होते रहेंगे ये बच्चे?

00000000

हेमंत कुमार

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. ‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक संस्कृति लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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