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पुस्तक समीक्षा : बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक

सोमवार, 24 जनवरी 2022

पुस्तक समीक्षा

 



           बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक  

     

        

                    पुस्तक:दिविक रमेश चुनिंदा नाटक


                            लेखक:दिविक रमेश

 




                     प्रकाशक:नेशनल बुक ट्रस्ट,इन्डिया


                      नेहरू भवन,5 इंस्टीट्युशनल एरिया,फेज-2


                   वसंत कुंज,नई दिल्ली-110070

 

      

                  वर्तमान हिंदी बाल साहित्य में सबसे अधिक कमी  किसी विधा में है तो वह है बाल नाटकों की।बाल कहानियों,कविताओं,उपन्यासों और सूचनात्मक साहित्य की तुलना में अच्छे बाल नाटक बहुत कम लिखे भी जा रहे और प्रकाशित भी कम हो रहे।इसीलिए अक्सर बाल नाटकों के मंचन के समय या फिर बाल रंगमंच की कार्यशालाओं में यह बात कही भी जाती है कि मंचन के लिए अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स की बहुत कमी है।

         


इसके पीछे कारण मुख्य रूप से कुछ ही हैं।पहला तो यह की बाल नाटक लिखने वाले लेखक  कम हैं,दूसरे जो इस दिशा में प्रयास कर भी रहे हैं वो बाल नाटक सिर्फ नाटक लिखने के लिए लिख देते हैं।उन नाटकों को बच्चे मंच पर प्रस्तुत कर सकेंगे या नहीं,मंचन में नाट्य निर्देशक या बच्चों को उस नाटक की प्रस्तुति के समय क्या दिक्कतें आयेंगी इस बात से उन्हें कोई मतलब नहीं।बस उन्होंने बाल नाटक लिखा उसे पैसे देकर छपवा दिया, उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गयी बस उनका काम समाप्त।उस नाटक को बच्चे रूचि से पढ़ेंगे या नहीं,उसका मंचन हो सकेगा या नहीं इन बातों से उन्हें कोई मतलब नहीं।

     


इस नजरिये से कुछ ही दिनों पहले नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित दिविक रमेश जी के बाल नाटकों क संकलन “दिविक रमेश चुनिंदा बाल नाटक”—बाल नाटकों और बाल रंगमंच की दिशा में एक नई आशा जगाते हैं।



दिविक जी के इस बाल नाटक संग्रह में कुल पांच बाल नाटक हैं–“मुसीबत की हार”,“मैं भी परी हूँ”,”बल्लू हाथी का बालघर”,“चतुराई का चमत्कार”,और “सोचूराम”।



संकलन का पहला नाटक“मुसीबत की हार”एक छोटी बच्ची की बहादुरी की कहानी है।बच्ची को उसकी मां बहादुरी की कहानियां सुनाती है।ऐसी ही एक कहानी चींटी और चिड़िया की सुनाई।बच्ची की माँ  गाँव की औरतों के साथ दूर जंगल में काम करने जाती है।एक दिन बच्ची भी ज़िद करके अपनी मां के साथ जंगल गयी और घूमते घूमते जंगल में खो गयी। पहले तो वह घने जंगल में घबरा गयी।फिर अचानक उसे माँ द्वारा सुनायी गयी बहादुर चिड़िया और साहसी चींटे की कहानी याद आ गयी।बच्ची उनकी बहदुरी को याद करती हुयी फूल दादा,नदी और संगीत दादी  की सहायता से अपने घर वापस लौट आई।छोटे छोटे दृश्यों और संवादों वाला यह नाटक बच्चों के साथ ही बड़ों को भी अच्छा लगेगा।नाटक को रोचक बनाने और बच्चों को आनंदित करने के लिए लेखक ने इसके संवादों में सुन्दर गीतों का भी प्रयोग किया है।घबराई हुयी बच्ची अपने मन की बात को फूल दादा से कुछ इस तरह कहती है---



मां ने समझाया था

पर कहाँ मानी थी

ज़िद मैंने ठानी थी

आकर यहाँ भी

बात नहीं मानी थी

दूर दूर निकल गयी

की मनमानी थी

रह गयी अकेली हूँ

बता दो फूल दादा

मेरे घर का पता।



संकलन का दूसरा नाटक “मैं भी परी हूँ” बच्चों के मन से रंग भेद,सुन्दरता-कुरूपता जैसे भावों को ख़तम करने का एक अच्छा प्रयास है।पूरा कथानक परी लोक की परियों को लेकर बुना गया है।परी लोक की कथाएं वैसे भी बच्चों की पहली पसंद होती हैं।इसलिए इस नाटक के मंचन में बच्चों को काफी आनंद आयेगा।नाटक का कथानक कुछ यूं है।परी लोक में सभी परियां,उनके परिवार के लोग,नन्हीं परियां सभी सुन्दर हैं।उन्हीं में एक परिवार में एक कुछ सांवली बच्ची पैदा हुयी।उसके माता पिता उसके सांवले रंग को लेकर बहुत चिंतित रहते थे।क्योंकि बच्ची के बड़े होने के साथ ही समस्याएँ भी बढ़ रही थीं।कोई भी परिवार उस सांवली परी के साथ अपने बच्चों को खेलने नहीं देता।मां बाप प्यार से उसे श्यामा कहने लगे।श्यामा के पिता उसे पढ़ाने के लिए चुपके से भारत देश से एक शिक्षक को ले आते हैं।शिक्षक श्यामा को ख़ूब पढ़ा लिखा कर शिक्षित कर देता है।श्यामा के पढी लिखी होने के कारण ही धीरे धीरे दूसरी नन्हीं परियां उससे काफी घुल मिल गयीं।एक दिन सभी परियां उड़ कर भारत देश पहुँच जाती हैं।वहां श्यामा ने दो बार उन नन्हीं परियों की जान बचायी।इससे सभी उसे बहुत सम्मान देने और दीदी कहने लगीं।सबके मां बाप ने भी अपनी बेटियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी श्यामा को सौंप दिया।परी लोक के सभी लोग उसे ज्ञान परी कहने लगे।इस नाटक के माध्यम से बच्चों को रंग भेद हटाने के साथ ही शिक्षा लेने की सीख भी दी गयी है।

   


संकलन का तीसरा नाटक “बल्लू हाथी का बालघर” संकलन का सबसे बेहतरीन नाटक है।नाटक एक जंगल के जीवों की पृष्ठ भूमि पर बुना गया है जहां का राजा शेर खुद को महाराज कहलाना पसंद नहीं करता बल्कि जीवों से कहता भी है कि वे उसे महोदय,महामहिम या फिर जंगलपति कहा करें।नाटक का प्रमुख पात्र एक बूढा हाथी बल्लू है।अन्य पात्रों में शेर,खरगोश,भालू,बन्दर,लोमड़ी,चीता और कुछ अन्य जानवरों के बच्चे हैं।

   


नाटक की कहानी मात्र इतनी है कि एक जंगल के जानवर इस बात को लेकर चिंतित हैं कि जब वो सब दिन में अपने कम पर चले जाते हैं तो उनके बच्चे अकेले रह जाते हैं।ऐसे में कहीं किसी दिन शिकारी आकर उनके भोले बच्चों को पकड़ न ले जाएं।इसके लिए उनकी एक सभा चल रही थी।सभा में खरगोश उन्हें बच्चों को एक सुरक्षित जगह रखने का सुझाव देता है।पर समस्या यह थी कि उनकी देख भाल कौन करेगा?उनकी सभा में कहीं से भटक कर आया हुआ एक बूढा हाथी भी था।हाथी से उसकी कहानी सुनने के बाद बल्लू हाथी को बच्चों की देखभाल की जिम्म्मेदारी सौंप दी गयी।और बच्चों के रहने की जगह को “बल्लू हाथी का बालघर” नाम दिया गया।बल्लू हाथी दिन भर बच्चों को कहानियां सुनाता,उन्हें खेल खिलाता,खाना देता और उन्हें गीत सुनाता।इस नाटक में लेखक ने जगह-जगह जीवों और जंगल के प्रति मनुष्यों की क्रूरता की भी बात उठायी है।तो दूसरी ओर बच्चों के कोमल मन और स्वभाव को भी बखूबी दर्शाया है बच्चे चाहे मनुष्य के हों या फिर अन्य जीवों के सबका मन एक ही तरह कोमलता से भरा होता है।यह बात नाटक में स्पष्ट हो जाती है जब बल्लू हाथी जानवरों की सभा में उनसे बताता है कि किस तरह उसके महावत का बेटा उसके पास आकर उसकी सूंड सहलाता और उसे प्यार से अपने खाने में से भी कुछ खिलाता था ।

      


संकलन का चौथे और पांचवें नाटक “चतुराई का चमत्कार”और “सोचूराम” अपेक्षाकृत छोटे बाल नाटक हैं और इनमें भी बच्चों के मनोरंजन और आनंद का पूरा ध्यान रखने के साथ उन्हें कुछ सीख भी दी गयी हैं।“चतुराई का चमत्कार”एक सीधे साधे गरीब किसान भोलू और दो धूर्त ठगों की कहानी है जो साधू का वेश धारण करके उसके पेड़ के सारे पके आम रोज तोड़ ले जाते हैं।बेचारा  भोलू और उसकी पत्नी इमरती बहुत परेशान होते हैं।ऐसे में एक व्यापारी उनसे एक रात के लिए घर में आश्रय मांगता है।और अगले दिन सुबह भोलू के साथ जाकर उन ठगों की पोल खोल कर उनकी पिटाई भी करवाता है।जबकि “सोचूराम”एक बहुत ही छोटा और एक बच्चे सुब्बू के मनोभावों को चित्रित करने वाला मजेदार नाटक है।सुब्बू हर समय कुछ न कुछ सोचता ही रहता था।उसकी इस सोच को ही एक लड़की पात्र “सोच”के रूप में बहुत ही कुशलता  के साथ प्रस्तुत किया  गया है।नाटक के अंत में सोच बताती है कि वह कोई परी या लड़की नहीं बल्कि सुब्बू के भीतर मन में हर वक्त चलने वाली उठा पटक की ही प्रतिमूर्ति है जो उसकी दोस्त सोच बन कर आई है ।



दिविक रमेश जी के इन पाँचों ही बाल नाटकों में कुछ ऐसे बिंदु या कहें तत्व हैं जो कि बाल नाटकों के लिए बहुत ही आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं।पहली बात है बाल मनोभावों की पकड़ और बच्चन को आनंदित करने वाला तत्व।पाँचों ही नाटकों की बुनावट ऎसी है कि हर दृश्य के बाद बच्चों को मजा आएगा।दूसरा महत्वपूर्ण और जरूरी तत्व नाटकों के छोटे छोटे और आसानी से मंच पर प्रस्तुत किये जाने वाले दृश्य।दृश्यों की संरचना ऎसी है कि उन्हें नाट्य निर्देशक आसानी से मंच पर प्रस्तुत कर सकेगा और दृश्यों को बदलने में भी ज्यादा भागदौड़ मेहनत बच्चों को नहीं करनी पड़ेगी।तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु है संवादों का छोटा छोटा और चुटीला होना।यह किसी भी बाल नाटक की प्रस्तुति का एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है।संवादों के छोटे रहने से बच्चों को उन्हें याद करने में आसानी रहती है और प्रस्तुति के समय संवाद भूलने की असुविधा से बच्चे बचे रहते।चौथी और सबसे महत्वपूर्ण खूबी इन नाटकों में गीति तत्व का मौजूद होना है जो कि बाल नाटकों का एक महत्वपूर्ण अंग है।चूंकि दिविक जी मूलतः एक कवि हैं इसलिए उनके नाटकों में भी जगह जगह संवादों में गीतात्मकता मौजूद है।बाल नाटकों में यदि गीत संगीत नहीं रहेगा तो वो बच्चों को न ही आनंदित करेंगे न ही बांधे रहने में सक्षम होंगे।इन खूबियों के साथ ही दिविक जी ने अपने इन नाटकों में बच्चों (खासकर बेटियों को)को शिक्षित करने और बच्चों तक किसी न किसी माध्यम से अच्छी किताबें पहुंचाने की(चतुराई का चमत्कार नाटक के अंत में) भी बात उठायी है।

   


इस बाल नाटक संकलन को अपने खुबसूरत चित्रों से प्रसिद्द कार्टूनिस्ट इरशाद कप्तान ने सजाया है।इरशाद कप्तान के चित्र निश्चित ही बच्चों को आकर्षित करेंगे ही साथ ही इनके मंचन के समय सेट लगाने या दृश्यों को प्रस्तुत करने में नाट्य निर्देशक के लिए भी सहायक होंगे।  

   


कुल मिला कर हम कह सकते हैं कि दिविक जी के नाटकों के इस संकलन का लाभ बच्चों के साथ ही बाल रंगमंच से जुड़े उन सभी रंगकर्मियों को भी मिलेगा जिन्हें मंचन के लिए अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स की तलाश रहती है।

                                  


००००००



समीक्षक: हेमन्त कुमार

                                                         

 

 


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बच्चों को जरूर पढ़ाएं ये किताबें---।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

1— मोइन और राक्षस
लेखिका:अनुष्का रविशंकर
अंग्रेजी से अनुवाद:पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा
चित्रांकन:अनीता बालचन्द्रन
मूल्य-रू085/
2—अण्डमान का लड़का
लेखिका:जाई व्हिटेकर
अंग्रेजी से अनुवाद: पूर्वा याज्ञिक कुशवाहार
मूल्य- रू090/
दोनों पुस्तकों के प्रकाशक:
एकलव्य
ई-10,शंकर नगर बी डी ए कालोनी
शिवाजी नगर,भोपाल-462016

        बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ाने में निश्चित रूप से परीकथाओं और काल्पनिक कथाओं का बहुत बड़ा हाथ होता है।काल्पनिक कथाएं और परियों की कहानियां बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर ऐसे लोक में पहुंचा देती हैं जहां पहुंच कर वह उसे इतनी अधिक खुशी मिलती है जो उसे इस वास्तविक दुनिया में जल्दी नहीं मिल पाती।वह ऐसी काल्पनिक कहानियों के पात्रों के साथ इस कदर घुल मिल जाता है जैसे वह वास्तविक जीवन के अंग हों।बच्चा उनके साथ खेलता है,घूमता है,सैर करता है,सपने देखता है और अपने अंदर एक ऐसे आनंद की अनुभूति करता है जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा।
                 बच्चों को ऐसी ही काल्पनिक दुनिया में पहुंचा देने वाली किताब है “मोइन और राक्षस”।“मोइन और राक्षस” एक छोटा सा मजेदार और रोचक उपन्यास या लम्बी कथा है।इसकी लेखिका अनुष्का रविशंकर हैं।हिन्दी में  अनुवाद पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा ने किया है और खूबसूरत चित्रों से सजाया है अनीता बालचन्द्रन ने।कहानी ऐसी है जिसकी हम आप या बच्चे कल्पना भी नहीं कर सकते।मोइन नाम के एक लड़के के साथ एक राक्षस की दोस्ती की कहानी।
    कहानी वैसे तो बहुत साधारण सी लगती है।लेकिन इसमें घटित घटनाएं ऐसी हैं जो बच्चों,बड़ों सभी को हंसने और किताब को जल्दी से जल्दी खतम करने पर मजबूर कर देंगी।मोइन नाम का 10-12 साल का एक लड़का।रात में अपने कमरे में अकेला सो रहा था।रात के बजे उसे अपने बिस्तर के नीचे अजीब सी आवाज सुनायी देती है।मोइन के पूछने पर आवाज खुद को राक्षस बताती है।और मोइन से एक कागज पर अपनी तस्वीर बनवाकर उस कमरे में वह रक्षस साकार हो जाता है।और यहीं से मजेदार घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है।कागज से निकला वह पतला दुबला अजीब सिर वाला राक्षस(क्योंकि मोइन ने जैसा कागज पर बनाया वह वैसे ही आकाए में बन गया)मोइन के कमरे में ही रहने लगा।
   अब राक्षस को घर में छिपाने,उसकी भूख मिटाने की जिम्मेदारी मोइन की।मोइन की मूसीबत ये कि वह उसे रखे कहां?कभी आल्मारी में,कभी पलंग के नीचे कभी स्कूल बैग में।आखिर उसे अपनी अम्मी और अब्बू से बचाना भी तो था।राक्षस मोइन के साथ स्कूल भी जाता है,उसके स्कूल के फ़ंक्शन में गाता भी है,उस राक्षस के चक्कर में उसे अम्मी अब्बू के साथ डाक्टर के पास भी जाना पड़ता है,उसके दोस्त भी राक्षस के दोस्त हो जाते हैं,मोइन के चाचा हरि मामा के कुत्ते पर राक्षस की सवारी,उसके स्कूल के अध्यापकों का राक्शस को लेकर कन्फ़्युजन---ऐसी ढेरों घटनाएं हैं जो कि किसी भी पाठक को पूरी किताब एक बार में पढ़ने को मजबूर कर देती हैं।और हर घटना के दौरान राक्षस की मजेदार बातें,उसकी हरकतें ऐसी की पढ़कर हंसते हंसते पेट में दर्द होने लगेगा।जितना ही मोइन और उसके साथी उस राक्षस को दुनिया के सामने लाने से रोकना चाहते हैं वह उतना ही सामने आने की कोशिश करता है।और उसकी उल्टी सीधी हरकतों से ऊबने के बावजूद अन्ततःमोइन उसे अपने घर पर ही अपने कमरे में रख लेता है।
       इस किताब की भाषा इतनी रोचक और मजेदार है कि बच्चे निश्चित ही इसे पढ़ते समय एक अच्छी किताब पढ़ने का पूरा अनन्द उठाएंगे।और इसके बीच बीच में अनीता बालचन्द्रन द्वारा बनाए गये चित्र इस काल्पनिक कथा को बच्चों के लिये सजीव बनाने का काम करते हैं।
     दूसरी किताब “अण्डमान का लड़का”---इसकी लेखिका हैं—जाई व्हिटेकर।यह एक छोटे बच्चे की ऐसी रोमांचक कहानी है जिसे हर अभिभावक,शिक्षक और बच्चे को जरूर पढ़ना चाहिये।
  इसकी भी कहानी है तो बहुत साधारण सामान्य सी—अपने अभिभावकों(चाचा-चाची) द्वारा प्रताड़ित बच्चे के घर से पलायन की।पर उसकी घर से पलायन की यह यात्रा इतनी रोचक और रोमांचक है जो पाठक को अन्त तक बांधे रहती है।
    “अण्डमान का लड़का” कहानी है एक दस सा;अ के लड़के आरिफ़ की—जो अपने बहुत धनाढ्य माता पिता के एक दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के कारण अपने चाचा-चाची के साथ मुम्बई में रहता है।पर चाचा चाची का उसको पालने के पीछे सिर्फ़ एक मकसद था कि कब वह बालिग हो और वो लोग उसकी पूरी सम्पत्ति पर कब्जा करें। चाचा-चाची के बुरे व्यवहार से दुखी होकर ही एक दिन आरिफ़ उनका घर छोड़ कर भागने का निर्णय करता है। और एक अंधेरी रात में एकदम खाली हाथ घर से भाग जाता है।वह भाग कर चेन्नई जाने वाली ट्रेन में सवार हो जाता है और खुद को छिपाने के लिये अपना वेश बदल कर किसी तरह चेन्नई पहुंचता है। पुलिस और दुनिया से बचने के लिये अन्ततः वह एक तस्कर के साथ उसकी नाव पर सवार होकर अण्डमान के घने जंगलों में रहने वाले जारवा जाति के लोगों के बीच पहुंच जाता है।
      आरिफ़ की घर से पलायन की यह कहानी हमें एक बेहद रोमांचक यात्रा का अनुभव तो कराती ही है साथ ही प्रकृति के बहुत खूबसूरत दृश्यों से रूबरू भी कराती हैअमें उस जारवा जाति के रहन सहन और संस्कृति से परिचित कराती है जिनके पास आज भी सभ्य मानव जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।इतना ही नहीं हमें यह संदेश भी देती है कि हम किसी अनाथ हो चुके बच्चे के साथ कैसा बर्ताव करेंअमें सोचने को विवश कर देती है कि आखिर आरिफ़ जैसा होनहार और धनाढ्य बच्चे ने क्यों आमजन से दूर प्रकृति की गोद में रहने वाली जारवा प्रजाति के साथ रहने का निर्णय लिया।
       किताब की भाषा इतनी सरल और शैली इतनी रोचक है कि निश्चित ही कोई बच्चा इसे बिना पूरा पढ़े दूसरे कोई काम नहीं करेगा।मैं तो हर अभिभावक से,और प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से अनुरोध करूंगा कि अपने बच्चों,छात्रों को दोनों किताबें—“मोइन और राक्षस” तथा “अण्डमान का लड़का” जरूर और जरूर पढ़ने को दें।
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डा0हेमन्त कुमार

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आभासी दुनिया ने खत्म की रचनाकारों और पाठकों के बीच की दूरियां---।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

    
साहित्य हमेशा तमाम तरह के खतरों और विरोधाभासों के बीच लिखा जाता रहा है,और लिखा जाता रहेगा। लेकिन साहित्य तो अन्ततः साहित्य ही कहा जायेगा,उसे अभिव्यक्त करने का माध्यम भले ही बदलता जाय।इधर काफ़ी समय से साहित्य जगत में इस बात से खलबली भी मची है और लोग चिन्तित भी हैं कि अन्तर्जाल का फ़ैलाव साहित्य को नुक्सान पहुंचायेगा। लोगों का चिन्तित होना स्वाभाविक है।लेकिन क्या किसी नये माध्यम के चैलेंज का साहित्य का यह पहला सामना है?इसके पहले भी तो जब टेलीविजन पर सीरियलों का आगमन हुआ था,नये चैनलों की भरमार हुयी थीक्या तब भी साहित्य के सामने यही प्रश्न नहीं उठे थे? तो क्या चैनलों के आने से साहित्य के लेखन या पठनीयता में कमी आ गयी थी?अगर आप पिछले दिनों को याद करें तोचन्द्रकान्ता धारावाहिक के प्रसारण के बाद चन्द्रकान्ता सन्तति उपन्यास तमाम ऐसे लोगों ने पढ़ा जिनसे कभी भी साहित्य का नाता नहीं रहा था।भीष्म साहनी का उपन्यास तमस,मनोहर श्याम जोशी का कुरु कुरु स्वाहा, तमस और कक्का जी कहिन धारावाहिकों के प्रसारण के बाद तमाम पाठकों ने उत्सुकतावश पढ़ा।तो टेलीविजन ने साहित्य के पाठक कम किये या बढ़ाये?ठीक यही बात मैं अन्तर्जाल या आभासी दुनिया के लिये भी कहूंगा।अन्तर्जाल के प्रसारऔर ब्लाग जैसे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम की बढ़ती संख्या के साथ ही एक बार फ़िर साहित्य से जुड़े लोगों को तमाम तरह के खतरे नजर आने लगे हैं।उनके मन में तरह तरह की शंकाएं जन्म लेने लगी हैं।जबकि मुझे नहीं लगता कि साहित्य को ब्लाग या अन्तर्जाल से किसी प्रकार का कोई खतरा हो सकता है। क्योंकि किसी भी नये माध्यम के नफ़े नुक्सान दोनों ही होते हैं।अब यह तो साहित्यकारों के समूह पर है कि वह इस विशाल,वृहद आभासी दुनिया से क्या लेता है क्या छोड़ता है।
साहित्य के ऊपर इस आभासी दुनिया का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही
तरह का प्रभाव पड़ रहा है।सकारात्मक इस तरह कि
v     इस आभासी दुनिया की वजह से दिग्गजों और मठाधीशों(साहित्य के अखाड़े के) की मठाधीशी अब खतम हो रही है।पहले जहां साहित्य कुछ गिने चुने नामों की धरोहर बन कर रह गया था वो अब सर्व सुलभ हो रहा है।आप देखिये कि जहां बहुत सारे नये लेखक,कविकिसी पत्र पत्रिका में छपने को तरस जाते थे(मठाधीशी के कारण)वो आज इसी आभासी दुनिया के कारण ही प्रकाशित भी हो रहे हैं,पढ़े भी जा रहे हैं और अच्छा लिख भी रहे हैं।
v     आभासी दुनिया में हर रचना का तुरन्त क्विक रिस्पान्स मिलता है।अच्छा हो या बुरा तुरन्त आपको पता लगता है,आप उसमें परिवर्तन परिमार्जन भी कर सकते हैं।जब कि प्रिण्ट में ऐसा नहीं है।आपको लिखने के कई-कई महीने बाद अपनी रचना पर प्रतिक्रियायें मिलती हैं।आप आज लिखते हैं, हफ़्ते भर बाद किसी पत्र-पत्रिका में भेजते हैं।वह स्वीकृत होकर महीनों बाद छपती है।तब कहीं जाकर उस पर आपको पाठकीय प्रतिक्रिया मिलती है।जबकि आप ब्लाग पर या किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर लिखते हैं तो वहां आपने रात में लिखा और और सुबह तक आपके पास प्रतिक्रियायें हाजिर।कुछ तारीफ़ कीकुछ सुझावों या वैचारिक मतभेद के साथ।
v     लेखक और प्रकाशक(प्रिण्ट माध्यम)दोनों अब आमने सामने हैं।आभासी दुनिया में जहां लेखक को पाठक उपलब्ध हैं वहीं आज आप देखिये कि प्रकाशक भी आसानी से अच्छे और नये लेखकों को अन्तर्जाल से लेकर छाप रहा है।ये हमारे साहित्य,साहित्यकारों,पाठकों सभी के लिये एक शुभ संकेत है।
जहां तक नकारात्मक प्रभाव की बात है---उसके खतरों से भी आप इन्कार नहीं कर सकते।
v     बहुत से रचनाकारों की रचनायें अच्छी और स्तरीय न रहने पर भी वाह-वाह, सुन्दर,प्रभावशाली जैसी टिप्पणियां रचनाकार को नष्ट करने का काम कर रही हैं।और इस बेवजह तारीफ़ का शिकार होकर कुछ रचनाकार अपने शुरुआती मेहनत और लगन के दौर में ही शायद खतम हो सकते हैं।
v     ऐसे भी रचनाकार यहां आपको मिलेंगे जो सिर्फ़ यही तारीफ़ सुनने या अपना मनोरंजन करने के लिये कुछ भी लिख रहे हैं,जिसका साहित्य,समाज,देश के लिये या पाठकों के लिये भी कोई उपयोग नहीं।ऐसे साहित्य की भरमार होने पर इस आभासी दुनिया में से अच्छे रचनाकारों को खोजना अपेक्षाकृत कठिन हो जायेगा।
इसके बावजूद मेरा मानना यही है कि अन्तर्जाल ने आज साहित्यकारों,पाठकों और
प्रकाशकों को आपस में इतना करीब ला दिया है कि अब प्रकाशित होना,पढ़े जाना कोई समस्या नहीं।और मुझे लगता है कि यदि इसे थोड़ा सा नियन्त्रण में रखा जाये तो यह आभासी दुनिया रचनाकारों,पाठकों,प्रकाशकों के बीच एक अच्छे और मजबूत सेतु का काम करेगी।
       जहां तक मंचों या समूहों की बात है इस समय फ़ेसबुक पर ही साहित्यकार सन्सद,रचनाकार,वर्ल्ड आफ़ चिल्ड्रेन्स लिट्रेचर आर्ट ऐण्ड कल्चर,दैट्स मी,गीत गज़ल और मुक्तक,हिन्दी साहित्य,ब्लागर्स रिफ़्लेक्शन,ब्लागर बाइ पैशन,समीक्षा ब्लाग,पुनर्नवा---जैसे सैकड़ों समूह ऐसे हैं जो सिर्फ़ साहित्य रचना के उद्देश्य से बनाये गये हैं।अब ये समूह कितना काम करेंगे यह तो भविष्य बतायेगा।लेकिन इतना तो तय है कि ये समूह भी आपसी विचार विमर्श,साहित्य चर्चा के अच्छे मंच साबित हो रहे हैं।मैं खुद इण्डियन चिल्ड्रेन्स लिट्रेचर समूह से जुड़ा हूं---और देख रहा हूं कि इस समूह में बाल साहित्य को लेकर सार्थक चर्चायें हो रही हैं।इसी ढंग से साहित्यकार संसद में भी लोग साहित्य पर अपने विचार देते हैं।पर बहुत से समूह ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ़ सेल्फ़ प्रमोशन के लिये ही बनाया गया है।अभी मैं एक नये समूह से जुड़ा---डायट,लखनऊ----।इस समूह में मुझे लग रहा है कि ज्यादातर सदस्य(छत्र-छात्रायें)काफ़ी सृजनशील और जिज्ञासु हैं जो कि एक अच्छी बात है समूह के सदस्यों,समाज, और प्राथमिक शिक्षा के साथ ही किसी समूह के लिये भी।फ़ेसबुक के अलावा गूगलप्लस या और भी वेबसाइट्स पर ऐसे ढेरों समूह हैं जहां सार्थक विचार विमर्श चल रहे हैं।
    आज आप देख सकते हैं कि पूरे साहित्य जगत में ब्लाग,फ़ेसबुक,ट्विटर,गूगल प्लस की चर्चा हो रही है। हर महीने अगर आप नेट पर या अखबारों में देखें तो किसी न किसी शहर में आपको ब्लागर्स मीट सम्पन्न होने,किसी ब्लागर के सम्मानित होने,ब्लाग माध्यम  पर आधारित किसी पुस्तक का विमोचन होने,ब्लाग्स पर किसी सेमिनार,संगोष्ठी की खबर जरूर पढ़ने को मिल जायेगी। मेरी जानकारी में कई विश्वविद्यालयों में भी इस नये माध्यम पर सेमिनार,संगोष्ठियों का आयोजन हुआ है। इसके अलावा भी विशुद्ध साहित्यिक संगोष्ठियों में भी अब इस माध्यम के बारे में थोड़ी बहुत चर्चायें तो हो ही रही हैं।
       मुझे खुद नेट से जुड़े हुये लगभग तीन साल हुये हैं।मैं ब्लाग से तब परिचित हुआ जब अमिताभ बच्चन और शाहरुख का वाक युद्ध ब्लाग पर आया था।मैंने मित्र लोगों से पूछ पूछ कर ब्लाग के बारे में जानकारी इकट्ठी की और इसकी मारक क्षमता को समझकर इससे जुड़ गया।आप आश्चर्य करेंगे जहां मेरे पाठक 2008 में सिर्फ़ भारत में थे वहीं आज की तारीख में दुनिया के हर देश में मेरे दो चार पाठक मौजूद हैं।यह सब इसी आभासी दुनिया का ही तो कमाल है।
            और मुझे लगता है कि जिस रफ़्तार से हमारे देश में(पूरे विश्व की बात नहीं करूंगा)में अन्तर्जाल पर ब्लाग्स,सोशल नेट्वर्किंग साइट्स,समूह,फ़ोरम बनते जा रहे हैं उससे यही प्रतीत होता है कि पूरे देश में एक तकनीकी क्रान्ति आ चुकी है जिससे जुड़ कर लोग एक दूसरे के काफ़ी करीब हो रहे हैं।एक दूसरे को सुन रहे हैं।समझ रहे हैं और सबसे बड़ी बात इस आभासी दुनिया ने दूरियों को समाप्त कर दिया है।और यह सही वक्त है देश को,समाज को,राष्ट्र को एक सही दिशा देने में इस आभासी दुनिया के सदुपयोग का।तभी हम सही मायनों में सूचना तकनीकी के सही लाभार्थी कहे जायेंगे।
                            00000

ड़ा0हेमन्त कुमार

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एक संवाद अपनी अम्मा से---।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

(आज दफ़्तर में बैठे बैठे आपकी बड़ी याद आयी अम्मा)

चाहता हूं
एक बार
बस एक बार मेरे हाथ
हो जाएं लम्बे
इतने लम्बे
जो पहुंच सकें दूर
नीले आसमान
और तारों के बीच से झांकते
आपके पैरों तक
अम्मा
और जैसे ही मैं स्पर्श करूं
आपके घुटनों को
सिर्फ़ एक बार आप
डांटें मुझे कि
बेवकूफ़ राम
चरणस्पर्श पंजों को छूकर
करते हैं
घुटनों को नहीं।

अम्मा सुनिए
अक्सर भटकता हुआ मन
पहुंच जाता है
यादों की रसोई में
और हूक सी उठती है
दिल में
एक बार
पत्थर वाले कोयले
की दहकती भट्ठी के पास बैठूं
धीरे से आकर
डालूं कुछ तिनके भट्ठी में
आप मुझे डराएं चिमटा दिखा कर
प्यार से कहें
का हो तोहार मन पढ़ै में
ना लागत बा?

ज्यादा कुछ नहीं
सिर्फ़ एक बार
भट्ठी की आंच में
सिंकी
आलू भरी गरम रोटियां
और टमाटर की चटनी
यही तो मांग रहा।

वक्त फ़िसलता जा रहा
मुट्ठी से निकलती बालू सा
यादें झिंझोड़ती हैं
हम सभी को।

कहीं घर के किसी कोने में
कील पर टंगी सूप
उस पर चिपके चावल के दाने
कहते हैं सबसे
यहीं कहीं हैं अम्मा
उन्हें नहीं पसन्द
सूप से बिना फ़टके
चावल यूं ही बीन देना।

अभी भी जब जाता हूं
घर तो
अनायास मंदिर के सामने
झुक जाता है मेरा सर
बावजूद इसके की आपने
नास्तिक होने का ठप्पा
मेरे ऊपर लगा दिया था।

पर वहां भी आपके हाथो का स्पर्श
सर पर महसूस तो करता हूं
लेकिन दिखती तो वहां भी नहीं
आप अम्मा।

वैसे
एक राज की बात बताऊं अम्मा
बाथरूम के दरवाजे पर बंधी मोटी रस्सी
मैंने हटाई नहीं अभी तक
पिता जी के बार बार टोकने के
बावजूद
आखिर उसी रस्सी को पकड़ कर
आप उठेंगी न कमोड से।

अम्मा
आप जो भी कहें
नालायक
चण्डलवा
बदमाश
नास्तिक----
सब मंजूर है मुझे
पर एक बार
सिर्फ़ एक बार
खाना चाहता हूं
आपके हाथों की
सोंधी रोटी
बेसन की कतरी
एक हल्का थप्पड़
और चन्द मीठी झड़कियां।
सुन रही हैं न अम्मा।
000

डा0हेमन्त कुमार

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उलझन

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

     
(यह चित्र मेरे मित्र वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार भाई प्रदीप सौरभ जी ने लगभग 35 वर्ष पूर्व बनाया कर मुझे दिया था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद के पुस्तकालय में मुश्किल से दो  ढाई मिनट में। संयोग देखिये आज अपनी इस नयी कहानी के साथ इसे पुब्लिश कर रहा हूं।)
      इससे पहले कि लोग मेरे बारे में आपको बताएं मैं अपने बारे में खुद ही आपको सब कु
छ बता देना बेहतर समझता हूं।यही शायद मेरे हित में भी अच्छा होगा और मेरे जैसे कुछ और युवाओं को भी शायद कुछ सबक मिल सकेगा।और सबसे बड़ी बात यह कि मेरा सबसे बड़ा प्रायश्चित भी होगा यह।
        मेरा नाम महेश है।मैं इस समय बी0ए0 पार्ट वन में पढ़ रहा हूं।मेरे घर में अम्मा बापू दीदी भैया सभी लोग हैं।भरा पूरा परिवार है मेरा।अम्मा घर के काम करती हैं।बापू खेती का काम करते हैं।मेरे घर में मेरा एक प्यारा स कुत्ता भी है मोती।मैं उसे बहुत प्यार करता हूं।और हां अगर मैं गौरव का जिकर न करूं तो मेरी कहानी अधूरी रह जाएगी।वही तो मेरा एक अच्छा और सच्चा दोस्त है।
         बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा ग्यारह में पढ़ता था।गांव से मैं और गौरव एक साथ ही शहर पढ़ने आए थे और अपने एक रिश्ते के चाचा के घर किराए पर कमरा लेकर रहते थे।हम दोनों कभी घर पर स्टोव में खाना बना लेते कभी पास के रामू दादा के होटल पर खा लेते।हम साथ साथ कालेज जाते थे।हमारा कालेज घर से थोड़ा दूर था इसी लिये हमारे घर वालों ने हमारे लिये नयी साइकिलें खरीद कर हमें दे दी थीं।
      उन दिनों हम अपनी छमाही परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।कोर्स पूरा हो चुका था। बस हम उसे दुहरा रहे थे।हालांकि हम दोनों की गिनती कालेज के पढ़ाकू छात्रों में थी फ़िर भी पढ़ाई और परीक्षा का दबाव तो था ही हम पर।गौरव तो हमेशा नार्मल रहता पर मैं अक्सर परीक्षा के दिनों में तनावग्रस्त हो जाता था।ऐसा नहीं कि मुझमें आत्मविश्वास की कमी रही हो फ़िर भी एक्जाम्स के समय एक अजीब किस्म का तनाव मेरे ऊपर हावी होने लगता था।
                मैं शनिवार का वह मनहूस दिन कभी नहीं भूल सकता---जिसने कुछ समय के लिये मेरे जीवन में अंधेरा भर दिया था।हम दोनों कमरे में बैठे पढ़ रहे थे।मैं उस दिन भी कुछ ज्यादा तनाव में था।मैं कभी किताबों के पन्ने पलटता कभी क्लास के नोट्स देखने लगता।मेरी मानसिक हालत को गौरव ने भांप लिया।इससे पहले कि मैं उससे कुछ कहता वो खुद ही बोल पड़ा,क्या बात है महेश तू कुछ परेशान दिख रहा कोई दिक्कत है क्या?
   “नहीं यार गौरव कुछ नहीं बस ऐसे ही—आज पढ़ने में मन नहीं लग रहा।मैं थोड़ा धीमे से बोला।
चल उठ चौराहे तक थोड़ा टहल कर चाय पीकर आते हैं।और हां शाम के लिये सब्जियां अण्डे भी तो लेना है।
   मैं गौरव के साथ चौराहे पर चाय पीने के लिये चल पड़ा।चाय वाले के यहां गौरव ने चाय के लिये बोल दिया और मैं गौरव के साथ चुपचाप सबसे किनारे वाली बेंच पर बैठ गया।हालांकि चाय की दूकान पर बहुत चहल पहल थी।एफ़ एम रेनबो पर बज रहे गीत चार बोतल वोदका काम मेरा रोज का--- के साथ ही लोगों का शोर,राजनीतिकि उठा पटक पर चर्चा।इन सबके बावजूद वहां भी मुझे एक अजीब सी घुटन सी महसूस हो रही थी।गौरव लगातार मुझे शान्त देख कर बोल ही पड़ा, भाई इतना शानदार गाना बज रहा फ़िर भी तू मौनी बाबा बना है आखिर माजरा क्या है?
मजबूरी में मुझे भी बोलना ही पड़ा,यार गौरव किया क्या जाय कुछ समझ में नहीं आ रहा?
पर हुआ क्या?गौरव ने पूछा।
अरे इम्तहान के दस दिन रह गये हैं।पूरी तैयारी कर ली।सब कुछ रिवाइज भी कर लिया है।मैं बहुत धीमे से बोला।
फ़िर—फ़िर क्या चिन्ता तुझे—ऐश कर ऐश।मुझे देख अभी तक एक भी विषय का रिवीजन नहीं कर पाया।फ़ीर भी मस्त हूं।गौरव उसी मस्ती में बोला।
पता नहीं क्यों दिल बहुत घबरा रहा।लगता है कहीं ऐसा न हो इम्तहान देते समय सब भूल जाऊं—कुछ गलत सलत न लिख दूं।कभी लगता है कि सारे पढ़े हुये विषय आपस में गड्ड मड्ड होते जा रहे हैं।मैं लगभग रुआंसा हो चला था।मेरी ये हालत देख कर गौरव ठहाके लगा कर हंसने लगा बिना इस बात की परवाह किये की बाकी चाय पीने वाले ग्राहक क्या सोचेंगे।
अबे महेश लगता है तुझे एक्जाम फ़ीवर हो गया है।चाय पी कर चल घर पर कुछ देर सो लेना।उठेगा तो फ़्रेश हो जाएगा।गौरव उसी रौ में बोला।
   हमारी बातों के बीच में ही एक और युवक आकर हमारी बेंच पर बैठ गया था और हमारी पूरी बातें बहुत ध्यान से सुन रहा था।गौरव की सोने वाली बात पर वह अचानक ही बोल पड़ा, खाली सोने से काम नहीं चलेगा बेटा।तुम्हारे दोस्त को तनावमुक्त होना भी जरूरी है।
मुझे उस आदमी का इस तरह बीच में दखल देना कुछ अच्छा तो नहीं लगा फ़िर भी मैंने उसकी उमर का खयाल करते हुए उससे पूछ ही लिया,आपकी तारीफ़?
थोड़ा मैले कपड़े पहने होने के बावजूद उस युवक की आवाज में गजब का आकर्षण था उसी के प्रभाव से गौरव का भी ध्यान उधर गया।उसने भी कहा,पहले भी कहीं देखा है आपको?
हमारी बात्तें सुन कर युवक मुस्कराकर बोला,जरूर देखा होगा।मैं भी यहीं पास में ही रहता हूं।वैसे तो मेरा नाम विश्वेश्वर प्रसाद है पर सब मुझे बिशु बिशु कहते हैं।तुम भी चाहो तो मुझे इसी नाम से बुला सकते हो।मैं भी अंग्रेजी से एम0ए0 करके कम्पटीशन दे रहा हूं।मैंने अभी यहां बैठे बैठे तुम्हारी बातें सुनी तो मुझे लगा मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकता हूं।देखो महेश का एक ही इलाज है कि वो परीक्षा के समय तनाव में न रहे।
    कैसे त्तनाव में न रहूं बिशु भैया।दिन रात पढ़ना,समझना,याद रखना।मुझे तो लग रहा है मैं आगे कैसे पढ़ सकूंगा?”मैंने अपनी परेशानी बिशु को बताई।
सब ठीक हो जाएगा।इसका भी इलाज है मेरे पास।बस एक पुड़िया खानी होगी।सारा टेंशन छू मंतर।बिशु अजीब रहस्यमय ढंग से मुस्कराकर बोला।
     “तो क्या आप डाक्टरी भी जानते हैं बिशु भैया?गौरव उत्सुकता से बोल पड़ा।
जानता तो बहुत कुछ हूं बच्चों पर मुझे पूछता कौन है।मैं भी पहले तुम्हारी तरह ही पढ़ाई की टेंशन में रहता था।पर अब सब ठीक है।बिशु उसी रहस्यमय अन्दाज मे बोला।
तो बिशु भैया हमे भी वो दवा खिलाओ न।मेरी उत्सुकता बिशु से छिपी न रह सकी।
सब्र करो,सब्र करो महेश।पहले मेरे घर तक तो चलो।फ़िर पुड़िया तुम्हारे मुंह में और सारा टेंशन,तनाव गायब—हवा में उड़ोगे—हवा में-- न घबराहट रहेगी न चिंता।कहते हुये बिशु फ़िर उसी रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया।
और अन्ततः गौरव के काफ़ी विरोध के बावजूद हम बिशु की आवाज के जादू और तनाव दूर करने वाली पुड़िया के आकर्षण में बंधे हुये बिशु के साथ उसके घर तक चले गये।
    फ़िर बिशु द्वारा दी गयी पुड़िया खा कर वाकयी हमने जन्नत की सैर की।और इस तरह वह काला शनिवार मेरे जीवन का अभिशाप बन गया।गौरव तो वहां दोबारा नहीं गया।पर मैं तनाव मुक्त होने के नाम पर बिशु की ही तरह नशीली दवाएं लेने का आदी बनता चला गया।मैं धीरे-धीरे नशे का गुलाम होता गया और बुरी तरह बिशु के पंजों में फ़ंसता गया।पहले तो बिशु मुझे मुफ़्त में तरह तरह की नशीली दवाओं के स्वाद चखाता रहा।और मैं भी उसके आकर्षण में बंधा हुआ नशे का आनन्द उठाता गया।
    जब बिशु इस बात को अच्छी तरह समझ गया कि अब मैं ड्रग्स के बिना नहीं रह सकता तो उसने मुझसे पैसे लेना शुरू कर दिया।मैं भी उसके द्वारा मिलने वाली दवाओं का इस कदर गुलाम बन गया कि उससे दवाएं हासिल करने के लिये मैंने कौन से पाप नहीं कर डाले।लानत है मुझ पर। आज आप सबको बताते हुये मुझे अपने ऊपर शर्म आ रही है कि मैंने ये सब कैसे कर दिया।गांव जाकर बापू से झूठ बोल कर हजारों रूपए लाया।अम्मा की चांदी की करधन चुरा कर बेच डाली।गौरव की साइकिल चुरा कर बेच डाली।यहां तक कि गौरव के बैग से उसके फ़ीस के रूपए भी चुरा लिया।गौरव यह सब जान कर भी मुझसे एक शब्द नहीं बोला।बस वह मुझे हमेशा समझाता रहा कि महेश ये सब छोड़ दे।
    धीरे धीरे मेरी सारी काली करतूतों की खबर मां बापू को भी मिलने लगीं।और मेरे बापू अम्मा सबके सपने बिखरने लगे।वापू ने मुझे कई बार समझाया।मुझे डंडों से पीटा। बड़े भैया ने बहुत समझाया। सभी मुझसे परेशान हो चुके थे।सब धीरे धीरे मेरा साथ छोड़ने लगे।यहां तक कि अन्त में मेरा सबसे अच्छा दोस्त गौरव भी मुझे समझा समझा कर हार जाने के बाद एक दिन रोता हुआ मुझे मेरे हाल पर छोड़ कर चला गया।
  इतना ही नहीं मुझे कालेज से भी निकाल दिया गया।और मैं बिशु के साथ ही उसका गुलाम बन कर रहने लगा।
    अब मेरा ज्यादातर समय बिशु के साथ नशीली दवा लेकर अंधेरे कमरे मे बीतता,या फ़िर हम दोनों कालेजों के आस पास घूम कर मेरे जैसे ही किसी नये शिकार की तलाश में घूमते।
   मैं बिशु के जाल में फ़ंस कर उसकी गुलामी करते हुये पतन की न जाने किन गहराइयों में पहुंच जाता,अगर उस दिन नेहा दीदी मुझे न मिली होतीं।
                         उस दिन भी बिशु के कमरे में स्मैक की एक खुराक लेकर उसके और अपने लिये कुछ खाने का सामान लेने जा रहा था।अभी मैं सड़क पर कुछ ही दूर गया था कि किसी युवती ने मेरा नाम लेकर मुझे पुकारा। एक अनजान युवती के मुंह से अपना नाम सुन कर मैं ठिठक कर रुक गया।मुड़ कर एक सांवली सी मगर खूबसूरत युवती स्कूटर के साथ मेरे बगल में आकर रुक गयी थी।
        “कौन हो सकती है ये?क्या ये भी मेरी ही तरह बिशु कि कोई नयी शिकार है?पर कभी बिशु ने बताया तो नहीं?”अभी मैं सोच ही रहा था कि युवती बोली,“तुम महेश हो न?”
     “आप मुझे जानती हैं?पर मैंने तो कभी आपको--?”मैं हकला कर बोला।
     “पहले तुम मेरी स्कूटर पर बैठ जाओ,बाकी बातें मेरी क्लीनिक पर पहुंचने के बाद।”युवती मुझसे बोली और मैं पता नहीं कैसे सम्मोहित सा होकर उसकी स्कूटर पर बैठ गया।कुछ ही देर में हम उसकी क्लीनिक में पहुंच गये। क्लीनिक में पहुंचकर वह अपनी कुर्सी पर बैठ गयी और मुझे भी बैठने के लिये बोली।“बैठो महेश ये मेरी क्लीनिक है।”और मैं हतप्रभ सा उसके सामने बैठ गया।
    “मगर –आप?”मैं उलझन भरे स्वरों में बोला।
    “मेरा नाम नेहा है और मैं डाक्टर हूं।”युवती मुस्कराकर बोली।
   “पर आप मुझे कैसे जानती हैं?”मेरी उलझन बढ़ती जा रही थी।तरह तरह के खयाल दिमाग में आ रहे थे।
   “मैं तुम्हारे दोस्त गौरव की बहन की सहेली हूं।गौरव ने मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ बताया है।वह तुम्हें लेकर बहुत चिंतित भी रहता है।”नेहा ने मेरे सारे सवालों का जवाब देते हुये कहा।
   “पर आप मुझे यहां---?”मैं अभी भी असमंजस की स्थिति में था।
   “बस मैं तुमसे कुछ बातें करना चाहती थी।”नेहा ने उसे समझाया। सुनते ही मेरे चेहरे का रंग बदलने लगा।एक अजीब सा तनाव मेरे दिमाग में भरने लगा।चेहरे की मांसपेशियां खिंचने लगीं।
  “कैसी बातें करना चाहती हैं आप मुझसे?”क्षण भर में ही मैं उत्तेजित हो गया।क्योंकि मेरे कानों में गौरव की वो बातें कौंध चुकी थीं – वो अक्सर मुझसे कहता था कि तुझे किसी मानसिक चिकित्सक को दिखाना चाहिये।मतलब ये सब उसी गौरव का प्लान है।
  “बोलिये—आप मुझे क्या समझायेंगी—वही न जो बापू समझाते हैं कि मैं बिशु का साथ छोड़ दूं?मैं उसकी दी हुयी दवाएं लेना बन्द कर दूं?यही कहना चाहती हैं न आप भी?”मैं लगभग चीखने लगा था।मेरे चेहरा लाल हो चुका था।स्मैक का असर खतम हो चुका था और गुस्से से मेरे हाथ पैर कांप रहे थे।नेहा दीदी आश्चर्य और भय से मेरे व्यवहार में आये इस बदलाव को बहुत ध्यान से देख रही थीं।मैं शायद गुस्से में कुछ कर बैठता अगर नेहा दीदी अपनी कुर्सी से उठ कर मेरे लिये एक गिलास पानी नहीं लातीं।मैंने पानी का ग्लास एक सांस में ही खाली कर दिया।नेहा अब कुर्सी पर बैठ कर शान्त भाव से बस मेरे चेहरे को लगातार देखे जा रही थी।मेरा गुस्सा शन्त हो चुका था।मैं सामान्य होने की कोशिश में उनकी मेज पर रखे पेपरवेट से खेल रहा था।यद्यपि नेहा लगातार मुझे देख रहीं थीं पर मेरी हिम्मत उनकी तरफ़ देखने की नहीं हुयी।
  “महेश इधर देखो मेरी तरफ़।नेहा दीदी की आवाज मेरे कानों में आयी जरूर पर मेरी निगाहें नीचीं ही थीं।
         “महेश क्या तुम ये ड्रग्स,स्मैक छोड़ नहीं सकते?नेहा दीदी की आवाज फ़िर मेरे कानों से टकरायी।
       “लेकिन मैं कैसे छोड़ दूं बिशु का साथ—अब कुछ नहीं हो सकता।मैं नहीं निकल सकता उसके शिकंजे से अब नेहा दीदी—”कहते कहते मैं रो पड़ा। मेरे सब्र का बांध टूट चुका था।
        नेहा दीदी उठ कर मेरे पास आयी और मेरा सर सहलाते हुये बोली,“अभी कुछ नहीं बिगड़ा महेश—अभी भी तुम चाहो तो उस अंधेरे से निकल सकते हो।”
          नेहा दीदी का प्यार भरा स्पर्श पाकर मैं फ़ूट पड़ा।मैं फ़ूट फ़ूट कर रोता रहा और  नेहा दीदी बस मेरा सर सहलाती रहीं।कुछ सामान्य होने पर मैंने फ़िर सिसकते हुये उनसे कहा,“कैसे निकल सकता हूं दीदी अब मैं उसके जाल से।कौन निकालेगा मुझको उसके चंगुल से?सब मुझसे नफ़रत करते हैं।सबसे बड़ी बात अब मैं उसकी नशीली दवाओं का गुलाम हो चुका हूं मैं टूट चुका हूं बुरी तरह से।”
           लेकिन नेहा दीदी कहां हार मानने वाली थीं।उन्होंने मुझे समझाया,“देखो महेश—तुम्हें तुम्हारी इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास ही तुम्हें उस अंधेरे से निकालेंगे।तुम बस आज ये कसम खा लो कि नशीली दवाएं नहीं लोगे।और आज के बाद बिशु और उसके आदमियों से कभी नहीं मिलोगे।फ़िर दुनिया की कोई भी ताकत तुम्हें नशे की ओर नहीं ले जा सकती।और जहां तक इलाज की बात है तो मैं तुम्हें
किसी नशा मुक्ति केन्द्र ले चलूंगी।मैं तुम्हारा साथ दूंगी हर जगह।”
        “सच दीदी आप मेरा साथ देंगी?मैं फ़िर सामान्य जीवन बिता पाऊंगा?पर पर बिशु के आदमी---मेरे मन में अभी भी भय था बिशु और उसके आदमियों का।
    “वो सब तुम मुझ पर छोड़ दो।मैं देकह लूंगी बिशु और उसके आदमियों को।दीदी ने मुझे आश्वस्त किया।
    “सच दीदी आप मेरा साथ देंगी?बचाएंगी बिशु से?मेरी आवाज खुशी से थरथरा रही थी।
    “हां महेश मैं तुम्हें बचाऊंगी नशे के उस जहर से।”नेहा दीदी खुश होकर बोली।
      और इस तरह मैं पूरे दो सालों तक नशे की उन अंधेरी गलियों में भटकने के बाद नेहा दीदी के सहयोग से और अपने आत्मविश्वास के बल पर खुली हवा में सांस लेने के काबिल हो सका।नेहा दीदी ने ही अपने खर्चे से मेरा दाखिला फ़िर कालेज में करा दिया।मैं फ़िर पढ़ने कालेज जा रहा हूं।मेरे घर,परिवार और समाज मे मेरी फ़िर वही इज्जत हो गयी है जो तीन साल पहले थी।
        ये सारी बातें आप सभी तक पहुंचाने का मेरा मकसद सिर्फ़ यही है कि मेरी यह कहानी सुन कर आप भी सतर्क हो जाएं और किसी बिशु जैसे जहर के व्यापारी के चक्कर में पड़कर अपना जीवन खत्म न करें।खुदा हाफ़िज।
000
डा0हेमन्त कुमार

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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