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“बखेड़ापुर” के बहाने वास्तविक भारत की तस्वीर।

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

पुस्तक -- बखेड़ापुर
लेखक - हरे प्रकाश उपाध्याय
प्रकाशकभारतीय ज्ञानपीठ
प्रकाशन वर्ष2014

                  हिन्दी कथा साहित्य में ग्रामीण परिवेश को लेकर लिखने वाले बड़े लेखकों के नामों की जब बात की जाती है तो प्रेमचंद की परम्परा का निर्वहन करने वाले कुछ चुनिंदा नाम ही हमारे सामने आते हैं।उन्हीं की चर्चाएं होती हैं उन्हीं पर विमर्श भी होते हैं।इधर हिन्दी के उपन्यासों में भारतीय गांवों पर अच्छे उपन्यास कम ही लिखे जा रहे हैं।जब की आज भी हमारे देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गांवों में ही बसता है।आज भी हमारे गांवों में शोषण का स्वरूप वही है जो प्रेमचन्द के जमाने में था।आज भी निचले वर्ग,पिछड़े वर्ग,दलितों की समस्याएं वही हैं जो प्रेमचन्द के उपन्यासों में वर्णित है।हां शोषकों का चेहरा जरूर बदल गया है।उनकी पोशाकें और मुखौटे बदल गये हैं।और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इधर हिन्दी साहित्य को ग्रामीण परिवेश पर आधारित ऐसे उपन्यास भी नहीं लिखे जा रहे जिन्हें हम प्रेमचन्द या रेणु की परम्परा से जोड़ सकें।
                           अभी हाल में ही प्रकाशित हरे प्रकाश उपाध्याय का उपन्यास बखेड़ापुर प्रेमचन्द और रेणु की ही परम्परा वाली एक सशक्त कृति है।जो हमारे सामने आज के गांवों की उन नंगी और भयावह सच्चाइयों की एक एक परतें इतने सहज ढंग से उघारती है,जिसे पढ़ कर पाठक को महसूस होगा कि क्या स्थितियां सचमुच इतनी भयावह भी हो सकती हैं? 
    बखेड़ापुर नाम तो गांव के प्रतीक के रूप में ही लिया गया है।लेकिन उपन्यास पढ़ते समय हमें उसमें घटने वाली हर घटना,हर कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज़ादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी हमारा देश सामन्ती ताकतों और मानसिकता का इस कदर गुलाम है जिसमें एक सामान्य ग्रामीण को अपनी जिन्दगी स्वेच्छा से जीने या मरने का हक भी नहीं है?उसके हर चरित्र की कहानी हमें आज के ग्रामीण परिवेश की वास्तविकता से परिचित कराती है।
    उपन्यास की कथावस्तु बखेड़ापुर गांव से ही शुरू होती है उसी गांव में खतम हो जाती है।लेकिन इस पूरी कथावस्तु के अन्दर कई और कहानियां भी चलती हैं।इन अन्तर्निहित कहानियों के एक एक चरित्र को लेकर हरे प्रकाश ने जिस तरह से बड़ी सहजता के साथ हमारे गांवों की दलगत राजनीति,निम्न वर्ग के शोषण के विविध रूपों,प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था,निम्नवर्ग की आर्थिक बदहाली,दलितों के अंदर पनप रहे विद्रोह,उनके दमन की सामन्ती कोशिशों जैसी ढेरों समस्याओं को उकेरा है वह देखते ही बनता है।   
                   उपन्यास के पात्र सुदामा,धीरू,संगीता मैडम,पचमा मास्साब,भैरव,हेड सर,रूप चौधरी,ज्वाला सिंह,लोटीराम,बुधन तेली,भूअर,लछमिनिया,परबतिया---और भी कईजिनके बारे में पढ़ते हुये या जिनके विचार पढ़ते हुये आपको बराबर महसूस होगा कि हम सच में भारतवर्ष की असली आबादी या असली आम जन के बारे में पढ़ रहे उन्हीं के बीच उठ बैठ रहे।साहित्यिक भाषा में कहा जाये तो एक तरह का तादात्म्य स्थापित हो जाता है हमारा इन पात्रों के साथ।मतलब हमें भी लगने लगता है कि हम खुद भी इन्हीं के बीच से हैं---या कि अरे यह तो हमारी ही कहानी है।और पाठकों का  पात्रों के साथ यह तादात्म्य स्थापित होते जाना ही उपन्यास की सबसे बड़ी सफ़लता है।
     हरे प्रकाश खुद भी गांव की उसी जमीन के व्यक्ति हैं इसी लिये वहां की एक एक पीड़ा,व्यथा को उनसे बेहतर भला कौन रेखांकित कर सकता है।भूअर की मौत के बाद गांवों की बदहाली और एक आम आदमी की अशक्तता और निरीहता का दुख पचमा मास्साब के अन्दर से फ़ूट पड़ता है।---क्या होगा,जमाना कहां से कहां चला,मगर हमार गांव-जवार को दवाई बीरो का सुविधा नहीं है।आदमी जैसे जंगल में रह रहा है। कीचड़ में जांगर खटाते खटाते कीचड़ में ही समा जाना जीवन है। कहीं किसी को कोई सुख आराम नहीं।शहर में सब लोग मौज मार रहा है।------अदम गोंडवी सहीए लिखे हैं---काजू प्लेट में,भिसकी गिलास में,उतरा है राम राज विधायक निवास में।---गरीबअमीरबड़नान्हहम लोगवे लोगबेचारा भुअरा---। अब आम जन की इस जीवन्त पीडा को वही उकेर पायेगा जो खुद भी उसी माटी की गहरायी से निकल कर आया हो।
   ऐसे ही शोषण के बदलते हुये स्वरूप की एक झलक हम वहां भी देख सकते हैं जब गरीबों के झण्डाबरदारों की बात आती है।वो संगठन जो आपके हितों की बात करते हैं वही किस कदर आपके शोषण का माध्यम बन जाते हैं----संगठनों के लोग चन्दा वसूलने में ही निर्ममता से पेश नहीं आते बल्कि उनके दस्ते जिन गांवों में जाते,वहां अपने समर्थकों के घर रुकने पर खाने-पीने और रहने के नाम पर भी काफ़ी तंग करते हैं।दोनों ही संगठनों में लगभग एक ही तरह के लोग थे।अब जब आपके पक्ष में पार्टी बन्दी करने वाले लोग ही आपका शोषण करने लगेंगे तो आपका कौन खेवनहार बनेगा?
    हमारे आज के प्रजातन्त्र के महा उत्सव यानि चुनाव का इससे बेहतरीन उदाहरण भला कहां मिलेगा। चुनाव प्रचार में सभी पार्टियां दारू,नोट और नारे के बल पर वोट की सौदेबाजी में एक दूसरे को पछाड़ देना चाहती थीं। प्रत्याशियों को उनकी पार्टियों की ओर से धन के अलावा हथियार और गुण्डों की भी बजाप्ता सहायता दी जा रही थी।जैसा कंडीडेट,उसको उतने ही गुंडे--हर कीमत पर वोट चाहियें नोट की नदी बहा दो और गड़ही में दारू बहा दो,हर नुक्कड़ पर नाच करा दो,-------के सी यादव तो मजाक में यहां तक कह दे रहे हैं लोगों से कि हमारा चाहो तो पिछवाड़ा ले लो,मगर वोट दे दो।जनता को मजा आ रहा है----धन-धन हो गान्ही जी कि सुराज दिलाए कि नेता अपना पिछवाड़ा देने तक को राजी है।---जै बोलो जवाहर लाल की,बाबा साहेब अम्बेडकर जी की जै हो---।----अब इसे हम अपने सबसे बड़े लोकतन्त्र के महोत्सव यानि चुनावों का यथार्थ कहें या कि भारत वर्ष की जनता का माखौल। लेकिन जो कुछ भी लिखा गया है वो हमारे देश की भयावह तस्वीरों का एक पहलू है।
                बखेड़ापुर उपन्यास बहुत भारी भरकम नहीं है लेकिन अपने आप में एक मुकम्मल कथावस्तु को हमारे सामने प्रस्तुत करता है।इसमें हर कहानी कुछ पात्रों को साथ लेकर हमारे समक्ष ग्रामीण परिवेश के एक नये स्वरूप,उसकी एक नयी घटना,एक अलग विसंगति को प्रस्तुत करती है।और गांवों की इन्हीं घटनाओं,कहानियों विद्रूपताओं,संघर्षों का एक ऐसा ताना बाना हमारे सामने लेखक द्वारा अनायास ही बुना जाता है जो हमे उपन्यास की सम्पूर्णता तक ले जाता है।
         हममें से अगर कोई पाठक गांवों से सम्बन्ध नहीं रखता है तो भी उसके समक्ष उपन्यास की भाषा या शैली के स्तर पर कोई भी कठिनाई नहीं आ सकती है। उपन्यास की शैली इतनी रोचक और भाषा इतनी सरल और प्रवाहमय है कि हर वर्ग का पाठक इसे समझ सकेगा। पात्रों की आम बोल चाल में कुछ असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग भी बहुत अधिक नहीं खटकता क्यों कि आज आम आदमी उतनी गालियों का प्रयोग करना अपना हक मान चुका है।
            अपनी भाषा,बोली की इसी रवानी,शैली की रोचकता और कथ्य की यथार्थता के साथ बखेड़ापुर उपन्यास भी प्रेमचन्द,रेणु,राही मासूम रजा और मिथिलेश्वर के उपन्यासों की पंक्ति में खड़ा होने में सक्षम है।
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समीक्षक- डा0हेमन्त कुमार


हरे प्रकाश उपाध्याय
बैसाडीह,भोजपुर(बिहार) में 5 फ़रवरी 1981 को पैदा हुये हरे प्रकाश उपाध्याय का यह प्रथम उपन्यास और एक कविता संग्रहखिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएंप्रकाशित।साहित्य के कई प्रसिद्ध सम्मान एवम पुरस्कार। अपने मिलनसार स्वभाव और कुशल सम्पादकीय गुणों से हरे ने साहित्यिक जगत में मित्रों,परिचितों,आत्मीयों का एक वृहत साम्राज्य भी खड़ा किया है। सम्प्रति मन्तव्य त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन।
      


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