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कटघरे के भीतर

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008


खून से रंगी सडकों पर
अपने कदमों के निशान बनाते हुए
निकल पड़े हैं
हजारों लाखों बच्चे
पूरी दुनिया के घरों से.

इनके हाथों में हैं मशालें
चेहरे हैं आंसुओं से तर बतर
मन में समाया है एक खौफ
कानों में गूँज रही है धमाकों की आवाजें
और आँखों में चस्पा हैं तमाम सवाल
जिनका जवाब देना है
हमें/आपको/हम सब को.

इन बच्चों की लाल पड़ गई सूनी ऑंखें
जानना चाहती हैं
अपने पैदा होने का कसूर
की क्यों वे सभी बना दिए गए अनाथ
चंद मिनटों में
कुछ उन्मादियों द्वारा की गयी हैवानियत से
की क्या होगा उनका भविष्य
की कैसे मिटेगा उनके चेहरों पर
छाया हुआ खौफ
की कैसे वे उबर सकेंगे पूरे जीवन भर
रात में दिखने वाले भयावह सपनों के प्रहार से
की कौन बुलाएगा अब उन्हें बेटा कह कर
की किसके आँचल में छुप सकेंगे वे
उनींदी आँखों से भयावह काली आकृतियाँ देख कर
की कैसे वे भी बिता सकेंगे एक सामान्य बच्चे का जीवन.

ये सभी सवाल पूछ रहे हैं
ये सारे बच्चे
हम सभी से
सोचिये जरा सोचिये
कुछ थोड़ा बहुत तो बोलिए
क्या जवाब है आपके हमारे पास
इनके सवालों का?

हम सब खड़े होकर कटघरों में
गीता पर हाथ रख कर
सच बोलने की शपथ तो खा सकते हैं
परन्तु क्या दे सकते हैं
कोई आश्वासन..कोई सबूत..कोई प्रमाण
इन बच्चों को
इनके बचपन को सुरक्षित रखने का.

आप भी जरा विचारिये
डालिए अपने दिमाग पर कुछ जोर
की क्या जवाब देना है इन बच्चों को
कब तक चलता रहेगा
दहशत गर्दी का ये खेल
कब तक बारूद के धमाकों
और संगीनों के साये में
खौफनाक मंजर की तस्वीरों से
आतंकित होते रहेंगे ये बच्चे?
00000000
हेमंत कुमार



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टैलेंट हंट या पायिद पयिपर की बांसुरी

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

किसी ऊंची मीनार पर पहुँचने के लिए सीढ़ी दर सीढ़ी चढना ठीक रहता है .ये बात हम सभी जानते हैं.अगर हम मीनार पर सीढियों के सहारे चढेंगे तो हमें चढ़ने के साथ ही उतरने का रास्ता भी मालूम रहेगा.पर एक ही छलांग में अगर मीनार के ऊपर पहुँच गए तो उसी तरह धडाम से नीचे भी गिर जायेंगे.
कुछ ऐसी ही हालत हो रही है हमारे देश के शहरों और गावों में.हर शहर, मुहल्ले,गावों,गली ,कूचे का बच्चा टी वी पर चल रहे टैलेंट हंट शो में जाने को आतुर है.टैलेंट हंट टीम के आने की घोषणा हुई नहीं की शहर के सारे बच्चे निकल पड़ते हैं घरों से.अब आगे आगे चलता हा बांसुरी वालाऔर पीछे पीछे बच्चे.किसी शहर में अगर कोई चैनल अडीशन के लिए दस बजे दिन का समय तै करता है तो चौबीस घंटे पहले से ही उस शहर के साथ ही आस पास के शहरों और गावों के बच्चे लाइन लगा कर खड़े हो जाते हैं.साथ में उनके माता पिता भी.अब बच्चे का गला सुरीला हो या भोंडा,बच्चा सुर ताल की समझ रखता हो या नहीं.इससे माँ बाप को मतलब नहीं.उन्हें तो चैनल के चमकते परदे पर अपने लाडले/लाडली की गाना गाती या ठुमके लगती सलोनी छवि नजर आती है.और तो और जो बच्चा साफ मना कर देता है की उसे गाना नाचना नहीं है तो उसके माता पिता लाठी ले कर सवार.क्यों नहीं जायेगा? क्यों नहीं नाचेगा?माँ बाप को नजर आती हा चैनल से मिलने वाली मोटी रकम

अब आप देखिये जरा टलेंट हंट शो के आयोजकों की तरफ़.देश के हर शहर में घूम घूम कर नगाडा पीटते हैं.हर गली,गावों,शहर,मुहल्ले के बच्चों को इकठ्ठा करते हैं,महीनों तक बच्चों के मन में आशा जगाये रखते हैं,और अंत में कुल दस बीस बच्चों को स्क्रीन पर शकल दिखने का मौका देते हैं.

एक बात और.इस टैलेंट हंट शो का जन्मदाता भी बहुत बड़ा बिजनेस वाला रहा होगा.जैसे जब किसी जगह पर कोई फक्ट्री खुलती है या कोई उद्योग शुरू होता है तो उसके आस पास के इलाके में काफी बड़ी बस्ती बन जाती है.फ़िर उस बस्ती में ढेरों दुकानें खुल जाती हैं.कई लघु उद्योग और उनके सहायक उद्योग भी खुल जाते हैं.मतलब ये की फक्ट्री अगर दो हजार लोगों को नौकरी देती है तो उसके आस पास चार हजार लोगों के रोजगार अपना आप पैदा हो जाते हैं.
ठीक यही कम किया इन टलेंटहन्तियाचैनलों ने.पूरे देश के हर शहर, गली मुहल्ले सब जगह संगीत विद्यालय खुल गए हैं.कोई गाना सिखाता है कोई नाच.कोई मोनो एक्टिंग तो कोई जोक सुनाने या कम्पेअरिग की क्लासेज लेता है.अब इनके यहाँ की टीचरों को भले ही सुर ताल का ज्ञान हो,कभी उन टीचरों ने कोम्पेअरिंग का नाम भी सुना हो,तो भी उनका स्कूल चल रहा है धड़ल्ले से.स्कूलों की अच्छी खासी कमाई हो रही है.
अभिभावकों पर तो जैसे जूनून सवार हो गया है.कोई अपने बच्चे को गायक बनाना चाहता है,तो कोई ब्रेक डांसर.कोई राजू श्रीवास्तव तो कोई मुन्ना भाई.और इसके लिए सब कमर कास कर तैयार हैं.गली गली में खुले संगीत स्कूलों में भेज रहे हैं अपने बच्चों को.उतनी ही फीस दे रहे हैं जितनी स्कूल की देते हैं.हर माँ बाप बड़े ध्यान से हर चैनल के विज्ञापन पर नजर रखता है.अख़बार का अक्षर अक्षर चाट जाता है,की कहीं कोई टलेंट हंट का विज्ञापन छूट जाया .
अब आप ही बताइए जब चारों और इतनी कोशिशें की जा रही हैं तो हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी रहा पायेगी ? नहीं .
लेकिनबस यही एक लेकिन शब्द ऐसा है जो हमें आपको और हम सबको सोचने पर मजबूर कर रहा है.
अब सोचने का मुद्दा ये है की हजारों बच्चों में से एक जो चुना गया वह तो हीरो हो गया.सारी दक्षता ,सारा हुनर,सारा तेज उसी बच्चे में है.

लेकिन क्या बाकी हजारों बच्चों में कोई हुनर नहीं है?
बाकी बच्चे क्या शून्य हैं?
बाकी बच्चों के मन , कोमल हृदय पर क्या गुजरती होगी जब उन्हें प्रारंभिक चयन या एक समूह से एलिएनेट किया जाता होगा?
क्या इन बच्चों के मन में अपनी पूरी जिंदगी के लिए एक हीन भावना नहीं घर कर जायेगी?
चयन की पूरी प्रक्रिया/ taiyaree के दौरान बच्चों की पढ़ाई का जो नुकसान
होता है उसकी भरपाई कौन करेगा?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो मुझे अक्सर परेशां करते हैं, जब मैं टी वी पर एलिएनेशन के दौरान किसी बच्चे /बच्च्चों को रोते (बेहोश होते यहाँ तक की कोमा में जाते,) देखता हूँ.
आप लोग इस दिशा में क्या सोचते हैं जरूर बताइयेगा.
हेमंत कुमार

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पालीथीन संस्कृति

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008


इनको देखो
ये वही बच्चे हैं
जिनके कन्धों पर
रख दिया है भार
पूरे देश का
हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने.
इनकी उदास आँखों में
क्या कभी उगेंगे
गुल्ली डंडा और सीसो पाती
से ऊँचे सपने?
ध्यान से देखो और पहचानो
ये वही बच्चे हैं
जिनकी आंखे खुली हैं
कचरे के ढेरों पर.

अब ये बच्चे
कचरे के ढेर से पालीथीन बीनते हैं
माचिस सिगेरेट के खोखों
और निरोध के गुब्बारों से
खेलते हैं.

ये बच्चे पालीथीन बीनते हैं
ये बच्चे पालीथीन छीनते हैं
ये बच्चे पालीथीन जलाते हैं
ये बच्चे पालीथीन खाते हैं
इनके बाबा भी पालीथीन बीनते थे
इनके बच्चे भी पालीथीन बीनेंगे.

ये बच्चे निर्माण कर रहे हैं
एक नई संस्कृति
पालीथीन संस्कृति का.
जिसमें न कोई बच्चा ऊँचा होगा
न कोई बच्चा नीचा होगा
न कोई बच्चा कान्वेंट में पढेगा
न कोई बच्चा मदरसे में पढेगा
न कोई बच्चा पापा की सिगरेट
चुरा कर पीएगा
न कोई बच्चा बप्पा की बीडी के ठूंठ
खोजेगा.

इनकी संस्कृति में
सब बच्चे पढेंगे एक ही मदरसे में
पालीथीन बीनेंगे एक ही कचरे के ढेर पर
एक दूसरे को गलियां देंगे एक ही भाषा में
खेलेंगे एक ही ब्रांड के निरोध के गुब्बारे से
सुट्टे लगायेंगे एक ही ब्रांड की बीडी से.

इस तरह बनेगी इनकी एक नई संस्कृति
पालीथीन संस्कृति
बनेगा एक नया समाज पालीथीन समाज
जहाँ एक और एक मिलकर होगा
ग्यारह /दो नहीं.
०००००००००००००
हेमंत कुमार


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नागफनियों के बीच

रविवार, 16 नवंबर 2008

कितनी नागफनियाँ
और उगाओगे
उस नन्हें से दिल में.

अभी तो वह बेचारा वैध शब्द
से परिचित भी नहीं हुआ था
और तुमने
उसे अवैध
घोषित कर दिया.
जाती शब्द का
अर्थ जानने से पहले ही
उसे बदजात घोषित कर दिया.

कान्वेंट और मदरसे की
संस्कृतियों के बीच
तुमने लटका दिया
उसे पेंडुलम की तरह.
राजनीति शब्द सुनने के
पूर्व ही
तुम उसे राजनीति के
शिकंजों में कस कर
करने लगे परीक्षण
की किस खांचे में यह फिट बैठेगा.

गुब्बारे और कलम की जगह
तुमने पकड़ा दिया चाकू
उसके हाथों में
जिसने की अभी
चाकू की धार भी
नहीं देखी थी.

अभी कितनी नागफनियाँ
और उगाओगे
इस नन्हें से दिल में.
०००००००

हेमंत कुमार

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कब मिलेंगे अधिकार हमारे

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

कब मिलेंगे हमारे अधिकार?

कल यानी १४ नवम्बर .बाल दिवस . हमारे प्यारे चाचा नेहरू का जन्म दिवस.पूरे देश में इस दिन को हम बाल दिवस के रूप में मनाएंगे.क्योंकि चाचा नेहरू को बच्चों से बहुत प्यार था.
बाल दिवस मनाना बहुत अच्छी बात है.बच्चों के हित में भी हमारे हित में भी.हमारे हित में इसलिए क्योंकि हम सभी इसी बहाने अपने बचपन के दिन याद कर लेते हैं.
पर क्या मात्र बाल दिवस मना लेने से ही हमारे कर्तव्य पूरे हो जाते हैं ? हम अपने बच्चों को वह माहोल ,वह सुविधाएं,वह शिक्षा ,स्वास्थय,या स्तर दे पा रहे हैं जिसे देने का वादा हमने १९८९ में बाल अधिकार घोषणा पत्र पर दस्तखत करते समय किया था . आप पूछेंगे ये बाल अधिकार क्या है?हो सकता है आप जानते भी हों. लेकिन बहुतों को नहीं मालूम बाल अधिकर घोषणा पत्र क्या है.
बच्चों के अधिकारों का घोषणा पत्र अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों के कानून में सबसे स्पष्ट और बड़ा है .इसके ५४ अनुच्छेदों में बच्चों को पहली बार आर्थिक , सामाजिक एवं राजनैतिक अधिकार एक साथ दिए गए हैं.
यह घोषणा पत्र संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा १९८९ में स्वीकृत हो गया . ९ माह बाद इसे लागू भी कर दिया गया.इतनी जल्दी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा स्वीकृत किया जाने वाला यह पहला घोषणा पत्र था.
इस घोषणा पत्र के ५४ अनुच्छेदों में बच्चों के ४१ विशिष्ट अधिकार हैं . इनमें से भी १६ अधिकार हमारे अपने देश भारत के संदर्भ में मुझे ज्यादा ठीक लगे. इन्हीं का उल्लेख मैं नीचे कर रहा हूँ.
* इस बाल अधिकार घोषणा पत्र के मुताबिक हर बच्चे को अधिकार है –
जिंदा रहने एवं विक्सित होने(बड़े होने का).
भेद भाव रहित जीवन जीने का.
माँ बाप दोनों का पूरा प्यार ओर देख भाल पाने का.
स्वस्थ रहने एवं हर तरह की चिकित्सा सुविधाओं के साथ बीमारियों से सुरक्षा पाने का.
अच्छा जीवन स्टर pane का जिसमें उसका सही मानसिक , बौद्धिक,नैतिक,और सामाजिक विकास हो सके.
शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग होने पर उचित देखभाल,चिकित्सा एवं शिक्षा पाने का .
नशीले एवं मादक पदार्थों से बचाव का .
उचित एवं सही शिक्षा पाने का.स्कूलों में खुशनुमा माहोल एवं सम्मान पाने का .
समुचित विकास के लिए खेलकूद एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के अवसरों के साथ मनोरंजन का .
उपेक्षा ,गाली,दुर्व्यवहार,लापरवाही से बचाए जाने का.
अनाथ होने पर पूरी सुरक्षा ,शिक्षा, देखभाल एवं स्वास्थय सुविधायें पाने का.
बाल मजदूर या श्रमिक के रूप में काम करने से रोके जाने एवं शोषण से बचाव का .
अपहरण ,बेचे या भगाए जाने से बचाव का.
यौन उत्पीडन एवं शोषण से बचाव का.
कठोर दंड ,यातना,शारीरिक या मानसिक कष्टों से बचाव का.
किशोर के रूप में किसी कानूनी विवाद में फंसने पर पूरा आत्म सम्मान पाने का .तथा कठोर कानूनी कार्यवाहियों से बचाव का.

ये वो अधिकार हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्टर पर स्वीकृत किए गए हैं.हमारे अपने देश भारत ने भी बाल अधिकारों के घोषणा पत्र पर अन्य देशों के साथ ११ दिसम्बर १९९२ को समर्थन दे दिया था.
१९९२ से… यह सन २००८ . पूरे१६ साल . इन १६ सालों में दुनिया कहाँ से कहा पहुँच गयी. पर हमारे बच्चों की स्थितियां……..?क्या हम अपने बच्चों को ये सभी या इनमें से कुछ अधिकार दे पाये हैं?जबकि बच्चों को उनके ये अधिकार देने की जिम्मेदारी पूरी तरह से राज्य पर है.राज्य का मतलब सिर्फ़ सरकार से नहीं है.राज्य में वे सभी लोग शामिल हैं जो व्यवस्था का हिस्सा हैं.यानी की सरकार ,अधिकारी,कर्मचारी, और
हम यानी की आम आदमी.
ऐसा नहीं की इस दिशा में कोशिशें नहीं हो रही हैं.
हो रही हैं….तमाम राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय स्टर की एजेंसियां बच्चों की हालत बदलने की कोशिशें कर रही हाँ.लेकिन जरूरत है उन्हें और गतिशील बनाने की.
इस दिशा में सरकारी स्तर पर २३ फरवरी २००७ को राष्ट्रीय ‘बाल आयोग’का गठन होना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है.इस आयोग की अध्यक्ष मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता एवं बच्चों के अधिकारों की दिशा में लंबे समय से संघर्षरत श्रीमती शांता सिन्हा जी को बनाया गया है.शांता जी ने ख़ुद बच्चों की हालत पर चिंता व्यक्त की है.उनहोंने एक प्रतिष्ठित पत्रिका में साक्षात्कार में स्वीकार भी किया है की “दिल्ली में भी एक पाकेट ऐसी है जहाँ बच्चे स्कूल नहीं जाते .उस जगह पर आइये तो एहसास हो जाता है की देश में बच्चों की स्थिति क्या है.”
तो इन हालातों में बच्चों को उनके अधिकार,उचित शिक्षा ,स्वास्थय दिलवाने एवं उन्हें स्कूलों तक पहुँचने के लिए हम सबको मिलकर कोशिश करनी है.मैं यहाँ अपनी ही एक कविता लिख रहा हूँ जो बच्चों की आज की हालत का चश्मदीद गवाह है.

उसकी उमर

उसकी उमर ग्यारह साल है.
वह अपना दिन
शुरू करता है
चाय की चुस्कियों से
और रात / समाप्त करता है
बीडी के धुवें में.
वह अपने पेट से
साइकिलों में हवा भरता हा
आंखों से दुनियादारी देखता है
हांथों से चाकू खेलता हा
दिमाग से
नई नई गालियों का उत्पादन करके
जुबान से
उन्हें निर्यात करता है
उसकी उमर ग्यारह साल है.

इस उम्र के बच्चे आपको, हमको हर शहर,मुहल्ले, हर
गली ,नुक्कड़,चौराहे पर,ढाबों,दूकानों,ठेलों के किनारे मिल
जायेंगे.इनकी उदास निगाहों में भी कुछ रंग बिरंगे सपने
हैं .इनके मन में भी कुछ कर दिखने की ललक,जोश है .ये बड़ी
उम्मीद से आपको, हमको,इस पूरी व्यवस्था को निहार रहे हैं ….

तो आइये बाल दिवस के दिन हम संकल्प लें की हम इनके
अधिकारों को दिलवाएंगे. हर हालत में….हर स्थिति में…..
ओर हर कीमत पर……

हेमंत कुमार

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कब तक

रविवार, 9 नवंबर 2008

कब तक ?

आठ नवम्बर को फ़िर एक मासूम बोरवेल में गिर गया.यह अभागा बच्चा राजीव कन्नौज शहर के भंवर gaddhaगाँव का है.और मुश्किल ये की ८० फीट गहरे बोरवेल में गिरा राजीव मंद बुद्धि है.जिसका परिणाम यह की उसे बचाने की जो भी कोशिशें होंगी उसमें वो शायद ही कुछ रिस्पौंस दे पाये.राजीव पास की ही प्राइमरी पाठशाला में मिड दे मील खाने जा रहा था .इश्वर करे राजीव सकुशल बाहर जाए.

पूरे देश मैं पिछले तीन चार सालों में मासूमों के बोरवेल में गिरने की यह कम से कम पच्चीसवीं घटना होगी (संख्या और भी ज्यादा हो सकती है) .इनमें कुछ बच्चों को अथक प्रयासों से बच्चा लिया गया . कुछ अभागे नही बच सके.

लेकिन सवाल यह है की मासूम बच्चों के बोरवेल मैं गिरने की ये दुर्घटनायें कब तक होती रहेंगी? कब तक ये ८०,९०,२०० फीट गहरे बोरवेल अबोध बच्चों को निगलते रहेंगे ?इन्हें रोकने की कोशिश क्यों नही की जा रही?
मुझे जहाँ तक याद है बोरवेल मैं किसी बच्चे के गिराने की पहली दुर्घटना लखनू के पास किसी गाँव में हुई थी.बोरवेल का दूसरा शिकार प्रिंस हुआ था.उसके बाद से हर दूसरे-तीसरे(कभी कभी हर माह)एक बच्चे के बोरवेल में गिराने की ख़बर अखबार या चैनलों में जाती है.
हमारे देश की सरकार और प्रशासन उन्हें रोकने के लिए कठोर कदम क्यों नहीं उठा रही हैं?जबकि इसका उपाय बहुत आसान है.
बोरवेल खोदने के बाद उसके चारों और कोई मजबूत रोक लगाई जाए जिससे बच्चे वहाँ तक पहुँच सकें .


बोरवेल के पास किसी व्यक्ति / व्यक्तियों की ड्यूटी तब तक के लिए लगाई जाए जब तक बोरवेल का काम ख़त्म हो जाए .
बोरवेल से यदि पानी नहीं निकला है तो उसे तुंरत बंद कर दिया जाए.
ऐसा करने वाले ठेकेदार / इंजिनियर /फ़र्म को कठोर आर्थिक दंड दिया जाए.
यदि किसी बोरवेल में फ़िर कोई मासूम गिरे तो उस बोरवेल की खुदाई करने वाले ठेकेदार / इंजिनियर के विरुद्ध वही प्रक्रिया अपनाई जाए जो हत्या के अपराधी के लिए अपनाई जाती है .

पर क्या हमारे देश में ऐसा सम्भव है

हेमंत कुमार

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कहाँ खो गया बचपन

शनिवार, 8 नवंबर 2008

कहाँ खो गया बचपन

जाने कहाँ खो गया है बचपन
पिछले कुछ सालों से.

मैं ढूँढता रहता हूँ बचपन को
मुहल्ले की सडकों पर
पार्कों में,गलियों में चबूतरों पर
पर कमबख्त बचपन
मुझे कहीं मिलता ही नहीं.

नहीं दिखाई देती अब कोई भी लड़की
मुहल्ले की सडकों पर
चिबद्दक खेलते हुए,
रस्सी कूदते हुए या फ़िर
घरों के आंगन, बरामदों में
गुडिया का ब्याह रचाते.

न पार्क में कोई लड़का
गिल्ली डंडा,सीसो पाती या
फ़िर कबड्डी ,खोखो खेलते हुए.

कहीं ऐसा तो नहीं
हमारे देश के सारे बच्चे
उलझ गए हों
कार्टून नेटवर्क,पोगो और टैलेंट हंट के
मायाजाल में.
सिमट गया हो बचपन
सिर्फ़ वीडियो गेम और
कंप्युटर की स्क्रीन तक
या लड़ गया हो बचपन की पीठ पर
पसेरी भर का बोझा ज्ञान विज्ञानं का
बस्त्ते के रूप में.

मुझे चिंता सिर्फ़ इस बात की नहीं
की मुहल्ले की गलियों पार्कों में
पसरा सन्नाटा कैसे टूटेगा
कैसे दिखाई देंगे बच्चे यहाँ.

चिंता तो इस बात की है



की बच्चों की कल्पना का क्या होगा?
जो न सुनते हैं कहानियाँ किस्से
अब नानी दादी से
न उन्हें मालूम है की
क्या है गुड्डे गुड्डी का खेल
न जाते हैं अब वे नागपंचमी,
दशहरे के मेलों में
न करते हैं भाग दौड़,
धमाचौकडी गलियों पार्कों में.
तो कल कहाँ से करेंगे ये बच्चे
नई नई विज्ञानं की खोजें
नए नए आविष्कार
कैसे बनेंगे ये बच्चे
देश के भावी कर्णधार
कहाँ से आयेगा इनके अन्दर
गांधी नेहरू या आजाद का संस्कार .
००००००००००००००००००००००
हेमंत कुमार

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शिक्षा का अधिकार

बुधवार, 5 नवंबर 2008

शिक्षा का अधिकार

अंततः हमारे देश के छः से चौदह साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने वाले विधेयक को सरकार की मंजूरी मिल ही गई . संभवतः यह बिल दिसम्बर २००८ मैं संसद मैं पेश किया जाएगा . यदि यह बिल पास हो जाता है तो यह हमारे देश की एक बड़ी उपलब्धि होगी ।
शिक्षा के अधिकार सम्बन्धी बिल से हमारे देश के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा पाने का हक़ मिल सकेगा . इस विधेयक के माध्यम से संसद द्वारा कुछ साल पहले मंजूर किए गए ८६वेइन संविधान संशोधन का क्रियान्वित किया जा सकेगा . .इसमे छः से चौदह साल के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देने की बात कही गई है .
लेकिन सवाल यह है की क्या सिर्फ़ बच्चों को ये अधिकार दे देने से ही हमारे देश की निरक्षरता दूर हो सकेगी ? देश आज़ाद होने के बाद बने संविधान में भी शिक्षा को हर बच्चे का मोलिक अधिकार कहा गया था . उसके बाद कई आयोग बने , समितियां बनीं ,रिपोर्टें तैयार हुईं , पर नतीजा क्या रहा ?

१९८६ में बनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी छः से चौदह साल के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मुहैया कराने की बात कही गई है . १९८६ की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में लड़के-लड़कियों को समान अधिकार देने ,लड़कियों की शिक्षा के विशेष प्रयास ,स्कूल न आ सकने वाले बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा देने ,तथा १५ से ३५ साल के प्रौधों के लिए प्रौढ़ शिक्षा को गति देने की बात की गयी है . राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद पूरे देश में ओपरेशन ब्लैक बोर्ड नामक महायोजना , फ़िर सबको शिक्षा सबको स्वास्थय (लक्ष्य २०००), दी.पी.ई.पी;और अब सर्व शिक्षा अभियान और मिड दे मील . इन योजनाओं पर विश्व बैंक एवं भारत सरकार का अच्छा खासा धन खर्च हो रहा है . इन कोशिशों से सफलताएं भी मिल रही हैं . पर क्या हम अभी तक अपने देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को वह स्वरुप दे पाए जो भारत जैसे विकासशील देश में होनी चाहिए थी?

जब हम बच्चों को मुफ्त किताबें,ड्रेस,मद्ध्यांह भोजन,टी.वी ,एवं कम्प्यूटर द्बारा शिक्षा के अवसर सभी कुछ दे रहे हैं तो भी अभी तक हमारे देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था पटरी पर क्यों नहीं आ सकी .

संभवतः इस शिक्षा के अधिकार सम्बन्धी विधेयक के पास होने के बाद स्थितियों में बदलाव आ सकता है . लेकिन इसके लिए हमारी सरकार को कुछ कठोर नियम बनने की जरूरत है . हमारे कई पड़ोसी देशों में स्कूल जाना हर बच्चे के लिए अनिवार्य कर दिया गया है . १९९४ के आस पास चीन में नोऊ साल तक के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है . .बच्चों को स्कूल न भेजने वाले अभिभावकों पर आर्थिक दंड का भी प्रावधान वहां है. थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इन्डोनेशिया आदि देशों में पहले ही शिक्षा अनिवार्य कर दी गयी थी . फ़िर हमें किस बात का इंतज़ार है?

हमारी सरकार को शिक्षा के मौलिक अधिकार सम्बन्धी विधेयक को पास करने के साथ कुछ कठोर नियम एवं दंड भी बनने चाहिए –
*जो अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं उनके ऊपर ५ या १० रुपये प्रतिमाह का आर्थिक दंड लगाया जाया .
*जिस स्कूल में नामांकित होने के बाद बच्चे स्कूल आना बंद कर दें उन स्कूलों के प्रधानाचार्य , अध्यापकों की वेतन वृद्धि रोक लेने जैसा या अन्य कोई दंड .
* जिस गाँव के बच्चे स्कूल नही जा रहे हों वहाँ के प्रधानों पर भी कोई अर्थ दंड .

इसके साथ ही शिक्षा व्यवस्था में नीचे से ऊपर तक व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कोई ओर कठोर नियम .

यदि हमारी सरकार इन मुद्दों पर भी विचार करे तो शायद हम अपने देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर ला सकें .
हेमंत कुमार
०४.०११.०८

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शनिवार, 1 नवंबर 2008

ब्लॉग क्यों ?

मैं पिछले लगभग तीन दशकों से बच्चों के लिए काम कर रहा हूँप्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों ही माध्यमों के द्वाराफ़िर मुझे ब्लॉग शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ गयीबात बहुत सीधी सी हैमुझे इधर ये दोनों माध्यम नाकाफी लग रहे थेलोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए
मुझे लग रहा था की मुझे कोई तीसरा माध्यम भी अपनाना चाहिए
दूसरी बात यह है की ,मैं एक ऐसे मंच का निर्माण भी करना चाह रहा था जिस पर मैं बच्चों के लिए काम करने , चिंता करने वाले दुनिया भर के लोगों को अपने साथ जोड़ सकूं
इस समय पूरी दुनिया भर में बच्चों की जो स्थिति है ,
उससे हर संवेदनशील व्यक्ति परिचित होगा .(खासकर अविकसित देशों के बच्चों की ).एक तरफ़ उन्हें अशिक्षा , गरीबी प्रदुषण जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ़ उनका साबका कुपोषण ,और एड्स जैसी बीमारियों से भी पड़ रहा है .
आज दुनिया भर में बढ़ते आतंकवाद के कारन हर देश के बच्चों का बचपन डर और अनजाने भय की लम्बी अभेद्य सुरंगों में खोता जा रहा है . दुनिया के हर देश के बच्चे आज मजबूर हो गए है रात रात भर जागने और बार बार डर कर आँखें बंद कर लेने के लिए

मैंने कुछ दिनों पहले एक कविता ऐसे ही बच्चों की मानसिक स्थितियों पर लिखी थीइसे आप भी पढिये

भयाक्रांत

उसकी आँखों की
पुतलियों में
अब नहीं होती
कोई हलचल
सतरंगे गुब्बारों
और लाल पन्नी वाले
चश्मों को देख कर
नहीं फड़कते हैं अब
उसके होंठ
बांसुरी बजाने के लिए
नहीं मचलती हैं उसकी उंगलियाँ
रंगीन तितलियों के मखमली स्पर्श
को महसूस करने के लिए

उसके पावों में
नहीं होती कोई हलचल
अब
गली में मदारी की
दुग्दुगी की आवाज सुनकर
नहीं उठाती है उसकी गुलेल
कच्ची अमियों पर निशाना
लगाने के लिए .
पिछले कुछ दिनों से
उसकी आँखों में
जम गया है खून
होंठों पर लग गया है ताला
लग गयी है जंग
हाथों और पांवों में
जब से उसने देखा है
अपने गाँव की कच्ची गलियों में
फौलादी मोटरों की कवायद
संगीनों की चमक
और बारूद के धमाकों के बीच
अपनी बूढी दादी और बड़ी बहन
की लाशों को
खाकी वर्दी द्वारा
घसीटे जाते हुए

बच्चों की इन हालातों को हम कैसे बदल सकते हैं ?उन्हें एक सामान्य जीवन देने के लिए हम क्या कर सकते हैं?आप भी यदि इन मुद्दों पर कुछ सोच रहे हैं तो क्रिएटिव कोना
में आप का खुले दिल से स्वागत है
हेमंतकुमार 01।11.08

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. ‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक संस्कृति लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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