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सिर्फ़ साहित्यकार,समालोचक और समाजवादी चिंतक ही नहीं थे ---डा0रघुवंश।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

         
पिछले वर्ष 23 अगस्त2013 को अचानक ही सुबह डा0अनुपम आनन्द ने खबर दी कि डा0रघुवंश जी का निधन हो गया।सुन कर स्तब्ध हो गया था मैं। तुरन्त ही मैंने उनके मझले पुत्र श्री ज्योति मित्र को फ़ोन किया।तो इस दुखद समाचार की पुष्टि हो गयी।काफ़ी देर तक वैसे ही जड़वत बैठा रहा।---आंखों के आगे आदरणीय डा0 रघुवंश जी के साथ बिताये एक एक सुखद पल कैमरे के फ़्लैश की चमकते गये थे।
        सन1979 में डा रघुवंश जी से मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद में उनके बैंक रोड स्थित आवास पर हुयी थी।मैं उनके निर्देशन में शोध करना चाहता था।पहले तो उन्होंने एकदम साफ़ मना कर दिया।पर दो तीन दिन लगातार जाने के बाद जब मैंने उनसे कहा कि मैं रिसर्च आपके साथ ही करूंगा, नहीं तो नहीं तब मुझे उनके साथ रिसर्च ज्वाइन करने का सौभाग्य मिल सका।
            डा0रघुवंश जी के साथ मैं लगभग सात-आठ साल रहा।चार साल शोध,तीन--चार साल रिसर्च असिस्टेण्ट के रूप में। इस दौरान मुझे उन्होंने एक गुरु,पिता और मित्र तीनों ही का स्नेह दिया।उनके साथ मैंने देश के हर कोने की लंबी लंबी यात्राएं की।बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिला और खूब अच्छी अच्छी दावतें भी उड़ाईं।ऐसी ही एक यात्रा के दौरान घटित एक घटना का उल्लेख मैं यहां करूंगा जिससे रघुवंश जी की जीवटता और हिम्मत का अंदाजा लग सकता है।
     मुझे रघुवंश जी के साथ इलाहाबाद से गोरखपुर किसी सेमिनार में जाना था। उन दिनों भटनी से आगे की यात्रा छोटी लाइन(नैरो गेज)की ट्रेन से होती थी।ट्रेन बदलने हमे दूसरे प्लेटफ़ार्म पर जाना था।सिर्फ़ दो मिनट थे ट्रेन छूटने में।कुली दिख नहीं रहे थे।मैंने कहा सर ट्रेन छूट जायेगी क्या?रघुवंश जी ने कहा ---अरे ऐसे कैसे छूटेगी ट्रेन।अभी देखो ---। और अपने मुड़े हुये हाथों में ही एक में बैग और एक में छोटी अटैची उठा कर रघुवंश जी दौड़ पड़े दूसरे प्लेटफ़ार्म की ओर---अब मैं भी पीछे पीछे दो भारी वाली अटैचियां लेकर दौड़ा---और अन्ततः हमें गाड़ी मिल गयी। तो ऐसे कर्मठ,और हिम्मत वाले इन्सान थे रघुवंश जी। ऐसे महान और बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्ति का इस तरह जाना---सच में हिन्दी साहित्य के साथ ही भारत के बुद्धिजीवियों की अपूरणीय क्षति कही जायेगी।
              ड़ा रघुवंश जी का जन्म 30 जून 1921 को उत्तर प्रदेश के गोपामऊ कस्बे में हुआ था।बचपन से ही हाथों की विकलांगता के बावजूद  भी आपने पढ़ाई की।अँगूठे साल तक सिर्फ़ पढ़ना ही हो सका।पर अन्ततः एक दिन अपने हाथों और पैर के अंगूठों में कलम फ़ंसा कर लिखने भी लगे।लिखने पढ़ने का ये जो सिलसिला शुरु हुआ तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम0ए0,डी0फ़िल0 भी कर लिया।और वहीं पर अध्यापन भी करने लगे।
                    डा0रघुवंश जी ने कभी किसी को यह अहसास होने ही नहीं दिया कि उनके दोनों हाथ खराब हैं।वो अपने सारे ही काम दोनों हाथों और पैरों के सहारे बखूबी सम्पन्न कर लेते थे।लिखने के लिये वो तखत य चौकी पर बैठ कर अपने दाहिने पैर के अंगूठे में पेन फ़ंसा कर अपने दाहिने हाथ की सहायता से काफ़ी तेज गति से लिख लेते थे।दाढ़ी बनाना,कंघी करना,खाना खाना, कपड़े बदलना हर काम वो खुद ही करते थे---हां कभी कभी बटन लगाने में उन्हें जरूर थोड़ी दिक्कत होती थी ----वो भी जल्दी रहने पर।समय रहता था तो ये भी वो खुद ही करते थे। उनके अंदर जीवन के प्रति जो जिजीवषा,कर्मठता,और कुछ अलग और नया करने की इच्छा थी शायद उसी ने उन्हें इतने बड़े बड़े उपन्यास,शोध और आलोचना की पुस्तकें लिखने के लिये प्रेरित किया। 
     एक अध्यापक के रूप में रघुवंश जी ऊपर से दिखने में जितने कठोर थे अंदर से उतने ही मृदु और कोमल स्वभाव वाले।अक्सर छात्रों को डांटते तो कुछ समय बाद ही माहौल को हलका करने के लिये उनसे मजाक भी कर देते।एक अध्यापक के साथ ही  आप देश के प्रमुख समाजवादी चिंतकों में से एक  थे।एक जमाने में इलाहाबाद में उनके बैंक रोड स्थित आवास पर हमेशा साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का जमावड़ा रहता था।

                                                                          साहित्यकार के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य को छायातप,तंतुजाल,अर्थहीन,वह अलग व्यक्ति,हरी घाटी जैसे उपन्यास दिये दूसरी ओर प्रकृति और काव्य,नाट्यकला,साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य,कबीर,सर्जनशीलता का आधुनिक संदर्भ जैसी आलोचनात्मक पुस्तकें। इमर्जेंसी में जेल में बन्दी जीवन बिताते हुये जेल और स्वतन्त्रताजैसी पुस्तक तैयार करना डा0रघुवंश जैसे कर्मठ व्यक्ति के बस की ही बात थी। नहीं तो इमर्जेन्सी में मीसा बन्दियों की जेल में क्या हलत होती थी इसे कौन नहीं जानता। इसके साथ ही रघुवंश जी ने आलोचना,आलोचना समीक्षा,क ख गजैसी पत्रिकाओं का संपादन कार्य भी संभाला।
         डा0रघुवंश को 1992मेंउ0प्र0हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण,के के बिड़ला फ़ाउण्डेशन से शंकर पुरस्कार1994 में उ0प्र0हिन्दी संस्थान सेसाहित्य-भारती,2008 में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारामूर्तिदेवीपुरस्कार प्रदान किया गया। सामन्यतः 80 वर्ष के बाद साहित्य सृजन कम ही लोग कर पाते हैं परन्तु रघुवंश जी 92 साल की उम्र में भी सक्रिय थे।उनकी अंतिम पुस्तक यूरोप के इतिहास की प्रभावी शक्तियां अभी एक डेढ़ साल पहले ही प्रकाशित हुयी है।
        रघुवंश जी के साथ मेरी अंतिम मुलाकात 2009 में दिल्ली में उनके मझले पुत्र श्री ज्योति मित्र के घर पर हुयी थी। मैं एन सी ई आर टी में किसी वर्कशाप में गया था।डा0साहब को फ़ोन किया तो उन्होंने कहा कि बेटा हेमन्त इस बार मुझसे मिल कर ही जाना। अगले दिन सुबह मैं गया। तब शायद आदरणीया सावित्री जी जीवित थीं। मेरे लिये ढेर सारा नाश्ता बनवा कर रखा था रघुवंश जी ने। काफ़ी देर बातें होती रहीं। पेट भर नाश्ता करके जब मैं चलने को हुआ तो रघुवंश जी ने मुझसे कहाहेमन्त मैं चाहता हूं तुम एक नयी परम्परा को जन्म दो? मैं बत समझा नहीं और उनकी तरफ़ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगा। मेरा आशय समझकर वो बोले, देखो ये तो आम बात है कि कोई गुरु अपने शिष्य की किसी पुस्तक की भूमिका लिखता है। मैं चाहता हूं तुम उल्टा करो। मतलब मेरे नये उपन्यास की भूमिका तुम लिखो। यह एक नयी परम्परा होगी।कि एक शिष्य अपने गुरु की किताब की भूमिका लिखेगा।?
    ऐसे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति इतने बड़े बुद्धिजीवी,साहित्यकार और चिन्तक का जाना सच में एक बड़े शून्य का बन जाना है--- जिसके भरने में वक्त तो लगेगा ही। हमारे आज के युवाओं के साथ ही उन विकलांग व्यक्तियों को भी डा0रघुवंश जी के जुझारू और सौम्य सरल व्यक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिये जो अपनी शारीरिक विकलांगता को अपनी कमी मान कर हिम्मत हार बैठे हैं या किसी हीन भाव से ग्रस्त हैं। यही आदरणीय डा रघुवंश जी के प्रति सबसे बड़ी  श्रद्धांजलि होगी।
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डा0हेमन्त कुमार

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‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहाड़ पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. Bअच्चे का विकास। Breast Feeding. Child health Child Labour. Children children. Children's Day Children's Devolpment and art. Children's Growth children's health. children's magazines. Children's Rights Children's theatre children's world. Facebook. Fader's Day. Gender issue. Girls Kavita. lekh lekhh masoom Neha Shefali. perenting. Primary education. Pustak samikshha. Rina's Photo World.रीना पीटर.रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया.तीसरी आंख। Teenagers Thietor Education. Youth

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