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पर्यावरण और बच्चों के प्रति समर्पित ---- श्री चिक्कामुनियप्पा

मंगलवार, 20 मार्च 2012

चिक्कामुनियप्पा
           आज हमारे देश के सामने ही नहीं पूरी दुनिया के सामने अपनी इस धरती और अपने पर्यावरण को बचाने की समस्या है। इसे बचाने के लिये हमें तो काम करना ही है। साथ ही हमें आने वाली पीढ़ी यानि अपने बच्चों को भी इस मुहिम से जोड़ना होगा। तभी शयद हम उन्हें खुली हवा,धूप,हरियाली,रंग बिरंगे पक्षियों का प्यारा संसार यानि वो सभी कुछ दे सकेंगे जो हमारे जीवन के लिये जरूरी है।
     आज हमारे समाज में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो बच्चों के साथ जुड़ कर उन्हें अपनी प्राकृतिक सम्पदा,अपने पर्यावरण को बचाने के लिये प्रेरित करने का काम कर सकें। आज मैं आपका परिचय एक ऐसी ही शख्सियत से कराने जा रहा हूं जो खुद तो प्रकृति को बचाने के मुहिम में वर्षों से लगे हैं। अपने साथ ही उन्होंने बहुत से बच्चों को भी इस मुहिम का हिस्सा बना रखा है।और पूरी निष्ठा और जुनून की हद तक पर्यावरण को बचाने का कार्य करने वाले व्यक्ति हैं--श्री चिक्का मुनियप्पा।
                    राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान,लखनऊ में कैमरामैन के पद पर कार्यरत श्री चिक्का मुनियप्पा की फ़िल्म मेरे आंगन में आओ को इसी साल सी0 आई0ई0टी0,नई दिल्ली द्वारा आयोजित 17वें शैक्षिक वीडियो फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के साथ ही सर्वश्रेष्ठ निर्देशन,सम्पादन और ध्वन्यांकन का पुरस्कार भी मिला है।
     स्वभाव से बहुत सरल और हंसमुख स्वभाव वाले चिक्का जी से बात करने पर उन्होंने बताया कि लगभग 16 साल पहले जब वो अपने आवास विकास के मकान में गये तो वहां सामने बना पार्क पूरी तरह सूखा था।वहां गाय,भैंसों के साथ ही सूअर तक पड़े रहते थे। इस माहौल को देखकर उनके मन में यही प्रश्न आया कि क्या बच्चों को इसी वातावरण में ही रखना है?इसमें बच्चों का कैसा विकास हो सकेगा?
पार्क की हरियाली
        और बस उसी दिन से उन्होंने सबसे पहले पार्क को हरा भरा बनाने का काम शुरू किया।पहले अपने गमलों के कुछ पेड़ वहां लगाये।फ़िर वहां सफ़ाई करवाकर घास लगवायी। ---धीरे धीरे आस-पास के सभी लोग अपने घरों के सामने घास लगाने लगे।फ़िर सभी ने चिक्का जी से प्रेरित होकर पेड़ लगवाने शुरू किये। सामूहिक चन्दे से पार्क की सुरक्षा के लिये बाउण्ड्री बनी। ---फ़िर पेड़ों की संख्या बढ़ती गयी।
पार्क में समारोह
   एक और अच्छी बात चिक्का जी बताते हैं कि बच्चों को इस मुहिम से जोड़ने के लिये वो लोग पेड़ लगाने की पूरी तैयारी करने के बाद ---किसी बच्चे से ही पौधारोपण करवाते थे।जिससे कि बच्चा भी उस पेड़ से,पार्क से आत्मीयता महसूस करे।
 चिक्का के प्रयासों से ही सभी ने चन्दा करके उसी पार्क में एक मंदिर भी स्थापित करवाया है। जहां प्रतिदिन बच्चे,बड़े सभी इकट्ठे होकर कुछ समय पूजा और आरती में भी देते हैं।इसका भी मकसद सभी बच्चों बड़ों को एक जगह इकट्ठा करना और एकता के सूत्र में बांधना ही था।
क्रिस्मस
         अब तो चिक्का जी के प्रयासों से वही पार्क इतना हरा भरा हो चुका है जिसे देखकर हर किसी का मन वहां कुछ देर विश्राम करने का होगा। इसके साथ ही अब उस पार्क में चिक्का जी और अन्य बड़ों के निर्देशन में बच्चे हर त्योहार,(जन्माष्टमी, दशहरा,क्रिसमस,होली) बहुत बेहतरीन ढंग से मनाते हैं। उस पार्क में सुबह शाम रंग-बिरंगे तरह तरह के पक्षियों का कलरव गूंजता है।
बच्चों के साथ व्यस्त चिक्का
            इन्हीं पक्षियों के कलरव से ही प्रेरित होकर चिक्का ने यह फ़िल्म मेरे आंगन में आओ बहुत ही सीमित साधनों में बनायी। इस फ़िल्म में भी बच्चों का इन्वाल्वमेण्ट बताता है कि चिक्का जी बच्चों के भविष्य,उन्हें दिये जाने वाले संस्कारों,उन्हें दिये जाने वाले प्रकृति और पर्यावरण को लेकर कितने अधिक संवेदनशील हैं।काश कि बच्चों और पर्यावरण के प्रति यही संवेदनशीलता दुनिया के हर व्यक्ति में आ सके-------।
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हेमन्त कुमार

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