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नव वर्ष की मंगल कामनायें

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

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कहाँ खो गया बचपन

रविवार, 19 दिसंबर 2010

जाने कहां खो गया है बचपन
पिछ्ले कुछ सालों से।

मैं ढूंढ़ता रहता हूं बचपन को
मुहल्ले की सड़कों पर
पार्कों में, गलियों में, चबूतरों पर
पर कम्बख्त बचपन
मुझे कहीं मिलता ही नहीं।

नहीं दिखाई देती अब कोई भी लड़की
मुहल्ले की सड़कों पर
चिबड्डक खेलते हुये
रस्सी कूदते हुये या फ़िर
घरों के आंगन बराम्दों में
गुड़िया का ब्याह रचाते।
न पार्क में कोई लड़का
गिल्ली डण्डा, सीसो पाती या
फ़िर कबड्डी, खोखो खेलते हुये।

कहीं ऐसा तो नहीं
हमारे देश के सारे बच्चे
उलझ गये हों
कार्टून नेटवर्क,पोगो  और टैलेण्ट हण्ट के
मायाजाल में।

सिमट गया हो बचपन
सिर्फ़ वीडियो गेम और
कम्प्यूटर की स्क्रीन तक
या लद गया हो बचपन की पीठ पर
पसेरी भर का बोझा ज्ञान विज्ञान का
बस्ते के रूप में।

मुझे चिन्ता सिर्फ़ इस बात की नहीं
कि मुहल्ले की गलियों पार्कों में
पसरा सन्नाटा कैसे टूटेगा
कैसे दिखाई देंगे बच्चे यहां
चिन्ता तो इस बात की है
कि बच्चों की कल्पना का क्या होगा?
जो न सुनते हैं कहानियां किस्से
अब नानी दादी से
न उन्हें मालूम है कि क्या है
गुड्डे गुड़िया का खेल
न जाते हैं अब वे नागपंचमी,
दशहरे के मेलों में
न करते हैं भागदौड़,धमाचौकड़ी
गलियों और पार्कों में।

तो कल कहां से करेंगे ये बच्चे
नई नई विज्ञान की खोजें
नये नये आविष्कार
कैसे बनेंगे ये बच्चे
देश के भावी कर्णधार
कहां से आएगा इनके अंदर
गांधी नेहरू या आजाद का संस्कार।
000000
हेमन्त कुमार 

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बच्चों के अधिकार,देने को सब तैयार

शनिवार, 13 नवंबर 2010

आज 14 नवम्बर यानि बाल दिवस है। हमारे पूरे देश में इस दिन बच्चों के लिये बहुत सारे आयोजन होंगे। बच्चों के विकास की तमाम बातें होंगी। उनके मनोरंजन के लिये मेलों,तमाशों का आयोजन भी होगा। लेकिन क्या हम सभी यह जानते हैं कि बच्चे हमसे यानि समाज से क्या चाहते हैं?या हमारा, आपका,समाज का ,देश का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमें बाल अधिकारों को पढ़े और जाने बिना नहीं मिल सकता। आज मैं उन्हीं बाल अधिकारों की चर्चा यहां कर रहा हूं।
 बच्चों के अधिकार,देने को सब तैयार

        बच्चों के अधिकारों की बात तो आज सभी करते हैं।लेकिन ये अधिकार कौन कौन से हैं इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। आइये देखें बच्चों के वो कौन कौन से अधिकार हैं जिन्हें देकर हम बच्चों का जीवन संवार सकते हैं।
       बच्चों के अधिकारों से सम्बन्धित घोषणा पत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों के कानून में सबसे अधिक स्पष्ट व वृहद हैं। इसके 54 अनुच्छेदों में बच्चों को पहली बार आर्थिक,सामाजिक एवम राजनीतिक अधिकार एक साथ दिये गये हैं। यह घोषणा पत्र संयुक्तराष्ट्र महासभा द्वारा 1989 में स्वीकृत होकर नौ माह के भीतर ही लागू हो गया। इतनी शीघ्रता से अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा स्वीकार होने वाला यह पहला घोषणा पत्र था।
         घोषणा पत्र संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 20 नवंबर 1989 को स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1990 को अन्य देशों द्वारा हस्ताक्षर एवं निश्चय के लिये प्रस्तुत किया गया। यह 2 सितंबर 1990 से लागू कर दिया गया। 18 मई 1990 तक कुल 159 देशों ने या तो घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया या उसके समर्थक राज्य बन गये। भारत ने भी इस घोषणा का 11 दिसंबर 1992 को समर्थन कर दिया था।
       इन 54 अनुच्छेदों में बच्चों को 41 विशिष्ट अधिकार दिये गये हैं।
0बच्चे की परिभाषा 0कोई भेदभाव नहीं 0बाल हितों की रक्षा 0अधिकारों को लागू करना 0मां बाप की जिम्मेदारियों का मार्गदर्शन 0जिन्दा रहना व विकसित होना 0नाम और राष्ट्रीयता 0पहचान का संरक्षण 0मां बाप के साथ रहना 0पारिवारिक एकता 0अपहरण से बचाव0बच्चों के विचार 0अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 0वैचारिक एवं धार्मिक स्वतंत्रता 0मिलने जुलने की स्वतंत्रता 0गोपनीयता की रक्षा 0सूचनाओं के उचित साधन 0मां बाप की जिम्मेदारी 0लापरवाही व दुर्व्यवहार से रक्षा 0अनाथ बच्चों की रक्षा 0बच्चों का गोद लेना 0शरणार्थी बच्चों की देखभाल 0विकलांग बच्चों के लिये उचित व्यवस्था 0स्वास्थ्य सेवायें 0स्थानान्तरित बच्चों की नियमित देखभाल 0सामाजिक सुरक्षा 0अच्छा जीवन स्तर 0शिक्षा की व्यवस्था 0शिक्षा सम्पूर्ण विकास के लिये 0अल्पसंख्यक आदिवासी बच्चों की संस्कृति 0क्रीड़ा एवं सांस्कृतिक गतिविधियां 0बाल श्रमिकों की सुरक्षा 0नशीले पदार्थों से बचाव 0यौन शोषण से बचाव0बेचने भगाये जाने पर रोक 0अन्य शोषणों से बचाव 0यातना व दासता पर रोक 0सेना में भर्ती पर रोक 0पुनर्वास व देखरेख 0किशोर न्याय का प्रबन्ध 0उच्चतर स्तर लागू।

इन 41 बाल अधिकारों में से 16 अधिकार भारतीय बच्चों के सन्दर्भ में ज्यादा जरूरी हैं। इन्हें हर भारतीय को जानना भी चाहिये। इसी लिये मैं उन्हीं 16 अधिकारों के बारे में विस्तार से लिख रहा हूं।
1-     जिन्दा रहना एवम विकसित होना:हर बच्चे को जिन्दा रहने का मौलिक अधिकार है।इसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य पर है। हर राज्य इस के लिये नैतिक रूप से बंधा है। राज्य को हर बच्चे के जीवन और विकास को निश्चित करना चाहिये।
2-     कोई भेद भाव नहीं:बिना भेदभाव के हर अधिकार हर बच्चे के लिये लागू होंगे।यह हर राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को किसी भी तरह के भेदभाव से बचाये। उनके अधिकारों को बढ़ाने के लिये उचित कदम उठाये।
3-     मां बाप की जिम्मेदारी:बच्चों को आगे बढ़ाने की पहली जिम्मेदारी मां बाप दोनों पर है राज्य इस काम में उन्हें सहारा देगा।राज्य मां बाप या अभिभावक को बच्चों के विकास के लिये उचित सहायता देगा।
4-स्वास्थ्य सेवायें: बच्चे को उच्चतम स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधायें पाने का अधिकार है।हर राज्य बच्चों को प्रारंभिक स्वास्थ्य की रक्षा,और शिशुओं की मृत्यु दर कम करने पर विशेष बल देगा।
5-अच्छा जीवन स्तर:हर बच्चे को अच्छा जीवन स्तर पाने का अधिकार है। जिसमें उसका पर्याप्त मानसिक,शारीरिक,बौद्धिक,नैतिक और सामाजिक विकास हो सके। उसे पर्याप्त रोटी कपड़ा और मकान मिल सके।
6-विकलांग बच्चों के लिये उचित व्यवस्था:हर अक्षम बच्चे को विशेष देखभाल,शिक्षा,प्रशिक्षण पाने का अधिकार है। जिससे वह सक्षम हो कर अपने समाज का हिस्सा बन जाय।
7-नशीले पदार्थों से बचाव:हर बच्चे को नशीली दवाओं,मादक पदार्थों के उपयोग से बचाए जाने का अधिकार है। राज्य बच्चे को इन दवाओं,नशीले पदार्थों के बनाने बेचने से बचायेगा।
8-शिक्षा की व्यवस्था:हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है। हर राज्य का यह कर्तव्य है कि वह हर बच्चे के लिये प्राथमिक स्तर की शिक्षा निःशुल्क एवम अनिवार्य करे। बच्चों को माध्यमिक स्कूलों में प्रवेश दिलवाये।यथा संभव हर बच्चे को उच्च शिक्षा दिलवाए। विद्यालयों में अनुशासन बच्चों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाला न हो।शिक्षा बच्चों को ऐसे जीवन के लिये तैयार करे जो उसमें समझ,शान्ति एवं सहनशीलता विकसित करे।
9-क्रीड़ा एवं सांस्कृतिक गतिविधियां: बच्चे के सम्पूर्ण विकास में खेलकूद,मनोरंजन, सांस्कृतिक गतिविधियों,विज्ञान का बड़ा हाथ होता है। इसलिये हर बच्चे को छुट्टी,खेलकूद तथा कलात्मक, सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है।बच्चे को ऐसा माहौल प्रदान करना राज्य की जिम्मेदारी है।
10-दुर्व्यवहार से रक्षा: बच्चे को उपेक्षा,गाली,दुर्व्यवहार से बचाये जाने का अधिकार है।राज्य का यह कर्तव्य है वह बच्चों को हर तरह के दुर्व्यवहार से बचाये। पीड़ित बच्चों के सुधार, उचित उपचार के लिये उचित सामाजिक कार्यक्रम चलाये जाने चाहिये।
11-अनाथ बच्चों की रक्षा: अनाथ बच्चों को सुरक्षा पाने का अधिकार है।राज्य का कर्तव्य है कि अनाथ बच्चों के संरक्षण,उनको पारिवारिक माहौल देने वाली संस्थाओं या सही परिवार द्वारा गोद लेने की व्यवस्था करे।
12-बाल श्रमिकों की सुरक्षा:बच्चों को ऐसे कामों से बचाये जाने का अधिकार है जो उसके स्वास्थ्य,शिक्षा,विकास को हानि पहुंचायें। राज्य को बाल मजदूरी और नौकरी की न्यूनतम उम्र तय करने के साथ काम करने का माहौल सुधारना चाहिये।
13-बेचने,भगाने पर रोक:किसी बच्चे को बेचना,बहला फ़ुसलाकर अपहरण करना,या जबरन काम करवाना कानूनी अपराध है। राज्य की नैतिक  जिम्मेदारी है कि वह बच्चे को इनसे बचाये।
14-यौन शोषण से बचाव:हर राज्य की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को यौन अत्याचारों,वेश्यावृत्ति या अश्लील चित्रों के व्यवसाय से बचाये।
15-यातना ,दासता पर रोक:बच्चे को कठोर दण्ड,यातना,गैर कानूनी कैद नहीं दी जा सकती। 18 साल से कम बच्चे को आर्थिक दण्ड,उम्रकैद जैसी सजा नहीं दी जा सकती।बाल कैदियों के साथ क्रूरता,कठोरता का व्यवहार नहीं होना चाहिये।
16-किशोर न्याय का प्रबन्ध:अपराध करने वाले बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार होना चाहिये जिससे उनके आत्मसम्मान,योग्यता,विकास को बल मिले।जो उन्हें समाज के साथ फ़िर से जोड़े। जहां तक संभव हो ऐसे बच्चों को कानूनी कार्यवाहियों या संस्थागत परिवर्तनों से बचाना चाहिये।
बच्चों को दोगे अधिकार,
तब पाओगे उनसे प्यार।
हेमन्त कुमार


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प्रदीप सौरभ की कविता

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

                                       पिता हो गये मां
पिता दहा्ड़ते
मेरा विद्रोह कांप जाता
मां शेरनी की तरह गुत्थमगुत्था करती
बच्चों को बचाती
दुलराती
पुचकारती
मां की मृत्यु के बाद
पिता मां हो गये।

पिता मर गये और मां ने नया अवतार ले लिया
सौ साल पार कर चुकने के बाद भी
वे खड़े रहते
अड़े रहते
वाकर पर चलते
फ़ुदक फ़ुदक
सहारे पर उन्हें गुस्सा आता
वे लाचारगी से डरते।


कभी-कभी अपने विद्रोह पर खिसियाता मैं
क्षमाप्रार्थी के तौर पर प्रस्तुत होता
पिता बस मुस्कुरा देते
अश्रुधारा बह उठती
पिता मां की तरह सहलाते।

फ़िर एक दिन वे मां के पास चले गये
उनके अनगिनत पुत्र पैदा हो गये
कंधा देने की बारी की प्रतीक्षा ही करता रहा मैं
और वे मिट्टी में समा गये।

अक्सर स्मृतियों के झोंके आते
गाहे-बगाहे रात-रात सोने न देते
विद्रोह और पितृत्व की मुठभेड़ में
पितृत्व बार बार जीतता
निरर्थक विद्रोह भ्रम है और पितृत्व सत्य।

पिता मैं भी बना
दो बेटियों का
पिता क्या होते हैं तब यह मैंने जाना।

पिता बरगद होते हैं
पिता पहाड़ होते हैं
पिता नदी होते हैं
पिता झरने होते हैं
पिता जंगल होते हैं
पिता मंगल होते हैं
पिता कलरव होते हैं
पिता किलकारी होते हैं
पिता धूप और छांव होते हैं
पिता बारिश में छत होते हैं
पिता दहाड़ते हैं तो शेर होते हैं।
000
                                                                                                                                                                                       
                                                                    प्रदीप सौरभ:पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में विशेष संवाददाता।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक। मुन्नी मोबाइल उपन्यास काफ़ी चर्चित। तीसरी ताली   उपन्यास प्रकाशनाधीन।कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबाद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार। 
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।



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हिन्दी ब्लाग के स्तंभ

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

                        हिन्दी में अन्तर्जाल पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है और काफ़ी अच्छा लिखा जा रहा है। यहां मैं उन कुछ खास ब्लाग्स की चर्चा कर रहा हूं जहां पहुंच कर आपको निश्चित रूप से पाठकीय सन्तुष्टि का अनुभव होगा।
                   सबसे पहले तो मैं बात करूंगा देवाशीष जी की वेबसाइट हिन्दी ब्लाग्स डाइरेक्ट्री की। यह अपने आप में एक अनूठा और प्रशंसनीय काम है देवाशीष जी का। आप को इस ब्लाग डाइरेक्ट्री पर दुनिया भर में लिखे जा रहे हिन्दी ब्लाग्स की अद्यतन सूची मिल जायेगी।जहां से आप हर ब्लाग पर पहुंच सकते हैं।अब आती है बात ब्लाग्स की तो मैं यहां हिन्दी के कुछ चुनिन्दा ब्लाग्स की संक्षिप्त जानकारी दे रहा हूं।

1--गंगा किनारे अजब सी मानसिक हलचल
             इस ब्लाग के लेखक श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी पेशे से रेलवे में यातायात प्रबन्धक हैं।लेकिन उनका मन एक कवि और साहित्यकार का है।रेलवे की पटरियों के साथ ही आस पास,समाज,देश,साहित्य और संस्कृति में होने वाली हलचल ज्ञानदत्त जी के मन को उद्वेलित करती है और इस उद्वेलन को वे बाकायदा अपने ब्लाग में दर्ज करते हैं। बात चाहे ककड़ी,खीरा चकोतरा बेचने वाले की हो या गंगा किनारे के नाविक ,मछुवारों के खोजी बच्चों की।साहित्य हो या फ़िर किसी नयी पुस्तक की चर्चा,तीज त्योहार,मेले ,उत्सव सभी कुछ इनके ब्लाग पर आपको पढ़ने को मिलेगा।
 2- एक मुकम्मल पत्रिका है मानसी ब्लाग
          मानसी ब्लाग को यदि एक मुकम्मल पत्रिका कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।कारण ,ज्यादातर ब्लोग किसी एक ही विधा में लिखे गये हैं।लेकिन इस ब्लाग में संवेदनात्मक कवितायें हैं तो मन को उद्वेलित करने वाली कहानियां भी हैं।एक ओर पद्य की विभिन्न विधाएं---कविता,गज़ल,दोहे,भजन,काव्यानुवाद के साथ ही जापान की प्रचलित काव्य विधा हाइकु हैं दूसरी ओर  कहानी, संस्मरण,लघुकथा, लेख,सांस्कृतिक समाचार,अनुभव आदि भी हम पढ़ सकते हैं।
  मानोशी एक सफ़ल अध्यापिका के साथ कुशल लेखिका भी हैं।यह बात उनके शिक्षा ,बाल मनोविज्ञान से संबन्धित लेखों को पढ़ कर हम समझ सकते हैं।इतना ही नही यदि हम इनके लेखों की भाषा ,शिल्प पर ध्यान दें तो भी इस ब्लाग पर प्रकाशित रचनाओं में हमें एक नयापन दिखाई देता है।
3-दो संस्कृतियों के मध्य एक सेतु----चोंच में आकाश
                    दो संस्कृतियों को जोड़ना अपने में एक कठिन काम है।पर इस काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं पूर्णिमा बर्मन इस ब्लाग के माध्यम से।पूर्णिमा जी ने नेट पर उस समय अपने हस्ताक्षर बनाये थे जब नेट पर हिन्दी लिखना बहुत कठिन था।ब्लाग में आपको भारत के साथ पूरे यू ए ई के रीति रिवाजों त्योहारों रहनसहन,खानपान की रोचक जानकारियां मिल जायेंगी।आपको अन्तर्राष्ट्रीय चरित्रों बार्बीडाल,डोनल्ड डक के बारे में भी रोचक लेख मिलेंगे।पूर्णिमा संवेदनशील कवियत्री भी हैं।प्रकृति,समाज देश को लेकर इनके मन में होने वाली उथलपुथल इनकी कविताओं में पढ़ सकते हैं
4-कस्बे में समायी है एक पूरी दुनिया
             कस्बा सिर्फ़ ब्लाग नहीं एक पूरी दुनिया है रवीश जी की वैचारिक उथल पुथल,
मानसिक मन्थन और प्रतिबद्धताओं की। यह ब्लाग बताता है कि वे सिर्फ़ एक टी वी पत्रकार ही नहीं बल्कि उससे बहुत ऊपर मानवता के पुजारी हैं।उनके अन्दर एक बहुत कोमल हृदय कवि भी है।
           कस्बा में आपको एक तरफ़ राष्ट्रीय,अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति,समाज,धर्म,संस्कृति,बोली, भाषा पर रोचक विचारोत्तेजक लेख मिलेंगे।जो आपको काफ़ी कुछ सोचने पर मजबूर कर देंगे।दूसरी ओर फ़िल्म समीक्षायें,स्लोगन्स,शिक्षा से जुड़ी और पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती टिप्पणियां। कभी कभी आपको लगेगा कि हम ब्लाग पढ़ रहे हैं या फ़िर किसी फ़ोटो एक्जीबिशन में घूम रहे हैं।मतलब यह कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हर चर्चा आपको यहां मिलेगी।
            और इन सबसे अलग आपको रवीश जी के कवि हृदय को आप उनकी कविताओं के माध्यम से पढ़ सकते हैं।इस ब्लाग पर प्रकाशित कई कविताओं में से एक है बाबू जी का मकान और मकान में उनका फ़्रेम।इस कविता को जितनी बार मैने पढ़ा मेरी आंखों में आंसू आये ------अब आप भी पढ़ कर देखिये।                                                                         5-गीत,गज़ल,लेख का अनोखा संगम उड़न तश्तरी
               जहां न जाये रवि वहां जाये कवि।इस ब्लाग के लिये यह बात सच है।यहां आप छोटी बातों पर लेख पढ़ सकते हैं जिन्हें आपने सोचा नहीं होगा। एक तरफ़ रोचक लेख मिलेंगे दूसरी ओर गम्भीर गजलें कवितायें।एक तरफ़ समीर जी की ब्लागरों के साथ चलने वाली जुगलबन्दी हैं दूसरी ओर देश विदेश की सांस्कृतिक गतिविधियों की झलकियां। ऊपर से समीर जी की सरल भाषा और प्रवाहमयी शैली पढ़ने के आनन्द को दोगुना कर देती है।इनके लेखन की खासियत है कि वो अपने लेख किसी छोटी सी बात से शुरू करके उसे किसी गजल,कविता के साथ पूर्णता तक पहुंचाते हैं। ब्लाग सचमुच उड़न तश्तरी ही है।
6-प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी की दिशा में एक कदम----प्राइमरी का मास्टर
     किसी भी देश के भविष्य का पूरा दारोमदार वहां की प्राथमिक शिक्षा पर होता है। हमारे देश में सरकारी ,गैरसरकारी स्तरों पर प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिये काफ़ी कोशिशें हो रही हैं।इनसे अलग हटकर एक प्राथमिक शिक्षक इस विषय में क्या सोचता है,क्या चाहता है यह जानने के लिये हमें प्राइमरी का मास्टर ब्लाग जरूर पढ़ना चाहिये।पेशे से प्राथमिक शिक्षक प्रवीण त्रिवेदी ने अपने इस ब्लाग में प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर पहलू को बखूबी उठाया है।फ़तेहपुर जैसी छोटी जगह पर रहने के बावजूद दुनिया भर की प्राथमिक शिक्षा और बच्चों से जुड़ी हर कोशिश,हर खबर ,हर शोध पर इनकी नजर रहती है।
7-बाल कल्पनाओं की उड़ान-- बाल सजग
 बाल अधिकारों में एक अभिव्यक्ति की आज़ादी भी है।यानि हर बच्चा हम बड़ों से अपनी बातें कहने के लिये स्वतंत्र है।इसी आजादी से हम उन्हें दूर रखते हैं।खासकर उन बच्चों को जिनका पूरा दिन दाल रोटी के जुगाड़ में बीतता है।बाल सजग ऐसे ही बच्चों के सपनों को साकार करने की एक कोशिश है।इसमें बच्चे ही सम्पादक,लेखक,चित्रकार सब कुछ हैं।और ये वो बच्चे हैं जो अपने माता पिता के साथ ईंट भट्ठे पर सारा दिन काम करते हैं।लेकिन इन बच्चों की कल्पनाओं,सपनों की ऊंची उड़ान हम इनकी रचनात्मकता में देख सकते हैं।इन बच्चों की कल्पनाओं में पंख लगाने का पूरा श्रेय महेश कुमार और सिरीश को है।काश कि महेश और सिरीश जैसी लगन हर भारतीय में पैदा हो जाय।
                                                 इन सभी ब्लाग्स पहुंचने का रास्ता नीचे लिखा है। आप इन पर क्लिक
करके इन ब्लाग्स पर पहुंच सकते हैं----
1-हिन्दी ब्लाग डाइरेक्ट्री---http://www.hindiblogs.org/
2- मानसिक हलचल---http://halchal.gyandutt.com/
4- चोंच में आकाशhttp://purnimavarman.blogspot.com/
5- कस्बाhttp://naisadak.blogspot.com/
6-उड़न तश्तरीhttp://udantashtari.blogspot.com/
7प्राइमरी का मास्टरhttp://primarykamaster.blogspot.com/
8बाल सजग--http://balsajag.blogspot.com/
                                                                   000000000
हेमन्त कुमार

              

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भयाक्रांत

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

उसकी आंखों की
पुतलियों में
अब नहीं होती
कोई हलचल
सतरंगे गुब्बारों
और लाल पन्नी वाले
चश्मों को देखकर।

नहीं फ़ड़कते हैं अब
उसके होंठ
बांसुरी बजाने के लिये
नहीं मचलती हैं उसकी उंगलियां
रंगीन तितलियों के मखमली स्पर्श
को महसूस करने के लिये।

उसके पांवों में
नहीं होती है कोई हलचल
अब
गली में मदारी की
डुगडुगी की आवाज सुनकर
नहीं उठती है उसकी गुलेल
कच्ची अमियों पर निशाना
लगाने के लिये।

पिछ्ले कुछ दिनों से
उसकी आंखों में
जम गया है खून
होठों पर लग गया है ताला
लग गयी है जंग
हाथों और पांवों में।

जबसे उसने देखा है
अपने गांव की कच्ची गलियों में
फ़ौलादी मोटरों की कवायद
सगीनों की चमक
और बारूद के धमाकों के बीच
अपनी बूढ़ी दादी और बड़ी बहन
की लाशों को
खाकी वर्दी द्वारा
घसीटे जाते हुये।
0000000
हेमन्त कुमार

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आज के संदर्भ में कल

शनिवार, 4 सितंबर 2010

           आज शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर सभी गुरुजनों को हार्दिक शुभकामनायें।आज मैं आदरणीय प्रताप सहगल जी की काफ़ी पहले लिखी गयी यह कविता प्रकाशित कर रहा हूं,क्योंकि यह आज भी उतनी ही सार्थक है जितनी 30 वर्षों पूर्व थी।     

आज के संदर्भ में कल


सड़कों पर घूमते हुये एकलव्य
खोज रहे हैं द्रोण को
और द्रोण न जाने किन अन्धी गुफ़ाओं में
या यूतोपियाई योजनाओं में
खोया हुआ खामोश है।

लाखों एकलव्य अपनी अपनी पीड़ा ढोते हुये
प्रकाश किरणों को पकड़ने का करते हैं प्रयास
और रोशनी के किसी भी स्तूप को नोच लेते हैं
मिनियेचर ताजमहलों को
अपने हाथों में दबाये
समुद्र पार के देशों की ओर करते हुये संकेत
शान्ति यात्राओं में लौट आते हैं
विस्फ़ोटक पदार्थ से भरे हुये हाथों सहित
मेरे देश के एकलव्य
द्रोण की खोज में
और द्रोण न जाने किन दिशाओं में खो गया है।


कल आज में परिवर्तित
होने वाला है कल
चक्राकार घूमता हुआ ग्लोब
चपटियाता हुआ भी चक्रबद्ध रहेगा
आलोक स्तंभ बुझ जायेगा
किसी मनु की प्रतीक्षा में
और मेरे देश के एकलव्यों को
तब भी जरूरत होगी द्रोण की
और द्रोण न जाने किन अतल गहराइयों में सिमट जायेगा।
00000

                   






कविप्रताप सहगल
 आदरणीय प्रताप सहगल जी हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि नाटककार एवम उपन्यासकार हैं।प्रताप सहगल जी के अब तक कई नाटक,कविता संग्रह एवम उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।आप इस समय दिल्ली विश्व्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह कविता प्रताप जी के चर्चित काव्य संग्रह सवाल अब भी मौजूद है से ली गयी है।


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हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

        इधर मुझे लगातार हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित कई सेमिनारों,गोष्ठियों और सम्मान समारोहों में जाने का अवसर मिला है।इन गोष्ठियों,सेमिनारों में खूब गरमागरम बहसें हुयीं,साहित्यिक चर्चायें हुयीं।हिन्दी साहित्य पर मंडरा रहे इन्टरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के खतरों की बातें भी की गयीं----लेकिन ये चर्चायें काफ़ी आधी अधूरी सी लगींइनमें कुछ कमी खटक सी रही थी। और वह कमी थी हिन्दी के बाल साहित्य की चर्चा।
            आज जब कि प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा जा रहा है,प्रकाशित भी  हो रहा है। ऐसे में किसी भी सेमिनार,संगोष्ठी साहित्यिक समारोह में बाल साहित्य की चर्चा न होना इस बात का द्योतक है कि आज भी हिन्दी साहित्य के मठाधीश बाल साहित्य को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखते। इतना ही नहीं आप हिन्दी साहित्य के इतिहास और आलोचनाओं से सम्बन्धित पुस्तकें उठा कर देखिये उसमें भी कहीं बाल साहित्य की चर्चा नहीं मिलेगी,या मिलेगी भी तो बहुत नाम मात्र की।
         जब कि वास्तविकता यह है कि खड़ी बोली हिन्दी के आरंभिक काल से ही बाल साहित्य लिखा जा रहा है।सभी बड़े साहित्यकारों ने भी थोड़ा बहुत तो बाल साहित्य लिखा ही है।चाहे वह बच्चों को उपदेश देने के लिये लिखा हो अथवा मनोरंजन के लिये। महादेवी वर्मा,डा0रामकुमार वर्मा,सुमित्रा नंदन पंत,मुंशी प्रेमचन्द सभी ने बच्चों के लिये साहित्य लिखा है।लेकिन उनके इस साहित्य को भी बड़ों के ही साहित्य में ही स्थान दिया गया।
                       उस समय भी बाल साहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य ही माना जाता था।इतना ही नहीं उस समय बहुत से साहित्यकारों की यह सोच भी थी कि जो साहित्यकार बड़ों के लिये साहित्य लिखने में असफ़ल हो जाते हैं वो बाल साहित्य लिखना शुरू कर देते हैं। जबकि वास्तविकता इस तथ्य से कोसों दूर है। बाल साहित्य लिखना सामान्य साहित्य लिखने की अपेक्षा बहुत कठिन है।बाल साहित्य वही लिख सकता है जिसे बाल मनोविज्ञान के साथ ही बच्चों की भावनाओं,संवेदनाओं, उनकी  रुचियों अरुचियों के साथ ही उनके स्तर की भाषा की समझ हो। बाल साहित्य लिखने के लिये लेखक को खुद भी बच्चा बनना पड़ता है।
                         आज की समस्या यह है कि बाल साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है। प्रकाशित भी हो रहा है।लोगों में बाल साहित्य को लेकर काफ़ी जागरूकता,उत्सुकता सभी कुछ है। (अब यह जरूर है कि लिखा जा रहा पूरा बाल साहित्य बच्चों के लिये उपयोगी नहीं है। कुछ बाल साहित्यकार तो बहुत अच्छा साहित्य लिख रहे हैं कुछ घटिया। और यह स्वाभाविक भी है।) लेकिन---फ़िर भी बाल साहित्य को वह दर्जा नहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिये। आज भी बाल साहित्य मुख्य धारा से हटकर हाशिये पर ही पड़ा है।यह तो हुयी बाल साहित्य को पहचान मिलने की समस्या।
                 इसके अलावा भी बाल साहित्य के ऊपर कई संकट हैं।मसलन प्रकाशन,पुस्तकों के आकर्षक उत्पादन और सबसे बढ़ कर बच्चों तक पुस्तकें पहुंचने की।बच्चों के लिये प्रकाशित ज्यादातर किताबों का उत्पादन इतने घटिया स्तर का रहता है कि बच्चे उन्हें पढ़ने के लिये आकर्षित ही नहीं होंगे। ज्यादातर प्रकाशक बाल साहित्य सिर्फ़ सरकारी खरीद के लिये प्रकाशित करते हैं।
                     बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट,चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट,और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग का योगदान महत्वपूर्ण है। इनके अलावा कुछ एन जी ओ जैसे प्रथम बुक्स,नालन्दा,एकलव्य आदि भी बच्चों तक अच्छी आकर्षक और बढ़िया किताबें पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इन संगठनों द्वारा प्रकाशित बच्चों का साहित्य विषयवस्तु और साज सज्जा दोनों ही दृष्टियों से बेहतरीन कहा जा सकता है।
       कुछ प्राइवेट प्रकाशक भी बच्चों की अच्छी किताबें छाप रहे हैं। लेकिन दिक्कत वही है इन किताबों की पहुंच बच्चों तक नहीं हो पा रही है। ये किताबें भी या तो सरकारी खरीद में जाकर पुस्तकालयों की आल्मारियों में बन्द हो जा रही हैं या फ़िर महंगी होने के कारण बच्चों के अभिभावकों की जेब से बाहर हैं।
                 यद्यपि बच्चों तक किताबें पहुंचाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट का बाल साहित्य केन्द्र(एन सी सी एल) काफ़ी प्रयास कर रहा है। इसकी तरफ़ से देश भर में स्कूलों के साथ ही मुहल्लों में भी पाठक मंचों की स्थापना करवाई जा रही है। तथा उन केन्द्रों को एन बी टी अपने प्रकाशनों के साथ ही दूसरे प्रकाशकों की भी बच्चों की अच्छी किताबें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करा रहा है। साथ ही कई एन जी ओ भी गांवों के साथ ही झुग्गी,झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के लिये बाल साहित्य उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय हैं। फ़िर भी सरकारी स्तर पर इन कार्यक्रमों को और गति देने की जरूरत है।
                      मेरे विचार से हिन्दी बाल साहित्य को हाशिये पर से उठा कर साहित्य की मुख्य धारा में लाने के लिये सरकारी स्तर पर निम्न लिखित प्रयास होने चाहिये।
0 बाल साहित्यकारों को भी साहित्य की मुख्य धारा में स्थान दिलवाना।
0 अच्छा बाल साहित्य लिखने के लिये उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था।
0 लिखे जा रहे श्रेष्ठ बाल साहित्य के आकर्षक उत्पादन एवम प्रकाशन की
   व्यवस्था।
0 चूंकि बच्चों की किताबों की डिजाइनिंग,ले आउट, और उत्पादन पर ज्यादा
  खर्च आता है। इसलिये बाल साहित्य के प्रकाशकों को बढिया स्तर का
  कागज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराने, सस्ती दरों पर किताबों के छपाई
 की व्यवस्था ---अथवा बच्चों के लिये आकर्षक किताबें छापने वाले 
 प्रकाशकों के लिये सरकार की तरफ़ से सब्सीडी देने की व्यवस्था।
 0 और सबसे अन्तिम और मह्त्वपूर्ण बात यह कि प्रकाशित अच्छे बाल साहित्य को बच्चों के हाथों तक पहुंचाने की व्यवस्था।
              यदि हमारी सरकार इन बिन्दुओं पर कुछ ध्यान दे तो सम्भवतः हिन्दी के  बाल साहित्य को उचित दिशा और स्थान मिल सकेगा।
                        00000000
हेमन्त कुमार 

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बारिश का मतलब

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

बारिश का मतलब
नहीं होता सिर्फ़
गरम गरम पकौड़ी और चाय
हंसी ठहाका और तफ़रीह
या फ़िर लार्ज या स्माल पेग और मुर्गा
साथ में राजनीति
सास बहू या कहानी घर घर की पर
चर्चा और लफ़्फ़ाजी।

बारिश का मतलब होता है
झोपड़ी के कोने में
पूरे कुनबे का गुड़मुड़िया कर
एक ही बंसेहठी पर बैठना
चारों ओर से फ़टी पालीथिन की छत से
टपकते पानी को एकटक निहारना
झोपड़ी में भर गये पानी में
तैरते हुये खाली बरतनों को देखना
और अररा कर बरस रहे मेघ को
भयभीत नजरों से निहारना।

चिन्ता इस बात की करना कि
पूरा कुनबा
इस झर झर बारिश में
कहां सोयेगा
झोपड़ी के किस कोने में परबतिया
जलायेगी चूल्हा
कहां पकायेगी रोटी
कि भर सके पूरे कुनबे का पेट।

बारिश का मतलब होता है
इस बात की चिन्ता भी कि अगर
हवा और तेज हुयी
फ़िर भरभरा कर गिर जायेगी
कच्ची माटी की भीत तो
पूरा कुनबा शहर के किस कोने में
शरण लेगा
किसी खाली बस स्टैन्ड के शेड के नीचे
नगर निगम के ह्यूम पाइप में
या फ़िर किसी निर्माणाधीन इमारत के बराम्दे में।

बारिश का मतलब होता है
हरखू की चिन्ता
इस बात की कि कल
जब सबके खेतों में चलेगा हल
तो कैसे जोतेगा वह खेत
बिना बैलों के
कहां से आयेगा बीज बोने के लिये।

लेकिन हमें क्या मतलब है
हरखू या परबतिया की चिन्ता से
हमारे लिये तो बारिश का मतलब ही है
बालकनी में बैठकर
चाय या व्हिस्की की चुस्कियां
मुर्गे की टांग या पकौड़ी
और झमाझम बौछार का आनन्द उठाना।
000
हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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