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यादें झीनी झीनी रे(आत्मीय संस्मरण)

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

(आज 31 जुलाई को मेरे पिता जी प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की पुण्य तिथि है।2016 की 31 जुलाई को ही 87 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था।इस बार कोरोना संकट को देखते हुए मैं उनकी स्मृति में कोई साहित्यिक आयोजन भी नहीं कर पा रहा।मेरे बड़े भाई तुल्य प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय कौशल पाण्डेय जी का यह बेहद आत्मीय संस्मरण ”बालवाटिका” के श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव पर केन्द्रित मार्च-2019 अंक में प्रकाशित हुआ था।आज इसे अपने ब्लॉग क्रिएटिवकोना पर मैं पुनः प्रकाशित कर रहा हूं।डा०हेमन्त कुमार)  

 



          यादें झीनी झीनी रे----



       

दिसंबर १९८५ के अंतिम सप्ताह की एक सर्द भारी शाममैं इलाहाबाद के अल्लापुर मोहल्ले की भूल-भुलैया जैसी गलियों में अपने एक मित्र के साथ एक पर्ची पर लिखे पते को तलाश रहा था।उस पर लिखा था श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव,90-ए/17एस,बाघम्बरी गद्दी के पीछे,(अल्लापुर)इलाहाबाद।और यह पर्ची देने वाले थे आकाशवाणी इलाहाबाद में मेरे सहयोगी राम पाण्डेय।दरअसल मुझे आकाशवाणी इलाहबाद में ज्वाइन किये करीब एक वर्ष हो चुका था,पर जिस घर में मैं किराए पर रह रहा था वह काफी बंद-बंद सा था।मुझे एक ऐसे घर की तलाश थी जहां हवा और धूप का खुलकर सेवन कर सकूं।यह बात जब मैंने अपने सहयोगी राम पाण्डेय को बताई तो राम पाण्डेय ने मुझसे एक दिन कहा कि, “मैं एक घर का पता दे रहा आप जा कर देख लीजिये।”बस मैं मकान की खोज में निकल पड़ा था।बेतरतीब नंबरों वाले मोहल्ले में भी नाम बताने पर घर आसानी से मिल गया।दरवाजा खटखटाया तो अन्दर से एक दुबले पतले और थोड़ा लम्बे व्यक्ति ने जब दरवाजा खोला तो मैंने अपनी बात बताई।वह श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव से मेरी पहली मुलाक़ात थी।उन्होंने घर का वह ऊपरी हिस्सा दिखाया जो उन्हें किराए पर देना था।चाय पिलाई और अपने परिवार के बारे में बताया तथा मेरे परिवार के बारे में जानकारी ली।साथ ही एक दिन सोचने का मौक़ा भी माँगा। संभवतः वह राम पाण्डेय से मेरे बारे में और विस्तार से जानना चाहते होंगे।अगले ही दिन वह सुबह-सुबह राम पाण्डेय से घर पर मिलते हुए बाद में मेरे पास दफ्तर आये और बोले कि, “आप जिस दिन चाहें सामान लेकर रहने आ जाएं।”

   अगले दिन मैं पत्नी और बच्चों को घर दिखाने ले गया।पत्नी की ओर से थोड़ी ना-नुकुर हुई कि घर मुख्य सड़क से काफी अन्दर है।अंततःघर का खुलापन और घर के लोगों का सरल स्वभाव इस एक पर भारी पड़ा और हम लोग एक सप्ताह बाद ही वहां शिफ्ट हो गए।5,जनवरी 1986 को मेरा इलाहाबाद का स्थानीय पता हो गया---श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का मकान,बाघम्बरी गद्दी के पीछे...जो कि मेरे इलाहाबाद छोड़ने तक बराबर बना रहा।यहाँ तक कि अगस्त-1990 में इलाहाबाद से मुंबई स्थानान्तरण के करीब दो वर्ष बाद तक भी।इस दौरान मैं मुंबई रहा और मेरा परिवार अकेले इलाहाबाद में।उन दिनों वो ऊ०प्र० सरकार के राज्य शिक्षा संस्थान में शोध प्राध्यापक थे और आकाशवाणी के नियमित नाटककार।बाद में पता चला कि उनके लेखन की शुरुआत पचास के दशक में ‘धर्मयुग’और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में कहानियां लिखने से हुयी थी।और फिर धीरे-धीरे यह भी पता चला कि वो जितने बड़े रेडियो नाटककार हैं उससे भी कहीं ज्यादा योगदान उनका बाल साहित्य लेखन में है।वो बहुत संकोची स्वभाव के थे।इसीलिए प्रायः अपने लेखन के बारे में चर्चा कम ही करते थे।लगभग तीन सौ रेडियो नाटक और पचास के करीब बाल साहित्य की पुस्तकें लिखने के बावजूद—मैंने कभी यह नहीं सुना या देखा कि उन्होंने कभी किसी से अपनी किताबों पर समीक्षा या चर्चा करने को कहा हो।रडियो की नौकरी के नाते मैं उन्हें केवल रेडियो नाटककार के रूप में ही जानता था।उनके तमाम नाटक आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण का हिस्सा रहे।सुप्रसिद्ध नाटककार और आकाशवाणी के तत्कालीन महानिदेशक स्व० जगदीश चन्द्र माथुर का वह पत्र भी मैंने उनकी पुरानी फ़ाइल में देखा जिसके द्वारा उन्होंने इनसे रेडियो के लिए लिखते रहने का अनुरोध किया था।

   उन्होंने शिक्षा विभाग में हिन्दी प्रवक्ता के रूप में नौकरी की शुरुआत की थी।बाद में 1964 में शिक्षा प्रसार विभाग में पहले प्रचार अधिकारी फिर पटकथा लेखक हुए।और करीब दो-ढाई सौ वृत्त चित्रों के लिए पटकथाएं लिखीं।सेवानिवृत्त होने के कुछ समय पहले वह प्राथमिक कक्षाओं की हिन्दी पाठ्य पुस्तकों के निर्माण कार्य से भी जुड़े थे।बाद में भी कई वर्षों तक वह इस कार्य से जुड़े रहे।

       उनकी देखा-देखी मैंने भी उन्हीं दिनों बच्चों के लिए लिखना शुरू किया।खूब बाल कवितायेँ लिखीं।मेरी कवितायेँ पराग,बाल भारती,बालहंस,दैनिक जागरण में खूब छपीं।उन्होंने मेरी हर कविता पढी,सराहा,पर कमी निकालने के भाव से या कभी संशोधन करने के लिए नहीं कहा।सच पूछा जाय तो मैं आज तक उन रिश्तों को कोई नाम नहीं दे पाया जो उनके घर में रहते हुए मेरे और उनके बीच तथा उनके घर के अन्य सदस्यों के बीच पनपे।अम्मा जी के सरल स्वभाव ने कभी भी हम दोनों को माँ,और बच्चों को दादी की कमी खलने नहीं दिया।अनायास ही मैं उस परिवार का सबसे बड़ा भाई बन गया।डा०मुकुल,डा०हेमन्त,डा०कविता और सबसे छोटी अलका सभी मेरे बच्चों के प्रिय चाचा और बुआ।और हम दोनों सबके भैया-भाभी।इन सभी की शादियों में सारे रीति-रिवाजों के साथ परिवार की तरह सहभागिता रही हम सभी की।

      घर में सब की ही तरह श्रीवास्तव जी को मैं भी भाई कहता था पर राय- मशविरे के समय वे मुझे सबसे करीबी मित्र की तरह काम आते थे। और किसी समस्या के समय पिता की ही तरह मैं उनका हाथ अपने कंधे पर रखा हुआ पाता था।अगस्त 1990 में उनके घर में रहते हुए मेरा स्थानान्तरण इलाहाबाद से मुंबई हो गया।मैं जाना नहीं चाहता था,पर काफी प्रयासों के बाद न तो मेरा स्थानान्तरण निरस्त हुआ और न ही स्थान बदला गया।मैं अकेले ही दुखी मन से मुम्बई गया।बच्चे बहुत छोटे थे।मुम्बई में परिवार रखने लायक आवास की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी।इसके करीब डेढ़-पौने दो बरस तक मेरा परिवार उन्हीं के घर में इलाहाबद में ही रहा।परिवार की देख-भाल के लिए मैं हर डेढ़-दो महीने पर इलाहाबाद आता था।कभी ऐसा नहीं हुआ कि वे मुझे स्कूटर से स्टेशन छोड़ने न गए हों।हर बार कंधे पर रखा उनके आश्वासन का हाथ मुझे मुम्बई में बराबर यह तसल्ली देता था कि इलाहाबाद में मेरे परिवार को कोई भी दिक्कत उनके रहते नहीं आयेगी।यह धर्म उनहोंने मेरी गैर मौजूदगी में हमेशा निभाया।अंततः जून 1992 में मैंने वह घर खाली कर दिया।

   बाद में 1996 से 2000 तक पुनः इलाहाबाद रहा पर अकेले ही।उनका बराबर आग्रह रहा कि मैं उनके घर कभी भी रहने आ सकता हूं।पर ऐसा हो नहीं पाया।हाँ ये जरूर है कि उनसे मेरा बराबर मिलना होता रहा।वो कभी आकाशवाणी में या कभी हमारे आफिस के आस-पास आते तो बिना मुझसे मिले न जाते।और मौक़ा मिलने पर मैं  भी भाई के घर पहुँच जाता।पर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि भोजन किये बिना उन्होंने मुझे वापस आने दिया हो।

   इलाहाबाद से दिल्ली और फिर पुणे रहते हुए मिलना तो कम रहा पर फोन पर खूब बातें होती थीं।अक्टूबर 2012 में अपने बड़े बेटे डा०मुकुल के रोड एक्सीडेंट में असामयिक निधन के बाद वो बिल्कुल टूट से गए थे।अम्मा जी का स्वास्थ्य भी काफी नाजुक स्थिति में आ गया।लगभग तीन साल तक बिस्तर पर रहने के बाद नवम्बर 2013 में अम्मा जी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।भाई की मनःस्थिति भी अच्छी नहीं रही।पर इतने झंझावातों के बाद भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा।उस दौरान भी लेखकीय सक्रियता उन्हें बहुत बल दे रही थी।

   मैं भी मई 2013 में पुणे से गोरखपुर आ गया था।पर उन दिनों  मैं भी कुछ पारिवारिक समस्याओं से बुरी तरह घिरा था।अक्सर गोरखपुर से कानपुर आना-जाना होता ही था।कार से आने-जाने के कारण लखनऊ रुकना आसान होने लगा।दिसंबर 2012 से वो भी स्थाई रूप से छोटे बेटे डा० हेमन्त के पास लखनऊ में ही रहने लगे थे।अक्सर मैं लखनऊ में उनसे मिलते हुए ही गोरखपुर जाता ।उन्हीं दिनों 2012 में उनका बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” नेशनल बुक ट्रस्ट से छप कर आया था।मुझे उसकी प्रति भेट करके उन्होंने उपन्यास पढने का आग्रह किया।मुझे अच्छा लगा कि मैंने उसकी समीक्षा लिखी और वह एक अच्छी पत्रिका में छपी।बीमारी की हालत में भी मेरी समीक्षा पढ़कर वो फोन करके धन्यवाद देना न भूले।

    इस बीच मैं मार्च 2015 में ट्रांसफर होकर तीसरी बार फिर इलाहाबाद आ गया था।मेरी सिर्फ डेढ़ वर्ष की नौकरी बची थी।उधर वर्ष 2016 की शुरुआत से ही उनका स्वास्थ्य काफी गड़बड़ रहने लगा था।घुटनों की तकलीफ काफी बढ़ गयी थी।अब बिना वाकर की सहायता के उनका चलना-फिरना बहुत मुश्किल हो गया था।इस दशा में भी वो बच्चों की कहानियां लिखते रहे,और कुछ प्रकाशित भी हो रही थीं।दिसंबर 2012 में लखनऊ आने के बाद उनकी कुछ बाल कहानियाँ नंदन,बालवाणी,सुमन सौरभ,बाल भारती में छपीं भी।तीन चार बड़ों की कहानियां कथा-क्रम,जनसत्ता(दीपावली विशेषांक),चौथी  दृष्टि जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुयी थीं।उनकी लेखन ऊर्जा और सक्रियता देख कर बहुत खुशी होती थी।

    अचानक एक दिन मेरे पास उनका फोन आया।शायद 25जुलाई 2016 का दिन था वो।उस दिन मैं कानपुर में था।बहुत ही भावुक होकर निराशा भारी बातें करने लगे।मुझसे मिलने की इच्छा भी व्यक्त की।अगले दिन ही मैं सुबह-सुबह लखनऊ उनसे मिलने पहुँच गया।उस दिन उन्होंने मुझसे जी भर कर बातें की।खूब खुश हुए।सबका हाल पूछा।मेरा हाथ पकड़कर काफी देर बैठे थे।खुद भोजन नहीं किया पर मुझे भोजन करते देखते रहे,खुश होते रहे।फिर मिलने का वादा करके मैं भारी मन से कानपुर लौट आया।क्या पता था कि ये हम लोगों की आखिरी मुलाक़ात थी।

    31 जुलाई की रात्रि में डा०हेमन्त का फोन आया कि भाई नहीं रहे।अगले दिन वो उनका पार्थिव देह लेकर इलाहाबाद पहुंचेंगे।बहुत कष्टकारक बात ये हुयी कि डा०हेमन्त ने अपने जन्मदिवस यानि 1 अगस्त को ही अपने पिताश्री को मुखाग्नि दी।शायद ईश्वर को यही मंजूर था।अगस्त 2016की अंतिम तारीख को मेरी सेवानिवृत्ति भी हो गयी।

   कितनी विचित्र बात हुयी कि इलाहाबाद शहर से मेरा रिश्ता उन्हीं के साथ जुडा  और उनके जाने के साथ ही ख़त्म भी हो गया।

                    ०००००

० कौशल पाण्डेय


परिचय:जन्म 3 अगस्त 1956 अन्किन कानपुर।1977 से बच्चों एवं बड़ों के लिए भारत की स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में लेखन।प्रकाशित पुस्तकें: “जंगल की और”, “सोन मछरिया गहरा पानी”(बाल कवितायें), “पासा पलट गया”(बाल नाटक मराठी में भी अनूदित), “बाल साहित्यकार-कौशल पाण्डेय:सृजन और संवाद”, “शेष कुशल है”, “इतना छोटा सफ़र”(कहानी संग्रह), “प्रयोजनमूलक हिन्दी:विविध सन्दर्भ(संपादित लेख संग्रह)।देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से समादृत।सदस्य-,हिन्दी पाठ्यक्रम समिति (महाराष्ट्र सरकार)।34 वर्षों ताका आकाशवाणी में सहायक निदेशक राज  भाषा पद पर कार्य कर के सेवानिवृत्त।सम्प्रति स्वतन्त्र लेखन।      

संपर्क:1310-ए,बसंत विहार,कानपुर-208021 मोबाइल नंबर-9532455570          

                                          

               


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हमारे जनप्रतिनिधियों को जरूर पढनी चाहिए यह किताब ---“आनन्द नगर”

मंगलवार, 30 जून 2020


हमारे जनप्रतिनिधियों को जरूर पढनी चाहिए यह किताब
    त्याग,सेवा समर्पण की गाथा--डोमिनिक लापिएर कृत-आनन्द नगर
                                                                         



           हमारे देश में वैसे तो प्राचीन काल से लोगों में दीन दुखियों,गरीबों के प्रति सेवा और सहृदयता का भाव रहा है।लेकिन पिछले दो दशकों में गरीबों,दुखियों की सेवा करने की भावना व्यक्तियों से हटकर संस्थाओं में समाहित होती जा रही है।संस्थाओं से मेरा तात्पर्य एन जी ओ यानि स्वयं सेवी संगठनों से है।हाल के वर्षों में हमारे देश में इतनी तेजी के साथ हजारों की संख्या में एन जी ओ खुल गये हैं कि हर गली कूचे में आपको किसी एन जी ओ का बोर्ड दिख जायेगा।लेकिन दुख की बात यह है कि इन संगठनों का मकसद गरीबों,दुखियों की सेवा या विकास न होकर देश और विदेश की तमाम वित्तीय एजेंसियों से अनुदान इकट्ठा करना है।
      इसके साथ ही मैं यह किताब अपने देश के समस्त माननीय जनप्रतिनिधियों को भी पढने की सलाह दूंगा जो गरीबों,किसानों,दलितों,आर्थिक रूप से अपवंचितों के लिए काम करने का बीड़ा उठा कर समाज सेवा की पवित्र भावना लेकर इस क्षेत्र में आये हैं। तथा जिन्हें यहाँ की जनता उसी गरीब जनता ने चुना है।   
    बहरहाल मेरा मकसद यहां एन जी ओ पर लिखना नहीं है।बल्कि उस पुस्तक के बारे में लिखना है जिसे भारत ही नहीं दुनिया के हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिये।खासकर उन युवाओं को जो एन जी ओ सेक्टर में काम कर रहे या जाने की मंशा रखते हैं तथा हमारे समस्त सम्माननीय जनप्रतिनिधियों को भी।
 यह पुस्तक है डोमिनीक लापिएर की सिटी आफ़ ज्वाय। मैंने इस पुस्तक का हिन्दी रूपान्तर आनन्द नगर पढ़ी है।इस कोविड महामारी के दौरान ही मैंने इसे दोबारा पढ़ा।तो मुझे लगा की इस किताब की चर्चा आज के किसानों मजदूरों के सन्दर्भ में पुनः होनी ही चाहिए।ऐसे वक्त में जब कि देश के लाखों किसानों,मजदूरों के शहरों से पलायन,उनकी तमाम दुश्वारियों के बारे में हर जगह चर्चा हो रही।उनकी सहायता को तमाम सरकारी,गैरसरकारी संस्थाएं,एन0जी०ओ० और व्यक्तिगत स्तर पर तमाम लोग प्रयास कर रहे। यह तो निश्चित है कि आप इस किताब को एक बार पढ़ना शुरू करके खतम किये बिना दूसरा काम नहीं करेंगे।
             आनन्द नगर सचमुच एक आनंद नगर ही है्।ड़ोमिनीक लापियेर ने इस किताब के बारे में खुद लिखा हैयह उन पुरुषों,स्त्रियों और बच्चों की कहानी है,जिन्हें प्रकृति और विपरीत परिस्थितियों ने उनके घर से उखाड़ फ़ेंका है।यह कहानी है इस बारे में कि लोग अविश्वसनीय कठिनाइयों के बावजूद किस प्रकार जिंदा रहना,आपस में मिल बांट कर खाना और परस्पर स्नेह करना सीखते हैं।
              आनन्द नगर की कहानी शुरू होती है पश्चिमी बंगाल के बांकुली गांव से कुछ दूरी पर रहने वाले गरीब किसान हसारी पाल के घर से।दुर्भिक्ष और गरीबी का शिकार होकर हसारी पाल भी हजारों किसानों की तरह गांव छोड़कर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ महानगर कलकत्ता (कोलकाता) की ओर कूच कर जाता है।उस महानगर कलकत्ते में जो हजारों लाखों लोगों को रोज अपने उदर में समाहित करने की क्षमता रखता है।कलकत्ता महानगर में पहुंचने के बाद हसारी पाल जैसे किसानों को किन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है,उन्हें मलिन बस्तियों में जानवरों से भी बद्तर कैसा जीवन बिताना पड़ता है यह आप आनन्द नगर में पढ़ सकते हैं।
                 किताब का दूसरा प्रमुख चरित्र स्टीफ़न कोवाल्स्की पोलैण्ड से आया हुआ एक 32 वर्षीय पादरी है।स्टीफ़न पश्चिम की सुख सुविधा छोड़कर भारत के कलकत्ता शहर में सिर्फ़ उन दीन,दुखियों,कोढ़ियों की सेवा करने आया था जिनमें हमेशा उसे प्रभु ईसा मसीह के दर्शन होते हैं।वह अपने पादरी मित्रों के लाख कहने के बावजूद कलकत्ता की उसी मलिन बस्ती में रहता है जहां एक छोटे से मैदान में हजारों झोपड़ियों में सत्तर हजार हसारी पाल जैसे लोग रहते थेआनन्द नगर एक ऐसा स्थान जहां झोपड़ियों में मनुष्यों के साथ कीड़े मकोड़ों से लेकर विषैले जीव जन्तु भी रहते थे। चौबीसों घण्टे खुली नालियों में कीड़े बजबजाते हैं जहां के लोग सड़ास और नाली की सड़ान्ध और बद्बू के अलावा दूसरी गन्ध के बारे में जानते ही नहीं थे।ऐसी बस्ती का नाम था आनन्द नगर।
         ऐसी बस्ती में रहकर दलितों,गरीबों और ऐसे कोढ़ियों की सेवा----जिनके शरीर को छूना तो दूर आप उनके पास खड़े ही न हो पायें। यह काम सिर्फ़ स्टीफ़न कोवाल्स्की के बूते का था।और स्टीफ़न ने यह किया भी।वह उसी बस्ती में रहकर सुबह,शाम,रात, हर समय आनन्द नगर के निवासियों  की सेवा में तत्पर था।वह उन्हीं कोढ़ियों के बीचबैठकर उन्हीं के हाथों से बनाया गया दाल भात खाता था।उन्हीं के साथ खेलता था।घूमता था।उन्हीं की तरह खुले नल से नहाता था।और उन्हीं की तरह हजारों  लाखों मच्छरों,के दंश के बीच झुग्गी में सोता था।
            हसारी पाल के माध्यम से लेखक ने भारत के उन लाखों करोड़ों झुग्गीवासियों के संघर्ष की गाथा लिखी है जिन्हें जिन्दा रहने के लिये अपने जीवन के हर पल की कीमत चुकानी पड़ती है।जो तमाम सपने लेकर अपने गांव से किसी महानगर में पहुंच तो जाते हैं।लेकिन रिक्शा चलाने, कुलीगीरी,प्लेटें धोने,भीख मांगने से लेकर ब्लड बैंकों में खून बेचने के बावजूद अपने परिवार को दो जून का भात नहीं खिला पाते।महानगर की तमाम विसगतियों,बीमारियों,महामारियों को झेलना और मरते रहना उनकी नियति है।इसके बावजूद उनके अन्दर जीवन जीने की जो अदम्य लालसा है वही उनकी प्राण शक्ति बन कर उन्हें नये रास्ते दिखलाती है।वे भीड़ के रेले में धक्का खाकर धूल में गिरते हैं फ़िर और फ़िर अगले ही पल उसी जोश के साथ नये रास्ते की खोज में निकल पड़ते हैं।
       उन्हें इन्हीं परिस्थितियों से निकालने और उन्हें एक बेहतर जीवन की ओर ले जाने के लिये ही स्टीफ़न कोवाल्स्की भारत आये थे।और उन्होंने इसका प्रयास भी किया। सफलता असफ़लता मिलने का मुद्दा अलग है।
                मेरा इस पुस्तक के बारे में लिखने का मकसद सिर्फ़ यह है कि यहां के युवाओं और समस्त समाजसेवियों को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिये।खासकर जो एन जी ओ सेक्टर में जाने के इच्छुक हैं,समाजसेवा की इच्छा रखते हैं या फिर जनप्रतिनिधि के रूप में समाज के गरीबों,दलितों, अपवंचितों के लिए कुछ बेहतर करने की ख्वाइश दिल में रखते हैं।उन्हें स्टीफ़न कोवाल्स्की के चरित्र से प्रेरणा तो मिलेगी ही।साथ ही वो समझ सकेंगे कि मानव सेवा है क्या?इस रास्ते में क्या रुकावटें आती हैं?और हम उन रुकावटों को कैसे दूर कर सकते हैं?
                यदि आपने अभी तक यह पुस्तक आनन्द नगर नहीं पढ़ी है तो एक बार इसे पढ़िये जरूर।निश्चित रूप से इसे पढ़ कर आपका जीवन पूरी तरह बदल जायेगा।और शायद आप अपने जीवन में वह कुछ कर सकेंगे,वह पा सकेंगे जो आप पाना चाहते थे।
                         0000000
डा0हेमन्त कुमार

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पुस्तक समीक्षा -प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी

गुरुवार, 21 मई 2020


पुस्तक समीक्षा
                                                                     
                                

  

पुस्तक:प्यारा कुनबा
लेखक:निकोलाई नोसोव
रूसी से अनुवाद:विजया उमराणीकर
चित्रांकन:सौरभ दास
प्रकाशक:एकलव्य
ई-10,शंकर नगर बी डी ए कालोनी
शिवाजी नगर,भोपाल-462016
संस्करण-2017

प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी
     बच्चों का मन बहुत कल्पनाशील तो होता है।साथ ही उनके अन्दर उत्सुकता भी बहुत होती है।नई चीजों को जानने की,हर नई चीज को छूने,महसूस करने,छूने का परिणाम जानने की।दुनिया को,प्रकृति को,घर को,परिवार को समझने की।रोज कोई नया काम करने की।
     उनके मन में ढेरों प्रश्न भी होते हैं..कि अमुक चीज क्या होती है?कैसे काम करती है?क्या इसे हम भी कर सकते हैं?ये चिड़िया उड़ती कैसे है?ये पंखों को फैला कर ही क्यूँ उड़ रही?पेड़ों की जड़ें ऊपर क्यूँ नहीं होती?यानि हजारों लाखों सवाल उसके दिमाग पूछता है।
      जैसे जैसे वो घर के बाहर की दुनिया से परिचित होता है उसे अपने बहुत सारे सवालों के जवाब भी मिलते हैं।कुछ के जवाब स्कूली  शिक्षा उसे देती है तो कुछ के जवाब वो खुद प्रयोग करके सीखता है।एक तरह से देखा जाय तो किसी काम को करके देखने की उत्सुकता बच्चों की जन्मजात प्रवृत्ति होती है।और बच्चे इसी जिज्ञासु मन से हर वक्त बहुत कुछ नया सीखते भी जाते हैं।
   “प्यारा कुनबा” ऐसे ही कुछ जिज्ञासु बच्चों की रोमांचक कहानी है।जिसके मुख्य पात्र मीश्का,उसकी छोटी बहन माया और उसका जिगरी दोस्त कोल्या(निकोलाद्जे)हैं।इस बाल उपन्यास की पूरी कहानी इन्हीं तीन बच्चों,उनकी जिज्ञासाओं,उनकी योजनाओं और उनके कारनामों के इर्द गिर्द घूमती है।
        उपन्यास की कथावस्तु संक्षेप में कुछ यूं है कि मीश्का एक दिन किसी अखबार की दूकान से “मुर्गी पालन” नाम की किताब ले आता है।उसे पढ़ते पढ़ते अचानक मीश्का के दिमाग में एक इन्क्युबेटर बनाने की बात आ जाती है।वह सोचता है की क्यूँ न एक इन्क्युबेटर घर पर ही बना कर उसमें अंडे से कर मुर्गी के बच्चे निकाले जायं।मीश्का इस बात की चर्चा अपने दोस्त कोल्या से करता है।
    उसकी योजना सुन कर कोल्या भी रोमांचित हो जाता है।बस फिर क्या था।शुरू हो जाती है उनकी खोज बीन और जुगाड़ की प्रक्रिया।पहले वो घर के कबाड़ में पड़े सामानों की छानबीन करते हैं और उसमें से अपने काम की चीजें जुटाते हैं।मसलन इन्क्युबेटर बनाने के लिए एक लकड़ी का बाक्स,उसमें ताप बनाये रखने के लिए लैम्प,तापमापी,वगैरह।पहले उन्होंने मिट्टी के तेल वाला लैम्प लिया पर मीश्का की माँ ने उसके लिए मना कर दिया तो उन लोगों ने बिजली के लैम्प का जुगाड़ किया।अब बाक्स में नमी बनाए रखने के लिए उसमें पानी रखने का बर्तन चाहिए तो इसके लिए उन्होंने मीश्का की छोटी बहन माया के खिलौनों में से लकड़ी की कटोरियाँ मांगी।
            पहले उसने ना-नुकुर की फिर एक चूजे की हिस्सेदारी का आश्वासन पाकर उसने कटोरियाँ दे दीं।इस तरह उनका इन्क्युबेटर तो बन गया।पर उसमें रखने के लिए मुर्गी के ताजे अंडे कहाँ मिलें?उसका भी उन्होंने जुगाड़ कर लिया---अपनी मकान मालकिन नताशा मौसी के गाँव ट्रेन से जाकर वो ताजे अंडे भी लाये।अंडे उस इन्क्युबेटर में रख भी दिए गए।अब 21 दिनों तक उसकी देखभाल,तापमान नियंत्रण,अंडे पलटना कौन करे?इसके लिए तीनों ने आपस में समय तय कर ड्यूटी लगायी।बाद में उनकी इस योजना में स्कूल के कई दोस्त—कोस्त्या,वीत्या और टीचर मारिया पेत्रोव्ना भी शामिल हो गयीं।और अंततः 21 दिनों बाद उन्हें प्यारे प्यारे 10 नन्हें चूजे मिलते हैं और उन्हें वो मौसी के गाँव में ही मुर्गियों के पास छोड़ आते हैं क्योंकि उन चूजों को शहर में दिक्कत होती।
     इस पूरे उपन्यास  में इतना अधिक रोमांच है,इतनी उत्सुकता है कि कोई भी बच्चा एक बार इसे पढना शुरू करके बिना पूरा किये छोड़ नहीं सकता।इस में बच्चों को वही रोमांच हर जगह दिखेगा जो बच्चों के किसी साहसिक कारनामों  वाले उपन्यास में मिल सकता है।मसलन क्या इन्क्युबेटर में रखे अण्डों से बच्चे (चूजे)निकलेंगे?तो कब निकलेंगे?जब निकलेंगे तो उस वक्त क्या घटना होगी?वगैरह वगैरह।
 बच्चों की जिज्ञासाओं प्रश्नों को इस उपन्यास में इस तरह चित्रित किया गया है कि पाठकों को ऐसा लगता है-- पात्रों को हम सामने ही बात करते देख रहे।उदहारण के लिए आप मीश्का और कोल्या की शुरूआती बातचीत देख सकते हैं।
  “शायद हमारे लिए इन्क्युबेटर बनाना जरूरी नहीं है।अण्डों को बस एक बरतन में रख कर अंगीठी पर रख दिया जाय।“मैंने प्रस्ताव रखा।
“अरे इसमें कुछ नहीं होगा” मीश्का बोल उठा।“आग बुझ जायेगी और सारे अंडे  खराब हो जायेंगे।इन्क्युबेटर की विशेषता यह है की उसमें बराबर 39 डिग्री सेंटीग्रेट ताप रहता है।”
“39 डिग्री ही क्यूँ?”
“इसलिये कि  जब मुर्गी अंडे सेती है,तब उसका ताप यही होता है।”(पृष्ठ संख्या-9)
    इसी तरह पूरे उपन्यास में पल पल बदलते घटनाक्रम,अण्डों से निकलने वाले चूजों को लेकर बच्चों के भीतर की उत्सुकता हमें पूरे कथानक में हर जगह दिखाई पड़ती है।21 दिन पूरे होने के बाद भी जब चूजे नहीं निकल रहे थे तो बच्चे बहुत निराश भी हो जाते हैं–ये सोच कर कि उन्हीं लोगों की किसी गलती से सारे अंडे खराब हो गए।पर मीश्का और कोल्या अभी भी आशान्वित थे और उनकी आशा फलीभूत भी हुयी।जब दोनों ने पहली बार एक अंडे में दरार देख कर एक चूजे की पतली चोंच देखी उस वक्त के रोमांच को देखिये लेखक ने किस खूबसूरती से लिखा है।
“देखो”,उसने अपना अंडे वाला हाथ मेरी और बढाते हुए फटी हुयी आवाज में कहा।पहले मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया,लेकिन फिर एक जगह पर बाल जैसी कोई चीज नजर आई -----“तो क्या चूजे ने ऐसा किया है?”मीश्का ने सर हिला कर हामी भरी।
   मैंने अपने नाखून से खोल के फटे टूकडे को सावधानी से ऊपर उठाया जिससे अंडे में एक छोटा सा छेद बन गया।उसी क्षण एक नन्हीं सी पीली चोंच ने अपने आपको छेद से बाहर निकाला और फिर गायब हो गयी।
      हम इतने उत्तेजित हो गए थे कि मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाल सके।बस हमने एक दूसरे को खुशी के मारे कास कर भींच लिया।(पृष्ठ संख्या-69)
    इस तरह से इस उपन्यास के कथानक का ताना बाना कुछ इस तरह से बुना गया है कि इसे पढने वाले बच्चों को कहीं भी यह नहीं लगेगा कि इसमें घट रही घटनाएँ उनसे कहीं अलग हैं।उन्हें हर समय यही लगेगा की अरे ये तो मैं ही हूं जो इस तरह अण्डों को सेने की मशीन बना रहा ---अरे ये तो मेरे फलां दोस्त जैसी ही बात कर रहा।यही संभवतः इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है।
       कुछ बातें और जिन्हें इस किताब के सन्दर्भ में लिखा जाना जरूरी है वो यह कि हिन्दी भाषा में विज्ञान कथाएं,उपन्यास,विज्ञान गल्प बहुत संख्या में लिखे गए हैं और लिखे जा रहे हैं।लेकिन उनमें कम संख्या ऐसी कहानियों या उपन्यासों की होगी जिसमें कि बच्चे ही किसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित प्रयोग को खुद करके देख और सीख रहे हों।या फिर किसी मशीन को खुद बनाने का उपक्रम कर रहे हों।
यहाँ मैं यह नहीं कह रहा की ऎसी विज्ञान कथाएं हिंदी में हैं ही नहीं।हैं लेकिन कम संख्या में।और दूसरी बात उनमें कहीं न कहीं बड़े पात्रों का भी इन्वाल्वमेंट है।
   लेकिन “प्यारा कुनबा” उपन्यास की ये सबसे बड़ी खासियत और सफलता कही जायेगी कि इसके शुरू से लेकर आखिर तक ---- इन्क्युबेटर बनाने की पूरी योजना से अण्डों से चूजे निकलने तक---सारे काम बच्चों द्वारा खुद ही किये गए हैं।सिर्फ एकाध जगह उन्हें बड़ों की सलाह मिली है बस।बाक़ी का सारा काम बच्चों ने खुद किया है।इस तरह ये उपन्यास बच्चों में करके सीखने,अनुभव करने,घटनाओं को नियंत्रित करने और सबसे बड़ी बात किसी काम में आपसी सहयोग की भावना का भी विकास करेगा।
 हमारे मनोवैज्ञानिक,शिक्षाशास्त्री भी इस बात पर बल देते हैं कि विज्ञान आदि से सम्बंधितआडियो, वीडियो कार्यक्रमों में और साथ ही विज्ञान पर आधारित बाल साहित्य में भी बच्चों को खुद करके सीखने पर जोर दिया जाना चाहिए।उनके सामने ऐसी परिस्थितियाँ रखी जायं जिससे उनके अन्दर खुद करके सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सके बजाय इसके कि कोई बड़ा आकर उन्हें बार बार किसी चीज को समझाए।और ऐसे कार्यक्रम,साहित्य बच्चों के लिए ज्यादा उपयोगी,आनंददायी और सार्थक होते हैं।  
   यद्यपि यह उपन्यास रूसी  भाषा से हिन्दी में अनूदित है।लेकिन अनुवाद के स्तर पर भी इस बात का पूरा ध्यान रखा गया शब्द बच्चों के बोलचाल वाले ही हों,वाक्य छोटे-छोटे और भाषा का प्रवाह बना रहे।इसमें बने खुबसूरत और आकर्षक चित्र किताब को और पठनीय बनाते हैं।  
   कुल मिला कर “प्यारा कुनबा”सचमुच बच्चों को बांधे रखने वाली एक प्यारी किताब है और इसे आप सब अपने बच्चों को जरूर पढ़वाइये।
                               ००००
समीक्षक-डा०हेमन्त कुमार                      
                                    
             

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पुस्तक समीक्षा-धरती से आसमान तक धमाल मचाने के लिए--बच्चों को जरुर पढ़ायें ये किताब

रविवार, 17 मई 2020


पुस्तक समीक्षा
समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार

धरती से आसमान तक धमाल मचाने के लिए--बच्चों को जरुर पढ़ायें ये किताब
                                                                         

                      पुस्तक का नाम: मेरा नाम है
(चार पुस्तकों की श्रृंखला)
लेखक—चित्रकार:आबिद सुरती
प्रकाशक:साहित्य अकादमी
रवीन्द्र भवन,35 फिरोजशाह मार्ग
नई दिल्ली-110001

                             अक्सर अभिभावक,प्राथमिक स्कूल के शिक्षक या बड़े साहित्यकार भी ये कहते सुने जाते हैं कि हिंदी में बच्चों के लिए अच्छा साहित्य नहीं लिखा जा रहा।या बाजार में बच्चों के पढने के लिए अच्छी किताबें हिंदी में उपलब्ध नहीं हैं।जबकि वास्तविकता यह नहीं है।आज की तारीख में बच्चों के लिए बहुत कुछ अच्छा लिखा जा रहा और प्रकाशित भी हो रहा है।हाँ ये जरूर है कि सर्कुलेशन या प्रचार प्रसार की कमी से भी बच्चों तक बहुत सारी अच्छी किताबें नहीं पहुँच पाती।
     बहरहाल मेरा मकसद यहाँ बाल साहित्य या उसके प्रचार प्रसार की समस्या गिनाना नहीं बल्कि बच्चों की एक बेहद खूबसूरत और खासकर छोटे बच्चों के लिए जरूर पठनीय पुस्तक के बारे में बताना है।इस पुस्तक का नाम ही “मेरा नाम है”।यानि कि पुस्तक के शीर्षक से ही लेखक ने बच्चों को जोड़ने की कोशिश की है।वो इस तरह कि किताब के अनुक्रम के बाद पहले पेज पर ही बच्चे के नाम लिखने की जगह दी गयी है।यानि उसी वक्त से बच्चा किताब से सीधे सीधे एक स्वामित्व वाले भाव से जुड़ जाएगा।और जब किताब उसकी होगी तो जाहिर सी बात है कि इसे वो पढ़ेगा भी। 
      इस किताब का शीर्षक पढ़ कर ही बच्चों के मन में इसे पढने कि उत्सुकता बढ़ जायेगी।इस खूबसूरत किताब के लेखक हैं बहुत ही वरिष्ठ पर मन से बच्चे—प्रसिद्ध साहित्यकार आबिद सुरती।आबिद जी लेखक से पहले एक मशहूर चित्रकार और कार्टूनिस्ट भी हैं।उन्होंने ही इस पूरी किताब को अपने द्वारा बनाये गए खूबसूरत चित्रों से सजाया भी है।किताब हाथ में आने के बाद यह निर्णय करना थोड़ा कठिन है कि पहले इसके चित्र बनाए गए हैं या कि किताब लिखी जाने के बाद चित्र बने हैं।किताब में कुल चार कहानियाँ हैं—1-चकमक चश्मे वाला 2-तैयबअली टाई वाला 3-फोफो फोटो वाला 4-रानी फूल पत्ती वाला 
           इन चारों खूबसूरत कहानियों को खुद आबिद जी ने इतने सुन्दर चित्रों से सजाया है कि ये किताब देखते ही कोई भी बच्चा इसे पढने को मचल उठेगा।इसके हर पृष्ठ पर दो पंक्तियाँ दी हैं “बहते चलो बच्चों बहते चलो” और“लहराते चलो बच्चों लहराते चलो”। इन्हें हम इस किताब की टैग लाइन भी कह सकते हैं जो बच्चे या पाठक को किताब को आगे पढने के लिए प्रेरित करती हैं।किताब की ख़ास बात ये है कि इसका हर पृष्ठ अपने आप में मुकम्मल है और एक कहानी,एक कविता का आनंद देता है।हर कहानी की एक शुरुआत है तो एक अंत भी है।
 किताब की सबसे बड़ी विशेषता जो बच्चों को निश्चित ही आकर्षित करेगी और बच्चों की जुबान पर भी चढ़ेगी वो है पूरी किताब का लिरिकल होना।यानि किताब का हर पृष्ठ बच्चों को एक गीत का भी आनंद देगा।अब आप पहली कहानी की शुरुआत ही देखियेयह कहानी मेरे सपनों की है/जिसे मैं इस साल देखूंगा/इसकी शुरुआत एक चूहे से होती/देखो वह कैसे फुदक रहा है इधर से उधर/और चिल्ला रहा उछल-उछल कर....इसी तरह पेज दस पर देखिये---सूरज मुस्कुरा रहा है/किरणें हुयी हैं मंद/कैंची ने किया है/मुंह मैडम का बंद।
    इसी तरह पेज 34-35 को हम देखते हैं तो वहां भी बच्चों के लिए मजेदार चित्रों की दुनिया सजी है।एक तरफ एक उड़ते सांप की पीठ  पर बैठा तोता यानि मिट्ठू और उस उड़ते सांप को एक हाथ से पकड़े लटका हुआ बच्चा नन्नू जिसके दूसरे हाथ में फलियों से भरा बर्तन।---सांप के सर पर रखा हीरा(शायद नागमणि)--दूसरी ओर हवा में उड़ता जोकर और उसे पकड़ कर लटका चंदू।साथ में इनका गीतमय शब्दों में वर्णन।---बहते हैं मियाँ मिट्ठू संग सबके/हीरे पर है उसकी ललचायी नजर/फलियाँ कैसे खाए नन्हा-मुन्ना नन्नू /इसी दुविधा में झूल रहा मगर---अब अगर ध्यान से पढ़ा जाय तो ये ऎसी पंक्तियाँ लगती हैं जिनका आपस में बहुत ज्यादा मेल न होते हुए भी आपस में ये पंक्तियाँ एक दूसरे की पूरक भी हैं।क्योंकि बच्चा इन्हें पढने के साथ पंक्तियों को पेज पर बनी तस्वीरों से भी रिलेट करता चलेगा।इस तरह उसे एक तरह के मानसिक अभ्यास का भी मौक़ा लेखक ने दिया है।    
   पूरे किताब की चारों ही कहानियां इसी प्रकार की गीतात्मक शैली में आगे बढती हैं और इन गीतों में भी शब्द बहुत सरल इस्तेमाल किये गए हैं जो आसानी से बच्चों की समझ में भी आये और उन्हें याद भी हो जाए।आबिद जी की इस किताब को पढ़ते हुए और उसकी गीतात्मक शैली का आनंद उठाते हुए मुझे बच्चों की फिल्म “जग्गा जासूस” की याद आ गयी जिसमें पूरी फिल्म मे रणबीर कपूर और अन्य कलाकार अपने सारे डायलाग गा कर बोलते हैं।      
    चित्रों से भरपूर इस किताब की एक और बड़ी विशेषता का जिक्र यहाँ मुझे जरूरी लगता है–वो यह कि  इस किताब का वो बच्चा भी आनंद उठा सकता है जिसे अभी अक्षर ज्ञान भी नहीं है।यानि जिसने अभी पढ़ना लिखना नहीं सीखा है या जो अभी स्कूल नहीं जा सका।ऐसा बच्चा भी इस किताब के हर पृष्ठ पर बने रंग-बिरंगे और बेहद खूबसूरत चित्रों को देख कर आनंद उठा सकता है और इतना ही नहीं उसके अन्दर पुस्तकों के प्रति आकर्षण भी बढेगा साथ ही भविष्य में किताबों से नाता जोड़ने की प्रवृत्ति  भी उसमें जागेगी।
     जैसा की सर्व विदित है आज भी बच्चों की पहली पसंद फैंटेसी और परी लोक की कहानियां हैं।क्योंकि बच्चा दुनिया के यथार्थ को महसूस करने से पहले तक अपनी कल्पनाओं की दुनिया में विचरना चाहता है।उसे हर पल कुछ अलग,कुछ नया दिखना चाहिए।उसका ध्यान बहुत ज्यादा देर तक किसी एक घटना या पात्र पर नहीं टिका रह सकता।इस दृष्टि से भी ये किताब बाल पाठकों के मनोनुकूल है।
            इस किताब की हर कहानी एक सपने के साथ शुरू होती है।और पूरी कहानी बच्चों को सपनों की दुनिया या कहें फैंटेसी में विचरने,कल्पना लोक की सैर करके आनंदित होने का पूरा अवसर देती है।आबिद जी की ये सबसे बड़ी विशेषता कही जायेगी की उन्होंने बच्चों के कल्पना लोक को इस किताब की माध्यम से बखूबी जिया है।बच्चों की कल्पनाओं के पंख उसे जहां जहां तक उड़ान भरवा सकते हैं—चाँद तारों पर---आसमान में—पहाड़ों के बीच –समुद्र में हर जगह आबिद जी ने बाल पाठकों को उड़ान भरने का पूरा अवसर दिया है।चाहे वो शब्दों के माध्यम से हो या हर पेज पर बने रंग-बिरंगे खूबसूरत चित्रों के माध्यम से।
  यदि इस पुस्तक को मुकम्मल रूप में एनीमेशन फिल्म के रूप में फिल्माया जाय और सारे गीतों संवादों को संगीत के साथ लयबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया जाय तो यह निश्चित रूप से छोटी उम्र के बच्चों के लिए एक शानदार एनीमेशन फिल्म बन सकती है।
  समग्र रूप से यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आज भारतीय बच्चों के लिए ऎसी ही रंग-बिरंगी चित्रात्मक किताबों की ज्यादा जरूरत भी है और बच्चों को ऎसी किताबें पसंद भी आयेंगी।
                ०००००
समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरा नाम है मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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