यह ब्लॉग खोजें

लोड हो रहा है. . .

खेत आज उदास है

शनिवार, 3 सितंबर 2016

खेत आज बहुत विवश और उदास है
एक अजीब-सा डर उसके
अस्तित्व पर कब से डोल रहा है

हरी-पीली लहराती धारियों पर अब
वह ताज़गी भरी शुद्धता की धुनें नहीं गूंजती।

मिट्टी उद्भ्रांत है
उसके मुख से लेकर अंतर्मन तक को
रासायनिक उर्वरकों के
कसैले स्वाद वाले धीमे ज़हर ने

निर्ममता से बेध डाला है।
और इधर सदमे में है उसकी प्रिय संतान
उसका प्रिय धरतीपुत्र ..
जो जा रहा है धीरे-धीरे

ऐसी मूर्छा की ओर, जहाँ
मौसम के वैभव की गन्ध भी

उसपर निष्प्रभावी हो जाएगी।

सदमे में है मिट्टी का प्यारा पुत्र
कि पावस छल करने लगे हैं उसके साथ
हीरे-पन्नों की लहरों पर
तन्मय होकर नाचता नहरों का पानी
कब से अपने विस्तार को तलाशता-तलाशता
थककर मौन हो चला।

उदास है घर की बड़ी बेटी
कि खेत से बहकर आने वाली हवा
अब चुप सी हो गई है

नहीं थिरकते उसके आँचल पर
परंपरा और संस्कृति वाले रोपनी के गीत।

उदास है वह बेटी
कि अब अग्गौं* से मिलनेवाले
खनकते सिक्के,चमकते हरे नोट
बीते दिनों की बात हो गई

जिन पैसों से खरीदती थी वह अपने लिए
रंग-बिरंगे गोटों वाली ओढ़नी
और रुन-झुन करती पायल

कि हवाओं के सुरों से मिलकर
जिसका संगीत गूँज उठता था

गाँव की तलैया से होते हुए
पर्वत वाले झरने तक।

नदी के पानी से मिट्टी को सानकर
हर सावन में गढ़ती है वह अब भी नए शिव
पर उम्मीदों के पहाड़ को
रुई की तरह धुनकर

बिखेर देता है सावन आसमान पर
भटक गई है मेघ-गीतों की तल्लीनता आतप्त वृत्तों में।
उदास है वह बेटी
कि मुरझाये सपनों का इक बोझ है
उसकी सूनी आँखों में

और झाँकता है गहरा विक्षोभ
घर के आइनों से

झनझना कर टूटते सपनों का
एक बोझ है उसके पिता की आँखों में
और इन बोझों के लिए जिम्मेवार
एक गहरी शर्मिंदगी का बोझ है
बहुत हीं उदास मिट्टी की थकी,
झिपकती-सी आँखों में ..।

टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त हो
बेबस होकर जिंदा है

वैभव खोकर बंजरपन में
मृदा आज शर्मिंदा है ll
000
कवयित्री

कंचन पाठक
चर्चित युवा कवयित्री और लेखिका कंचन पाठक की कविताएं आम आदमी से और जमीन से सीधी जुड़ी हैं।उन्होंने आम आदमी के साथ साथ धरती के,गांव के,किसानों के,स्त्री के और पूरी प्रकृति के दर्द को महसूस किया है और इसी लिये इन्हें अपनी कविताओं का विषय बनाया है।कंचन की अभी तक एकल और संयुक्त चार काव्य और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।“इक कली थी”(एकल काव्य-संग्रह),सिर्फ़ तुम (संयुक्त काव्य-संग्रह),काव्यशाला (संयुक्त काव्य-संग्रह),सिर्फ़ तुम (कहानी संग्रह),कविता अनवरत (काव्य-संग्रह)।कई सम्मानों से सम्मानित कंचन पाठक पत्र-पत्रिकाओं के साथ ब्लाग लेखन में भी सक्रिय हैं।
सम्पर्क:मेल आईडी-pathakkanchan239@gmail.com
ब्लॉग–स्वर्णरेणुकाएँ (www.kanchanpathak.blogspot.in
वेबसाइट–kanchanpathak02.wordpress.com 
*अग्गौं - कटनी के समय खेत की पहली फसल का पहला हिस्सा जिसपर घर की बड़ी बेटी का अधिकार होता है l







Read more...

“बालवाटिका” के “संस्मरण” और “पर्यावरण” विशेषांक….।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

             
     आज विज्ञापनों की चकाचौंध और बाजारवाद के युग में कोई पत्रिका निकालना और उसके स्तर को बरकरार रखना अपने आप में एक कठिन काम है।खासकर बच्चों की पत्रिकाओं के सन्दर्भ में यह बात ज्यादा लागू होती है।और उस स्थिति में तो और जब आपको यह पत्रिका पूरी तरह अपने बलबूते पर निकालनी हो।जब आपके पास प्रकाशन का एक बड़ा सेटप न हो।जब आपको पत्रिका के लिये स्तरीय सामग्री जुटाने से लेकर उसके प्रकाशन और प्रचार प्रसार की व्यवस्था खुद ही सम्हालनी हो।जब आपके पास सबसे बड़ी समस्या पत्रिका में खर्च किये जा रहे धन की वापसी की हो।ऐसी ही कई गम्भीर समस्याएं हैं जिनसे एक गैर व्यावसायिक पत्रिका निकालने वाले को रूबरू होना पड़ता है।और इन सारी मुसीबतों को झेलते हुये अगर कोई बाल पत्रिका निकालने का साहस कर रहा है तो वह निश्चय ही बाल साहित्य,बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान कर रहा है।
                  कुछ ऐसे ही संघर्षों के दौर से गुजरते हुये खुद को स्थापित किया है बाल पत्रिकाबालवाटिकाने।मैंबालवाटिकाका कई वर्षों से पाठक हूं।पर इधर के कुछ सालों में मैंबालवाटिकासे पाठक के साथ  ही बतौर लेखक भी जुड़ गया हूं।इसके अंकों के कलेवर में इधर जो सकारात्मक बदलाव आये हैं उसका पूरा श्रेय पत्रिका के सम्पादक डा0 भैरूंलाल गर्ग जी के साथ पत्रिका की पूरी सम्पादकीय टीम को जाता है।डा0भैरूं लाल गर्ग जी सिर्फ़ बालवाटिकानाम की पत्रिका नहीं निकाल रहे बल्कि हिन्दी बाल साहित्य के प्रचार और प्रसार के साथ इस पत्रिका के माध्यम से हिन्दी बाल साहित्य के नये और पुराने रचनाकारों को जोड़ने और उन्हें एक मंच पर एकत्रित करने की वह साधना कर रहे जो एक समर्पित सन्यासी ही कर सकता है।
   “बालवाटिकाके इधर आये विशेषांकों में दो विशेषांक तो बहुत ही महत्वपूर्ण और संग्रहणीय हैं।पहला संस्मरण विशेषांक”(मई-2016) और दूसरापर्यावरण विशेषांक”(जून-2016)
               पहले मैं बात करूंगा बालवाटिका केसंस्मरण विशेषांककी।बच्चों को उपलब्ध बाल साहित्य में ज्यादातर कहानियां,कविताएं,नाटक,गीत,निबन्ध,उपन्यास,यात्रा वृत्तान्त या अन्य रोचक और रोमांचक सामग्री ही पढ़ने के लिये मिल पाती है।लेकिन कभी कभी बच्चों के मन में भी यह सवाल जरूर आता होगा कि उनके लिये ये सारा साहित्य कौन लिखता है?उनका जीवन कैसा होता होगा?या उनका बचपन कैसे बीता होगा?क्या वो लोग भी उन्हीं की तरह बचपन में शरारतें करते रहे होंगे?या इस जैसे ही और भी ढेरों प्रश्न।
                     बच्चों की ऐसी ही जिज्ञासाओं को शान्त करेगाबालवाटिकाका संस्मरण विशेषांक।जिसमें नये पुराने लगभग 28 प्रतिष्ठित बाल साहित्यकारों के बचपन की यादों को संजोया गया है।बचपन के संस्मरणों के इस खण्ड में बच्चे अपने सभी प्रिय लेखकों प्रकाश मनु,राम दरश मिश्र,देवेन्द्र कुमार,दिविक रमेश,डा0 भैरूं लाल गर्ग,रमेश तैलंग,सूर्यनाथ सिंह,मंजुरानी जैन,प्रहलाद श्रीमाली,गोविंद शर्मा, जैसे स्थापित नामों के साथ ही नागेश पाण्डेय,रेनु चौहान,रावेन्द्र रवि जैसे युवा बाल साहित्यकारों के बचपन की यादों को पढ़ सकेंगे। और उनकी ये यादें निश्चित रूप से बच्चों के मन को गुदगुदाएंगी।यहां मेरा मकसद संस्मरण लेखकों के नाम गिनाना नहीं बल्कि मैं बाल पाठकों के उस आनन्द को बताना चाहूंगा जो इन संस्मरणों को पढ़ कर वो महसूस करेंगे।कि अरे तो ये हमारी तरह ही साहित्यकार भी बचपन में इतनी शरारतें करते थे?इन्होंने भी बगीचे से अमरूद तोड़ा है? या इन्होंने भी स्कूल की कक्षा छोड़ कर शैतानियां की।फ़िर उस समय उनका मन जिस तरह आह्लादित होगा उसे हम भी इन संस्मरणों को पढ़ कर ही महसूस कर सकते हैं।एक बात और ये संस्मरण निश्चित रूप से बच्चों को कुछ अच्छा करने की प्रेरणा भी देंगे।इस दृष्टि से बाल वाटिकाका यह संस्मरण विशेषांक महत्वपूर्ण है।
        इन संस्मरणों के साथ ही इस अंक में बच्चों के ज्ञानवर्धन के लिये अलग अलग विषयों पर तीन लेख,मो0अरशद खान,विनायक और पंकज चतुर्वेदी की कहानियां,लगभग 14 बाल कविताएं तथा तीन पुस्तकों की समीक्षाएं प्रकाशित हैं।यानि कि वो सभी सामग्रियां जो एक अच्छी पत्रिका में होनी चाहिये।
                      अब थोड़ी बातबालवाटिकाकेपर्यावरण विशेषांककी।ये तो हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण इस समय हमारे पूरे विश्व की चर्चा के केन्द्र में है।पूरी दुनिया में लोग अपनी इस धरती के बिगड़ते जा रहे पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं,इस असन्तुलित होते जा रहे पर्यावरण को कैसे बचाया जाय इस पर चर्चाएं।,कोशिशें कर रहे।लोगों को सचेत कर रहे कि अभी भी समय है सम्हल जाओ और बचा लो अपनी इस धरती और यहां की प्राकृतिक सम्पदा को अन्यथा समय निकल जाने पर सिवाय धरती के विनाश के कुछ भी सम्भव नहीं रहेगा।
    तो ऐसे माहौल में हमारा यह भी कर्तव्य बनता है कि हम अपने इस पर्यावरण और धरती के प्रति अपनी सभी चिन्ताओं,विचारों,प्रयासों में अपने बच्चों को भी शामिल करें।उन्हें भी इस पर्यावरण असन्तुलन की भयावहता के बारे में बताएं।उन्हें भी इसे रोकने और धरती को बचाने के उपायों को समझाएं।क्योंकि अन्ततः धरती पर हामारे बाद हमारे बच्चों को ही रहना है।तो क्या हम उन्हें यह धरती ऐसे ही विनाश के कगार पर पहुंचा कर दे देंगे?हमें निश्चित रूप से अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताना होगा कि हमारी किन गलतियों के कारण हमारी धरती इस हालत तक पहुंची है?हम इसे कैसे बचा सकते हैं?
           “बालवाटिकाका पर्यावरण विशेषांक निकालने के पीछे संपादकीय टीम का भी मकसद अपने बाल पाठकों को इस धरती पर बढ़ रहे पर्यावरणीय असन्तुलन को बताना और इसे रोकने के उपायों के प्रति जागरूक करना था।यह बात इस अंक में प्रकाशित सामग्री को पढ़ने से स्पष्ट हो जाती है।इस अंक में भी बच्चों के लिये प्रतिष्ठित रचनाकारों की लगभग नौ कहानियां,नौ ही कविताएं,पांच लेख और आठ संस्मरण तथा पुस्तक समीक्षाएं हैं।यानि कि बच्चों के मनोरंजन और ज्ञानवर्धन की पूरी सामग्री।बालवाटिकाका यह पर्यावरण विशेषांक निश्चित रूप से बच्चों तक पर्यावरण संरक्षण का सन्देश पहुंचाने मे सक्षम होगा।और यही पत्रिका के इस विशेषांक का मकसद भी है।
                “बालवाटिकाके इन दोनों अंकों का कलेवर निश्चित रूप से किसी व्यावसायिक पत्रिका से कम नहीं है।साथ ही इन अंकों में प्रकाशित सामग्री का स्तर भी पत्रिका को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।
        “बालवाटिकासे जुड़े एक प्रसंग का मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा।इसके दोनों अंकों को मेरे पास देख कर मेरे एक मित्र (प्रतिष्ठित उपन्यासकार )ने मुझसेबालवाटिकाके दोनों अंक एक दिन के लिये उधार लिया।और अगले दिन पत्रिका वापस करते समय उन्होंने जो बात कही वह चमत्कृत करने वाली थी।उन्होंने कहा किभाई बालवाटिका तो बाल साहित्य कीहंसहै।यह बालवाटिका के लिये एक बहुत ही गौरवपूर्ण टिप्पणी है।
      कुल मिलाकरबालवाटिकाकेसंस्मरणऔरपर्यावरणदोनों ही विशेषांक बाल पाठकों का मनोरंजन, ज्ञानवर्धन तो करेंगे ही साथ ही उन्हें आगामी भविष्य के लिये एक बेहतर नागरिक के रूप में तैयार भी करने का प्रयास करेंगे। इसके लियेबालवाटिकाकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई और साधुवाद।
                      0000
डा0हेमन्त कुमार

  

Read more...

पिता (दस क्षणिकाएं)

रविवार, 19 जून 2016

(मेरे पिता जी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव ।जो आज 87 वर्ष
की उम्र में भी लेखन में पूरी तरह सक्रिय हैं।ईश्वर आपको दीर्घायु करें।)
(एक)
पिता
विशाल बाहुओं का छत्र
वट वृक्ष
हम पौधे
फ़लते फ़ूलते
वट वृक्ष की
छाया में।
(दो)
पिता
अनन्त असीमित आकाश
हम सब
उड़ते नन्हें पाखी।
(तीन)
हम
लड़खड़ाते
जब जब भी
सम्हालते पिता
आगे बढ़ कर
बांह पसारे।
(चार)
आंसू
बहते गालों पर
ढाढ़स देता
पिता के खुरदरे
हाथों का स्पर्श।
(पांच)
पिता
बन जाते उड़नखटोला
हम करते हैं सैर
दुनिया भर की।
(छः)
हमारी ट्रेन
खिसकती प्लेटफ़ार्म से
पिता
पोंछ लेते आंसू
पीछे मुड़कर।
(सात)
पिता
बन जाते हिमालय
कोई आक्रमण
होने से पहले
हम पर।
(आठ)
जब भी
आया तूफ़ान कोई
हमारे जीवन में
पिता बन गये
अजेय अभेद्य
दीवार।
(नौ)
पिता
बन गये बांध
समुन्दर को
बढ़ते देख
हमारी ओर।
(दस)
पिता
बन गये बिछौना
हमें नंगी जमीन पर
सोते देख कर।
000
 डा0हेमन्त कुमार

Read more...

बूढ़ी नानी

रविवार, 12 जून 2016

बूढ़ी नानी
जैसे बारिश की घास
या फ़िर वो खूबसूरत मशरूम
जो बस यूं ही
चुपके से प्रकट हो जाते हैं
पता नहीं कहां से आते हैं
या कहां जाते हैं।
तंग गलियों में
गांव के चबूतरों पर
बाबा आदम की हवेली में
अब तो पान पट्टियों पर भी
दिख जाती हैं ये बूढ़ी नानियां।
ममता वाली मुस्कान के जाल में
टाफ़ी की पुचकार से
बच्चों को अपने पास बुलाती हैं
खुद जैसे फ़टेहाल में हों
पर दूसरों पर लुटाने को खजाना
न जाने कहां से बस
आता ही जाता है।
दिन ढलते, सुपारी काटते
कहानियों का सिलसिला
जैसे जादूगरनी का खेल।
अपने बच्चे हों या पड़ोसी के
इन्हें बस चाहिये होते हैं
नन्हें मुन्ने, भोले भाले
गोल मटोल बच्चे
प्यार से वो इनका नामकरण
तक कर देती हैं
धीरे धीरे हाथ सहलाते
बालों में उंगलियां फ़िराने लगती हैं
और बात चल रही होती है
शेर का शिकार करते एक राजा की
रात बढ़ती जाती है
इनकी कहानी भी।
तभी मुन्ने की मां आती है
उसे ढूंढ़ते हुये
नानी की बाहों में झूलते
नन्हें को मां ले जाती है।
और नानी मसलती हैं
बिन दांतों वाला पोपला मुंह
मुंह ढकती ऐनक को सम्हालती
सर पर आंचल रखती नानी
गायब हो जाती हैं
किसी अंधेरी कोठरी में
अपनी काल्पनिक कहानियों की तरह।
बदस्तूर
रोज की तरह
सुबह फ़िर होती है
मासूम हंसी का पिटारा लिये
झुर्रियों वाला चेहरा
फ़िर दिख पड़ता है
नुक्कड़ पर
धूप सेंकती
बिस्कुट का पैकेट दिखाती नानी।
0000
कवयित्री:नेहा शेफ़ाली।
      

युवा कवयित्री नेहा शेफ़ाली अभी जिन्दगी का गणित सीखने की कोशिश कर रही हैं।महानगर मुम्बई में रिहाइश दौड़ते हांफ़ते आदमियों और कंक्रीट के हुजूम में इनका जेहन चेहरों को पढ़ने की कोशिश करता है।और तभी उपजती है कोई कविता या कहानी।अंग्रेजी,हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं,अखबारों में फ़ुटकर रचनाएं प्रकाशित।



Read more...

दुनियादार

रविवार, 15 मई 2016

(फ़ोटो:गूगल से साभार)
        उसका रंग एकदम काला था।एकदम चेरी बूट पालिश की तरह।लम्बाई कुल जमा साढ़े चार फ़ीट।उमर ग्यारह साल।नाम कलुआ। वैसे तो उसका नाम था राजकुमार लेकिन उसके घर वाले उसे रजुआ कह कर बुलाते थे और जब से वह नईम मियां की साइकिल रिपेयरिंग की दूकान पर काम करने आया था उसका काला रंग देख कर ही शायद नईम मियां ने उसको कलुआ बुलाना शुरू कर दिया था।उनकी देखा देखी सारे ग्राहक भी उसे कलुआ ही बुलाने लगे थे।और पिछले दो सालों में तो वह शायद अपना नाम राजकुमार भूल भी चुका था।लेकिन कलुआ की दो खास बातें भी थीं जो मुझे बेहद पसंद थीं।पहली ये कि वो हमेशा मुस्कराता रहता था। और जब वो मुस्कुराता था तो उसके काले चेहरे पर सफ़ेद दांत एकदम अलग ही दिखते थे।कलुआ की दूसरी खास बात थी उसकी गाने की आदत।वह हर समय कोई न कोई फ़िल्मी गीत अपनी बेसुरी आवाज में गाने की कोशिश करता था।खासकरमेरा नाम राजू घराना अनाम—”।वह थोड़ा तुतलाता भी था।और जब इस गाने को वह अपनी तोतली आवाज में गाता--“मेला नाम लाजू घलाना अनाम---बहती है गंगा वहां मेला घाम---”तो हर ग्राहक उसको शाबाशी देता।इसी लिये मैं हमेशा अपनी साइकिल रिपेयर कराने उसी के पास जाता था।
    आज भी जब मैं अपनी साइकिल का पंचर बनवाने पहुंचा तो कलुआ पहले से ही एक साइकिल का नट खोलने के लिये रिंच से जूझ रहा था।मेला नाम लाजू घलाना अनाम----बहती है गंगा वहां मेला घाम---” वह अपनी बेसुरी आवाज में गा रहा था और अपनी पूरी ताकत लगाकर साइकिल के पहिये का जाम हो चुका नट खोलने की कोशिश कर रहा था।पर नट जंग लगने से जाम हो चुका था और उस पर से रिंच बार-बार फ़िसल जा रही थी।मैं बहुत देर से नट खोलने की उसकी यह कोशिश देख रहा था।उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं।उसने एक बार फ़िर रिंच को नट में फ़ंसाया और पूरा जोर लगाने के चक्कर में सायकिल के पहियों पर लगभग लटक गया।रिंच फ़िर फ़िसल गयी और उसी के साथ वह भी साईकिल के पहिये पर गिर पड़ा।इसी के साथ साइकिल नईम मियां का एक झन्नाटेदार झापड़ उसके गालों पर पड़ा।
        हट बेएक घण्टे से जूझ रहा है -- साले एक ठो नट नहीं खोल पा रहा।नईम चिल्लाया और उसने रिंच उसके हाथ से छीन कर खुद ही साइकिल का जाम पड़ा नट खोलने की कोशिश की।और कलुआ किनारे खड़ा होकर अपने ग्रीस लगे हाथों से गाल सहलाता हुआ डबडबाई आंखों से नईम द्वारा की जा रही कोशिश देखने लगा।पर साइकिल का जंग लगा नट नईम से भी नहीं खुला। अंत में झुंझला कर नईम ने रिंच एक तरफ़ फ़ेंक दी और कलुआ की तरफ़ देखा।वो अभी भी गाल सहला रहा था।
   “हे ल्लोअभी तू टेसुए बहा रहा है।चल जरा इस नट पे केरोसीन डाल दे।जब तक वो फ़ूलेगा तब तक तू बाबू जी की साइकिल का पंचर देख ले---नईम कलुआ को पुचकारता हुआ बोला।लेकिन उसके स्वर में पुचकारने का भाव कम उसका मजाक उड़ाने का भाव अधिक था।
    कलुआ ने अपने ग्रीस और तेल से चीकट हो चुकी कमीज की बांह से ही अपनी आंखें पोछीं और मेरी साइकिल लिटाकर  पाने से उसका टायर और ट्यूब खोलने लगा।मुझे इस वक्त सच में बहुत ही दया आ रही थी।इस तकलीफ़देह स्थिति में मैं उससे अपनी साइकिल का पंचर नहीं बनवाना चाहता था।लेकिन मेरी मजबूरी ये थी कि बिना साइकिल बनवाए मैं आफ़िस समय पर नहीं पहुंच सकता था।और न ही नईम से ये कह सकता था कि वो कलुआ को कुछ देर के लिये आराम करने के लिये छोड़ दे।क्योंकि एक बार मैं खुद देख चुका था कि एक ग्राहक द्वारा कलुआ को मारने से रोकने पर नईम ने कलुआ को उस ग्राहक के सामने ही दो हाथ और लगा दिया था।साथ ही उस गाहक की साइकिल भी नहीं बनायी थी।उल्टा उस गाहक को जरूर नसीहत दे दिया था कि वो उसकी दूकान पर आकर कलुआ की तरफ़दारी न किया करे।
     मैं अक्सर आफ़िस आते जाते कलुआ को मार खाते देखता।कई बार मैंने यह भी सोचा कि कलुआ को वहां से हटा कर काम करने के लिये अपने ही घर पर लगा लूं।और साथ ही उसका नाम किसी स्कूल में लिखा दूं।पर नईम के बिगड़ैल स्वभाव के कारण न ही मैं नईम से कुछ कह पा रहा था न ही कलुआ से कुछ बात कर पा रहा था।
       लेकिन आज पता नहीं क्यूं मुझे लग रहा था कि कलुआ से और नईम से मुझे इस संबंध में बात करनी चाहिये।लेकिन नईम से पहले मैं कलुआ से बात करना चाहता था कि वो यहां का काम छोड़ कर मेरे घर काम करेगा?स्कूल जायेगा?
    इसी उधेड़बुन में कलुआ के पास ही बैठा अपनी साइकिल का टायर खुलते देख रहा था उसी समय मुहल्ले के शर्मा जी अपनी बाइक से आये और नईम को अपनी कार का पहिया खोलने के लिये बुला ले गये।शायद उनकी कार पंचर हो गयी थी।नईम जाते जाते कलुआ को हिदायत भी देता गया,“अबे कलुआ बाबू जी की साइकिल जल्दी सही कर बे--–और हां जरा दुकान के ध्यान रख्योहम जरा शर्मा जी की कार का पहिया लै के आय रहे हैं।आधा घण्टा लग जाई।कौनौ बदमाशी नहींनहीं तो फ़िर कुटाई होइ जाई जान ल्यो।और नईम शर्मा जी की बाइक पर बैठ कर निकल गया।
  मेरी तो लाटरी निकल गयी।मैं तो खुद ऐसे मौके की तलाश में था कि जब दूकान पर नईम न रहे और मैं कलुआ से उसके मन की बात जान सकूं।जैसे ही नईम बाइक पर गया मैं कलुआ के और पास खिसक गया।बिना कोई भूमिका बनाए मैं सीधे सीधे मुद्दे पर आ गया।
       
कल्लू ई बताओ तुम्हारा मन पढ़ने लिखने का नहीं होता?”मैंने बात की शुरुआत की।पर कलुआ शायद मेरी बात को ठीक से समझ नहीं पाया और बस टुकुर टुकुर मेरा मुंह निहारने लगा।
देखो तुम चाहो तो पढ़ाई लिखायी भी कर सकते हो और पढ़ाई के बाद अपना कोई काम धन्धा कर सकते हो।मैंने कलुआ को फ़िर समाझाने की कोशिश की।
लेकिन बाबू जी हमरी पढ़ाई का खर्चा कौन देगा।बापू अम्मा के पास तो पैसा है नाहीं।कलुआ बहुत मासूमियत से बोला।
देखो उसकी चिन्ता तुम न करोबस तुम तैयार हो जाओ।मैंने उसे आश्वासन दिया।
लेकिन बाबू जी हमारा हियां का काम और हम अपने अम्मा से तो पूछि लें ?”उसने फ़िर सवाल किया।
यहां का काम तो तुम्हें छोड़ना होगा।मैंने उसे समझाने की कोशिश की।उसी समय दूर से नईम आता दिखा और हम दोनों ने अपनी बात बंद कर दी।इस बीच मेरी साइकिल बन चुकी थी।मैंने नईम को पैसा पकड़ाया और अपनी साइकिल लेकर वहां से आफ़िस की ओर चल पड़ा।उस दिन मेरी कलुआ से बात अधूरी रह गयी।
     अगले दिन मेरी छुट्टी थी।मैं आराम से बाहर के बराम्दे में बैठा अखबार पढ़ रहा था कि कलुआ को फ़ाटक के पास खड़े देख कर चौंक पड़ा।अरे आओ कल्लू --–अंदर आ जाओबाहर क्यों खड़े हो?”और मेरे कहते ही कलुआ आ कर मेरे सामने फ़र्श पर बैठ गया।मेरे लाख कहने के बाद भी वो कुर्सी पर बैठने को नहीं तैयार हुआ।इस बीच मेरी श्रीमती जी भी वहां आकर खड़ी हो गयी थीं।
     “देखो भाई,कल्लू आया है इसे कुछ पानी वानी पिलाओ—” मैने श्रीमती जी से आग्रह किया।श्रीमती जी अक्सर मेरे मुंह से कलुआ के बारे में सुनती रहती थीं इसीलिये उनके भीतर भी कलुआ के लिये साफ़्ट कार्नर  था।उन्होंने तुरंत तश्तरी में दो लड्डू और एक गिलास पानी लाकर कलुआ के सामने रख दिया।
   कलुआ ने लड्डू की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया।बस एकटक कभी मेरी ओर कभी श्रीमती जी की तरफ़ देखता रहा। अंत में श्रीमती जी ने ही उससे कहा,“लो बेटा लड्डू खाकर पानी तो पी लो।”कलुआ ने फ़िर मेरी ओर देखा तो मैंने उसे लड्डू खाने का इशारा किया।कलुआ ने बड़े संकोच से एक लड्डू उठा कर जल्दी जल्दी खाया और गिलास का पानी एक ही सांस में पी गया।अब उसने फ़िर मेरी और श्रीमती जी की ओर बारी बारी से देखना शुरू कर दिया था।बीच बीच में वह कभी अपने हाथ की उंगलियों के नाखून कुतरने लगता। कभी नीचे देखते हुये अपने पैरों के पंजों को एक दूसरे के ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता। मैं समझ गया कि वह इस माहौल में खुद को थोड़ा असहज महसूस कर रहा है।
  मैंने उसे इस असहजता से उबारने के लिये बात शुरू कर दी।
“हां तो बताओ कल्लू -–तुमने कुछ सोचा अपने काम छोड़ने के बारे में?”मैंने उससे सीधे सीधे प्रश्न कर लिया।
    “हां बाबू जी –मैंने खुद भी बहुत सोचा और अम्मा से भी पूछा था।उन्होंने मना कर दिया।”कलुआ ने बिना किसी भूमिका के जवाब भी दे दिया।उसका सपाट जवाब सुन कर हम दोनों ही चौंक पड़े। चौंके इसलिये कि हम उम्मीद कर रहे थे कि कलुआ खुद और उसके मां बाप भी उसकी बेहतरी के लिये उसे हमारे यहां भेज देंगे।पर उसने तो सीधे सीधे जवाब दे दिया।
“लेकिन क्यों बेटा?”श्रीमती जी भी उसके जवाब को सुन कर आश्चर्य से बोलीं।
“आण्टी अम्मा कह रही थीं कि –आप लोग तो दुई चार साल में चले जायेंगे फ़िर हमें कहां काम मिलेगा---फ़िर लौट के हमें ओही नईम की दूकान पर काम मांगने जाना होगा।”कलुआ बड़ी मासूमियत से बोला।
“लेकिन कल्लू बेटा हम तो तुम्हें स्कूल भी भेजेंगे।तुम्हें पढ़ाएंगे---।”
“बाबू जी हम का करेंगे पढ़ि लिख के---आखिर काम तो उसी नईम के यहां ही करना पड़ेगा।नईम की नहीं तो कौनो और दूकान पे।”
“लेकिन बेटा --–वो तुम्हें इतना मारता भी तो है—यहां कोई तुम्हें मार थोड़े ही रहा।”मैंने उसे एक बार और समझाने की कोशिश की।
“अरे बाबू जी—कोई गलती होई जाती है हमसे तबै तो मारते हैं नईम अंकल।अउर ई बात की का गारण्टी कि हमें इहां मार नहीं पड़ैगी।बाबू जी ई छोटी सी उमर में हम बहुत दुनिया देखे हैं और दुनियादारी समझते भी हैं---पहिले सब लोग बहुत बात करत हैं।बाद में सारी बातें धरी रहि जाती हैं--- कभी चोरी का इल्जाम लगाय दिया जाता है तो कभी चकारी का।”कलुआ बड़े बुजुर्गों की तरह बोल रहा था और मैं श्रीमती जी के साथ उसकी बड़ी बड़ी बातें सुन रहा था।
“तो यही लिये हम ई फ़ैसला किये हैं कि हम वहीं ठीक हैं।अच्छा अब हम जाय रहे हैं दुकान खोलने का टैम होइ गवा हैं।नमस्ते बाबू जी----।”कलुआ जल्दी से बोला और हमे नमस्ते करके जल्दी से फ़ाटक खोल कर निकल गया।हम लोग अवाक से उसे जाता देखते रहे।
    अगले दिन मैं फ़िर साइकिल में हवा भरवाने नईम की दूकान पर पहुंचा।कलुआ पसीने में तर बतर एक साइकिल के पहिये से जूझ रहा था और साथ ही अपने उसी मस्ती भरे अंदाज में गा रहा था---मेला नाम लाजू घलाना-----।”मैंने अपनी साइकिल में हवा ली और आफ़िस की ओर चल पड़ा।
                              00000

डा0हेमन्त कुमार

Read more...

लेबल

‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीताश्री गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहाड़ पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लू लू की सनक लेख लेख। लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. Bअच्चे का विकास। Breast Feeding. Child health Child Labour. Children children. Children's Day Children's Devolpment and art. Children's Growth children's health. children's magazines. Children's Rights Children's theatre children's world. Facebook. Fader's Day. Gender issue. Girls Kavita. lekh lekhh masoom Neha Shefali. perenting. Primary education. Pustak samikshha. Rina's Photo World.रीना पीटर.रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया.तीसरी आंख। Teenagers Thietor Education. Youth

हमारीवाणी

www.hamarivani.com

ब्लागवार्ता


CG Blog

ब्लागोदय


CG Blog

ब्लॉग आर्काइव

  © क्रिएटिव कोना Template "On The Road" by Ourblogtemplates.com 2009 and modified by प्राइमरी का मास्टर

Back to TOP