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बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत !

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

(पिता जी के जाने के बाद से घर में एक अजीब सा खालीपन आ गया है--वक्त बेवक्त हम सभी की नजरें उन्हें ही खोजती हैं.हर वक्त लगता है की शायद कहीं गए हैं ---आ जायेंगे कुछ देर में ..लेकिन --पिता जी की रचनात्मकता तो हर समय हमारा मार्ग दर्शन करेगी .---यही सोच कर ही आज मैं उनकी एक काफी पहले प्रकाशित कहानी को ब्लाग पर पुनः प्रकाशित कर रहा ...)

     बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत !
--प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव


बाबू जी ! दरवाजे के बाहर से आवाज आई।
मैं सम्पादकीय लिखने में व्यस्त था।सिर उठाकर देखा---दो भूरी आंखे दरवाजे पर पड़े हुये पर्दे के पीछे से झाँक रहीं थी।
अन्दर चले आओ।मैंने कहा।वह अन्दर चला आया।काले कपड़े का जांघिया, आधी बांह की कमीज, नंगे पैर, रूखे ओर उलझे हए बाल-अपनी इस वेशभूषा में लगभग बीस साल का वह युवक मेरी मेज के सामने खड़ा था।
क्या काम है ?’ मैंने पूछा।
आपको नौकर की जरूरत है?’
मेरी दृष्टि सामने रखी ट्रेपर जम गई।जिसमें एक नौकर की जगह के लिए आए हुए 26 आवेदनपत्र पड़े हुए थे।मुझे अखबारों को पैक करने वाले एक लड़के की जरूरत थी।वेतन केवल 20 रूपए प्रतिमास था, फिर भी नित नए आवेदन पत्र चले ही आ रहे थे। 27 वां आवेदनकर्ता प्रत्यक्ष मेरे सामने था।
कुछ पढ़े-लिखे भी हो ?’
जी, इन्टर तक!कहने में उसे कुछ संकोच हुआ और सुनकर मुझे अविश्वास।
उसका सार्टीफिकेट ?’ मैंने मांगा।
जी,वही होता तो.................।और वह अटक गया।उसके चेहरे की उदासी,मुझे लगा, कुछ गहरी हो चली थी।सहसा कुछ सचेत से स्वरों में बोला-आप मेरी परीक्षा ले लें। और उसकी आँखों में आशा की ज्योति झिलमला उठी।
                ‘तुम्हारे पिता का नाम और निवास-स्थान ?’ मैंने अगेंजी में पूछा। सम्पादक की गद्दी परीक्षक की कुर्सी बन गई।
       स्वर्गीय हरनामसिंह एम.ए., एल.एल.बी., एडवोकेट, निवास स्थान अनारकली लाहौर था।उसने स्वाभाविक लहजे में उत्तर दिया।
       तो तुम शरणार्थी हो?’ मैंने किंचित भी विस्मय न प्रकट करते हुए पूछा।हिन्दुस्तान की यह अभागी कथा पुरानी हो चली थी।
जी।
इसके पहले क्या करते थेमैंने अंग्रेजी में ही प्रश्न किया।
   एक वर्ष तक अपने पिता के एक मित्र के यहाँ क्लर्क रहा।फिर फलों की दूकान की, वह भी न चल सकी। कुछ पैसे उधार लेकर कपड़ों की फेरी लगानी शुरु कर दी थी।मगर किस्मत ने यहाँ भी धोखा दिया।एक दिन सब कपड़े चोर उठा ले गए और मैं दो सौ का कर्जदार बन गया।पिछले पांच महीनों तक रिक्शा खींचकर उसका कर्जा अदा किया।अब आपके सामने हूं।उसका यह संक्षिप्त उत्तर था।
                इस प्रकार कीरत सिंह मेरे सम्पर्क में आया।यह एक वर्ष पहले की शाम की घटना है।
                प्रेस के पास ही एक गली में कीरत सिंह को मकान मिल गया।शाम को उसके दरवाजे पर पहुंचा तो देखा तो कि वह एक अंगौछे में कोई वस्तु लटकाये सामने से चला आ रहा था।जन्माष्टमी का दिन था।सोचा---व्रत होगा,उसी के लिए फलाहार आदि होगा।मगर जब वह मुस्कराता हुआ नजदीक आकर खड़ा हो गया तो मैं उसके अंगौछे में होती हरकत देखकर चौंक उठा।कीरतसिंह गोश्त नहीं खाता था।खाना तो दूर रहा, उसका जिक्र आते ही वह नाक भौं सिकोड़ने लगता और महापुरूष के जन्म दिन पर.........।
                ‘क्यों, जीवित मछलियां हैं न ?’ मैंने व्यंगपूर्वक पूछा।सुनकर वह झेंपा और मेरा संदेह विश्वास में बदल गया।
                किन्तु दूसरे क्षण ही जब उसने अंगौछे की वस्तु मेरे सामने डाल दी तो मैं अवाक रहा गया। वह कुत्ते का एक मरियल सा पिल्ला था, नाली के दुर्गन्ध युक्त गन्दे काले कीचड़ में सना हुआ।शीघ्र ही उसकी बद्बू से समीप का वायुमण्डल भर उठा।घृणा से अपनी नाक पर रुमाल रखता हुआ मैं बोला-ओफ, पागलपन की हद कर दी, तुमने।आज जन्माष्टमी के दिन तो भगवान के नाम पर पवित्र रहते।
                ‘क्या बताँऊ!उधर से चला आ रहा था।बस, नाली में पड़ा हुआ यह कमबख्त मिल गया। छोटे-छोटे बच्चे इस पर कंकडि़यां बरसा रहे थे।दो चार मिनट की और देर हो जाती तो सब कुछ खत्म था, कहकर कीरत सिंह ने वह सांस ली जैसे घर का कोई व्यक्ति प्लेग या हैजे से पीडि़त हो गया हो ।
                ‘तो क्या अब इसकी पूजा करोगे ?’मैने खीझ कर पूछा।
                ‘अजी मैं गरीब इस लायक कहाँ! हाँ, नहला धुला दूंगा तो दो एक हफ्तों में अच्छा दिखने लगेगा।फिर कोई पालना चाहेगा तो अपने यहाँ उठा ले जायेगा।और कहकर वह उसे नल के नीचे उठा ले गया।
       नहले पर दहला पड़ा चुका था।मैं चुपचाप लौट आया।
                अभी परसों की ही तो बात है-
                     सड़क पर बच्चों का शोर सुनकर बाहर निकल आया।देखा, छोटे बच्चों की एक पूरी फौज कीरत सिंह को घेर कर खड़ी थी।वह लेमनजूस की गोलियाँ बाँट रहा था।गली के सभी बच्चे थे--- बनिये के भी और भंगी के भी, कुछ उजले कपड़ों में, कुछ गँदले चीथड़ों में। मगर व हँसता हुआ बगैर किसी भेदभाव के,सब की हथेलियों पर एक-एक दो-दो गोलियाँ रखता जा रहा था और बच्चे थे कि पूरे शैतान के औतार। कीरत सिंह की सफ़ेद कमीज पर नन्हे-नन्हें हाथों के धब्बे प्रति क्षण बढ़ते जा रहे थे। इस धमाचौकड़ी में किसी--किसी का भरपूर हाथ भी उसके आगे पीछे पड़ जाता था।फिर भी वह खिलखिला कर हँसता हुआ, उन्हें अपनी प्यार भरी बातों से हँसाता हुआ अपनी डयूटी पर मुस्तैद।
                मैं आत्म विभोर खड़ा देखता रहा-----.देखता रहा उसका वह अत्यन्त सरल व्यक्तित्व! बच्चों से क्या और बड़ों से क्या--- सभी से एक मीठा चाशनी से भी अधिक मीठा स्नेह और बेलाग मुहब्ब्त--- प्रेस के सारे कर्मचारी,उसके भाई साहब,और मैं उन्हीं मे खो चला।बच्चे शोर कर रहे थे, कीरत सिंह खिलखिला रहा था,मगर मैं इन सबसे ऊपर उठ रहा था,बहुत ऊपर----।
                मैं अपने कमरे में लेटा अपने अखबार के ताजे अंक को उलट-पलट रहा हूं।मगर कानों के परदों को फाड़ती हुई एक ध्वनि भीतर घुस रही है---हरे कृष्णा, हरे कृष्णा हरे हरे............!जन्माष्टमी का दिन,मंदिर में चौबीस घण्टे का अखण्ड कीर्तन और लाउड स्पीकर चीख रहा है-हरे राम हरे राम हरे कृष्णा हरे कृष्णामैं डूब चला हूँ। कीर्तन में मानव कंठ ही नहीं अनेक बाजों का सहयोग है।पंचम स्वर में एक विचित्र खिचड़ी राग उठ रहा है।मगर सभी उसमें झूम रहे हैं, कारण कि सबकी आत्मा भगवान कृष्ण के भक्ति रस से ओत-प्रोत है--भगवान के अनन्य भक्त हैं वे,श्रद्धालु सेवक कि जो निर्जल व्रत हैं!
                और यह मंदिर के दरवाजे पर बैठी है भिखमंगों की पांत! अपनी झपकती आंखों से सूखी ठठरी को गीले फर्श गीली दीवार का सहारा दिये वे द्वार की ओर टकटकी लगाये हैं।त्रिलोकी नाथ के जन्म की खुशी में भादों के जलधर उमड-घुमड़ कर बरस रहे है।और ये दरिद्र नारायण नर-नारायण पर आशा लगाए धैर्य की मूर्ति बने बैठे भीग रहे हैं।बारह बजे भगवान का जन्म होगा।भक्त इसी रास्ते से बाहर निकलेंगे। और उनकी फैली हुई झोली पर दो चार खीरे और अमरूद के टुकड़े पड़ जायेंगे। फिर वे एक दूसरे पर टूट पड़ेंगे, आपस में उलझ जायेंगे! ठीक उन कुत्तों की तरह जो पत्तल की जूठन के लिए जूझते हैं, फिर भी अतृप्त, फिर भी प्यासे के प्यासे।मैं और भी नीचे डूबा--यह कीरत सिंह, जन्माष्टमी का पु्ण्य पर्व, वह गंदगी में लिपटा हुआ कुत्ते का घिनौना पिल्ला, वह उसकी भावना, वह उसका पागलपन और यों हमारे सामने से गुजरती चली गयी जीवन निर्माण की पगडंडी।
                और मैं हड़बड़ा कर बैठ गया हूँ।मेरी दृष्टि सामने दीवार से लटकते चित्र पर जम गयी है-- कालिदास का विरही यक्ष बद्धांजलि हो अपनी प्रियतमा के पास संदेश भेज रहा है और संदेश वाहक कौन कि कारे कजरारे मेघ, जो अम्बर की छाया में धरती पर छाया करते उड़े चले जा रहे हैं दूर यक्ष की प्रिया के देश, मेघदूत।
                और मैं तल-तक करीब-करीब जा पहुँचा, जहाँ रूपहली बालू और मटमैली मिट्टी की पहचान आसान होती है। बशर्ते की आंखे खुली हों और दिल धडकन करता हो। कीरत सिंह की भावनायें, उसका संदेंह अथवा कि वह स्वयं संदेश वाहक, पहुँचाये किसके हृदय तक? पता नहीं, यक्ष का मेघदूत भी उसी की तरह संवेदशील था अथवा नहीं, महाकवि के काव्य की आत्मा जाने, किन्तु कीरत सिंह ?
                एकाकी जीवन में कीरत सिंह को भोजनादि की बड़ी दिक्कत थी।इसे वह भी महसूस करता था और मैं भी, किन्तु ऐसे परिवार हीन व्यक्ति को, जिसे कोई एक घूंट पानी देने वाला भी न हो, कोई अपनी कन्या देने के लिए तैयार न होता था।एक दिन मैंने उसके योग्य बहू ढूंढ भी निकाली।ब्याह का दिन भी निश्चित हो गया,मगर ब्याह के ठीक दो दिन पहले बड़े तड़के ही वह प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह आकर मेरे सामने खड़ा हो गया।दरी में लिपटा हुआ छोटा सफरी बिस्तरा एक हाथ में तथा डेढ़ हाथ का शीशम का डंडा दूसरे हाथ में।सिर पर दुपलिया टोपी, पैर में पंजाबी जूते और यों किसी भी सफर के लिए पूरी तैयारी ।
                आते ही बोला-पन्द्रह दिन की छुट्टी दीजिए
                ‘और तुम्हारा ब्याह मैंने रुष्ट होकर पूछामैं जानता था यह तारीख टली तो उसके ब्याह की बात भी हमेशा के लिए गई।
 अजी, वह तो होता रहेगा।भूकम्प की खबरें आपने तो पढ़ी ही होगीं।सारा आसाम तबाह हो गया।क्या इस समय वहां के लोगों की सहायता न करना देशद्रोह न होगा? उसने गम्भीर होकर कहा।
मैं स्तब्ध और जबान बन्द! उसे छुट्टी मिल गई।
                वह ठीक पन्द्रह दिन बाद लौटा, मगर स्वस्थ गया था बीमार आया।बीसों जगह पट्टियाँ बंधी थीं।हाथ की एक हड्डी भीइ सरक गई थी।यह भूकम्प पीडि़तों की रक्षा का प्रसाद था।वहां के बरसाती मच्छरों ने उसका पूरी तरह स्वागत किया था।मकानों के मलवे हटाने में उसे कई जगह गहरे घाव भी आ गए थे।फिर भी उस ने हँस-हँसकर अपना काम किया और हँसता हुआ ही वह मेरे सामने खड़ा था।भूकम्प पीडितों के समाचार पूछने पर भरी हुई आंखें और रुंधा हुआ गला, मगर स्वयं अपनी परेशानियों का जिक्र आने पर वही पूर्व परिचित खिल........खिल!
                सगे सम्बन्धियों को खो कर, लाखों की सम्पत्ति से हाथ धोकर, जन्मभूमि से बिछुड़ कर भी वह धरती-पुत्र अजेय सरलता, अजस्र मुस्कान और निःस्वार्थ त्याग लेकर जिन्दगी के हर मोर्चे पर खिलखिलाता हुआ! वह कालिदास का बीसवीं सदी का जीता जागता मेघदूत!
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प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।
31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।
शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला। 

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खेत आज उदास है

शनिवार, 3 सितंबर 2016

खेत आज बहुत विवश और उदास है
एक अजीब-सा डर उसके
अस्तित्व पर कब से डोल रहा है

हरी-पीली लहराती धारियों पर अब
वह ताज़गी भरी शुद्धता की धुनें नहीं गूंजती।

मिट्टी उद्भ्रांत है
उसके मुख से लेकर अंतर्मन तक को
रासायनिक उर्वरकों के
कसैले स्वाद वाले धीमे ज़हर ने

निर्ममता से बेध डाला है।
और इधर सदमे में है उसकी प्रिय संतान
उसका प्रिय धरतीपुत्र ..
जो जा रहा है धीरे-धीरे

ऐसी मूर्छा की ओर, जहाँ
मौसम के वैभव की गन्ध भी

उसपर निष्प्रभावी हो जाएगी।

सदमे में है मिट्टी का प्यारा पुत्र
कि पावस छल करने लगे हैं उसके साथ
हीरे-पन्नों की लहरों पर
तन्मय होकर नाचता नहरों का पानी
कब से अपने विस्तार को तलाशता-तलाशता
थककर मौन हो चला।

उदास है घर की बड़ी बेटी
कि खेत से बहकर आने वाली हवा
अब चुप सी हो गई है

नहीं थिरकते उसके आँचल पर
परंपरा और संस्कृति वाले रोपनी के गीत।

उदास है वह बेटी
कि अब अग्गौं* से मिलनेवाले
खनकते सिक्के,चमकते हरे नोट
बीते दिनों की बात हो गई

जिन पैसों से खरीदती थी वह अपने लिए
रंग-बिरंगे गोटों वाली ओढ़नी
और रुन-झुन करती पायल

कि हवाओं के सुरों से मिलकर
जिसका संगीत गूँज उठता था

गाँव की तलैया से होते हुए
पर्वत वाले झरने तक।

नदी के पानी से मिट्टी को सानकर
हर सावन में गढ़ती है वह अब भी नए शिव
पर उम्मीदों के पहाड़ को
रुई की तरह धुनकर

बिखेर देता है सावन आसमान पर
भटक गई है मेघ-गीतों की तल्लीनता आतप्त वृत्तों में।
उदास है वह बेटी
कि मुरझाये सपनों का इक बोझ है
उसकी सूनी आँखों में

और झाँकता है गहरा विक्षोभ
घर के आइनों से

झनझना कर टूटते सपनों का
एक बोझ है उसके पिता की आँखों में
और इन बोझों के लिए जिम्मेवार
एक गहरी शर्मिंदगी का बोझ है
बहुत हीं उदास मिट्टी की थकी,
झिपकती-सी आँखों में ..।

टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त हो
बेबस होकर जिंदा है

वैभव खोकर बंजरपन में
मृदा आज शर्मिंदा है ll
000
कवयित्री

कंचन पाठक
चर्चित युवा कवयित्री और लेखिका कंचन पाठक की कविताएं आम आदमी से और जमीन से सीधी जुड़ी हैं।उन्होंने आम आदमी के साथ साथ धरती के,गांव के,किसानों के,स्त्री के और पूरी प्रकृति के दर्द को महसूस किया है और इसी लिये इन्हें अपनी कविताओं का विषय बनाया है।कंचन की अभी तक एकल और संयुक्त चार काव्य और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।“इक कली थी”(एकल काव्य-संग्रह),सिर्फ़ तुम (संयुक्त काव्य-संग्रह),काव्यशाला (संयुक्त काव्य-संग्रह),सिर्फ़ तुम (कहानी संग्रह),कविता अनवरत (काव्य-संग्रह)।कई सम्मानों से सम्मानित कंचन पाठक पत्र-पत्रिकाओं के साथ ब्लाग लेखन में भी सक्रिय हैं।
सम्पर्क:मेल आईडी-pathakkanchan239@gmail.com
ब्लॉग–स्वर्णरेणुकाएँ (www.kanchanpathak.blogspot.in
वेबसाइट–kanchanpathak02.wordpress.com 
*अग्गौं - कटनी के समय खेत की पहली फसल का पहला हिस्सा जिसपर घर की बड़ी बेटी का अधिकार होता है l







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“बालवाटिका” के “संस्मरण” और “पर्यावरण” विशेषांक….।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

             
     आज विज्ञापनों की चकाचौंध और बाजारवाद के युग में कोई पत्रिका निकालना और उसके स्तर को बरकरार रखना अपने आप में एक कठिन काम है।खासकर बच्चों की पत्रिकाओं के सन्दर्भ में यह बात ज्यादा लागू होती है।और उस स्थिति में तो और जब आपको यह पत्रिका पूरी तरह अपने बलबूते पर निकालनी हो।जब आपके पास प्रकाशन का एक बड़ा सेटप न हो।जब आपको पत्रिका के लिये स्तरीय सामग्री जुटाने से लेकर उसके प्रकाशन और प्रचार प्रसार की व्यवस्था खुद ही सम्हालनी हो।जब आपके पास सबसे बड़ी समस्या पत्रिका में खर्च किये जा रहे धन की वापसी की हो।ऐसी ही कई गम्भीर समस्याएं हैं जिनसे एक गैर व्यावसायिक पत्रिका निकालने वाले को रूबरू होना पड़ता है।और इन सारी मुसीबतों को झेलते हुये अगर कोई बाल पत्रिका निकालने का साहस कर रहा है तो वह निश्चय ही बाल साहित्य,बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान कर रहा है।
                  कुछ ऐसे ही संघर्षों के दौर से गुजरते हुये खुद को स्थापित किया है बाल पत्रिकाबालवाटिकाने।मैंबालवाटिकाका कई वर्षों से पाठक हूं।पर इधर के कुछ सालों में मैंबालवाटिकासे पाठक के साथ  ही बतौर लेखक भी जुड़ गया हूं।इसके अंकों के कलेवर में इधर जो सकारात्मक बदलाव आये हैं उसका पूरा श्रेय पत्रिका के सम्पादक डा0 भैरूंलाल गर्ग जी के साथ पत्रिका की पूरी सम्पादकीय टीम को जाता है।डा0भैरूं लाल गर्ग जी सिर्फ़ बालवाटिकानाम की पत्रिका नहीं निकाल रहे बल्कि हिन्दी बाल साहित्य के प्रचार और प्रसार के साथ इस पत्रिका के माध्यम से हिन्दी बाल साहित्य के नये और पुराने रचनाकारों को जोड़ने और उन्हें एक मंच पर एकत्रित करने की वह साधना कर रहे जो एक समर्पित सन्यासी ही कर सकता है।
   “बालवाटिकाके इधर आये विशेषांकों में दो विशेषांक तो बहुत ही महत्वपूर्ण और संग्रहणीय हैं।पहला संस्मरण विशेषांक”(मई-2016) और दूसरापर्यावरण विशेषांक”(जून-2016)
               पहले मैं बात करूंगा बालवाटिका केसंस्मरण विशेषांककी।बच्चों को उपलब्ध बाल साहित्य में ज्यादातर कहानियां,कविताएं,नाटक,गीत,निबन्ध,उपन्यास,यात्रा वृत्तान्त या अन्य रोचक और रोमांचक सामग्री ही पढ़ने के लिये मिल पाती है।लेकिन कभी कभी बच्चों के मन में भी यह सवाल जरूर आता होगा कि उनके लिये ये सारा साहित्य कौन लिखता है?उनका जीवन कैसा होता होगा?या उनका बचपन कैसे बीता होगा?क्या वो लोग भी उन्हीं की तरह बचपन में शरारतें करते रहे होंगे?या इस जैसे ही और भी ढेरों प्रश्न।
                     बच्चों की ऐसी ही जिज्ञासाओं को शान्त करेगाबालवाटिकाका संस्मरण विशेषांक।जिसमें नये पुराने लगभग 28 प्रतिष्ठित बाल साहित्यकारों के बचपन की यादों को संजोया गया है।बचपन के संस्मरणों के इस खण्ड में बच्चे अपने सभी प्रिय लेखकों प्रकाश मनु,राम दरश मिश्र,देवेन्द्र कुमार,दिविक रमेश,डा0 भैरूं लाल गर्ग,रमेश तैलंग,सूर्यनाथ सिंह,मंजुरानी जैन,प्रहलाद श्रीमाली,गोविंद शर्मा, जैसे स्थापित नामों के साथ ही नागेश पाण्डेय,रेनु चौहान,रावेन्द्र रवि जैसे युवा बाल साहित्यकारों के बचपन की यादों को पढ़ सकेंगे। और उनकी ये यादें निश्चित रूप से बच्चों के मन को गुदगुदाएंगी।यहां मेरा मकसद संस्मरण लेखकों के नाम गिनाना नहीं बल्कि मैं बाल पाठकों के उस आनन्द को बताना चाहूंगा जो इन संस्मरणों को पढ़ कर वो महसूस करेंगे।कि अरे तो ये हमारी तरह ही साहित्यकार भी बचपन में इतनी शरारतें करते थे?इन्होंने भी बगीचे से अमरूद तोड़ा है? या इन्होंने भी स्कूल की कक्षा छोड़ कर शैतानियां की।फ़िर उस समय उनका मन जिस तरह आह्लादित होगा उसे हम भी इन संस्मरणों को पढ़ कर ही महसूस कर सकते हैं।एक बात और ये संस्मरण निश्चित रूप से बच्चों को कुछ अच्छा करने की प्रेरणा भी देंगे।इस दृष्टि से बाल वाटिकाका यह संस्मरण विशेषांक महत्वपूर्ण है।
        इन संस्मरणों के साथ ही इस अंक में बच्चों के ज्ञानवर्धन के लिये अलग अलग विषयों पर तीन लेख,मो0अरशद खान,विनायक और पंकज चतुर्वेदी की कहानियां,लगभग 14 बाल कविताएं तथा तीन पुस्तकों की समीक्षाएं प्रकाशित हैं।यानि कि वो सभी सामग्रियां जो एक अच्छी पत्रिका में होनी चाहिये।
                      अब थोड़ी बातबालवाटिकाकेपर्यावरण विशेषांककी।ये तो हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण इस समय हमारे पूरे विश्व की चर्चा के केन्द्र में है।पूरी दुनिया में लोग अपनी इस धरती के बिगड़ते जा रहे पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं,इस असन्तुलित होते जा रहे पर्यावरण को कैसे बचाया जाय इस पर चर्चाएं।,कोशिशें कर रहे।लोगों को सचेत कर रहे कि अभी भी समय है सम्हल जाओ और बचा लो अपनी इस धरती और यहां की प्राकृतिक सम्पदा को अन्यथा समय निकल जाने पर सिवाय धरती के विनाश के कुछ भी सम्भव नहीं रहेगा।
    तो ऐसे माहौल में हमारा यह भी कर्तव्य बनता है कि हम अपने इस पर्यावरण और धरती के प्रति अपनी सभी चिन्ताओं,विचारों,प्रयासों में अपने बच्चों को भी शामिल करें।उन्हें भी इस पर्यावरण असन्तुलन की भयावहता के बारे में बताएं।उन्हें भी इसे रोकने और धरती को बचाने के उपायों को समझाएं।क्योंकि अन्ततः धरती पर हामारे बाद हमारे बच्चों को ही रहना है।तो क्या हम उन्हें यह धरती ऐसे ही विनाश के कगार पर पहुंचा कर दे देंगे?हमें निश्चित रूप से अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताना होगा कि हमारी किन गलतियों के कारण हमारी धरती इस हालत तक पहुंची है?हम इसे कैसे बचा सकते हैं?
           “बालवाटिकाका पर्यावरण विशेषांक निकालने के पीछे संपादकीय टीम का भी मकसद अपने बाल पाठकों को इस धरती पर बढ़ रहे पर्यावरणीय असन्तुलन को बताना और इसे रोकने के उपायों के प्रति जागरूक करना था।यह बात इस अंक में प्रकाशित सामग्री को पढ़ने से स्पष्ट हो जाती है।इस अंक में भी बच्चों के लिये प्रतिष्ठित रचनाकारों की लगभग नौ कहानियां,नौ ही कविताएं,पांच लेख और आठ संस्मरण तथा पुस्तक समीक्षाएं हैं।यानि कि बच्चों के मनोरंजन और ज्ञानवर्धन की पूरी सामग्री।बालवाटिकाका यह पर्यावरण विशेषांक निश्चित रूप से बच्चों तक पर्यावरण संरक्षण का सन्देश पहुंचाने मे सक्षम होगा।और यही पत्रिका के इस विशेषांक का मकसद भी है।
                “बालवाटिकाके इन दोनों अंकों का कलेवर निश्चित रूप से किसी व्यावसायिक पत्रिका से कम नहीं है।साथ ही इन अंकों में प्रकाशित सामग्री का स्तर भी पत्रिका को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।
        “बालवाटिकासे जुड़े एक प्रसंग का मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा।इसके दोनों अंकों को मेरे पास देख कर मेरे एक मित्र (प्रतिष्ठित उपन्यासकार )ने मुझसेबालवाटिकाके दोनों अंक एक दिन के लिये उधार लिया।और अगले दिन पत्रिका वापस करते समय उन्होंने जो बात कही वह चमत्कृत करने वाली थी।उन्होंने कहा किभाई बालवाटिका तो बाल साहित्य कीहंसहै।यह बालवाटिका के लिये एक बहुत ही गौरवपूर्ण टिप्पणी है।
      कुल मिलाकरबालवाटिकाकेसंस्मरणऔरपर्यावरणदोनों ही विशेषांक बाल पाठकों का मनोरंजन, ज्ञानवर्धन तो करेंगे ही साथ ही उन्हें आगामी भविष्य के लिये एक बेहतर नागरिक के रूप में तैयार भी करने का प्रयास करेंगे। इसके लियेबालवाटिकाकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई और साधुवाद।
                      0000
डा0हेमन्त कुमार

  

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पिता (दस क्षणिकाएं)

रविवार, 19 जून 2016

(मेरे पिता जी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव ।जो आज 87 वर्ष
की उम्र में भी लेखन में पूरी तरह सक्रिय हैं।ईश्वर आपको दीर्घायु करें।)
(एक)
पिता
विशाल बाहुओं का छत्र
वट वृक्ष
हम पौधे
फ़लते फ़ूलते
वट वृक्ष की
छाया में।
(दो)
पिता
अनन्त असीमित आकाश
हम सब
उड़ते नन्हें पाखी।
(तीन)
हम
लड़खड़ाते
जब जब भी
सम्हालते पिता
आगे बढ़ कर
बांह पसारे।
(चार)
आंसू
बहते गालों पर
ढाढ़स देता
पिता के खुरदरे
हाथों का स्पर्श।
(पांच)
पिता
बन जाते उड़नखटोला
हम करते हैं सैर
दुनिया भर की।
(छः)
हमारी ट्रेन
खिसकती प्लेटफ़ार्म से
पिता
पोंछ लेते आंसू
पीछे मुड़कर।
(सात)
पिता
बन जाते हिमालय
कोई आक्रमण
होने से पहले
हम पर।
(आठ)
जब भी
आया तूफ़ान कोई
हमारे जीवन में
पिता बन गये
अजेय अभेद्य
दीवार।
(नौ)
पिता
बन गये बांध
समुन्दर को
बढ़ते देख
हमारी ओर।
(दस)
पिता
बन गये बिछौना
हमें नंगी जमीन पर
सोते देख कर।
000
 डा0हेमन्त कुमार

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बूढ़ी नानी

रविवार, 12 जून 2016

बूढ़ी नानी
जैसे बारिश की घास
या फ़िर वो खूबसूरत मशरूम
जो बस यूं ही
चुपके से प्रकट हो जाते हैं
पता नहीं कहां से आते हैं
या कहां जाते हैं।
तंग गलियों में
गांव के चबूतरों पर
बाबा आदम की हवेली में
अब तो पान पट्टियों पर भी
दिख जाती हैं ये बूढ़ी नानियां।
ममता वाली मुस्कान के जाल में
टाफ़ी की पुचकार से
बच्चों को अपने पास बुलाती हैं
खुद जैसे फ़टेहाल में हों
पर दूसरों पर लुटाने को खजाना
न जाने कहां से बस
आता ही जाता है।
दिन ढलते, सुपारी काटते
कहानियों का सिलसिला
जैसे जादूगरनी का खेल।
अपने बच्चे हों या पड़ोसी के
इन्हें बस चाहिये होते हैं
नन्हें मुन्ने, भोले भाले
गोल मटोल बच्चे
प्यार से वो इनका नामकरण
तक कर देती हैं
धीरे धीरे हाथ सहलाते
बालों में उंगलियां फ़िराने लगती हैं
और बात चल रही होती है
शेर का शिकार करते एक राजा की
रात बढ़ती जाती है
इनकी कहानी भी।
तभी मुन्ने की मां आती है
उसे ढूंढ़ते हुये
नानी की बाहों में झूलते
नन्हें को मां ले जाती है।
और नानी मसलती हैं
बिन दांतों वाला पोपला मुंह
मुंह ढकती ऐनक को सम्हालती
सर पर आंचल रखती नानी
गायब हो जाती हैं
किसी अंधेरी कोठरी में
अपनी काल्पनिक कहानियों की तरह।
बदस्तूर
रोज की तरह
सुबह फ़िर होती है
मासूम हंसी का पिटारा लिये
झुर्रियों वाला चेहरा
फ़िर दिख पड़ता है
नुक्कड़ पर
धूप सेंकती
बिस्कुट का पैकेट दिखाती नानी।
0000
कवयित्री:नेहा शेफ़ाली।
      

युवा कवयित्री नेहा शेफ़ाली अभी जिन्दगी का गणित सीखने की कोशिश कर रही हैं।महानगर मुम्बई में रिहाइश दौड़ते हांफ़ते आदमियों और कंक्रीट के हुजूम में इनका जेहन चेहरों को पढ़ने की कोशिश करता है।और तभी उपजती है कोई कविता या कहानी।अंग्रेजी,हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं,अखबारों में फ़ुटकर रचनाएं प्रकाशित।



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