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प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार और कहानीकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के 90वें जन्मदिवस पर हुआ “बालवाटिका” पत्रिका का लोकार्पण

मंगलवार, 12 मार्च 2019


     प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार और कहानीकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के 90वें जन्मदिवस पर  हुआ “बालवाटिका” पत्रिका का लोकार्पण

                श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव हिंदी के प्रतिष्ठित कहानीकार,लेखक और बालसाहित्यकार हैं।दिनांक 11मार्च को उनका 90वां जन्मदिन हिंदी के प्रतिष्ठित दैनिक “जन्संदेश टाइम्स” लखनऊ के सभाकक्ष में मनाया गया।इस अवसर पर भीलवाड़ा,राजस्थान से प्रकाशित बच्चों की स्थापित पत्रिका ”बालवाटिका” के श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव पर केन्द्रित मार्च-2019 अंक का लोकार्पण भी संपन्न हुआ।इस अवसर पर लखनऊ एवं कानपुर के बालसाहित्यकार,पत्रकार एवं प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के पाठक एवं प्रशंसक मौजूद थे।
                                 
   
         दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तस्वीर पर माल्यार्पण के पश्चात  उपस्थित समस्त अतिथियों ने “बालवाटिका” पत्रिका का लोकार्पण किया।
         कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कानपुर से आये वरिष्ठ बाल साहित्यकार कौशल पाण्डेय ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य के प्रति सपर्पण की बात बताते हुए कहा कि “प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का 1950 से शुरू हुआ लेखन जीवन पर्यंत चलता रहा।उन्होंने बड़ों की  कहानी,रेडियो नाटकों के लेखन के साथ ही प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य भी लिखा।उनकी 50से ज्यादा किताबें भी प्रकाशित हुयी लेकिन उन्होंने जीवन में न ही कभी किसी प्रकाशक से किताबें छापने का अनुरोध किया न ही किसी समीक्षक,आलोचक से अनुरोध किया कि वो उनकी किताबों की समीक्षा करे या उस पर टिप्पणी लिखे।न ही किसी रंगकर्मी से अपने नाटकों के मंचन की बात कही। इस मामले में प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी साहित्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित और स्वाभिमानी  व्यक्तित्व वाले लेखक थे।”

    इस अवसर पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि डा० सुभाष राय ने “बालवाटिका” पत्रिका की चर्चा करते हुए कहा कि “बालवाटिका” का बाल साहित्यकारों के समग्र जीवन को पाठकों से जोड़ने का यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है।उन्होंने पत्रिका में प्रकाशित प्रेमस्वरूप जी की बात का उदाहरण देते हुए कहा कि ”पत्रिका में डा० हेमन्त कुमार ने इस बात का उल्लेख किया है कि प्रेमस्वरूप जी कहा करते थे कि “अगर उनका लेखन ख़तम हो गया तो जीवन का क्या मतलब?” यानि लेखन को उन्होंने जीवन से जोड़ा।उसे ही अपनी जीवनधारा माना।

   सुभाष राय ने कहा कि लिखना यदि जीवन से जुड़ा हो तो वो लिखना किसी भी साहित्यकार का हो वह बहुत महत्वपूर्ण है।इसी बात को आगे बढाते हुए उन्होंने  ने यह भी कहा कि लेखक का लिखा हुआ पाठक तक पहुँचना चाहिए तभी उस लेखन की सार्थकता है।डा० राय ने हरिशंकर परसाई जी का उदाहरण देते हुए बताया कि वो अपनी अप्रकाशित रचनाओं की कई प्रतियाँ बना कर थैले में रखते थे और उसे मुफ्त ही लोगों को पढने के लिए देते थे।
     
प्रसिद्ध रंगकर्मी मेराज आलम ने कहा कि हम सभी को अपने अन्दर के बच्चे को जीवित और सक्रिय रखना होगा तभी हम पाठक को अच्छा बाल साहित्य और नाटक दे सकेंगे और बाल रंगमंच को सार्थक दिशा भी दे सकेंगे।कानपुर से आयी प्रसिद्ध बाल साहित्यकार और बाल मनोविज्ञान की  पारखी  अर्पणा पाण्डेय ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के जीवन से जुड़े कई रोचक संस्मरण सुना कर उनकी स्मृतियों को ताजा किया।प्रतिष्ठित बालसाहित्यकार,कहानीकार और उपन्यासकार संजीव जायसवाल ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी को प्रौढ़ों और बच्चों का पुरोधा साहित्यकार बताते हुए उनके प्रसिद्ध बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” का उल्लेख किया और कहा कि उनका यह उपन्यास बालसाहित्य के पाठकों के लिए अभूतपूर्व देन है।

       अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रतिष्ठित बालसाहित्य समीक्षक और आलोचक श्री बंधु कुशावर्ती ने कहा कि प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी मूलतः कहानीकार और नाटककार हैं और 1964 में इलाहाबाद आने के पहले वो खुद को एक कहानीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर चुके थे।1964 में शिक्षा प्रसार विभाग के फिल्म प्रोडक्शन सेक्शन में स्क्रिप्ट राइटिंग से जुड़ने के बाद से ही उन्होंने बाल साहित्य लेखन भी शुरू किया और रेडियो पर बाल कहानियों नाटकों के अलावा तत्कालीन सभी पत्र पत्रिकाओं में बाल कहानियाँ लिखना  शुरू किया।बाद के समय में उन्होंने अपना अधिकाँश लेखन बच्चों के लिए किया।और बाल साहित्य लेखन में उन्होंने खुद को उसी तरह स्थापित किया जिस तरह बड़ों की कहानियों के लेखन में किया था।
   बंधुजी ने बताया कि सन 1964 का समय वह समय था जब सरकारी स्तर पर भी अच्छे बाल साहित्य लेखन के लिए प्रयास किये जा रहे थे तथा श्री संपूर्णानंद जी के मुख्यमंत्रित्व काल में इस दिशा  में काफी काम भी हुआ।शिक्षा विभाग द्वारा भी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया गया।संभवतः शिक्षा विभाग में नौकरी करने और प्राथमिक शिक्षा विभाग द्वारा हो रहे प्रयासों से प्रभावित हो कर ही प्रेमस्वरूप जी का रुझान बाल साहित्य लेखन की तरफ बढ़ा और उन्होंने जीवन पर्यंत बाल साहित्य को समृद्ध किया।बंधू कुशावर्ती ने बताया कि प्रेमचंद के सम्पूर्ण साहित्य को एकत्रित करने और उसे पाठकों तक पहुँचाने में उनके पुत्र अमृत राय का बहुत बड़ा योगदान है। प्रेमचंद के लिए जो काम अमृत राय ने किया था वही काम प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के साहित्य को पाठकों तक पहुंचाने के लिए आज डा०हेमन्त कुमार कर रहे हैं।  
       प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के पुत्र और बाल साहित्यकार डा० हेमन्त कुमार ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी से जुड़ी यादों को साझा करने के साथ ही “बालवाटिका” के सम्पादक डा० भैंरूलाल गर्ग जी एवं प्रतिष्ठित बालसाहित्यकार एवं बालसाहित्य इतिहास लेखक डा० प्रकाश मनु जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया जिनके प्रयासों से “बालवाटिका” का प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी पर केन्द्रित यह अंक प्रकाशित हो सका।कार्यक्रम के अंत में प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार अखिलेश श्रीवास्तव चमन ने श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य लेखन परम्परा को आगे बढाने के लिए डा० हेमन्त को बधाई देने के साथ सभी आगंतुक अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
           इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि,लेखक भगवान स्वरूप कटियार, बाल साहित्यकार पूनम श्रीवास्तव,डा० शीला पाण्डेय,पर्यावरण के प्रसिद्ध फिल्मकार श्री चिक्का मुनियप्पा,शैक्षिक दूरदर्शन की साउंड इंजीनियर सुधाश्री,प्रसिद्ध युवा कवयित्री एवं गायिका डा०प्रीति गुप्ता,रेडियो उद्घोषिका और कलाकार शिखा दुबे,युवा बाल गीतकार नित्या शेफाली ने उपस्थित होकर कार्यक्रम की गरिमा बढाई साथ ही प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के जन्मदिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम को सफल बनाया।
                                  ००००००
डा० हेमन्त कुमार
मोबाइल—9451250698   
                          
         

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पुस्तक समीक्षा---लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019


पुस्तक समीक्षा
      लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें
                                                                                    समीक्षक  ----- कौशल पाण्डेय
समीक्ष्य पुस्तक
ठेंगे से
(कविता संग्रह )
कवि-अजीत सिंह राठौर  “लुल्ल कानपुरी”
प्रकाशक
सोशल रिसर्च फाउण्डेशन
मूल्य - ३०० रूपए
कला मनीषियों ने कविता को कवि द्धारा अपने से की गई बातचीत का व सहज स्वरूप  भी माना है।जो तमाम अवरोधों से अप्रभावित रहते हुए भी सदैव
शाश्वत और गतिमान रहता है।कविता से किया जाने वाला यह आत्मसंवाद समाज और परिवेश की उस भावभूमिपर जन्म लेता है जहाँ अभाव,पीड़ा,भूख,निराशा,कुंठा,घुटन और आर्थिक विसंगतियाँ हमें पल-पल प्रभावित करती हैं।ऐसे में जब कोई कवि वर्षों की प्रतीक्षा के बाद कविता का दामन थामता है तो उसकी धार में व्यंग का उपजना स्वाभाविक है।
अजीत सिंह राठौर “लुल्ल कानपुरी” की चौंसठ कविताओं का पहला संकलन जब तिरसठ वर्ष की उम्र में आता है तो उन कविताओं में समाज की विसंगतियाँ व्यंग का रूप लेकर एक ऐसा आकार ग्रहण करती हैं जहाँ सामान्य पाठकों को यह कवितायेँ अपने आस-पास की कवितायें सी लगने लगती हैं।

अजीत सिंह राठौर के इस संकलन -"ठेंगे से" की अधिकाँश कविताओं में रिश्तों के कोमल तानों-बानों और बचपन की खुरदुरी यादों के सहारे हमारा लोक जीवन अपनी लोक भाषा में एक सार्थक आकार लेता प्रतीत होता है ------
मिटटी के चूल्हे ने रोते हुए
बहन फुँकनी से कहा
बरसों बरस का था
साथ हमारा तुम्हारा
बिना तुम्हारे
हम जलते नहीं थे
तनिकौ हिलते नहीं थे
नहलाये जाते
पोंछे जाते
पूजे जाते
मनाये जाते
तब कहीं आगि
जोरी जाती
**   **   **
बहिन तुम्हारे कूटे बिना
कौनो कण्डा चूल्हे मा घुसत न रहे
(
मिटटी के चूल्हे का दर्द )
दिन पर दिन बढ़ती जाती जीवन की आपा-धापी, उथल-पुथल और इससे उपजे तरह-तरह के कडुवे अनुभवों को झेलने के लिये अब ये जरूरी लगने लगा है कि जीवन के दृष्टिकोण को हास्यपरक बनाया जाये।हास्य-व्यंग का यह व्याकरण अजीत सिंह राठौर की कविताओं में जगह जगह नजर आता है ----------
राम रामलीला के रंगमंच पर
राम के मुखौटे का धैर्य
आखिर जवाब दे गया
उसने रावण के
मुखौटे से पूछा
गुरु तुम तो
पूरे गुरु नजर आते हो
हमको एक रात के
तीन सौ
दिलवाते हो
आप तो तीन हजार
एक रात के झटक ले जाते हो
**    **    **
पूरी भीड़ मुझ पर थूकती है
कोसती है गालियाँ देती है
मेरा मृतक शरीर
बड़ी-बड़ी आँखों से
यह सब देखता है
इस दर्द को
कभी आपने महसूस किया है
(
मुखौटों का दर्द )
      आज हिंदी कविता की सबसे बड़ी जरूरत है कि वह भाषा के चोंचलों और शिल्प के बखेड़ों से मुक्त होकर लोक परम्पराओं, मुहावरों और देशज शब्दों साथ एक आत्मीय रिश्ता जोड़े।दृष्टि और सम्भावनाओं से भरी-पूरी यह कवितायेँ आज की संपूर्ण लोक चेतना, खंडित होते सपने और आदमीपन की तलाश के साथ-साथ इस बात की भी प्रमाण हैं की लोक और आँचल से जुड़ा साहित्य ही पाठकों को साथ लेकर चल सकता है।मेरे लिए इन कविताओं को पढ़ना एक आत्मीय रिश्ते की गर्माहट को महसूस करने जैसा है।
                               ००००००
कौशल पाण्डेय
1310-ए,बसंत विहार,
कानपुर-208021
मोबाइल नंबर-9532455570          




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लेख-- पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017


पिंकी--सुबह जल्दी उठना है जाकर सो जाओ।”“राजू इतने नजदीक से टी वी मत देखो--आंखें खराब होती हैं।”“मीना सीधे बैठ कर पढ़ो---झुक कर बैठने से कूबड़ निकल आएगा।”“तनु बेटा नल खुला रख कर ब्रश मत करो पानी बर्बाद हो रहा है। ये या ऐसे ही ढेरों वाक्य हैं जो हर घर में,परिवार में सुबह शाम हर समय आपको सुनाई पड़ते होंगे।ये वाक्य या उपदेश दिये जाते हैं बच्चों को।और उपदेश देता कौन है? हम आपहम सभी यानि कि हर अभिभावक या घर का बड़ा सदस्य।
  इन नसीहतों को सुन कर ऐसा लगता है कि बच्चे सिर्फ़ नसीहतें सुनने के लिये ही इस धरती पर आयें हैं।मतलब यह कि सारी नैतिकता,सारी नसीहतें सिर्फ़ छोटे मासूम बच्चों के लिये। और हमारे आपके लिये ?क्या जो नसीहतें जो हम उठते,बैठते ,खेलते-खाते,सोते-जागते,बच्चों को देते हैं।ये क्या सिर्फ़ उनके ऊपर ही लागू होती हैं?हमारे ऊपर नहीं?क्या टी वी नजदीक से देखने पर हमारी आंखें नहीं खराब होंगी।क्या झुक कर बैठने या पढ़ने पर हमारी रीढ़ की हड्डी नहीं मुड़ेगी?या उसमें कोई विकार नहीं आयेगा?फ़िर क्या कारण है कि हम हर समय बच्चों पर ही नसीहतें थोपते रहते हैं?हर समय टोकने,नसीहत देने का असर बच्चों पर क्या पड़ेगा?क्या अपने इस बात पर भी कभी गौर किया है?क्या हर समय की टोका टाकी बच्चों को विद्रोही नहीं बनायेगी?इन सब बातों पर भी हमें विचार करना होगा।खासकर आज के युग में जब कि हर मां-बाप अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद सतर्क और चिन्तित रहता है।
               यह सही है कि नसीहत या उपदेश हम बच्चों की बेहतरी के लिये ही देते हैं।लेकिन उसका तरीका क्या हो?यह भी हो सकता है कि हम ये नसीहतें या उपदेश बच्चों को सीधे न देकर किसी और तरीके से दें।वह तरीका कौन सा होगा उस पर विचार करने के पहले मैं आपको एक कहानी संक्षेप में सुनाना चाहूंगा।यह कहानी शायद आपमें बहुतों ने पढ़ी या सुनी भी होगी।
          कहानी है एक फ़कीर की।फ़कीर के पास एक दिन एक महिला अपने बेटे को लेकर आई।बच्चे के दांतों में बहुत तकलीफ़ थी। महिला ने शिकायत करते हुए कहा कि मेरा बेटा गुड़ बहुत खाता है।इसके दांतों में कीड़े लग गए हैं। अगर आप इसकी यह गुड़ खाने की आदत छुड़ा दें तो मैं आपका उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगी।फ़कीर ने उसकी बात ध्यान से सुनी।कुछ देर सोचते रहे फ़िर उसको यह कह कर वापस भेज दिया कि इसे लेकर दस दिनों के बाद आना। और उन्होंने बच्चे के दांतों का दर्द कम करने के लिये कुछ दवाएं भी उसे दीं।दस दिनों के बाद महिला फ़िर आई।फ़कीर ने दोनों को बैठाया और बच्चे को समझाते हुए कहा कि बेटा तुम हर समय गुड़ खाना बंद कर दो। तुम्हारे दांत बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। और हां कभी भी कुछ खाओ तो उसके बाद दांत जरूर साफ़ कर लिया करो। महिला ने उनसे पूछा कि ये बात तो आप उस दिन भी बता सकते थे।फ़कीर मुस्कराया और बोला मैंने उस दिन इसे इसलिये नहीं समझाया क्योंकि मैं खुद भी बहुत गुड़ खाता था। सो मैं कैसे इसे समझाता। इन दस दिनों में मैंने गुड़ खाना बंद कर दिया। इस लिये अब मैं इसे समझाने का हकदार हो गया हूं। फ़कीर और बच्चे की यह कहानी आज हम सब पर लागू होती है। यानि कि हमें भी इस कहानी से सीख लेनी चाहिये। हमें बच्चों को कोई नसीहत देने से पहले खुद भी उस पर अमल करना चाहिये। तभी हम बच्चों को सही दिशा दे सकेंगे।
            एक बात और है।हमें ऐसे मौकों पर कभी कभी अपने बचपन को भी याद कर लेना चाहिये। आप याद करिये अपने बचपन को। आप अच्छे खासे अधलेटे होकर अपना कोई कहानी की किताब पढ़ रहे होते थे और अचानक आपके पिताजी कहते थे बेटा सीधे बैठ कर पढ़ो। ऐसे भी कहीं पढ़ाई होती है?आपको कितनी झुंझलाहट होती थी। ठीक यही स्थिति हमारे उपदेश देने पर हमारे भी बच्चों की होती है।
  इसकी जगह अगर हम खुद टी वी दूर बैठ कर देखें,खुद सीधे बैठ कर पढ़ें,खुद ब्रश करते समय नल को बंद रखा करें तो शायद बच्चों को उपदेश देने की जरूरत ही न पड़े।क्योंकि बच्चों में अनुकरण करके सीखने की एक स्वाभाविक विशेषता होती है।वह जब आपको सुबह जल्दी उठते,रात में जल्दी सोते,समय पर नहाते-खाते,तैयार होते,सही मुद्रा में बैठ कर पढ़ते लिखते देखेगा तो वह स्वतः ही वैसा करेगा। आपको कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
                   यहां एक उदाहरण मैं और देना चाहूंगा।अपने स्कूली दिनों का।मेरे स्कूल के प्राचार्य जब भी किसी कक्षा में जाते और वहां बच्चों द्वारा फ़ाड़े गये कागज की पुड़िया या कोई दूसरा कचरा देखते तो उसे स्वयं ही उठा कर कक्षा के बाहर फ़ेंक आते। कभी वो किसी बच्चे को इसके लिये आदेश नहीं देते थे। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन  से उस कक्षा के बच्चे थोड़ा जल्दी आने लगते। और खूद ही अपने कमरे की सफ़ाई कर लेते।
         तो यह भी एक अच्छा तरीका है बच्चों से कार्य लेने और उन्हें समझाने का।हमारे अध्यापक और अभिभावक अगर दोनों ही बच्चों को समझाने,दिशा निर्देश देने और उन्हें आगे बढ़ाने के संदर्भ में यह तरीका अपना लें तो मुझे लगता है कि बच्चों के ऊपर उपदेशों का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और उनके विकास को एक सही दिशा मिल सकेगी।
                          000

डा0 हेमन्त कुमार 

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संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

यादों का झरोखा
गीतांजलि गिरवाल

       
बचपन की कुछ यादो में एक हैं ये संजा पर्व।मम्मा, पापा सरकारी नौकरी में थे और हम जहाँ रहते थे वहां गली में और कई परिवार भी थे, जो निमाड़ी थे।उनकी बच्चियां यानि हमारी सहेलियां श्राद्ध पक्ष में ये संजा पर्व मानती थी तो हम भी साथ हो लेते थे ।बस उनकी देखा देखी नकल करते थे।बहुत मज़ा आता था इस में। आख़िरी दिन इसे नदी में ठंडा करने जाते थे। बच्चों को दूल्हा दुल्हन बनाते थे और गाते हुए जाते ।मै अपने स्वाभाव अनुरूप हमेशा पुरुष की भूमिका में होती। सच बहुत ही लुभाने दिन थे वो भीसमय बीतने के साथ ही अब ये पर्व लगभग विलुप्त होने लगा है ।मात्र गांव में सिमट कर रह गया है ।लोक परंपरा में मालवांचल में कुँवारी कन्याओं का ये एक लोकप्रिय पर्व माना जाता है।गांव की सौंधी मिट्टी सी खुशबु है  इन लोक परम्पराओं में।

        टिफ़िन में भिन्न भिन्न पकवान बना कर सभी लाते थे,आरती के बाद सब उसे बूझते थे कि कौन क्या लाया।जिसका टिफ़िन नहीं बूझ पाते  वो विजेता और उसकी माँ सुपर माँ 
फिर सब मिलकर खाते थे।इसमें लड़कों का कोई रोल नहीं होता था फिर भी सब के भाई अपनी बहनों के पीछे घूमते थे ताकि आखरी में अच्छा अच्छा खाने को मिलेगा।वो 15 दिन पलक झपकते निकल जाते।

 संजा पर्व मालवा संस्कृति का अनोखा त्यौहार।
              भाद्रपद माह के शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक पितृपक्ष में कुंआरी कन्याओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व है।यह पर्व मुख्य रूप से मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि में मनाया जाता है।संजा पर्व में श्राद्ध के सोलह ही दिन कुंवारी कन्याएँ शाम के समय एक स्थान पर एकत्रित होकर गोबर के मांडने मांडती हैं और संजा के गीत गाती हैं व संजा की आरती कर प्रसाद बांटती हैं।सोलह ही दिन तक कुंवारी कन्याएँ गोबर के अलग-अलग मांडने मांडती है तथा हर दिन का एक अलग गीत भी होता है।
गान
छोटी-सी गाड़ी गुड़कती जाए, गुड़कती जाए,
जी में बैठ्या संजा बाई, घाघरो धमकाता जाए,
चूड़लो छमकाता जाए,
बई जी की नथड़ी झोला खाए,
बताई दो वीरा पीयर जाए।
संजा बाई, संजा बाई सांझ हुई/जाओ संझा ।

        गणेश उत्सव के बाद कुँवारी कन्याओं का त्योहार आता है संजा।यूँ तो यह भारत के कई भागों में मनाया जाता है।लेकिन इसका नाम अलग होता है,जैसे- महाराष्ट्र में गुलाबाई (भूलाबाई), हरियाणा में सांझी धूंधा’, ब्रज में सांझी’, राजस्थान में सांझाफूलीया संजयाक्वार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर अमावस्या तक शाम ढलने के साथ घर के दालान की दीवार के कोने को ताजे गोबर से लीपकर पतली-पतली रेखाओं पर ताजे फूल की रंग-बिरंगी पंखुड़ियाँ चिपका कर संजा तैयार की जाती है।

विभिन्न आकृतियाँ


     गणेश,चाँद-सूरज,देवी-देवताओं के साथ बिजौरा,कतरयो पान,दूध,दही का वाटका (कटोरी),लाडू घेवर,घुघरो नगाड़ा, पंखा, केले का झाड़, चौपड़ दीवाली झारी, बाण्या की दुकान,बाजूर, किल्लाकोट होता है।मालवा में संजाका क्रम पाँच (पंचमी) से आरंभ होता है।पाँच पाचे या पूनम पाटला से।दूसरे दिन इन्हें मिटाकर बिजौर, तीसरे दिन घेवर, चौथे दिन चौपड़ और पंचमी को पाँच कुँवारेबनाए जाते हैं।लोक कहावत के मुताबिक जन्म से छठे दिन विधाता किस्मत का लेखा लिखते हैं ।जिसका प्रतीक है छबड़ी।सातवें दिन सात्या (स्वस्तिक) या आसमान के सितारों में सप्तऋषि, आठवे दिन अठफूल’, नवें दिन वृद्धातिथिहोने से डोकरा-डोकरी और दसवें दिन वंदनवार बाँधते हैं।ग्यारहवें दिन केले का पेड़ तो बारहवें दिन मोर-मोरनी या जलेबी की जोड़ मँडती है। तेरहवें दिन शुरू होता है किलाकोट, जिसमें 12 दिन बनाई गई आकृतियों के साथ नई आकृतियों का भी समावेश होता है।
पूजा के पश्चात कच्चा दूध, कंकू तथा कसार छाँटा जाता है।प्रसाद के रूप में ककड़ी-खोपरा बँटता है और शुरू होते हैं।
संजा के गीत-
संजा मांग ऽ हरो हरो गोबर संजा मांग ऽ हरो हरो गोबर कासे लाऊ बहण हरो हरो गोबर संजा सहेलडी बजार में हाले वा राजाजी की बेटी।

परम्परागत मान्यता के अनुसार गुलतेवड़ी के फूल सजावट के लिये उपयुक्त समझे जाते हैं।संजा की आकृति को और ज्यादा सुंदर बनाने के लिये हल्दी, कुकुंम, आटा, जौ, गेहूँ का भी प्रयोग किया जाता है|मुख्या रूप से उज्जैन,आगर, महिदपुर,शाजापुर, निमाड़ , खंडवा , धार में काफी लोकप्रिय त्यौहार है संजा
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लेखिका  गीतांजलि गिरवाल
युवा लेखिका गीतांजलि पिछले 15 सालों से रंगमंच में अभिनय और निर्देशन में सक्रिय हैं।कालेज में पढाई के समय से ही साहित्य के प्रति रुझान था तभी से लेखन में सक्रिय।ये हमेशा नारी की समस्याओं उनके जीवन उनके हालातों की चिंता करती हैं।और नारी मन के हर भाव,अंतर्द्वंद्व और पीड़ा  को शब्द देने का प्रयास भी हमेशा करती हैं।हमारे समाज,लोक संस्कृति पर भी गीतांजलि काफी कुछ लिख रही हैं।




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घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का------

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

         
स्कूलों में जाकर अक्सर अभिभावक यह शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे का मन पढ़ाई में लगता ही नहीं है। या कि मास्साब आप कैसे पढ़ाते हैं कि इसे कुछ याद ही नहीं रहता।कभी कभी यह भी शिकायत करते हैं कि आप इसे होमवर्क नहीं देते इसीलिये यह घर पर कुछ पढ़ता ही नहीं। कुछ अभिभावकों को मैंने यह भी कहते हुये सुना है कि अरे फ़लां स्कूल---अब तो बेकार हो चुका हैकभी होती थी वहां भी अच्छी पढ़ाई--- अब तो बस उस स्कूल का नाम भर रह गया है।
   यानी कि बच्चा घर में पढ़े न,उसका मन पढ़ने में न लगे,वह हमेशा टी0वी0 से चिपका रहे,खेलता रहे -----इन सब की जिम्मेदारी स्कूल की और मास्साब की। अभिभावक ने ले जाकर स्कूल में नाम लिखा दिया और उनकी जिम्मेदारी खत्म।अब बच्चे के पढ़ने,विकसित होने,अच्छे नंबर लाने सबका दारोमदार मास्टर जी के ऊपर।
          यहां सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों के पढ़ाने,लिखाने की अभिभावक या मां बाप की कोई जिम्मेदारी नहीं है?क्या उनकी जिम्मेदारी बस बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की है?जबकि बच्चा स्कूल में 24घण्टों में से सिर्फ़ 5-6 घण्टे रहता है। बाकी के 18घण्टे वो आपके साथ बिताता है। स्कूल तो एक जगह भर है जहां उसे शिक्षा का एक रास्ता बताया जाता है। सीखने सिखाने की एक प्रक्रिया से परिचित करा कर ज्ञान के एक अथाह समुद्र की तरफ़ बढ़ाया जाता है। ज्ञान के इस समुद्र में बच्चे को तैरना सिखाया जाता है। अब इस अथाह समुद्र के नये तैराक को एक कुशल,बेहतरीन तैराक बनाने में शिक्षकों के साथ अभिभावकों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब तक वो अपनी भी जिम्मेदारियां नहीं निभायेंगे बच्चा ज्ञान के सागर का एक कुशल तैराक नहीं बन पायेगा।
पढ़ने लिखने में आगे नहीं बढ़ सकेगा।

क्या जिम्मेदारियां हैं एक अच्छे अभिभावक की----- ?
                                            बच्चे को पढ़ने लिखने के लिये सबसे जरूरी चीज है अच्छे और खुशनुमा माहौल की। स्कूल में भी और घर पर भी। खुशनुमा माहौल का मतलब है ऐसा माहौल जिसमें बच्चा सहज ढंग से शान्तिपूर्ण वातावरण में पढ़ लिख सके। उसके ऊपर किसी तरह का मानसिक दबाव न हो। वह संकुचित या भयभीत न रहे। वह अपने मन में उठने वाले प्रश्नों को आपसे बिना किसी संकोच के पूछ सके। माना कि ऐसा वातावरण उसे स्कूल में अध्यापकों की कृपा और सहयोग से मिल जाता है। लेकिन क्या हम उसे घर पर ऐसा माहौल दे पा रहे हैं? अगर दे रहे हैं तो बहुत अच्छा है। यदि नहीं तो क्यों? और साथ ही हमें यह भी विचार करना पड़ेगा कि हम अपने घर का कैसा माहौल बनायें जिसमें बच्चा अच्छे ढंग से पढ़ लिख सके। यहां मैं कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर इंगित करूंगा जिन पर ध्यान देकर आप घर का वातावरण बच्चों की पढ़ाई के अनुकूल बना सकते हैं।
शान्तिपूर्ण माहौल
 बच्चों को पढ़ने के लिये सबसे जरूरी शन्तिपूर्ण माहौल होता है। बच्चों की पढ़ाई के  समय उनके पढ़ने की जगह पर तेज आवाज में बातचीत न करें। टी0वी0,रेडियो धीमी आवाज में बजायें। यदि उनके पढ़ने के समय में घर में कोई मेहमान आ जाता है तो कोशिश करें कि बच्चे की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो। मेहमानों को आप दूसरे कमरे में बैठा कर उनका स्वागत कर सकते हैं।
समय का निर्धारण---
  स्कूल के अलावा बच्चे 18घण्टों का जो समय आपके साथ बिताते हैं उनका सही उपयोग करना बच्चों को आप ही सिखला सकते हैं। इसके लिये यह जरूरी है कि आप अपने बच्चे के लिये एक संक्षिप्त टाइम टेबिल बनायें। जिसमें उसके सुबह उठने,स्कूल जाने,खेलने कूदने,मनोरंजन ,पढ़ाई और सोने का समय निर्धारित हो। यह जरूरी नहीं कि आपका बच्चा एकदम उसी समय सारिणी पर चले। जरूरत पड़ने पर उसमें आप या बच्चा फ़ेर बदल भी कर सकते हैं। लेकिन इससे उसके अंदर काम को समय पर और सही ढंग से करने की आदत पड़ेगी।
टी0वी0,कम्प्युटर का समय निश्चित करें---
      आजकल बच्चों का ध्यान सबसे ज्यादा टी0वी0,वीडियो गेम्स और कम्प्युटर में लगता है। आप इससे उन्हें पूरी तरह रोक नहीं सकते।क्योंकि आज तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों का ही युग है। इनके बिना वह बहुत सारे ज्ञान और सूचनाओं से वंचित रह जाएगा। लेकिन इस पर बहुत ज्यादा समय देना भी स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिये अपने बच्चों को इन माध्यमों के फ़ायदों और हानियों से परिचित करा दें।
तथा इनके उपयोग का समय भी तय कर दें। जिससे वह अपना समय अन्य गतिविधियों को भी दे सके।
खुद भी पढ़ें---
   बच्चों को पढ़ाई के लिये उचित माहौल देने के लिये यह बहुत जरूरी बिन्दु है। क्योंकि बच्चे बहुत सी बातें अनुकरण से भी सीखते हैं। आप को कोशिश यह करनी चाहिये कि आप बच्चों के पढ़ने के समय में खुद भी अपनी रुचि की कोई पुस्तक,पत्रिका या अखबार पढ़ें। आपको पढ़ता देखकर बच्चे के अंदर भी पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत होगी। उसे यह महसूस होगा कि मेरे पिता या मां भी मेरे साथ पढ़ रहे हैं।
कुछ बाल पत्रिकाएं और रोचक बाल साहित्य बच्चों को दें----
       हर भाषा में आजकल हर उम्र के बच्चों के लिये बहुत सी पत्रिकाएं बाजार में उपलब्ध हैं। आप अपने बच्चे की आयु के अनुरूप कुछ बाल पत्रिकाएं घर में लायें। उनसे बच्चों का मनोरंजन तो होगा ही,उनके ज्ञान में बढ़ोत्तरी भी होगी। क्योंकि इन पत्रिकाओं में सिर्फ़ कहानी,कविता ही नहीं बल्कि बच्चों के लिये ढेरों सामग्री रहती है। जैसे चित्रों में रंग भरने,वर्ग पहेली,च्त्र देखकर कहानी लिखने,वाक्य पूरा करने,आदि के अभ्यास इनसे बच्चे की बुद्धि तीव्र होने के साथ उसका मनोरंजन भी होगा। और पत्रिकाओं में सामग्री की विविधता के कारण उसकी पढ़ने में रुचि भी  जागृत होगी।
          यहां कुछ अभिभावक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि बच्चों के ऊपर वैसे ही बस्ते का इतना बड़ा बोझ है। उसमें ये पत्रिकायें या बाल साहित्य---?उनके प्रश्न का सीधा सा जवाब यह है कि जैसे आप आफ़िस में अपने काम से ऊबने लगते हैं तो क्या करते हैं?दोस्तों से गप शप,टहलना घूमना।फ़िर तरोताजा होकर अपना काम शुरू कर देते हैं। ठीक वैसे ही बच्चों की ये पत्रिकाएं या बाल साहित्य,बच्चों के लिये थोड़े समय का मनोरंजन का काम करेगा। यानि कि वो कुछ समय के लिये कोर्स की किताबों से हट कर ज्ञान के ऐसे संसार में जायेंगे जहां उन्हें ज्ञान और मनोरंजन दोनों मिलेगा।जहां उनकी कल्पनाओं के भी पंख लगेंगे। उन्हें आनन्द की अनुभूति होगी।
बच्चों को घर पर ही कभी कभी रोचक शैक्षिक फ़िल्में दिखाएं---
   आज तो पढ़ाई में भी इलेक्ट्रानिक माध्यमों का वर्चस्व होता जा रहा है। पत्रिकाओं की ही तरह बाजर में हर कक्षा,हर विषय की पाठ्यक्रम आधारित या पूरक कार्यक्रमों की सी0डी0 उपलब्ध हैं। यद्यपि इनकी संख्या अभी उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये। आज हर घर में टी0वी0 और सी0डी0प्लेयर भी मौजूद हैं। आप बच्चों के लिये उनकी कक्षा के अनुरूप शैक्षिक फ़िल्मों या इण्टरैक्टिव(ऐसे कार्यक्रम जिसमें बच्चे के लिये भी काफ़ी कुछ करने की गुंजाइश रहती है।) कार्यक्रमों की सी0डी0
लाकर बच्चों को दिखायें। इनसे भी बच्चों  के अंदर पढ़ने की रुचि पैदा होगी।
         ये कुछ ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जिन पर ध्यान देकर इन्हें अपनाकर आप अपने घर का माहौल बच्चों की पढ़ाई लिखाई के अनुरूप बना सकते हैं बच्चों के अंदर पढ़ने लिखने की रुचि जगा सकते हैं। उन्हें यह महसूस करा सकते हैं कि उनके पढ़ने की जगह सिर्फ़ स्कूल में ही नहीं बल्कि घर पर भी है।
                         000


डा0हेमन्त कुमार

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ठहराव

बुधवार, 23 अगस्त 2017

ठहराव
ठहरो जरा सुस्ता लो
किसी बूढ़े बरगद की छांव में
किसी घनी नीम की छाया में
किसी बँसवारी के झुरमुट में
किसी कुएं की जगत पर
या इन सबको छोड़
जहां तुम्हें सकून मिल सके
वहीं सुस्ता लो
आखिर इतनी लंबी यात्रा की है तुमने
अपने संघर्षमय जीवन की
तो थोड़ा सुस्ताने का हक तो
बनता ही है तुम्हारा।

ठहराव चाहे कहीं का भी हो
तुम्हें देता है बहुत कुछ
पेड़ पौधों से बतियाने का मौका
उनके सुख दुख से तादात्म्य
स्थापित करने के खूबसूरत पल
और हां इसके साथ ही
बँसवारी का मधुर संगीत भी तो सुनोगे तुम
वही संगीत जो बचपन में तुम्हें
खींचता था चुम्बक की तरह।

और फिर ठहरने सुस्ताने की प्रक्रिया में ही
यही बरगद नीम पीपल बांसों का झुरमुट
यही सब मिलकर भर देंगे स्वच्छ आक्सीजन तुम्हारे फेफड़ों में
जिससे तुम फिर हो जाओगे तैयार
अपनी आगे की यात्रा जारी रखने को।

इसी ठहराव में ही तुम मुस्कराओगे
कभी अपने बचपन को याद करके
दूर किसी पगडंडी से गुजरते
एक दो युवा जोड़े खींचेंगे
कुछ खूबसूरत रेखाचित्र
कभी युवावस्था में देखे हुए कुछ
रोमानी ख्वाबों के बिम्बों को भी
कर देंगे साकार तुम्हारे सामने।


ठहराव को मत मानो तुम विराम
ठहरो जरूर कुछ पल सुस्ताओ
लंबी लंबी सांसों से शरीर को
भर दो ऊर्जा से
मुड़ कर देखो भी एक बार अपने पीछे
छोड़ आये लंबे लंबे रास्तों को
फिर मुस्कुराओ थोड़ा सा ही सही
याद करो ठहराव के सुखद पलों को
और बढ़ चलो फिर से आगे
अपने नए पड़ाव की ओर।
0000
डॉ0 हेमन्त कुमार
23/08/2017

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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