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युवा कवयित्री नेहा शेफाली की कविताएँ ।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

लालटेन
जली वो पूरी रात
हर मौसम  बेबात
मेरे सपनों को रोशन करती
टकटकी लगाये
कभी कभी किताबें बांचा करती
जल कर काले होते तेल का रंग 
मानों मेरे कल के अंधेरे खींच रहा हो
मैं गाहे-बगाहे जो झपकी ले लूँ 
हवा के साथ चर्र-चूँ कर 
मुझे जगाया करती थी
एक कोने में 
किसी बुढ़िया के जैसे 
उकड़ू बैठी रहती
दीवारों पर उभरती 
डरावनी परछाइयों
से दोस्ती सिखाया करती थी
मेरे सोने तक
खुद की भी आँखें जलाये रखती थी
कुछ कुछ मेरी नानी के जैसे ही थी
मेरी नानी की वो लालटेन
00000
चौका
उसकी माई
चटनी और रोटियों के साथ परोसती थी
राजा रानी के किस्से 
चाँद तारों के नक्शे 
युद्ध-महात्मा की रणनीतियां 
उसकी माई 
जिसके पांव कभी चौके के बाहर 
पड़े ही नहीं थे।
000
ज़रा
ज़रा सा और रुक लेते
तो एक शाम, सदियाँ बन जाती
ज़रा सा कुछ कह देते 
तो ग़िले-शिक़वे भूल जाती
ज़रा मुट्ठी कस के बाँधी होती
एक ख़ुशबू पीछे रह जाती
ज़रा हक़ दिखाते जो तुम
मैं संग तुम्हारे आ जाती
0000
गुलमोहर
बिगड़ रहे हैं लोग 
छोटी-बड़ी बातों पर
बरस रहे हैं मुल्क 
तख़्तों की पासा पलट पर
बिलख रही है ज़मीं
अपने-दूजे खोने पर
बौरा रहा है अंतर्मन 
सपनों पर चलती कुल्हाड़ी पर
बस बांध रहे हैं 
इस आग उगलती दुनिया के ओर-छोर
अपनी आशा से, हर सुबह 
घर के बाहर खिलते
गुलमोहर के कुछ फूल
000
कवयित्री:नेहा शेफ़ाली।

युवा कवयित्री नेहा शेफ़ाली अभी जिन्दगी का गणित सीखने की कोशिश कर रही हैं।महानगर मुम्बई में रिहाइश दौड़ते हांफ़ते आदमियों और कंक्रीट के हुजूम में इनका जेहन चेहरों को पढ़ने की कोशिश करता है।और तभी उपजती है कोई कविता या कहानी।अंग्रेजी,हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं,अखबारों में फ़ुटकर रचनाएं  प्रकाशित।






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फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

         
           फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति

लेखिका-डॉ.ममता धवन
दिल्ली विश्वविद्यालय
इमेल : hindimamta3@gmail.com
                 
                   आजकल का दौर तीव्रता से कहानी कहने का चल रहा है. फिल्म प्रदर्शित करने की समय अवधि कम होती जा रही है. फिल्म के इस कम समय को बनाए रखने का पूरा असर फिल्म में गीतों के स्थान और संख्या पर दिखता है. गीतों के लिए स्थितियां बननी बंद हो गयी हैं. कुछ फ़िल्में तो गीत शून्य आने लगी हैं. ऐसे में दंगल फिल्म में मौजूद तीन गीत अपनी ओर आकर्षित करते हैं. भले ही इनकी संख्या कम है लेकिन अपने विषयों के कारण ये बहुत लोकप्रिय हुए हैं. यह फिल्म बायोपिक फिल्म है जो महावीर सिंह फोगाट की आत्मकथा ‘अखाड़ा’ पर बनी है जिसमें कुश्ती क्षेत्र में अपना नाम करने वाली गीता और बबिता के जीवन और उनके पिता के संघर्ष को शब्द और दृश्य दिए गए हैं. अपने प्लाट और अपने गीतों के माध्यम से यह फिल्म दर्शकों को अपनी तरफ खींचने में बखूबी सफल रही है. इसके अलावा आमिर को पसंद करने वाले दर्शकों का भी अपना एक ख़ासा वर्ग है.
       फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत है – ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है’... इस गीत को अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखा और हरियाणवी तर्ज पर बड़ा ही घुलता-सा म्यूजिक प्रीतम ने दिया है. यह गीत अपने दिलचस्प बोलों के कारण बच्चे-बच्चे की जुबां पर है. पूरा गीत न केवल गीता बबिता बल्कि सभी बच्चों को उनकी अपनी व्यथा कहता-सा लगता है. गीत हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और हरियाणवी शब्दों का बेहतरीन संयोजन है. सेहत, हानिकारक, बापू, हालत, वाहनचालक, जैसे हिंदी शब्दों के साथ टार्चर, टॉफी, टाटा, बॉडी, मोगाम्बो, डिसिप्लिन, पिकनिक जैसे अंग्रेजी शब्द भी सुनाई देते हैं. हरियाणवी शब्दों जैसे कि तन्ने, घना, बापू का प्रयोग पूरे गीत को हरियाणवी भाषा के गीतों के करीब ले जाता है. ख़ुदकुशी और किस्मत जैसे उर्दू शब्द भी गीत में शामिल किया गया है. यह गीत बैकग्राउंड में चलता है. गीता बबिता की रोजमर्रा की निरंतर तैयारी दिखाने के लिए बड़े ही रोचक तरीके से इस गीत को फिल्माया गया और फिल्म में गीत विधा का बेहतरीन प्रयोग किया गया. फिल्म का दर्शक स्क्रीन पर चल रहे इस गीत जो कि गीता बबिता के हिटलर बने बापू की सही तस्वीर प्रस्तुत करता है; से गीता बबिता की शिकायत भरे बोलों का मज़ा भी लेता है, वहीँ अपनी बेटियों के भविष्य को गढ़ते हुए कर्मठ और समर्पित पिता को भी महसूस करता है. महावीर फोगाट अपने आस-पास के स्त्री विरोधी वातावरण की परवाह किये बगैर अपनी बेटियों के भविष्य को बेफिक्री से जब तैयार कर रहा होता है तो तसलीमा नसरीन के ये पंक्तियाँ याद आने लगती हैं -
यह अच्छी तरह याद रखना,
तुम जब घर की चौखट लान्घोगी,
लोग तुम्हें टेढ़ी मेढ़ी नज़रों से देखेंगे.
जब तुम गली से होकर गुज़रोगी,
लोग तुम्हारा पीछा करेंगे, सीटी बजाएंगे,
जब तुम गली पार करके सड़क पर पहुँचोगी, लोग तुम्हें चरित्रहीन कह देंगे.
तुम व्यर्थ हो जाओगी, अगर पीछे लौटोगी
वरना जैसी जा रही हो, जाओ.

          इस गीत का मुखड़ा है – ‘औरों पे करम अपनों पे सितम.. ऐ बापू हम पे ये ज़ुल्म न कर.. ये ज़ुल्म न कर’. यह मुखड़ा 1968 में बनी फिल्म आँखें के गीत; ‘गैरों पे करम अपनों पे सितम...,ऐ जाने वफ़ा ये ज़ुल्म न कर....ये ज़ुल्म न कर....रहने दे अभी थोडा-सा भरम...ऐ जाने वफ़ा ये ज़ुल्म न कर..’ की तुरंत याद दिलाता है. फिल्म दंगल के इस गीत के मुखड़े को रिक्रिएट किया जाना कहा जा सकता है जो इतनी बखूबी और हरियाणवी संस्कृति  के साथ किया गया है कि दर्शक सिनेमा हाल में ताली पीटने और सिटी बजाने को मचल उठता है.
          फिल्म में ‘बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है /हम पे थोड़ी दया करो हम नन्हें बालक हैं,’ गीत को सरवर खान और सरताज खान ने गाया , धाकड़ गीत को रफ़्तार ने अपनी आवाज़ दी, गिलहरियाँ ज्योति गाँधी, दंगल दिलेर मेहँदी ने गाया ,नैना अरिजीत सिंह और इडियट बन्ना ज्योति और सुल्ताना नूरान ने गाया. फिल्म का दूसरा गीत है- ‘ऐसी धाकड़ है ...धाकड़ है... ऐसी धाकड़ है....,रे छोरियां...,ये छोरियां ..,तन्ने चारों खाने चित कर देगी...,तेरे पुर्जे फिट कर देगी....,डटकर देगी तेरे दांव से..... बाँध के पेंच पलट कर देगी.... ,चित कर देगी चित कर देगी’. इस गीत के बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य ने, गाया है रफ़्तार ने और म्यूजिक दिया है प्रीतम ने. कहना चाहिए कि स्त्री के बाहरी सौंदर्य पर गीत रचे जाने की अधिकता में बहुत ही कम या न के बराबर गीत ऐसे मिलेंगे जो स्त्री की कर्मठता तथा उसके भीतर छिपी हुई क्षमता को उजागर करते हैं. ऐसे गीतों को स्त्री के प्रति सामाजिक बदलाव करने की भूमिका में हमेशा याद किया जाता रहेगा. बहुत संभव है कि अब लोग ‘शीला की जवानी’ और ‘बेबी डॉल’ सोने की’ की बजाय अब धाकड़ स्त्रियों को पसंद करने लगेंगे. लड़कियां अब सुंदर दिखने की ही कोशिश में नहीं रहेंगी क्यूंकि यह फिल्म स्त्री की सुन्दरता के नए मानदंडों को गढ़ती है. होंठों पर लिपस्टिक लगा लेना, बाल स्टाइल करवा लेना और स्टाइलिश कपडे पहनकर स्त्री सुंदर नहीं पर उपभोग की वस्तु ज्यादा दिखती है. वही स्त्री सुंदर है जो अपने जीवन का एक उद्देश्य निर्धारित करती है और पूरी ईमानदारी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्पित है. वही स्त्री सुंदर है जो अब अपने जीवन में सफल है. वही स्त्री सुंदर है जो सामाजिक रुढियों से आगे निकलकर नयी पीढ़ी के लिए भी सफलता के रास्ते निश्चित करती है. यह गीत औरत के वीरत्व को शब्द देता है. स्त्री के सौन्दर्य, उसके भाव  से आगे बढ़कर उसमें वीरत्व को दिखने की प्रशंसनीय पहल यह गीत करता है. पुरुष समाज को चुनौती देते इस गीत के आगे के बोल हैं, ‘तेरी अकड की रस्सी जल जाएगी..पकड़ में इसकी आग है..यो इंची टेप से नापेगी..तेरी कितनी ऊंची नाक है..तेरी सांसें अटक जाएंगी ..वो जोर पटक जाएंगी..ऐसी धाकड़ हैं...’ यह गीत रैप वर्ज़न में है और इसे स्वयं आमिर खान ने गाया है. इस से पहले आमिर ने 1998 में बनी  फिल्म गुलाम का ‘आती क्या खंडाला’ गीत गया था जो कि काफी लोकप्रिय हुआ था. आमिर की ये खासियत है कि वो अपनी फिल्म के साथ, अपने लुक के साथ, अपनी भाषा के साथ नए-नये प्रयोग करते रहते हैं. आमिर; शाहरुख़ और सलमान की तरह टाइप्ड हीरो नहीं हैं. वे अपनी हर अगली फिल्म में स्वयं अपनी ही पिछली फिल्म को चुनौती देते नज़र आते हैं. आमिर की प्रतियोगिता उनके अपने आप से है यही कारण है कि वे किसी अवार्ड फंक्शन में नहीं जाते. उनकी फिल्में सामाजिक उद्देश्यों के साथ चलते हुए भी भरपूर मनोरंजन करती हैं.
       पिता और पुत्री के बीच के बड़े ही संवेदनशील रिश्ते को पकड़ने की कोशिश करती है यह फिल्म. महावीर सिंह अपनी बेटियों के भविष्य को गढ़ना चाहता है और देश के लिए कुश्ती में गोल्ड मैडल लाने के लिए उन्हें तैयार करना चाहता है और कोशिश भी करता है. खुद कोच की भूमिका निभाता है और कुश्ती की सभी तकनीकें और चालाकियां अपनी बेटियों को समझाता है. बेटी की इच्छा पर उसे नेशनल स्पोर्ट्स अकादमी भी भेजता है,अपनी नोकरी तक छोड़ देता है. नया कोच, नया वातावरण की ताम-झाम गीता को बेहद आकर्षित करती है. वो देखती है कि इस तरह के वातावरण में भी कुश्ती की तैयारी हो सकती है. उसे लगता है कि चटनी और गोलगप्पे खाकर, सिनेमा देखकर भी कुश्ती की तैयारी की जा सकती है. जब गीता घर वापिस आती है तो अपने पिता को अपने कोच से कमतर आंकती है और अपने बाल बढाकर अनकहा विरोध जताती है. पिता और बेटी के बीच इसी टकराहट से उपजा पिता के भीतर की पीड़ा की पृष्ठभूमि पर बहुत ही भावुक गीत चलता है जिसके बोल लिखे अमिताभ भट्टाचार्य ने और गाया अरिजीत सिंह ने और संगीत दिया प्रीतम ने. बोल हैं...’झूठा जग रेन बसेरा..सांचा दर्द मेरा..मृग तृष्णा-सा मोह पिया..नाता मेरा तेरा..क्यूँ निराशा से है..आस हारी हुई..क्यूँ सवालों का उठा सा ..दिल में तूफ़ान है..’ गीत के आगे के बोल इस तरह हैं..  ’थे आसमान के सितारे..ग्रहण में आज टूट ते हैं यूँ ..कभी जो धूप सेंकते थे...ठहर के छाँव ढूँढ़ते हैं यूँ...’.
        जिस दौर में सीच्युएशनल गीत लिखे जाने बिलकुल खत्म हो गये हों ऐसे में ‘दंगल’ फिल्म अपने गीतों के लिए पर्याप्त स्थितियां भी ढूँढती है और सही तथा उचित समय, भाव, संगीत एवं आवाज़ के साथ फिल्म की लोकप्रियता को बढाती भी है.
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लेखिका ---डॉ.ममता धवन
दिल्ली विश्वविद्यालय
इमेल : hindimamta3@gmail.com




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मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

पुस्तक समीक्षा
पुस्तक

सुविख्यात मनीषी-संवादों के आईने में
लेखक--डा०सुनील केशव देवधर
प्रकाशक--सुभांजलि प्रकाशन ;कानपुर
मूल्य -तीन सौ पचास रूपये।
            
           मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला   
                                                      संचार माध्यमों में साक्षात्कारों का प्रकाशन एवं प्रसारण पाठकों और श्रोताओं के लिए एक बहुत ही आकर्षण का विषय रहा है।संवाद के माध्यम से बहुत कुछ ऐसा बाहर निकालकर आता है ,जो संभवतः किसी अन्य माध्यम से सम्भव नहीं हो पता है।डा०सुनील केशव देवधर एक लंबे समय से प्रसारण माध्यमों और लेखन से जुड़े हुए है।रेडियो प्रसारण पर इनकी कई पुस्तकें भी आ चुकी है।संवादों की इस किताब को पढ़कर मुझे जो बात सबसे अच्छी लगी वह यह कि डा०देवधर ने बात करने के लिए वह चलताऊ फार्मूला नहीं अपनाया कि हम चार -पांच या कुछ ज्यादा भी ,परंपरागत सवाल पहले से तैयार कर लेते है और उनके लिखित उत्तर लेकर, साक्षात्कार जैसा शीर्षक देकर आनन -फानन एक किताब तैयार कर देते है,पर डा० देवधर की इस किताब में ऐसा नहीं है। 
       जिन बारह मनीषियों से देवधर ने संवाद किया है वे अपने -अपने क्षेत्रों की जानी -मानी हस्तियां है ये संवाद प्रायोजित भी नहीं है ,जैसे कि प्रायःराजनीतिज्ञों और "सीकरी"में बसे बड़े -बड़े पदों पर विराजमान साहित्यकारों और कलाकारों के होते है।इन्होंने संवाद के लिए उन संतों का चयन किया है जिन्हें पद,पुरस्कार और सीकरी का कभी आकर्षण नहीं रहा है।ये बारह नाम है---वेद पंडित डा०शंकर अभ्यंकर,कत्थक नृत्यांगना मनीषा साठे,ओंकार साधक डा०जयंत करंदीकर,इतिहासविद निनाद बेड़ेकर ,कवि अग्निशेखर,कश्मीरी शायर प्रेमी रूमानी,रंगकर्मी डी०जे०नारायण,लेखक-अनुवादक निशिकांत ठकार,संत साहित्य अध्येता यू०म०पठान,सामजिक कार्यकर्ता सिंधुताई सकपाल,वैज्ञानिक डा०जयंत नारलीकर और गांधीवादी विचारक नारायण भाई देसाई।                                                                                      मुझे लगता है कि इस पुस्तक में जिन मनीषियों से संवाद स्थापित किया गया है उनसे समय पाना काफी कठिन रहा होगा क्योंकि उनके लिए कर्म ही पूजा है।उदाहरण के लिए प्रख्यात खगोलशास्त्री डा0 जयंत नारलीकर कभी किसी उद्घाटन समारोह में नहीं जाते है।इन संवादों में एकतरफा संवाद नहीं है। बातें होती है और बातों से ही बातें निकलती चली जाती हैं।और बातों -बातों में हमारे सामने देश,दुनियां,धर्म, अध्यात्म,फिल्म, वैदिक परंपरा,संगीत, नृत्य,खगोलशास्त्र,साहित्य,संत परंपरा और गाँधी दर्शन  जैसे न जाने कितने विषय सहज रूप में हमें आनंदित करते हुए ज्ञान की अथाह गंगा में स्नान करते से चलते है। इनमे से अधिकांश मनीषियों का कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र है ,पर इन्होंने विलक्षण प्रतिभा से देश ही नहीं, देश के बाहर भी अपने कर्तत्व का झंडा फहराया है। 
    मेरा मानना है कि डा०देवधर की यह पुस्तक "सुविख्यात मनीषी -संवादों के आईने में "को पढ़कर पत्रकारिता के विद्यार्थी यह जान सकेंगे कि वास्तव में किसी मनीषी से संवाद के माध्यम से कैसे उसके अंतर्मन तक पहुंच जा सकता है, संचार माध्यमों में काम करनेवाले पत्रकार यह जान सकेंगे कि केवल राजनीति के पीछे भागना ही पत्रकारिता नहीं है और सामान्य पाठकों को यह जानकारी मिलेगी कि हमारे देश में मनीषियों की एक ऐसी परंपरा आज भी है ,जो बिना किसी शोर -शराबे और प्रचार -प्रसार के अपने सार्थक उद्देश्यों में निरंतर लगे हुए है।
                             ०००

समीक्षक--



कौशल पाण्डेय 
1310 ,बसंत विहार,           
कानपुर-208021 
मो० --09532455570 


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मोनिका अग्रवाल की कविताएँ

रविवार, 4 दिसंबर 2016

मोनिका अग्रवाल की कविताएँ

1- जीवन
क्या कहूँ
क्या बोलूँ
पल दो पल 
जीवन पास
जिस पर न्योछावर
दौलत बेहिसाब

क्या पाया
क्या पाओगे
क्या साथ ले जाओगे
क्या मिली खुशी?

कैसी है ये भेड़चाल
क्यों चल रहे हो 
मिला कर इससे ताल

लूट लो सादगी का मजा
करो पुराने दिनों को याद
जब खाते थे दाल रोटी भात
सब जाते थे स्कूल और
खेलते थे खो खो 
व छुपम् छुपाई
नौका चलाते
बारिश में  भीग भीग कर
 
बस वही थी जिंदगी
वही था असली जीवन
गर देख ली चिड़िया
और घोंसले में बच्चे
तब बाजरे के दानों के लिए 
माँ से करते बारंबार मिन्नतें

फिर आज क्यों हम
दिखावे मे रहना चाहते हैं
इस दौड़ से हम दूर 
क्यों नही हो पाते हैं
गर प्यार की भाषा 
हम सब पहचाने
तो शायद जीवन की सही
राह को  जाने।
 2-आस
चली हूं जीवन सफर 
इक नया अरमान लिए
कुछ रंग ढूँढने
कुछ रंग भरने
कुछ कर गुजरने
कुछ पा जाने
कुछ गवां जाने 
फिर उन्ही उबड़ -खाबड़ रास्तों  पर
कि जहाँ पर हर पल
जीवन था
तड़प थी ,जुदाई थी
पर फिर भी हर पल
मिलने की इक आस थी
कुछ कर गुजरने की प्यास थी 
और हर प्यास के मिटने की 
इक आस थी।
3
प्रेम देह का मिलन नहीं है 
प्रेम दिलों का जुड़ना है ।
चोटी पर चढ़कर मैं सोचूँ ?
आगे बढूँ कि मुड़ना है ।
समझ मुझे समझाती है 
कि रुक जाओ गिर जाओगी 
प्रेम कह रहा पंख पसारो 
नीलगगन तक उड़ना है।
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मोनिका अग्रवाल 
मैं  कंप्यूटर से स्नातकोत्तर हूं।अपने जीवन के  अनुभवों को कलमबद्ध करने का जुनून सा है जो मेरे हौंसलों को उड़ान देता है।मैंने कुछ वर्ष पूर्व टी वी,सिनेमाहाल के लिए 3 विज्ञापन गृहशोभा के योगा विशेषांक के लिए फोटो शूट में भी काम किया।मेरी कविताएँ वर्तमान अंकुर, हमारा पूर्वांचल में प्रकाशित।वेब पत्रिका "हस्ताक्षर" में भी मेरी कविताओं को स्थान मिला।साथ ही अमर उजाला,  रूपायन,गृहशोभा में मेरी कुछ कहानी और रचनाओं को भी जगह मिली।














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बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत !

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

(पिता जी के जाने के बाद से घर में एक अजीब सा खालीपन आ गया है--वक्त बेवक्त हम सभी की नजरें उन्हें ही खोजती हैं.हर वक्त लगता है की शायद कहीं गए हैं ---आ जायेंगे कुछ देर में ..लेकिन --पिता जी की रचनात्मकता तो हर समय हमारा मार्ग दर्शन करेगी .---यही सोच कर ही आज मैं उनकी एक काफी पहले प्रकाशित कहानी को ब्लाग पर पुनः प्रकाशित कर रहा ...)

     बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत !
--प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव


बाबू जी ! दरवाजे के बाहर से आवाज आई।
मैं सम्पादकीय लिखने में व्यस्त था।सिर उठाकर देखा---दो भूरी आंखे दरवाजे पर पड़े हुये पर्दे के पीछे से झाँक रहीं थी।
अन्दर चले आओ।मैंने कहा।वह अन्दर चला आया।काले कपड़े का जांघिया, आधी बांह की कमीज, नंगे पैर, रूखे ओर उलझे हए बाल-अपनी इस वेशभूषा में लगभग बीस साल का वह युवक मेरी मेज के सामने खड़ा था।
क्या काम है ?’ मैंने पूछा।
आपको नौकर की जरूरत है?’
मेरी दृष्टि सामने रखी ट्रेपर जम गई।जिसमें एक नौकर की जगह के लिए आए हुए 26 आवेदनपत्र पड़े हुए थे।मुझे अखबारों को पैक करने वाले एक लड़के की जरूरत थी।वेतन केवल 20 रूपए प्रतिमास था, फिर भी नित नए आवेदन पत्र चले ही आ रहे थे। 27 वां आवेदनकर्ता प्रत्यक्ष मेरे सामने था।
कुछ पढ़े-लिखे भी हो ?’
जी, इन्टर तक!कहने में उसे कुछ संकोच हुआ और सुनकर मुझे अविश्वास।
उसका सार्टीफिकेट ?’ मैंने मांगा।
जी,वही होता तो.................।और वह अटक गया।उसके चेहरे की उदासी,मुझे लगा, कुछ गहरी हो चली थी।सहसा कुछ सचेत से स्वरों में बोला-आप मेरी परीक्षा ले लें। और उसकी आँखों में आशा की ज्योति झिलमला उठी।
                ‘तुम्हारे पिता का नाम और निवास-स्थान ?’ मैंने अगेंजी में पूछा। सम्पादक की गद्दी परीक्षक की कुर्सी बन गई।
       स्वर्गीय हरनामसिंह एम.ए., एल.एल.बी., एडवोकेट, निवास स्थान अनारकली लाहौर था।उसने स्वाभाविक लहजे में उत्तर दिया।
       तो तुम शरणार्थी हो?’ मैंने किंचित भी विस्मय न प्रकट करते हुए पूछा।हिन्दुस्तान की यह अभागी कथा पुरानी हो चली थी।
जी।
इसके पहले क्या करते थेमैंने अंग्रेजी में ही प्रश्न किया।
   एक वर्ष तक अपने पिता के एक मित्र के यहाँ क्लर्क रहा।फिर फलों की दूकान की, वह भी न चल सकी। कुछ पैसे उधार लेकर कपड़ों की फेरी लगानी शुरु कर दी थी।मगर किस्मत ने यहाँ भी धोखा दिया।एक दिन सब कपड़े चोर उठा ले गए और मैं दो सौ का कर्जदार बन गया।पिछले पांच महीनों तक रिक्शा खींचकर उसका कर्जा अदा किया।अब आपके सामने हूं।उसका यह संक्षिप्त उत्तर था।
                इस प्रकार कीरत सिंह मेरे सम्पर्क में आया।यह एक वर्ष पहले की शाम की घटना है।
                प्रेस के पास ही एक गली में कीरत सिंह को मकान मिल गया।शाम को उसके दरवाजे पर पहुंचा तो देखा तो कि वह एक अंगौछे में कोई वस्तु लटकाये सामने से चला आ रहा था।जन्माष्टमी का दिन था।सोचा---व्रत होगा,उसी के लिए फलाहार आदि होगा।मगर जब वह मुस्कराता हुआ नजदीक आकर खड़ा हो गया तो मैं उसके अंगौछे में होती हरकत देखकर चौंक उठा।कीरतसिंह गोश्त नहीं खाता था।खाना तो दूर रहा, उसका जिक्र आते ही वह नाक भौं सिकोड़ने लगता और महापुरूष के जन्म दिन पर.........।
                ‘क्यों, जीवित मछलियां हैं न ?’ मैंने व्यंगपूर्वक पूछा।सुनकर वह झेंपा और मेरा संदेह विश्वास में बदल गया।
                किन्तु दूसरे क्षण ही जब उसने अंगौछे की वस्तु मेरे सामने डाल दी तो मैं अवाक रहा गया। वह कुत्ते का एक मरियल सा पिल्ला था, नाली के दुर्गन्ध युक्त गन्दे काले कीचड़ में सना हुआ।शीघ्र ही उसकी बद्बू से समीप का वायुमण्डल भर उठा।घृणा से अपनी नाक पर रुमाल रखता हुआ मैं बोला-ओफ, पागलपन की हद कर दी, तुमने।आज जन्माष्टमी के दिन तो भगवान के नाम पर पवित्र रहते।
                ‘क्या बताँऊ!उधर से चला आ रहा था।बस, नाली में पड़ा हुआ यह कमबख्त मिल गया। छोटे-छोटे बच्चे इस पर कंकडि़यां बरसा रहे थे।दो चार मिनट की और देर हो जाती तो सब कुछ खत्म था, कहकर कीरत सिंह ने वह सांस ली जैसे घर का कोई व्यक्ति प्लेग या हैजे से पीडि़त हो गया हो ।
                ‘तो क्या अब इसकी पूजा करोगे ?’मैने खीझ कर पूछा।
                ‘अजी मैं गरीब इस लायक कहाँ! हाँ, नहला धुला दूंगा तो दो एक हफ्तों में अच्छा दिखने लगेगा।फिर कोई पालना चाहेगा तो अपने यहाँ उठा ले जायेगा।और कहकर वह उसे नल के नीचे उठा ले गया।
       नहले पर दहला पड़ा चुका था।मैं चुपचाप लौट आया।
                अभी परसों की ही तो बात है-
                     सड़क पर बच्चों का शोर सुनकर बाहर निकल आया।देखा, छोटे बच्चों की एक पूरी फौज कीरत सिंह को घेर कर खड़ी थी।वह लेमनजूस की गोलियाँ बाँट रहा था।गली के सभी बच्चे थे--- बनिये के भी और भंगी के भी, कुछ उजले कपड़ों में, कुछ गँदले चीथड़ों में। मगर व हँसता हुआ बगैर किसी भेदभाव के,सब की हथेलियों पर एक-एक दो-दो गोलियाँ रखता जा रहा था और बच्चे थे कि पूरे शैतान के औतार। कीरत सिंह की सफ़ेद कमीज पर नन्हे-नन्हें हाथों के धब्बे प्रति क्षण बढ़ते जा रहे थे। इस धमाचौकड़ी में किसी--किसी का भरपूर हाथ भी उसके आगे पीछे पड़ जाता था।फिर भी वह खिलखिला कर हँसता हुआ, उन्हें अपनी प्यार भरी बातों से हँसाता हुआ अपनी डयूटी पर मुस्तैद।
                मैं आत्म विभोर खड़ा देखता रहा-----.देखता रहा उसका वह अत्यन्त सरल व्यक्तित्व! बच्चों से क्या और बड़ों से क्या--- सभी से एक मीठा चाशनी से भी अधिक मीठा स्नेह और बेलाग मुहब्ब्त--- प्रेस के सारे कर्मचारी,उसके भाई साहब,और मैं उन्हीं मे खो चला।बच्चे शोर कर रहे थे, कीरत सिंह खिलखिला रहा था,मगर मैं इन सबसे ऊपर उठ रहा था,बहुत ऊपर----।
                मैं अपने कमरे में लेटा अपने अखबार के ताजे अंक को उलट-पलट रहा हूं।मगर कानों के परदों को फाड़ती हुई एक ध्वनि भीतर घुस रही है---हरे कृष्णा, हरे कृष्णा हरे हरे............!जन्माष्टमी का दिन,मंदिर में चौबीस घण्टे का अखण्ड कीर्तन और लाउड स्पीकर चीख रहा है-हरे राम हरे राम हरे कृष्णा हरे कृष्णामैं डूब चला हूँ। कीर्तन में मानव कंठ ही नहीं अनेक बाजों का सहयोग है।पंचम स्वर में एक विचित्र खिचड़ी राग उठ रहा है।मगर सभी उसमें झूम रहे हैं, कारण कि सबकी आत्मा भगवान कृष्ण के भक्ति रस से ओत-प्रोत है--भगवान के अनन्य भक्त हैं वे,श्रद्धालु सेवक कि जो निर्जल व्रत हैं!
                और यह मंदिर के दरवाजे पर बैठी है भिखमंगों की पांत! अपनी झपकती आंखों से सूखी ठठरी को गीले फर्श गीली दीवार का सहारा दिये वे द्वार की ओर टकटकी लगाये हैं।त्रिलोकी नाथ के जन्म की खुशी में भादों के जलधर उमड-घुमड़ कर बरस रहे है।और ये दरिद्र नारायण नर-नारायण पर आशा लगाए धैर्य की मूर्ति बने बैठे भीग रहे हैं।बारह बजे भगवान का जन्म होगा।भक्त इसी रास्ते से बाहर निकलेंगे। और उनकी फैली हुई झोली पर दो चार खीरे और अमरूद के टुकड़े पड़ जायेंगे। फिर वे एक दूसरे पर टूट पड़ेंगे, आपस में उलझ जायेंगे! ठीक उन कुत्तों की तरह जो पत्तल की जूठन के लिए जूझते हैं, फिर भी अतृप्त, फिर भी प्यासे के प्यासे।मैं और भी नीचे डूबा--यह कीरत सिंह, जन्माष्टमी का पु्ण्य पर्व, वह गंदगी में लिपटा हुआ कुत्ते का घिनौना पिल्ला, वह उसकी भावना, वह उसका पागलपन और यों हमारे सामने से गुजरती चली गयी जीवन निर्माण की पगडंडी।
                और मैं हड़बड़ा कर बैठ गया हूँ।मेरी दृष्टि सामने दीवार से लटकते चित्र पर जम गयी है-- कालिदास का विरही यक्ष बद्धांजलि हो अपनी प्रियतमा के पास संदेश भेज रहा है और संदेश वाहक कौन कि कारे कजरारे मेघ, जो अम्बर की छाया में धरती पर छाया करते उड़े चले जा रहे हैं दूर यक्ष की प्रिया के देश, मेघदूत।
                और मैं तल-तक करीब-करीब जा पहुँचा, जहाँ रूपहली बालू और मटमैली मिट्टी की पहचान आसान होती है। बशर्ते की आंखे खुली हों और दिल धडकन करता हो। कीरत सिंह की भावनायें, उसका संदेंह अथवा कि वह स्वयं संदेश वाहक, पहुँचाये किसके हृदय तक? पता नहीं, यक्ष का मेघदूत भी उसी की तरह संवेदशील था अथवा नहीं, महाकवि के काव्य की आत्मा जाने, किन्तु कीरत सिंह ?
                एकाकी जीवन में कीरत सिंह को भोजनादि की बड़ी दिक्कत थी।इसे वह भी महसूस करता था और मैं भी, किन्तु ऐसे परिवार हीन व्यक्ति को, जिसे कोई एक घूंट पानी देने वाला भी न हो, कोई अपनी कन्या देने के लिए तैयार न होता था।एक दिन मैंने उसके योग्य बहू ढूंढ भी निकाली।ब्याह का दिन भी निश्चित हो गया,मगर ब्याह के ठीक दो दिन पहले बड़े तड़के ही वह प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह आकर मेरे सामने खड़ा हो गया।दरी में लिपटा हुआ छोटा सफरी बिस्तरा एक हाथ में तथा डेढ़ हाथ का शीशम का डंडा दूसरे हाथ में।सिर पर दुपलिया टोपी, पैर में पंजाबी जूते और यों किसी भी सफर के लिए पूरी तैयारी ।
                आते ही बोला-पन्द्रह दिन की छुट्टी दीजिए
                ‘और तुम्हारा ब्याह मैंने रुष्ट होकर पूछामैं जानता था यह तारीख टली तो उसके ब्याह की बात भी हमेशा के लिए गई।
 अजी, वह तो होता रहेगा।भूकम्प की खबरें आपने तो पढ़ी ही होगीं।सारा आसाम तबाह हो गया।क्या इस समय वहां के लोगों की सहायता न करना देशद्रोह न होगा? उसने गम्भीर होकर कहा।
मैं स्तब्ध और जबान बन्द! उसे छुट्टी मिल गई।
                वह ठीक पन्द्रह दिन बाद लौटा, मगर स्वस्थ गया था बीमार आया।बीसों जगह पट्टियाँ बंधी थीं।हाथ की एक हड्डी भीइ सरक गई थी।यह भूकम्प पीडि़तों की रक्षा का प्रसाद था।वहां के बरसाती मच्छरों ने उसका पूरी तरह स्वागत किया था।मकानों के मलवे हटाने में उसे कई जगह गहरे घाव भी आ गए थे।फिर भी उस ने हँस-हँसकर अपना काम किया और हँसता हुआ ही वह मेरे सामने खड़ा था।भूकम्प पीडितों के समाचार पूछने पर भरी हुई आंखें और रुंधा हुआ गला, मगर स्वयं अपनी परेशानियों का जिक्र आने पर वही पूर्व परिचित खिल........खिल!
                सगे सम्बन्धियों को खो कर, लाखों की सम्पत्ति से हाथ धोकर, जन्मभूमि से बिछुड़ कर भी वह धरती-पुत्र अजेय सरलता, अजस्र मुस्कान और निःस्वार्थ त्याग लेकर जिन्दगी के हर मोर्चे पर खिलखिलाता हुआ! वह कालिदास का बीसवीं सदी का जीता जागता मेघदूत!
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प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म।
31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।
शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन मे संलग्न।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।
बाल कहानियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला। 

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‘देख लूं तो चलूं’ “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” 1mai 2011 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आने वाली किताब आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दशरथ प्रकरण दस्तक दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहाड़ पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पितृ दिवस पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्रकृति प्रताप सहगल प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाजू वाले प्लाट पर बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध माँ मां का दूध माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लू लू की सनक लेख लेख। लौटना वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र संदेश संध्या आर्या। संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. Bअच्चे का विकास। Breast Feeding. Child health Child Labour. Children children. Children's Day Children's Devolpment and art. Children's Growth children's health. children's magazines. Children's Rights Children's theatre children's world. Facebook. Fader's Day. Gender issue. Girls Kavita. lekh lekhh masoom Neha Shefali. perenting. Primary education. Pustak samikshha. Rina's Photo World.रीना पीटर.रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया.तीसरी आंख। Teenagers Thietor Education. Youth

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