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त्याग,सेवा,समर्पण और रचनात्मकता का अनोखा संगम है:साक्षरता निकेतन

मंगलवार, 10 सितंबर 2019


संस्मरण

त्याग,सेवा,समर्पण और रचनात्मकता का
अनोखा संगम है साक्षरता निकेतन
                   
                  
          किसी प्रतिष्ठान से या संस्थान से जुड़ना और वहां के लिए लम्बे  समय तक काम करना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है।इस प्रक्रिया में आपके खजाने में खट्टे मीठे दोनों तरह अनुभव आते हैं।मीठे अनुभव आपको जीवन भर खुशी से आह्लादित करते हैं तो खट्टे अनुभव कई तरह की सीख देते हैं।कहीं कहीं जाकर आपको ऐसा भी लगता है कि आप किसी संस्थान में नहीं बल्कि अपने घर परिवार में ही काम करने के लिये आ गये हों।ऐसे ही कुछ सुखद अनुभवों का खजाना मुझे मिला लखनऊ के प्रसिद्ध संस्थान लिट्रेसी हाउस या साक्षरता निकेतन से जुड़ कर।
                 लिट्रेसी हाउस का नाम मैं अपने पिता श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी से बराबर सुनता था।बचपन में भी और बड़े होने पर भी।वो अक्सर इस प्रतिष्ठान की तारीफ़ करते हुये मुझसे कहते भी थे कि कभी लखनऊ जाना तो वहां एक बार लिट्रेसी हाउस जरूर जाना।कारण था कि मेरे पिता श्री भी लिट्रेसी हाउस से बतौर लेखक काफ़ी समय तक जुड़े रहे थे।
                मार्च 1986 में जब मैंने लखनऊ में नौकरी ज्वाइन करने आया तो  मैंने यहां के क्रियेटीविटी और लेखन से जुड़े हर अड्डों पर जाना शुरू किया।इसी क्रम में आकाशवाणी,दूरदर्शन,उ0प्र0हिन्दी संस्थान,संगीत नाटक एकेडेमी,रवीन्द्रालय आदि मुख्य थे।इन सब जगहों पर जाने के दो ही मकसद थे मित्र मंडली का विस्तार और कुछ नये कामों की तलाश।लिट्रेसी हाउस भी जाने का मन बहुत होता पर अपने दफ़्तर(निशातगंज)से दूरी और नया शहर होने के कारण नहीं जा पा रहा था।
                     पर कहते हैं न जहां चाह वहां राह्।मैं आफ़िस में एक दिन बैठा कुछ काम कर ही रहा था कि तत्कालीन निदेशक महोदय ने मुझे बुलाया और कहा कि साक्षरता निकेतन में कठपुतलियों पर आधारित दो दिनों की एक स्क्रिप्ट राइटिंग वर्कशाप है और उसमें मुझे प्रतिभाग करने जाना है।मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।और इस तरह से 1986 के आस-पास ही मेरा साक्षरता निकेतन में आना जाना शुरू हो गया।उसी दौरान साक्षरता निकेतन में श्री वीरेन्द्र मुलासी,डा0धरम सिंह,श्री लायक राम मानव,श्री दिनेश सिंह जी जैसे क्रिएटिव महानुभावों से परिचय हुआ।शुरुआती दौर में हुआ यह परिचय आगे चल कर प्रगाढ़ मित्रता में परिवर्तित हो गया।
    तो इस तरह लखनऊ आने के साथ ही साक्षरता निकेतन से हुआ जुड़ाव आज भी जारी है।इस दौरान मैं वहां कई क्रिएटिव राइटिंग वर्कशाप्स,सेमिनार्स,संगोष्ठियों में कई-कई दिन के लिये जाने लगा।वहां से जुड़ी मेरी ढेरों यादें हैं।कई तरह के अनुभव हैं।जिनको अगर कलमबद्ध करूं तो एक लम्बी संस्मरणात्मक किताब बन सकती है।
   उन्हीं में से कुछ घटनाओं को मैं यहां साझा करने की कोशिश कर रहा हूं।
    0 सेवा और समर्पण का अद्भुत भाव : सबसे पहली बात तो ये कि वहां के हर अधिकारी और कर्मचारी में आगन्तुक रचनाकारों के प्रति सम्मान,सेवा और समर्पण का जो भाव मौजूद है वैसा कम ही संस्थानों में देखने को मिलता है।कोई भी वर्कशाप हो,किसी भी स्तर का प्रतिभागी वहां आया हो उसको जितना सम्मान इस संस्थान में मिलता है उसे देख कर ही आश्चर्य होता है क्या यहां के अधिकारी कर्मचारी इसी दुनिया के मनुष्य हैं या देव लोक के प्राणी।चाहे प्रतिभागियों का स्वागत सत्कार हो,उनके जलपान,भोजन की बात हो या उन्हें ठहराने की व्यवस्था---किसी भी प्रतिभागी को कभी कोई तकलीफ़ होती मैंने आज तक नहीं देखी।कम से कम मैं तो ये बात दावे के साथ कह सकता हूं कि बतौर रचनाकार मुझे जो सम्मान,जो सहृदयता वहां मिली कम ही जगह मिली है।प्रतिभागी के आने से लेकर वापस जाने तक संस्थान के कर्मचारी,अधिकारी बराबर प्रतिभागी की सेवा में लगे रहते हैं।
              शुरुआती दौर की एक वर्कशाप की एक घटना मैं बताऊं।शायद पांच दिन की वर्कशाप थी।पहले दिन वर्कशाप समाप्त होने के बाद मैं अपने मित्र श्री मधुकर जी के साथ जब निकलने को हुआ तो देखा श्री वीरेन्द्र मुलासी,डा0धरम सिंह,श्री लायक राम मानव,श्री दिनेश सिंह कमरों से निकलकर हमें स्कूटर स्टैण्ड तक छोड़ने आये हैं।मुझे बड़ा अश्चर्य हुआ।अगले दिन फ़िर जब हम निकले तो फ़िर चारों लोग वहां मौजूद–और बाकायदा हाथ जोड़ कर।मुझसे रहा नहीं गया।मैंने मुलासी जी से पूछ ही लिया कि भाई साहब ये रोज हम लोगों को स्टैण्ड तक छोड़ने आप अपने काम छोड़ कर क्यूं आते हैं---क्या हम कोई मेहमान हैं?तो मुलासी जी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर मेरे भीतर  साक्षरता निकेतन और वहां के लोगों के प्रति एक अजीब सा श्रद्धा भाव जागृत हो गया जो आज भी बरकरार है---कि क्या आज भी धरती पर ऐसी सज्जनता और सेवा भाव मौजूद है?उन्होंने कहा कि—“हेमन्त जी आप लोग हमारे लिये सिर्फ़ मेहमान रचनाकार ही नहीं बल्कि देवतातुल्य हैं—और ये बात मैं नहीं कह रहा – ये बात इस निकेतन की भूमि कहला रही मुझसे।इस भूमि ने ही हमें ऐसे संस्कार दिये हैं।“मैं अवाक हो कर मुलासी जी का चेहरा देखता रह गया।
                                 

0रचनात्मक ऊर्जा निकेतन के कण कण में विद्यमान :एक जो सबसे बड़ी बात साक्षरता निकेतन की मुझे आकर्षित करती रही है वो है संस्थान की लोकेशन,परिसर और वहां का मनोरम और प्राकृतिक वातावरण।शिक्षा से जुड़े अन्य कई संस्थानों में गया हूं लेकिन इस संस्थान में प्रवेश करते ही दिल के अन्दर जो पवित्रता का भाव प्रवेश करता रहा है वो अनुभूति मुझे किसी अन्य संस्थान परिसर में जाने पर आज तक नहीं हुयी।संस्थान के प्रवेश द्वार की ग्रामीण परिवेश जैसी फ़ूस से की गयी सजावट,सामने दिखता प्रार्थना भवन,दाहिनी तरफ़ बना कठपुतली विभाग,बायीं ओर बना जलपान गृह,और आगे बढ़ने पर जनशिक्षण संस्थान भवन,स्टेट रिसोर्स सेण्टर का भवन---और इन सबके चारों ओर पेड़ों की कतारें और फ़ूलों की क्यारियां सब कुछ आपको अभीभूत करता है।-----ऐसा लगता है अदरणीया मैडम वेल्दी फ़िशर जी ने रचनाकारों के लिये असली भारत का गांवों का परिवेश यहां उठा कर रख दिया हो।---और इन सबसे भी बढ़कर इस संस्थान की मेरी सबसे प्रिय जगह “टैगोर हाल”---जहां बैठकर वर्कशाप की सामग्री तैयार करने के साथ ही मैंने अपनी “ओ मां”,
“कहां खो गया बचपन”, “कटघरे के भीतर” जैसी अच्छी कविताएं और “अकेला चल चला चल” जैसी कहानी लिखी है।इस “टैगोर हाल” के बारे में तो मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि आप रचनाकार नहीं भी हैं और वहां जा कर एक दो घण्टे बैठ जायें तो निश्चित ही आपकी कलम से भी एकाध छोटी-मोटी कहानी,कविता या गीत सादे पन्नों पर उतर ही आयेगी।
     एक वर्कशाप में तो कमाल ही हो गया।सुबह से ही हम लोग कुछ लिखने का मूड और माहौल बना नहीं पा रहे थे।डा0धरम सिंह जी मुझे और श्री मधुकर जी को दो बार पान भी खिला चुके थे।और पूछ भी रहे थे कि, “भैया तुम पचे कुछ लिखिहौ कि खाली हियां घूमै आये हो?” मैंने कहा कि “आप तो कहते थे कि यहां मोर आते हैं—मोर को बुलाइए और हमारी कलम चालू।” “ल्यो अबहीं बुलाय देत हैं---“ अभी डा0धरम सिंह जी कह ही रहे थे कि एक मोर टैगोर हाल के दरवाजे पर हाजिर।---थोड़ी देर वो सबको देखता रहा फ़िर कूद कर मेज पर।और बड़े आराम से दस पन्द्रह मिनट वहां बैठा रहा।और सचमुच उसके आते ही हम लोगों का जबर्दस्त मूड बना लिखने का।हमने शाम तक एक-एक साक्षरता गीत लिख दिया।
             तो ऐसा सृजनात्मक ऊर्जा से भरपूर है पूरे साक्षरता निकेतन का और खासकर टैगोर हाल का माहौल।ऐसे में भला कौन नहीं जाना चाहेगा वहां।बल्कि मैं तो कई बार श्री वीरेन्द्र मुलासी जी से कहता भी था कि मुझे यहां के हास्टल में एकाध कमरा दिलवा दीजिये मैं कुछ दिनों के लिये छुट्टी लेकर यहीं आ जाऊं और ढेर सारी रचनायें लिख कर साथ ले जाऊं।
0मैडम वेल्दी फ़िशर का कमरा : इस संस्थान की जनक मैडम वेल्दी फ़िशर जी इसी परिसर में रहती भी थीं।संस्थान के पीछे की तरफ़ उनका आवास बना है।मुझे इस बात का पता नहीं था।एक वर्कशाप के बीच में किसी दिन श्री मुलासी जी ने सभी प्रतिभागियों से कहा कि आइये चलिये आप लोगों को इस पूरे संस्थान की जनक वेल्दी फ़िशर जी का निवास दिखा दें।हम लोग चल पड़ेउनके निवास पर पहुंचने पर तो मैं दंग रह गया कि—इतनी दूर से भारत आकर यहां साक्षरता की अलख जगाने के लिये अपना वतन छोड़ देने वाली ये महिला—इतने साधारण ढंग से रहती थीं।–उनका बहुत छोटा सा निवास,उनका छोटा सा अध्ययन कक्ष,कमरे सामान सभी कुछ उनकी सादगी,त्याग और समर्पण की भावना की गवाही देते हैं।शायद मैडम वेल्दी फ़िशर जी का ही पूरा असर आज भी साक्षरता निकेतन के कण-कण में बसा है तभी तो यहां के लोगों में भी आज वही मानवीय गुण विद्यमान हैं।
0कर्मठता,ईमानदारी और श्रद्धा की भूमि: साक्षरता निकेतन के परिसर में जब आप प्रवेश करते हैं तो सबसे सामने ही आपको प्रार्थना भवन दिखाई देता है।जब मैं पहली बार वहां गया था तो मैंने डा0धरम सिंह जी से पूछा था कि क्या यहां कोई प्रार्थना या सत्संग भी होता है ?तो डा0धरम सिंह ने मुझसे कहा कि कल सुबह आठ बजे तक आ जाओ तो देखो यहां क्या क्या होता है।मैंने भी मजाक में ही कहा कि जब वर्कशाप दस बजे कि है तो क्या मैं यहां आठ बजे घास छीलने आऊंगा?तो धरम सिंह जी ने उसी टोन में मुझसे कहा कि हां हम लोग घास छीलते हैं तुम्हें भी छीलनी है घास तो आ ही जाओ कल जल्दी उठ के
        खैर अगले दिन मैं सुबह घर से जल्दी निकल कर आठ बजे तक साक्षरता निकेतन पहुंच गया।और वहां हो रहे काम को देख कर तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा।वहां प्रार्थना भवन के सामने श्री मुलासी जी,डा0धरम सिंह,श्री दिनेश जी,श्री लायक राम मानव और कई अन्य कर्मचारी अधिकारी इधर-उधर पड़े तिनकों,कागज के कुछ टुकड़ों को इकट्ठा कर रहे थे।कुछ लोग खुरपियों से घास साफ़ कर रहे थे।धरम सिंह के इशारे पर मैंने भी कुछ देर घास छीली।---फ़िर थोड़ी देर बाद सभी लोग हाथ धोकर प्रार्थना सभा में पहुंचे और वहां बाकायदा प्रार्थना हुयी।---फ़िर सभी लोग अपने अपने काम पर।
      ये पूरा घटनाक्रम देखकर मुझे लगा कि मैं किसी संस्थान में नहीं बल्कि किसी आश्रम में आया हूं।और यहां का हर कर्मचारी अधिकारी एक सरल साधु है।सचमुच उसके बाद से मैं जितनी बार भी वहां गया मेरी श्रद्धा साक्षरता निकेतन के लिये एक आश्रम जैसी ही बढ़ती गयी।और आज भी बरकरार है।
              मुझे आज भी लगता है कि मुझे यदि साक्षरता निकेतन परिसर में एक दो माह लगातार रहने का अवसर मिल जाये तो निश्चित रूप से मैं दो महीनों में कुछ नया,अनोखा और अभूतपूर्व सृजन तो कर ही दूंगा।
            मुझे यह भी लगता है कि इतने मनोरम प्राकृतिक वाता्वरण में जिस परिकल्पना को साकार करने के लिये मैडम वेल्दी फ़िशर ने आश्रम जैसे माहौल वाले इस संस्थान को जन्म दिया था-----उसे मेट्रो कल्चर की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहिये और इसे पूर्ण शासकीय संरक्षण देकर वेल्दी फ़िशर जी के सपनों को साकार करना चाहिये।
                           0000
डा0हेमन्त कुमार
मोबाइल-09451250698

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संस्मरण---जिन्होंने मुझे रोशनी दिखाई----।

गुरुवार, 5 सितंबर 2019


जिन्होंने मुझे रोशनी दिखाई----।
                                        
डा0रघुवंश जी 
              
 
 हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कोई न कोई ऐसा शख्स जरूर आता है जो उसकी पूरी जीवन धारा या पूरा जीवन दर्शन ही बदल देता है।वैसे तो इस बदलाव का प्रेरक कोई भी हो सकता है।मां-पिता,भाई-बहन,मित्र,शिक्षक यहां तक कि कोई अनजान व्यक्ति भी।लेकिन अक्सर बदलाव की इस प्रेरणा में शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान रहता है।क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का सबसे सुनहरा यानि बचपन का समय दो ही लोगों के साथ सबसे ज्यादा बिताता है।वो हैं मां-पिता या फ़िर शिक्षक।स्कूल के समय के पहले और बाद का सारा समय अपने मां-पिता के साथ और स्कूल का समय शिक्षक के साथ।इन्हीं लोगों के द्वारा सिखाई गयी बातें बच्चे के पूरे जीवन को प्रभावित करती हैं।
         अगर मैं खुद अपने शिक्षकों की बात करूं तो मेरे जीवन को बदलने वाले दो शिक्षक हैं।पहले स्व0डा0अश्विनी कुमार चतुर्वेदीराकेशऔर दूसरे स्व0डा0रघुवंश।
मेरा सौभाग्य कि मैं इलाहाबाद युनिवर्सिटी में दोनों ही शिक्षकों का छात्र रहा हूं।डा0 राकेश चतुर्वेदी जी ने मुझे साहित्य लेखन की ओर प्रेरित किया और डा0रघुवंश जी ने मुझे जीवन में साहस,मेहनत और ईमानदारी का पाठ पढ़ाया।
   पहले मैं बात करूंगा डा0राकेश चतुर्वेदी जी की।बात लगभग 1976 की है।मैंने बस इलाहाबाद युनिवर्सिटी में बी0ए0 में दाखिला लिया ही था।और दूसरे छात्रों की ही तरह मेरा भी मकसद बी0ए0 करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना था।ड़ा0राकेश चतुर्वेदी जी मुझे हिन्दी में भाषा विज्ञान पढ़ाते थे।क्लास शुरू होने पर पहले दिन सबसे उन्होंने औपचारिक परिचय लेना शुरू किया।मेरा भी नम्बर आया तो मैंने अपना नाम बता दिया।उन्होंने पूछा कि हिन्दी पढ़ने के अलावा कभी कुछ लिखा भी है?(ये प्रश्न वो सबसे पूछ रहे थे पर सभी का जवाब नकारात्मक था।)मैंने यूं ही कह दिया कि हां कहानियां लिखने की कोशिश करता  हूं।डा0 राकेश जी काफ़ी खुश हुये।उन्होंने कहा चलो कोई तो निकला लिखने पढ़ने वाला।उन्होंने मुझे अगले दिन शाम को चाय पीने के लिये अपने घर बुलाया और यह भी हिदायत दी कि जो कुछ भी लिखा है साथ में लेते आना।अब मेरी हालत खराब।अभी तक मैंने कोई कहानी तो क्या छोटी सी कविता नहीं लिखी थी।खैर---रात में जाग कर काफ़ी सोच विचार कर मैंने अपनी डायरी में एक कहानी लिख मारी।आखिर सिर ओखली में तो मैंने ही डाला था।कहानी उस समय के अनुकूल थी।संक्षेप में कथानक ये था कि एक बेरोजगार बी0ए0पास युवक नौकरी की खोज में भाग कर बम्बई जाता है और काफ़ी असफ़लताएं झेलने के बाद एक दिन हत्या करके जेल पहुंच जाता है।
       युनिवर्सिटी के पास ही डा0राकेश जी का आवास था।अगले दिन मैं अपनी डायरी लेकर डा0राकेश जी के घर पहुंच गया।उन्होंने मेरे स्वागत का पूरा इन्तजाम किया था।चाय,पकौड़ी,मिठाई।मैंने जम कर नाश्ता किया और चाय पी।फ़िर बारी आई कहानियों की।मैंने डरते-डरते डायरी उन्हें पकड़ा दी।और चुपचाप बैठ गया।मन ही मन डर रहा था कि अब डांट पड़ेगी।पर राकेश जी ने तन्मयता के साथ दस-पन्द्रह मिनट में कहानी खतम कर दी।और मुझसे मुखातिब हुये।
           हां तो बाबू हेमन्त कुमार जीआगे क्या इरादा है?डा0राकेश जी ने मुस्कुराकर पूछा।
  सर---आगे कम्पटीशन---और ये कहानी तो बस ऐसे ही----।मेरी हालत खराब।
कल ही लिखी है न?
सर---क्या बताऊंमैंने तो बस क्लास में वाह वाही पाने के लिये कह दिया था---कभी कहानी लिखी नहीं थी---इसी लिये कल रात जाग कर लिखी।मैं लगभग हकलाते हुये बोला।
    बर्खुरदारये बताओ इतनी शानदार कहानी लिखी है तुमने ---और वो भी पहली कहानी।और ऊपर से घबरा रहे।क्यों तुम कम्पटीशन देने के चक्कर में हो?कहानियां क्यों नहीं लिखते भाई?डा राकेश की बातों पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था।मैं अपलक उनकी ओर देख रहा था।
        देखो मैं ये नहीं कह रहा कि तुम कम्पटीटिव एक्जाम्स मत दो तैयारी करो--पढ़ो लिखो--लेकिन तुम एक अच्छे कहानीकार भी बन सकते हो।तुम्हारे पास शब्द,भाषा,विचार,भावनाएं सभी गुण हैं एक कहानीकार के।---और इसे ले जाओ थोड़ा और संशोधन करके युनिवर्सिटी की मैगज़ीन में दे देना।कहकर उठते हुये उन्होंने मुझे डायरी पकड़ा दी।
   मेरी वो कहानी जंजीरें युनिवर्सिटी पत्रिका में तो छपी ही उसे युनिवर्सिटी की ही एक कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कार भी मिला।फ़िर तो मेरे पंख से लग गये।रोज एक नयी कहानी।और डा0राकेश जी का साथ।एम0ए0 फ़ाइनल में आने के पहले मेरा एक बाल कहानी संग्रह आ चुका था।और मैंने इसी दिशा में आगे बढ़ना अपना लक्ष्य बना लिया।
         मेरे दूसरे प्रेरक थे मेरे रिसर्च गाइड डा0 रघुवंश।मैंने 1979 में रघुवंश जी के निर्देशन में रिसर्च ज्वाइन किया था।रघुवंश जी हाथों की दिक्कत(उनके हाथ बचपन से ही बहुत पतले और अंदर की ओर मुड़े हुए थे।)के कारण अक्सर अपनी यात्राओं के दौरान मुझे सहायक के रूप में साथ ले जाते थे।
       मैं अक्सर यात्राओं के दौरान अपना भारी  सामान खुद उठाने के बजाए कुलियों के भरोसे रहता था।क्योंकि मुझे लगता था कि जब यू0जी0सी0वाले पैसा दे रहे तो अपने सामान मैं क्यों उठाऊं।पर रघुवंश जी के साथ की गयी एक यात्रा ने इस मामले में मेरी विचारधारा ही बदल दी।
       मुझे रघुवंश जी के साथ इलाहाबाद से गोरखपुर किसी सेमिनार में जाना था।उन दिनों भटनी से आगे की यात्रा छोटी लाइन(नैरो गेज)की ट्रेन से होती थी।ट्रेन बदलने हमें दूसरे प्लेटफ़ार्म पर जाना था।सिर्फ़ दो मिनट थे ट्रेन छूटने में।कुली दिख नहीं रहे थे।मैंने कहा सर ट्रेन छूट जायेगी क्या?रघुवंश जी ने कहा ---अरे ऐसे कैसे छूटेगी ट्रेन।अभी देखो ---।और अपने मुड़े हुये हाथों में ही एक में बैग और एक में छोटी अटैची उठा कर रघुवंश जी दौड़ पड़े दूसरे प्लेटफ़ार्म की ओर---उनकी इस हिम्मत और जज्बे को देख मुझे खुद पर बड़ी शर्म आयी।एक वृद्ध और हाथों से अशक्त व्यक्ति मेरे सामने सामान उठा कर दौड़ रहा और मैं कुली का इन्तजार कर रहा हूं।मैंने खुद को धिक्कारा और जल्दी से मैं भी पीछे पीछे दो भारी वाली अटैचियां लेकर दौड़ा---और अन्ततः हमें गाड़ी मिल गयी।उसी दिन से मैंने निर्णय किया कि अपने सारे काम खुद करूंगा।किसी के भरोसे नहीं रहूंगा।
     वो दिन था और आज का दिन मैं यथा संभव अपने सारे काम खुद ही करने की कोशिश करता हूं।यहां तक कि अपने घर का फ़्लश बेसिन तक खुद साफ़ करता हूं।और इससे मुझे जो आत्म सन्तोष मिलता है उसे मैं शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता।
          मैं आज जो कुछ भी हूं उसके प्रेरक आदरणीय डा0राकेश चतुर्वेदी और डा0रघुवंश जी दोनों ही लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा दी गयी सीखें आज भी मुझे प्रेरणा देती हैं।दोनों ही गुरुओं को मेरा हार्दिक नमन और अभिनन्दन।
     00000
डा0हेमन्त कुमार

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एक टिप्पणी --“आदिज्ञान”--एक आध्यात्मिक यात्रा के दो दशक।

सोमवार, 26 अगस्त 2019



"आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर,2019 अंक
        मुंबई से प्रकाशित भारतीय संस्कृति  के उच्च  मूल्यों के लिये समर्पित रही यह पत्रिका अपने प्रकाशन के दो दशक पूरे  करने जा रही है।मुझे प्रसन्नता है कि भाष,साहित्य,कला, दर्शन,धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़े साहित्य के साथ प्रकाशन मेँ स्तरीयता से समझौता न करने वाली इस पत्रिका से मैं  इसके  प्रकाशन के शुरुआत से ही एक लेखक और पाठक के रूप मे जुड़ा  रहा हूं।भारतीय  परम्परा में दर्शन और अध्यात्म का क्षेत्र इतना व्यापक है कि विद्वान और मनीषी अपनी तरह से इसकी व्याख्या करते आ रहे हैं।कुछ विद्वानों ने धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रंथों की भाषा को इतना जटिल बना दिया है कि  सामान्य पाठक इससे दूर होता चला गया। मुझे यह कहने मेँ  कतई  संकोच नहीँ है कि आदिज्ञान ने आम बोल-चाल की भाषा मे लिखने  वाले विद्वानों को एक मंच पर लाकर  धर्म और अध्यात्म,यहाँ  तक कि तंत्र-मन्त्र के बारे मेँ फैली भ्रांतियों को दूर करके एक वैज्ञानिक सोच के साथ  पाठकों के सामने  रखा है।इस नये अंक की सामग्री में इन सब बातों को देखा-समझा जा सकता है।
हमारा  ब्रह्मांड सदैव से ही एक कौतूहल का विषय रहा है।धरती समूचे  ब्रह्मांड का तीर्थस्थल है(मुरलीधरचांदनीवाला),भारतीय  परम्परा में पृथ्वी(श्रीकृष्ण जुगनू),मनुष्य और प्रकृति का आदिकालीन अन्त:सम्बंध(डा0अमर सिंह बधान),मृत्यु  जीवन की सहचरी है(डा0कमल प्रकाश अग्रवाल),विज्ञान सम्मत हैं हिन्दू पर्व और मान्यतायें(लव गडकरी) जैसे आलेख पाठकों में धर्म और अध्यात्म  के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण  विकसित  करने का काम करते हैं।कुछ अन्य आलेख हमारे लोक जीवन से सीधे जुड़े हुए हैं,चाहे वह दिया-बाती की परम्परा हो या फिर नववर्ष के विभिन्न रूपों की बात।अन्य आलेख भी अपनी समसामयिकता और व्यापक पहुंच के कारण पठनीय बन पड़े हैं।अंक की कविताएं भी अपनी स्तरीयता बनाये हुए हैं।
आज के इस कठिन साहित्यिक दौर में इस तरह की लघु पत्रिका  निकालना  निश्चित  ही एक दुस्साहस और जोखिम भरा काम है।इस दुस्साहस के  लिये पत्रिका के सम्पादक श्री जीत सिंह चौहान निश्चित ही बधाई के पात्र हैं।
                 ०००००




कौशल पांडेय
1310 ,बसंत विहार,
कानपुर-208021
मो0---9532455570

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कैंसर-दर-कैंसर(लघुकथा)

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

               

पिछले चार दिनों से भगेलू वार्ड के बाहरी बरामदे के एक कोने में पड़ा छटपटा रहा था।बीच बीच में वह दर्द बर्दाश्त से बाहर हो जाने पर भयानक रूप से चीख पड़ता।उसकी बड़ी बेटी भी पिछले चार दिनों से अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए दिन रात भागदौड़ कर रही थी।लेकिन डाक्टरों की हड़ताल की वजह से अस्पताल के सारे काम काज ठप।न मरीजों की भर्ती न कोई पुरसा हाल।उसकी लड़की कैंसर से जूझ रहे अपने बाप को अस्पताल में भर्ती करवाने आई थी।लेकिन डाक्टरों की हड़ताल ..... ।
  लड़की भागदौड़ से पस्त होकर बरामदे में निढाल बैठी थी।अन्धेरा भी हो चला था।भगेलू ने बड़ी दयनीय और मरी सी आवाज में उससे डाक्टरों की हड़ताल के लिए पूछा ...पर लड़की  क्या जवाब देती ..बस उसने भगेलू से अपने आंसू छुपाने के लिए मुंह दूसरी ओर घुमा लिया।इसी बीच भगेलू फिर दर्द से चीख पड़ा।लड़की रोती हुयी उसका सर सहलाने लगी।
     इसी बीच एक वार्ड ब्वाय वहां आकर दोनों की तरफ देखने लगा।लड़की की निगाहें जैसे ही उसकी और गयीं वह दोनों के और करीब आ गया।शायद वो बात करने का बहाना ढूँढ़ रहा था।
  “क्या दादा को तकलीफ ज्यादा है क्या?”वार्ड ब्वाय ने पूछा।
“भैया ----”लड़की के आगे के शब्द रुलाई में दब गए।
“क्या बतायें..ई डाक्टरों की हड़ताल को...लेकिन घबराओ हम बात करेंगे एक डाक्टर साहेब से।”वार्ड ब्वाय ने उसे सांत्वना दी।
“भैया क्या आप किसी डाक्टर को जानते हैं क्या?” लड़की ने पूछा।
“हम इसी अस्पताल के बड़े डाक्टर साहब को जानते हैं और उन्हें दिखा भी देंगे लेकिन.....” कहते हुए वार्ड ब्वाय बहुत कुटिलता से मुस्कराया।
“लेकिन....लेकिन क्या भैया ...मैं बापू को दिखाने के लिए जितना रुपया कहोगी दे दूंगी...”
“मुझे रुपया पैसा नहीं चाहिए भाई...बस ज़रा ..थोड़ी देर के लिए मेरे साथ अस्पताल के एक कमरे में चलना होगा तुम्हें ....”कहते हुए वार्ड ब्वाय ने लड़की के उभारों पर एक बींधती हुई निगाह डाली और हौले से मुस्कराया।
लड़की युवा थी ...उसकी निगाहों का अर्थ समझ गयी उसका चेहरा तमतमा गया।लड़की के हाथ की मुट्ठियाँ भी क्रोध से भींच गयीं।
उसका यह रूप देख कर वार्ड ब्वाय थोड़ा घबराया,“नहीं कोई जबरदस्ती नहीं...मैंने तो सोचा भाई कि तुम लोगों की तकलीफ कुछ कम हो जाय...तुम अपने बाप को ऐसे ही तड़पा कर मारना चाहती हो तो...ठीक है मैं चला...”कहकर वार्ड ब्वाय वहां से चलने को हुआ।
लड़की संज्ञाशून्य हो कर अपने बाप को देख रही थी...कभी उसकी निगाह उस वार्ड ब्वाय पर जाती कभी तड़प रहे बाप पर।तभी उसका पिता फिर दर्द से चीख पडा।उसकी दर्द भरी चीख से आहत लड़की ने बस एक सेकण्ड में निर्णय कर लिया।उसने झट अपने आंसू पोंछे और बाप का सर एक बार सहला कर वार्ड ब्वाय के साथ अस्पताल की भीड़ में खो गयी।
    लगभग आधे घंटे बाद लड़की अस्त व्यस्त सी बहुत धीरे धीरे चलते हुए पिता की ओर बढ़ रही थी।वार्ड ब्वाय ने उसे समझाया था कि वो दस मिनट में स्ट्रेचर का इंतजाम करके आ रहा है।फिर डाक्टर के पास उसके पिता को ले चलेगा। लड़की बाप के पास पहुंची तो कई  लोग वहां इकट्ठे होकर उसे देख रहे थे।पिता के बंद होठों से खून रिस रहा था उसकी आँखें फटी फटी सी आसमान देख रही थीं।शायद वो कैंसर के दर्द की आखिरी सीमा से मुक्त हो गया था।लड़की के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली वो धम्म से पिता की लाश के बगल में बैठ गयी।
                                   ०००००
डा० हेमन्त कुमार

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कहानी -- मुंशी जी

मंगलवार, 30 जुलाई 2019


(कल 31जुलाई को मेरे स्व०पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तीसरी पुण्य तिथि है।इस अवसर पर पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी एक कहानी “मुंशी जी”।यह कहानी पिता जी ने संभवतः सन 2014 में लिखी थी।यह कहानी पिता जी के पैतृक गाँव खरौना के किसी मुंशी जी की कहानी है या उनके किसी दूसरे शिक्षक की कहानी—यह बात तय कर पाना थोडा मुश्किल है।लेकिन इतना जरुर है की आज जो भी युवा अध्यापन से जुड़ रहे हैं चाहे वो प्राथमिक स्तर पर या उच्च शिक्षा में---उनके लिए ये कहानी निश्चित ही एक प्रेरणा देने वाली कहानी है।युवा शिक्षकों को मुंशी जी के चरित्र से प्रेरणा लेनी चाहिए।–-डा0हेमन्त कुमार)

कहानी
मुंशी जी


                                                                                                                                         प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

              गाँव के दक्खिन एक ऊसर भूमि पर मुंशी राम दयाल की पाठशाला थी।पास की बंसवाड़ी से झरती पत्तियाँ पाठशाला में भर जातीं। मुंशी जी के पहुँचने से पहले ही बच्चे अरहर की झाड़ू से उसे साफ कर डालते।उससे उठती धूल गाँव वालों को बता देती कि बच्चे पहुँच गये हैं, मुंशी जी अब पहुँचने ही वाले हैं। महुअरिया से लगे हुए दूर दूर तक फैले पीले पके धान के खेत।इनके बीच से गुजरती पगडंडी पर जब मुंशी जी आते दिखायी पड़ते बच्चों का शोरगुल एकदम थम जाता।
जब ऊपर तक खुँटियाई धोती पर गाढ़े का कुरता पहने, आँखों पर तागे से जोड़ी पीतल की कमानी वाली ऐनक चढ़ाये, दोनों हाथों में थमी नारियल की गुड़गुड़ी से धुँए के कश खींचते मुंशी जी के पाठशाला में प्रवेश करते ही सभी शरारती बच्चे विनम्रता की मूर्ति बन खड़े हो जाते। इस तरह वे अपने मुंशी जी के प्रति आदर प्रकट करते।उनके आसन ग्रहण कर लेने के बाद ही सब अपनी जगह बैठते।कुछ पढ़ाना शुरू करने से पहले ऐनक के पीछे से मुंशी जी की आँखें एक बार सभी बच्चों को अवश्य झाँक लेतीं।
मुंशी जी की पाठशाला को कहीं बाहर से कोई सहायता नहीं मिलती थी।फिर भी उन्होंने जिन्दगी में कभी निराशा या गिरावट का अनुभव नहीं किया।साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में कब रविवार आता है, कब दशहरा दिवाली पड़ते हैं, वे नहीं जानते थे।पर्वों पर भी बच्चे आयें या न आयें, मुंशी जी अपनी ऐनक संभालते अक्सर  अपने निर्वाण पद प्राप्त आसन पर जमे दिखायी पड़ते।कोई छात्र कई दिन न दिखायी पड़ता तो उसका हालचाल लेने उसके घर जरूर पहुँच जाते।अभिभावकों के हृदय में भी समय की मार से असमय वृ़द्ध हो चले उस व्यक्ति के प्रति कुछ ऐसा लगाव था कि वे अपने बच्चे तो पाठशाला भेजते ही, उसकी झोली भी अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुरूप भर देते।
मुंशी जी एक तार थे जो किसी न किसी रूप में हर किसी के दिल में बजते रहते थे।
   उस दिन माघ महीने की सारी ठंड जैसे उस गाँव में ही समाने का प्रयास कर रही थी।मुंशी जी ने भाप से धुंधले पड़ गये अपनी ऐनक के शीशों को धोती की खूँट से पोंछ कर आँखें आसमान पर उठायीं।बादलों के सफेद भूरे फाहे तह बना रहे थे।दाँत कटकटाती हवा शरीर बेध रही थी।पानी गिरने के आसार थे।मुंशी जी ने एक लम्बी साँस ली।आज पाठशाला जमने के लक्षण न थे।गुड़ की चाय पी कर जो एक गर्मी उनके शरीर में आ गई थी वह इस विचार के आते ही शीतलहर बन गई।सामान्य व्यक्ति उस दशा में  घर से बाहर निकलने की कल्पना तक न करता।किन्तु मुंशी जी असामान्य व्यक्ति थे।उन्होंने कमला को आवाज दी -बेटी, खिचड़ी तैयार हो गई हो तो परोस दे।
मगर भीतर तो अभी चूल्हा तक नहीं जला था।उनकी पत्नी ने  हैरत से पूछा -क्या पाठशाला ऐसे मौसम में भी खुलेगी ?
क्या ? यह सुन कर मुंशी जी को पत्नी से भी ज्यादा हैरत हुई।
ठीक है।लगता है कि पैर अब ठीक से फैलने लगे हैं।रात भर मालिश करवाओ, सिंकवाओ और अब ठंड में निकलने की बात करो।मरना तो मुझे होता है। पत्नी ने कुछ झल्लाहट से कहा।तब अकस्मात मुंशी जी को एहसास हुआ कि वे तो गठिया के मरीज हैं।अभी पिछली पूरी रात उन्होंने कितने दर्द और बेचैनी से बितायी थी।
कई मिनटों तक मुंशी जी छप्पर वाले ओसारे की एक थून का सहारा लिए खड़े रहे।उनके भीतर एक भयानक कोलाहल उत्पन्न हो गया था।जीवन का जो व्रत कभी भंग नहीं हुआ क्या उसकी कड़ी आज टूट कर रहेगी ? यह व्रत कैसा और तपस्या क्यों ? कौन सी सिद्धि प्राप्त होने वाली है इससे उन्हें ?
केवल कुछ वर्षों का समय बीतते ही कमला विवाह के योग्य हो जायगी।उसके हाथ पीले करने के लिए उन्होंने अब तक किस पूँजी का संचय किया था? क्या यह सहस्त्र छिद्रों वाला आवास बेच कर भी वे अपने एक सब से बड़े उत्तरदायित्व को निबाह सकेंगे? उन्होंने रात को रात और दिन को दिन नहीं समझा।माघ पूस की ठारी भी जर्जर वस्त्रों में काट दी।कभी यह भी नहीं देखा कि भोजन की थाली में साग है तो नमक नहीं, रोटी है तो दाल नहीं।जीवन का सारा विष वे शंकर की तरह पचाते  चले गये। मगर अबोध बेटी और रोग जर्जर पत्नी-इन दो निरीह प्राणियों को उन्होंने क्या दिया ? पत्नी आज भी पैबंद लगी धोती में अपने नारीत्व की मर्यादा छिपाये घर में पड़ी रहती है।बेटी के लिये एक छँटाक दूध की कौन कहे, कभी ढंग से रोटियाँ भी वे न उपलब्ध कर सके।बेटे को दूध के नाम पर आटे का घोल पिलाने वाले आचार्य द्रोण की तो सारी व्यथा उस दिन दूर हो गई जब वे राजगुरू बनाये गए। मगर कहाँ से आते मुंशी रामदयाल के लिए राजकुमार।
मगर जब मुंशी जी ने पाठशाला शुरू की थी तब सारी बातों का स्वरूप कुछ और ही था।उनकी पनीली आंखों के आगे आज भी वे दिन जीवन्त हो उठते हैं।उन्होंने कैसे गाँव के जमींदार से चिरौरी विनती कर के दस हाथ ऊसर भूमि पाठशाला के लिये प्राप्त की थी।पिता ने उन्हें सनकी कहा था और गाँव के लोगों ने जी भर  खिल्ली उड़ायी थी।मगर अपमान और उपेक्षा की सारी कड़वी घूटों को पी कर उस सनकी युवक राम दयाल ने अकेले ही गाँव के ताल की मिट्टी से पाठशाला की दीवारें खड़ी करनी शुरू कर दी।जिस दिन एक कमरे की आधी दीवार गर्व से सीना ताने ऊपर उभर आयी थी, गाँव वालों ने अनुभव किया था, वह मिट्टी भर नहीं है।उसके एक एक कण में श्रम और लगन की झंकार भी निहित है।तब उन्हें पागल कहने वालों ने ही उनके कार्य को हाथों हाथ ले लिया था।महीने भर के भीतर नई खपरैलों का ताज सिर पर लगाये पाठशाला की सफेद पुती दीवारें दूधिया चाँदनी में श्वेत संगमर्मर निर्मित विद्या मंदिर बन गई थीं।पहले दिन जब गाँव के पाँच सात बच्चे वहाँ पढ़ने के लिए आये, उन्होंने कितने उल्लास से अपने घर का बना नया गुड़ सब को खिलाया था।
किन्तु उत्साह का जो स्थायी रूप मुंशी राम दयाल के हृदय में था, गाँव वाले उससे वंचित थे।पाठशाला  कुछ सालों तक अपनी इन्द्रधनुषी आभा के साथ खूब चमकती रही।भीतर जगह भर गई तो बच्चे बाहर खुले में बैठ कर पढ़ते थे।फिर धीरे धीरे लोगों के मन में इस ओर से एक उदासीनता सी पैदा हो चली।मुंशी जी उसका कारण जानते थे।लोगों का जीवन इतना संघर्षमय और जटिल हो चला कि जीवन के सारे ओज और उमंग, तीज और त्योहारों का उल्लास न जाने किस दानवी के पेट में समाने लगे।जीवन की सारी स्वाभाविक मधुरता पर जैसे किसी ने कृत्रिमता का काला पेंट पोत दिया।इंसान हाड़ मांस न हो, एक मशीन भर हो चला।अब लोगों के पास इतना वक्त न था कि वे पाठशाला की ओर ध्यान देते।फिर भी मुंशी जी ढीले न पड़े।जब हवा और पानी की मार से दीवारें जर्जर होने लगीं, मुंशी जी ने अकेले ही उनकी मरम्मत करने की कोशिश की।परन्तु अब वह पहले वाला शरीर न था। वह जवानी की उमंग और मजबूत हड्डियाँ स्वप्न पट के चित्र भर रह गई थीं।
इतने पर भी उनका पढ़ाने जाने का क्रम एक दिन के लिए भी नहीं टूटा।जो कुछ उनके मस्तिष्क में था उसे बच्चों को देने में कभी कृपणता नहीं की।उन्हें प्रसन्नता थी कि उनके पढ़ाये कुछ बच्चे ऊँचे ऊँचे पदों पर कार्य कर रहे थे।जब वे गाँव आते और अपने इस आदि गुरू के चरणों का स्पर्श करते, मुंशी जी अपनी सारी व्यथा भूल जाते।
मुंशी जी ने थोड़ा झिटक कर अपनी दोनों बाहें फैलायीं।ठंड से वे कुछ अकड़ चली थीं।खड़े रहने के कारण घुटनों में दर्द होने लगा था।अच्छा हो कि आज आराम कर लिया जाय।जीवन भर तो उसी आग में झुलसा, एक दिन नहीं ही सही।यह सोच वे भीतर जाने के लिए मुड़ने को थे कि याद हो आया -- लछमन वजीफे की परीक्षा में बैठने वाला है।आज वह अवश्य आया होगा।गणित के जरूरी सवाल जो समझने हैं उसे।लछमन ही नहीं, गोविन्द, महेश, धनकू को भी तो इसी महीने शहर के अंग्रेजी स्कूल में भरती होना है।उन लोगों के लिए तो एक एक दिन कीमती है।नहीं -- अब वे घर पर नहीं रूकेंगे।
कमला! उन्हों ने ऐसे पुकार कर कहा जैसे उनके भीतर कहीं यकायक सौ पावर का बल्ब जल गया हो। मैं पाठशाला जा रहा हूँ।बन जाने पर मेरा खाना थाली में ढँक कर रख देना। लौट कर खाऊँगा। फिर किसी भी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उन्होंने अपनी सूती चादर कंधे और सीने के चारों ओर लपेटी और बाहर निकल गए।
पीछे दरवाजे की चौखट से झाँकती चार आँखों में कितनी अकुलाहट थी, मुंशी जी ने मुड़ कर इसे भी न देखा।
पाठशाला में एक भी छात्र नहीं आया था।मगर मुंशी रामदयाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।उन्होंने लछमन के घर पहुँच कर वहीं महेश धनकू और गोविन्द को भी बुलवा लिया।बच्चों के लिए यह चौंकाने वाली बात नहीं थी।क्योंकि उनके लिए यह कुछ भी नया नहीं था।उनका यह स्वभाव बच्चों में हमेशा से एक अनिर्वचनीय पुलक भरता आया था।
उस रात मुंशी रामदयाल को बड़ा तेज ज्वर चढ़ आया।पैर की नसें बुरी तरह सूज आयी।चारपाई पर हिलना डुलना तक मुश्किल हो गया।दो हफ्ते रोग से लड़ने के बाद वे चलने फिरने के योग्य हुए।
आगे के कुछ सालों में गाँव में बड़े बदलाव आये।देश में पुनरूत्थान और जागृति की जो बयार बही उसके स्पर्श से वह गाँव भी अछूता नहीं रहा।पास के कस्बे में प्लास्टिक का एक कारखाना खुल गया। गाँव के काफी लोगों को उसमें रोजगार मिल गया।कारखाने की तरफ से गाँव के बगल एक स्कूल भी खुल गया।स्कूल की सुन्दर पक्की इमारत थी।योग्य और अनुभवी अध्यापक थे।वहाँ पढ़ने वाले बच्चों  की फीस माफ थी।जो गरीब थे उन्हें वजीफा मिलता था।गाँव के भाग्य खुल गये।
मुंशी रामदयाल की पाठशाला अब सूनी हो गई थी।जब तक पौरूष चला मुंशी जी अपने लंगड़े आसन पर बैठे दिखायी पड़ते रहे।आँखों पर वही ऐनक तथा हाथों में वही पुरानी गुड़गुड़ी रहती।उनका चेहरा अवश्य पहले से काफी बदल गया था।आँखों की रोशनी थक चली थी।चेहरे की झुर्रियाँ जीवन के सतत संघर्षों की दास्तान बन कर नीचे लटक आयी थीं।उनकी आँखों के आगे जब तब अपने खंडहर घर की दीवारें आ खड़ी होतीं।पत्नी का करूणार्द्र मुख उन्हें विचलित कर देता।जब विवाह की उम्र पार कर रही बेटी उनके हृदय के घावों को कुरेदने लगती उनका सारा धैर्य आँखों की राह बह निकलता।
      नये स्कूल में लम्बी लम्बी छुट्टियाँ पड़ती थीं।अध्यापक उन छुट्टियों में कभी स्कूल की ओर आँख उठा कर भी न देखते।उनका कोई छात्र हफ्तों अनुपस्थित रहे तो उन्हें उसकी कोई चिन्ता न होती।अभिभावकों छात्रों और टीचर्स का सम्बन्ध बस महीने में एक दिन पड़ने वाली पैरेन्ट टीचर्स मीटिंग तक ही सीमित था।मुंशी जी के लिए यह सब एकदम नयी बात थी।पाठशाला, अध्यापक और छात्रों का यह सम्बन्ध कभी भी उनकी कल्पना का विषय नहीं रहा।वे तो पाठशाला की हृद्तंत्री में झंकार बन समा जाने वाले जीव थे।बाहर खड़े रह कर केवल उसका स्वर सुनने का उन्हें कोई अभ्यास न था।
आज ऐसे में हम सोच भी कैसे सकते हैं कि कभी मुंशी जी जैसी शख्सियत भी हुआ करती थी।
                             ००००००

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11 मार्च, 1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म। 31 जुलाई 2016  को लखनऊ में आकस्मि निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी, नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों, नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित।


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