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ठहराव

बुधवार, 23 अगस्त 2017

ठहराव
ठहरो जरा सुस्ता लो
किसी बूढ़े बरगद की छांव में
किसी घनी नीम की छाया में
किसी बँसवारी के झुरमुट में
किसी कुएं की जगत पर
या इन सबको छोड़
जहां तुम्हें सकून मिल सके
वहीं सुस्ता लो
आखिर इतनी लंबी यात्रा की है तुमने
अपने संघर्षमय जीवन की
तो थोड़ा सुस्ताने का हक तो
बनता ही है तुम्हारा।

ठहराव चाहे कहीं का भी हो
तुम्हें देता है बहुत कुछ
पेड़ पौधों से बतियाने का मौका
उनके सुख दुख से तादात्म्य
स्थापित करने के खूबसूरत पल
और हां इसके साथ ही
बँसवारी का मधुर संगीत भी तो सुनोगे तुम
वही संगीत जो बचपन में तुम्हें
खींचता था चुम्बक की तरह।

और फिर ठहरने सुस्ताने की प्रक्रिया में ही
यही बरगद नीम पीपल बांसों का झुरमुट
यही सब मिलकर भर देंगे स्वच्छ आक्सीजन तुम्हारे फेफड़ों में
जिससे तुम फिर हो जाओगे तैयार
अपनी आगे की यात्रा जारी रखने को।

इसी ठहराव में ही तुम मुस्कराओगे
कभी अपने बचपन को याद करके
दूर किसी पगडंडी से गुजरते
एक दो युवा जोड़े खींचेंगे
कुछ खूबसूरत रेखाचित्र
कभी युवावस्था में देखे हुए कुछ
रोमानी ख्वाबों के बिम्बों को भी
कर देंगे साकार तुम्हारे सामने।


ठहराव को मत मानो तुम विराम
ठहरो जरूर कुछ पल सुस्ताओ
लंबी लंबी सांसों से शरीर को
भर दो ऊर्जा से
मुड़ कर देखो भी एक बार अपने पीछे
छोड़ आये लंबे लंबे रास्तों को
फिर मुस्कुराओ थोड़ा सा ही सही
याद करो ठहराव के सुखद पलों को
और बढ़ चलो फिर से आगे
अपने नए पड़ाव की ओर।
0000
डॉ0 हेमन्त कुमार
23/08/2017

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विश्व फोटोग्राफी दिवस

शनिवार, 19 अगस्त 2017

विश्व फोटोग्राफी दिवस


आज विश्व फोटोग्राफी दिवस के मौके पर मैंने भी सोच लाओ अपने खजाने के अनमोल रत्नों की झाड पोंछ कर उनकी सफाई तो कर ही ली जाय।(वैसे अपने कैमरों की सफाई मैं दो तीन माह में कर ही लेता हूँ।)मैंने पहला कैमरा इस्तेमाल किया था पिता जी का– “कोडक का बाक्स कैमरा ।फिर कहीं से मिला—“अग्फा आइसोली 100”—फिर आया हाट शाट का स्नैपर55... ।
                         

      1983 के आस पास मेरे मित्र प्रदीप सौरभ(वर्त्तमान में एक स्थापित पत्रकार और उपन्यासकार)ने बार बार मुझे  कैमरा खरीदने की सलाह देते रहे।मेरे फोटोग्राफी के शौक को देखते हुए मेरे पिता जी ने मुझे एक सेकेण्ड हैण्ड  एस एल आर कैमरा ---पेंटेक्स के 1000 शायद 1983 में खरीद कर दिया था।ये मेरे पास लगभग 6 महीने रहा।इस पर कुछ अभ्यास किया।फिर उसे बेच कर थोडा और मंहगा कैमरा मामिया का (माडल याद नहीं) ले लिए जो मेरे एक मित्र डा०अनुपम आनंद के पास आज भी सुरक्षित है।इस दौरान मैंने एक ब्लैक एंड व्हाईट इन्लार्जर(अग्फा का) भी खरीद लिया था।उसी दौरान मेरी मुलाक़ात बड़े भाई अजामिल जी से हुयी।उनको मैं अपना फोटोग्राफी का गुरु भी मानता हूँ।प्रदीप सौरभ और अजामिल जी से मुझे फोटोग्राफी के बहुत से गुर सीखने को मिले।कुछ समय बाद मेरे एक मित्र के स्टूडियो के मार्फ़त मैंने शादियों में भी कुछ दिन फोटोग्राफी की जिससे डाक्टरेट करके भी बेरोजगारी के दंश से बचा रहूँ और मेरी पाकेट मनी भी निकलती रहे।     1986 में शैक्षिक दूरदर्शन,लखनऊ  की नौकरी में आने और लेखन में ज्यादा वक्त देने के बाद भी मैंने फोटोग्राफी का दामन नहीं छोड़ा।1988 में पिता जी ने फिर मुझे एक और नए एस एल आर कैमरे मिनोल्टा X 300” किट भी खरीद कर दे दी।लेकिन जैसे जैसे डिजिटलीकरण होता गया मेरे  फिल्म कैमरा मिनोल्टा का इस्तेमाल मंहगा होता गया।
        फिर पिछले चार पांच सालों से मैंने 2 एम् पी से 8 एम् पी के मोबाइल कैमरे का सहारा ले रखा था।और अभी पिछले दिनों मेरी बड़ी बेटी ने मुझे सोनी कासाइबर शाट दिया तो लगा की अब फिर फोटोग्राफी के शौक को जारी रखा जा सकता है।
                              

       इस बीच फोटोग्राफी की दुनिया में बहुत कुछ बदल गया।पहले अगर आपको याद हो तो हर स्टूडियो में एक व्यक्ति बैठ कर ब्लैक एंड व्हाईट निगेटिव की री-टचिंग करता था।एक व्यक्ति फोटोग्राफ्स की टचिंग।और ये दोनों ही काम फोटोग्राफी में बड़ी विशेषज्ञता के माने जाते थे।एक निगेटिव य फोटो री-टचिंग करने वाले एक्सपर्ट के पास कई स्टूडियोज के काम रहते थे।अब डिजिटल की दुनिया ने सभी कुछ बदल दिया।वो डार्क रूम्स के अँधेरे में फिल्म को डेवलप करना,कभी कभी हरी सेफ लाईट जला कर निगेटिव देखना,लाल लाईट जला कर प्रिंट बनाना,---फिर कलर लब्स का ज़माना ----और अब मोबाइल से लेकर डी एस एल आर का ज़माना।फोटोग्राफी की दुनिया में मशहूर फिल्म कंपनी कोडक का बंद होना (शायद2013 में) एक बड़ी घटना थी।
      इस डिजिटलीकरण के दौर में पूरी दुनिया में लाखों करोडो की संख्या में मंहगे से मन्हंगे फिल्म कैमरे लोगों की आलमारियों में बंद पड़े हैं उनका क्या भविष्य है।सूना है कुछ कम्पनियाँ उन फिल्म कैमरों में कोई डिवाइस लगाकर उसे डिजिटल मोड़ में कन्वर्ट करने की दिशा में भी कुछ काम कर रही हैं।शायद फिर कभी उन कैमरों को आलमारियों से बाहर निकल कर दुनिया देखने दिखाने का मौक़ा मिल सके इस उम्मीद के साथ आप सभी को विश्व फोटोग्राफी दिवस की हार्दिक बधाई।
0000
डा०हेमन्त कुमार                
  

                

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मां का दूध अमृत समान

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

         
अपने बच्चे को स्तनपान कराने में मां एवं बच्चे दोनों को जिस सुख का अनुभव होता है उसे शब्दों में नहीं व्यक्त किया जा सकता है। उस अलौकिक सुख को या तो स्तनपान कराने वाली मां समझ सकती है या फ़िर वह अबोध शिशु। लेकिन दुख की बात यह है कि स्तनपान के विषय में युवा माताओं एवम पिताओं को बहुत कम जानकारियां हैं।इसी लिये हम नीचे स्तनपान से संबन्धित कुछ जरूरी बातें बता रहे हैं जिन्हें हर मां,पिता के साथ ही उन नव विवाहितों को भी जानना चाहिये जिन्हें भविष्य में मां,पिता बनना है।
(1)  जन्म के तुरंत बाद स्तनपान बहुत जरूरी:बच्चा पैदा होने के बाद शुरू के दो तीन दिनों में मां के स्तन से निकला हुआ दूध (खीस) बच्चों के लिये अमृत की तरह होता है।यही खीस बच्चों के शरीर को जीवन भर रोगों से लड़ने की ताकत देने के साथ उसके सम्पूर्ण विकास में भी सहायक बनता है।खीसदो तीन दिनों के बाद सामान्य दूध में बदल जाता है। यदि बच्चा शुरू में ही इसे नहीं पी पाता तो जीवन भर इस अमृत से वंचित रहेगा। इसी खीस को लेकर ही शायद छ्ठी का दूध याद दिलाने का मुहावरा भी बनाया गया है।
(2)  स्तनपान के कुछ फ़ायदे:पैदाइश के बाद पहले चार महीनों तक बच्चे का पेट मां के दूध से ही भर जाता है।उसे इसके अलावा किसी दूसरे ऊपरी आहार की जरूरत नहीं रहती। स्तनपान के कुछ और भी फ़ायदे हैं जिन्हें हर मां को जानना चाहिये----
0बच्चे को जरूरत के अनुसार शुद्ध और गरम दूध मिलता है।इस दूध से उसे दस्त नहीं आता।
0मां का दूध आसानी से पच जाता है,इसीलिये इससे बच्चे के पेट में गैस नहीं बनती।0सबसे बड़ी बात यह है कि मां का दूध बच्चे की रोगरोधी ताकत (रेजिस्टेंस) को बढ़ाता है।
0स्तनपान से मां और उसके शिशु को जो सुख मिलता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। 
0इससे बच्चे के अन्दर सुरक्षा,प्यार और खुद को विशिष्ट मानने की भावना बढ़ती है।0स्तनपान से सबसे महत्वपूर्ण और अन्तिम फ़ायदा यह है कि बच्चे को स्तनपान कराने के दौरान मां को दुबारा गर्भ धारण करने की संभावना कम रहती है।
(3)स्तनपान कैसे करायें: आज भी बहुत सी माताओं को स्तनपान कराने का सही तरीका नहीं मालूम है। हम स्तनपान कराने के  सही तरीके को यहां बता रहे हैं----
0 शिशु को स्तनपान कराने के पहले हाथ एवं स्तन दोनों को अच्छी तरह धो लें।
0 बच्चे को स्तनपान हमेशा बैठ कर करायें।बच्चे का सर अपनी बांह पर इस तरह रखें कि उसका सर स्तन से ऊंचा रहे। इससे उसके कान में दूध नहीं जायेगा। यदि आप दूध लेटकर ही पिलाना चाहें तो ध्यान रखें बच्चे की नाक कहीं से न दबे।
0 बच्चे को भूख के हिसाब से दूध पिलायें। एक बार 10-15 मिनट दूध पीकर बच्चा दो-तीन घण्टे तक भूख नहीं महसूस करेगा।दुबारा जब बच्चा चाहे तभी उसे स्तनपान करायें।दूध पिलाकर बच्चे को अपने कंधे पर लिटा कर उसकी पीठ पर दो-तीन हल्की थपकियां दें ताकि बच्चा डकार ले। इससे बच्चा दूध उल्टेगा नहीं।यदि वह स्तनपान करते करते सो जाय तो उसे सोने दें।
0 यदि आपके स्तन में बच्चे की जरुरत से ज्यादा दूध आये तो उसे निकाल दें।नहीं तो स्तनों में कड़ापन और सूजन आ जायेगी।इससे आपको बच्चे को दूध पिलाने में परेशानी होगी।
0पहले 2-3 महीनों में बच्चा रात में भी मां को स्तनपान के लिये जगायेगा।रात में भी बच्चे को स्तनपान कराना नुक्सानदायक नहीं होता।दूध पीकर वह फ़िर सो जायेगा।कुछ महीनों बाद बच्चा जब रात में ठीक से सोने लगेगा तो धीरे धीरे रात में उसकी स्तनपान करने की आदत  खुद ही बन्द हो जायेगी।
             जन्म से छः सालों तक दो,बच्चे को प्यार सुरक्षा।
           बिन बाधा बढ़ता जायेगा ,बनेगा वो फ़िर बच्चा अच्छा॥
                           0000000

हेमन्त कुमार

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प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता एवं पुरस्कार वितरण

सोमवार, 31 जुलाई 2017

          आज दिनांक 31 जुलाई 2017 को प्रतिष्ठित बालसाहित्यकार श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की पहली पुण्य तिथि है।उनकी स्मृति में पिछले दिनों प्रतिष्ठित संस्था  सेवा संकल्प  द्वारा विबग्योर हाई स्कूल,गोमती नगर,लखनऊ के बच्चों के लिए एक साहित्य प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था।आज इस साहित्य प्रतियोगिता के प्रतिभागी विबग्योर हाई स्कूल के समस्त छात्र-छात्राओं को स्कूल परिसर में सेवा संकल्प द्वारा आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में पुरस्कार स्वरूप साहित्यिक किताबें,मूमेंटो एवं प्रमाण पत्र वितरित किया गया।बच्चों को ये पुरस्कार जनसन्देश टाइम्स के प्रधान संपादक डा०सुभाष राय और प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार बंधु कुशावर्ती के कर कमलों द्वारा वितरित किया गया।
                        कार्यक्रम की शुरुआत श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तस्वीर पर
आगंतुक अतिथियों द्वारा माल्यार्पण एवं सरस्वती वंदना से हुयी।तत्पश्चात विबग्योर हाई स्कूल की प्रधानाचार्य सुश्री रश्मि सिंह जी ने आगंतुक अतिथियों का स्वागत पुष्प गुच्छ दे कर किया।सेवासंकल्प संस्था की महामंत्री सुखप्रीत कौर ने बच्चों और अतिथियों को सेवा संकल्प संस्था के विषय में संक्षिप्त जानकारी दी।  
                       
                  कार्यक्रम में श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के साहित्यिक योगदान पर चर्चा हुयी।हिंदी के प्रतिष्ठित दैनिक जनसन्देश टाइम्स के प्रधान संपादक डा०सुभाष राय ने श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के समग्र साहित्यिक अवदान पर चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने साहित्य की हर विधा पर कम किया है।कहानी,नाटक,रेडियो नाटकों के साथ ही बाल  उपन्यास एवं संस्मरणात्मक साहित्य उनके लेखन की प्रिय विधाएँ  थी।डा०राय ने बच्चों को भारत वर्ष के पूर्व राष्ट्रपति डा० कलाम साहब का उदाहरण देते हुए कहा कि कलाम साहब को बच्चों से बहुत लगाव था।उनका कहना था की हर बच्चे के अन्दर रचनात्मकता होती है।बच्चों की इस रचनात्मकता को हमें निखारना होगा। 

प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार एवं समालोचक श्री बंधु कुशावर्ती ने श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव के बाल उपन्यासों और बाल  नाटकों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके नाटक और बाल  उपन्यास दोनों में ही देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी है।उनका उपन्यास “मौत के चंगुल” में काफी चर्चित हुआ है।उनके  बाल नाटकों का एक संग्रह नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा शीघ्र प्रकाशनाधीन है ।बंधु कुशावर्ती  ने बच्चों को मुंशी प्रेमचंद के साहित्य के बारे में भी विस्तार से बताया और उन्हें मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का उदहारण देते हुए बताया कि उनकी सारी बाल  कहानियां उनके आस-पास के बचपन के दोस्तों से जुडी हैं ।बंधु जी ने बच्चों से ये भी कहा की प्रेमचंद जी और प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी दोनों में प्रेम शब्द सामान है और हमें इसी प्रेम को भाईचारे की भावना  दुनिया में फैलाना है।
            
प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के पुत्र प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार एवं कवि डा०हेमंत कुमार ने कहा कि उनके पिता श्री प्रेमस्वरूप जी एक सकारात्मक विचारों वाले  और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे ।लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी थी कि अपने जीवन के अंतिम दिनों तक लिखते रहे। निधन के लगभग एक माह पूर्व उन्होंने एक बाल उपन्यास और दो रेडियो नाटक पूर्ण किये।अब उनके समस्त अप्रकाशित साहित्य को पाठकों के समक्ष लाने का प्रयास किया  जा रहा  है।
            समारोह में विब्ग्योर हाई की प्रधानाचार्य सुश्री रश्मि सिंह,उप-प्राचार्य मिस लवलीन,संयोजिका-सुश्री जास्लीन के साथ ही सेवा संकल्प संस्था के उपाध्यक्ष श्री शिव कुमार, महामंत्री सुखप्रीत कौर, हिंदी की प्रतिष्ठित ब्लागर एवं कवयित्री श्रीमती पूनम श्रीवास्तव,श्री विपुल कुमार,युवा चित्रकर्त्री नित्या शेफाली ने उपस्थित होकर कार्यक्रम में पुरस्कृत बच्चों का उत्साह वर्धन किया।
क्रिएटिवकोना के लिए रिपोर्टिंग:




नित्या शेफाली  


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सूरज सी हैं तेज बेटियां

बुधवार, 26 जुलाई 2017

                       (यह लेख मैंने आज से लगभग 6 साल पहले लिखा था।इन 6 सालों में देश,समाज,अर्थव्यवस्था सभी कुछ में भारी बदलाव आ चुका है।यहाँ तक की हमारी अर्थव्यवस्था का केंद्र नोट भी बदले जा चुके हैं।---अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है हमारे समाज में लड़कियों की हालत।आज इतने बदलावों के बावजूद हमारा समाज  बेटियों को उनका हक़ देने को तैयार नहीं।बल्कि इन कुछ वर्षों में कोमल बेटियों के प्रति समाज में जो दरिंदगी,पाशविकता और बर्बरता पूर्ण घटनाएँ बढ़ी हैं वो पूरे देश,समाज के लिए शर्म के साथ ही भारी  चिंता का भी विषय हैं।)     
                                                       


             सूरज सी हैं तेज बेटियां -------
                                         डा0हेमन्त कुमार
         
      31 अक्टूबर 2011 का दिन भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिये बहुत खास था।खास इस लिये कि इसी दिन दुनिया के सात अरबवें शिशु का जन्म हुआ। और वह भी एक लड़की के रूप में। हमारे अपने प्रदेश लखनऊ के माल कस्बे में पैदा हुयी नरगिस को दुनिया की सात अरबवां  शिशु बनने का गौरव मिला। पूरी दुनिया से उसे बधाइयां मिली। वह अखबारों,न्यूज चैनल की सुर्खियों में आई। धरती पर नरगिस का खूब जोरदार स्वागत हुआ।संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून से लेकर मल्लिका सारा भाई,सुनीता नारायण जैसी हस्तियों और तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं ने नरगिस के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।कुल मिलाकर पूरी दुनिया में उसके पैदा होने की चर्चा से एक जश्न का माहौल बन गया था।एक तरह से देखा जाय तो दुनिया भर की बेटियों के लिये यह बहुत ही शुभ अवसर था।
        लेकिन अगर हम सच्चाई की बात करें तो हमारे देश में परिदृश्य काफ़ी भयावह है। हमारे देश और समाज में आज भी लड़कियों को वह दर्जा नहीं मिल सका जो उसे मिलना चाहिये।दर्जा मिलना तो दूर इन कुछ वर्षों में कोमल बेटियों के प्रति समाज में जो दरिंदगी,पाशविकता और बर्बरता पूर्ण घटनाएँ बढ़ी हैं वो पूरे देश,समाज के लिए शर्म के साथ ही भारी  चिंता का भी विषय हैं।
        आज भी हमारे देश में कन्या का जन्म एक अभिशाप माना जा रहा है। तमाम सरकारी कानून और बन्दिशों के बावजूद आज भी लोग पैथालाजी सेन्टर्स पर जाकर भ्रूण लिंग परीक्षण करवा रहे हैं।आज भी ऐसी बर्बर मानसिकता के लोग हैं जो आनर किलिंग जैसे पाशविक कारनामे करते हैं। आज भी सड़क पर चलने वाली लड़कियां सुरक्षित नहीं। और इसी का नतीजा है कि 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश में शून्य से छह साल की उम्र में एक हजार लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या महज 914 हो गयी है।यानि कि लड़के लड़कियों की संख्या में भी अन्तर बढ़ रहा है।
           यहां सवाल यह उठता है कि यह अन्तर कम कैसे किया जाय?लोगों की मानसिकता कैसे बदली जाय?लड़कियों को उनका हक कैसे दिलवाया जाय?समाज की सोच कैसे बदली जाय?
हमें इन प्रश्नों का उत्तर सीधे अपने परिवार से ही ढूंढ़ना पड़ेगा।क्योंकि परिवार हमारे समाज की इकाई है।परिवार से ही लड़की और लड़के के बीच अन्तर की शुरुआत होती है। और  इस अन्तर को खतम करने की शुरुआत और रास्ते भी हमें अपने परिवार में ही बनाने होंगे। सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि परिवार में हम किस तरह से अपने ही बच्चों में यह भेद पैदा कर रहे हैं।
  • शिशु के जन्म का उत्सव:
                      आज इतने शिक्षित, सभ्य और सुसंस्कृत हो जाने के बावजूद बहुत से परिवार आपको ऐसे मिलेंगे जहां बेटे के पैदा होने पर तो अच्छा खासा जश्न मनाया जाता है। लेकिन अगर कहीं गलती से पैदा होने वाला शिशु बेटी है तो उसके पैदा होने पर जश्न की मात्र औपचारिकता निभा दी जाती है। घर वालों में वह उत्साह नहीं दिखता जो एक नवागत के आने पर होना चाहिये।
  • खानपान में अन्तर:
                 मेरे समझ में यह बात आज तक नहीं आई कि परिवार में खाना खाते समय घर के पुरुषों,लड़कों को खाना पहले क्यों परोसा जाता है और महिलाओं और लड़कियों को बाद में? अगर लड़कियों को पहले खाना खिला दिया जायेगा तो क्या खाना खतम हो जायेगा या उसकी महत्ता कम हो जायेगी? घरों की बात छोड़िये अगर आप शादी विवाह या किसी अन्य समारोह में जायेंगे तो वहां भी यही रीति अपनायी जाती है।जबकि हम हमेशा नारा देते हैं लेडीज फ़र्स्ट का।
       इतना ही नहीं अक्सर हम यह मानकर कि लड़कों को ज्यादा मेहनत करनी हैउन्हें अधिक पोषक खाना देते हैं और लड़कियों को कम।क्या लड़कियों को पोषण की जरूरत नहीं है?(जबकि सच्चाई यह है कि लड़कियां ज्यादा शारीरिक श्रम करती हैं,उन्हें भविष्य में मां भी बनना है इस दृष्टि से भी उन्हें ज्यादा पोषक खाने की जरूरत रहती है।)
  • घरेलू काम काज:                                                                  आज भी हमरे परिवारों की मनसिकता यही बनी है कि घरेलू कामकाज लड़कियों की जिम्मेदारी है। अगर आपका बेटा बेटी दोनों सामने हैं तो हमेशा आप कहते हैं कि बिटिया जरा एक गिलास पानी पिलानान कि बेटा जरा एक गिलास पानी लाओ। ऐसा हम क्यों करते हैं? यदि पति पत्नी दोनों ही सर्विस करने वाले हैं तो घर लौटने पर पति पत्नी से उम्मीद करता है कि वो एक प्याली चाय बना कर उसे दे। कभी खुद इस दिशा में पहल नहीं करता। घर की सब्जी काटना,बर्तन,चूल्हा चौका,कपड़े धोना इन सबके लिये हमपरिवार की लड़कियों को ही क्यों आदेश देते हैं। लड़कों को क्यों नहीं? हमे अपनी इस सोच और मानसिकता को बदलना ही होगा।
  • शिक्षा दीक्षा:
            अपने ही बच्चों को शिक्षा देने के मामले में भी हम हमेशा लड़कों को ही स्कूल भेजने की दिशा में पहल करते हैं। लड़कियों को बाद में यह अवसर देते हैं।जबकि लड़कियों को शिक्षित करना ज्यादा जरूरी है। इस दृष्टि से कि उसे तो दो घरों की(आपके और ससुराल के) की जिम्मेदारियां सम्हालनी हैं। लड़का तो बस आपके ही परिवार को चलायेगा। यद्यपि इस दिशा में हमारे समाज की सोच थोड़ा तो बदली है लेकिन उतनी नहीं जितनी बदलनी चाहिये।हमें इस बिन्दु पर खास तौर से अधिक ध्यान देने की जरूरत है। कहीं कहा भी गया है कि मां ही पहली शिक्षक होती है। यानि कि आपकी लड़की का पढ़ना लिखना इस लिये भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वह भविष्य में मां बनेगी। अगर वह पढ़ी लिखी रहेगी तो आपके ,ससुराल के घर को स्सुव्यव्स्थित रूप से संचालित करने के साथ ही अपने शिशु को शिक्षित,संस्कारित करके देश को एक अच्छा जिम्मेदार नागरिक भी प्रदान करेगी।
  • खेलकूद एवम अन्य गतिविधियों के अवसर:
       आम भारतीय परिवारों में अक्सर यह दृश्य देखने को मिलता है कि लड़के लड़की दोनों स्कूल से आये।और लड़का तो आते ही बस्ता एक तरफ़ फ़ेंक कर भागा सीधे मैदान की ओर। दोस्तों के साथ खेलने के लिये। और लड़की बेचारी बस्ता रखते ही जुट गई मां के साथ घरेलू कामों में हाथ बटाने के लिये। और परिवार का मुखिया यानि पिता बड़े गर्व से अपने दोस्तों,रिश्तेदारों से यह कहता है कि देखो मेरी बिटिया कितनी समझदार है जो स्कूल से आते ही घर के काम में जुट गई।बात उनकी सही है---लड़की तो समझदार है ही। लेकिन क्या उसको खेलने कूदने मनोरंजन का अवसर नहीं मिलने चाहिये?वो खुद कभी अपनी बिटिया से यह कहते कि बिटिया जाओ तुम भी थोड़ी देर अपनी सहेलियों के साथ खेल कूद आओ। लाओ घर के काम मैं करवा देता हूं। हमें अपने परिवारों की यह मानसिकता भी बदलने की जरूरत है।
  • कपड़े पहनावे के स्तर पर अन्तर:
कभी भी कोई त्योहार या उत्सव होगा नये कपड़े बनवाने का अवसर हम परिवार में सबसे पहले लड़के को देते हैं।लड़कियों का नम्बर बाद में आता है?क्यों भाई?क्या लड़की को नये कपड़े पहनने का हक नहीं?या उसके कपड़े बनवाने पर आपका खजाना खतम हो जायेगा।आप पहले लड़कियों के कपड़े बनवाने की बात क्यों नहीं करते?हमें इस सोच को भी बदलने की आवश्यकता है।
  • शादी विवाह का निर्णय:
लड़के लड़की के अन्तर का सबसे अहम प्रश्न और महत्वपूर्ण बिन्दु है यह हमारे भारतीय समाज का। हम अपने बेटे की शादी तय करते समय तो लड़की देखने,पसन्द नापसन्द,पढ़ाई लिखाई हर मुद्दे पर अपने बेटे को अपने साथ रखते हैं।उसकी सलाह लेते हैं।उसके कहने पर कई कई लड़कियों को देख कर रिजेक्ट कर देते हैं।लेकिन लड़की के लिये?क्या कभी हम शादी विवाह के समय उसकी पसन्द नापसन्द के बारे में सोचते हैं।या उससे पूछते हैं कि बेटी तुम्हें किस नौकरी वाले लड़के को अपना जीवन साथी बनाना है?या कि अभी तुम विवाह करने के लिये मानसिक रूप से तैयार हो?क्या लड़कियों को अपने जीवन साथी के बारे में निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है? क्या वह मात्र एक हाड़ मास की पुतली है जिसे हम किसी भी व्यक्ति के साथ बांध कर अपने उत्तरदायित्व से छुटकारा पा जाना चाहते हैं?भारतीय समाज और परिवार की इस सोच को भी बदलना ही होगा। तभी हम लड़कियों की बराबरी का दर्जा देने के स्वप्न को पूरा कर सकेंगे।
            ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण बिन्दु हैं हमारे समाज और परिवार के जिन पर चिन्तन करके,जिनमें बदलाव लाकर ही हम दुनिया की सात अरबवीं शिशु बनने का गौरव पाने वाली प्यारी बिटिया नरगिस और उसके जैसी दुनिया भर की सभी बेटियों को उनका हक़,सम्मान,और समाज में उनकी प्रतिष्ठा को बढ़ा सकेंगे।और कवयित्री  पूनम श्रीवास्तव के गीत बेटियां की इन पंक्तियों को साकार कर सकेंगे।
सूरज से हैं तेज बेटियाँ
चाँद की शीतल छाँव बेटियाँ
झिलमिल तारों सी होती हैं
दुनिया को सौगात बेटियाँ
कोयल की संगीत बेटियाँ
पायल की झंकार बेटियाँ
सात सुरों की सरगम जैसी
वीणा की वरदान बेटियाँ
घर की हैं मुस्कान बेटियाँ
लक्ष्मी का हैं मान बेटियाँ
माँ बापू और कुनबे भर की
सचमुच होती जान बेटियाँ
                  00000000000


डा0हेमन्त कुमार

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गीतांजलि गिरवाल की दो कविताएँ

रविवार, 23 जुलाई 2017

(युवा रंगकर्मी और कवयित्री गीतांजलि गिरवाल की कविताएँ लीक से एकदम अलग हट कर हैं।आज की  नारी के प्रति वो हमेशा चिंतित रहती हैं।नारी के ऊपर सदियों से पुरुष प्रधान समाज द्वारा जो अत्याचार हो रहे हैं वो उनके अन्तः को उद्वेलित करते हैं और तीक्ष्ण धारदार शब्दों का आकार लेकर एक कविता का रूप लेते हैं।गीतांजलि की दो कविताएं  आप सभी के लिए ।)
(1)   चालीस पार
सुनो प्रिये  क्या संभव है
फिर से तुमसे प्यार करना
वो रात औ दिन को जीना
माना, अब वो खिंचाव ना
होगा मेरे अंदर, जो तुम्हे
बांधे रखता था पल पल
प्यार की गलियों से निकल, अब भटक रही हूँ
गृहस्थी की गलियों में।
याद आता है, तुम्हारा वो शरारत से देखना
देख कर मुस्काना, कनखियों से इशारा कर
बात बात पर छेड़ना
सिहर जाती थी मैं अंदर तक...
फिर से करना चाहती हूँ तुम से प्यार
क्या हुआ जो हम तुम हो गये चालीस पार
मेरे प्यार का मतलब नहीं है मात्र सहवास
तुम्हे सामने बैठा कर निहारना चाहती हूँ
घंटो बाते करते रहना चाहती हूं
रूठते  मनाते हुये
फिर से देखना चाहती हूँ 
तुमको हँसते हुए
जीना चाहती हूँ तुम में
तुम को जीते हुए।
ये आवाज़ की तल्ख़ी
जिम्मेदारियों से है
उलझे बाल सब की तिमारदारियो से है
इससे तुम ना यूं  नजरे चुराओ
है आकर्षण आज भी जो जागा था
देख कर तुमको पहली बार
घर में राशन पानी भरती हूं 
पर आत्मा से रोज भूखी सोती हूँ।
साथ व स्पर्श के लिए बैचेन रहती हूँ
जानती हूँ तुम हो अपने काम में मशगूल
व्यस्तता का मतलब नहीं है
लापरवाही ये भी जानती हूँ
मुझे तो मात्र चाहिए तुम्हारा साथ
नोकझोंक औ पहले सी मनुहार
रूठने पर मनाना न मानने पर
तुम्हारा प्रणय निवेदन करना
बहुत याद आता है
दे दो मुझे एक प्लेट नमकीन प्यार
रोज़ शाम की प्याली के साथ
औ मीठा सा नित्य चुम्बन
सुबह की लाली के साथ
लौटा दो मुझे फिर से मेरा संसार
आओ ना.... प्रिये... 
फिर से कर लें  हम पहला प्यार
क्या हो गया जो हो गए हम चालीस पार
000000
(2) पतंग 
मोह के धागे मर्यादा के बंधन
सदियों से लिपटे हुए 
मुझ में और लिपटते गए
कुछ देहरी पर घिसट गए
कुछ मेरे मन में धंसते गये
और कुछ लटकते रहे मेरी 
आत्मा की छाती पर  अनचाहे
दीवार से जब भी टिकना चाहा
वो फाँसी बन मुझे झुलाते रहे
खुली हवा की चाह में अक्सर
मन की पतंग बन उड़ते रहे
बिस्तर की सलवटों में वो
अक्सर मेरे साथ उलझते गए
कभी मज़बूरी बन कभी लाचारी बन
वो मेरे खून में गहरे रंगते गए
बंधन तोड़ कर जाने की सज़ा में
पाँव को लहूलुहान करते गए 
झूठी हंसी में अक्सर वो
चेहरे की लकीर बनते गए
वो मेरी मर्यादा की बेड़ी बन
मेरे वजूद को डसते गये
०००





कवयित्री गीतांजलि गिरवाल
युवा कवयित्री गीतांजलि पिछले 15 सालों से रंगमंच में अभिनय और निर्देशन में सक्रिय हैं।कालेज में पढाई के समय से ही साहित्य के प्रति रुझान था तभी से लेखन में सक्रिय।ये हमेशा नारी की समस्याओं उनके जीवन उनके हालातों की चिंता करती हैं।और नारी मन के हर भाव,अंतर्द्वंद्व और पीड़ा  को शब्द देने का प्रयास भी हमेशा करती हैं




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