झूमें नाचें गायें

शनिवार, ३१ अक्तूबर २००९

लौटना


आसमान पर
दौड़ रहे हैं
हाथी घोड़े हिरण
बादलों के साथ
चल रही है
सूरज की लुकाछिपी।

दौड़ रहे हैं
बच्चे
स्कूल की ओर
मचाते शोर
देखो देखो
हो रही है
सियार की शादी।

उसी वक्त
ठीक उसी वक्त
सफ़ेद बालों वाला
एक पथिक
लौट जाता है
छुटपन के दिनों में
वह मन्द मन्द
मुस्कराता है
और आंखों तक
दायां हाथ ले जाता है।
00000000
कवि:शैलेन्द्र
प्रभारी सपादक ‘जनसत्ता’
कोलकाता संस्करण
मोबाइल न—09903146990
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।

बुधवार, २१ अक्तूबर २००९

इन्तजार


इस जंगल के
दरख्तों से
क्यों पूछते हो
इनकी खैरियत ।

इनके
दहशतजर्द चेहरों पर तो
खुद ही चस्पा है
रोज तिल तिल कर
मरते हुये
अपने जिबह होने के
इन्तजार
की तस्वीरें ।
000000
हेमन्त कुमार

सोमवार, १२ अक्तूबर २००९

महुअरिया की गंध(भाग-2)



(अभी तक आपने पढ़ा---- मानिक क्षण भर उनकी आंखों में झांक कर बोला—‘आप का कह रहे हैं मालिक ?घर में एक भी जन रहता है तब भी तुलसी के बिरवा तर संझौती की दिया बाती होती है। मंदिर का कपाट नाहीं खुला होता
तब भी लोगों का हाथ जुड़ता है ।सच है कि नाहीं ? उठिये, यह संझौती की बेला है।----और अब आगे पढ़िये-----)

मानिक के इन शब्दों से कमलेश्वर का मन जैसे सुवासित हो उठा। कहीं यह सुवास उनके गौरा की माटी की तो नहीं थी। मानिक की आंखों में संझौती के दिये का शीतल प्रकाश तैर रहा था। एक नवशक्ति से भर वे उठ कर खड़े हो गये।
वे अमला से बोले –‘भूपेश जाय तो हम सब गौरा चलेंगे। अपने गांव गौरा। भले ही रात भर को। अमला का मुंह एक सुखद आश्चर्य से खुला रह गया।वह मुस्करायी। पर शायद उसकी मुस्कराहट को नहीं पता था, कमलेश्वर अपने इन शब्दों पर कितने अडिग हैं। भूपेश और प्राची का गौरा के निचाट उजाड़ भूखण्ड पर मिला बहता हुआ हंसी का झरना पूनो। मानिक की बेटी। आग बरसाते सूरज,बंसवारी को मथती गरम हवा की लपटों से बेखबर उसकी हंसी गूंजती रहती।
भूपेश ने पूनो को बताया—‘पापा ने यहां आने के लिये अनशन कर दिया था। इसीलिये सबको आना पड़ा। पर उन्हें यहां छोड़ना---ना बाबा ना। यहां तो आग के बगूले उठ रहे हैं। नदी सूख गयी है। कुयें तालाब में पानी नहीं है। कैसे जीते हैं यहां के लोग ?
पूनो उसका हाथ पकड़कर उसे खींचती हुयी ले गयी।एक चट्टान से बूंद बूंद कर पानी टपक रहा था। बर्फ़ सा ठंडा। भूपेश अवाक सा उसे सुनता रहा---‘ बाबू पाथर की छाती में से पानी रिस रहा है।ऊपर से धरती सूख गयी है। लेकिन नीचे पोर पोर में रस भरा हुआ है। ऊपर से चिनगारी बरसत है। नीचे से लपट उठत है। लेकिन
देखो,सिवाने पर लगी महुअरिया। बतायेगी,इहां का मानुस कैसे जीता है। साल में एक बार दिन आता है जब महुआ के पोर - पोर में रस छलक उठता है। टप-टप टपके लगता है सफ़ेद मोती। पलाश का रंग पाय के महुआ की गंध उड़ती है तो इहां का पत्ता पत्ता रसिया हो जाता है बाबू। भूल जाता है आपन दुख दरिद्दर।और फ़िर वह हंसी का फ़ुटहरा। जैसे वहां अब भूपेश नहीं था,पूनो नहीं थी,गौरा का वह भूखण्ड नहीं था। हजार हजार विषम गांठों को खोलती चली गई पूनो की वह उन्मुक्त हंसी।

आज सबको वापस लौटना था। लेकिन पूनो के आग्रह पर एक रात के लिये वे और रुक गये। पूनो ने कहा-‘बाबू आज पहिला महुआ टपका है न। सो महुअरिया में इहां का मानुस थोड़ा नाचेगा ,गायेगा। करिया का मिरदंग जरूर सुनियेगा। दस गांव जवार में ऐसा नामी गिरामी मिरदंगिया नहीं है। असली विजयसार का मिरदंग है। बोल करिया---और करिया फ़ड़क उठा—‘हां बाबू , धुम किटतक ----धुम किटतक -----ऐसे बजेगा कि-------

यह हंसी, उल्लास। भूपेश चकित था। उनके जाने के बाद प्राची बोली---‘पीड़ा के भीतर से ही ऐसी हंसी और उल्लास भी उपजते हैं। तुमने तो देखाधरती तपती है तो पलाश खिलता है। अग्निबाण चलते हैं तो महुआ के पोर पोर से रस टपकने लगता है। इस करिया ने एक दुर्घटना में अपना पूर परिवार खो दिया। पूनो का पति परदेस गया तो वहीं का होकर रह गया। पर इसकी प्रतीक्षा तो रोजाना तुलसी के नीचे एक दिया जलाकर और भी प्राणवती हो उठती है। जीने का विश्वास मिल जाता है। क्या हम इसे नहीं पा सकते भूपेश ?’
तभी एक कोमल पाश ने जकड़ लिया प्राची को—‘लो जिज्जी, पहनो घुंघरू।
अरे यह क्या है?’प्राची अचकचा कर बोली।
पूनो मचल कर बोली---‘अब महुअरिया में चल कर ही बतायेंगे। और हां बाबू, चलो।तुम्हें ही तो साथ देना है।मिरदंग पर ऐसे थिरकेंगे पांव।
प्राची की आंखों में आंसू छलछला आये। पूनो ने अपने आंचल से उसे पोंछते हुये कहा—‘अरे , का ?आज पहिला महुआ टपका है। आज अंखियन में आंसू आये तो देवता रिसिया जायेंगे। फ़िर अगले साल महुआ नहीं टपकेगा जिज्जी।
प्राची भरे गले से बोली---‘चलो पूनो,महुआ हर साल टपके। इसलिये हम तुम लोगों के साथ हंसेंगे, नाचेंगे। आओ भूपेश।
पूनो वहीं से चिल्लाती हुई महुअरिया की ओर दौड़ी---‘अरे मिरदंगिया,जरा जोर से बजाओ। पाहुन आय रहे हैं।
टटकी गंध से सराबोर महुअरिया में करिया का मिरदंग गमक रहा है। घुंघरू बंधे अनेक पांव एक लयताल पर उठते हुये करिया के मिरदंग से होड़ ले रहे हैं।
सहसा कमलेश्वर अमला की आंखों में झांकते हैं। संझौती के दीये का शीतल प्रकाश तैर रहा है उन आंखों में। वे आपादमस्तक नहा उठते हैं उसमें। कानों में करिया का मिरदंग रस घोल रहा है। सांसों में महुअरिया की गंध घुल रही है।
( समाप्त )

लेखक:श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
( इस कहानी के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं। आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है। 1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 80 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित

गुरुवार, ८ अक्तूबर २००९

महुअरिया की गंध

कमलेश्वर के हाथ में पेग देख मानिक चुप न रह सका—‘हम गंवई गांव का मानुस है मालिक। यह लाल रंग देखकर हमें अपने गांव का कमल ताल याद होइ आय रहा है।ऊ लाल लाल कमल ला फ़ूल,पुरवा के हिलोर पर उनका नाचना। जैसे ऊ ललाई ई बोतल में आय के बंद होय गई है।मालिक,अब गांव नाहीं चलेंगे कभी?’
कमलेश्वर के मन को जैसे किसी वासंती पवन ने छू लिया।गौरा उनका अपना वह गांव।उन्होने एक उसांस भरी। पर तभी भीतर एक तल्खापन सा भर उठा।वे बोले--- ‘हां रे, बहुत पहले गया हूं। लेकिन अब वह गौरा कहां रहा।क्या है अब वहां?क्या अब भी वैसे कमल खिलते होंगे?क्या अब भी शाम पानी में पांव लटकाये लोगों की शोख और चुलबुली हंसी गूंजती होगी?नहीं नऽब तो दुपहरिया में ताल की सूखी दरारों पर धूल का बवंडर उठता होगा।क्यों,उसी गौरा की बात कर रहा है न तू?’
लेकिन मानिक का विश्वास कहां मुरझाने वाला था।वैसे ही बोला---‘हां,वही अपना गांव मालिक।गौरा अब भी वही है।गौरा करमा के तीरे बसा है। आज करमा सूख रही है तो का उसका नाम भी बदल जायेगा? ऊ नदी नहीं कहायेगी?कमलताल की छाती भले ही दरक गई होय।लेकिन ऊ आज भी आपका रक्तबरनी अगवानी करेगा।’
कमलेश्वर मुस्करा कर बोले ---‘रक्तबरनी? अरे,तू तो कविता की भाषा बोलने लगा रे मनिकवा ।’
मानिक का पीला चेहरा अचानक जैसे कमल की ललाई से रक्ताभ हो आया।वह उत्साह से बोला ---‘खून का रंग लाल होता है ना। इसीलिये देवी देउता से भी खून का रिश्ता जोड़ने के लिये उहां का मानुस आज भी चौरा पर लाल चूनर,पताका,सेंधुर और गुड़हल का फ़ूल चढ़ाता है।महावीर जी के एंगुर टीपता है।’
‘और बदले में देवता क्या देते हैं?सूखा,अकाल,बीमारी,गरीबी।क्यों?’कमलेश्वर ने एक हल्की सी चिकोटी काटी।
मानिक निरुत्तर नहीं हुआ—‘वहां की धरती ई कहां देखती है मालिक।पानी बरसे न बरसे।बवंडर चले,चिनगारी उड़ें।तब भी ऊ धरती के करेजे पर पलाश का लाल फ़ूल खिल उठता है।रक्तबरन चादर ओढ़ लेता है पलाश वन। का आप ऊ रंग से धरती आकाश एक होत नाहीं देखे हैं।फ़िर आप गौरा काहे नहीं चलना चाह रहे हैं?मालिक,बोतल में भरा ई लाल रंग आपके करेजा का सत निचोड़ लेगा।मालकिन को नाहीं देख रहे हैं आप्।कौन सुख नाहीं है घर में ?लेकिन सूख के कंकाल होय रही हैं।बबुआ ऐसन नौकरी में है कि हवाई जहाज से सफ़र करत है।बहूरानी ऊनी वरसीटी में प्रोफ़ेसर हैं।मगर दूनों जन छटपटाय रहे हैं।कौन तकलीफ़ है।’
मानिक छोटा थ तभी से इस घर में है।इसी से वह इतना मुखर हो उठता है।पर कैसे बतायें कमलेश्वर कि आज भी वे कमलेश्वर प्रसाद सिंह हैं,लोक सेवा आयोग के रिटायर्ड चेयरमैन्।इस दंभ ने ही उनकी पूरी जिन्दगी को आपाधापी से भर दिया।उनके अपनों के लिये वक्त को छीन लीया।कार,कोठी,बागीचा ,नौकर चाकरपने इर्द गिर्द इतना हुजूम बटोरकर भी उन्होंने खुद पत्नी अमला में इतना एकाकीपन भर दिया कि वह निरीह होकर टूटती चली गई।बेटा भूपेश आई ए एस आफ़िसर,बहू प्राची पी एच डी प्रोफ़ेसर।पर सब एक दूसरे से अलग थलग होते चले गये ।नहीं रोक पाये वे बढ़ती हुयी दूरियों को।
शायद कभी इन्हीं सुख सुविधाओं का जिक्र आने पर अमला ने ही कह दिया था---‘ये सब डाक्टरी फ़ार्मूले हैं कमल। तुमने मेरे ऊपर,बहू बेटे पर इसे आजमाया।लेकिन हर घाव की दवा मलहम नहीं होती। अब तो इच्छा होती है कि एयरकन्डीशनर को बन्द करके पागल हवाओं के बीच निकल जाऊं।तुम कहते हो यह वक्त का सैलाब है।इसे रोकने के लिये कोई आकाश से नहीं उतरेगा।’
छटपटाहट से थोड़ा उबरे तो सहसा कमलेश्वर को याद आया—अरे ,आज तो बहू बेटे की शादी की सालगिरह है।पर जश्न या मातम? क्या मनायेंगे वे? बेटा सबेरे की फ़्लाइट पकड़कर बाहर जा चुका है।बहू एक जरूरी मीटिंग अटेण्ड करने यूनिवर्सिटी चली गयी।देर रात लौटेगी।कौन काटेगा केक? क्या जवाब देंगे वे मेहमानों को?मन के एक कोने से उनके दंभ ने फ़िर सिर उठाया। किसी के चले जाने से कोई काम नहीं रुकने वालाऽअफ़िसर्स के छुट्टी पर होने पर भी उन्होंने अकेले इतना बड़ा आफ़िस चलाया है। मगर मन के दूसरे कोने से आवाज उठी—यह आफ़िस नहीं घर है।रिश्तों का नाजुक बन्धन्। जिसके हर कसाव को तुम ढीला करते चले आये।दंभ की खोखली दीवार को और संभालना उसके लिये मुश्किल हो गया।
उन्होंने बड़े असहाय भाव से मानिक को सब बताया। पूरा कार्यक्रम रद्द करने के लिये कहा । मानिक क्षण भर उनकी आंखों में झांक कर बोला—‘आप का कह
रहे हैं मालिक ?घर में एक भी जन रहता है तब भी तुलसी के बिरवा तर संझौती की दिया बाती होती है ।मंदिर का कपाट नाहीं खुला होता तब भी लोगों का हाथ जुड़ता है ।
सच है कि नाहीं ? उठिये, यह संझौती की बेला है।
(शेष अगले भाग में)


लेखक:श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
( इस कहानी के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं। आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है। 1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 80 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।


शनिवार, २६ सितम्बर २००९

नियति


इस जंगल में
हर शाम
एक कहर बरपा होता है
सन्नाटा टूटता है जंगल का
बन्दूकों की आवाजों से।

बूट रौंदते हैं
जंगल के सीने को
टूटती हैं
कुछ व्हिस्की और रम की
खाली बोतलें
और एक मासूम पेंडुकी
दम तोड़ देती है
तड़फ़ड़ा कर
चन्द खुरदुरे हाथों के बीच।
00000
हेमन्त कुमार

रविवार, २० सितम्बर २००९

रामकली

बहुत सालों के बाद
आज इस चेहरे को देखा है
दिमाग पर काफ़ी दबाव देने के बाद याद आया
इसका नाम रामकली है।

रामकली उन दिनों
लहलहाता खेत थी
एक भरा पूरा गुलदस्ता
और जिन्दगी को जीने की
एक अदम्य लालसा थी उसकी आंखों में।

खनखनाती हंसी बिखेरती
महफ़िलों की रौनक रामकली
आज बाजार में सूखी ईख बनी खड़ी है
चेहरे पर गुलाबीपन झड़ गया है और
सुरमई दैत्य फ़ैल गया है पूरे बदन पर
दांतों पर जमी मोटी मैल की परत
रामकली की राम कहानी कह रही है।

उसके बालों की चमक न जाने कहां दुबक गई है
और गालों के गहरे गड्ढे
आंखों के नीचे काली झाइयां
लगता यूं है
जैसे रामकली अपनी तीस साल की
जिन्दगी में ही
कई जीवन जी चुकी है।

और अब वो केवल
अपने छः बच्चों के वास्ते
राशन पानी बटोरने के लिये ही
घिसट रही है।

आपने भी कहीं न कहीं जरूर देखा होगा
रामकली को बाजार दूकान घर
या अपने ही घर में
दूर से ही आसान है उसकी पहचान।

उस का दुर्भाग्य यह है
कि न वो अब पहली जिन्दगी में लौट सकती है
और न ही अपने बच्चों को
दे सकती है
सभ्य दुनिया का परिवेश।
000000000





कवि—प्रताप सहगल
आदरणीय प्रताप सहगल जी हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि नाटककार एवम उपन्यासकार हैं।प्रताप सहगल जी के अब तक कई नाटक ,कविता संग्रह एवम उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।आप इस समय दिल्ली विश्व्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह कविता प्रताप जी के चर्चित काव्य संग्रह “सवाल अब भी मौजूद है” से ली गयी है।
हेमंत कुमार द्वारा प्रकाशित

गुरुवार, १७ सितम्बर २००९

तलाश एक द्रोण की


मैं जानता हूं कि आज
द्रोण मर चुका है
फ़िर भी मुझे
रहती है तलाश/हर चेहरे में एक द्रोण की।

मैं तलाशता हूं उसे
सुबह से शाम तक
शाम से रात तक
दोपहर की चिलचिलाती धूप में
बरसात के थपेड़ों के बीच
कि शायद कहीं वह----।

मैं उसे तलाश करता हूं
विद्या मन्दिरों के विध्वंसित होते
खंडहरों के बीच
शिक्षालयों की टुटपुंजिया और
लिजलिजी राजनीति के बीच
दिग्भ्रमित एकलव्यों के एक लम्बे
हुजूम के बीच
कि शायद कहीं वह----।

मेरी जिन्दगी की हर शाम
उस द्रोण की तलाश में
काफ़ी हाउस के शोर में
चौराहों के नुक्क्ड़ नाटकों के बीच
बन्द कमरों की गोष्ठियों में
एक शब्दवेधी सन्नाटे के मानिन्द
सरक जाती है
और रात गहरी होने के साथ
मेरे और द्रोण के बीच का
यह शब्दवेधी सन्नाटा
और घना होता जाता है।

मेरे और द्रोण के बीच
बचे हुये सम्पर्क की एक
पतली डोर भी
मेट्रो बार के शोर में
जामों की टकराहट और
सिगरेट के धुयें के बीच
खामोश हो कर
निरन्तर लम्बी होती चली जाती है
और मैं फ़िर अकेला निकल पड़ता हूं
अंधेरी सड़क पर
एक द्रोण की तलाश में।
********
हेमन्त कुमार