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बच्चों को जरूर पढ़ाएं ये किताबें---।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

1— मोइन और राक्षस
लेखिका:अनुष्का रविशंकर
अंग्रेजी से अनुवाद:पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा
चित्रांकन:अनीता बालचन्द्रन
मूल्य-रू085/
2—अण्डमान का लड़का
लेखिका:जाई व्हिटेकर
अंग्रेजी से अनुवाद: पूर्वा याज्ञिक कुशवाहार
मूल्य- रू090/
दोनों पुस्तकों के प्रकाशक:
एकलव्य
ई-10,शंकर नगर बी डी ए कालोनी
शिवाजी नगर,भोपाल-462016

        बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ाने में निश्चित रूप से परीकथाओं और काल्पनिक कथाओं का बहुत बड़ा हाथ होता है।काल्पनिक कथाएं और परियों की कहानियां बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर ऐसे लोक में पहुंचा देती हैं जहां पहुंच कर वह उसे इतनी अधिक खुशी मिलती है जो उसे इस वास्तविक दुनिया में जल्दी नहीं मिल पाती।वह ऐसी काल्पनिक कहानियों के पात्रों के साथ इस कदर घुल मिल जाता है जैसे वह वास्तविक जीवन के अंग हों।बच्चा उनके साथ खेलता है,घूमता है,सैर करता है,सपने देखता है और अपने अंदर एक ऐसे आनंद की अनुभूति करता है जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा।
                 बच्चों को ऐसी ही काल्पनिक दुनिया में पहुंचा देने वाली किताब है “मोइन और राक्षस”।“मोइन और राक्षस” एक छोटा सा मजेदार और रोचक उपन्यास या लम्बी कथा है।इसकी लेखिका अनुष्का रविशंकर हैं।हिन्दी में  अनुवाद पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा ने किया है और खूबसूरत चित्रों से सजाया है अनीता बालचन्द्रन ने।कहानी ऐसी है जिसकी हम आप या बच्चे कल्पना भी नहीं कर सकते।मोइन नाम के एक लड़के के साथ एक राक्षस की दोस्ती की कहानी।
    कहानी वैसे तो बहुत साधारण सी लगती है।लेकिन इसमें घटित घटनाएं ऐसी हैं जो बच्चों,बड़ों सभी को हंसने और किताब को जल्दी से जल्दी खतम करने पर मजबूर कर देंगी।मोइन नाम का 10-12 साल का एक लड़का।रात में अपने कमरे में अकेला सो रहा था।रात के बजे उसे अपने बिस्तर के नीचे अजीब सी आवाज सुनायी देती है।मोइन के पूछने पर आवाज खुद को राक्षस बताती है।और मोइन से एक कागज पर अपनी तस्वीर बनवाकर उस कमरे में वह रक्षस साकार हो जाता है।और यहीं से मजेदार घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है।कागज से निकला वह पतला दुबला अजीब सिर वाला राक्षस(क्योंकि मोइन ने जैसा कागज पर बनाया वह वैसे ही आकाए में बन गया)मोइन के कमरे में ही रहने लगा।
   अब राक्षस को घर में छिपाने,उसकी भूख मिटाने की जिम्मेदारी मोइन की।मोइन की मूसीबत ये कि वह उसे रखे कहां?कभी आल्मारी में,कभी पलंग के नीचे कभी स्कूल बैग में।आखिर उसे अपनी अम्मी और अब्बू से बचाना भी तो था।राक्षस मोइन के साथ स्कूल भी जाता है,उसके स्कूल के फ़ंक्शन में गाता भी है,उस राक्षस के चक्कर में उसे अम्मी अब्बू के साथ डाक्टर के पास भी जाना पड़ता है,उसके दोस्त भी राक्षस के दोस्त हो जाते हैं,मोइन के चाचा हरि मामा के कुत्ते पर राक्षस की सवारी,उसके स्कूल के अध्यापकों का राक्शस को लेकर कन्फ़्युजन---ऐसी ढेरों घटनाएं हैं जो कि किसी भी पाठक को पूरी किताब एक बार में पढ़ने को मजबूर कर देती हैं।और हर घटना के दौरान राक्षस की मजेदार बातें,उसकी हरकतें ऐसी की पढ़कर हंसते हंसते पेट में दर्द होने लगेगा।जितना ही मोइन और उसके साथी उस राक्षस को दुनिया के सामने लाने से रोकना चाहते हैं वह उतना ही सामने आने की कोशिश करता है।और उसकी उल्टी सीधी हरकतों से ऊबने के बावजूद अन्ततःमोइन उसे अपने घर पर ही अपने कमरे में रख लेता है।
       इस किताब की भाषा इतनी रोचक और मजेदार है कि बच्चे निश्चित ही इसे पढ़ते समय एक अच्छी किताब पढ़ने का पूरा अनन्द उठाएंगे।और इसके बीच बीच में अनीता बालचन्द्रन द्वारा बनाए गये चित्र इस काल्पनिक कथा को बच्चों के लिये सजीव बनाने का काम करते हैं।
     दूसरी किताब “अण्डमान का लड़का”---इसकी लेखिका हैं—जाई व्हिटेकर।यह एक छोटे बच्चे की ऐसी रोमांचक कहानी है जिसे हर अभिभावक,शिक्षक और बच्चे को जरूर पढ़ना चाहिये।
  इसकी भी कहानी है तो बहुत साधारण सामान्य सी—अपने अभिभावकों(चाचा-चाची) द्वारा प्रताड़ित बच्चे के घर से पलायन की।पर उसकी घर से पलायन की यह यात्रा इतनी रोचक और रोमांचक है जो पाठक को अन्त तक बांधे रहती है।
    “अण्डमान का लड़का” कहानी है एक दस सा;अ के लड़के आरिफ़ की—जो अपने बहुत धनाढ्य माता पिता के एक दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के कारण अपने चाचा-चाची के साथ मुम्बई में रहता है।पर चाचा चाची का उसको पालने के पीछे सिर्फ़ एक मकसद था कि कब वह बालिग हो और वो लोग उसकी पूरी सम्पत्ति पर कब्जा करें। चाचा-चाची के बुरे व्यवहार से दुखी होकर ही एक दिन आरिफ़ उनका घर छोड़ कर भागने का निर्णय करता है। और एक अंधेरी रात में एकदम खाली हाथ घर से भाग जाता है।वह भाग कर चेन्नई जाने वाली ट्रेन में सवार हो जाता है और खुद को छिपाने के लिये अपना वेश बदल कर किसी तरह चेन्नई पहुंचता है। पुलिस और दुनिया से बचने के लिये अन्ततः वह एक तस्कर के साथ उसकी नाव पर सवार होकर अण्डमान के घने जंगलों में रहने वाले जारवा जाति के लोगों के बीच पहुंच जाता है।
      आरिफ़ की घर से पलायन की यह कहानी हमें एक बेहद रोमांचक यात्रा का अनुभव तो कराती ही है साथ ही प्रकृति के बहुत खूबसूरत दृश्यों से रूबरू भी कराती हैअमें उस जारवा जाति के रहन सहन और संस्कृति से परिचित कराती है जिनके पास आज भी सभ्य मानव जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।इतना ही नहीं हमें यह संदेश भी देती है कि हम किसी अनाथ हो चुके बच्चे के साथ कैसा बर्ताव करेंअमें सोचने को विवश कर देती है कि आखिर आरिफ़ जैसा होनहार और धनाढ्य बच्चे ने क्यों आमजन से दूर प्रकृति की गोद में रहने वाली जारवा प्रजाति के साथ रहने का निर्णय लिया।
       किताब की भाषा इतनी सरल और शैली इतनी रोचक है कि निश्चित ही कोई बच्चा इसे बिना पूरा पढ़े दूसरे कोई काम नहीं करेगा।मैं तो हर अभिभावक से,और प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से अनुरोध करूंगा कि अपने बच्चों,छात्रों को दोनों किताबें—“मोइन और राक्षस” तथा “अण्डमान का लड़का” जरूर और जरूर पढ़ने को दें।
                     0000

डा0हेमन्त कुमार

4 टिप्पणियाँ:

ब्लॉग बुलेटिन 26 मार्च 2016 को 7:26 am  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " वोटबैंक पॉलिटिक्स - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 12 अप्रैल 2016 को 4:04 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (13-04-2016) को "मुँह के अंदर कुछ और" (चर्चा अंक-2311) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रश्मि शर्मा 13 अप्रैल 2016 को 5:45 am  

Wakai padhni chhaiye ye dono kitab..bachho se pahle to main padhna chahungi. Mujhe behad pasand hai aisi kahaniya.

Saif Mohammad Syad 10 जून 2016 को 2:14 am  

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