यह ब्लॉग खोजें

दुनियादार

रविवार, 15 मई 2016

(फ़ोटो:गूगल से साभार)
        उसका रंग एकदम काला था।एकदम चेरी बूट पालिश की तरह।लम्बाई कुल जमा साढ़े चार फ़ीट।उमर ग्यारह साल।नाम कलुआ। वैसे तो उसका नाम था राजकुमार लेकिन उसके घर वाले उसे रजुआ कह कर बुलाते थे और जब से वह नईम मियां की साइकिल रिपेयरिंग की दूकान पर काम करने आया था उसका काला रंग देख कर ही शायद नईम मियां ने उसको कलुआ बुलाना शुरू कर दिया था।उनकी देखा देखी सारे ग्राहक भी उसे कलुआ ही बुलाने लगे थे।और पिछले दो सालों में तो वह शायद अपना नाम राजकुमार भूल भी चुका था।लेकिन कलुआ की दो खास बातें भी थीं जो मुझे बेहद पसंद थीं।पहली ये कि वो हमेशा मुस्कराता रहता था। और जब वो मुस्कुराता था तो उसके काले चेहरे पर सफ़ेद दांत एकदम अलग ही दिखते थे।कलुआ की दूसरी खास बात थी उसकी गाने की आदत।वह हर समय कोई न कोई फ़िल्मी गीत अपनी बेसुरी आवाज में गाने की कोशिश करता था।खासकरमेरा नाम राजू घराना अनाम—”।वह थोड़ा तुतलाता भी था।और जब इस गाने को वह अपनी तोतली आवाज में गाता--“मेला नाम लाजू घलाना अनाम---बहती है गंगा वहां मेला घाम---”तो हर ग्राहक उसको शाबाशी देता।इसी लिये मैं हमेशा अपनी साइकिल रिपेयर कराने उसी के पास जाता था।
    आज भी जब मैं अपनी साइकिल का पंचर बनवाने पहुंचा तो कलुआ पहले से ही एक साइकिल का नट खोलने के लिये रिंच से जूझ रहा था।मेला नाम लाजू घलाना अनाम----बहती है गंगा वहां मेला घाम---” वह अपनी बेसुरी आवाज में गा रहा था और अपनी पूरी ताकत लगाकर साइकिल के पहिये का जाम हो चुका नट खोलने की कोशिश कर रहा था।पर नट जंग लगने से जाम हो चुका था और उस पर से रिंच बार-बार फ़िसल जा रही थी।मैं बहुत देर से नट खोलने की उसकी यह कोशिश देख रहा था।उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं।उसने एक बार फ़िर रिंच को नट में फ़ंसाया और पूरा जोर लगाने के चक्कर में सायकिल के पहियों पर लगभग लटक गया।रिंच फ़िर फ़िसल गयी और उसी के साथ वह भी साईकिल के पहिये पर गिर पड़ा।इसी के साथ साइकिल नईम मियां का एक झन्नाटेदार झापड़ उसके गालों पर पड़ा।
        हट बेएक घण्टे से जूझ रहा है -- साले एक ठो नट नहीं खोल पा रहा।नईम चिल्लाया और उसने रिंच उसके हाथ से छीन कर खुद ही साइकिल का जाम पड़ा नट खोलने की कोशिश की।और कलुआ किनारे खड़ा होकर अपने ग्रीस लगे हाथों से गाल सहलाता हुआ डबडबाई आंखों से नईम द्वारा की जा रही कोशिश देखने लगा।पर साइकिल का जंग लगा नट नईम से भी नहीं खुला। अंत में झुंझला कर नईम ने रिंच एक तरफ़ फ़ेंक दी और कलुआ की तरफ़ देखा।वो अभी भी गाल सहला रहा था।
   “हे ल्लोअभी तू टेसुए बहा रहा है।चल जरा इस नट पे केरोसीन डाल दे।जब तक वो फ़ूलेगा तब तक तू बाबू जी की साइकिल का पंचर देख ले---नईम कलुआ को पुचकारता हुआ बोला।लेकिन उसके स्वर में पुचकारने का भाव कम उसका मजाक उड़ाने का भाव अधिक था।
    कलुआ ने अपने ग्रीस और तेल से चीकट हो चुकी कमीज की बांह से ही अपनी आंखें पोछीं और मेरी साइकिल लिटाकर  पाने से उसका टायर और ट्यूब खोलने लगा।मुझे इस वक्त सच में बहुत ही दया आ रही थी।इस तकलीफ़देह स्थिति में मैं उससे अपनी साइकिल का पंचर नहीं बनवाना चाहता था।लेकिन मेरी मजबूरी ये थी कि बिना साइकिल बनवाए मैं आफ़िस समय पर नहीं पहुंच सकता था।और न ही नईम से ये कह सकता था कि वो कलुआ को कुछ देर के लिये आराम करने के लिये छोड़ दे।क्योंकि एक बार मैं खुद देख चुका था कि एक ग्राहक द्वारा कलुआ को मारने से रोकने पर नईम ने कलुआ को उस ग्राहक के सामने ही दो हाथ और लगा दिया था।साथ ही उस गाहक की साइकिल भी नहीं बनायी थी।उल्टा उस गाहक को जरूर नसीहत दे दिया था कि वो उसकी दूकान पर आकर कलुआ की तरफ़दारी न किया करे।
     मैं अक्सर आफ़िस आते जाते कलुआ को मार खाते देखता।कई बार मैंने यह भी सोचा कि कलुआ को वहां से हटा कर काम करने के लिये अपने ही घर पर लगा लूं।और साथ ही उसका नाम किसी स्कूल में लिखा दूं।पर नईम के बिगड़ैल स्वभाव के कारण न ही मैं नईम से कुछ कह पा रहा था न ही कलुआ से कुछ बात कर पा रहा था।
       लेकिन आज पता नहीं क्यूं मुझे लग रहा था कि कलुआ से और नईम से मुझे इस संबंध में बात करनी चाहिये।लेकिन नईम से पहले मैं कलुआ से बात करना चाहता था कि वो यहां का काम छोड़ कर मेरे घर काम करेगा?स्कूल जायेगा?
    इसी उधेड़बुन में कलुआ के पास ही बैठा अपनी साइकिल का टायर खुलते देख रहा था उसी समय मुहल्ले के शर्मा जी अपनी बाइक से आये और नईम को अपनी कार का पहिया खोलने के लिये बुला ले गये।शायद उनकी कार पंचर हो गयी थी।नईम जाते जाते कलुआ को हिदायत भी देता गया,“अबे कलुआ बाबू जी की साइकिल जल्दी सही कर बे--–और हां जरा दुकान के ध्यान रख्योहम जरा शर्मा जी की कार का पहिया लै के आय रहे हैं।आधा घण्टा लग जाई।कौनौ बदमाशी नहींनहीं तो फ़िर कुटाई होइ जाई जान ल्यो।और नईम शर्मा जी की बाइक पर बैठ कर निकल गया।
  मेरी तो लाटरी निकल गयी।मैं तो खुद ऐसे मौके की तलाश में था कि जब दूकान पर नईम न रहे और मैं कलुआ से उसके मन की बात जान सकूं।जैसे ही नईम बाइक पर गया मैं कलुआ के और पास खिसक गया।बिना कोई भूमिका बनाए मैं सीधे सीधे मुद्दे पर आ गया।
       
कल्लू ई बताओ तुम्हारा मन पढ़ने लिखने का नहीं होता?”मैंने बात की शुरुआत की।पर कलुआ शायद मेरी बात को ठीक से समझ नहीं पाया और बस टुकुर टुकुर मेरा मुंह निहारने लगा।
देखो तुम चाहो तो पढ़ाई लिखायी भी कर सकते हो और पढ़ाई के बाद अपना कोई काम धन्धा कर सकते हो।मैंने कलुआ को फ़िर समाझाने की कोशिश की।
लेकिन बाबू जी हमरी पढ़ाई का खर्चा कौन देगा।बापू अम्मा के पास तो पैसा है नाहीं।कलुआ बहुत मासूमियत से बोला।
देखो उसकी चिन्ता तुम न करोबस तुम तैयार हो जाओ।मैंने उसे आश्वासन दिया।
लेकिन बाबू जी हमारा हियां का काम और हम अपने अम्मा से तो पूछि लें ?”उसने फ़िर सवाल किया।
यहां का काम तो तुम्हें छोड़ना होगा।मैंने उसे समझाने की कोशिश की।उसी समय दूर से नईम आता दिखा और हम दोनों ने अपनी बात बंद कर दी।इस बीच मेरी साइकिल बन चुकी थी।मैंने नईम को पैसा पकड़ाया और अपनी साइकिल लेकर वहां से आफ़िस की ओर चल पड़ा।उस दिन मेरी कलुआ से बात अधूरी रह गयी।
     अगले दिन मेरी छुट्टी थी।मैं आराम से बाहर के बराम्दे में बैठा अखबार पढ़ रहा था कि कलुआ को फ़ाटक के पास खड़े देख कर चौंक पड़ा।अरे आओ कल्लू --–अंदर आ जाओबाहर क्यों खड़े हो?”और मेरे कहते ही कलुआ आ कर मेरे सामने फ़र्श पर बैठ गया।मेरे लाख कहने के बाद भी वो कुर्सी पर बैठने को नहीं तैयार हुआ।इस बीच मेरी श्रीमती जी भी वहां आकर खड़ी हो गयी थीं।
     “देखो भाई,कल्लू आया है इसे कुछ पानी वानी पिलाओ—” मैने श्रीमती जी से आग्रह किया।श्रीमती जी अक्सर मेरे मुंह से कलुआ के बारे में सुनती रहती थीं इसीलिये उनके भीतर भी कलुआ के लिये साफ़्ट कार्नर  था।उन्होंने तुरंत तश्तरी में दो लड्डू और एक गिलास पानी लाकर कलुआ के सामने रख दिया।
   कलुआ ने लड्डू की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया।बस एकटक कभी मेरी ओर कभी श्रीमती जी की तरफ़ देखता रहा। अंत में श्रीमती जी ने ही उससे कहा,“लो बेटा लड्डू खाकर पानी तो पी लो।”कलुआ ने फ़िर मेरी ओर देखा तो मैंने उसे लड्डू खाने का इशारा किया।कलुआ ने बड़े संकोच से एक लड्डू उठा कर जल्दी जल्दी खाया और गिलास का पानी एक ही सांस में पी गया।अब उसने फ़िर मेरी और श्रीमती जी की ओर बारी बारी से देखना शुरू कर दिया था।बीच बीच में वह कभी अपने हाथ की उंगलियों के नाखून कुतरने लगता। कभी नीचे देखते हुये अपने पैरों के पंजों को एक दूसरे के ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता। मैं समझ गया कि वह इस माहौल में खुद को थोड़ा असहज महसूस कर रहा है।
  मैंने उसे इस असहजता से उबारने के लिये बात शुरू कर दी।
“हां तो बताओ कल्लू -–तुमने कुछ सोचा अपने काम छोड़ने के बारे में?”मैंने उससे सीधे सीधे प्रश्न कर लिया।
    “हां बाबू जी –मैंने खुद भी बहुत सोचा और अम्मा से भी पूछा था।उन्होंने मना कर दिया।”कलुआ ने बिना किसी भूमिका के जवाब भी दे दिया।उसका सपाट जवाब सुन कर हम दोनों ही चौंक पड़े। चौंके इसलिये कि हम उम्मीद कर रहे थे कि कलुआ खुद और उसके मां बाप भी उसकी बेहतरी के लिये उसे हमारे यहां भेज देंगे।पर उसने तो सीधे सीधे जवाब दे दिया।
“लेकिन क्यों बेटा?”श्रीमती जी भी उसके जवाब को सुन कर आश्चर्य से बोलीं।
“आण्टी अम्मा कह रही थीं कि –आप लोग तो दुई चार साल में चले जायेंगे फ़िर हमें कहां काम मिलेगा---फ़िर लौट के हमें ओही नईम की दूकान पर काम मांगने जाना होगा।”कलुआ बड़ी मासूमियत से बोला।
“लेकिन कल्लू बेटा हम तो तुम्हें स्कूल भी भेजेंगे।तुम्हें पढ़ाएंगे---।”
“बाबू जी हम का करेंगे पढ़ि लिख के---आखिर काम तो उसी नईम के यहां ही करना पड़ेगा।नईम की नहीं तो कौनो और दूकान पे।”
“लेकिन बेटा --–वो तुम्हें इतना मारता भी तो है—यहां कोई तुम्हें मार थोड़े ही रहा।”मैंने उसे एक बार और समझाने की कोशिश की।
“अरे बाबू जी—कोई गलती होई जाती है हमसे तबै तो मारते हैं नईम अंकल।अउर ई बात की का गारण्टी कि हमें इहां मार नहीं पड़ैगी।बाबू जी ई छोटी सी उमर में हम बहुत दुनिया देखे हैं और दुनियादारी समझते भी हैं---पहिले सब लोग बहुत बात करत हैं।बाद में सारी बातें धरी रहि जाती हैं--- कभी चोरी का इल्जाम लगाय दिया जाता है तो कभी चकारी का।”कलुआ बड़े बुजुर्गों की तरह बोल रहा था और मैं श्रीमती जी के साथ उसकी बड़ी बड़ी बातें सुन रहा था।
“तो यही लिये हम ई फ़ैसला किये हैं कि हम वहीं ठीक हैं।अच्छा अब हम जाय रहे हैं दुकान खोलने का टैम होइ गवा हैं।नमस्ते बाबू जी----।”कलुआ जल्दी से बोला और हमे नमस्ते करके जल्दी से फ़ाटक खोल कर निकल गया।हम लोग अवाक से उसे जाता देखते रहे।
    अगले दिन मैं फ़िर साइकिल में हवा भरवाने नईम की दूकान पर पहुंचा।कलुआ पसीने में तर बतर एक साइकिल के पहिये से जूझ रहा था और साथ ही अपने उसी मस्ती भरे अंदाज में गा रहा था---मेला नाम लाजू घलाना-----।”मैंने अपनी साइकिल में हवा ली और आफ़िस की ओर चल पड़ा।
                              00000

डा0हेमन्त कुमार

6 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 16 मई 2016 को 7:18 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-05-2016) को "अबके बरस बरसात न बरसी" (चर्चा अंक-2345) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रतिभा सक्सेना 17 मई 2016 को 5:53 am  

कैसे-कैसे अनुभवों ने बचपन में परिपक्व बना डाला एक नादान बालक को - समय का मार ही तो है !

ISHWAR KAG 17 मई 2016 को 5:15 pm  

💥💥"नवीनतम करेंट अफेयर्स और नौकरी अपडेट के लिए इस ब्लॉग पर विजिट करते रहें।"💥💥

Ishwarkag.blogspot.com

Rajat Yadav 21 मई 2016 को 8:39 am  

आप चेरी बूट पॉलिश के बजाय गुलाबजामुन भी कह सकते थे. बहुत हँसी आई, इस उपमा से.

दुनियादारी यही तो हम सीख ना पाए, पर समय तो अभी भी है......

sameer 29 मई 2016 को 4:19 am  

अब RS 50,000/महीना कमायें
Work on FB & WhatsApp only ⏰ Work only 30 Minutes in a day
आइये Digital India से जुड़िये..... और घर बैठे लाखों कमाये....... और दूसरे को भी कमाने का मौका दीजिए... कोई इनवेस्टमेन्ट नहीं है...... आईये बेरोजगारी को भारत से उखाड़ फैंकने मे हमारी मदद कीजिये.... 🏻 🏻 बस आप इस whatsApp no 8017025376 पर " INFO " लिख कर send की karo or

sameer 10 जून 2016 को 2:12 am  

अगर आप ऑनलाइन काम करके पैसे कमाना चाहते हो तो हमसे सम्‍पर्क करें हमारा मोबाइल नम्‍बर है +918017025376 ब्‍लॉगर्स कमाऐं एक महीनें में 1 लाख से ज्‍यादा or whatsap no.8017025376 write. ,, NAME'' send ..

एक टिप्पणी भेजें

लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अम्मा अरुणpriya अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा0 हेमन्त कुमार डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मेरा नाम है मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. Bअच्चे का विकास। Breast Feeding. Child health Child Labour. Children children. Children's Day Children's Devolpment and art. Children's Growth children's health. children's magazines. Children's Rights Children's theatre children's world. Facebook. Fader's Day. Gender issue. Girl child.. Girls Kavita. lekh lekhh masoom Neha Shefali. perenting. Primary education. Pustak samikshha. Rina's Photo World.रीना पीटर.रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया.तीसरी आंख। Teenagers Thietor Education. World Photography day Youth

हमारीवाणी

www.hamarivani.com

ब्लागवार्ता


CG Blog

ब्लागोदय


CG Blog

ब्लॉग आर्काइव

कुल पेज दृश्य

  © क्रिएटिव कोना Template "On The Road" by Ourblogtemplates.com 2009 and modified by प्राइमरी का मास्टर

Back to TOP