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रिमझिम पड़ी फ़ुहार

बुधवार, 3 अगस्त 2011


 रिमझिम पड़ी फ़ुहार
भीग उठा बादल के नीचे
पूरा घर संसार।

डूबा आंगन छप्पक छैया
बच्चे ढूंढ़ें छोटी नैया
मेढक कूदें ताल तलैया
इंद्र्धनुष में पंख पसारे
दिखते रंग हजार ।
रिमझिम पड़ी फ़ुहार…।

हल की फ़ाल में साम धराने
धरती का सोंधापन पाने
खाद बीज का जुगत लगाने
बैलों की घंटी सजवाने
निकले सब बाजार ।
रिमझिम पड़ी फ़ुहार-----।

बंसवारी में बोले झींगुर
हंसी दामिनी कड़क कड़क कर
गोरी सहमी घूंघट के भीतर
सपने बादल के पंखों पर
लेके आये बहार ।

रिमझिम पड़ी फ़ुहार
भीग उठा बादल के नीचे
पूरा घर संसार ।
00000
हेमन्त कुमार

10 टिप्पणियाँ:

kshama 3 अगस्त 2011 को 11:03 am  

Aap to hame bachpan me le gaye!

Chaitanyaa Sharma 3 अगस्त 2011 को 1:35 pm  

बहुत प्यारी कविता

kaushal Pandey,  3 अगस्त 2011 को 6:21 pm  

kavita padhkar laga ki gaon vapas pahunch gaya hun.

रुनझुन 3 अगस्त 2011 को 8:01 pm  

बारिश कि मीठी फ़ुहारों से भिगोती सुन्दर रचना... हम शहर में रहने वाले बच्चों को तो रिम्झिम फ़ुहारों से भीगी ऐसी प्रकृति सिर्फ़ कविता और कहानियों में ही देखने को मिलती है...

प्रवीण पाण्डेय 3 अगस्त 2011 को 8:02 pm  

सावन सी लहराती, झरने सी बलखाती बाल कविता।

vandan gupta 4 अगस्त 2011 को 6:01 am  

बारिश की फ़ुहारो जैसी मनभावन रचना।

Dinesh pareek 8 अगस्त 2011 को 7:54 pm  

मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

pragya 10 अगस्त 2011 को 10:37 pm  

बारिश की फुहार जितनी ही हल्की-फुल्की, उछलती-कूदती और अपने आप में मस्त रचना...

B.K.Sharma 27 अगस्त 2011 को 11:25 am  

आप के लीखे शब्द हमेशा सराहनीय है|

B.K.Sharma
Lucknow

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