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कहानी कहना ---कहानी सुनाना---एक कला

गुरुवार, 11 जून 2009


कहानी सुनना हर बच्चे को तो अच्छा लगता ही है।इससे बड़े भी अछूते नहीं हैं।कहानी अगर मनोरंजन का साधन है तो दूसरी ओर यह शिक्षा देने का एक जबर्दस्त औजार भी है।पूरी दुनिया में कहानियों का एक ऐसा अनोखा ,अद्भुत समुद्र है जिसमें हर बच्चा,बूढ़ा तैरना चाहता है।
हमारे देश में भी कहानियां सुनाने या किस्सागोई की एक समृद्ध परंपरा रही है।कहानी सुना कर ज्ञान देने और लोगों को शिक्षित बनाने का पहला प्रयोग पं0 विष्णु शर्मा ने अपनी पंचतंत्र की कहानियों में किया था। इसी क्रम में सिंहासन बत्तीसी,बैताल पच्चीसी,पूत बुलाकी, अलिफ़ लैला या अरेबियन नाइट्स की कहानी सुनाने की शैलियों का भी विकास हुआ।
हमारी अन्य भारतीय भाषाओं में भी कहानी सुनाने की अलग अलग शैलियों का विकास हुआ।
अकबर बीरबल की कहानियां भी इसी किस्सागोई की परंपरा में आती हैं।
यदि हम इन सभी शैलियों का विश्लेषण करें तो कहानी सुनाने के कुछ तत्व सब में दिखाई
पड़ेंगे।मसलन रोचकता,मनोरंजन,भाषा की सरलता,प्रवाह,सुनाने वाले की आवाज की विशेषता आदि। बच्चों को कहानी सुनाने की कला में कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखना जरूरी है।
1- बाल मनोभावों की समझ:
बच्चों को कहानी सुनाने की सबसे पहली शर्त है कि कहानी सुनाने वाले को बच्चों के मनोभावों,उनकी रुचियों ,उनके ज्ञान की अच्छी समझ हो और वह खुद भी उस समय बच्चा बन जाय ,जब वह कहानी सुना रहा हो।बच्चों के साथ बैठते ही वह कुछ देर के लिये अपने बड़ेपन को
भूलकर अपने बचपन के दिनों में लौट जाय। और याद करे अपनी शरारतों,चुलबुलेपन और धमाचौकड़ियों को। कहानी सुनने वाले बच्चों के साथ कुछ देर खेले कूदे,उन्हें अपना दोस्त बनाये,
उनसे कुछ बातें करे,उनके साथ अच्छी तरह घुल मिल जाय। इससे उसे श्रोता बच्चों का मानसिक स्तर,उनके भाषा ज्ञान को समझने का अवसर मिलेगा। और उसे श्रोता बच्चों के अनुकूल कहानी का चयन करने में आसानी होगी।
2- भाषा की सरलता:
बच्चों की कहानियों की भाषा सरल,सहज एवं प्रवाहमयी होनी चाहिये। शब्द बच्चों के मानसिक स्तर के अनुरूप हों ।जिन्हें बच्चे आसानी से समझ सकें।बच्चे यदि किसी विशेष क्षेत्र के हों तो वहां की स्थानीय बोली के शब्दों को भी कहानी में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिये। कहानी के वाक्य जहां तक संभव हो छोटे छोटे बनाने चाहिये,जिन्हें बच्चे आसानी से समझ सकें।यदि कहानी में स्थानीय कहावतों और मुहावरों का इस्तेमाल करें तो ये बच्चों को अतिरिक्त लाभ पहुंचायेगा।(लेकिन ये मुहावरे या कहावतें कहानी में सहज रूप में आयें,अलग से थोपे हुये न लगें।)
कहानी सुनाते समय हमें यह बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिये कि हम कहानी सुनाने के साथ ही कहीं न कहीं परोक्ष रूप से बच्चों को भाषा का ज्ञान भी देते चलते हैं।
3-समसामयिकता:
कहानी का चुनाव बच्चों के परिवेश ,उनके रहन सहन और परिवेश के अनुकूल करें।इसके लिये आप कहानी सुनाने से पहले बच्चों से उनकी राय भी ले सकते हैं कि आज वे किस तरह की कहानी सुनना चाहते हैं? मसलन जानवरों की,परियों की,भूतों की,कोई विज्ञान कथा या फ़िर किसी सच्ची घटना पर अधारित कहानी।
एक बात और ,यदि आप कोई पौराणिक या पंचतंत्र आदि की कहानी सुनाने जा रहे हैं तो उसे भी आज के सन्दर्भों से जोड़ कर बच्चों को सुनाना एक अच्छी कोशिश होगी। और बच्चे इसमें रुचि भी ज्यादा लेंगे।
4- रोमांचकता:
बच्चों की कहानी में यदि रोमंचकता का तत्व न हो तो वह कहानी ही कैसी ?
यह कहना है बच्चों के प्रतिष्ठित कहानीकार श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी का।मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं।जब तक बच्चों की कहानी में --- अरे ये कैसे हुआ?----अरे अचानक ये कहां से टपक गया?------देखो अब आगे क्या होता है? जैसे प्रश्न न उठें,बच्चों के चेहरे रोमांचित न हों,उनकी आंखें बीच बीच में विस्मय से फ़ैल न जायें ,तब तक भला वह बच्चों की कहानी कहां से कही जा सकती है।
5-उत्सुकता:
उत्सुकता का तत्व भी रोमांचकता से जुड़ा हुआ ही है।बच्चों की कहानी में अगर कहानी सुनाने वाले के हर वाक्य के बाद बच्चों के अंदर ---अब आगे क्या होने वाला है?---अमुक व्यक्ति अब क्या करेगा?----जैसे प्रश्न यदि नहीं उठते हैं तो मेरे विचार से वो कहानी पूरी तरह से फ़्लाप मानी जायेगी। वह कहानी बच्चों को कुछ भी देने में सफ़ल नहीं हो सकतीं। न मनोरंजन न सीख। अब ये उत्सुकता न जगा पाना कहानीकार की असफ़लता भी हो सकती है या फ़िर कहानी सुनाने वाले की शैली की।
कहानी सुनाने वाला यदि कुशल कथावाचक है तो वह एक फ़्लाप कहानी से भी बच्चों का मनोरंजन कर सकता है।ठीक उसी तरह से जैसे एक कुशल निर्देशक किसी समान्य कहानी पर भी सुपरहिट फ़िल्म बना सकता है।
6-कहानी मनोरंजन के लिये ,उपदेश या सीख के लिये नहीं:
मेरे हिसाब से बच्चों को वही कहानी अच्छी तरह बांधे रख सकती है,जो सिर्फ़ और सिर्फ़ बच्चों के मनोरंजन के लिये लिखी गयी हो।कहानी सुनाते समय जहां आप बच्चों को उपदेश या सीख देने की कोशिश करेंगे वहीं कहानी का बंटाधार हो जयेगा। बच्चों को जम्हायी आने लगेगी ,किसी को लघु शंका लग जायेगी तो कोई पानी पीने का बहाना ढूंढ़ लेगा----यानि कि आपकी कथा पंचायत भंग। इसलिये बच्चों को कहानी सिर्फ़ मनोरंजन ,आनंद ,खेल के लिये सुनायें।उपदेश देने के लिये नहीं।यहां मेरे कहने का यह मतलब कदापि नहीं कि कहानी में सीख नहीं हो सकती,हो सकती है पर अपने आप कहानी में आई हुई। अलग से थोपी हुई नहीं।
ये तो कुछ मुख्य बिन्दु थे जिन पर बच्चों को कहानी सुनाते समय जरूर ध्यान देना ही चाहिये। अब आती है बात कहानी सुनाने के तरीकों की ---तो इन पर मैं अपने अगले लेख में चर्चा करूंगा।
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हेमन्त कुमार





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बचपन

रविवार, 17 मई 2009

एक बचपन
मांगता है
रोबोट राकेट
सुबह सुबह
दूसरा रोटी।

एक बचपन
सिर पर उठा लेता है
पूरे घर को
दूसरा बोझ।

एक बचपन
बनता है मदारी
दूसरा जमूरा।

एक बचपन
पढ़ता है पुस्तकें
दूसरा
कठिन समय को।

बचपन होता है
राष्ट्र का भविष्य ।
00000000
कवि:शैलेन्द्र
प्रभारी सपादक ‘जनसत्ता’
कोलकाता संस्करण
मोबाइल न—09903146990
0 श्री शैलेन्द्र हिन्दी के सुपरिचित कवि एवम वरिष्ठ पत्रकार हैं। आपके अब तक तीन काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।कविताओं के साथ ही समय समय पर दिनमान,रविवार,श्रीवर्षा,हिन्दी परिवर्तन,जनसत्ता आदि पत्र पत्रिकाओं में समाचार कथायें,लेख,टिप्पणियां,कुछ कहानियों का प्रकाशन।पत्रकारिता में एक लंबी संघर्षमय यात्रा पूरी करके इस समय ‘जनसत्ता’ के कोलकाता संस्करण में प्रभारी संपादक पद पर कार्यारत हैं।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।

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ओ मां

शनिवार, 9 मई 2009


जब भी मैं बैठता हूं
ढलते सूरज के साथ
बालकनी में कुर्सी
पर अकेला
मेरी आंखों के सामने
आता है कैमरे का व्यूफ़ाइंडर
और उसमें झलकती है
एक तस्वीर
आंगन में तुलसी की पूजा करती
एक स्त्री की
और कहीं दूर से आती है एक आवाज
ओ मां।

जब भी बच्चे व्यस्त रहते हैं
टी वी स्क्रीन के सामने
और मैं बाथरूम में
शेव कर रहा होता हूं
शीशे के सामने अकेला
अचानक मेरे हाथ हो जाते हैं
फ़्रीज
शीशे के फ़्रेम पर
डिजाल्व होता है एक फ़्रेम और
मेरा मन पुकारता है
ओ मां।

जब भी मैं खड़ा होता हूं
बाजार में किसी दूकान पर अकेला
कहीं दूर से आती है सोंधी खुशबू
बेसन भुनने की
आंखों के सामने क्लिक
होता है एक फ़्रेम
बेसन की कतरी
और मेरे अन्तः से आती है आवाज
ओ मां।

जब भी मैं बैठता हूं
देर रात तक किसी बियर बार में
कई मित्रों के साथ पर अकेला
अक्स उभरता है बियर ग्लास में
आटो रिक्शा के पीछे
दूर तक हाथ हिलाती
एक स्त्री का
और टपकते हैं कुछ आंसू
बियर के ग्लास में
टप-टप
फ़िर और फ़िर
चीख पड़ता है मेरा मन
ओ मां।
**********
हेमन्त कुमार

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दोहे

शुक्रवार, 8 मई 2009


हर चौराहा बन गया,अब नाटक का मंच।
अभिनय उस पर कर रहे ,बगुले बन सरपंच॥

बिका चाय पर आदमी, जला रहा है आंत।
अन्धकार के बीच वह,बीन रहा है तांत॥

पेट सभी भट्ठी हुये,सुलग रही है आग।
सरपंचों के सामने,खेल रहे हैं फ़ाग॥

सभी राम रावण हुये,कौन चलाये राज।
आज द्रौपदी रो रही,कौन बचाए लाज॥
**********
हेमन्त कुमार

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1May.The Day Of Angels

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009



(आज मई है। दुनिया भर के उन सभी मेहनतकश साथियों को मैं दिल से नमन करते हुए अपनी शुभकामनायें दे रहा हूँ ,जो दूसरों के सपनों ,हसरतों को पूरा करने के लिए अपने सपनों को दफ़न कर देते हैं ....पूरी उम्र भर के लिए इस मौके पर मैं अपनी ये कहानी प्रकाशित कर रहा हूँ ये कहानी काफी पहले मैनें 'पराग 'पत्रिका के लिए लिखी थी )


कहानी --टिक्कू का फैसला


क्यूं बे छोकरे,काम चाहिए तुझे?”
टिक्कू ने चौंक कर पीछे देखा.गैंडे की तरह मोटा और खुरदुरा शरीर.तेजाब से जला हुआ एक आंख का चेहरा,उस दूसरी बची हुयी आंख में भी फैले हुए लाल डोरे--- एक बेहद बदशक्ल और खौफनाक सा दीखता आदमी खड़ा था उसके सामने.
काम….?”
हाँकाम..और बदले में दाम भी.”इस बार वह आदमी थोड़ा सा हंसा तो उसके पीले दांत देख कर टिक्कू को उबकाई आने लगी.मगर तब तक वह उसके एकदम करीब आकर उसके कंधे पर अपना एक हाथ रख चुका था.टिक्कू वहां से हटने की कोशिश करता उससे पहले ही वह अपनी दूसरी वाली आंख दबा कर बोला,”अबे इतना घबराता काहे कू है?यह अपना इलाका है.इधर से एक चिडिया भी उड़े तो अपुन कू उसके दिल का हाल मालूम हो जाता हैक्या समझा..?अब ये बता तेरा नाम क्या है?

टिक्कू।”वह ऐसे बोल पड़ा जैसे किसी ने जादू के बल पर उसके मुंह से उसका नाम निकलवा लिया हो
ठीक है..ठीक है..टिक्कू हो या पिक्कू ….अपुन को तेरे नाम से जास्ती मतलब नईच रखने का..बस मेरे कू काम से मतलब होता क्या…..?बस कुछ ही दिन में तेरे कू सारा काम समझ जायेगा…”
फ़िर तो वह पीटर की ओर ऐसे ही खिंचता चला गया जैसे सांप की आँखों के सम्मोहन में फंसी हुयी चिडिया.
सचमुच टिक्कू उस दिन अपनी क्लास छोड़कर काम की ही तलाश में निकला था.वह नावेल्टी सिनेमा के पास से गुजर रहा था कि वहीं इस रूप में पीटर से टकरा गया.इन पन्द्रह दिनों में कई बार उसने ख़ुद अपने आप को धिक्कारा, ‘कहाँ फंसा तू?कितना ग़लत काम कर रहा है तू?पुलिस वालों से आख मिचौली के बाद नहीं भी पकड़े गए तो क्याकौन सी खुशी होती है तुझे?बस चंद रुपयों की खातिर.....पचीस तीस रूपयों की खातिर ..पीटर के हाथ अपनी आत्मा बेच दी तूने?छिः

मगर सिनेमा के टिकटों की चोर बाजारी के इस काले धंधे को नहीं छोड़ पाया वह.जब जब उसने छोड़ना चाहा लंबे बुखार के बाद भी कमजोरी से बुत पडी माँ का चेहरा आँखों के सामने खड़ा होता.फ़िर कहाँ से आयेगी उसके लिए दावा?कहाँ से आयेंगी रोटियां?अभी तो वह किसी के यहाँ बर्तन माजने जा नहीं सकती.जायेगी भी तो फ़िर उस दिन की तरह कहीं किसी नाली में गिर पड़ेगी.टिक्कू को सबसे बड़ा डर था कि कहीं माँ को उसके धंधे के बारे में पता चल जाय….कितने अरमान थे माँ के….वह पढ़ लिख कर एक भला सा आदमी बन जाएगा….कहीं अच्छी सी नौकरी करेगा…..पर हुआ क्याटिक्कू ने एक लम्बी साँस ली.
लेकिन आज टिक्कू ने फैसला कर लिया था कि वह अब ये धंधा नहीं करेगा.दुनिया इतनी बड़ी है.कहीं तो काम मिलेगा ही.पीटर ने और भी कितने लड़कों को इस काम में फंसा रखा था.टिक्कू को उन सभी की आँखों में दहशत भरी दिखायी पड़ती.उसने अपने मन की बात को जब अपने साथ काम करने वाले दीपू को बताया…..तो वह बोला तो कुछ नहीं बस अपनी फटीआँखों से उसकी ओर ताकता भर रह गया

आज का धंधा निपटा कर टिक्कू सिनेमा हाल के पीछे वाली गली से गुजर रहा था .अचानक पीटर को अपने सामने देख कर वह हडबडा गया था ..पर जल्दी ही उसने अपना आप को सम्हाल लिया.
क्यूं बे !पर निकल आये हैं तेरे कू?धंधा छोडेगा तू….?मेरा काम नयी करने का?..तेरे भेजे में ये बात आईच कैसे….?पीटर भेड़िये की तरह गुर्राता हुआ सवाल दागता चला गया.
टिक्कू ने लम्बी साँस ली .वह समझ गया था कि दीपू पीटर को सब कुछ बता चुका है.पर टिक्कू डरा नहीं.उसने सधे शब्दों में पीटर से कहा,"दादा मैं कल से ये धंधा करने नहीं आऊंगा.”
तेरा ये आखिरी फैसला है?”
हाँ…”
एक भयानक सी किरर्र….की आवाज हुयी.अंधेरे के बावजूद छूरे की तेज धार टिक्कू की आँखों के आगे चमक उठी.
आयेगा कैसे नहीं?तू नहीं आयेगा तो पीटर तेरी लाश को लायेगा.मैंने तेरे को पैलेच बोला था रे कि इदर कू सब आता तो अपनी मर्जी से है….पर जाने के वास्ते मेरापीटर का मर्जी चलता हैक्या.तेरे भेजे में इत्ती सी बात नयी घुसती रे टिक्कू?
टिक्कू डर कर थर थर कांप उठा.अब तो पीटर उसका घर भी देख चुका थावो आखिर बच कर जाएगा किधर.?कोई रिश्तेदार भी तो नहीं है इस मुम्बई में.
और सुन पीटर जो कहता है वोइच करता है….जा अब्भी भाग जा धीरे सेअभी मैं तेरे को समझाता..है रेऐसा डरने का नहीं….पणकल से काम पर आने का..उसमें मेरे कू टप्पा नहीं देने का..”

किर्र की आवाज के साथ छुरा फ़िर अन्दर हो गया.लौटते हुए पीटर के बूटों की ठक ठकटिक्कू के दिल की धड़कन में डूबती चली गयी.
अगले दिन टाइम पे सब लडके गए.लेकिन टिक्कू नहीं आया.पीटर गुस्से से अपने होठ चबा रहा था.तीन बार वो सिगरेट जला कर फेंक चुका था.इतनी मजाल उस कल के छोकरे कीअभी तक के धंधे में किसी छोकरे ने पीटर के सामने सर उठाने की हिम्मत नहीं कीपण वो सालाहरामी ..टिक्कू..पीटर का गुस्सा बढ़ता जा रहा था.इससे पहले कि वो किसी से कुछ कहता ..टिक्कू उसे सामने से आता दिखलाई पड़ा.वह बिना किसी हिचक के उसकी ओर बढ़ रहा था.जब वह पीटर के सामने कर खड़ा हुआ उसके चेहरे पर डर का कोई निशान नहीं था.
क्यूं …..बे ..कहाँ था अब तक..?ये मैटनी के टिकट कौन बेचेगा..तेरा बाप? “
पीटर टिकटों की गड्डी उसके सामने करते हुए लगभग चीख कर बोला

नहीं,अब मैं ये टिकट नहीं बेचूंगा.”टिक्कू की आवाज में दृढ़ता थी.
तब साला क्या मेरे हाथों से मरने के वास्ते आया इधर…?पीटर बिफर गया.
हाँ मैं मरने ही आया हूँ.मैंने माँ को सब सच सच बता दिया.माँ ने इन पैसों से ख़रीदी हुयी दवा खाने से इंकार कर दिया है.वह खाना भी नहीं खा रही है.पानी तक नहीं पी रही है.”टिक्कू लगभग चीखने लगा था.”माँ कहती है यह पाप की कमाई है.माँ मुझे पढाना चाहती थी..अच्छी सी नौकरी में देखना चाहती थी.ये सब तो हुआ नहीं.उल्टे मेरी वजह से मेरी माँ आज मरने जा रही है.जब मेरी माँ ही नहीं रहेगी तो मैं जी कर क्या करूंगा दादा?लो ,अपना चाकू मेरे सीने में उतार दो.”कहते कहते टिक्कू का गला भर आया. उसने अपनी फटी हुयी कमीज के बटन खोल डाले.हड्डियों का ढांचा भर दीखता उसका सीना पीटर के सामने खुला पड़ा था.वे हड्डियाँ जरूर थीं ..लेकिन उन पर जैसे टिक्कू का फैसला लिखा हुआ था.
एक पल….दो पल….तीन पल…..लेकिन टिक्कू की मौत नहीं आयी.पीटर का चाकू नहीं निकला.उसने धीरे से अपने हाथ टिक्कू के कन्धों पर रख दिए.अगले क्षण टिक्कू को अपने माथे पर गरम बूँदें टपकती अनुभव हुईं.उसने चौंक कर सर ऊपर उठाया.वह आश्चर्य से देखता रह गया.पीटर की जालिम ऑंखें आंसुओं से तर थीं.
टिक्कू ने भरे हुए गले से कहा," टिक्कू…..मैं तेरी माईं को मिलना चाहता रेमैं उसके पैर छूना मांगता ..जिसने तेरे जैसे बेटे कू जनम दिया है रे….चल तूअभ्हीच चल….”
नावेल्टी थियेटर के सामने अजीब माजरा थासाइकिल स्टैंड वाले से लेकर ….टिकट ब्लैक करने वाले सारे छोकरे….. सबबड़ी हैरत से टिक्कू और पीटर को जाते हुए देख रहे थे.
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हेमंत कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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