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1May.The Day Of Angels

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009



(आज मई है। दुनिया भर के उन सभी मेहनतकश साथियों को मैं दिल से नमन करते हुए अपनी शुभकामनायें दे रहा हूँ ,जो दूसरों के सपनों ,हसरतों को पूरा करने के लिए अपने सपनों को दफ़न कर देते हैं ....पूरी उम्र भर के लिए इस मौके पर मैं अपनी ये कहानी प्रकाशित कर रहा हूँ ये कहानी काफी पहले मैनें 'पराग 'पत्रिका के लिए लिखी थी )


कहानी --टिक्कू का फैसला


क्यूं बे छोकरे,काम चाहिए तुझे?”
टिक्कू ने चौंक कर पीछे देखा.गैंडे की तरह मोटा और खुरदुरा शरीर.तेजाब से जला हुआ एक आंख का चेहरा,उस दूसरी बची हुयी आंख में भी फैले हुए लाल डोरे--- एक बेहद बदशक्ल और खौफनाक सा दीखता आदमी खड़ा था उसके सामने.
काम….?”
हाँकाम..और बदले में दाम भी.”इस बार वह आदमी थोड़ा सा हंसा तो उसके पीले दांत देख कर टिक्कू को उबकाई आने लगी.मगर तब तक वह उसके एकदम करीब आकर उसके कंधे पर अपना एक हाथ रख चुका था.टिक्कू वहां से हटने की कोशिश करता उससे पहले ही वह अपनी दूसरी वाली आंख दबा कर बोला,”अबे इतना घबराता काहे कू है?यह अपना इलाका है.इधर से एक चिडिया भी उड़े तो अपुन कू उसके दिल का हाल मालूम हो जाता हैक्या समझा..?अब ये बता तेरा नाम क्या है?

टिक्कू।”वह ऐसे बोल पड़ा जैसे किसी ने जादू के बल पर उसके मुंह से उसका नाम निकलवा लिया हो
ठीक है..ठीक है..टिक्कू हो या पिक्कू ….अपुन को तेरे नाम से जास्ती मतलब नईच रखने का..बस मेरे कू काम से मतलब होता क्या…..?बस कुछ ही दिन में तेरे कू सारा काम समझ जायेगा…”
फ़िर तो वह पीटर की ओर ऐसे ही खिंचता चला गया जैसे सांप की आँखों के सम्मोहन में फंसी हुयी चिडिया.
सचमुच टिक्कू उस दिन अपनी क्लास छोड़कर काम की ही तलाश में निकला था.वह नावेल्टी सिनेमा के पास से गुजर रहा था कि वहीं इस रूप में पीटर से टकरा गया.इन पन्द्रह दिनों में कई बार उसने ख़ुद अपने आप को धिक्कारा, ‘कहाँ फंसा तू?कितना ग़लत काम कर रहा है तू?पुलिस वालों से आख मिचौली के बाद नहीं भी पकड़े गए तो क्याकौन सी खुशी होती है तुझे?बस चंद रुपयों की खातिर.....पचीस तीस रूपयों की खातिर ..पीटर के हाथ अपनी आत्मा बेच दी तूने?छिः

मगर सिनेमा के टिकटों की चोर बाजारी के इस काले धंधे को नहीं छोड़ पाया वह.जब जब उसने छोड़ना चाहा लंबे बुखार के बाद भी कमजोरी से बुत पडी माँ का चेहरा आँखों के सामने खड़ा होता.फ़िर कहाँ से आयेगी उसके लिए दावा?कहाँ से आयेंगी रोटियां?अभी तो वह किसी के यहाँ बर्तन माजने जा नहीं सकती.जायेगी भी तो फ़िर उस दिन की तरह कहीं किसी नाली में गिर पड़ेगी.टिक्कू को सबसे बड़ा डर था कि कहीं माँ को उसके धंधे के बारे में पता चल जाय….कितने अरमान थे माँ के….वह पढ़ लिख कर एक भला सा आदमी बन जाएगा….कहीं अच्छी सी नौकरी करेगा…..पर हुआ क्याटिक्कू ने एक लम्बी साँस ली.
लेकिन आज टिक्कू ने फैसला कर लिया था कि वह अब ये धंधा नहीं करेगा.दुनिया इतनी बड़ी है.कहीं तो काम मिलेगा ही.पीटर ने और भी कितने लड़कों को इस काम में फंसा रखा था.टिक्कू को उन सभी की आँखों में दहशत भरी दिखायी पड़ती.उसने अपने मन की बात को जब अपने साथ काम करने वाले दीपू को बताया…..तो वह बोला तो कुछ नहीं बस अपनी फटीआँखों से उसकी ओर ताकता भर रह गया

आज का धंधा निपटा कर टिक्कू सिनेमा हाल के पीछे वाली गली से गुजर रहा था .अचानक पीटर को अपने सामने देख कर वह हडबडा गया था ..पर जल्दी ही उसने अपना आप को सम्हाल लिया.
क्यूं बे !पर निकल आये हैं तेरे कू?धंधा छोडेगा तू….?मेरा काम नयी करने का?..तेरे भेजे में ये बात आईच कैसे….?पीटर भेड़िये की तरह गुर्राता हुआ सवाल दागता चला गया.
टिक्कू ने लम्बी साँस ली .वह समझ गया था कि दीपू पीटर को सब कुछ बता चुका है.पर टिक्कू डरा नहीं.उसने सधे शब्दों में पीटर से कहा,"दादा मैं कल से ये धंधा करने नहीं आऊंगा.”
तेरा ये आखिरी फैसला है?”
हाँ…”
एक भयानक सी किरर्र….की आवाज हुयी.अंधेरे के बावजूद छूरे की तेज धार टिक्कू की आँखों के आगे चमक उठी.
आयेगा कैसे नहीं?तू नहीं आयेगा तो पीटर तेरी लाश को लायेगा.मैंने तेरे को पैलेच बोला था रे कि इदर कू सब आता तो अपनी मर्जी से है….पर जाने के वास्ते मेरापीटर का मर्जी चलता हैक्या.तेरे भेजे में इत्ती सी बात नयी घुसती रे टिक्कू?
टिक्कू डर कर थर थर कांप उठा.अब तो पीटर उसका घर भी देख चुका थावो आखिर बच कर जाएगा किधर.?कोई रिश्तेदार भी तो नहीं है इस मुम्बई में.
और सुन पीटर जो कहता है वोइच करता है….जा अब्भी भाग जा धीरे सेअभी मैं तेरे को समझाता..है रेऐसा डरने का नहीं….पणकल से काम पर आने का..उसमें मेरे कू टप्पा नहीं देने का..”

किर्र की आवाज के साथ छुरा फ़िर अन्दर हो गया.लौटते हुए पीटर के बूटों की ठक ठकटिक्कू के दिल की धड़कन में डूबती चली गयी.
अगले दिन टाइम पे सब लडके गए.लेकिन टिक्कू नहीं आया.पीटर गुस्से से अपने होठ चबा रहा था.तीन बार वो सिगरेट जला कर फेंक चुका था.इतनी मजाल उस कल के छोकरे कीअभी तक के धंधे में किसी छोकरे ने पीटर के सामने सर उठाने की हिम्मत नहीं कीपण वो सालाहरामी ..टिक्कू..पीटर का गुस्सा बढ़ता जा रहा था.इससे पहले कि वो किसी से कुछ कहता ..टिक्कू उसे सामने से आता दिखलाई पड़ा.वह बिना किसी हिचक के उसकी ओर बढ़ रहा था.जब वह पीटर के सामने कर खड़ा हुआ उसके चेहरे पर डर का कोई निशान नहीं था.
क्यूं …..बे ..कहाँ था अब तक..?ये मैटनी के टिकट कौन बेचेगा..तेरा बाप? “
पीटर टिकटों की गड्डी उसके सामने करते हुए लगभग चीख कर बोला

नहीं,अब मैं ये टिकट नहीं बेचूंगा.”टिक्कू की आवाज में दृढ़ता थी.
तब साला क्या मेरे हाथों से मरने के वास्ते आया इधर…?पीटर बिफर गया.
हाँ मैं मरने ही आया हूँ.मैंने माँ को सब सच सच बता दिया.माँ ने इन पैसों से ख़रीदी हुयी दवा खाने से इंकार कर दिया है.वह खाना भी नहीं खा रही है.पानी तक नहीं पी रही है.”टिक्कू लगभग चीखने लगा था.”माँ कहती है यह पाप की कमाई है.माँ मुझे पढाना चाहती थी..अच्छी सी नौकरी में देखना चाहती थी.ये सब तो हुआ नहीं.उल्टे मेरी वजह से मेरी माँ आज मरने जा रही है.जब मेरी माँ ही नहीं रहेगी तो मैं जी कर क्या करूंगा दादा?लो ,अपना चाकू मेरे सीने में उतार दो.”कहते कहते टिक्कू का गला भर आया. उसने अपनी फटी हुयी कमीज के बटन खोल डाले.हड्डियों का ढांचा भर दीखता उसका सीना पीटर के सामने खुला पड़ा था.वे हड्डियाँ जरूर थीं ..लेकिन उन पर जैसे टिक्कू का फैसला लिखा हुआ था.
एक पल….दो पल….तीन पल…..लेकिन टिक्कू की मौत नहीं आयी.पीटर का चाकू नहीं निकला.उसने धीरे से अपने हाथ टिक्कू के कन्धों पर रख दिए.अगले क्षण टिक्कू को अपने माथे पर गरम बूँदें टपकती अनुभव हुईं.उसने चौंक कर सर ऊपर उठाया.वह आश्चर्य से देखता रह गया.पीटर की जालिम ऑंखें आंसुओं से तर थीं.
टिक्कू ने भरे हुए गले से कहा," टिक्कू…..मैं तेरी माईं को मिलना चाहता रेमैं उसके पैर छूना मांगता ..जिसने तेरे जैसे बेटे कू जनम दिया है रे….चल तूअभ्हीच चल….”
नावेल्टी थियेटर के सामने अजीब माजरा थासाइकिल स्टैंड वाले से लेकर ….टिकट ब्लैक करने वाले सारे छोकरे….. सबबड़ी हैरत से टिक्कू और पीटर को जाते हुए देख रहे थे.
*************************
हेमंत कुमार

4 टिप्पणियाँ:

hem pandey 2 मई 2009 को 12:53 am  

चाहें तो इसे कहानी का अंतिम पैरा समझ लें -
पीटर को वह दिन याद आ गया जब वह पांचवी की परीक्षा में नकल की पर्ची बना कर ले गया था | जब घर लौट कर उसने वह पर्ची माँ को दिखाई थी तो माँ ने सहानुभूति से कहा था - बेटे पीटर इतने बारीक अक्षर पढ़ने में तो तुझे बहुत दिक्कत हुई होगी | पीटर सोचने लगा- शायद अपराध की दुनिया में उसका यह पहला कदम था | काश उसकी माँ ने उसे तभी रोक लिया होता !

हरि 2 मई 2009 को 1:42 am  

बच्‍चा कच्‍ची मिट्टी की तरह होता है। मां उस मिट्टी को सांचे में ढालती है और वक्‍त पकाता है।..अच्‍छी कथा गढ़ी है आपने।

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi 2 मई 2009 को 5:03 am  

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना!आप ने मुझे उस समय की याद दिला दिया जब "पराग"मेरी प्रिय पत्रिका हुआ करती थी।
आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।आप मेरे ब्लाग
पर आएं,आप को यकीनन अच्छा लगेगा।

दिगम्बर नासवा 3 मई 2009 को 5:28 am  

आपने इस कहानी में बहुत की यथार्थ को छुआ है ............ अक्सर बचपन अपराध की दुनिया में पहला कदम अनजाने या किसी मजबूरी में ही रखता है और फिर चाट पटाता रहता है बाहर निकलने को...........बहुत भावोक कहानी है

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