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बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

               
                        पुस्तक:बाल साहित्यकार कौशल पाण्डेय
                                   सृजन और संवाद
                         संपादन: डा0सुनीता यदुवंशी
                         प्रकाशक: शैलजा प्रकाशन
                                 57-पी,कुंज विहार2
                                 यशोदानगर, कानपुर-208011

                   किसी भी साहित्यकार के पूरे साहित्य को एक साथ एक ही जिल्द में पढ़ना अपने आप में एक अनोखा और विशिष्ट अनुभव होता है।अनोखा इसलिये कि आप एक साथ उस रचनाकार की विभिन्न विधाओं में लिखी गयी रचनाओं का रसस्वादन करते हैं।विशिष्ट इसलिये कि आप उस साहित्यकार की पूरी रचना यात्रा से रूबरू होते हैं।खासतौर से बाल साहित्य के संदर्भ में यह बात ज्यादा सार्थक कही जा सकती है।
                             कुछ ऐसा ही अनुभव प्रतिष्ठित लेखक कौशल पाण्डेय के ऊपर लिखी गई पुस्तक बाल साहित्यकार कौशल पाण्डेय:सृजन और संवाद पढ़कर हमें होता है। इस पुस्तक का संपादन डा0 सुनीता यदुवंशी ने किया है।पुस्तक में श्री कौशल पाण्डेय द्वारा रचित 41 बाल कवितायें,एक लंबी बाल कविता,तीन बाल कहानियां,तीन बाल नाटक तथा बाल साहित्य पर दो लेख संकलित हैं। इनके साथ ही कौशल जी के ऊपर लिखे गये लेखों एवं उनसे लिये गये साक्षात्कार भी शामिल किये गये हैं। यानी कि बाल साहित्य पर काम करने वाले किसी अध्येता को कौशल पाण्डेय के बाल साहित्य को ढूंढने के लिये कहीं इधर उधर भटकना नहीं पड़ेगा। उसे कौशल जी का समग्र बाल साहित्य एक साथ इसी किताब में मिल जायेगा। इस दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।
                              अब अगर हम इस पुस्तक में संकलित रचनाओं की चर्चा करें तो कह सकते हैं कि ये समस्त रचनायें एक ऐसे साहित्यकार द्वारा लिखी गयी हैं जिसको बाल मनोविज्ञान,बच्चों की रुचि अरुचि,उनकी भाषा के स्तर की बहुत गहरी समझ है। कौशल जी ने बाल मन के अंदर कितनी गहराई के साथ झांका है इस बात का प्रमाण उनकी बाल कविता दादा जी की चिट्ठीमें देखा जा सकता है---
         दादी जी को हुआ जुकाम/खाए थे दो कच्चे आम/उस पर पिया था ठण्ढा पानी/बोलो है ना ये नादानी।अब न करूंगी गलती ऐसी/कान पकड़ के उट्ठी बैठी/दादा
जी की आई------।
             यानि कि दादी जी की गलती पर उनसे उठक बैठक करवाना एक बालमन की उपज ही तो है।और बच्चों की इसी बाल सुलभ चंचलता को कौशल जी ने बखूबी पकड़ा है। बाल मन की यही चंचलता,उत्सुकता,उसकी कल्पना की उड़ान हमें इस पुस्तक की ज्यादातर कविताओं(कहो कहानी नानी जी,सिंहराज की बीमारी,सुनिये बंदर मामा जी,आज का अखबार,नाव आदि)में दिखाई पड़ती है।
            कौशल पाण्डेय की पकड़ बच्चों की कहानियों पर भी उतनी ही है जितनी कि कविताओं पर। वैसे भी पाण्डेय जी ने बड़ों के लिये कहानियां ज्यादा लिखी हैं। इस संकलन में हालांकि सिर्फ़ तीन ही बाल कहानियां हैं।वह दीवाली, कहानी दुष्ट कौवे की’ औरसीख ऐसे मिली।लेकिन लंबी बाल कविता सोन मछरिया गहरा पानी भी एक गीतात्मक कहानी ही है। और यह भी बाल पाठकों को पूरी कहानी का आनन्द देती है।वह दीवालीकहानी एक अध्यापक और छात्र के मनोभावों को गहराई से उकेरती है वहीं सीख ऐसे मिलीएक घमंडी बच्चे के हृदय परिवर्तन की कथा है। कहानी दुष्ट कौवे की’ अपेक्षाकृत छोटे बच्चों के लिये लिखी गयी कहानी है।
          कौशल पाण्डेय बाल गीतकार,कहानीकार के साथ ही एक सफ़ल नाटककार भी हैं।इस संग्रह में संकलित बाल नाटक आंखें ऐसे खुलीं,पासा पलट गया,जहाँ किशोर छात्रों की उद्दण्डताओं, शैतानियों के साथ उनमें आये बदलाव को रेखांकित करते हैं वहीं सच होता सपना प्रौढों एवं नव साक्षरों को संदेश देने वाला नाटक है।ये तीनों नाटक यद्यपि हैं तो छोटे यानि कम अवधि के। लेकिन आज बच्चों की ज़रूरत के हिसाब से उपयुक्त हैं।क्योंकि अक्सर बच्चों को अपने स्कूलों में मंचन के लिये छोटे नाटकों की ज़रूरत पड़ती है और ये नाटक इन ज़रूरतों को पूरा करेंगे।
          कौशल पाण्डेय की इस सर्जनात्मक यात्रा को और गहराई से समझने,बाल साहित्य कि प्रति उनके समर्पण,प्रतिबद्धता से समझने के लिये हमें उनके द्वारा लिखे लेख तथा उनके ऊपर लिखे गये लेखों और साक्षत्कार को भी पढ़ना आवश्यक है।ये लेख, साक्षत्कार हमें कौशल जी की बाल साहित्य की प्रतिबद्धता, समझ,अंर्तदृष्टि को तो बताते ही हैं,उनके अंदर छिपे बालमन का भी साक्षत्कार कराते हैं। पाण्डेय जी ने अंबिका सिंह वर्मा से बातचीत में इस बात को स्वीकार किया है कि बच्चों के लिये लिखना मेरे लिये आत्मसंतोष की बात है। और उनके अंदर का बाल साहित्य के प्रति यही झुकाव हमें उनकी समस्त रचनाओं में तो दिखाई पड़ता ही है साथ ही उन्हें बाल साहित्य के सर्जकों में एक विशिष्ट स्थान भी प्रदान करता है।
        कुल मिलाकर यह पुस्तक हिन्दी के सभी बाल साहित्य प्रेमियों के लिये तो लाभप्रद है ही,उन शोधार्थियों का भी यह मार्गदर्शन करेगी जो बाल साहित्य के क्षेत्र में शोध करना चाहते हैं।
                   0000
हेमन्त कुमार

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जेठ की दुपहरी

मंगलवार, 15 जून 2010

जेठ की तपती दुपहरी
आग जो बरसा रही
बर्फ़ की चादर लपेटे
ठंढ भी शरमा रही ।

स्याह लावा हर सड़क पर
बस पिघलता जा रहा
चीख प्यासे पाखियों की
दिल को अब दहला रही ।

दूर तक दरकी है धरती
घाव बस सहला रही
सोत पानी का दिखा कर
आंख को भरमा रही।

हर नदी अब भाप बन कर
धुंध में मिल जा रही
तलहटी की रेत भी अब
भय से बस थर्रा रही ।
0000
हेमन्त कुमार

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ओ मां

गुरुवार, 10 जून 2010

      परिस्थितियां हमें कभी कभी इतना विवश कर देती हैं कि हम चाह कर भी कुछ कर नहीं सकते----बस उन हालातों को मूक दर्शक बने देखते रहते हैं और खुद को हवाले कर देते हैं उन हालातों के जिनसे हम जूझ रहे होते हैं। हम मान लेते हैं कि जो प्रकृति करेगी वो ठीक ही करेगी।

ऐसी ही हालातों का शिकार पिछले दिनों मैं भी रहा।---9 मई को जब दुनिया भर में मातृ दिवस मनाया जा रहा था सभी मांओं की लम्बी उम्र के लिये प्रार्थनायें कर रहे थे मैं इलाहाबाद के एक अस्पताल में अपनी मां(अम्मा) को आई सी यू में भर्ती करा रहा था। ----हास्पिटल की फ़ार्मेल्टीज के तहत मुझे उन पेपर्स पर दस्तखत करने पड़ रहे थे जिन्हें पढ़ पढ़ कर मेरे आंसू लगातार मेरे चेहरे को भिगो रहे थे---कि हे ईश्वर मातृ दिवस के दिन मुझसे किन पेपर्स पर दस्तखत करवाये जा रहे हैं----कि यदि मेरी मां को कुछ हो जाता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी------
                         ------- लेकिन परिवार के सभी लोगों,रिश्तेदारों,मित्रों की दुआओं प्रार्थनाओं के साथ ही घर के सभी लोगों की सेवा एवम प्रार्थना से मेरी मां जल्द ही आई सी यू से बाहर आ गयीं। लगभग 15 दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद अब मेरी मां घर आ गयी हैं।धीरे धीरे उनका स्वास्थ्य भी सुधर रहा है।
               पिछले दिनों मैं नेट पर पूरी तरह अनुपस्थित रहा। अब उपस्थित हुआ हूं --- अपनी मां के ही जन्मदिवस पर लिखी अपनी एक कविता लेकर।(यद्यपि यह कविता मैं पहले भी प्रकाशित कर चुका हूं। फ़िर भी मुझे यह कविता बहुत बहुत अच्छी लगती है----)

ओ मां


जब भी मैं बैठता हूं
ढलते सूरज के साथ
बालकनी में कुर्सी
पर अकेला
मेरी आंखों के सामने
आता है कैमरे का व्यूफ़ाइंडर
और उसमें झलकती है
एक तस्वीर
आंगन में तुलसी की पूजा करती
एक स्त्री की
और कहीं दूर से आती है एक आवाज
ओ मां।


जब भी बच्चे व्यस्त रहते हैं
टी वी स्क्रीन के सामने
और मैं बाथरूम में
शेव कर रहा होता हूं
शीशे के सामने अकेला
अचानक मेरे हाथ हो जाते हैं
फ़्रीज
शीशे के फ़्रेम पर
डिजाल्व होता है एक फ़्रेम और
मेरा मन पुकारता है
ओ मां।


जब भी मैं खड़ा होता हूं
बाजार में किसी दूकान पर अकेला
कहीं दूर से आती है सोंधी खुशबू
बेसन भुनने की
आंखों के सामने क्लिक
होता है एक फ़्रेम
बेसन की कतरी
और मेरे अन्तः से आती है आवाज
ओ मां।


जब भी मैं बैठता हूं
देर रात तक किसी बियर बार में
कई मित्रों के साथ पर अकेला
अक्स उभरता है बियर ग्लास में
आटो रिक्शा के पीछे
दूर तक हाथ हिलाती
एक स्त्री का
और टपकते हैं कुछ आंसू
बियर के ग्लास में
टप-टप
फ़िर और फ़िर
चीख पड़ता है मेरा मन
ओ मां।
**********
हेमन्त कुमार



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हमारे विकास के तीन दशकों का जीवंत दस्तावेज----“मुन्नी मोबाइल”

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010


पुस्तक:मुन्नी मोबाइल
लेखक:प्रदीप सौरभ
  प्रकाशक:वाणी प्रकाशन
 4695,21-ए,दरियागंज,
नई दिल्ली-110002
                                                                                                                                                                       मुन्नी मोबाइल नाम किसी फ़िल्म या टी0वी0 सीरियल का नहीं बल्कि प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक प्रदीप सौरभ के हाल में ही प्रकाशित उपन्यास का है। यह उपन्यास मैनें पिछले पन्द्रह दिनों में तीन बार पढ़ा है। और हर बार इसमें मुझे प्रदीप सौरभ की कलम का एक नया रूप दिखाई पड़ा है।                            
              दरअस्ल यह उपन्यास मात्र एक उपन्यास न होकर हमारे देश में पिछले तीन दशकों में हुये भौतिकता के अन्धाधुन्ध विकास का प्रामाणिक दस्तावेज कहा जा सकता है। मुन्नी नाम की काम वाली और उसका नया मोबाइल---ये तो माध्यम मात्र हैं।
         उपन्यास के मुख्य पात्र तो पत्रकार आनन्द भारती और मुन्नी मोबाइल हैं। उपन्यास का पूरा ताना बाना पत्रकार आनन्द भारती और उनके घर में काम करने वाली बिन्दू यादव उर्फ़ मुन्नी मोबाइल के इर्द गिर्द बुना गया है। आनन्द भारती एक तेज तर्रार और गंभीर पत्रकार हैं। जो मन में ठान लिया उसे पूरा करना उनके जीवन का मकसद बन जाता है।
        मुन्नी मोबाइल है तो घरों में काम करने वाली---बिहार से आकर दिल्ली के साहिबाबाद में बसी हुयी एक साधारण नौकरानी लेकिन उसके चरित्र का भी एक विशिष्ट पहलू है। वह है उसके अंदर की दबंगता और महत्वाकांक्षा। एक आम आदमी की ही तरह उसकी भी इच्छा थी कि उसकी बेटियां पढ़ लिख कर साहब बन जायं। उन्हें लोगों के घरों में बर्तन चौका न करना पड़े। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये मुन्नी मोबाइल ने जो सफ़र पत्रकार आनन्द भारती के घर से शुरू किया वो काम वालियों की यूनियन,साहिबाबद के चौधरियों से पंगा,डाक्टरनी के साथ नर्सिंग के अवैध धन्धों,गाजियाबाद और पहाड़गंज रूट की बसों के फ़र्राटा भरते पहियों के साथ चलता हुआ अन्त में कालगर्ल्स के रैकेट और मुन्नी मोबाइल के मर्डर के साथ पूरा होता है।
                 ध्यान देने वाली बात यह है कि जब मुन्नी मोबाइल बस चलाने वाले ठेकेदारों के अड्डे पर जाकर सीधे उनसे कहती है कि मेरा नाम मुन्नी मोबाइल है और बिहार की रहने वाली हूं।मैं किसी से डरती नहीं हूं। आप अपना काम करो और मुझे अपनी बस चलाने दो। तो यह संवाद सिर्फ़ मुन्नी का नहीं रह जाता ।यहां मुन्नी के माध्यम से प्रदीप सौरभ ने बस ठेकेदारों को उस तबके से चेतावनी दिलवायी है जो हमेशा से दबाया जाता रहा है। जो भारत के दूर दराज के गांवों से भागकर महानगरों में सिर्फ़ इस लिये आता है कि ---इन महानगरों में शायद उसका भाग्य उसे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करवा देगा। लेकिन यहां भी पहले से काबिज रसूखदार ऐसे लोगों को पनपने का मौका नहीं देते।
                      मुन्नी मोबाइल के माध्यम से जहां एक वर्ग विशेष कि गाथा लिखी गयी है वहीं लेखक ने हमारे देश में पिछले तीन चार दशकों में हुये परिवर्तनों ,बदलावों ,भौतिकतावाद की चपेट में आते जा रहे सम्पूर्ण देश,मोबाइल क्रान्ति,कालसेण्टरों के भयावह सच के साथ ही राजनीति में जाति,धर्म,और नारों के साथ जनता की भावनाओं के साथ खेले जा रहे भयावह खेल के सच की एक एक परतों को भी बहुत सच्चाई और निष्पक्षता के साथ उधेड़ा है।
        उपन्यास की शुरुआत से ही पता चल जाता है कि आनन्द भारती किस मिट्टी के बने पत्रकार हैं। वह एक तेज तर्रार और गंभीर पत्रकार हैं। जो मन में ठान लिया उसे पूरा करना उनके जीवन का मकसद बन जाता है। कभी किसी किस्म का समझौता करके जीवन बिताना उन्हें पसन्द नहीं। और उनकी इसी दृढ़ता का परिणाम उन्हें गुजरात में भुगतना पड़ा। ----मोदी को जीत का नशा था। हिन्दू ब्रिगेड भी नशे में चूर थी। चुन चुन कर विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा था। मीडिया पहले निशाने पर था। आनंद भारती पर भी हमला हुआ। उन्हें कार से उतार कर पानी से नहलाया गया। पानी के प्लास्टिक पाउचों से मारा गया।फ़िर छोड़ दिया गया। एक बार फ़िर इस हमले में उन्हें भारत माता की जय बोलने के लिये मजबूर किया गया।
                       और यह परिणाम भुगतना पड़ता है आनद भारती को दंगों की आग में जल रहे गुजरात की आंखों देखी,नंगी और भयावह सच्चाई को अखबार में लिख कर आम जनता को पढ़वाने की सजा के रूप में। नरेन्द्र मोदी और उनकी हिन्दू ब्रिगेड को जनता के सामने बिल्कुल नंगा कर देने के एवज में। मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जीवन की इन सच्चाइयों को उपन्यास में लिखना प्रदीप सौरभ के ही बूते की बात है।
             उपन्यास में हमें आनन्द भारती के तेज तर्रार,खुर्रैट, गम्भीर रूप के साथ ही एक बेहद संवेद्नशील और भावुक हृदय भी देखने को मिलता है जो सिर्फ़ मानसी के लिये सोचता है। इस दिल में हर वक्त हर समय आनन्द भारती के साथ मानसी बसती है। मानसी एक तरह से आनंद भारती के जीवन का प्रेरणा स्रोत भी है। जो हर उस मोड़ पर आनंद भारती के साथ है जब वो किसी अनिर्णय की स्थिति में होते हैं।
   उपन्यास की मुख्य चरित्र मुन्नी की कहानी के साथ ही कई अन्य प्रसंग भी साथ साथ चलते हैं जो उपन्यास को और अधिक रोचक,गतिशील और पठनीय बनाते हैं। आनंद भारती की लंदन यात्रा,पत्नी शिवानी से अलगाव,मानसी से इमोशनल अटैचमेण्ट,सुधा पाण्डेय के साथ कोलकाता यात्रा और आनंद भारती का इलाहाबाद से लगाव। ये प्रसंग उपन्यास की कथावस्तु से सीधे जुड़े न होकर भी उसे आगे बढ़ाने के साथ ही  उपन्यास की मूल कथा को समृद्ध करते हैं।
         मसलन आनंद भारती की लंदन यात्रा एक सम्पूर्ण लेखा जोखा है प्रवासी भारतीयों के मन का,उनके हालातों का और उनके अन्दर वतन से दूर रहने के दर्द का। अपनी जमीन से दूर रहने का यही दर्द,यही संवेदना हमें बार बार आनंद भारती की इलाहाबाद यात्राओं और प्रसंगों में दिखाई पड़ती है। इलाहाबाद के प्रति यह दर्द और संवेदना आनंद भारती का नहीं बल्कि प्रदीप सौरभ के साथ हर उस सर्जक मन का दर्द है जो रोजी रोटी की तलाश में इलाहाबाद से दूर पहुंच गया है। मैं खुद पिछले पच्चीस सालों से इलाहाबाद से दूर हूं और प्रदीप सौरभ की इस पीड़ा को समझ सकता हूं।
          कथानक के साथ ही अगर हम भाषा और शैली की बात करें तो मुन्नी मोबाइल अपने में एकदम अलग तरह का उपन्यास है।यह लीक से हट कर लिखा गया एक नया एक्स्पेरीमेण्ट कहा जा सकता है। इसे पढ़ते समय कभी आपको लगेगा कि हम किसी लेखक की डायरी का अंश पढ़ रहे हैं,कहीं लगेगा कि लेखक रिपोर्टिंग कर रहा है,भावुकता भरे क्षणों में आप इसे कविता के रूप में भी पायेंगे। और उपन्यास की शैली की यह विविधता स्वाभाविक भी है। क्योंकि प्रदीप सौरभ सबसे पहले कवि,फ़ोटोग्रैफ़र और पत्रकार हैं फ़िर उपन्यासकार। और उनका यह कवि,पत्रकार ,फ़ोटोग्रैफ़र और चित्रकार का रूप इस उपन्यास में हमें हर जगह परिलक्षित होता है।
                   कुल मिलाकर मैं  इतना दावे के साथ कहूंगा कि आपको भी अगर भारत के पिछले तीन दशकों के विकास के साथ ही भारतवर्ष में भगवा राजनीति और उसकी आड़ में जनता की भावनाओं,संवेदनाओं और अस्तित्व के साथ चल रहे खिलवाड़ को अगर नंगी सच्चाई के रूप में देखना है तो इस उपन्यास को एक बार जरूर पढ़ने की कोशिश करियेगा----आपको निराशा नहीं होगी।
                                         000000


प्रदीप सौरभ: 
पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में   सहायक संपादक।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक।कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार। फ़िलहाल हिन्दुस्तान दिल्ली के संपादकीय विभाग में कार्यरत

हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित
             

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सारी रात

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

रात रात भर
खदबदाते हैं विचार
अदहन की तरह
मेरा दिमाग बन जाता है
चूल्हे पर चढ़ी पतीली।

कितने कितने विचार
कैसे कैसे विचार
ढेर सारे विचार
अच्छे बुरे सुखद दुखद।

आसमान में उड़ती चिड़िया
बियाबान जंगलों की हरियाली
पेड़ों के बीच भागते हिरनों का झुण्ड
फ़ूल पत्तियां झरने
तपते रेगिस्तान में ऊंटों का काफ़िला
जंगल गांव कस्बे शहर।

तपती सड़कों पर तैरती तेज रफ़्तार
कंक्रीट के जंगल
झोपड़ पट्टियों के बीच
पतंग की डोर लूटते
अधनंगे बच्चे
स्लमडाग मिलेनियर
स्माइल पिंकी
शाहरूख अमिताभ बिपाशा।

अदहन बलकता है
भीतर की भाप जोर लगाती है
ऊपर की तश्तरी गिराने को
ढब ढब की आवाज।

मेरी सांस बन जाती है
लोहार की भट्ठी
दम घुटता है
सीने पर जम जाता है
शिलाखण्ड कोई टूटा हुआ
इतिहास के पन्नों से निकलकर।

खदबदाते विचार
आकार लेते हैं
दुःस्वप्न का

लम्बे लम्बे अंतहीन मैदान
युद्ध करती सेनाएं
योद्धाओं का कोलाहल
हाथियों की चिग्घाड़
घोड़ों की टाप
तलवारों की खनक
छपाक छपाक
कटकर गिरते नरमुंड।

अचानक सब कुछ थम जाता है
एक भयानक धमाके के साथ
आंखों के सामने रह जाता है
सिर्फ़ तेज धार बहता खून
जिस पर कोई नाम नहीं लिखा
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई
गोरा काला ताम्रवर्णी
न ही कोई निशान
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे का
वहां सिर्फ़ दिखता है
बहता हुआ खून
सुर्ख लाल
तेज धार बहता खून।
000
हेमन्त कुमार




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हंस रे निर्मोही हंस

मंगलवार, 30 मार्च 2010

हंसो शेखरू
हंसो सिद्धू
हंसो राजू
हंस रे जानी
हंस,हंस रे निर्मोही हंस।

हंसो कि बचपन भूलता जा रहा है हंसना
हंसो कि लड़कियां भूल रही हैं खिलखिलाना
हंसो कि दम तोड़ रहे हैं यौवन के अरमान
हंसो कि बोझ बन गया है बुढ़ापा
हंसो कि बढ़ रही है पागलों की तादाद
हत्यारों की संख्या में हो रहा है इजाफ़ा
हंसो कि गर्भ में मसल दिये जा रहे हैं भ्रूण
हंसो कि आबाद हो रही हैं नई नई बदनाम बस्तियां
हंसो कि शर्म ने रूप धारण कर लिया है बेहयाई का
हंसो कि संगीत को बेदखल कर दिया है शोर ने
हंसो कि अन्न उपजाने वाले खाने लगे हैं कीटनाशक
हंसो कि बेरूत में कत्ल किये गये बच्चे
हंसो कि कत्लगाह बना दिया गया ईराक को


जार जार रोने के समय में तुम हंसो
जरूर हंसो,इतना हंसो कि टूट जाएं
बेशर्मी की सारी हदें।
    0000


    कवि:शैलेन्द्र
    प्रभारी सपादक जनसत्ता
    कोलकाता संस्करण
    मोबाइल न09903146990
0 श्री शैलेन्द्र हिन्दी के सुपरिचित कवि एवम वरिष्ठ पत्रकार हैं। आपके अब तक तीन काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।कविताओं के साथ ही समय समय पर दिनमान,रविवार,श्रीवर्षा,हिन्दी परिवर्तन,जनसत्ता,कथादेश,पाखी, आदि पत्र पत्रिकाओं में समाचार कथायें,लेख,टिप्पणियां,कुछ कहानियों का प्रकाशन।पत्रकारिता में एक लंबी संघर्षमय यात्रा पूरी करके इस समय जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में प्रभारी संपादक पद पर कार्यारत हैं।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।

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गौरैया से----

शनिवार, 20 मार्च 2010

प्यारी गौरैया
क्यों रूठ गई हो तुम
हमसे
पिछले कुछ सालों से।

मेरा आंगन घर
और खपरैले पर फ़ैली
लौकी की बेल
सब बाट जोह रहे
तुम्हारी वापसी का।

तुम्हारी
चीं चीं चूं चुं से ही
हमारी सुबह होती थी
आंगन में तुम्हारे फ़ुदकने
के साथ ही तो
हम भी
शुरू करते थे धमाचौकड़ी।

प्यारी गौरैया
फ़िर क्यों रूठ गयी हो तुम
हमसे
पिछले कुछ सालों से।

याद होगा तुम्हें भी
हमारा बचपन
सबेरे जब मां आंगन में
बंसेहटी पर हमें
खाना खिलाने बैठती
कितना निडर होकर
तुम आ बैठती थी
बंसेहटी के पावे पर
मां चीखती
बड़ी ढीठ गौरैया।

कहिं तुम इसी से तो
नाराज नहीं हो गयी?

प्यारी गौरैया
सुना है आज
पूरी दुनिया भर में
तुम्हें मनाने
आंगन में वापस बुलाने
और
तुम्हारी प्रजाति बचाने
के लिये
गौरैया दिवस मना रहे हैं
सारे लोग
तुम्हें वापस बुलाने के
ढेरों उपाय और जतन
कर रहे हैं
दुनिया भर के लोग।

प्यारी गौरैया
एक बार ---
सिर्फ़ एक बार तुम
माफ़ कर दो
हम सभी को
लौट आओ फ़िर से हमारे
आंगन और खपरैलों पर
मैं तुम्हें कर रहा हूं आश्वस्त
अब नहीं कहेंगी मां तुम्हें कभी
ढीठ गौरैया
नहीं रंगेंगे पिताजी
तुम्हारे कोमल पंखों को
गुलाबी रंग से
नहीं डांटेगा
तुम्हें कोई भी
शैतान गौरैया कहकर।
बोलो
प्यारी गौरैया
तुम वापस आओगी न
फ़िर से
मेरे आंगन में?
0000
हेमन्त कुमार

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होलीनामा

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

 (कुछ व्यक्तिगत और कुछ आफ़ीशियल व्यस्तताओं के कारण मैं पिछले दो माह से ब्लाग पर अनुपस्थित था। मैनें सोचा कि होली के पावन पर्व पर ब्लाग पर फ़िर वापस हो लिया जाय। आज मैं अपने पिता श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी का एक व्यन्ग्य प्रकाशित कर रहा हूं। यह व्यन्ग्य लगभग चार दशक पहले साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ था। कल शाम जब मैनें पिता जी से फ़ोन पर इसे पुनः प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो उन्होंने 82 वर्ष की उम्र में भी जो ठहाका लगाया --वह उनकी जीवन के प्रति सकारात्मक सोच का सूचक है। होली की हार्दिक मंगलकामनाओं के साथ।)
                       होलीनामा


    सबसे पहले मैं अपने स्वर्गीय बाबा,दादा की वन्दना करता हूं। जिनकी बदौलत आज होलीनामा की ये चन्द सतरें लिखने के काबिल हुआ हूं। फ़िर अपने पिताश्री का स्मरण करता हूं जिन्होंने मरते वक्त वसीयत में मुझे कुछ चीजें सौंपते हुये कहा था—‘देख बेटे यह तो है एक डिबिया जिसमें पांच छोटी छोटी सूखी फ़लियां हैं,इन्हें हमारे जमाने में इलायची कहा जाता था। इन फ़लियों पर एक फ़ीका हरा छिलका होगा। जिसे उतार देने पर अन्दर काले रंग के छोटे छोटे कई दाने निकलेंगे। एक दाना एक आदमी को खाने के लिये दिया जा सकता है। अगर आदमी ज्यादा हों तो उसी के मुताबिक दाने के और भी कई टुकड़े किये जा सकते हैं। डिबिया में काले रंग की एक छोटी सी सूखी लकड़ी होगी।इसे लौंग कहते थे हमारे जमाने में। इसे जरा से पानी में घिस कर एक बूंद जबान पर
रख लो तो इलायची के दाने की तरह इससे भी मुंह का जायका बदल जाता है। जहां तक मुझे याद है मेरे बचपन तक यह चीज खास दूकानों पर परमिट से दो एक मिल जाया करती थी।
        मैं ताज्जुब से उनका चेहरा देखने लगा। यह इलायची नाम की फ़ली जिसके भीतर दाने निकलेंगे, या यह लौंग नाम की सूखी लकड़ी इन्हें लेकर मैं क्या करूंगा? तभी पिताश्री फ़िर बोले—‘बेटे,तुझे यह जान कर ताज्जुब होगा कि मेरे बाप यानि तेरे बाबा के जमाने तक होली का त्योहार हर साल आता था। फ़िर धीरे धीरे यह दो दो ,चार चार साल पर पड़ने लगा। अब तो जिन्दगी में यह सिर्फ़ एक बार आता है---शादी के बाद। शादी होने पर आदमी जब पहली बार अपनी ससुराल जाता है तो वहां होली का त्योहार मनाया जाता है। अगर आदमी की बीबी मर जाय और उसकी दूसरी शादी हो, तो उसे जिन्दगी में दूसरी बार भी होली का त्योहार देखने का मौका मिल सकता है। हां तो बेटे,मैं यह कह रहा था कि इस त्योहार के दिन नाश्ते वगैरह के बाद यह इलायची और लौंग
खाने खिलाने का रिवाज था। अब ये पांच इलायचियां इस लिये तुझे देकर जा रहा हूं कि एक इलायची तू अपनी शादी के बाद अपनी ससुराल ले जाना होली के लिये। दूसरी अपने छोटे भाई को दे देना। तेरे तीन बहनें हैं, उनकी भी शादियां होंगी। और तीन होलियां तुझे अपने घर पर मनानी होंगी अपने बहनोइयों के साथ। ये तीनों इलायचियां
उस समय काम आयेंगी।
            फ़िर उन्होंने बड़े जतन से तह किया हुआ एक कुर्तापायजामा निकालकर मुझे दिया और समझाया---बेटे,मेरे बाप के बाप अर्थात तेरे पड़ बाबा ने रूई के सूत का यह कुर्ता पायजामा सिलवाया था। इसे पहन कर होली खेलने का रिवाज है। इसे सम्हाल कर रख,आगे की पीढ़ियों को भी इसी से होली खेलनी होगी। उन दिनों खेतों में कपा नाम का एक पौधा होता था। उसमें रूई के फ़ूल खिलते थे। उसी के धागों से यह कपड़ा
बनता था।
        पिताश्री के बेहद कष्ट में होने के बावजूद मैं हंस पड़ा। कैसे जंगली लोग थे उन दिनों के---कि खेतों में कपड़ों के बीज बोते थे।
         पर उन्होंने मेरी हंसी पर कोई ध्यान दिये बिना उस सुनहली डिबिया पर बड़े प्यार से उंगलियां फ़िराते हुये कहा---बेटे,अब यह इलायची और लौंग एक नायाब चीज है।मोहल्ले में क्या,पूरे शहर में यह किसी और के पास नहीं है। इसी तरह यह कुर्ता पायजामा भी सिर्फ़ मेरे ही पास है। इन्हें म्युजियम में रखने के लिये सरकार ने कई बार मुझे मुंह मांगी कीमत देनी चाही पर मैंनें स्वीकार नहीं किया। इससे पहले मेरे बाप बेवकूफ़ी कर चुके थे। तब चमड़े के जूते होते थे,जिनका वजन 100 ग्राम से लेकर कभी कभी तीन चार सौ ग्राम तक होता था। वे उन्होंने सस्ते में सरकार को दे दिये। आज होते तो उनकी कीमत लाखों में होती। मैंने वह गलती नहीं की और न तू वैसी गलती
करना।
     मेरे पिताश्री चले गये।पांचों इलायचियां ,लौंग और वह कुर्ता पायजामा मेरे पास रह गये। जब मेरी शादी हुयी और मुझे पहली बार ससुराल जाना हुआ तब स्वर्गीय पिताश्री से मिली चीजों की याद आई। मैंने सेफ़ में बड़े जतन से रखी डिबिया में से एक इलायची निकाली और वह सूत का कुर्ता पायजामा भी रख लिया। मैंने इम्पोर्टेड पोलीथिन का एक कीमती सूट पहना हुआ था और वैसे ही कई सूट मेरी अटैची में भी थे।उनके आगे यह कुर्ता पायजामा बड़ा अजीब सा लग रहा था। पर जैसा कि मैंने पिताश्री के मुंह से सुना था कि होली के त्योहार पर पानी में रंग घोल कर कपड़ों पर डाला जाता है,यह कुर्ता पायजामा उस मौके के लिये जरूर काम का था। पालीथिन पर तो पानी या रंग चढ़ता ही नहीं था।
        कहते हैं शोहरत के पांव आदमी से तेज होते हैं। सो मेरी ससुराल में वह मुझसे पहले जा पहुंची।पहुंचते ही ससुर जी ने फ़रमाया---जमाई साहब हमें मालूम हो चुका था कि आप कुछ दुर्लभ चीजें लेकर पधार रहे हैं। इसी लिये हमने सारे मोहल्ले वालों को देखने की दावत दे दी है।
         मैंने देखा---एक दर्जन साले सालियों के पीछे श्रीमती जी की नीली झील जैसी आंखें बड़ी बेताबी से मेरा जवाब पाने का इन्तजार कर रही थीं। मैं समझ गया कि यह शुभ समाचार उन्होंने ही अपने मैके वालों को दिया होगा कि मैं चन्द नायाब चीजें लेकर होली मनाने आऊंगा। जैसे ही मैंने ससुर साहब की बात का अनुमोदन किया घर भर की बांछें खिल गयीं। साले सालियां मुहल्ले भर को यह खुशखबरी देने दौड़ पड़े कि जीजा जी सचमुच अलादीन का जादुई चिराग लेकर आये हैं। अब वह चीज क्या है,यह तो शायद खुद मेरी श्रीमती जी को ही ठीक से मालूम नहीं था,उन बेचारों को क्या पता?
            घर में होली की जबर्दस्त तैयारियां थीं। मेरी तरह उनके यहां भी कम से कम मेरी उमर वालों को तो यह पहली होली देखना मयस्सर हो रहा था। सुबह से ही यह धो वह पोंछ,यह बिछा वह सजा का आलम था।तय यह हुआ कि पहले रंग खेल लिया जाय फ़िर खाना खाया जाय। जब मैनें हिफ़ाजत से रखा हुआ अपना सूती कुर्ता पायजामा निकाला तो लोग देखते ही रह गये। सैकड़ों जोड़ा निगाहें उस वक्त उन कपड़ों को निकालने से लेकर पहनने तक की सारी क्रिया बड़ी उत्सुकता से देख रही थीं। मैंने किस तरह कुर्ते में अपनी बाहें डालीं,कैसे उसके बटन लगाये,कैसे पायजामे की मोहरियों में पैर डाले और फ़िर इजारबन्द कसा, सारी बातें उन्हें बड़ी अलौकिक लग रही थीं। कोई मशीन की बखियों को छू रहा था तो कोई बटन काज छू कर देख रहा था। उस जमाने
के दर्जी की अक्ल के बारे में तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं।
           ईश्वर मेरे पिताश्री को स्वर्ग में जगह दे,उन्होंने सचमुच मुझे एक ऐसी चीज दी थी जिसे लोग अब सिर्फ़ किसी संग्रहालय में ही देख सकते थे। कपड़े पहन कर मैं खड़ा हुआ तो ससुर साहब ने मोहल्ले वालों को बड़े गर्व से देखा।उनकी निगाहें जैसे कहना चाहती थीं---देखा,मैंने तुम्हें गलत खबर नहीं दी थी।
            मैंने ससुर जी से निवेदन किया—“अब मैं होली खेलने के लिये तैयार हूं।"मगर यह क्या ! मेरे मुंह से इतना निकलना था कि सभी के चेहरे फ़ीके पड़ गये। आंखों पर जो नूर चमक रहा था,उसकी जगह मातम छा गया। हे ईश्वर मैं समझ नहीं पाया कि मुझसे क्या कसूर हो गया है?तभी ससुर जी रुआंसे होकर बोले---लेकिन जमाई जी,इन कपड़ों को पहन कर आप होली खेलेंगे तो हम लुट जायेंगे।
              मैं ससुर जी की बात बिल्कुल नहीं समझ पाया। मेरे इन कपड़ों के पहन कर होली खेलने से वह कैसे लुट जायेंगे। पर वह बराबर आग्रह करते रहे कि मैं उन कपड़ों को उतार कर रख दूं। उन्होंने मेरे और घर के सभी लोगों के लिये होली खेलने के कपड़े सिलवाये थे।वो चाहते थे कि वे ही इस्तेमाल हों। मैंने उन्हें पिताश्री की बात बताई----सूती कपड़े पहन कर होली खेलने का रिवाज था हमारे यहां।
           तो बरखुरदार,कौन तुम्हें यहां कहता है कि सूती कपड़ों में मत होली खेलो।ससुर जी बोले।लाचार मैंने गिरे हुये मन से अपना कुर्ता पायजामा उसी तरह तह करके रख दिया और अपना मशीन में ढला हुआ पालीथिन का सूट पहन लिया।
           फ़िर मेरे पिताश्री की ही तरह मेरे ससुर जी ने भी मेरे सामने एक डिबिया खोली---उसमें मेरे लिये नया सिला हुआ कुर्ता और पायजामा रखा था। उसे निकाल कर उन्होंने मेरी हथेली के बीच में रख दिया। उनकी लम्बाई चौड़ाई करीबन सात आठ से0मी0थी। इसी तरह दूसरों के भी कपड़े थे।वह बोले—‘अब कपड़े सीने वाले दर्जी तो रहे
 नहीं।पूरे शहर में मुश्किल से एक स्पेशलिस्ट बचा है। वह मनमानी सिलाई चार्ज करता है। अब चूंकि किताबों में लिखा है कि होली सूती कपड़ों में खेली जाती है,इसीलिये सिलवाने पड़े। मेरा तो दिवाला निकल गया।
            हम लोग अपनी अपनी हथेलियों पर अपने कुर्ते पायजामे या साड़ी ब्लाउज लेकर उस बड़े कमरे में पहुंचे जहां होली खेलने की व्यवस्था थी। कमरे में एक ओर मेज के गिर्द औरतें खड़ी थीं और दूसरी ओर मर्द।मैं दूसरी ओर मर्दों की जमात में पहुंचा।देखा मेज पर एक कटोरी में रंग घुला हुआ था और रंग खेलने के लिये पन्द्रह बीस आई ड्रापर पड़े हुये थे। दूसरी मेज पर भी वैसा ही इन्तजाम था। अब ससुर जी की बात समझ
में आई कि मैं अपना कुर्ता पायजामा पहन कर रंग खेलता तो वह कैसे लुट जाते।
            अब समां यह था कि लोग ड्रापर में दो दो बूंद रंग भर कर एक दूसरे के पीछे भाग रहे थे। हरेक अपने नये सिले कपड़ों को रंग से बचाने के चक्कर में था। यह अच्छी खासी धमाचौकड़ी तब तक चलती रही,जब तक हरेक के कपड़ों पर दो चार बूंद रंग नहीं पड़ गया। मुझे भी बड़ी खुशी हुयी कि मैंने और मेरे समवयस्कों ने  आज रंग खेल कर मनाया जाने वाला होली का त्योहार देखा।
      उसके बाद हम लोग खाने की मेज पर पहुंचे। लोग किसी चीज को पढ़ने में जुटे हुये थे।मुझे बताया गया कि वह आज के खाने का मीनू है। मैंने देखा वह मीनू कम एक अलबम ज्यादा था। उसमें गुझिया,समोसे,पेड़े,पापड़ से लेकर आलू गोभी की सब्जी,टमाटर का सास,मटर पनीर ,कटहल के कोफ़्ते और खस्ते,कचौरियों तथा सादी पूरियों तक की रंग बिरंगी तस्वीरें थीं।
       हमारे सामने कटोरियों में गरम पानी परोस दिया गया। इसके बाद अपनी अपनी खाने की पसन्द थी।जिसे जो चीज पसन्द हो उसके कैप्सूल अलग अलग प्लेटों में रखे थे। मुझे बचपन से ही मीठा बहुत ही पसन्द है।इसीलिये मीठे की सचित्र सूची देखकर मैंने गुझिया और गाजर के हलवे का एक एक कैप्सूल निकाला और अपनी कटोरी में डाल लिया। नमकीन का जायका लेने के लिये खस्ता कचौरी,पापड़ और मटर पनीर का भी एक एक कैप्सूल ले लिया। चीजों की महक बड़ी प्यारी थी। अपने बाबा दादाओं के भाग्य पर ईर्ष्या होने लगी,जिन्हें मूल वस्तुओं के खाने का सुख मिला था। जल्द ही पेट भर जाने से मुझे डकारें आने लगीं और मैं भोजन खत्म करके सबके साथ उठ खड़ा हुआ।
      अब मैं ड्राइंग रूम में था और सारा परिवार मेरे चारों ओर। वह क्षण बेहद करीब था,जिसके लिये उनके दिल बेकरार थे। मैंने सम्हाल कर एक छोटी चमकती डिबिया में से इलायची नाम की वह वस्तु निकाली जो मुझे अपने स्वर्गीय पिताश्री से मिली थी। हरेक ने उसे अपनी हथेली पर रख कर अच्छी तरह घुमा घुमा कर देखा। जैसा किसी जमाने में लोगों ने चन्द्रलोक से आये हुये चट्टानों के टुकड़ों को पहली बार देखा होगा। जैसा कि मेरे पिताश्री ने बताया था,मैंने धीरे धीरे उस पर से हरा छिलका उतारा अन्दर से काले मगर खुशबूदार दाने बाहर निकल आये।मैंने अन्दाजा लगाया कि हरेक को एक एक दाना दिया जा सकता है। मगर तभी ससुर साहब ने फ़रमायाजमाई साहब ,हमें गर्व है कि ईश्वर ने आपको ऐसी नायाब चीज दी है।देखो मेरे और भी बेटे बेटियां हैं।उनको भी होलियां मनानी पड़ेंगी। क्या आप इन दानों में से कुछ मुझे नहीं दे सकते?
            कहना न होगा कि आधे दाने बड़ी सफ़ाई से मेरे ससुर साहब ने हथिया लिये। फ़िर मैंने अपने पिताश्री का बताया फ़ार्मूला अपनाया। बचे हुये दानों के टुकड़े किये और हरेक को बांट दिये।
             इस तरह जिन्दगी में पहली बार होली मनाकर मैं अपनी श्रीमती जी के साथ घर वापस हुआ। सब कुछ ठीक है। लेकिन अब मुझे अपनी श्रीमती जी की सेहत का अधिक ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि ईश्वर न करे उन्हें कहीं कुछ हो गया और दोस्तों रिश्तेदारों के दबाव में आकर ही मुझे दूसरा ब्याह रचाना पड़ा तो मैं अपनी दूसरी होली मनाने के लिये अब दूसरी इलायची कहां से लाऊंगा?
            अब मैं चाहता हूं कि मेरा यह होलीनामा किसी ऐसे मजबूत टाइम कैप्सूल में रखकर दिल्ली में कहीं गाड़ दिया जाय। ताकि भविष्य की पीढ़ी को भी यह मालूम हो कि कभी होली जैसा कोई त्योहार मनाया जाता था।
                       0000000
प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
      ( इस व्यन्ग्य के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं। आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है।  1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 82 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
  हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।              

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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