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जेठ की दुपहरी

मंगलवार, 15 जून 2010

जेठ की तपती दुपहरी
आग जो बरसा रही
बर्फ़ की चादर लपेटे
ठंढ भी शरमा रही ।

स्याह लावा हर सड़क पर
बस पिघलता जा रहा
चीख प्यासे पाखियों की
दिल को अब दहला रही ।

दूर तक दरकी है धरती
घाव बस सहला रही
सोत पानी का दिखा कर
आंख को भरमा रही।

हर नदी अब भाप बन कर
धुंध में मिल जा रही
तलहटी की रेत भी अब
भय से बस थर्रा रही ।
0000
हेमन्त कुमार

24 टिप्पणियाँ:

Unknown 15 जून 2010 को 9:14 am  

जेठ की दुपहरी में त्रस्त जीवन का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती बेहतरीन कविता..

Jandunia 15 जून 2010 को 9:21 am  

बहुत सुंदर रचना, हेमंत जी इस रचना के लिए साधुवाद

kshama 15 जून 2010 को 9:28 am  

Qudrat ne hame kitna khazana diya tha/hai...hame istemal karna nahi aaya..lootte gaye..panchhee aur dharti ki pyas,donon ka bakhubi chitran hai..

दिलीप 15 जून 2010 को 9:30 am  

waah bahut hi sundar rachna..kahin dar kar hi baarish na ho jaaye...

Unknown 15 जून 2010 को 9:46 am  

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

Renu goel 15 जून 2010 को 10:25 am  

जेठ की दोपहर है ...घर से निकलो मगर ज़रा संभल कर ...

Dev K Jha 15 जून 2010 को 1:05 pm  

बहुत सुन्दर कविता लिखी है भाई... निगेटिव लगी बस थोडी..

Dev K Jha 15 जून 2010 को 1:06 pm  

बाकी अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है. बधाई.

रश्मि प्रभा... 15 जून 2010 को 6:17 pm  

ek sahi chitran....chilchilati dhoop dikh jati hai

दिगम्बर नासवा 16 जून 2010 को 12:05 am  

दूर तक दरकी है धरती
घाव बस सहला रही
सोत पानी का दिखा कर
आंख को भरमा रही।

धूप का नज़ारा सामने आ गया .... बहुत लाजवाब लिखा है ...

Alpana Verma 16 जून 2010 को 1:45 pm  

दूर तक दरकी है धरती
घाव बस सहला रही
सोत पानी का दिखा कर
आंख को भरमा रही।
सच! बिलकुल सही स्थिति का चित्रण कर दिया इस कविता में .
गर्मी की मार धरती पर ऐसे ही सितम कर रही है..कि-
हर नदी अब भाप बन कर
धुंध में मिल जा रही
तलहटी की रेत भी अब
भय से बस थर्रा रही ।

बहुत ही अच्छी कविता जेठ के मौसम पर लिखी है.
बधाई .

सुशीला पुरी 16 जून 2010 को 11:21 pm  

इस तपती गर्मी का आपने सजीव चित्रण किया है ......,व्यंजना भी जबर्दस्त है ।

pragya 19 जून 2010 को 5:22 am  

बिल्कुल सही चित्रण..यही हालत है आजकल धरती की..

hem pandey 20 जून 2010 को 9:41 am  

कठोर ग्रीष्म का सुन्दर वर्णन.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 22 जून 2010 को 9:30 am  

आपकी सुन्दर पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है!
--
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/06/3.html

Akshitaa (Pakhi) 23 जून 2010 को 10:49 pm  

बहुत सही लिखा आपने अंकल जी...सच्चाई है.
_____________________
'पाखी की दुनिया' में 'पाखी का लैपटॉप' देखने जरुर आइयेगा.

माधव( Madhav) 26 जून 2010 को 2:41 am  

बहुत सुन्दर बहुत सुन्दर

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World 14 जुलाई 2010 को 1:47 am  

बेहतरीन बाल-कविता...बधाई.
_________________________
अब ''बाल-दुनिया'' पर भी बच्चों की बातें, बच्चों के बनाये चित्र और रचनाएँ, उनके ब्लॉगों की बातें , बाल-मन को सहेजती बड़ों की रचनाएँ और भी बहुत कुछ....आपकी भी रचनाओं का स्वागत है.

पूनम श्रीवास्तव 22 जुलाई 2010 को 11:51 pm  

jeth ki dupahari, bahut hi sahi prastutikaran.
bahut achchi lagi kavita.

sandhyagupta 26 जुलाई 2010 को 10:35 am  

समय से वार्तालाप करती इस सुन्दर रचना के लिए बधाई.

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