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कैंसर-दर-कैंसर(लघुकथा)

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

               

पिछले चार दिनों से भगेलू वार्ड के बाहरी बरामदे के एक कोने में पड़ा छटपटा रहा था।बीच बीच में वह दर्द बर्दाश्त से बाहर हो जाने पर भयानक रूप से चीख पड़ता।उसकी बड़ी बेटी भी पिछले चार दिनों से अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए दिन रात भागदौड़ कर रही थी।लेकिन डाक्टरों की हड़ताल की वजह से अस्पताल के सारे काम काज ठप।न मरीजों की भर्ती न कोई पुरसा हाल।उसकी लड़की कैंसर से जूझ रहे अपने बाप को अस्पताल में भर्ती करवाने आई थी।लेकिन डाक्टरों की हड़ताल ..... ।
  लड़की भागदौड़ से पस्त होकर बरामदे में निढाल बैठी थी।अन्धेरा भी हो चला था।भगेलू ने बड़ी दयनीय और मरी सी आवाज में उससे डाक्टरों की हड़ताल के लिए पूछा ...पर लड़की  क्या जवाब देती ..बस उसने भगेलू से अपने आंसू छुपाने के लिए मुंह दूसरी ओर घुमा लिया।इसी बीच भगेलू फिर दर्द से चीख पड़ा।लड़की रोती हुयी उसका सर सहलाने लगी।
     इसी बीच एक वार्ड ब्वाय वहां आकर दोनों की तरफ देखने लगा।लड़की की निगाहें जैसे ही उसकी और गयीं वह दोनों के और करीब आ गया।शायद वो बात करने का बहाना ढूँढ़ रहा था।
  “क्या दादा को तकलीफ ज्यादा है क्या?”वार्ड ब्वाय ने पूछा।
“भैया ----”लड़की के आगे के शब्द रुलाई में दब गए।
“क्या बतायें..ई डाक्टरों की हड़ताल को...लेकिन घबराओ हम बात करेंगे एक डाक्टर साहेब से।”वार्ड ब्वाय ने उसे सांत्वना दी।
“भैया क्या आप किसी डाक्टर को जानते हैं क्या?” लड़की ने पूछा।
“हम इसी अस्पताल के बड़े डाक्टर साहब को जानते हैं और उन्हें दिखा भी देंगे लेकिन.....” कहते हुए वार्ड ब्वाय बहुत कुटिलता से मुस्कराया।
“लेकिन....लेकिन क्या भैया ...मैं बापू को दिखाने के लिए जितना रुपया कहोगी दे दूंगी...”
“मुझे रुपया पैसा नहीं चाहिए भाई...बस ज़रा ..थोड़ी देर के लिए मेरे साथ अस्पताल के एक कमरे में चलना होगा तुम्हें ....”कहते हुए वार्ड ब्वाय ने लड़की के उभारों पर एक बींधती हुई निगाह डाली और हौले से मुस्कराया।
लड़की युवा थी ...उसकी निगाहों का अर्थ समझ गयी उसका चेहरा तमतमा गया।लड़की के हाथ की मुट्ठियाँ भी क्रोध से भींच गयीं।
उसका यह रूप देख कर वार्ड ब्वाय थोड़ा घबराया,“नहीं कोई जबरदस्ती नहीं...मैंने तो सोचा भाई कि तुम लोगों की तकलीफ कुछ कम हो जाय...तुम अपने बाप को ऐसे ही तड़पा कर मारना चाहती हो तो...ठीक है मैं चला...”कहकर वार्ड ब्वाय वहां से चलने को हुआ।
लड़की संज्ञाशून्य हो कर अपने बाप को देख रही थी...कभी उसकी निगाह उस वार्ड ब्वाय पर जाती कभी तड़प रहे बाप पर।तभी उसका पिता फिर दर्द से चीख पडा।उसकी दर्द भरी चीख से आहत लड़की ने बस एक सेकण्ड में निर्णय कर लिया।उसने झट अपने आंसू पोंछे और बाप का सर एक बार सहला कर वार्ड ब्वाय के साथ अस्पताल की भीड़ में खो गयी।
    लगभग आधे घंटे बाद लड़की अस्त व्यस्त सी बहुत धीरे धीरे चलते हुए पिता की ओर बढ़ रही थी।वार्ड ब्वाय ने उसे समझाया था कि वो दस मिनट में स्ट्रेचर का इंतजाम करके आ रहा है।फिर डाक्टर के पास उसके पिता को ले चलेगा। लड़की बाप के पास पहुंची तो कई  लोग वहां इकट्ठे होकर उसे देख रहे थे।पिता के बंद होठों से खून रिस रहा था उसकी आँखें फटी फटी सी आसमान देख रही थीं।शायद वो कैंसर के दर्द की आखिरी सीमा से मुक्त हो गया था।लड़की के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली वो धम्म से पिता की लाश के बगल में बैठ गयी।
                                   ०००००
डा० हेमन्त कुमार

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कहानी -- मुंशी जी

मंगलवार, 30 जुलाई 2019


(कल 31जुलाई को मेरे स्व०पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तीसरी पुण्य तिथि है।इस अवसर पर पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी एक कहानी “मुंशी जी”।यह कहानी पिता जी ने संभवतः सन 2014 में लिखी थी।यह कहानी पिता जी के पैतृक गाँव खरौना के किसी मुंशी जी की कहानी है या उनके किसी दूसरे शिक्षक की कहानी—यह बात तय कर पाना थोडा मुश्किल है।लेकिन इतना जरुर है की आज जो भी युवा अध्यापन से जुड़ रहे हैं चाहे वो प्राथमिक स्तर पर या उच्च शिक्षा में---उनके लिए ये कहानी निश्चित ही एक प्रेरणा देने वाली कहानी है।युवा शिक्षकों को मुंशी जी के चरित्र से प्रेरणा लेनी चाहिए।–-डा0हेमन्त कुमार)

कहानी
मुंशी जी


                                                                                                                                         प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

              गाँव के दक्खिन एक ऊसर भूमि पर मुंशी राम दयाल की पाठशाला थी।पास की बंसवाड़ी से झरती पत्तियाँ पाठशाला में भर जातीं। मुंशी जी के पहुँचने से पहले ही बच्चे अरहर की झाड़ू से उसे साफ कर डालते।उससे उठती धूल गाँव वालों को बता देती कि बच्चे पहुँच गये हैं, मुंशी जी अब पहुँचने ही वाले हैं। महुअरिया से लगे हुए दूर दूर तक फैले पीले पके धान के खेत।इनके बीच से गुजरती पगडंडी पर जब मुंशी जी आते दिखायी पड़ते बच्चों का शोरगुल एकदम थम जाता।
जब ऊपर तक खुँटियाई धोती पर गाढ़े का कुरता पहने, आँखों पर तागे से जोड़ी पीतल की कमानी वाली ऐनक चढ़ाये, दोनों हाथों में थमी नारियल की गुड़गुड़ी से धुँए के कश खींचते मुंशी जी के पाठशाला में प्रवेश करते ही सभी शरारती बच्चे विनम्रता की मूर्ति बन खड़े हो जाते। इस तरह वे अपने मुंशी जी के प्रति आदर प्रकट करते।उनके आसन ग्रहण कर लेने के बाद ही सब अपनी जगह बैठते।कुछ पढ़ाना शुरू करने से पहले ऐनक के पीछे से मुंशी जी की आँखें एक बार सभी बच्चों को अवश्य झाँक लेतीं।
मुंशी जी की पाठशाला को कहीं बाहर से कोई सहायता नहीं मिलती थी।फिर भी उन्होंने जिन्दगी में कभी निराशा या गिरावट का अनुभव नहीं किया।साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में कब रविवार आता है, कब दशहरा दिवाली पड़ते हैं, वे नहीं जानते थे।पर्वों पर भी बच्चे आयें या न आयें, मुंशी जी अपनी ऐनक संभालते अक्सर  अपने निर्वाण पद प्राप्त आसन पर जमे दिखायी पड़ते।कोई छात्र कई दिन न दिखायी पड़ता तो उसका हालचाल लेने उसके घर जरूर पहुँच जाते।अभिभावकों के हृदय में भी समय की मार से असमय वृ़द्ध हो चले उस व्यक्ति के प्रति कुछ ऐसा लगाव था कि वे अपने बच्चे तो पाठशाला भेजते ही, उसकी झोली भी अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुरूप भर देते।
मुंशी जी एक तार थे जो किसी न किसी रूप में हर किसी के दिल में बजते रहते थे।
   उस दिन माघ महीने की सारी ठंड जैसे उस गाँव में ही समाने का प्रयास कर रही थी।मुंशी जी ने भाप से धुंधले पड़ गये अपनी ऐनक के शीशों को धोती की खूँट से पोंछ कर आँखें आसमान पर उठायीं।बादलों के सफेद भूरे फाहे तह बना रहे थे।दाँत कटकटाती हवा शरीर बेध रही थी।पानी गिरने के आसार थे।मुंशी जी ने एक लम्बी साँस ली।आज पाठशाला जमने के लक्षण न थे।गुड़ की चाय पी कर जो एक गर्मी उनके शरीर में आ गई थी वह इस विचार के आते ही शीतलहर बन गई।सामान्य व्यक्ति उस दशा में  घर से बाहर निकलने की कल्पना तक न करता।किन्तु मुंशी जी असामान्य व्यक्ति थे।उन्होंने कमला को आवाज दी -बेटी, खिचड़ी तैयार हो गई हो तो परोस दे।
मगर भीतर तो अभी चूल्हा तक नहीं जला था।उनकी पत्नी ने  हैरत से पूछा -क्या पाठशाला ऐसे मौसम में भी खुलेगी ?
क्या ? यह सुन कर मुंशी जी को पत्नी से भी ज्यादा हैरत हुई।
ठीक है।लगता है कि पैर अब ठीक से फैलने लगे हैं।रात भर मालिश करवाओ, सिंकवाओ और अब ठंड में निकलने की बात करो।मरना तो मुझे होता है। पत्नी ने कुछ झल्लाहट से कहा।तब अकस्मात मुंशी जी को एहसास हुआ कि वे तो गठिया के मरीज हैं।अभी पिछली पूरी रात उन्होंने कितने दर्द और बेचैनी से बितायी थी।
कई मिनटों तक मुंशी जी छप्पर वाले ओसारे की एक थून का सहारा लिए खड़े रहे।उनके भीतर एक भयानक कोलाहल उत्पन्न हो गया था।जीवन का जो व्रत कभी भंग नहीं हुआ क्या उसकी कड़ी आज टूट कर रहेगी ? यह व्रत कैसा और तपस्या क्यों ? कौन सी सिद्धि प्राप्त होने वाली है इससे उन्हें ?
केवल कुछ वर्षों का समय बीतते ही कमला विवाह के योग्य हो जायगी।उसके हाथ पीले करने के लिए उन्होंने अब तक किस पूँजी का संचय किया था? क्या यह सहस्त्र छिद्रों वाला आवास बेच कर भी वे अपने एक सब से बड़े उत्तरदायित्व को निबाह सकेंगे? उन्होंने रात को रात और दिन को दिन नहीं समझा।माघ पूस की ठारी भी जर्जर वस्त्रों में काट दी।कभी यह भी नहीं देखा कि भोजन की थाली में साग है तो नमक नहीं, रोटी है तो दाल नहीं।जीवन का सारा विष वे शंकर की तरह पचाते  चले गये। मगर अबोध बेटी और रोग जर्जर पत्नी-इन दो निरीह प्राणियों को उन्होंने क्या दिया ? पत्नी आज भी पैबंद लगी धोती में अपने नारीत्व की मर्यादा छिपाये घर में पड़ी रहती है।बेटी के लिये एक छँटाक दूध की कौन कहे, कभी ढंग से रोटियाँ भी वे न उपलब्ध कर सके।बेटे को दूध के नाम पर आटे का घोल पिलाने वाले आचार्य द्रोण की तो सारी व्यथा उस दिन दूर हो गई जब वे राजगुरू बनाये गए। मगर कहाँ से आते मुंशी रामदयाल के लिए राजकुमार।
मगर जब मुंशी जी ने पाठशाला शुरू की थी तब सारी बातों का स्वरूप कुछ और ही था।उनकी पनीली आंखों के आगे आज भी वे दिन जीवन्त हो उठते हैं।उन्होंने कैसे गाँव के जमींदार से चिरौरी विनती कर के दस हाथ ऊसर भूमि पाठशाला के लिये प्राप्त की थी।पिता ने उन्हें सनकी कहा था और गाँव के लोगों ने जी भर  खिल्ली उड़ायी थी।मगर अपमान और उपेक्षा की सारी कड़वी घूटों को पी कर उस सनकी युवक राम दयाल ने अकेले ही गाँव के ताल की मिट्टी से पाठशाला की दीवारें खड़ी करनी शुरू कर दी।जिस दिन एक कमरे की आधी दीवार गर्व से सीना ताने ऊपर उभर आयी थी, गाँव वालों ने अनुभव किया था, वह मिट्टी भर नहीं है।उसके एक एक कण में श्रम और लगन की झंकार भी निहित है।तब उन्हें पागल कहने वालों ने ही उनके कार्य को हाथों हाथ ले लिया था।महीने भर के भीतर नई खपरैलों का ताज सिर पर लगाये पाठशाला की सफेद पुती दीवारें दूधिया चाँदनी में श्वेत संगमर्मर निर्मित विद्या मंदिर बन गई थीं।पहले दिन जब गाँव के पाँच सात बच्चे वहाँ पढ़ने के लिए आये, उन्होंने कितने उल्लास से अपने घर का बना नया गुड़ सब को खिलाया था।
किन्तु उत्साह का जो स्थायी रूप मुंशी राम दयाल के हृदय में था, गाँव वाले उससे वंचित थे।पाठशाला  कुछ सालों तक अपनी इन्द्रधनुषी आभा के साथ खूब चमकती रही।भीतर जगह भर गई तो बच्चे बाहर खुले में बैठ कर पढ़ते थे।फिर धीरे धीरे लोगों के मन में इस ओर से एक उदासीनता सी पैदा हो चली।मुंशी जी उसका कारण जानते थे।लोगों का जीवन इतना संघर्षमय और जटिल हो चला कि जीवन के सारे ओज और उमंग, तीज और त्योहारों का उल्लास न जाने किस दानवी के पेट में समाने लगे।जीवन की सारी स्वाभाविक मधुरता पर जैसे किसी ने कृत्रिमता का काला पेंट पोत दिया।इंसान हाड़ मांस न हो, एक मशीन भर हो चला।अब लोगों के पास इतना वक्त न था कि वे पाठशाला की ओर ध्यान देते।फिर भी मुंशी जी ढीले न पड़े।जब हवा और पानी की मार से दीवारें जर्जर होने लगीं, मुंशी जी ने अकेले ही उनकी मरम्मत करने की कोशिश की।परन्तु अब वह पहले वाला शरीर न था। वह जवानी की उमंग और मजबूत हड्डियाँ स्वप्न पट के चित्र भर रह गई थीं।
इतने पर भी उनका पढ़ाने जाने का क्रम एक दिन के लिए भी नहीं टूटा।जो कुछ उनके मस्तिष्क में था उसे बच्चों को देने में कभी कृपणता नहीं की।उन्हें प्रसन्नता थी कि उनके पढ़ाये कुछ बच्चे ऊँचे ऊँचे पदों पर कार्य कर रहे थे।जब वे गाँव आते और अपने इस आदि गुरू के चरणों का स्पर्श करते, मुंशी जी अपनी सारी व्यथा भूल जाते।
मुंशी जी ने थोड़ा झिटक कर अपनी दोनों बाहें फैलायीं।ठंड से वे कुछ अकड़ चली थीं।खड़े रहने के कारण घुटनों में दर्द होने लगा था।अच्छा हो कि आज आराम कर लिया जाय।जीवन भर तो उसी आग में झुलसा, एक दिन नहीं ही सही।यह सोच वे भीतर जाने के लिए मुड़ने को थे कि याद हो आया -- लछमन वजीफे की परीक्षा में बैठने वाला है।आज वह अवश्य आया होगा।गणित के जरूरी सवाल जो समझने हैं उसे।लछमन ही नहीं, गोविन्द, महेश, धनकू को भी तो इसी महीने शहर के अंग्रेजी स्कूल में भरती होना है।उन लोगों के लिए तो एक एक दिन कीमती है।नहीं -- अब वे घर पर नहीं रूकेंगे।
कमला! उन्हों ने ऐसे पुकार कर कहा जैसे उनके भीतर कहीं यकायक सौ पावर का बल्ब जल गया हो। मैं पाठशाला जा रहा हूँ।बन जाने पर मेरा खाना थाली में ढँक कर रख देना। लौट कर खाऊँगा। फिर किसी भी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उन्होंने अपनी सूती चादर कंधे और सीने के चारों ओर लपेटी और बाहर निकल गए।
पीछे दरवाजे की चौखट से झाँकती चार आँखों में कितनी अकुलाहट थी, मुंशी जी ने मुड़ कर इसे भी न देखा।
पाठशाला में एक भी छात्र नहीं आया था।मगर मुंशी रामदयाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।उन्होंने लछमन के घर पहुँच कर वहीं महेश धनकू और गोविन्द को भी बुलवा लिया।बच्चों के लिए यह चौंकाने वाली बात नहीं थी।क्योंकि उनके लिए यह कुछ भी नया नहीं था।उनका यह स्वभाव बच्चों में हमेशा से एक अनिर्वचनीय पुलक भरता आया था।
उस रात मुंशी रामदयाल को बड़ा तेज ज्वर चढ़ आया।पैर की नसें बुरी तरह सूज आयी।चारपाई पर हिलना डुलना तक मुश्किल हो गया।दो हफ्ते रोग से लड़ने के बाद वे चलने फिरने के योग्य हुए।
आगे के कुछ सालों में गाँव में बड़े बदलाव आये।देश में पुनरूत्थान और जागृति की जो बयार बही उसके स्पर्श से वह गाँव भी अछूता नहीं रहा।पास के कस्बे में प्लास्टिक का एक कारखाना खुल गया। गाँव के काफी लोगों को उसमें रोजगार मिल गया।कारखाने की तरफ से गाँव के बगल एक स्कूल भी खुल गया।स्कूल की सुन्दर पक्की इमारत थी।योग्य और अनुभवी अध्यापक थे।वहाँ पढ़ने वाले बच्चों  की फीस माफ थी।जो गरीब थे उन्हें वजीफा मिलता था।गाँव के भाग्य खुल गये।
मुंशी रामदयाल की पाठशाला अब सूनी हो गई थी।जब तक पौरूष चला मुंशी जी अपने लंगड़े आसन पर बैठे दिखायी पड़ते रहे।आँखों पर वही ऐनक तथा हाथों में वही पुरानी गुड़गुड़ी रहती।उनका चेहरा अवश्य पहले से काफी बदल गया था।आँखों की रोशनी थक चली थी।चेहरे की झुर्रियाँ जीवन के सतत संघर्षों की दास्तान बन कर नीचे लटक आयी थीं।उनकी आँखों के आगे जब तब अपने खंडहर घर की दीवारें आ खड़ी होतीं।पत्नी का करूणार्द्र मुख उन्हें विचलित कर देता।जब विवाह की उम्र पार कर रही बेटी उनके हृदय के घावों को कुरेदने लगती उनका सारा धैर्य आँखों की राह बह निकलता।
      नये स्कूल में लम्बी लम्बी छुट्टियाँ पड़ती थीं।अध्यापक उन छुट्टियों में कभी स्कूल की ओर आँख उठा कर भी न देखते।उनका कोई छात्र हफ्तों अनुपस्थित रहे तो उन्हें उसकी कोई चिन्ता न होती।अभिभावकों छात्रों और टीचर्स का सम्बन्ध बस महीने में एक दिन पड़ने वाली पैरेन्ट टीचर्स मीटिंग तक ही सीमित था।मुंशी जी के लिए यह सब एकदम नयी बात थी।पाठशाला, अध्यापक और छात्रों का यह सम्बन्ध कभी भी उनकी कल्पना का विषय नहीं रहा।वे तो पाठशाला की हृद्तंत्री में झंकार बन समा जाने वाले जीव थे।बाहर खड़े रह कर केवल उसका स्वर सुनने का उन्हें कोई अभ्यास न था।
आज ऐसे में हम सोच भी कैसे सकते हैं कि कभी मुंशी जी जैसी शख्सियत भी हुआ करती थी।
                             ००००००

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11 मार्च, 1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म। 31 जुलाई 2016  को लखनऊ में आकस्मि निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी, नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों, नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित।


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प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार और कहानीकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के 90वें जन्मदिवस पर हुआ “बालवाटिका” पत्रिका का लोकार्पण

मंगलवार, 12 मार्च 2019


     प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार और कहानीकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के 90वें जन्मदिवस पर  हुआ “बालवाटिका” पत्रिका का लोकार्पण

                श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव हिंदी के प्रतिष्ठित कहानीकार,लेखक और बालसाहित्यकार हैं।दिनांक 11मार्च को उनका 90वां जन्मदिन हिंदी के प्रतिष्ठित दैनिक “जन्संदेश टाइम्स” लखनऊ के सभाकक्ष में मनाया गया।इस अवसर पर भीलवाड़ा,राजस्थान से प्रकाशित बच्चों की स्थापित पत्रिका ”बालवाटिका” के श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव पर केन्द्रित मार्च-2019 अंक का लोकार्पण भी संपन्न हुआ।इस अवसर पर लखनऊ एवं कानपुर के बालसाहित्यकार,पत्रकार एवं प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के पाठक एवं प्रशंसक मौजूद थे।
                                 
   
         दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तस्वीर पर माल्यार्पण के पश्चात  उपस्थित समस्त अतिथियों ने “बालवाटिका” पत्रिका का लोकार्पण किया।
         कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कानपुर से आये वरिष्ठ बाल साहित्यकार कौशल पाण्डेय ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य के प्रति सपर्पण की बात बताते हुए कहा कि “प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का 1950 से शुरू हुआ लेखन जीवन पर्यंत चलता रहा।उन्होंने बड़ों की  कहानी,रेडियो नाटकों के लेखन के साथ ही प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य भी लिखा।उनकी 50से ज्यादा किताबें भी प्रकाशित हुयी लेकिन उन्होंने जीवन में न ही कभी किसी प्रकाशक से किताबें छापने का अनुरोध किया न ही किसी समीक्षक,आलोचक से अनुरोध किया कि वो उनकी किताबों की समीक्षा करे या उस पर टिप्पणी लिखे।न ही किसी रंगकर्मी से अपने नाटकों के मंचन की बात कही। इस मामले में प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी साहित्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित और स्वाभिमानी  व्यक्तित्व वाले लेखक थे।”

    इस अवसर पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि डा० सुभाष राय ने “बालवाटिका” पत्रिका की चर्चा करते हुए कहा कि “बालवाटिका” का बाल साहित्यकारों के समग्र जीवन को पाठकों से जोड़ने का यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है।उन्होंने पत्रिका में प्रकाशित प्रेमस्वरूप जी की बात का उदाहरण देते हुए कहा कि ”पत्रिका में डा० हेमन्त कुमार ने इस बात का उल्लेख किया है कि प्रेमस्वरूप जी कहा करते थे कि “अगर उनका लेखन ख़तम हो गया तो जीवन का क्या मतलब?” यानि लेखन को उन्होंने जीवन से जोड़ा।उसे ही अपनी जीवनधारा माना।

   सुभाष राय ने कहा कि लिखना यदि जीवन से जुड़ा हो तो वो लिखना किसी भी साहित्यकार का हो वह बहुत महत्वपूर्ण है।इसी बात को आगे बढाते हुए उन्होंने  ने यह भी कहा कि लेखक का लिखा हुआ पाठक तक पहुँचना चाहिए तभी उस लेखन की सार्थकता है।डा० राय ने हरिशंकर परसाई जी का उदाहरण देते हुए बताया कि वो अपनी अप्रकाशित रचनाओं की कई प्रतियाँ बना कर थैले में रखते थे और उसे मुफ्त ही लोगों को पढने के लिए देते थे।
     
प्रसिद्ध रंगकर्मी मेराज आलम ने कहा कि हम सभी को अपने अन्दर के बच्चे को जीवित और सक्रिय रखना होगा तभी हम पाठक को अच्छा बाल साहित्य और नाटक दे सकेंगे और बाल रंगमंच को सार्थक दिशा भी दे सकेंगे।कानपुर से आयी प्रसिद्ध बाल साहित्यकार और बाल मनोविज्ञान की  पारखी  अर्पणा पाण्डेय ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के जीवन से जुड़े कई रोचक संस्मरण सुना कर उनकी स्मृतियों को ताजा किया।प्रतिष्ठित बालसाहित्यकार,कहानीकार और उपन्यासकार संजीव जायसवाल ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी को प्रौढ़ों और बच्चों का पुरोधा साहित्यकार बताते हुए उनके प्रसिद्ध बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” का उल्लेख किया और कहा कि उनका यह उपन्यास बालसाहित्य के पाठकों के लिए अभूतपूर्व देन है।

       अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रतिष्ठित बालसाहित्य समीक्षक और आलोचक श्री बंधु कुशावर्ती ने कहा कि प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी मूलतः कहानीकार और नाटककार हैं और 1964 में इलाहाबाद आने के पहले वो खुद को एक कहानीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर चुके थे।1964 में शिक्षा प्रसार विभाग के फिल्म प्रोडक्शन सेक्शन में स्क्रिप्ट राइटिंग से जुड़ने के बाद से ही उन्होंने बाल साहित्य लेखन भी शुरू किया और रेडियो पर बाल कहानियों नाटकों के अलावा तत्कालीन सभी पत्र पत्रिकाओं में बाल कहानियाँ लिखना  शुरू किया।बाद के समय में उन्होंने अपना अधिकाँश लेखन बच्चों के लिए किया।और बाल साहित्य लेखन में उन्होंने खुद को उसी तरह स्थापित किया जिस तरह बड़ों की कहानियों के लेखन में किया था।
   बंधुजी ने बताया कि सन 1964 का समय वह समय था जब सरकारी स्तर पर भी अच्छे बाल साहित्य लेखन के लिए प्रयास किये जा रहे थे तथा श्री संपूर्णानंद जी के मुख्यमंत्रित्व काल में इस दिशा  में काफी काम भी हुआ।शिक्षा विभाग द्वारा भी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया गया।संभवतः शिक्षा विभाग में नौकरी करने और प्राथमिक शिक्षा विभाग द्वारा हो रहे प्रयासों से प्रभावित हो कर ही प्रेमस्वरूप जी का रुझान बाल साहित्य लेखन की तरफ बढ़ा और उन्होंने जीवन पर्यंत बाल साहित्य को समृद्ध किया।बंधू कुशावर्ती ने बताया कि प्रेमचंद के सम्पूर्ण साहित्य को एकत्रित करने और उसे पाठकों तक पहुँचाने में उनके पुत्र अमृत राय का बहुत बड़ा योगदान है। प्रेमचंद के लिए जो काम अमृत राय ने किया था वही काम प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के साहित्य को पाठकों तक पहुंचाने के लिए आज डा०हेमन्त कुमार कर रहे हैं।  
       प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के पुत्र और बाल साहित्यकार डा० हेमन्त कुमार ने प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी से जुड़ी यादों को साझा करने के साथ ही “बालवाटिका” के सम्पादक डा० भैंरूलाल गर्ग जी एवं प्रतिष्ठित बालसाहित्यकार एवं बालसाहित्य इतिहास लेखक डा० प्रकाश मनु जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया जिनके प्रयासों से “बालवाटिका” का प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी पर केन्द्रित यह अंक प्रकाशित हो सका।कार्यक्रम के अंत में प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार अखिलेश श्रीवास्तव चमन ने श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य लेखन परम्परा को आगे बढाने के लिए डा० हेमन्त को बधाई देने के साथ सभी आगंतुक अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
           इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि,लेखक भगवान स्वरूप कटियार, बाल साहित्यकार पूनम श्रीवास्तव,डा० शीला पाण्डेय,पर्यावरण के प्रसिद्ध फिल्मकार श्री चिक्का मुनियप्पा,शैक्षिक दूरदर्शन की साउंड इंजीनियर सुधाश्री,प्रसिद्ध युवा कवयित्री एवं गायिका डा०प्रीति गुप्ता,रेडियो उद्घोषिका और कलाकार शिखा दुबे,युवा बाल गीतकार नित्या शेफाली ने उपस्थित होकर कार्यक्रम की गरिमा बढाई साथ ही प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के जन्मदिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम को सफल बनाया।
                                  ००००००
डा० हेमन्त कुमार
मोबाइल—9451250698   
                          
         

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पुस्तक समीक्षा---लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019


पुस्तक समीक्षा
      लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें
                                                                                    समीक्षक  ----- कौशल पाण्डेय
समीक्ष्य पुस्तक
ठेंगे से
(कविता संग्रह )
कवि-अजीत सिंह राठौर  “लुल्ल कानपुरी”
प्रकाशक
सोशल रिसर्च फाउण्डेशन
मूल्य - ३०० रूपए
कला मनीषियों ने कविता को कवि द्धारा अपने से की गई बातचीत का व सहज स्वरूप  भी माना है।जो तमाम अवरोधों से अप्रभावित रहते हुए भी सदैव
शाश्वत और गतिमान रहता है।कविता से किया जाने वाला यह आत्मसंवाद समाज और परिवेश की उस भावभूमिपर जन्म लेता है जहाँ अभाव,पीड़ा,भूख,निराशा,कुंठा,घुटन और आर्थिक विसंगतियाँ हमें पल-पल प्रभावित करती हैं।ऐसे में जब कोई कवि वर्षों की प्रतीक्षा के बाद कविता का दामन थामता है तो उसकी धार में व्यंग का उपजना स्वाभाविक है।
अजीत सिंह राठौर “लुल्ल कानपुरी” की चौंसठ कविताओं का पहला संकलन जब तिरसठ वर्ष की उम्र में आता है तो उन कविताओं में समाज की विसंगतियाँ व्यंग का रूप लेकर एक ऐसा आकार ग्रहण करती हैं जहाँ सामान्य पाठकों को यह कवितायेँ अपने आस-पास की कवितायें सी लगने लगती हैं।

अजीत सिंह राठौर के इस संकलन -"ठेंगे से" की अधिकाँश कविताओं में रिश्तों के कोमल तानों-बानों और बचपन की खुरदुरी यादों के सहारे हमारा लोक जीवन अपनी लोक भाषा में एक सार्थक आकार लेता प्रतीत होता है ------
मिटटी के चूल्हे ने रोते हुए
बहन फुँकनी से कहा
बरसों बरस का था
साथ हमारा तुम्हारा
बिना तुम्हारे
हम जलते नहीं थे
तनिकौ हिलते नहीं थे
नहलाये जाते
पोंछे जाते
पूजे जाते
मनाये जाते
तब कहीं आगि
जोरी जाती
**   **   **
बहिन तुम्हारे कूटे बिना
कौनो कण्डा चूल्हे मा घुसत न रहे
(
मिटटी के चूल्हे का दर्द )
दिन पर दिन बढ़ती जाती जीवन की आपा-धापी, उथल-पुथल और इससे उपजे तरह-तरह के कडुवे अनुभवों को झेलने के लिये अब ये जरूरी लगने लगा है कि जीवन के दृष्टिकोण को हास्यपरक बनाया जाये।हास्य-व्यंग का यह व्याकरण अजीत सिंह राठौर की कविताओं में जगह जगह नजर आता है ----------
राम रामलीला के रंगमंच पर
राम के मुखौटे का धैर्य
आखिर जवाब दे गया
उसने रावण के
मुखौटे से पूछा
गुरु तुम तो
पूरे गुरु नजर आते हो
हमको एक रात के
तीन सौ
दिलवाते हो
आप तो तीन हजार
एक रात के झटक ले जाते हो
**    **    **
पूरी भीड़ मुझ पर थूकती है
कोसती है गालियाँ देती है
मेरा मृतक शरीर
बड़ी-बड़ी आँखों से
यह सब देखता है
इस दर्द को
कभी आपने महसूस किया है
(
मुखौटों का दर्द )
      आज हिंदी कविता की सबसे बड़ी जरूरत है कि वह भाषा के चोंचलों और शिल्प के बखेड़ों से मुक्त होकर लोक परम्पराओं, मुहावरों और देशज शब्दों साथ एक आत्मीय रिश्ता जोड़े।दृष्टि और सम्भावनाओं से भरी-पूरी यह कवितायेँ आज की संपूर्ण लोक चेतना, खंडित होते सपने और आदमीपन की तलाश के साथ-साथ इस बात की भी प्रमाण हैं की लोक और आँचल से जुड़ा साहित्य ही पाठकों को साथ लेकर चल सकता है।मेरे लिए इन कविताओं को पढ़ना एक आत्मीय रिश्ते की गर्माहट को महसूस करने जैसा है।
                               ००००००
कौशल पाण्डेय
1310-ए,बसंत विहार,
कानपुर-208021
मोबाइल नंबर-9532455570          




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लेख-- पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017


पिंकी--सुबह जल्दी उठना है जाकर सो जाओ।”“राजू इतने नजदीक से टी वी मत देखो--आंखें खराब होती हैं।”“मीना सीधे बैठ कर पढ़ो---झुक कर बैठने से कूबड़ निकल आएगा।”“तनु बेटा नल खुला रख कर ब्रश मत करो पानी बर्बाद हो रहा है। ये या ऐसे ही ढेरों वाक्य हैं जो हर घर में,परिवार में सुबह शाम हर समय आपको सुनाई पड़ते होंगे।ये वाक्य या उपदेश दिये जाते हैं बच्चों को।और उपदेश देता कौन है? हम आपहम सभी यानि कि हर अभिभावक या घर का बड़ा सदस्य।
  इन नसीहतों को सुन कर ऐसा लगता है कि बच्चे सिर्फ़ नसीहतें सुनने के लिये ही इस धरती पर आयें हैं।मतलब यह कि सारी नैतिकता,सारी नसीहतें सिर्फ़ छोटे मासूम बच्चों के लिये। और हमारे आपके लिये ?क्या जो नसीहतें जो हम उठते,बैठते ,खेलते-खाते,सोते-जागते,बच्चों को देते हैं।ये क्या सिर्फ़ उनके ऊपर ही लागू होती हैं?हमारे ऊपर नहीं?क्या टी वी नजदीक से देखने पर हमारी आंखें नहीं खराब होंगी।क्या झुक कर बैठने या पढ़ने पर हमारी रीढ़ की हड्डी नहीं मुड़ेगी?या उसमें कोई विकार नहीं आयेगा?फ़िर क्या कारण है कि हम हर समय बच्चों पर ही नसीहतें थोपते रहते हैं?हर समय टोकने,नसीहत देने का असर बच्चों पर क्या पड़ेगा?क्या अपने इस बात पर भी कभी गौर किया है?क्या हर समय की टोका टाकी बच्चों को विद्रोही नहीं बनायेगी?इन सब बातों पर भी हमें विचार करना होगा।खासकर आज के युग में जब कि हर मां-बाप अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद सतर्क और चिन्तित रहता है।
               यह सही है कि नसीहत या उपदेश हम बच्चों की बेहतरी के लिये ही देते हैं।लेकिन उसका तरीका क्या हो?यह भी हो सकता है कि हम ये नसीहतें या उपदेश बच्चों को सीधे न देकर किसी और तरीके से दें।वह तरीका कौन सा होगा उस पर विचार करने के पहले मैं आपको एक कहानी संक्षेप में सुनाना चाहूंगा।यह कहानी शायद आपमें बहुतों ने पढ़ी या सुनी भी होगी।
          कहानी है एक फ़कीर की।फ़कीर के पास एक दिन एक महिला अपने बेटे को लेकर आई।बच्चे के दांतों में बहुत तकलीफ़ थी। महिला ने शिकायत करते हुए कहा कि मेरा बेटा गुड़ बहुत खाता है।इसके दांतों में कीड़े लग गए हैं। अगर आप इसकी यह गुड़ खाने की आदत छुड़ा दें तो मैं आपका उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगी।फ़कीर ने उसकी बात ध्यान से सुनी।कुछ देर सोचते रहे फ़िर उसको यह कह कर वापस भेज दिया कि इसे लेकर दस दिनों के बाद आना। और उन्होंने बच्चे के दांतों का दर्द कम करने के लिये कुछ दवाएं भी उसे दीं।दस दिनों के बाद महिला फ़िर आई।फ़कीर ने दोनों को बैठाया और बच्चे को समझाते हुए कहा कि बेटा तुम हर समय गुड़ खाना बंद कर दो। तुम्हारे दांत बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। और हां कभी भी कुछ खाओ तो उसके बाद दांत जरूर साफ़ कर लिया करो। महिला ने उनसे पूछा कि ये बात तो आप उस दिन भी बता सकते थे।फ़कीर मुस्कराया और बोला मैंने उस दिन इसे इसलिये नहीं समझाया क्योंकि मैं खुद भी बहुत गुड़ खाता था। सो मैं कैसे इसे समझाता। इन दस दिनों में मैंने गुड़ खाना बंद कर दिया। इस लिये अब मैं इसे समझाने का हकदार हो गया हूं। फ़कीर और बच्चे की यह कहानी आज हम सब पर लागू होती है। यानि कि हमें भी इस कहानी से सीख लेनी चाहिये। हमें बच्चों को कोई नसीहत देने से पहले खुद भी उस पर अमल करना चाहिये। तभी हम बच्चों को सही दिशा दे सकेंगे।
            एक बात और है।हमें ऐसे मौकों पर कभी कभी अपने बचपन को भी याद कर लेना चाहिये। आप याद करिये अपने बचपन को। आप अच्छे खासे अधलेटे होकर अपना कोई कहानी की किताब पढ़ रहे होते थे और अचानक आपके पिताजी कहते थे बेटा सीधे बैठ कर पढ़ो। ऐसे भी कहीं पढ़ाई होती है?आपको कितनी झुंझलाहट होती थी। ठीक यही स्थिति हमारे उपदेश देने पर हमारे भी बच्चों की होती है।
  इसकी जगह अगर हम खुद टी वी दूर बैठ कर देखें,खुद सीधे बैठ कर पढ़ें,खुद ब्रश करते समय नल को बंद रखा करें तो शायद बच्चों को उपदेश देने की जरूरत ही न पड़े।क्योंकि बच्चों में अनुकरण करके सीखने की एक स्वाभाविक विशेषता होती है।वह जब आपको सुबह जल्दी उठते,रात में जल्दी सोते,समय पर नहाते-खाते,तैयार होते,सही मुद्रा में बैठ कर पढ़ते लिखते देखेगा तो वह स्वतः ही वैसा करेगा। आपको कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
                   यहां एक उदाहरण मैं और देना चाहूंगा।अपने स्कूली दिनों का।मेरे स्कूल के प्राचार्य जब भी किसी कक्षा में जाते और वहां बच्चों द्वारा फ़ाड़े गये कागज की पुड़िया या कोई दूसरा कचरा देखते तो उसे स्वयं ही उठा कर कक्षा के बाहर फ़ेंक आते। कभी वो किसी बच्चे को इसके लिये आदेश नहीं देते थे। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन  से उस कक्षा के बच्चे थोड़ा जल्दी आने लगते। और खूद ही अपने कमरे की सफ़ाई कर लेते।
         तो यह भी एक अच्छा तरीका है बच्चों से कार्य लेने और उन्हें समझाने का।हमारे अध्यापक और अभिभावक अगर दोनों ही बच्चों को समझाने,दिशा निर्देश देने और उन्हें आगे बढ़ाने के संदर्भ में यह तरीका अपना लें तो मुझे लगता है कि बच्चों के ऊपर उपदेशों का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और उनके विकास को एक सही दिशा मिल सकेगी।
                          000

डा0 हेमन्त कुमार 

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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