इन्तजार
बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

इस जंगल के
दरख्तों से
क्यों पूछते हो
इनकी खैरियत ।
इनके
दहशतजर्द चेहरों पर तो
खुद ही चस्पा है
रोज तिल तिल कर
मरते हुये
अपने जिबह होने के
इन्तजार
की तस्वीरें ।
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हेमन्त कुमार



कमलेश्वर के हाथ में पेग देख मानिक चुप न रह सका—‘हम गंवई गांव का मानुस है मालिक। यह लाल रंग देखकर हमें अपने गांव का कमल ताल याद होइ आय रहा है।ऊ लाल लाल कमल ला फ़ूल,पुरवा के हिलोर पर उनका नाचना। जैसे ऊ ललाई ई बोतल में आय के बंद होय गई है।मालिक,अब गांव नाहीं चलेंगे कभी?’
कमलेश्वर के मन को जैसे किसी वासंती पवन ने छू लिया।गौरा उनका अपना वह गांव।उन्होने एक उसांस भरी। पर तभी भीतर एक तल्खापन सा भर उठा।वे बोले--- ‘हां रे, बहुत पहले गया हूं। लेकिन अब वह गौरा कहां रहा।क्या है अब वहां?क्या अब भी वैसे कमल खिलते होंगे?क्या अब भी शाम पानी में पांव लटकाये लोगों की शोख और चुलबुली हंसी गूंजती होगी?नहीं नऽब तो दुपहरिया में ताल की सूखी दरारों पर धूल का बवंडर उठता होगा।क्यों,उसी गौरा की बात कर रहा है न तू?’
लेकिन मानिक का विश्वास कहां मुरझाने वाला था।वैसे ही बोला---‘हां,वही अपना गांव मालिक।गौरा अब भी वही है।गौरा करमा के तीरे बसा है। आज करमा सूख रही है तो का उसका नाम भी बदल जायेगा? ऊ नदी नहीं कहायेगी?कमलताल की छाती भले ही दरक गई होय।लेकिन ऊ आज भी आपका रक्तबरनी अगवानी करेगा।’
कमलेश्वर मुस्करा कर बोले ---‘रक्तबरनी? अरे,तू तो कविता की भाषा बोलने लगा रे मनिकवा ।’
मानिक का पीला चेहरा अचानक जैसे कमल की ललाई से रक्ताभ हो आया।वह उत्साह से बोला ---‘खून का रंग लाल होता है ना। इसीलिये देवी देउता से भी खून का रिश्ता जोड़ने के लिये उहां का मानुस आज भी चौरा पर लाल चूनर,पताका,सेंधुर और गुड़हल का फ़ूल चढ़ाता है।महावीर जी के एंगुर टीपता है।’
‘और बदले में देवता क्या देते हैं?सूखा,अकाल,बीमारी,गरीबी।क्यों?’कमलेश्वर ने एक हल्की सी चिकोटी काटी।
मानिक निरुत्तर नहीं हुआ—‘वहां की धरती ई कहां देखती है मालिक।पानी बरसे न बरसे।बवंडर चले,चिनगारी उड़ें।तब भी ऊ धरती के करेजे पर पलाश का लाल फ़ूल खिल उठता है।रक्तबरन चादर ओढ़ लेता है पलाश वन। का आप ऊ रंग से धरती आकाश एक होत नाहीं देखे हैं।फ़िर आप गौरा काहे नहीं चलना चाह रहे हैं?मालिक,बोतल में भरा ई लाल रंग आपके करेजा का सत निचोड़ लेगा।मालकिन को नाहीं देख रहे हैं आप्।कौन सुख नाहीं है घर में ?लेकिन सूख के कंकाल होय रही हैं।बबुआ ऐसन नौकरी में है कि हवाई जहाज से सफ़र करत है।बहूरानी ऊनी वरसीटी में प्रोफ़ेसर हैं।मगर दूनों जन छटपटाय रहे हैं।कौन तकलीफ़ है।’
मानिक छोटा थ तभी से इस घर में है।इसी से वह इतना मुखर हो उठता है।पर कैसे बतायें कमलेश्वर कि आज भी वे कमलेश्वर प्रसाद सिंह हैं,लोक सेवा आयोग के रिटायर्ड चेयरमैन्।इस दंभ ने ही उनकी पूरी जिन्दगी को आपाधापी से भर दिया।उनके अपनों के लिये वक्त को छीन लीया।कार,कोठी,बागीचा ,नौकर चाकरपने इर्द गिर्द इतना हुजूम बटोरकर भी उन्होंने खुद पत्नी अमला में इतना एकाकीपन भर दिया कि वह निरीह होकर टूटती चली गई।बेटा भूपेश आई ए एस आफ़िसर,बहू प्राची पी एच डी प्रोफ़ेसर।पर सब एक दूसरे से अलग थलग होते चले गये ।नहीं रोक पाये वे बढ़ती हुयी दूरियों को।
शायद कभी इन्हीं सुख सुविधाओं का जिक्र आने पर अमला ने ही कह दिया था---‘ये सब डाक्टरी फ़ार्मूले हैं कमल। तुमने मेरे ऊपर,बहू बेटे पर इसे आजमाया।लेकिन हर घाव की दवा मलहम नहीं होती। अब तो इच्छा होती है कि एयरकन्डीशनर को बन्द करके पागल हवाओं के बीच निकल जाऊं।तुम कहते हो यह वक्त का सैलाब है।इसे रोकने के लिये कोई आकाश से नहीं उतरेगा।’
छटपटाहट से थोड़ा उबरे तो सहसा कमलेश्वर को याद आया—अरे ,आज तो बहू बेटे की शादी की सालगिरह है।पर जश्न या मातम? क्या मनायेंगे वे? बेटा सबेरे की फ़्लाइट पकड़कर बाहर जा चुका है।बहू एक जरूरी मीटिंग अटेण्ड करने यूनिवर्सिटी चली गयी।देर रात लौटेगी।कौन काटेगा केक? क्या जवाब देंगे वे मेहमानों को?मन के एक कोने से उनके दंभ ने फ़िर सिर उठाया। किसी के चले जाने से कोई काम नहीं रुकने वालाऽअफ़िसर्स के छुट्टी पर होने पर भी उन्होंने अकेले इतना बड़ा आफ़िस चलाया है। मगर मन के दूसरे कोने से आवाज उठी—यह आफ़िस नहीं घर है।रिश्तों का नाजुक बन्धन्। जिसके हर कसाव को तुम ढीला करते चले आये।दंभ की खोखली दीवार को और संभालना उसके लिये मुश्किल हो गया।
उन्होंने बड़े असहाय भाव से मानिक को सब बताया। पूरा कार्यक्रम रद्द करने के लिये कहा । मानिक क्षण भर उनकी आंखों में झांक कर बोला—‘आप का कह
रहे हैं मालिक ?घर में एक भी जन रहता है तब भी तुलसी के बिरवा तर संझौती की दिया बाती होती है ।मंदिर का कपाट नाहीं खुला होता तब भी लोगों का हाथ जुड़ता है ।
सच है कि नाहीं ? उठिये, यह संझौती की बेला है।
(शेष अगले भाग में)

बहुत सालों के बाद
आज इस चेहरे को देखा है
दिमाग पर काफ़ी दबाव देने के बाद याद आया
इसका नाम रामकली है।
रामकली उन दिनों
लहलहाता खेत थी
एक भरा पूरा गुलदस्ता
और जिन्दगी को जीने की
एक अदम्य लालसा थी उसकी आंखों में।
खनखनाती हंसी बिखेरती
महफ़िलों की रौनक रामकली
आज बाजार में सूखी ईख बनी खड़ी है
चेहरे पर गुलाबीपन झड़ गया है और
सुरमई दैत्य फ़ैल गया है पूरे बदन पर
दांतों पर जमी मोटी मैल की परत
रामकली की राम कहानी कह रही है।
उसके बालों की चमक न जाने कहां दुबक गई है
और गालों के गहरे गड्ढे
आंखों के नीचे काली झाइयां
लगता यूं है
जैसे रामकली अपनी तीस साल की
जिन्दगी में ही
कई जीवन जी चुकी है।
और अब वो केवल
अपने छः बच्चों के वास्ते
राशन पानी बटोरने के लिये ही
घिसट रही है।
आपने भी कहीं न कहीं जरूर देखा होगा
रामकली को बाजार दूकान घर
या अपने ही घर में
दूर से ही आसान है उसकी पहचान।
उस का दुर्भाग्य यह है
कि न वो अब पहली जिन्दगी में लौट सकती है
और न ही अपने बच्चों को
दे सकती है
सभ्य दुनिया का परिवेश।
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कहानी से चित्र/चित्र से कहानी

कहानी सुनाने, कहानी पढाने या कहने का एक और तरीका है। वह है कहानी को बच्चों से चित्रित करवाना या कुछ चित्रों के आधार पर उनसे कहानी लिखवाना। इस प्रक्रिया में भी सभी श्रोता बच्चे कहानी के साथ तुरंत ही इन्वाल्व हो जाते हैं। उन्हें यह लगता है कि वे केवल कहानी सुनने के लिये यहां नहीं बैठे हैं ।उन्हें कुछ और भी करना है। कहानी सुनाने के इस तरीके का प्रयोग मैंने फ़रवरी 08 में दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में बच्चों के लिए आयोजित एक वर्कशाप में किया था।
नॅशनलबुक ट्रस्ट ने पुस्तक मेले में प्रथम ( एन जी ओ) के सहयोग से बच्चों की एक कार्यशाला आयोजित की। मुझे इस कार्यशाला में बच्चों को कहानी सुनाने और उनसे कोई कहानी से संबंधित गतिविधि करवाने के लिए कहा गया। अपने चित्रकार मित्रों से बात चीत के बाद मैंने अपने प्रस्तुतीकरण का खाका तय कर लिया। मैं उस वर्कशाप में अपने साथ अपनी दो-तीन कहानियों की कई छाया प्रतियां करवाकर ले गया। साथ ही उन कहानियों के लिए बनाए गए चित्रों की कई प्रतियां भी। इससे मेरा काम बहुत आसान हो गया था।मैंने वर्कशाप शुरु होते ही पहले बच्चों से सामान्य बातचीत की। उन्हें एक छोटी कहानी सुनाई। कुछ उनकी कहानियां सुनी। कुछ बच्चों से गाने सुने, कुछ से पहेलियां। यह कार्यक्रम लगभग 15-20 मिनट तक चला। अब तक बच्चे मुझसे और प्रथम के कार्यकर्ताओं से काफ़ी घुल मिल चुके थे। अब मैंने बच्चों को दो समूहों में बॉट दिया। एक समूह उन बच्चों का जो चित्र बनाना चाह रहे थे। दूसरा उनका जो कहानियॉ लिखना चाह रहे थे। फ़िर मैंने दोनों समूहों को कहानी और चित्र बॉट दिये।
और आप यकीन मानिए एक घण्टे बाद बच्चों की कलम से चित्रों को
देखकर जो कहानियॉ निकली : उनकी कल्पनाओं ने जो उड़ान भरी……शायद वहॉ तक मैं भी कल्पना नहीं कर सकता था। मेरी तीन कहानियों के चित्रों से कम से कम 45-50 के आस पास कहानियॉ तैयार हुईं। इतना ही नहीं हर कहानी के शीर्षक…… कथावस्तु……भाषा सबमें एक नयापन्।
ठीक यही बात हुई कहानियों के आधार पर बनाए गए चित्रों की। हर कहानी के बच्चों ने अलग ढंग से चित्र बनाये। हर बच्चे की कल्पना एकदम अलग्……इतना ही नहीं वर्कशाप के अंत में बाकायदा बच्चों ने कहानियॉ सुनाईं……किसी किसी बच्चे ने कहानी के किसी पात्र का अभिनय भी किया। किसी ने कहानी को पद्य के रूप में सुनाने की कोशिश की।
इस वर्कशाप के बारे में इतना विस्तार से बताने का मेरा मकसद सिर्फ़ यह है कि ……… कहानी से चित्र और चित्र से कहानी बनाने के इस औजार को भी कक्षा में हमारे अध्यापक मित्र प्रयोग कर सकते हैं। निश्चित रूप से उन्हें कहानी सुनाने…… पढाने के इस तरीके के अच्छे परिणाम मिलेंगे।
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हेमन्त कुमार
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