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इन्तजार

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009


इस जंगल के
दरख्तों से
क्यों पूछते हो
इनकी खैरियत ।

इनके
दहशतजर्द चेहरों पर तो
खुद ही चस्पा है
रोज तिल तिल कर
मरते हुये
अपने जिबह होने के
इन्तजार
की तस्वीरें ।
000000
हेमन्त कुमार

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महुअरिया की गंध(भाग-2)

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009



(अभी तक आपने पढ़ा---- मानिक क्षण भर उनकी आंखों में झांक कर बोला—‘आप का कह रहे हैं मालिक ?घर में एक भी जन रहता है तब भी तुलसी के बिरवा तर संझौती की दिया बाती होती है। मंदिर का कपाट नाहीं खुला होता
तब भी लोगों का हाथ जुड़ता है ।सच है कि नाहीं ? उठिये, यह संझौती की बेला है।----और अब आगे पढ़िये-----)

मानिक के इन शब्दों से कमलेश्वर का मन जैसे सुवासित हो उठा। कहीं यह सुवास उनके गौरा की माटी की तो नहीं थी। मानिक की आंखों में संझौती के दिये का शीतल प्रकाश तैर रहा था। एक नवशक्ति से भर वे उठ कर खड़े हो गये।
वे अमला से बोले –‘भूपेश जाय तो हम सब गौरा चलेंगे। अपने गांव गौरा। भले ही रात भर को। अमला का मुंह एक सुखद आश्चर्य से खुला रह गया।वह मुस्करायी। पर शायद उसकी मुस्कराहट को नहीं पता था, कमलेश्वर अपने इन शब्दों पर कितने अडिग हैं। भूपेश और प्राची का गौरा के निचाट उजाड़ भूखण्ड पर मिला बहता हुआ हंसी का झरना पूनो। मानिक की बेटी। आग बरसाते सूरज,बंसवारी को मथती गरम हवा की लपटों से बेखबर उसकी हंसी गूंजती रहती।
भूपेश ने पूनो को बताया—‘पापा ने यहां आने के लिये अनशन कर दिया था। इसीलिये सबको आना पड़ा। पर उन्हें यहां छोड़ना---ना बाबा ना। यहां तो आग के बगूले उठ रहे हैं। नदी सूख गयी है। कुयें तालाब में पानी नहीं है। कैसे जीते हैं यहां के लोग ?
पूनो उसका हाथ पकड़कर उसे खींचती हुयी ले गयी।एक चट्टान से बूंद बूंद कर पानी टपक रहा था। बर्फ़ सा ठंडा। भूपेश अवाक सा उसे सुनता रहा---‘ बाबू पाथर की छाती में से पानी रिस रहा है।ऊपर से धरती सूख गयी है। लेकिन नीचे पोर पोर में रस भरा हुआ है। ऊपर से चिनगारी बरसत है। नीचे से लपट उठत है। लेकिन
देखो,सिवाने पर लगी महुअरिया। बतायेगी,इहां का मानुस कैसे जीता है। साल में एक बार दिन आता है जब महुआ के पोर - पोर में रस छलक उठता है। टप-टप टपके लगता है सफ़ेद मोती। पलाश का रंग पाय के महुआ की गंध उड़ती है तो इहां का पत्ता पत्ता रसिया हो जाता है बाबू। भूल जाता है आपन दुख दरिद्दर।और फ़िर वह हंसी का फ़ुटहरा। जैसे वहां अब भूपेश नहीं था,पूनो नहीं थी,गौरा का वह भूखण्ड नहीं था। हजार हजार विषम गांठों को खोलती चली गई पूनो की वह उन्मुक्त हंसी।

आज सबको वापस लौटना था। लेकिन पूनो के आग्रह पर एक रात के लिये वे और रुक गये। पूनो ने कहा-‘बाबू आज पहिला महुआ टपका है न। सो महुअरिया में इहां का मानुस थोड़ा नाचेगा ,गायेगा। करिया का मिरदंग जरूर सुनियेगा। दस गांव जवार में ऐसा नामी गिरामी मिरदंगिया नहीं है। असली विजयसार का मिरदंग है। बोल करिया---और करिया फ़ड़क उठा—‘हां बाबू , धुम किटतक ----धुम किटतक -----ऐसे बजेगा कि-------

यह हंसी, उल्लास। भूपेश चकित था। उनके जाने के बाद प्राची बोली---‘पीड़ा के भीतर से ही ऐसी हंसी और उल्लास भी उपजते हैं। तुमने तो देखाधरती तपती है तो पलाश खिलता है। अग्निबाण चलते हैं तो महुआ के पोर पोर से रस टपकने लगता है। इस करिया ने एक दुर्घटना में अपना पूर परिवार खो दिया। पूनो का पति परदेस गया तो वहीं का होकर रह गया। पर इसकी प्रतीक्षा तो रोजाना तुलसी के नीचे एक दिया जलाकर और भी प्राणवती हो उठती है। जीने का विश्वास मिल जाता है। क्या हम इसे नहीं पा सकते भूपेश ?’
तभी एक कोमल पाश ने जकड़ लिया प्राची को—‘लो जिज्जी, पहनो घुंघरू।
अरे यह क्या है?’प्राची अचकचा कर बोली।
पूनो मचल कर बोली---‘अब महुअरिया में चल कर ही बतायेंगे। और हां बाबू, चलो।तुम्हें ही तो साथ देना है।मिरदंग पर ऐसे थिरकेंगे पांव।
प्राची की आंखों में आंसू छलछला आये। पूनो ने अपने आंचल से उसे पोंछते हुये कहा—‘अरे , का ?आज पहिला महुआ टपका है। आज अंखियन में आंसू आये तो देवता रिसिया जायेंगे। फ़िर अगले साल महुआ नहीं टपकेगा जिज्जी।
प्राची भरे गले से बोली---‘चलो पूनो,महुआ हर साल टपके। इसलिये हम तुम लोगों के साथ हंसेंगे, नाचेंगे। आओ भूपेश।
पूनो वहीं से चिल्लाती हुई महुअरिया की ओर दौड़ी---‘अरे मिरदंगिया,जरा जोर से बजाओ। पाहुन आय रहे हैं।
टटकी गंध से सराबोर महुअरिया में करिया का मिरदंग गमक रहा है। घुंघरू बंधे अनेक पांव एक लयताल पर उठते हुये करिया के मिरदंग से होड़ ले रहे हैं।
सहसा कमलेश्वर अमला की आंखों में झांकते हैं। संझौती के दीये का शीतल प्रकाश तैर रहा है उन आंखों में। वे आपादमस्तक नहा उठते हैं उसमें। कानों में करिया का मिरदंग रस घोल रहा है। सांसों में महुअरिया की गंध घुल रही है।
( समाप्त )

लेखक:श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
( इस कहानी के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं। आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है। 1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 80 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित

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महुअरिया की गंध

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

कमलेश्वर के हाथ में पेग देख मानिक चुप न रह सका—‘हम गंवई गांव का मानुस है मालिक। यह लाल रंग देखकर हमें अपने गांव का कमल ताल याद होइ आय रहा है।ऊ लाल लाल कमल ला फ़ूल,पुरवा के हिलोर पर उनका नाचना। जैसे ऊ ललाई ई बोतल में आय के बंद होय गई है।मालिक,अब गांव नाहीं चलेंगे कभी?’
कमलेश्वर के मन को जैसे किसी वासंती पवन ने छू लिया।गौरा उनका अपना वह गांव।उन्होने एक उसांस भरी। पर तभी भीतर एक तल्खापन सा भर उठा।वे बोले--- ‘हां रे, बहुत पहले गया हूं। लेकिन अब वह गौरा कहां रहा।क्या है अब वहां?क्या अब भी वैसे कमल खिलते होंगे?क्या अब भी शाम पानी में पांव लटकाये लोगों की शोख और चुलबुली हंसी गूंजती होगी?नहीं नऽब तो दुपहरिया में ताल की सूखी दरारों पर धूल का बवंडर उठता होगा।क्यों,उसी गौरा की बात कर रहा है न तू?’
लेकिन मानिक का विश्वास कहां मुरझाने वाला था।वैसे ही बोला---‘हां,वही अपना गांव मालिक।गौरा अब भी वही है।गौरा करमा के तीरे बसा है। आज करमा सूख रही है तो का उसका नाम भी बदल जायेगा? ऊ नदी नहीं कहायेगी?कमलताल की छाती भले ही दरक गई होय।लेकिन ऊ आज भी आपका रक्तबरनी अगवानी करेगा।’
कमलेश्वर मुस्करा कर बोले ---‘रक्तबरनी? अरे,तू तो कविता की भाषा बोलने लगा रे मनिकवा ।’
मानिक का पीला चेहरा अचानक जैसे कमल की ललाई से रक्ताभ हो आया।वह उत्साह से बोला ---‘खून का रंग लाल होता है ना। इसीलिये देवी देउता से भी खून का रिश्ता जोड़ने के लिये उहां का मानुस आज भी चौरा पर लाल चूनर,पताका,सेंधुर और गुड़हल का फ़ूल चढ़ाता है।महावीर जी के एंगुर टीपता है।’
‘और बदले में देवता क्या देते हैं?सूखा,अकाल,बीमारी,गरीबी।क्यों?’कमलेश्वर ने एक हल्की सी चिकोटी काटी।
मानिक निरुत्तर नहीं हुआ—‘वहां की धरती ई कहां देखती है मालिक।पानी बरसे न बरसे।बवंडर चले,चिनगारी उड़ें।तब भी ऊ धरती के करेजे पर पलाश का लाल फ़ूल खिल उठता है।रक्तबरन चादर ओढ़ लेता है पलाश वन। का आप ऊ रंग से धरती आकाश एक होत नाहीं देखे हैं।फ़िर आप गौरा काहे नहीं चलना चाह रहे हैं?मालिक,बोतल में भरा ई लाल रंग आपके करेजा का सत निचोड़ लेगा।मालकिन को नाहीं देख रहे हैं आप्।कौन सुख नाहीं है घर में ?लेकिन सूख के कंकाल होय रही हैं।बबुआ ऐसन नौकरी में है कि हवाई जहाज से सफ़र करत है।बहूरानी ऊनी वरसीटी में प्रोफ़ेसर हैं।मगर दूनों जन छटपटाय रहे हैं।कौन तकलीफ़ है।’
मानिक छोटा थ तभी से इस घर में है।इसी से वह इतना मुखर हो उठता है।पर कैसे बतायें कमलेश्वर कि आज भी वे कमलेश्वर प्रसाद सिंह हैं,लोक सेवा आयोग के रिटायर्ड चेयरमैन्।इस दंभ ने ही उनकी पूरी जिन्दगी को आपाधापी से भर दिया।उनके अपनों के लिये वक्त को छीन लीया।कार,कोठी,बागीचा ,नौकर चाकरपने इर्द गिर्द इतना हुजूम बटोरकर भी उन्होंने खुद पत्नी अमला में इतना एकाकीपन भर दिया कि वह निरीह होकर टूटती चली गई।बेटा भूपेश आई ए एस आफ़िसर,बहू प्राची पी एच डी प्रोफ़ेसर।पर सब एक दूसरे से अलग थलग होते चले गये ।नहीं रोक पाये वे बढ़ती हुयी दूरियों को।
शायद कभी इन्हीं सुख सुविधाओं का जिक्र आने पर अमला ने ही कह दिया था---‘ये सब डाक्टरी फ़ार्मूले हैं कमल। तुमने मेरे ऊपर,बहू बेटे पर इसे आजमाया।लेकिन हर घाव की दवा मलहम नहीं होती। अब तो इच्छा होती है कि एयरकन्डीशनर को बन्द करके पागल हवाओं के बीच निकल जाऊं।तुम कहते हो यह वक्त का सैलाब है।इसे रोकने के लिये कोई आकाश से नहीं उतरेगा।’
छटपटाहट से थोड़ा उबरे तो सहसा कमलेश्वर को याद आया—अरे ,आज तो बहू बेटे की शादी की सालगिरह है।पर जश्न या मातम? क्या मनायेंगे वे? बेटा सबेरे की फ़्लाइट पकड़कर बाहर जा चुका है।बहू एक जरूरी मीटिंग अटेण्ड करने यूनिवर्सिटी चली गयी।देर रात लौटेगी।कौन काटेगा केक? क्या जवाब देंगे वे मेहमानों को?मन के एक कोने से उनके दंभ ने फ़िर सिर उठाया। किसी के चले जाने से कोई काम नहीं रुकने वालाऽअफ़िसर्स के छुट्टी पर होने पर भी उन्होंने अकेले इतना बड़ा आफ़िस चलाया है। मगर मन के दूसरे कोने से आवाज उठी—यह आफ़िस नहीं घर है।रिश्तों का नाजुक बन्धन्। जिसके हर कसाव को तुम ढीला करते चले आये।दंभ की खोखली दीवार को और संभालना उसके लिये मुश्किल हो गया।
उन्होंने बड़े असहाय भाव से मानिक को सब बताया। पूरा कार्यक्रम रद्द करने के लिये कहा । मानिक क्षण भर उनकी आंखों में झांक कर बोला—‘आप का कह
रहे हैं मालिक ?घर में एक भी जन रहता है तब भी तुलसी के बिरवा तर संझौती की दिया बाती होती है ।मंदिर का कपाट नाहीं खुला होता तब भी लोगों का हाथ जुड़ता है ।
सच है कि नाहीं ? उठिये, यह संझौती की बेला है।
(शेष अगले भाग में)



लेखक:श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
( इस कहानी के लेखक मेरे पिता जी श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य के लिये नये नहीं हैं। आप पिछले छः दशकों से साहित्य सृजन में संलग्न हैं। आपने कहानियों,नाटकों,लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी कहनियों,नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ वृत्त चित्रों का लेखन कार्य भी किया है। 1950 के आस पास शुरू हुआ आपका लेखन एवम सृजन का यह सफ़र आज 80 वर्ष की उम्र में भी जारी है।)
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।


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नियति

शनिवार, 26 सितंबर 2009


इस जंगल में
हर शाम
एक कहर बरपा होता है
सन्नाटा टूटता है जंगल का
बन्दूकों की आवाजों से।

बूट रौंदते हैं
जंगल के सीने को
टूटती हैं
कुछ व्हिस्की और रम की
खाली बोतलें
और एक मासूम पेंडुकी
दम तोड़ देती है
तड़फ़ड़ा कर
चन्द खुरदुरे हाथों के बीच।
00000
हेमन्त कुमार

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रामकली

रविवार, 20 सितंबर 2009

बहुत सालों के बाद
आज इस चेहरे को देखा है
दिमाग पर काफ़ी दबाव देने के बाद याद आया
इसका नाम रामकली है।

रामकली उन दिनों
लहलहाता खेत थी
एक भरा पूरा गुलदस्ता
और जिन्दगी को जीने की
एक अदम्य लालसा थी उसकी आंखों में।

खनखनाती हंसी बिखेरती
महफ़िलों की रौनक रामकली
आज बाजार में सूखी ईख बनी खड़ी है
चेहरे पर गुलाबीपन झड़ गया है और
सुरमई दैत्य फ़ैल गया है पूरे बदन पर
दांतों पर जमी मोटी मैल की परत
रामकली की राम कहानी कह रही है।

उसके बालों की चमक न जाने कहां दुबक गई है
और गालों के गहरे गड्ढे
आंखों के नीचे काली झाइयां
लगता यूं है
जैसे रामकली अपनी तीस साल की
जिन्दगी में ही
कई जीवन जी चुकी है।

और अब वो केवल
अपने छः बच्चों के वास्ते
राशन पानी बटोरने के लिये ही
घिसट रही है।

आपने भी कहीं न कहीं जरूर देखा होगा
रामकली को बाजार दूकान घर
या अपने ही घर में
दूर से ही आसान है उसकी पहचान।

उस का दुर्भाग्य यह है
कि न वो अब पहली जिन्दगी में लौट सकती है
और न ही अपने बच्चों को
दे सकती है
सभ्य दुनिया का परिवेश।
000000000





कवि—प्रताप सहगल
आदरणीय प्रताप सहगल जी हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि नाटककार एवम उपन्यासकार हैं।प्रताप सहगल जी के अब तक कई नाटक ,कविता संग्रह एवम उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।आप इस समय दिल्ली विश्व्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह कविता प्रताप जी के चर्चित काव्य संग्रह “सवाल अब भी मौजूद है” से ली गयी है।
हेमंत कुमार द्वारा प्रकाशित

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तलाश एक द्रोण की

गुरुवार, 17 सितंबर 2009


मैं जानता हूं कि आज
द्रोण मर चुका है
फ़िर भी मुझे
रहती है तलाश/हर चेहरे में एक द्रोण की।

मैं तलाशता हूं उसे
सुबह से शाम तक
शाम से रात तक
दोपहर की चिलचिलाती धूप में
बरसात के थपेड़ों के बीच
कि शायद कहीं वह----।

मैं उसे तलाश करता हूं
विद्या मन्दिरों के विध्वंसित होते
खंडहरों के बीच
शिक्षालयों की टुटपुंजिया और
लिजलिजी राजनीति के बीच
दिग्भ्रमित एकलव्यों के एक लम्बे
हुजूम के बीच
कि शायद कहीं वह----।

मेरी जिन्दगी की हर शाम
उस द्रोण की तलाश में
काफ़ी हाउस के शोर में
चौराहों के नुक्क्ड़ नाटकों के बीच
बन्द कमरों की गोष्ठियों में
एक शब्दवेधी सन्नाटे के मानिन्द
सरक जाती है
और रात गहरी होने के साथ
मेरे और द्रोण के बीच का
यह शब्दवेधी सन्नाटा
और घना होता जाता है।

मेरे और द्रोण के बीच
बचे हुये सम्पर्क की एक
पतली डोर भी
मेट्रो बार के शोर में
जामों की टकराहट और
सिगरेट के धुयें के बीच
खामोश हो कर
निरन्तर लम्बी होती चली जाती है
और मैं फ़िर अकेला निकल पड़ता हूं
अंधेरी सड़क पर
एक द्रोण की तलाश में।
********
हेमन्त कुमार

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शिक्षक दिवस पर ----मेरे मन में ---------

शनिवार, 5 सितंबर 2009


आज शिक्षक दिवस है। इस शुभ अवसर पर सभी शिक्षक बन्धुओं को हार्दिक बधाई । इस अवसर पर मैं अपने शिक्षक बन्धुओं खासकर प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से कुछ अनुरोध करना चाहूंगा। कि ------
0बच्चों का मन बहुत कोमल होता है।
0इस उम्र में बच्चों के मन पर जो छाप पड़ती है वह जीवन पर्यन्त
उनके साथ बनी रहती है।
0इस उम्र में सीखी गयी बातें ही उन्हें ताउम्र अच्छाई और बुराई
का भेद करना सिखाती हैं।
0 यही वह उम्र है जब उनका सम्पूर्ण विकास हम कर सकते हैं।
इसीलिये आप
0अपने सभी शिष्यों (बच्चों ) से मित्रवत व्यवहार करें।
0उनके ऊपर दण्डात्मक कार्यवाई(मारना,पीटना,बेंच पर खड़े
कराना,मुर्गा बनाना आदि) न करके उन्हें हर बात प्यार से
समझायें।
0उनके खिलाफ़ कोई ऐसी कार्यवाई न करें जिसका बोझ उसे पूरी उम्र
भर अपने पीठ पर ढोना पड़े।
0उसे भी अपने ही परिवार का एक सदस्य मान कर उसके साथ
सयंमित भाषा एवं व्यवहार अपनायें।
तभी शायद हम
0 दे सकेंगे बच्चों को उनके अधिकार।
0 बना सकेंगे उनका उज्ज्वल भविष्य।
0रोक सकेंगे स्कूलों में ड्राप आउट रेट ।
0 पूरा कर सकेंगे बच्चों के साथ ही सम्पूर्ण साक्षरता का सपना।
0 और ला सकेंगे हर बच्चे के चेहरे पर वह मोहक मुस्कान ---
जिसका वह हकदार है।
माहौल स्कूलों का बना दें ऐसा
बच्चा महसूस करे घर जैसा।
****************
हेमन्त कुमार

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कहानी कहना…… सुनाना………(भाग-4)

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

कहानी से चित्र/चित्र से कहानी



कहानी सुनाने, कहानी पढाने या कहने का एक और तरीका है। वह है कहानी को बच्चों से चित्रित करवाना या कुछ चित्रों के आधार पर उनसे कहानी लिखवाना। इस प्रक्रिया में भी सभी श्रोता बच्चे कहानी के साथ तुरंत ही इन्वाल्व हो जाते हैं। उन्हें यह लगता है कि वे केवल कहानी सुनने के लिये यहां नहीं बैठे हैं ।उन्हें कुछ और भी करना है। कहानी सुनाने के इस तरीके का प्रयोग मैंने फ़रवरी 08 में दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में बच्चों के लिए आयोजित एक वर्कशाप में किया था।
नॅशनलबुक ट्रस्ट ने पुस्तक मेले में प्रथम ( एन जी ओ) के सहयोग से बच्चों की एक कार्यशाला आयोजित की। मुझे इस कार्यशाला में बच्चों को कहानी सुनाने और उनसे कोई कहानी से संबंधित गतिविधि करवाने के लिए कहा गया। अपने चित्रकार मित्रों से बात चीत के बाद मैंने अपने प्रस्तुतीकरण का खाका तय कर लिया। मैं उस वर्कशाप में अपने साथ अपनी दो-तीन कहानियों की कई छाया प्रतियां करवाकर ले गया। साथ ही उन कहानियों के लिए बनाए गए चित्रों की कई प्रतियां भी। इससे मेरा काम बहुत आसान हो गया था।
मैंने वर्कशाप शुरु होते ही पहले बच्चों से सामान्य बातचीत की। उन्हें एक छोटी कहानी सुनाई। कुछ उनकी कहानियां सुनी। कुछ बच्चों से गाने सुने, कुछ से पहेलियां। यह कार्यक्रम लगभग 15-20 मिनट तक चला। अब तक बच्चे मुझसे और प्रथम के कार्यकर्ताओं से काफ़ी घुल मिल चुके थे। अब मैंने बच्चों को दो समूहों में बॉट दिया। एक समूह उन बच्चों का जो चित्र बनाना चाह रहे थे। दूसरा उनका जो कहानियॉ लिखना चाह रहे थे। फ़िर मैंने दोनों समूहों को कहानी और चित्र बॉट दिये।
और आप यकीन मानिए एक घण्टे बाद बच्चों की कलम से चित्रों को
देखकर जो कहानियॉ निकली : उनकी कल्पनाओं ने जो उड़ान भरी……शायद वहॉ तक मैं भी कल्पना नहीं कर सकता था। मेरी तीन कहानियों के चित्रों से कम से कम 45-50 के आस पास कहानियॉ तैयार हुईं। इतना ही नहीं हर कहानी के शीर्षक…… कथावस्तु……भाषा सबमें एक नयापन्।
ठीक यही बात हुई कहानियों के आधार पर बनाए गए चित्रों की। हर कहानी के बच्चों ने अलग ढंग से चित्र बनाये। हर बच्चे की कल्पना एकदम अलग्……इतना ही नहीं वर्कशाप के अंत में बाकायदा बच्चों ने कहानियॉ सुनाईं……किसी किसी बच्चे ने कहानी के किसी पात्र का अभिनय भी किया। किसी ने कहानी को पद्य के रूप में सुनाने की कोशिश की।
इस वर्कशाप के बारे में इतना विस्तार से बताने का मेरा मकसद सिर्फ़ यह है कि ……… कहानी से चित्र और चित्र से कहानी बनाने के इस औजार को भी कक्षा में हमारे अध्यापक मित्र प्रयोग कर सकते हैं। निश्चित रूप से उन्हें कहानी सुनाने…… पढाने के इस तरीके के अच्छे परिणाम मिलेंगे।
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हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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