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कथा,काव्य,यात्रावृत्त और दर्शन का अद्भुत संगम----‘देख लूं तो चलूं’।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

पुस्तक

देख लूं तो चलूं
लेखक:समीर लाल ‘समीर’
प्रकाशक:शिवना प्रकाशन
पी0सी0लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेण्ट
बस स्टैण्ड,सिहोर(म0प्र0)
भारत
मूल्य– रू0-100/मात्र


कथा,काव्य,यात्रावृत्त और दर्शन का अद्भुत संगम----‘देख लूं तो चलूं’।

                    साहित्य में हर विधा की पुस्तक पढ़ने का अपना अलग आनन्द होता है। कहानी,कविता,नाटक,उपन्यास,व्यंग्य,यात्रा वृत्तान्त सभी विधाओं की अपनी खूबियां होती हैं। सबका अलग अलग प्रभाव और आनंद होता है। और सबसे बड़ी बात यह कि सभी विधाओं के पाठक भी अलग अलग अभिरुचि के होते हैं। किसी पाठक को कविता आनन्दित करती है तो किसी को कथा साहित्य,किसी कू नाटक तो किसी को व्यंग्य। ज्यादातर पाठक किसी एक विधा के लिये ही एक किताब खरीदता और पढ़ता है। इसका कारण यह भी है कि बहुत कम ही पुस्तकें ऐसी मिलेंगी जिनमें आपको हर विधा का रसास्वादन मिल सके।लेकिन हाल ही में प्रकाशित समीर लाल ‘समीर’ की पुस्तक ‘देख लूं तो चलूं’ इस विषय में अपवाद है।अपवाद इसलिये कि यह उन गिनी चुनी किताबों की श्रेणी में रखी जा सकती है जिसमें आपको साहित्य की अलग अलग विधाओं की रसानुभूति हो सकेगी।यानि कि इसे पढ़ते समय आपको कहानी,कविता,उपन्यास,यात्रावृत्त सभी का आनन्द मिलेगा। मेरी एक आदत है। मैं कोई भी पुस्तक बहुत आराम से पढ़ता हूं। यानि कि ब्रेक लगा लगाकर। लेकिन इस मामले में भी यह किताब अपवाद सिद्ध हुई। यानि कि आदत के विरुद्ध मैं इसे एक ही बैठक में पढ़ गया। जबकि ऐसा मेरे साथ बहुत कम ही हुआ है। कुछ गिनी चुनी किताबें हैं जिन्हें मैं सारा काम छोड़कर पढ़ने लगा था।‘देख लूं तो चलूं’ भी उन्हीं किताबों की सूचि में शामिल हो गयी।जबकि इस पुस्तक की कहानी इतनी मात्र है कि लेखक को अपने किसी मित्र के घर गृह प्रवेश की दावत में पहुंचना है। और वह कार से कनाडा के एक हाइवे पर यात्रा कर रहे हैं। सिर्फ़ इतने छोटे से कथ्य को लेकर एक उपन्यासिका लिख देना कलम के एक मजे हुये खिलाड़ी के बूते की बात है। और इस मामले में में समीर जी बधाई के पात्र हैं।
  अपने घर से निकलकर मित्र के घर पहुंचने की इस पूरी यात्रा के दौरान समीर जी ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ दो देशों,दो संस्कृतियों,रीति रिवाजों,दो देशों की राजनैतिक स्थितियों,राजनेताओं,जनता के स्वभाव के अन्तर,आदि को बड़े करीने से शब्दों में बांधा है।इस पुस्तक में जहां आपको प्रवासी भारतीयों का दर्द,उनके वतन छूटने की पीड़ा,उनके मन में चल रही उथल पुथल पढ़ने को मिलेगी वहीं दूसरी ओर भारतवर्ष में उनके रिश्तेदारों,उनके हम वतन मित्रों के मन में चलने वाले विचार भी पढ़ने को मिलेंगे। एक मां बाप जिनका बेटा कनाडा,फ़्रांस,जर्मनी,टोक्यो या अन्य किसी देश में नौकरी करने चला गया है।उस मां पिता के मन की छटपटाहट,बेटे के वापस आने की प्रतीक्षा में जाग जाग कर पूरी रात बिताना,आपस की बातचीत में हर वक्त उस बेटे/बहू/बच्चों की चर्चा मन को कहीं गहराई तक आन्दोलित कर जाती है।
         उपन्यासिका का हर प्रसंग अपने आप में एक अलग कहानी होते हुये भी आपस में इस तरह जुड़ा है कि पाठक किताब शुरू करने के बाद समाप्त करके ही छोड़ेगा।चाहे वो प्रवासी हो गये बेटे के इन्तजार में बातों में रात काटने की कोशिश कर रहे वृद्ध दम्पत्ति हों,जर्मनी में समलैंगिकों की पार्टी की घटना हो,ट्रेन में प्रेमी युगल के किसिंग का दृश्य हो,भारतवर्ष में मित्र के पिता के निधन का प्रसंग हो या इस ढंग के अन्य प्रसंग।जिस तरह आप किसी बहुत सुन्दर मकान में प्रवेश करें और उसके कमरे दर कमरे में प्रवेश करते जा रहे हों---और हर दरवाजा आपको एक अलग खूबसूरत कमरे में पहुंचा रहा हो—एक दरवाजे के अंदर दूसरा,दूसरे के अंदर तीसरा,चौथा और हर बार आपके मुंह से निकले वाह—अरे—अद्भुत—कुछ ऐसा ही अनुभव आप पायेंगे इस पुस्तक को पढ़ते हुये।छोटी छोटी घटनाओं ,प्रसंगों को समीर जी ने जिस प्रकार अपनी हाइवे की कार यात्रा के साथ संयोजित किया है वह अद्भुत है। हर घटना,प्रसंग पढ़कर पाठक चमत्कृत, अभिभूत होता हुआ आगे बढ़ता है। इसमें एक तरफ़ भारत देश है,यहां के गांव हैं,मध्य प्रदेश की यादें हैं तो दूसरी तरफ़ कनाडा है,वहां की संस्कृति है,वहां के लोग हैं,उनका व्यवहार है।
        यहां आपको भाषा और शिल्प का ऐसा अद्भुत अनोखा सामंजस्य मिलेगा जो प्रायःगद्य में कम पढ़ने को मिलता है। भाषा इतनी सहज और प्रवाहमयी कि ऐसा नहीं लगता है कि हम पुस्तक पढ़ रहे हैं।सारे दृश्य एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने से गुजरते जाते हैं। और दृश्यों का यही गुजरते जाना ही इस उपन्यासिका की शैली की सबसे बड़ी विशेषता है। यह किताब पढ़ते हुए मुझे एक और उपन्यास बार बार याद आ रहा था। वो उपन्यास है प्रख्यात समाजवादी चिंतक,आलोचक एवं भूतपूर्व अध्यक्ष,हिन्दी विभाग इलाहाबाद युनिवर्सिटी मेरे गुरु डा0 रघुवंश जी का उपन्यास ‘तन्तुजाल’।रघुवंश जी के ‘तन्तुजाल’ का नायक भी ट्रेन की लम्बी यात्रा में है। और उसकी पूरी यात्रा के साथ घटनाओं,संवेदनाओं, और व्यक्तियों का समूह लेखक से लगभग चार सौ पृष्ठ लिखवा डालता है। पूरी यात्रा में ट्रेन की खटर खट्ट,----सीटी,  स्टेशन,चायवाले वेण्डर,कुली---और उनके बीच से निकलता नायक का चिन्तन ,उसकी सोच,समाज,देश के प्रति उसकी चिन्ताएं—और भी बहुत कुछ। हां यह बात जरूर है कि रघुवंश जी की भाषा अपेक्षाकृत थोड़ा कठिन और बोझिल है।लेकिन इसके बावजूद वह उपन्यास मैंने कई बार पढ़ा है।
             समीर जी की इस उपन्यासिका में उनके कवि मन,यायावरी प्रवृत्ति, और छोटी छोटी चुटकियां लेकर अपनी बात बढ़ाने की विशेष कला स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। और उनकी यही चुटकियां,व्यंग्यात्मक शैली उन्हें अन्य लेखकों से अलग करती है।
                         एक और विशेषता इस पुस्तक की जो बहुत प्रभावित करती है कि हर प्रसंग की शुरुआत तो समीर जी बहुत ही मजेदार और हंसमुख वातावरण से करते हैं।पर वह प्रसंग समाप्त होते होते वो पूरे दार्शनिक हो जाते हैं। इतना ही नहीं प्रसंग की समाप्ति पर पहुंच कर तो हमें मानव जीवन की उन सच्चाइयों,उन आदर्शों,उन रास्तों से रूबरू कराते हैं जिन पर यदि दुनिया चले तो शायद धरती की रंगत ही बदल जाय। देशों,सम्प्रदायों,धर्मों,जातियों के सारे विवाद ही समाप्त हो जायं।लेकिन ऐसा संभव हो  तब न…?कुल मिलाकर अगर मैं यह कहूं कि ‘देख लूं तो चलूं’ घटनाओं,कथ्यों,शब्दों और भाषा का ऐसा अद्भुत कोलाज है जिसे पाठक बार बार पढ़ना चाहेगा।
                        0000
हेमन्त कुमार


समीर लाल समीर
दुनिया में हिन्दी का भला कौन सा ब्लागर,पाठक होगा जो समीर जी से अपरिचित होगा।जबलपुर, मध्य प्रदेश में जन्मे समीर जी अपनी पढ़ाई पूरी करके कनाडा पहुंच गये।जबलपुर से कनाडा तक की इस यात्रा,देश छूटने की पीड़ा,अपने देश भारत के लिये कुछ करने की तमन्ना उनके लेखन में हमें परिलक्षित होती है। कनाडा के प्रतिष्ठित बैंकों में तकनीकी सलाहकार।‘उड़न तश्तरी’ ब्लाग के साथ ‘मोहे बेटवा न कीजो’(लघुकथा संग्रह),‘बिखरे मोती(काव्य संग्रह)’,और ‘देख लूं तो चलूं’(उपन्यासिका)
साथ ही 2007 का विश्व के सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का सम्मान आपके खाते में है।

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सपने दर सपने

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

हम भी दौड़ाते हैं रेल
कभी एक्स्प्रेस कभी सुपर फ़ास्ट
कभी लोकल
अपने कुनबे के सपनों को
नन्हीं सी ढोल में बन्द करके।

अम्मा बापू के सपने
हमारे सपने
सबके सपने
बन्द हैं हमारी छोटी सी ढोल में।
सबके सपनों का बोझ
भूख से कुलबुलाती अंतड़ियां
अलस्सुबह खींच ले जाती हैं हमें
भारतीय रेल की पटरियों पर।

किसी भी एक्स्प्रेस/पैसेंजर ट्रेन
के साथ दौड़ पड़ता है
हमारे सपनों का महल
पहियों की खड़र भड़र
पटरियों की खटर पटर
के साथ मिल जाती है
हमारी ढोल की थाप।

मेरी छोटी बहन
दिखाती है कलाबाजियां
सारे खतरों और भय को
करके दरकिनार
हमारे गले से निकलता बेसुरा
पर बेहद सुरीला गाना
मुन्नी बदनाम हुयी-----
यात्रियों की वाह वाह
फ़रमाइश सहानुभूति के बीच
फ़ैला हुआ हमारा हाथ
हाथों पर गिरते
रूपये एक दो के सिक्के
किसी टीनेजर के कैमरे की
चमकती फ़्लैश
बना देते हैं अनूठा अद्भुत कोलाज
हमारे चारों ओर।

इस कोलाज में बन्द हैं
अम्मा बापू छोटी बहन
हम सभी के सपने
सपनों के साकार होने की उम्मीद में
हम भी दौड़ाते हैं रेल
लखनऊ से मुम्बई
मुम्बई से इटारसी
फ़िर मुम्बई से इटारसी
सुबह से शाम
शाम से रात
सबके सपनों को बन्द करके
अपनी नन्हीं सी ढोलक
की थाप में।
000
हेमन्त कुमार

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जागो लड़कियों

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बालिका दिवस पर दुनिया की सभी बालिकाओं को  समर्पित मेरी यह
कविता---तथा सभी पाठकों/पाठिकाओं को हार्दिक शुभकामनायें।

जागो लड़कियों

जागो लड़कियों जागो
बना दो अपने हस्ताक्षर
इतिहास के सीने पर।

हर गांव गली चौराहों पर
गूंजें बस
तुम्हारे ही गाये हुये गीत
बता दो इस पूरी दुनिया को
कि तुमने भी
सजा लिया है
वक्त की रफ़्तार को
अपनी सुकोमल लेकिन
धारदार हथेलियों पर।

हवाओं से कह दो
वो भी गुनगुनायें
तुम्हारे गीत और राग
हर दिशा में
झरनों की अठखेलियां भी
अब मिला लें ताल
तुम्हारी ही इजाद की हुई
अनोखी नृत्य मुद्राओं से।

बता दो आज पूरी दुनिया को
कि अब नहीं धड़कता है तुम्हारा सीना
खामोश आंगन की चहारदिवारियों में अकेला
अब तुम्हारी
हर धड़कन के साथ है
चिड़ियों का कलरव
झरनों का संगीत
हवाओं की सरसराहट
फ़ूलों की खुशबू
पर्वतों की ऊंचाइयां
और सागर की उत्ताल तरंगों की
गम्भीर गर्जना।

जागो लड़कियों जागो
बना दो हस्ताक्षर
इतिहास के सीने पर।
000
हेमन्त कुमार

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आने वाली किताब---

शनिवार, 13 अगस्त 2011


बेंगाली गर्ल्स डोण्ट----

लेखिका—एल0ए0शेरमन
प्रकाशक-अमेजन बुक्स
                       www.amazon.com
     किसी ऐसी लेखिका,जिसकी आंखें ही बमों के धमाकों,सैनिकों की क्रूरता और अत्याचार तथा निहत्थे लोगों के चीत्कार के बीच खुली हों—के अनुभवों को उसी के शब्दों में पढ़ना अपने आप में एक अलग किस्म का अनुभव होगा। अलग इसलिये क्योंकि लेखिका शिशु होने के नाते इन अनुभवों से खुद भले ही नहीं गुजरी है।लेकिन उसने इन अनुभवों को अपने माता पिता,सगे सम्बन्धियों
  परिजनों से सुना और गहराई से उन परिस्थितियों  को महसूस किया है।
  मैं आज आपको एक ऐसी ही आत्मकथात्मक पुस्तक के बारे में बता रहा हूं।“बेंगाली गर्ल्स डोण्ट” शीर्षक से यह किताब टाम्पा,फ़्लोरिडा की रहने वाली लेखिका,माडल और अभिनेत्री एल0ए0शेरमन ने लिखी है।
          लकी शेरमन की यह आत्मकथा अमेजन बुक्स ने ई बुक के रूप में प्रकाशित की है। और जल्द ही इसका प्रिण्ट वर्जन भी आने वाला है। यद्यपि मैंने अभी इसका कुछ अंश ही पढ़ा है।लेकिन इसकी कहानी कुछ ऐसी है जो निश्चित रूप से हर वर्ग के पाठक को पूरी पुस्तक पढ़ने के लिये आकर्षित करेगी।
        कहानी की शुरुआत 1971 में पाकिस्तान के विभाजन और बांग्ला देश के निर्माण के साथ होती है। उस समय पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा बांगला देश में जो अत्याचार किये गये, निहत्थों का खून बहाने के साथ ही महिलाओं के साथ जिस क्रूरता के साथ बलात्कार और फ़िर हत्या जैसे जघन्य काण्ड किये गये,बच्चों तक को जिस पाशविकता के साथ मारा गया उन सब का यथावत वर्णन आपको इस पुस्तक में मिलेगा।
          इस आत्मकाथात्मक पुस्तक में आपको एक ऐसी लड़की की कहानी पढ़ने को मिलेगी जिसका पूरा परिवार पाकिस्तानी सैनिकों की पाशविकता का शिकार होकर अपनी जन्मभूमि यानि बांग्लादेश छोड़ने को मजबूर हो गया। शेरमन का पूरा परिवार ब्रिटेन चला गया। वहां उस परिवार का जन्मभूमि छोड़ने का दर्द,स्थापित होने का संघर्ष सब कुछ लिखा गया है इस आत्मकथा में।
       15 साल की उम्र में पिता द्वारा जबर्दस्ती बंगलादेश ले जाकर अपनी(पिता की)उम्र के एक व्यक्ति से शादी और फ़िर वहां की घुटन, उससे मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ना,अमेरिका जाकर वहां लेखिका द्वारा खुद अपनी पहचान बनाने और नये जीवन की शुरुआत करने का संघर्ष ये सभी घटनायें पुस्तक को रोचक बनाती हैं।शेरमन की इस पुस्तक में आपको बंगाली एवम मुस्लिम संस्कृति दोनों की झलक मिलेगी।
          साथ ही लेखिका द्वारा जीवन के हर पल में खुशी की खोज के साथ ही अपने परिवार के साथ सन्तुलन बनाने का उल्लेख उनके संघर्षशील जीवन का परिचायक है। जीवन के प्रति यह जिजीविषा निश्चित ही पाठकों को कहीं न कहीं प्रभावित करेगी।
           यद्यपि यह किताब अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी है फ़िर भी मुझे नहीं लगता कि थोड़ा भी अंग्रेजी की समझ रखने वाले पाठकों को इसे पढ़ने में दिक्कत आयेगी। क्योंकि परिस्थितियों के अनुकूल शब्दों का चयन और भाषा का प्रवाह शेरमन की लेखन शैली की विशेषता है।
                मुझे लगता है कि जीवन संघर्ष,पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों तथा बंगला देश के मुक्ति आन्दोलन को जानने ,समझने और पढ़ने वाले पाठकों को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिये।
                                     ----
हेमन्त कुमार





लेखिका—एल0ए0शेरमन
लेखिका होने के साथ ही एक कुशल माडल और अभिनेत्री हैं। “बेंगाली गर्ल्स डोण्ट”इनकी दूसरी पुस्तक है।



  

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रिमझिम पड़ी फ़ुहार

बुधवार, 3 अगस्त 2011


 रिमझिम पड़ी फ़ुहार
भीग उठा बादल के नीचे
पूरा घर संसार।

डूबा आंगन छप्पक छैया
बच्चे ढूंढ़ें छोटी नैया
मेढक कूदें ताल तलैया
इंद्र्धनुष में पंख पसारे
दिखते रंग हजार ।
रिमझिम पड़ी फ़ुहार…।

हल की फ़ाल में साम धराने
धरती का सोंधापन पाने
खाद बीज का जुगत लगाने
बैलों की घंटी सजवाने
निकले सब बाजार ।
रिमझिम पड़ी फ़ुहार-----।

बंसवारी में बोले झींगुर
हंसी दामिनी कड़क कड़क कर
गोरी सहमी घूंघट के भीतर
सपने बादल के पंखों पर
लेके आये बहार ।

रिमझिम पड़ी फ़ुहार
भीग उठा बादल के नीचे
पूरा घर संसार ।
00000
हेमन्त कुमार

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कटघरे के भीतर

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

खून से रंगी सडकों पर
अपने कदमों के निशान बनाते हुए
निकल पड़े हैं
हजारों लाखों बच्चे
पूरी दुनिया के घरों से.

इनके हाथों में हैं मशालें
चेहरे हैं आंसुओं से तर बतर
मन में समाया है एक खौफ
कानों में गूँज रही है धमाकों की आवाजें
और आँखों में चस्पा हैं तमाम सवाल
जिनका जवाब देना है
हमें/आपको/हम सब को.

इन बच्चों की लाल पड़ गई सूनी ऑंखें
जानना चाहती हैं
अपने पैदा होने का कसूर
की क्यों वे सभी बना दिए गए अनाथ
चंद मिनटों में
कुछ उन्मादियों द्वारा की गयी हैवानियत से
की क्या होगा उनका भविष्य
की कैसे मिटेगा उनके चेहरों पर
छाया हुआ खौफ
की कैसे वे उबर सकेंगे पूरे जीवन भर
रात में दिखने वाले भयावह सपनों के प्रहार से
की कौन बुलाएगा अब उन्हें बेटा कह कर
की किसके आँचल में छुप सकेंगे वे
उनींदी आँखों से भयावह काली आकृतियाँ देख कर
की कैसे वे भी बिता सकेंगे एक सामान्य बच्चे का जीवन.

ये सभी सवाल पूछ रहे हैं
ये सारे बच्चे
हम सभी से
सोचिये जरा सोचिये
कुछ थोड़ा बहुत तो बोलिए
क्या जवाब है आपके हमारे पास
इनके सवालों का?

हम सब खड़े होकर कटघरों में
गीता पर हाथ रख कर
सच बोलने की शपथ तो खा सकते हैं
परन्तु क्या दे सकते हैं
कोई आश्वासन..कोई सबूत..कोई प्रमाण
इन बच्चों को
इनके बचपन को सुरक्षित रखने का.

आप भी जरा विचारिये
डालिए अपने दिमाग पर कुछ जोर
की क्या जवाब देना है इन बच्चों को
कब तक चलता रहेगा
दहशतगर्दी का ये खेल
कब तक बारूद के धमाकों
और संगीनों के साये में
खौफनाक मंजर की तस्वीरों से
आतंकित होते रहेंगे ये बच्चे?

00000000

हेमंत कुमार

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रस्म में दफन इन्सानियत

बुधवार, 15 जून 2011

चिडियों का झुंड जीवन
उडना साथ साथ
सांस फेफ़ड़ों में 
जीवन होना।

पर दो जोडी आंखों वाले  
जादूगर ने खींच लिया था
उस मासूम की नजरों को 
अपनी ओर
जो दूर गगन की छाँव में
सकून से उड़ रही थी।

नजर यहाँ एक रस्म है
जो  उड़ता है वह खिंचता भी है
इस तरह वह थी झुंड से दूर
साथ जादूगर के।

वह चंगुल मे थी
पर
वक्त का ख्याल था कि
नसीब है उसका।

चिड़िया ने लम्हा लम्हा सांस 
पिला दिया था
दो जोडी आंखों को
पर हर बार बडी ही निर्ममता से
वह एक एक कर
पंखो को खींचता
रिसते खून पर कालिख पोत देता।

आज बेबस बेपंख थी
वह
चोंच मारना सीख रही थी
पर डर भी जाती
अपने पास से
गुजर जाने वाली हवाओं से भी।

रस्म भी ऐसी क्यों होती है
जो दफन करती है इंसानियत !!!!!
       ---
कवियत्री---सन्ध्या आर्या----परिचय उन्हीं के शब्दों में----पिछले 14 सालो से मुम्बई मे प्रवास।   पिछ्ले दो साल से ब्लोग पढती रही हूँ और एक साल से कविताये लिख रही हूँ। साहित्य से कोई खास लगाव नही रहा, पर पता नही कब कुछ लिखने लगी। और लोगो ने उसे कविता कहना शुरू कर दिया। हाँ, मुम्बई के साहित्यिक सांस्कृतिक  कार्यक्रमो मे अक्सर हिस्सा लेती रहती हूँ।

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पार रूप के

बुधवार, 8 जून 2011

पुस्तक समीक्षा
समीक्ष्य पुस्तक--पार रूप के
लेखक—नर्मदा प्रसाद उपाध्याय
प्रकाशन—मनस्वी प्रकाशन
हरदा(म0प्र0)।
मूल्य—रूपये 500 मात्र।
  “पार रूप के” हिन्दी के सुपरिचित ललित निबन्धकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के 28 ललित निबन्धों का संग्रह है। जिसकी विषय वस्तु उनके पूर्व प्रकाशित संग्रहों से बिल्कुल अलग हटकर है। ये निबन्ध भारतीय संस्कृति,परंपरा और इतिहास के माध्यम से भारतीय चित्रकला में रूप के उस आंतरिक सौन्दर्य से हमारा परिचय कराते हैं,जो कि अब तक प्रायः अनदेखा सा बना हुआ था। इन निबंधों में रामायण और महाभारत पर आधारित चित्रों से लेकर बौद्ध कालीन और मुगल शासकों के समय में बनाये गये लघुचित्रों को सामने रखकर भारतीय रूप परंपरा की एक नये ढंग से विवेचना की गयी है। इन निबंधों को पढ़ना रूप के पार जाकर रूप में झांकने की एक ऐसी  अन्तर्यात्रा है,जिसमें रूप की पहचान से लेकर रूप के साक्षात्कार और उसकी धरोहर को प्रतिष्ठित करने का लेखक द्वारा विनम्र प्रयास किया गया है।
              उत्कृष्ट साज सज्जा और आवरण पर दिये गये ‘कुंज में राधा’शीर्षक लघुचित्र वाली इस किताब में देश विदेश के तमाम प्रमुख संग्रहालयों के साथ-साथ कला संग्रहालयों के व्यक्तिगत संग्रहों में उपलब्ध तीन दर्जन लघुचित्रों की प्रतिकृतियां भी प्रकाशित की गयी हैं,जो इस किताब के महत्व को और भी रेखांकित करती हैं।
                               ----
समीक्षक----

कौशल पाण्डेय
हिन्दी अधिकारी
आकाशवाणी,शिवाजीनगर
पुणे-411005
मोबाईल न:09823198116



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21वीं सदी का हिन्दी बाल साहित्य: आडियो,वीडियो कार्यक्रम इंटरनेट एवं डिजिटल पुस्तकें

शनिवार, 21 मई 2011

पिछले मार्च में नेशनल बुक ट्रस्ट इन्डिया ने वाराणसी के काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग में बाल साहित्य पर एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया था। उसमें मुझे भी आमन्त्रित किया गया था। मैंने वहां जो रिसर्च पेपर पढ़ा था उसे यथावत प्रकाशित कर रहा हूं। इसमें यदि बच्चों के किसी ब्लाग का लिंक रह गया हो तो आप सुझायें। मैं संशोधित कर दूंगा। क्योंकि नेशनल बुक ट्रस्ट सम्भवत:इस सेमिनार में प्रस्तुत पेपर्स को कम्पाइल करके पुस्तक रूप में प्रकाशित करेगा,जो कि बाल साहित्य पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज रहेगा। 
 21वीं सदी का हिन्दी बाल साहित्य:
आडियो,वीडियो कार्यक्रम इंटरनेट एवं डिजिटल पुस्तकें

   इधर मुझे लगातार हिन्दी साहित्य से संबंधित कई सेमिनारों,संगोष्ठियों और समारहों में जाने का अवसर मिला।इन गोष्ठियों,सेमिनारों में खूब गरमागरम बहसें,साहित्यिक चर्चायें हुईं। हिन्दी साहित्य पर मंडरा रहे इण्टरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के खतरों की बातें भी की गयीं। लेकिन ये चर्चायें काफ़ी आधी अधूरी सी लगीं।इनमें कुछ कमी खटक रही थी।और वह कमी थी हिन्दी के बाल साहित्य की चर्चा।
                     आज जबकि प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा जा रहा है और प्रकाशित भी हो रहा है। ऐसे में किसी भी साहित्यिक सेमिनार,संगोष्ठी में बाल साहित्य की चर्चा न होना इस बात का द्योतक है कि आज भी हिन्दी में बाल साहित्य को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा रहा है।
                    आज बहुत खुशी की बात है कि नेशनल बुक ट्रस्ट की इकाई राष्ट्रीय बाल साहित्य केन्द्र ने हिन्दी बाल साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है।मुझे भी इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में लेख पढ़ने के लिये आमंत्रित किया गया इसके लिये मैं केन्द्र के संपादक श्री मानस का आभारी हूँ।
                    आडियो,वीडियो कार्यक्रम इंटरनेट एवं डिजिटल पुस्तकें -ये चारों ही माध्यम अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।अलग अस्तित्व वाले होते हुए भी आज के विकसित तकनीकी युग में हम इन्हें एकदम अलग करके इनका मूल्यांकन नहीं कर सकते।कारण यह कि उपरोक्त चारों माध्यमों में किसी पर भी काम करते हुए हमें अन्य तीनों माध्यमों की ज़रूरत भी पड़ती है और सहायता भी लेनी पड़ती है।
                  प्रश्न उठता है कैसे? मान लीजिये हम मुंशी प्रेमचन्द या पन्त जी के ऊपर किसी ब्लाग या डिजीटल बुक के लिये कोई कार्यक्रम बना रहे हैं तो हमें पंत जी का आडियो आकाशवाणी के या किसी अन्य संग्रहालय से ही मिल सकेगा।यदि हम महात्मा गांधी के ऊपर कोई मल्टीमीडिया कार्यक्रम बना रहे हैं तो उनके पुराने फ़ुटेज लेने के लिये हमें फ़िल्म आर्काइव या सूचना प्रसारण मंत्रालय की लाइब्रेरी तलाशनी ही पड़ेगी।इसीलिये इन माध्यमों को हम एकदम से अलग नहीं कर सकते।हां ये ज़रूर कह सकते हैं कि आडियो-वीडियो-इन्टरनेट- और डिजीटल या ई पुस्तकें हमारे इलेक्ट्रानिक माध्यम के बढ़ते चरण हैं।
              मैं पहले बात शुरू करूंगा आडियो कार्यक्रमों की।आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से अलग अलग आयु वर्ग के बच्चों के लिये बाल संघ,बाल जगत,नन्हें मुन्ने कार्यक्रमों का प्रसारण तो काफ़ी पहले से हो रहा था।इन कार्यक्रमों का उद्देश्य बच्चों का मनोरंजन एवं शिक्षा दोनों ही था।इनमें बच्चों के लिये कहानियाँ,नाटक,कवितायें प्रसारित होते थे।इसके साथ ही इन कार्यक्रमों में बच्चों को भी अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का मौका दिया जाता था।1979 में सी आई.ई.टी नई दिल्ली ने जयपुर एवं अजमेर के 500 स्कूलों के लिये भाषा शिक्षण की एक परियोजना की शुरूआत की ।इस कार्यक्रम का उद्देश्य भी बच्चों को पाठ्य पुस्तकों से अलग हटकर कहानियों,गीतों,नाटकों के माध्यम से भाषा की शिक्षा देना था।

          बाद में आकाशवाणी के अन्य केन्द्रों से भी शैक्षिक रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण होने लगा। एन.सी.ई.आर.टी ,सी.आई.ई.टी तथा उत्तर प्रदेश लखनऊ के एस.आई.ई.टी ने भी बच्चों के लिये सैकड़ों रेडियो कार्यक्रमों का निर्माण एवं प्रसारण किया। इस क्रम मैं एन.सी.ई.आर.टी नई दिल्ली,आकाशवाणी लखनऊ तथा बाल एवं महिला विकास विभाग(उप्र) द्वारा चलाये गये कार्यक्रम प्रोजेक्ट चीयर का भी उल्लेख मैं विशेष रूप से करना चाहूँगा।1992 में इस प्रोजेक्ट के अन्तर्गत 3-6 वर्ष के बच्चों के लिये 15 मिनट के लगभग 150 कार्यक्रमों का निर्माण करके उन्हें आकाशवाणी लखनऊ द्वारा ‘फ़ुलबगिया’नाम के कार्यक्रम में प्रसारित किया गया। इस कार्यक्रम के लिये आलेख तैयार करने वाले लेखक थे—डा0अरविन्द दुबे,रज्जन लाल,शकुन्तला वर्मा,दीक्षा नागर और डा0 हेमन्त कुमार—कर्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता थे—श्री विजय बैनर्जी।15 मिनट अवधि का यह कार्यक्रम सप्ताह में दो बार प्रसारित होता था।फ़ुलबगिया कार्यक्रम की लोकप्रियता को देखते हुए ही बद में इसका प्रसारण  आकाशवाणी के पोर्ट ब्लेयर एवं उदयपुर,अजमेर आदि केन्द्रों से किया गया।इतना ही नहीं एन.सी.ई.आर.टी ने इन कार्यक्रमों का संकलन तैयार करके विक्रय का भी प्रयास किया।

   सरकारी प्रयासों के साथ ही उसी के समानान्तर प्राईवेट कैसेट कंपनियों द्वारा भी बच्चों के लिये बालगीतों,कहानियों के आडियो कैसेट्स तैयार किये जा रहे थे।यद्यपि इनमें हिन्दी के कार्यक्रमों की संख्या कम और अंग्रेजी कार्यक्रमों की संख्या अधिक थी।
     इन्हीं रेडियो कार्यक्रमों की ही तरह दूरदर्शन पर भी बच्चों के लिये कार्यक्रमों का प्रसारण प्रारंभ हुआ।दूरदर्शन पर बच्चों के लिये ‘विक्रम बेताल’,‘पंचतंत्र’,‘एक दो तीन चार’,‘ चांद सितारे’,‘ दादा दादी की कहानियां’ जैसे अच्छे कार्यक्रम प्रसारित हुए।1986 से एस आई ई टी के लखनऊ,पटना केन्द्रों से बच्चों के लिये शैक्षिक वीडियो कार्यक्रमों का प्रसारण होने लगा।जबकि सी.आई.ई.टी नई दिल्ली द्वारा निर्मित कार्यक्रम पहले से ही प्रसारित हो रहे थे।उनके केन्द्रों द्वारा हज़ारों वीडियो कार्यक्रमों का निर्माण एवं प्रसारण किया गया है।सी आई ई टी के मियां गुमसुम और बत्तो रानी,टर्रमटूं,बंदर और मगरमच्छ,घोड़े की कहानी,कैसे होती हैं आवाजें,तथा एस आई ई टी लखनऊ के—नटखट मुर्गा,हीरे मोती की पत्तलें,शून्य,लाओ लाओ और लाओ,गीदड़ की रिपोर्ट,मुनिया ने सीखा जोड़,चूं चिरैया कैसे उड़ी---आदि कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुये हैं।

       इसी क्रम में हम अगर इन्टरनेट और डिजिटल पुस्तकों या ई बुक्स की बात करें तो इन दोनों के माध्यम से भी बच्चों के लिये काफ़ी कुछ रचनात्मक हो रहा है। इन्टरनेट पर तो जहां बड़ों के लिये हज़ारों की संख्या में ब्लाग्स लिखे जा रहे हैं वहीं बच्चों के लिये भी बहुत सारे लेखक ब्लाग्स पर अच्छी रचनायें प्रकाशित कर रहे हैं। इन ब्लाग्स में कुछ का मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। बच्चों के प्रमुख ब्लाग्स में ‘परीकथा(कनाडा की मानसी चटर्जी)’,बाल सजग(कानपुर,सिरीष,महेश),नन्हें सुमन(रूप चन्द शास्त्री मयंक),‘आओ सीखें हिन्दी( रानी पात्रिक, अमेरिका)’,‘नन्हा मन(सीमा सचदेव),‘सरस पायस (रावेन्द्र रवि उत्तराखण्ड)’,‘बालसभा(कविता वाचक्नवी,लंदन)’,‘फ़ुलबगिया(हेमन्त कुमार)’,बालमन( ज़ाकिर अली रजनीश),मीठे बोल (रश्मि प्रभा),अभिव्यक्ति पत्रिका (शारजाह से पूर्णिमा बर्मन) और बालचर्चा मंच(खटीमा उत्तराखण्ड के डा0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक),बालदुनिया(आकांक्षा यादव,पोर्टब्लेयर) हैं।

         इन सभी ब्लाग्स में कुछ ब्लाग के लेखक सिर्फ़ अपनी कहानियां,बालगीत प्रकाशित कर रहे हैं। कुछ ब्लाग्स के लेखक अपने साथ ही अन्य लेखकों,गीतकारों की रचनाओं को भी प्रकाशित कर रहे हैं। चार ब्लागों का संचालक होने के नाते कम से कम मैंने बच्चों के इन सभी ब्लाग्स को पढ़ा है और मैं इतना दावे के साथ कह सकता हूं कि इन पर लिखा जा रहा बाल साहित्य प्रिण्ट में आ रहे बाल साहित्य से किसी भी दशा में कम नहीं आंका जा सकता।।बल्कि एक मायने में इसे हम ज्यादा समृद्ध कह सकते हैं।वो यह कि चूंकि नेट पर गूगल ने ब्लाग्स की सुविधा अभी तक नि:शुल्क रखी है इसलिये ज्यादातर ब्लागर बच्चों के ब्लाग्स में रचनायें काफ़ी सजा संवारकर प्रकाशित कर रहे हैं।और इसमें योगदान गूगल (स्पेस देने के लिये) और ब्लागर्स का है जो कि एक कहानी या बालगीत को इतने आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से प्रकाशित कर रहे हैं।

         नेट पर उपलब्ध इन ब्लाग्स के अलावा भी कई वेबसाइट्स बालसाहित्य के संकलन का कार्य कर रही हैं।यद्यपि इन  वेबसाइट्स का उद्देश्य व्यवसायिक ज़्यादा है। मतलब कि वे अपनी वेबसाइट पर जो भी सामग्री रख रहे हैं उसे मूल्य देकर ही खरीदना होगा।फ़िर भी वे नेट पर वेबसाइट्स तो उपलब्ध करवा ही रहे हैं

  अब बात आती है डिजीटल पुस्तकों की। तो जैसा कि मैं पहले ही उल्लेख किया है कि कई वेबसाइट्स बच्चों की कहानियों,बालगीतों, या नाटकों को ई-बुक का स्वरूप देकर नि:शुल्क या सशुल्क पाठकों को अपलब्ध करवा रही हैं। ऐसी वेबसाइट्स में कुछ का उल्लेख मैं यहां करूँगा।
               सबसे पहली और मेरी दृष्टि में अच्छी वेबसाइट जिसका उल्लेख मैं करना चाहूँगा वो है-
1-      www.akhlesh.com- इस वेबसाइट पर बच्चों के लिये तैयार अल्फ़ाबेट्स(हिन्दी अंग्रेज़ी दोनों में),हिन्दी कहानियां,नर्सरी राइम्स और एक किताब देशभक्ति के गीतों की है।
2-      दूसरी महत्वपूर्ण साइट है-  ArvindGuptasToysBooksGallery
      इस वेबसाइट पर डा0 अरविन्द गुप्ता ने विज्ञान को विज्ञान को बच्चों के दैनिक जीवन से जोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस वेबसाइट की उल्लेखनीय ई-पुस्तकें हैं-1सेवाग्राम से शोधग्राम तक(डा0 अभय बैंग) 2-साफ़ माथे का समाज( अनुपम मिश्र) 3-दीवार का इस्तेमाल(कृष्ण कुमार) 4-चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा 5-मन के लड्डू (बांग्ला लोककथा)

6-पेब्लस इन्फ़ोटेक मुंबई की- Dovemulti mediaLtd
        प्राइवेट वेबसाइट्स के अलावा भी इधर 2008 में मानव संसाधन मंत्रालय के शिक्षा विभाग ने पूरे देश के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्कूलों के लिये इण्टरऐक्टिव सी डी का निर्माण भी करवाया है।ये इण्टरऐक्टिव सी डी हिन्दी बेल्ट के छात्रों के लिये सी.आई.ई.टी नई दिल्ली और एस.आई.ई.टी लखनऊ ने तैयार की है।कुछ राज्यों में ये इण्टरऐक्टिव सी डी प्राइवेट कंपनियों से भी तैयार करवाई जा रही हैं।इसके साथ ही हर राज्य अपने प्रादेशिक भाषाओं में भी ऐसी सी डी तैयार करवा रहे हैं।उनका उद्देश्य यही है कि बच्चा खुद सीडी देखकर पाठ/कहानी पढ़ सके और उसका लाभ उठा सके।

   यदि हम बाल साहित्य की दृष्टि से पिछले दशक में निर्मित आडियो/वीडियो कार्यक्रमों तथा इण्टरनेट और ई-बुक्स पर नज़र डालें तो पाएँगे कि इस दिशा में काफ़ी कुछ नया काम हुआ है और हो रहा है।परन्तु एक सबसे बड़ी दिक्कत जो हमारे समक्ष है और हमें इस समस्या को गंभीरता से लेकर इसका निदान सोचना होगा वह यह है की बच्चों तक इनकी पहुंच कैसे बनाई जाये?

क्योंकि न तो हर बच्चे के पास रेडियो टू इन वन सेट है,न उसे दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रमों को देखने के लिये टीवी है/फ़िर कंप्यूटर और इण्टरनेट तक उसे हम कैसे पहुंचाएं?

       चूंकि मैं रेडियो पर बतौर लेखक और शैक्षिक दूरदर्शन पर कार्यक्रम निर्माता के रूप में पिछले 25 वर्षों से जुड़ा हूँ तो मैं इन कार्यक्रमों की पहुंच के बारे में भली भांति जानता हूं।मुझे लगता है कि जितना प्रयास हमारी सरकार आडियो/वीडियो , कार्यक्रमों,इण्टरऐक्टिव सी डी या डिजीटल पुस्तकों के निर्माण के लिये कर रही हैं उससे कहीं ज़्यादा प्रयास और मेहनत इन सामग्रियों को बच्चों तक पहुंचाने का भी करें तभी इलेक्ट्रानिक माध्यमों के कार्यक्रमों को सफ़ल बनाया जा सकेगा।
                                                           -----
बच्चों के चर्चित और पठनीय ब्लाग्स----
7-Balcharchamanch— http://mayankkhatima.blogspot.com
9-abhivyakti patrika— www.abhivyakti-hindi.org
10-Ao sikhen hindi— http://aoseekhenhindi.blogspot.com
                                            0000
 हेमन्त कुमार

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? 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