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वह सांवली लड़की

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

 

आज मेरे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की दसवीं पुण्य तिथि है । 2016 में आज ही के दिन वो हम सभी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गए थे । अब उनके अप्रकाशित साहित्य को पाठकों के सामने लाना ही मेरा लक्ष्य है ।इसी लिए आज मैं उनकी एक अप्रकाशित कहानी “वह सांवली लड़की” अपने ब्लाग “क्रिएटिव कोना” पर प्रकाशित कर रहा हूं ।


 कहानी 

                                                     


                                                       वह सांवली लड़की                                              

                                                                                                  

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

           

            


रंग पक्का सांवला और नाम हो चांदनी । क्या सोचेंगे आप ? यही न कि नाम और रूप रंग में कोई तालमेल नहीं । जिस दिन चांदनी ने उस कालेज में  बी. ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया उसी दिन से छात्रों के जेहन में यही बात कौंधने लगी । किसी की आंखों में व्यंग होता, किसी की मुस्कराहट में । कोई ऐसे ढंग से हाय हैलो करता कि उसमें भी व्यंग जरूर झलक उठे । चांदनी सब समझती थी । मगर वह इन सब से बेखबर बन केवल एक हल्की सी मुस्कान बिखेरती सीधे अपनी क्लास में चली जाती ।

            

 केवल नाम और रंग ही होता तो कोई बात नहीं थी । वह तो साफ साफ एक कस्बाई लड़की नजर आती थी । किसी छोटे मोटे कस्बे से इण्टर पास कर आई हुई । बड़े शहर के उस कालेज के आधुनिक रूप रंग में ढले हुए छात्र छात्राओं को भला उसकी शालीनता क्या नजर आती । हां दस पांच दिनों में ही पूरी क्लास ने यह जरूर जान लिया कि वह मेधावी भी है । बोर्ड परीक्षा की मेरिट लिस्ट में एक स्थान बनाने वाली लड़की । इस बात की गवाही हर टीचर का चेहरा देने लगता जो उसका प्रोजेक्ट देखते । वे कभी प्रोजेक्ट की फाइल देखते कभी चांदनी का चेहरा ।

            

रंगनाथ क्लास का मुंहफट छात्र था । एक दिन वह  चांदनी से पूछ बैठा – “मैडम, क्या हमें बताएंगी कि आप कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हैं ?

            


चांदनी कुछ नहीं बोली । बस चुपचाप उसे देख भर लिया । तभी नीलम के मुंह से भी निकला - “हां हां, जरूर बताइए । हम भी तो उसे खा कर अपने दिमाग को तरो ताजा रख सकें ।

            


रंगनाथ और नीलम की ये फब्तियां सुन पूरी क्लास ठठा कर हंस पड़ी । मगर चांदनी के चेहरे का सौम्य भाव इससे जरा भी नहीं प्रभावित हुआ । वह मुस्करा कर केवल इतना बोली - “हां हां, क्यों नहीं बताऊंगी, जरूर बताऊंगी ।” फिर उसका ध्यान अपनी कापी पर चला गया ।

             


चांदनी गर्ल्स हास्टल में रहती थी । वह छुट्टी का दिन था । लड़कियां हास्टल के मैदान में बालीबाल खेल रही थीं । कुछ हरी घास पर बैठी गपशप कर रही थीं । कोई मिलने आए अपने परिजनों से बातचीत में व्यस्त थीं । साथ आए बच्चे हरी घास पर लोट पोट लगा रहे थे । वहीं कारीडोर में एक किनारे कुर्सी पर बैठी हास्टल वार्डन मिसेज भटनागर सारे दृश्य देख रही थीं । उनके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी । इन सारे दृश्यों को देखते हुए भी उनकी आंखें जैसे कहीं और खोई हुई थीं । उनका हमेशा प्रसन्न रहने वाला चेहरा इस वक्त चिन्ता में डूबा हुआ था । कारीडोर में लड़कियां इधर से उधर भाग दौड़ मचाए हुई थीं । मगर शायद किसी का भी ध्यान मिसेज भटनागर पर नहीं गया । अगर गया भी हो तो किसी ने उनके चेहरे की उदासी के बारे में पूछने की जरूरत नहीं समझी ।

            


अचानक मिसेज भटनागर के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा । उन्होंने  सिर उठा कर देखा - वह चांदनी थी । “कहां खोई हुई हैं मैडम ? आपकी तबियत तो ठीक है न ? चांदनी ने पूछा ।

           


नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । मैं ठीक हूं चांदनी ।” मिसेज भटनागर बोलीं ।

           


नहीं मैडम । कुछ तो है । छिपाइए मत । आपका चेहरा बता रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं ।

            


मिसेज भटनागर की आंखें नम हो आईं । चांदनी के शब्दों में न जाने कैसा अपनापन था कि उनसे बताए बिना नहीं रहा गया । वे अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को आंचल से पोंछती हुई भरे गले से बोलीं -  “ चांदनी, कुछ देर पहले ही मेरे घर से फोन आया है कि मेरे बेटे की तबियत ठीक नहीं है । वह मुझे बहुत याद कर रहा है । मैं कुछ समय के लिए उसे यहां ले आना चाहती हूं । मगर यहां मैं हर समय तो उसके पास रह नहीं सकती । घर से कोई और आ नहीं सकता । ऐसे में कौन रहेगा उसके पास ?

            


बस इतनी सी बात के लिए आप परेशान हैं । वाह मैडम, बस समझ लीजिए कि आपकी प्राब्लम दूर हो गई । उदासी और चिन्ता को दूर भगाइए । घर जाकर बच्चे को ले आएं ।”

          

 


मगर कैसे ?

           


मैं हूं न यहां ।” चांदनी बोली ।

            


मिसेज भटनागर ने उसका हाथ पकड़ लिया । वे चकित होकर उसे देखती भर रहीं । उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । क्या हास्टल की एक सामान्य छात्रा इतना आत्मीय भाव प्रकट कर सकती है । आज ऐसा पहली बार हुआ था । पर चांदनी की आंखों में से झांकती निश्छलता कह रही थी - हां मैडम, यह सच है । मुझे हर किसी के दर्द और चिन्ता की पहचान हो जाती है । मिसेज भटनागर की आंखों में फिर एक बार आंसू छलक आए ।

          

  


ना ना ना ----- मैडम, आपकी ये आंखें आंसू बहाने के लिए नहीं हैं । जो मैने कहा है उसे कीजिए ।” चांदनी इस बार स्वयं अपने रूमाल से उनके आंसू पोंछती हुई बोली ।

            



धीरे धीरे साल बीत गया । चांदनी बी. ए.द्वितीय वर्ष में पहुंच गई । वह टैलेन्टेड तो थी ही, उसके व्यवहार ने भी अब तक कालेज में उसकी अपनी एक पहचान बना दी थी । मगर रंगनाथ जैसे साहबजादों को अभी भी यह सब चांदनी का एक ढोंग मात्र लगता था । अब भी वे मौका पाने पर उस पर व्यंग कसने से नहीं चूकते थे ।

            


नया सत्र शुरू होते ही हमेशा की तरह इस बार भी अपनी अपनी कक्षाओं में प्रथम आए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित करने की घोषणा हुई । इसमें उन छात्र छात्राओं को अपने अभिभावकों को भी साथ ले आने के लिए कहा जाता था । चांदनी अपनी कक्षा में प्रथम आई थी ।

            


रंगनाथ के लिए चांदनी पर फब्ती कसने का यह अच्छा मौका था । उसने अपने दोस्तों से कहा -“चलो अच्छा है । इस बार हमें भी मैडम के मम्मी पापा के दर्शन हो जायेंगे ।”

            


मम्मी पापा --- अरे बेवकूफ राम, मैडम गांव से आई हैं । वहां मम्मी पापा कहां होते हैं ।” एक दोस्त बोला ।

           


फिर ? रंगनाथ ने पूछा ।

           


अपनी अम्मा और बापू को ले कर आएंगी मैडम ।” दोस्त के इस जुमले पर पूरी दोस्त मंडली खिलखिला पड़ी ।

            


चलो, तब तो यह भी देख लेंगे कि मखमल की चादर पर टाट का पैबन्द कैसा नजर आता है ?” रंगनाथ इस पर भी चुटकी लेने से नहीं चूका ।

           


समारोह का दिन आया । प्रिंसिपल और स्टाफ के साथ शहर के कुछ माननीय भी सामने स्टेज पर बैठे हुए थे । तभी प्रिंसिपल ने सब लोगों के स्वागत की औपचारिकता पूरी करने के बाद एक एक कर सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को बुलाना शुरू किया । चांदनी का नाम लेते ही पूरे कालेज की नजर उधर उठ गई ।

            


चांदनी एक अधेड़ उम्र की औरत का हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हुई धीरे धीरे स्टेज की ओर बढ़ रही थी । वह एक सामान्य हिन्दुस्तानी औरत जैसी थी । वहां उपस्थित दर्जनों सजी संवरी शहरी औरतों से बिलकुल अलग । मगर सलीके से पहनी हुई सफेद साड़ी, खिचड़ी हुए बालों के बीच सिन्दूर विहीन मांग, थकी हुई दृष्टि के बावजूद सजग आंखें, चेहरे पर झलकता उसका आत्मविश्वास । सब मिला कर उसे मामूलीपन में भी एक खासियत प्रदान कर रहे थे । वह चांदनी की मां थी । वहां उपस्थित अभिभावकों में पहली ऐसी मां थी जिसे कोई छा़त्र अपने साथ ही स्टेज पर ले गया ।

           


उसके स्टेज पर पहुंचते ही प्रिंसपल ने खड़े होकर उसका स्वागत किया । फिर एक कुर्सी मंगा कर उसे बैठाया । अब आगे चांदनी को बोलना था । उसने थोड़े से नपे तुले शब्दों में बताया -“ये मेरी मां है । गांव में ही रहती है । पिता जी के जाने के बाद मुझे कभी उनकी कमी नहीं अनुभव होने दी इन्होंने । मां और पिता दोनों की जगह ले ली । मुझे पढ़ाने के इनके इरादों में जरा भी कमी नहीं आई । आज मैं जो आप लोगों के बीच हूं वह इन्हीं की बदौलत ।”

            


काफी समय पहले मेरे कुछ मित्रों ने पूछा था - मैं कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हूं । मैंने उनसे वादा किया था कि समय आने पर जरूर बताऊंगी । आज वह वादा पूरा करने का समय आ गया है । मैं अपने उन प्रिय मित्रों को बताना चाहूंगी कि वह चक्की है मेरी मां । तमाम मुश्किलों और तकलीफों में पिस कर भी इन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया । इनका प्रोत्साहन पा कर ही मैं आगे बढ़ रही हूं । मेरा आज का मुकाम आपके सामने है । इससे भी बड़े मुकाम को मैं हासिल करना चाहती हूं । उसके लिए मुझे आपकी शुभकामनाएं चाहिए ।”

           


चांदनी के चुप होते ही पूरा हाल तालियों से गड़गड़ा उठा । प्रिंसिपल ने स्वयं उठ कर मां को स्टेज की सीढ़ियों से नीचे उतरने के लिए सहारा दिया । रंगनाथ और उसके दोस्तों को आज पहली बार अनुभव हुआ - उस सांवली लड़की का नाम ही चांदनी नहीं है, उसके भीतर चांदनी सा उजला एक दिल भी है ।

            


बाहर निकलते ही चांदनी को बधाई देने वाला पहला व्यक्ति था रंगनाथ, दोनों हाथ जोड़े और आंखों में क्षमा याचना लिए हुए । चांदनी ने गद्गद् होकर उसके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया ।



०००



प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव



परिचय: 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में पैदा हुए प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव मुख्यतः ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं.चाहे उनका बाल साहित्य हो या फिर बड़ों के लिए लिखी गई कहानियां या नाटक--- उनकी अधिकांश रचनाओं में हमें गांव की मिट्टी का सोंधापन जरूर मिलेगा.

शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों, नाटकों, लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों,नाटकोंकी पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।सन 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशित बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” काफी चर्चित।

नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से  प्रकाशितही  बाल नाटक संग्रहएक तमाशा ऐसा भी 

   इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।  31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।

 

 

 

 

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