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चिड़िया

शनिवार, 4 जुलाई 2009

चिड़िया तो आखिर चिड़िया है
उसको बेचारी को कहां पता कि हम
सभ्य हो रहे हैं
और हमारा विकास
पूरी प्रगति पर है ।

चिड़िया तो खोज रही है
सूनी आंखों से
अपना नन्हां सा घोसला
और नन्हें बच्चों को
जिन्हें वह अकेला छोड़
सुबह उड़ गई थी
दानों की खोज में
पर अब तो वहां कुछ भी नहीं
न पेड़ न घोसला न बच्चे ।

उसे तो दिख रहा है
दूर दूर तक फ़ैला हुआ
कंक्रीट और इस्पात का
एक अंतहीन जंगल
पिघले हुये
काले तारकोल की बहती नदियां
और धरती के सीने में
उड़ेला जा रहा
खौलता इस्पात ।

चिड़िया बेचारी तो
हो गयी है स्तब्ध
हमारी सभ्यता
और विकास की तेज
गति को देखकर ।

आखिर वह
अब कहां खोजे
अपना घोसला और बच्चों को
किससे करे फ़रियाद
खाकी वर्दी / खद्दरधारी से
या फ़िर यू एन ओ और
वर्ल्ड पीस फ़ाउण्डेशन के
माननीय सदस्यों से ?

लेकिन
चिड़िया तो आखिर चिड़िया है
उसको बेचारी को कहां पता
कि हम सभ्य हो रहे हैं
और हमारा विकास प्रगति पर है
हमें नहीं कोई मतलब
चिड़िया घोसले
और उसके बच्चों से ।
********
हेमन्त कुमार

10 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा 5 जुलाई 2009 को 2:07 am  

चिड़िया तो आखिर चिड़िया है
उसको बेचारी को कहां पता कि हम
सभ्य हो रहे हैं

Lajawaab maadhyam bana kar gahri baat kahti hai aapki kavitaa.... Aur kitni bali legaa maanay sabhy hone ki chah mein.....

रश्मि प्रभा... 6 जुलाई 2009 को 5:31 am  

चिड़िया बेचारी तो
हो गयी है स्तब्ध
हमारी सभ्यता
और विकास की तेज
गति को देखकर ।
adbhut rachna.....

Harkirat Haqeer 7 जुलाई 2009 को 1:16 am  

आखिर वह
अब कहां खोजे
अपना घोसला और बच्चों को
किससे करे फ़रियाद
खाकी वर्दी / खद्दरधारी से
या फ़िर यू एन ओ और
वर्ल्ड पीस फ़ाउण्डेशन के
माननीय सदस्यों से ?

पर्यावरण पर एक अच्छी रचना .....!!

बेनामी,  8 जुलाई 2009 को 9:14 am  

एक उत्तम रचना.
पर मेरा एक विरोध है चिरइया फिर भी
घोसला बनाती है.
अभी एक सप्ताह पहले एक कबूतरी ने
नन्हे-नन्हे बच्चे मेरे कमरे की
रोशनदान पर दिए हैं. दिन भर कबूतरी
की मधुर ध्वनी मन को आह्लादित
करती रहती है.
पर आप की बात भी जायज़ है घोसले के
लिए टहनियां कहाँ से मिलेंगी.
क्या इसका भी स्थानापन्न मिल पायेगा !
फिलहाल मुझे जन्मदिन की बधाई देने के
लिए धन्यवाद.
:)
बहुत ही जल्द आप मुझे नेट पर सक्रिय पायेंगे.
ई-गुरु राजीव

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" 9 जुलाई 2009 को 1:36 am  

किससे करे फ़रियाद
खाकी वर्दी / खद्दरधारी से
या फ़िर यू एन ओ और
वर्ल्ड पीस फ़ाउण्डेशन के
माननीय सदस्यों से.....

अँधा -धुंध प्रगति की चाह में भागती मानव जाति ने दूसरे जीवों के अस्तित्व के लिए संकट पैदा कर दिया है ,जो एक दिन हम पर ही भारी पड़ेगा.सुन्दर रचना .

hem pandey 10 जुलाई 2009 को 1:47 am  

चिड़िया के बहाने प्रगति की अंधी और अमर्यादित दौड़ पर आपने संवेदना जगाते हुए सुन्दर व्यंग्य किया है. साधुवाद.

Vasudha Kamat 17 जुलाई 2009 को 10:22 pm  

Dear Mr. Hemant Kumar,

It was pleasure visiting your blog. It's coulourful and wonderful.

Your poem opens eyes to the stark reality of so called Development!

Vasudha Kamat

sandhyagupta 22 जुलाई 2009 को 3:12 am  

Bahut prabhavit kiya aapki is rachna ne.Badhai.

k.r. billore 3 अगस्त 2009 को 8:30 am  

pragati ki keemat,prakrati ke samanjasya ko,barbaad hote hue kavi ka dard,aapne achha vyakt kiya hai,,,,,kamna mumbai,,,,,

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