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नदी किनारे एक शाम

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009


कितना अच्छा लगता है
शाम को नदी किनारे
पानी में पैर डुबा कर बैठना
पानी में कंकडियाँ उछालना
और नदी की धार को देखना।

मछुआरों के छोटे छोटे बच्चों का
ऊंची कगारों पर से नदी में कूदना
नदी की तेज धार में मछलियों की तरह फिसलना
और मछुआरों का दूर नदी की बीच धारा में
माझी गीतों की तान छेड़ते हुए
नावों पर स्वच्छंद विचरण करना।

इनसे भी ज्यादा अच्छा लगता है
पुल पर से गुजरती हुई ट्रेनों को देखना
दूर क्षितिज की ओट में
डूबते हुए सूर्य के प्रतिबिम्ब को
नदी के जल में देखना।

सचमुच कितना सुखद लगता है
शाम के समय
नदी के किनारे
पानी में पैर डुबा कर बैठना
आती जाती लहरों को गिनना
और नदी की धार को देखना।
००००००००००
हेमंत कुमार

8 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा 11 अप्रैल 2009 को 3:07 am  

हेमंत जी
गहरी रचना है यादों को अच्छी तरह से सिमटा है आपने
मज़ा आ गया

रश्मि प्रभा 12 अप्रैल 2009 को 12:49 am  

सचमुच कितना सुखद लगता है
शाम के समय
नदी के किनारे
पानी में पैर डुबा कर बैठना
आती जाती लहरों को गिनना
और नदी की धार को देखना।.....
क्षणांश के लिए ऐसी शाम से गुजर गए,वाकई बहुत अच्छा लगता है....

अल्पना वर्मा 12 अप्रैल 2009 को 4:24 am  

दूर क्षितिज की ओट में
डूबते हुए सूर्य के प्रतिबिम्ब को
नदी के जल में देखना।'

बहुत सुन्दर द्रश्य प्रस्तुत करती हुई कविता.

Harkirat Haqeer 12 अप्रैल 2009 को 9:15 am  

मछुआरों के छोटे छोटे बच्चों का
ऊंची कगारों पर से नदी में कूदना
नदी की तेज धार में मछलियों की तरह फिसलना
और मछुआरों का दूर नदी की बीच धारा में
माझी गीतों की तान छेड़ते हुए
नावों पर स्वच्छंद विचरण करना।

हेमंत जी ,
बचपन की याद दिला दी आपने...!!

hempandey 12 अप्रैल 2009 को 9:38 am  

'सचमुच कितना सुखद लगता है
शाम के समय
नदी के किनारे
पानी में पैर डुबा कर बैठना
आती जाती लहरों को गिनना
और नदी की धार को देखना।'
-सुन्दर भाव-चित्र. साधुवाद.

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" 13 अप्रैल 2009 को 2:03 am  

कितना अच्छा लगता है
शाम को नदी किनारे
पानी में पैर डुबा कर बैठना
पानी में कंकडियाँ उछालना
और नदी की धार को देखना।
सुंदर द्रश्य -बिम्ब ,सहज भावों की सरल अभिव्यक्ति .

Hari Joshi 13 अप्रैल 2009 को 4:20 am  

सचमुच आप बड़े सौभाग्‍यशाली हैं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey 17 अप्रैल 2009 को 11:23 pm  

यह तो मेरे घर के पास का गंगा घात और फाफामऊ रेल पुल का दृष्य है। वहां मैं अपने को अनवाइण्ड करने जाता हूं।

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