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21वीं सदी का हिन्दी बाल साहित्य: आडियो,वीडियो कार्यक्रम इंटरनेट एवं डिजिटल पुस्तकें

शनिवार, 21 मई 2011

पिछले मार्च में नेशनल बुक ट्रस्ट इन्डिया ने वाराणसी के काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग में बाल साहित्य पर एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया था। उसमें मुझे भी आमन्त्रित किया गया था। मैंने वहां जो रिसर्च पेपर पढ़ा था उसे यथावत प्रकाशित कर रहा हूं। इसमें यदि बच्चों के किसी ब्लाग का लिंक रह गया हो तो आप सुझायें। मैं संशोधित कर दूंगा। क्योंकि नेशनल बुक ट्रस्ट सम्भवत:इस सेमिनार में प्रस्तुत पेपर्स को कम्पाइल करके पुस्तक रूप में प्रकाशित करेगा,जो कि बाल साहित्य पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज रहेगा। 
 21वीं सदी का हिन्दी बाल साहित्य:
आडियो,वीडियो कार्यक्रम इंटरनेट एवं डिजिटल पुस्तकें

   इधर मुझे लगातार हिन्दी साहित्य से संबंधित कई सेमिनारों,संगोष्ठियों और समारहों में जाने का अवसर मिला।इन गोष्ठियों,सेमिनारों में खूब गरमागरम बहसें,साहित्यिक चर्चायें हुईं। हिन्दी साहित्य पर मंडरा रहे इण्टरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के खतरों की बातें भी की गयीं। लेकिन ये चर्चायें काफ़ी आधी अधूरी सी लगीं।इनमें कुछ कमी खटक रही थी।और वह कमी थी हिन्दी के बाल साहित्य की चर्चा।
                     आज जबकि प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा जा रहा है और प्रकाशित भी हो रहा है। ऐसे में किसी भी साहित्यिक सेमिनार,संगोष्ठी में बाल साहित्य की चर्चा न होना इस बात का द्योतक है कि आज भी हिन्दी में बाल साहित्य को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा रहा है।
                    आज बहुत खुशी की बात है कि नेशनल बुक ट्रस्ट की इकाई राष्ट्रीय बाल साहित्य केन्द्र ने हिन्दी बाल साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है।मुझे भी इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में लेख पढ़ने के लिये आमंत्रित किया गया इसके लिये मैं केन्द्र के संपादक श्री मानस का आभारी हूँ।
                    आडियो,वीडियो कार्यक्रम इंटरनेट एवं डिजिटल पुस्तकें -ये चारों ही माध्यम अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।अलग अस्तित्व वाले होते हुए भी आज के विकसित तकनीकी युग में हम इन्हें एकदम अलग करके इनका मूल्यांकन नहीं कर सकते।कारण यह कि उपरोक्त चारों माध्यमों में किसी पर भी काम करते हुए हमें अन्य तीनों माध्यमों की ज़रूरत भी पड़ती है और सहायता भी लेनी पड़ती है।
                  प्रश्न उठता है कैसे? मान लीजिये हम मुंशी प्रेमचन्द या पन्त जी के ऊपर किसी ब्लाग या डिजीटल बुक के लिये कोई कार्यक्रम बना रहे हैं तो हमें पंत जी का आडियो आकाशवाणी के या किसी अन्य संग्रहालय से ही मिल सकेगा।यदि हम महात्मा गांधी के ऊपर कोई मल्टीमीडिया कार्यक्रम बना रहे हैं तो उनके पुराने फ़ुटेज लेने के लिये हमें फ़िल्म आर्काइव या सूचना प्रसारण मंत्रालय की लाइब्रेरी तलाशनी ही पड़ेगी।इसीलिये इन माध्यमों को हम एकदम से अलग नहीं कर सकते।हां ये ज़रूर कह सकते हैं कि आडियो-वीडियो-इन्टरनेट- और डिजीटल या ई पुस्तकें हमारे इलेक्ट्रानिक माध्यम के बढ़ते चरण हैं।
              मैं पहले बात शुरू करूंगा आडियो कार्यक्रमों की।आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से अलग अलग आयु वर्ग के बच्चों के लिये बाल संघ,बाल जगत,नन्हें मुन्ने कार्यक्रमों का प्रसारण तो काफ़ी पहले से हो रहा था।इन कार्यक्रमों का उद्देश्य बच्चों का मनोरंजन एवं शिक्षा दोनों ही था।इनमें बच्चों के लिये कहानियाँ,नाटक,कवितायें प्रसारित होते थे।इसके साथ ही इन कार्यक्रमों में बच्चों को भी अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का मौका दिया जाता था।1979 में सी आई..टी नई दिल्ली ने जयपुर एवं अजमेर के 500 स्कूलों के लिये भाषा शिक्षण की एक परियोजना की शुरूआत की ।इस कार्यक्रम का उद्देश्य भी बच्चों को पाठ्य पुस्तकों से अलग हटकर कहानियों,गीतों,नाटकों के माध्यम से भाषा की शिक्षा देना था।

          बाद में आकाशवाणी के अन्य केन्द्रों से भी शैक्षिक रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण होने लगा। एन.सी..आर.टी ,सी.आई..टी तथा उत्तर प्रदेश लखनऊ के एस.आई..टी ने भी बच्चों के लिये सैकड़ों रेडियो कार्यक्रमों का निर्माण एवं प्रसारण किया। इस क्रम मैं एन.सी..आर.टी नई दिल्ली,आकाशवाणी लखनऊ तथा बाल एवं महिला विकास विभाग(उप्र) द्वारा चलाये गये कार्यक्रम प्रोजेक्ट चीयर का भी उल्लेख मैं विशेष रूप से करना चाहूँगा।1992 में इस प्रोजेक्ट के अन्तर्गत 3-6 वर्ष के बच्चों के लिये 15 मिनट के लगभग 150 कार्यक्रमों का निर्माण करके उन्हें आकाशवाणी लखनऊ द्वारा फ़ुलबगियानाम के कार्यक्रम में प्रसारित किया गया। इस कार्यक्रम के लिये आलेख तैयार करने वाले लेखक थेडा0अरविन्द दुबे,रज्जन लाल,शकुन्तला वर्मा,दीक्षा नागर और डा0 हेमन्त कुमारकर्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता थेश्री विजय बैनर्जी।15 मिनट अवधि का यह कार्यक्रम सप्ताह में दो बार प्रसारित होता था।फ़ुलबगिया कार्यक्रम की लोकप्रियता को देखते हुए ही बद में इसका प्रसारण  आकाशवाणी के पोर्ट ब्लेयर एवं उदयपुर,अजमेर आदि केन्द्रों से किया गया।इतना ही नहीं एन.सी..आर.टी ने इन कार्यक्रमों का संकलन तैयार करके विक्रय का भी प्रयास किया।

   सरकारी प्रयासों के साथ ही उसी के समानान्तर प्राईवेट कैसेट कंपनियों द्वारा भी बच्चों के लिये बालगीतों,कहानियों के आडियो कैसेट्स तैयार किये जा रहे थे।यद्यपि इनमें हिन्दी के कार्यक्रमों की संख्या कम और अंग्रेजी कार्यक्रमों की संख्या अधिक थी।
     इन्हीं रेडियो कार्यक्रमों की ही तरह दूरदर्शन पर भी बच्चों के लिये कार्यक्रमों का प्रसारण प्रारंभ हुआ।दूरदर्शन पर बच्चों के लिये विक्रम बेताल,पंचतंत्र,एक दो तीन चार, चांद सितारे, दादा दादी की कहानियां जैसे अच्छे कार्यक्रम प्रसारित हुए।1986 से एस आई ई टी के लखनऊ,पटना केन्द्रों से बच्चों के लिये शैक्षिक वीडियो कार्यक्रमों का प्रसारण होने लगा।जबकि सी.आई..टी नई दिल्ली द्वारा निर्मित कार्यक्रम पहले से ही प्रसारित हो रहे थे।उनके केन्द्रों द्वारा हज़ारों वीडियो कार्यक्रमों का निर्माण एवं प्रसारण किया गया है।सी आई ई टी के मियां गुमसुम और बत्तो रानी,टर्रमटूं,बंदर और मगरमच्छ,घोड़े की कहानी,कैसे होती हैं आवाजें,तथा एस आई ई टी लखनऊ केनटखट मुर्गा,हीरे मोती की पत्तलें,शून्य,लाओ लाओ और लाओ,गीदड़ की रिपोर्ट,मुनिया ने सीखा जोड़,चूं चिरैया कैसे उड़ी---आदि कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुये हैं।

       इसी क्रम में हम अगर इन्टरनेट और डिजिटल पुस्तकों या ई बुक्स की बात करें तो इन दोनों के माध्यम से भी बच्चों के लिये काफ़ी कुछ रचनात्मक हो रहा है। इन्टरनेट पर तो जहां बड़ों के लिये हज़ारों की संख्या में ब्लाग्स लिखे जा रहे हैं वहीं बच्चों के लिये भी बहुत सारे लेखक ब्लाग्स पर अच्छी रचनायें प्रकाशित कर रहे हैं। इन ब्लाग्स में कुछ का मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। बच्चों के प्रमुख ब्लाग्स में परीकथा(कनाडा की मानसी चटर्जी),बाल सजग(कानपुर,सिरीष,महेश),नन्हें सुमन(रूप चन्द शास्त्री मयंक),आओ सीखें हिन्दी( रानी पात्रिक, अमेरिका),नन्हा मन(सीमा सचदेव),सरस पायस (रावेन्द्र रवि उत्तराखण्ड),बालसभा(कविता वाचक्नवी,लंदन),फ़ुलबगिया(हेमन्त कुमार),बालमन( ज़ाकिर अली रजनीश),मीठे बोल (रश्मि प्रभा),अभिव्यक्ति पत्रिका (शारजाह से पूर्णिमा बर्मन) और बालचर्चा मंच(खटीमा उत्तराखण्ड के डा0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक),बालदुनिया(आकांक्षा यादव,पोर्टब्लेयर) हैं।

         इन सभी ब्लाग्स में कुछ ब्लाग के लेखक सिर्फ़ अपनी कहानियां,बालगीत प्रकाशित कर रहे हैं। कुछ ब्लाग्स के लेखक अपने साथ ही अन्य लेखकों,गीतकारों की रचनाओं को भी प्रकाशित कर रहे हैं। चार ब्लागों का संचालक होने के नाते कम से कम मैंने बच्चों के इन सभी ब्लाग्स को पढ़ा है और मैं इतना दावे के साथ कह सकता हूं कि इन पर लिखा जा रहा बाल साहित्य प्रिण्ट में आ रहे बाल साहित्य से किसी भी दशा में कम नहीं आंका जा सकता।।बल्कि एक मायने में इसे हम ज्यादा समृद्ध कह सकते हैं।वो यह कि चूंकि नेट पर गूगल ने ब्लाग्स की सुविधा अभी तक नि:शुल्क रखी है इसलिये ज्यादातर ब्लागर बच्चों के ब्लाग्स में रचनायें काफ़ी सजा संवारकर प्रकाशित कर रहे हैं।और इसमें योगदान गूगल (स्पेस देने के लिये) और ब्लागर्स का है जो कि एक कहानी या बालगीत को इतने आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से प्रकाशित कर रहे हैं।

         नेट पर उपलब्ध इन ब्लाग्स के अलावा भी कई वेबसाइट्स बालसाहित्य के संकलन का कार्य कर रही हैं।यद्यपि इन  वेबसाइट्स का उद्देश्य व्यवसायिक ज़्यादा है। मतलब कि वे अपनी वेबसाइट पर जो भी सामग्री रख रहे हैं उसे मूल्य देकर ही खरीदना होगा।फ़िर भी वे नेट पर वेबसाइट्स तो उपलब्ध करवा ही रहे हैं

  अब बात आती है डिजीटल पुस्तकों की। तो जैसा कि मैं पहले ही उल्लेख किया है कि कई वेबसाइट्स बच्चों की कहानियों,बालगीतों, या नाटकों को ई-बुक का स्वरूप देकर नि:शुल्क या सशुल्क पाठकों को अपलब्ध करवा रही हैं। ऐसी वेबसाइट्स में कुछ का उल्लेख मैं यहां करूँगा।
               सबसे पहली और मेरी दृष्टि में अच्छी वेबसाइट जिसका उल्लेख मैं करना चाहूँगा वो है-
1-      www.akhlesh.com- इस वेबसाइट पर बच्चों के लिये तैयार अल्फ़ाबेट्स(हिन्दी अंग्रेज़ी दोनों में),हिन्दी कहानियां,नर्सरी राइम्स और एक किताब देशभक्ति के गीतों की है।
2-      दूसरी महत्वपूर्ण साइट है-  ArvindGuptasToysBooksGallery
      इस वेबसाइट पर डा0 अरविन्द गुप्ता ने विज्ञान को विज्ञान को बच्चों के दैनिक जीवन से जोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस वेबसाइट की उल्लेखनीय ई-पुस्तकें हैं-1सेवाग्राम से शोधग्राम तक(डा0 अभय बैंग) 2-साफ़ माथे का समाज( अनुपम मिश्र) 3-दीवार का इस्तेमाल(कृष्ण कुमार) 4-चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा 5-मन के लड्डू (बांग्ला लोककथा)

6-पेब्लस इन्फ़ोटेक मुंबई की- Dovemulti mediaLtd
        प्राइवेट वेबसाइट्स के अलावा भी इधर 2008 में मानव संसाधन मंत्रालय के शिक्षा विभाग ने पूरे देश के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्कूलों के लिये इण्टरऐक्टिव सी डी का निर्माण भी करवाया है।ये इण्टरऐक्टिव सी डी हिन्दी बेल्ट के छात्रों के लिये सी.आई..टी नई दिल्ली और एस.आई..टी लखनऊ ने तैयार की है।कुछ राज्यों में ये इण्टरऐक्टिव सी डी प्राइवेट कंपनियों से भी तैयार करवाई जा रही हैं।इसके साथ ही हर राज्य अपने प्रादेशिक भाषाओं में भी ऐसी सी डी तैयार करवा रहे हैं।उनका उद्देश्य यही है कि बच्चा खुद सीडी देखकर पाठ/कहानी पढ़ सके और उसका लाभ उठा सके।

   यदि हम बाल साहित्य की दृष्टि से पिछले दशक में निर्मित आडियो/वीडियो कार्यक्रमों तथा इण्टरनेट और ई-बुक्स पर नज़र डालें तो पाएँगे कि इस दिशा में काफ़ी कुछ नया काम हुआ है और हो रहा है।परन्तु एक सबसे बड़ी दिक्कत जो हमारे समक्ष है और हमें इस समस्या को गंभीरता से लेकर इसका निदान सोचना होगा वह यह है की बच्चों तक इनकी पहुंच कैसे बनाई जाये?

क्योंकि न तो हर बच्चे के पास रेडियो टू इन वन सेट है,न उसे दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रमों को देखने के लिये टीवी है/फ़िर कंप्यूटर और इण्टरनेट तक उसे हम कैसे पहुंचाएं?

       चूंकि मैं रेडियो पर बतौर लेखक और शैक्षिक दूरदर्शन पर कार्यक्रम निर्माता के रूप में पिछले 25 वर्षों से जुड़ा हूँ तो मैं इन कार्यक्रमों की पहुंच के बारे में भली भांति जानता हूं।मुझे लगता है कि जितना प्रयास हमारी सरकार आडियो/वीडियो , कार्यक्रमों,इण्टरऐक्टिव सी डी या डिजीटल पुस्तकों के निर्माण के लिये कर रही हैं उससे कहीं ज़्यादा प्रयास और मेहनत इन सामग्रियों को बच्चों तक पहुंचाने का भी करें तभी इलेक्ट्रानिक माध्यमों के कार्यक्रमों को सफ़ल बनाया जा सकेगा।
                                                           -----
बच्चों के चर्चित और पठनीय ब्लाग्स----
7-Balcharchamanch— http://mayankkhatima.blogspot.com
9-abhivyakti patrika— www.abhivyakti-hindi.org
10-Ao sikhen hindi— http://aoseekhenhindi.blogspot.com
                                            0000
 हेमन्त कुमार

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मां तेरा साथ----------

रविवार, 8 मई 2011

कितना अच्छा लगता है
नदी किनारे शाम को
तुम्हारे साथ पानी में पैर डुबाकर बैठना
तुम्हारा मेरे बालों को सफ़ेद फ़ूलों से सजाना

मेरे साथ
रंग बिरंगी तितलियों के पीछे भागना
आड़े तिरछे झूलों पर फ़ुदकना
और फ़िर काले खट्टे गोले की चुस्कियाँ लेना

वो लुक्का छुपी खेलना
मेरा झाड़ियों में छुपना
और चोटिल होना

मम्मा इदल आओ…
वो सुबकना
और
तुमहारा मुझे गोद में उठाकर फ़ुसलाना

मुझे बढ़ते हुए देखना
मेरी दिन भर की चटर पटर पर खिलखिलाना
कालेज के दोस्तों के किस्से बताना
और तुम्हारा वो बेटा जल्दी आना

सब याद आता है माँ
जब कभी अकेली होती हूँ...

तुम्हें लगता है मैं बड़ी हो गई हूँ
पर मुझे आज भी अच्छा लगता है
काली खूबसूरत रातों को
तुम्हारी गोद में सर रख कर
सितारों संग सैर पे जाना...
 माँ के साथ तो हर दिन खास होता है…उनके लिये किसी विशेष दिन की ज़रूरत नहीं होती…पर आज मदर्स डे पर उन सभी दिनों को एक साथ पिरोने की कोशिश की है…happy mothers day maa.....
000                                                                                                    नेहा शेफ़ाली                                                                                   

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नागफ़नियों के बीच

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

कितनी नागफ़नियां
और उगाओगे
इस नन्हें से सीने में।

अभी तो यह बेचारा वैध शब्द
से परिचित भी नहीं हुआ था
और तुमने
इसे अवैध
घोषित कर दिया
जाति शब्द का
अर्थ जानने से पहले ही
इसे बद्जात घोषित कर दिया।

कान्वेण्ट और मदरसे की
संस्कृतियों के बीच
तुमने लटका दिया
इसे पेण्डुलमकी तरह।
राजानीति शब्द सुनने के
पूर्व ही
तुम इसे राजनीति के
शिकंजों में कस कर
करने लगे परीक्षण
कि किस खांचे में यह फ़िट बैठेगा।

गुब्बारे और कलम की जगह
तुमने पकड़ा दिया चाकू
इसके हाथों में
जिसने कि अभी
चाकू की धार भी
नहीं देखी थी।
अभी कितनी नागफ़नियां
और उगाओगे
इस नन्हें से सीने में।
00000
हेमन्त कुमार

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शायद चाँद से मिली है

रविवार, 24 अप्रैल 2011

दोस्तो वो बाज़ नहीं
एक चिड़िया थी
जिसके दो नन्हें पंख थे
दिनभर फुदकती
नन्हें अरमानों से भरे
परों के साथ
रात ढले उड़ना पड़ता
नीमबाज़ आंखे नमकीन हो
हल्की सी जान में
उमस भर देतीं

बिना रौशनदान के घर में
थोड़ी सी बंद हवाओं के बीच
उसे उड़ना होता
हर लम्हा उसे अपने पंखो के घायल हो
जाने का डर बना रहता
दिनभर बंद रौशनी में
दाना चुगती और चुगाती

थोड़ी सी उड़ान में भी
आसमान को ज्यादा छूती
इसीलिये मुंडेर पर बैठे
कुछ परिंदे  यह सोचते कि
इसके पंखो को चमक
शायद चाँद से मिली है

बंद आशियाने में उड़ते वक्त
उसके पंख घायल हो जाते
दर्द की उफ्फ भी
दबती रही
बंद कमरों की बहरी दीवारों में
गिद्ध जैसा वक्त नोचता रहता
उसके भोले और मासूम पंखो को
बड़ी बेरहमी से
दानों को चुगता और
पंखों को तोड़ता
कुम्हलाने के बाद भी वो मुस्काती

और हर सुबह सूरज की किरणों पर सवार हो
मुंदी खिड़कियों के बंद कमरे में
रोज एक उड़ान भरती
और कोशिश करती
एक फ़िज़ा बनाये
इन बंद कमरों के
अंधेरे क्षितिज पर
जहाँ सब कुछ हो
पर्वत,पहाड़,डाल,पात
झूला,सावन,भादो,शीतल हवायें ......
वो सब मौसम
जिनके बिना भी
वह उड़ती रही है अब तक

उसके बनाये आडम्बर में
सभी संभावनाओं के साथ उडान भरती
बस थोड़ी सी हवा ही कम पड़ जाती
और वो घायल मन के साथ
पंखो को सहलाते हुये बैठ जाती
कहीं किसी कोने में
अंधेरा बहुत होता !!!
000
संध्या आर्या


संध्या आर्या जी का परिचय उन्हीं के शब्दों में
पिछले 14 सालो से मुम्बई में प्रवास पिछ्ले दो साल से ब्लाग पढ़ती रही हूँ और एक साल से कवितायें लिख रही हूँसाहित्य से कोई खास लगाव नहीं रहा पर पता नहीं कब कुछ लिखने लगी और लोगों ने उसे कविता कहना शुरू कर दियाहाँ,मुम्बई के साहित्यिक सांस्कृतिक  कार्यक्रमों में अक्सर हिस्सा लेती रही हूँ !

 


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जाने क्यों ?

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

जाने क्यों
आज मौसम का मिजाज़
कुछ बदला हुआ नज़र आ रहा है

मेरे गमले के देशी गुलाब की पंखुड़िया
झुलसाने लगी है
जाने क्यों उम्र के इस पड़ाव पर
छुटपन के घाव
हाजिरी दर्ज करने लगे है

कभी रेत पर रची आकृतियाँ
अब आँधियों की आँखों में
नागफनी की तरह चुभने लगी है
कुतुबमीनार से भी ऊँची सहचर की सम्भावनाएं
 
अस्तित्वहीन हो निष्प्राण हो चली है
 
और
 
भावनाओं की असंख्य  बस्तिया भी
 
असमय रस रंग गंध  को अंगूठा  दिखाते हुए
 
समय की सुनामी में बह चुकी है।                                                                   000
                                                           राजेश्वर मधुकर
शैक्षिक दूरदर्शन लखनऊ में प्रवक्ता उत्पादन के पद पर कार्यरत श्री राजेश्वर मधुकर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।मधुकर के व्यक्तित्व में कवि,लेखक,उपन्यासकार और एक च्छे फ़िल्मकार का अनोखा संगम है।
सांझ की परछांई(बौद्ध दर्शन पर आधारित  उपन्यास),आरोह स्वर(कविता संग्रह),घड़ियाल(नाटक), छूटि गइल अंचरा के दाग(भोजपुरी नाटक) आदि  इनकी  प्रमुख कृतियां हैं। इनके अतिरिक्त मधुकर जी ने अब तक लगभग एक दर्जन से अधिक टी वी सीरियलों का लेखन एवं निर्देशन तथा सांवरी नाम की भोजपुरी फ़ीचर फ़िल्म का  लेखन,निर्देशन एवं निर्माण भी किया है। आपके हिन्दी एवं भोजपुरी गीतों के लगभग 50 कैसेट तथा कई वीडियो एलबम भी बन चुके हैं।                                                                                                                   

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तीसरी ताली यानि समाज में उपस्थित रह कर भी अनुपस्थिति का दंश झेलने को मजबूर किन्नरों की गाथा-----।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

तीसरी ताली
लेखक:प्रदीप सौरभ
प्रकाशक:वाणी प्रकाशन
4695,21-ए,दरियागंज,
नई दिल्ली-110002

                     हमारा यह पूरा मानव समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है। पुरुष और स्त्री। नर और नारी। पुल्लिंग और स्त्री लिंग। इन्हीं दो स्तम्भों के सहारे मानव प्रजाति आगे बढ़ रही है। मानव जाति की आदिम सभ्यता से ही समाज का सम्पूर्ण विकास इन्हीं दो लिंगों के कारण ही हो रहा है।दोनों का काम एक दूसरे के सहयोग से बच्चे पैदा करना और मानव प्रजाति को आगे बढ़ाना है।
             लेकिन हमारे समाज में मानव प्रजाति के इन दो लिंगों के अलावा भी एक और प्रजाति का अस्तित्व है।जो न पुरुष होता है न स्त्री।न तो नर है न नारी।जो न संभोग कर सकता है न ही गर्भ धारण कर सकता है। जिसे हमारा समाज किन्नर, हिंजड़ा या छक्का कहता है। जिसे आदिकाल से ही हमारे मानव समाज ने उपहास का पात्र या मनोरंजन का साधन बना रखा है। जिसे इस समाज से हमेशा उपेक्षा मिली है। बावजूद इस उपेक्षा,उपहास के इस तीसरी योनि का अस्तित्व हमारे समाज में है और हमेशा रहेगा।
         इन्हीं किन्नरों और हिजड़ों के जीवन की एक एक परतों को खोला है प्रदीप सौरभ ने अपने नये उपन्यास तीसरी ताली में।हमारे आपके लिये इस तीसरी योनि के लोग सिर्फ़ कुछ शुभ अवसरों पर  तालियां बजा कर नाचने,बधाई देने और रूपये ऐंठने के लिये आते हैं।लेकिन इसके अलावा भी इनका अपना समाज है,अपनी संस्कृति,रीति- रिवाज हैं। जिसके बारे में न हम कभी सोचते हैं न ही जानने की कोशिश करते हैं। हमने शायद कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि ये लोग कैसे रहते हैं। इनके रीति- रिवाज, संस्कृति क्या है? इनके अंदर क्या भावनायें हैं?ये मानव समाज की सारी उपेक्षा,उपहास और संत्रास का दंश झेलते हुये भी अपने अंदर क्या महसूस करते हैं? हमने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि इनके अंदर धड़कने वाले दिल में क्या हलचल होती है? इनके मन की गहराइयों में क्या भावनायें हिलोरें लेती रहती हैं? इन सभी प्रश्नों का जवाब हमें मिलता है तीसरी ताली उपन्यास में।
        तीसरी ताली उपन्यास के कथानक की शुरुआत दिल्ली की सिद्धार्थ इन्क्लेव हाउसिंग सोसायटी से होकर हिजड़ों के पवित्र तीर्थ स्थल कुवागम के मेले में जाकर पूर्णता को पहुंचती है। सिद्धार्थ इन्क्लेव से कुवागम मेले के बीच का यह सफ़र हमें मानव समाज के उस रूप का दर्शन करवाता है जिसके बारे में प्रायः हम आप बात करना तो दूर सोचना,विचारना तक पसंद नहीं करते। जिनके बारे में हमारी तथाकथित सभ्य सोसायटी में बात करना वर्जित है। जिन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। इस कथानक में हिजड़ो के जीवन के साथ ही एक और भी समान्तर दुनिया चलती है।यह उभयलिंगी सामाजिक दुनिया के बीच बरक्स हिजड़ों,लौंडों,लौंडेबाजों,लेस्बियन्स और विकृत-प्रकृति की ऐसी दुनिया है जो हर शहर में मौजूद है। और समाज के हाशिये पर जिंदगी जीती रहती है।अलीगढ़ से लेकर आरा,बलिया,छपरा,देवरिया यानी एबीसीडी तक, दिल्ली से लेकर पूरे भारत में फ़ैली यह दुनिया समान्तर जीवन जीती है।------समकालीन बहुसांस्कृतिकदौर के गे,लेस्बियन्स,ट्रांसजेण्डर,अप्राकृतिकयौनात्मक जीवन शैलियों के सीमित सांस्कृतिक स्वीकार में भी यह दुनिया अप्रिय,अकाम्य,अवांछित और वर्जित दुनिया है।”—सुधीश पचौरी(उपन्यास के फ़्लैप से)।
                   हमारे समाज में हिजड़ों के साथ लौड़ों,लौंडेबाजों,लेस्बियन्स या यूं कहें विकृत सेक्स मानसिकता वाले लोगों का अस्तित्व हमेशा से रहा है। प्राचीन,मध्यकालीन या आधुनिक हर युग में। इतना ही नहीं इनके ऊपर कलम भी तमाम लेखकों और साहित्यकारों ने चलायी है। लेकिन उतना खुल कर नहीं। क्योंकि उस समय इतना कड़वा सच शायद लिखने के लिये  उनमें हिम्मत नहीं थी।शायद उस समय हमारे समाज में ऐसा साहित्य स्वीकार्य नहीं था। पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र ने भी अपनी कुछ कहानियों में लौण्डेबाजी या अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों को विषय बनाया है।
         हिजड़ो के बारे में फ़्रांस के प्रसिद्ध उपन्यासकार,लेखक डोमनीक लापिएर ने अपनी बहुचर्चित कृति द सिटी आफ़ ज्वाय(आनन्द नगर) में काफ़ी विस्तार से लिखा है।लेकिन हिजड़ो की दुनिया में उतनी गहराई तक वे नहीं पहुंचे हैं जितना प्रदीप सौरभ। यद्यपि सिटी आफ़ ज्वाय लापिएर के लम्बे शोध और अध्ययन के बाद लिखी गयी रचना है।लेकिन उनका मुख्य विषय कोलकाता शहर,वहां के रिक्शाचालक, बिहार से आये हुये मजदूर थे न कि हिजड़े।जब कि तीसरी ताली उपन्यास का मुख्य विषय और केन्द्र बिन्दु हिजड़े ही हैं।
            यहां डोमनीक लापियेर की कृति का जिक्र मैं इस लिये कर रहा हूं कि लापियेर और प्रदीप सौरभ की कार्य शैली में एक बहुत बड़ी समानता है। वह यह कि दोनों ही अपनी कृति के विषय पर बहुत गहन शोध करने के बाद उस पर कलम चलाते हैं। जितना शोध हमें लापिएर की कृतियों में दिखायी देता है उतना या उससे कहीं अधिक कार्य प्रदीप सौरभ ने भी अपनी कृतियों के लिये किया है।चाहे इनका पहला उपन्यास मुन्नी मोबाइल हो या तीसरी ताली वैसे भी एक कुशल और सफ़ल पत्रकार होने के नाते प्रदीप की खोजी प्रवृत्ति की झलक हमें इस उपन्यास के हर पृष्ठ और हर वाक्य में दिखायी पड़ती है।
    तीसरी तालीके मुख्य पात्र हैं डिम्पल(हिजड़ोके गद्दी की मालकिन),गौतम साहब,आनन्दी आण्टी,रेखाचितकबरी,(कालगर्ल रैकेटियर),रानी उर्फ़ राजा,बाबू श्याम सुन्दर सिंह,सुविमल भाई(गांधीवादी नेता),अनिल,सुनीता,विनीत उर्फ़ विनीता और फ़ोटोग्रैफ़र विजय। पूरा उपन्यास इन्हीं पात्रों के साथ आगे बढ़ता है।एक कथानक हिजड़ो के जीवन को आगे लेकर बढ़ रहा है तो दूसरी ओर समान्तर ही लौण्डेबाजों,लेस्बियन्स, और कालगर्ल्स के धन्धे की कहानियां भी इससे जुड़ी हैं।
        अगर हम उपन्यास की मूलकथा की बात करें तो हिजड़ो की मण्डली की सरगना डिम्पल के चरित्र को साथ लेकर चलना पड़ेगा।इस कथानक में लेखक ने हिजड़ो के डेरे,उनकी गद्दी,डेरे के अन्दर की समस्त गतिविधियों को बखूबी रेखांकित किया है। हिजड़े अपने हर शुभ कार्य,शुभ अवसर पर मुर्गेवाली या खप्परवाली दो देवियों की पूजा करते हैं।हिजड़ो की गुरू सन्त आशामाई हैं।जिनका आश्रम या पीठ मेहरौली की पहाड़ियों के बीच स्थापित है।हिजड़े अपने सारे क्रियाकलाप इन्हीं सन्त आशामाई के ही उपदेशों के अनुसार करते हैं। इनके अन्दर भी सामान्य मानव की ही तरह अपने गुरु और अपनी देवियों के प्रति अपार श्रद्धा है।ये भी अपनी देवियों के प्रकोप से डरते हैं। इनके भी अपने उसूल होते हैं।ये कभी भी किसी से गलत ढंग से पैसा नहीं ऐंठना चाहते।क्योंकि इनकी गुरु सन्त आशामाई ने जीविका के ऐसे तरीकों को गलत बताया है।
       डिम्पल के डेरे पर ही अलीगढ़ के नाचने वाले राजा को रानी में तब्दील करने की कथा उपन्यास को रोचक बनाने के साथ ही हमें बहुत कुछ विचारने पर भी मजबूर करती है।ड़िम्पल ने जिस मंजू को अपनी बेटी की तरह पाला उसी के साथ शारीरिक संबंध बनाने की सजा राजा को अपना पुरुषांग कटवाकर भुगतनी पड़ती है। पढ़ने में तो यह कथानक दिल दहला देने वाला है लेकिन साथ ही हमारे अपने समाज के सम्मुख एक प्रश्न भी खड़ा करता है।
         वह यह कि एक तरफ़ तो हिजड़ो का समाज है जहां मंजू की एक छोटी सी नादानी या भूल की सजा राजा को अपना लिंग कटवाकर भुगतनी पड़ती है----वहीं दूसरी ओर हम अपने समाज में उन बलात्कारियों को क्या सजा देते हैं जो किसी युवती या मासूम लड़की को जबरदस्ती अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं।-----सिर्फ़ कुछ दिनों की जेल या जुर्माना ----और उसके बाद वह बलात्कारी फ़िर आजाद---?क्या हिजड़ो का वह गुप्त समाज हमारे आपके समाज से उसूलों के मामले में बेहतर नहीं---?जिन्हें कम से कम अपनी बिरादरी,समाज और गुरु का भय तो है।इतना ही नहीं उपन्यास के अंत तक डिम्पल बार बार जिस तरह से राजा मंजू प्रकरण को लेकर पश्चाताप करती दिखायी देती है,यह उसके अंदर छिपी मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं,मां की ममता और हिजडे होने के दर्द का प्रतीक है।
        उपन्यास का हिजड़ो वाला कथानक एक ओर हमें उनके बीच गद्दियों,इलाकों को लेकर होने वाले खूनी घमासान से रूबरू कराता है।तो दूसरी तरफ़ उनकी परंपराओं---किसी को हिजड़ा बनाने,चुनरी की रसम करने,मंडली और गुरू की परंपरा का निर्वाह,हिजड़ियों के अंदर की स्त्रीत्व की भावना,उनमें गिरिया रखने (वह भी मूंछों वाले) के रिवाज,जैसी कितनी ही परंपराओं से हमें परिचित कराता है। शायद हममें से ज्यादातर को यह मालूम भी नहीं होगा कि कुवागम कौन सी जगह है?तमिलनाडु के विल्लूपुरम जिले का छोटा सा गांव है कुवागम। यह हिजड़ो का पवित्र तीर्थ स्थल है।यहां हर साल एक मेला लगता है। जिसमें दुनिया भर के हिजड़े आते हैं। ये सभी हिजड़े कुठनवार मंदिर जाकर एक दिन के लिये सुहागन फ़िर विधवा बन जाते हैं।पूरे कुवागम में सत्रह दिनों तक उत्सव का माहौल रहता है। देश विदेश के कोने कोने से हिजड़े यहां आते हैं।कुवागम के इस मेले के पीछे की महाभारत की कथा भी उपन्यास को रोचक और पठनीय बनाती है। साथ ही हमें इस तीसरी योनि के लोगों की संस्कृति और परंपरा के एक अन्य रूप का दर्शन भी कराती है।
      तीसरी ताली में तीसरी योनि धारी लोगों के कथानक के समान्तर ही हमें अपने समाज के उस रूप का परिचय मिलता है जो हमारे अंदर वितृष्णा,क्षोभ और जुगुप्सा पैदा करता है। लेकिन फ़िर भी वह सब हमारे समाज की एक नंगी सच्चाई है जिसके बारे में हमें दिमागी मंथन करने की भी जरूरत है।कथानक के इस हिस्से में हमें दिखायी देती है कालगर्ल्स रैकेट,लौण्डेबाजों,लेस्बियनों और गे लोगों की दुनिया।बाबू श्याम सुन्दर सिंह,सुविमल भाई,अनिल जैसे खद्दरधारी और सफ़ेदपोशों की यह वो दुनिया है जहां देश की सत्ता में आने और कुर्सी पर काबिज होने के लिये साम दाम दण्ड भेद सभी कुछ अपनाया जाता है।लेकिन इनका व्यक्तिगत जीवन कितना कलंकित और घिनौना है यह बात हम तीसरी ताली पढ़ कर भली भांति समझ सकते हैं।
         बाबू श्यामसुन्दर सिंह को तवायफ़ों के साथ ही लौण्डों का भी शौक था। ज्योति उनका  सबसे प्रिय लौण्डा था जिसे बाबू साहब अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे।बाबू साहब का प्रकरण हमें पूर्वी उत्तरप्रदेश,बिहार के एबीसीडी यानी आरा,बलिया,छपरा,देवरिया के सफ़ेदपोशों के घृणित और कुत्सित शौकों से परिचित कराता है। इसी सन्दर्भ में इन सफ़ेदपोशों का शिकार बनने वाले लौण्डों(खूबसूरत किशोरों,युवकों) का दर्द हमें ज्योति के इन शब्दों में साफ़ साफ़ दिखायी देता है---माना मैं मर्द हूं,लेकिन ये समाज मुझसे मर्द का काम लेने के लिये राजी नहीं है। मुझे इस समाज ने मादा की तरह भोग की चीज में तब्दील कर दिया है। मैं मर्द रहूं या फ़िर हिजड़ा बन जाऊं इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। पेट की आग तो बड़ों बड़ों को न जाने क्या से क्या बना देती है।(तीसरी तालीपृष्ठ-57)
        यही पेट की आग ही तो है जो हिजड़ो को नाचने गाने के साथ समाज की उपेक्षा और उपहास के दंश से बचने के लिये,कालगर्ल्स रैकेट में घुसने की कोशिश और रैइसजादों के लौण्डेबाजी के शौक को पूरा करने के लिये मजबूर करती है।एक मुकम्मल पुरुष ज्योति को हिजड़ा बनाने की रसम और प्रक्रिया हमारे अन्दर वितृष्णा तो भरती है लेकिन साथ ही एक प्रश्न भी हमारे आत्ममंथन के लिये छोड़ देती है कि आखिर इस तीसरी योनि का अस्तित्व हमारे समाज में क्या है?
       इसी लौण्डेबाजी के शौकीन सुविमल भाई। थे तो गांधीवादी लेकिन व्यक्तिगत तौर पर इन्हें औरतों की गंध से नफ़रत थी।इन्होंने विवाह तो रति से किया लेकिन सिर्फ़ एक सुरक्षा कवच के लिये। अपने घर का काम काज,चूल्हा चौका करने के लिये।अपनी शारीरिक भूख तो वे पार्टी के एक युवक अनिल के साथ अप्राकृतिक सम्बन्ध बनाकर पूरा करते हैं। इतना ही नहीं वे अपनी पत्नी रति को भी लेस्बियन बनने की सलाह देते हैं। जो कि बाद में इनसे तलाक लेकर अपना घर बसा लेती  है।
         इस गे वर्ल्ड और लेस्बियन्स,होमो की दुनिया को भी लेखक ने उतनी ही कुशलता के साथ रेखांकित किया है जितना हिजड़ो की दुनिया को।इसे पढ़ने के साथ ही हमारी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। इन सभी के प्रति हमारे मन में जुगुप्सा के साथ ही इनकी स्थितियों पर तरस भी आता है कि क्या कभी ये असामान्य लोग सामान्य जीवन नहीं बिता सकेंगे?
          इसी उपन्यास के एक और पात्र का मैं खास तौर से जिक्र करना चाहूंगा जिसके बिना इस उपन्यास पर बात करना अधूरा रह जायेगा।यह पात्र या चरित्र है गौतम का बेटा विनीत  उरफ़ विनीता।विनीत को गौतम साहब लड़का बना कर रखना चाहते हैं।जबकि वह थी लड़की।शायद उसके पीछे गौतम साहब का अपना दर्द छुपा था बेटा न होने का।विनीत के विनीता बनने की कहानी से हमारे सामने समाज के कई रहस्य उद्घाटित होते चले जाते हैं।सेक्स रैकेट में कैसे हिजड़ो,हिजड़ियो का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है। पुलिस किसी व्यक्ति को किस ढंग से यूज करना चाहती है। इंस्पेक्टर शर्मा विनीता को रेखा चितकबरी को सौंप कर कुछ रकम कमाने के मूड में थे।लेकिन वह कांस्टेबिल राज चौधरी की सहायता से किस तरह  ब्यूटीपार्लर तक पहुंचती है और धीरे धीरे खुद अपना पार्लर गे वर्ल्ड खोलकर जल्द ही चैनलों की सुर्खियों से लेकर अखबारों के थर्ड पेज तक छा जाती है।विनीता की यह कहानी भी बहुत रोचक बन पड़ी है।
       इस तरह कहानी दर कहानी कहता हुआ यह उपन्यास हमारे ऊपर अपने सम्पूर्ण रूप में इस तरह का प्रभाव डालता है जिसमें हर कहानी या कथानक अपने आप में एक मुकम्मल कहानी भी है और साथ  ही उपन्यास का एक हिस्सा भी।
                          अगर हम उपन्यास के शिल्प और भाषा की बात करें तो इसमें कोई शक नहीं कि यह पूरा उपन्यास हमारे सामने कथानक,शब्द और रेखाचित्रों का अद्भुत कोलाज खड़ा करता है। एक ऐसा कोलाज जिसे हम चाहे दूर से देखें या नजदीक से  वह पूरी गहराई  और तीक्ष्णता के साथ हमारे जेहन पर प्रश्नों घाव बनाता जाता है। इस उपन्यास के शिल्प की सबसे बड़ी विशेषता है इसका चरित्र प्रधान होना। इसका हर चरित्र अपने आप में सम्पूर्ण भी हैं और एक दूसरे का पूरक भी। इन्हीं चरित्रों के माध्यम से ही लेखक ने कथानक को आगे भी बढ़ाया है साथ ही वर्णित विषय की पर्त दर पर्त को खोला भी है।
              मैं पहले भी कह चुका हूं कि प्रदीप  पहले एक कवि,पत्रकार और कुशल फ़ोटोग्रैफ़र हैं।उपन्यासकार बाद में।उनके इन्हीं तीनों रूपों ने मिलकर उनके इस उपन्यास में जो गठन और कसाव पैदा किया है वह पाठक को हिलने नहीं देता,और अन्त तक बांधे रहता है। तीसरी ताली के शिल्प और गठन के साथ ही अच्छे शोध के कारण विषय वस्तु में आयी जीवन्तता भी पाठक को आकर्षित करती है।
         आखिरी बातउपन्यास के अंत में पत्रकार विजय द्वारा कहा गया यह संवाद—“दुनिया के दंश से अपने आपको बचाने के लिये मैंने लगातार लड़ाई लड़ी। और खुद को स्थापित किया। मैं नाचना गाना नहीं,नाम कमाना चाहता था। भगवान राम के उस मिथक को झुठलाना चाहता था,जिसके कारण तीसरी योनि के लोग नाचने गाने के लिये अभिशप्त हैं और परिवार समाज से बेदखल हैं।
          यह संवाद हमारे पूरे समाज के सामने एक प्रश्नचिह्न है।लेखक ने इसके माध्यम से मानव समाज में इस तीसरी योनि के अस्तित्व के बारे में जानना चाहा है कि यह समाज अब खुद बताये कि आखिर इस धरती पर इनका क्या वजूद है?इनके क्या हक हैं?इनको क्या दर्जा दिया जाना चाहिये----नर का ?नारी का?या किसी तीसरी योनि का?
                                         00000
प्रदीप सौरभ: पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में विशेष संवाददाता।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक। मुन्नी मोबाइल, तीसरी ताली   उपन्यास काफ़ी चर्चित। कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबाद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।


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हिन्दी ब्लाग के स्तंभ(2)

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

हिन्दी में अन्तर्जाल पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है और काफ़ी अच्छा लिखा जा रहा है। यहां मैं उन कुछ खास ब्लाग्स की चर्चा कर रहा हूं जहां पहुंच कर आपको निश्चित रूप से पाठकीय सन्तुष्टि का अनुभव होगा।
(1) चवन्नी चैपपूरे भारतीय फ़िल्म उद्योग का लेखा जोखा:
          यदि आप की रुचि हिन्दी सिर्फ़ हिन्दी फ़िल्मों में न होकर उसे गहरायी तक जानने और महसूस करने की है तो आपको यह ब्लाग जरूर पढ़ना चाहिये। इस ब्लाग के लेखक प्रसिद्ध फ़िल्म समीक्षक और पत्रकार अजय ब्रह्मात्म्ज हैं।
       इस ब्लाग में आपको फ़िल्मी दुनिया से जुड़ी हर खबर पढ़ने को मिल जायेगी। चाहे वह बड़े फ़िल्मी सितारों का जीवन हो या फ़िर नयी फ़िल्मों की समीक्षा। हमारा पूरा फ़िल्म संसार ही एक अलग तरह का ग्लैमर वर्ल्ड है। यहां के बारे में हर आम आदमी जानने और इसे समझने के लिये उत्सुक रहता है। यहां आम आदमी के नजरिये से ही फ़िल्मी दुनिया को देखा गया है।
                                    इस ब्लाग में आपको फ़िल्मी सितारों,निर्देशकों,लेखकों,गीतकारों,कैमरामैन्स,रिकार्डिस्ट,एडिटर यानि फ़िल्म से जुड़े हर व्यक्ति  की जीवनी,आत्मकथायें,साक्षात्कार पढ़ने को मिलेगा तो दूसरी ओर फ़िल्मों की समीक्षायें। मल्टीप्लेक्स कल्चर मिलेगी तो दूसरी ओर पुराने फ़िल्मी टाकीज के बारे में लोगों के रोचक संस्मरण। नयी और पुरानी फ़िल्मों का ऐसा अनूठा सम्मेलन आपको बार बार इस ब्लाग पर जाने को प्रेरित करेगा। इतना ही नहीं यहां आपको फ़िल्मी सितारों के साथ ही फ़िल्म से जुड़े तमाम लोगों के ब्लाग लिंक्स भी मिलेंगे जिनके माध्यम से आप उनसे सीधे संवाद बना सकते हैं। कुल मिला कर इस ब्लाग को हम अगर एक फ़िल्मी दुनिया का म्युजियम या इन्साइक्लोपीडिया कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
(2)कथाचक्र---प्रिण्ट को नेट पर लाने की अच्छी कोशिश:
      हिन्दी में इस समय दो स्थानों पर काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है।प्रिण्ट की
      छोटी बड़ी   पत्रिकाओं में,तथा नेट पर ब्लाग्स,अन्तर्जाल की पत्रिकाओं पर।
      लेकिन दोनों के लेखक पाठक एक दूसरे से अपरिचित हैं। इन्हीं दोनों स्थानों
      के साहित्य प्रेमियों(लेखकों,पाठकों दोनों)को करीब लाने का अनूठा प्रयास है कथाचक्र।
      इस ब्लाग के लेखक हैं श्री अखिलेश शुक्ल जी।इनका प्रयास यही है कि नेट के लेखकों
     और पाठकों को प्रिण्ट में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं,उनके स्वरूप,कलेवर,कथ्य,और
     साथ ही लेखकों से रूबरू कराया जाय।अखिलेश जी का प्रयास सराहनीय है,सफ़ल भी
      है।
                    इनके इस ब्लाग पर आपको देश भर की सभी स्थापित पत्रिकाओं के साथ ही उन नयी पत्रिकाओं की भी जानकारी मिलेगी जो अभी शैशवावस्था में हैं।यह ब्लाग आने वाले समय में खास तौर हिन्दी साहित्य के शोध छात्रों के लिये काफ़ी उपयोगी साबित होगा। अखिलेश जी के इस ब्लाग पर उपलब्ध सामग्री निश्चित रूप से शोध छात्रों के लिये एक  संसाधन केन्द्र का काम करेगी।

(3)कन्धे से कन्धा कदम से कदम
   मिला कर चलने का नारी में है दम।
                       जी हां,नारी ब्लाग कुछ ऐसी ही ख्वाहिशों और भावनाओं से जुड़ी महिलाओं का एक मंच है।यह महिलाओं का पहला बाईलिन्गुअल कम्युनिटी ब्लाग है। खास बात यह है कि इस ब्लाग पर केवल महिलायें ही लिखती हैं।शायद इसलिये कि वो अपनी वैचारिक स्वतत्रता में पुरुषों को बाधक मानती हों।  इस ब्लाग से लगभग 50 के आस पास महिला ब्लागर्स जुड़ी हैं जो इस मंच पर अपनी आवाज को बुलन्द करती हैं।
           इस ब्लाग पर आपको नारी अस्तित्व से जुड़े हर मुद्दे पर सामग्री मिलेगी। चाहे वह दहेज की समस्या हो या प्रताड़ना की।यहां आपको छेड़छाड़,लैंगिक समानता,नारी सशक्तीकरण,नारी अधिकार मतलब महिलाओं से जुड़ा हर वो मुद्दा मिलेगा जिसकी आज के समाजशास्त्री,बुद्धिजीवी बात करते हैं। इस ब्लाग में जहां इतिहास रचने वाली महिलाओं की जीवनियां,साक्षात्कार हैं वहीं महिलाओं को आगे बढ़ाने वाले प्रेरक प्रसंग भी हैं। इस ब्लाग पर लिखी गयी 600 से अधिक पोस्टें इस बात का प्रतीक हैं कि आज की नारी कितनी जागरूक और संघर्षशील है अपने अधिकारों के प्रति,जीवन को बेहतर बनाने के प्रति और समाज में स्वयं को स्थापित करने के प्रति।
(4)अनजाने लोगों के बीच अपनेपन की खोज:
       अनजाना शहर अजनबी लोगऐसा ब्लाग है जिसमें हमें जीवन के हर रंग दिखाई पड़ते हैं।ब्लाग में एक तरफ़ मन को छूने वाली भावनात्मक कवितायें हैं,दूसरी ओर यथार्थ परक कहानियां।कविताओं के माध्यम से आशु ने विदेश में अपनों से दूर रहने के दर्द को उकेरा दूसरी ओर उनकी कविताओं में भारत की माटी का सोंधापन महसूस किया जा सकता है।ब्लाग लेखक आशु कोई कवि ,लेखक या पत्रकार नहीं। उनके द्वारा लिखी गयी कविताओं,कहानियों या संस्मरणों की भाषा पढ़ कर यह बोध नहीं होता कि यह रचना किसी इन्जीनियर द्वारा लिखी गयी है। इनकी किसी भी रचना में कोई लाग लपेट नहीं है ।सरल ,सीधे,और विषय के अनुरूप शब्दों का चयन ही इस ब्लाग को अन्य ब्लागों से अलग करता है।
(5)बाल कविताओं का एक बेहतरीन संकलन ---बाल मन
                          बाल मन ब्लाग को यदि बच्चों के सपनों का संसार कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।इसमें अभी तक कुल 33 बालगीत,25 बाल कवितायें,और 28चिल्ड्रेन्स पोएम्स संकलित की जा चुकी हैं। ब्लाग की खास बात यह है कि इसमें आपको नये पुराने,स्थापित नवोदित हर तरह के रचनाकारों के बालगीत एवं कवितायें पढ़ने को मिल जायेंगी।बच्चों की रुचि के अनुरूप इस ब्लाग में प्रकृति,जीव जन्तुओं,मानवीय संवेदनाओं,तीज त्योहारों आदि हर तरह के विषयों के गीत संकलित किये गये हैं।
इस ब्लाग के लेखक एव प्रस्तुतकर्ता जाकिर अली रजनीश चूंकि खुद भी एक अच्छे बाल साहित्यकार हैं इसलिये भी ब्लाग को उन्होंने बच्चों के अनुकूल ही सजाया संवारा भी है। निश्चित रूप से यह ब्लाग भविष्य में बाल साहित्य पर काम करने वालों के लिये एक मार्ग दर्शक का काम करेगा। हां यदि रजनीश जी अपने ब्लाग का फ़ाण्ट बड़े साइज का कर दें तो ब्लाग में चार चांद लग जायेगा।
(6)सुरभि ---एक सुवासित हवा का झोंका
                      अगर आपको जीवन के विभिन्न रंगों का आनन्द कविताओं के माध्यम से लेना है तो आपको सुरभि ब्लाग पर जरूर जाना चाहिये।इस ब्लाग की लेखिका हैं कोलकाता में इन्जीनियरिंग व्यवसाय से जुड़ी मेनका जी।
         मेनका के इस ब्लाग में आपको जीवन के हर रंग के दर्शन
   होंगे।चेहरा,रिश्ते,मां,कलम,मकान शीर्षक से लिखी कविताओं में जहां
   सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी चिन्ता साफ़ जाहिर होती है।वहीं
   उनकी  ॠतुयें,नदी,सागर,कारे बदरा,पहाड़,शाम की दूल्हन,अम्बर,बरफ़ की
   फ़र्श पर,बदरा कवितायें उनकी प्रकृति से नजदीकियों को उजागर करती हैं।
   उनकी सामाजिक सरोकारों के पड़ताल की शैली भी अनूठी ,अलग है।वे
   सिर्फ़ सामाजिक स्थितियों की मूक दर्शक नहीं बनना चाहतीं ,बल्कि
इन चिन्ताओं की छानबीन वे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से करती हैं।प्रकृति को लेकर लिखी गयी इनकी कविताओं में आपको नये बिम्बों,प्रतीकों के उपयोग के साथ ही शिल्प और भाषा का नयापन भी मिलेगा। निश्चित रूप से मेनका की रचनायें पाठकों के अन्दर निराशा से आशा का संचार करने में समर्थ हैं।
(7)शब्दों का एक अनूठा कोलाज ----शिखा दीपक
                           शिखा दीपक ब्लाग की रचनाकर खुद शिखा दीपक हैं।इस ब्लाग पर आने के बाद आपको शब्दों,बिम्बों और अनुभूतियों का एक अनूठा संसार मिलेगा। इस संसार में सुन्दर
अनुभूतियों और संवेदनाओं वाली बेहतरीन कवितायें हैं। तो दूसरी ओर भावनाओं मानवीय संवेदनाओं के साथ ही सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कहानियां। एक तरफ़ हृदय को छूने वाले शब्द चित्र हैं तो दूसरी ओर आपको प्रकृति के बीच ले जाने वाले बढ़िया यात्रा वृत्तान्त।बीच बीच में ब्लाग की एकरसता को तोड़ने के लिये शिखा दीपक आपको कला के एक नये रूप फ़ूड आर्ट से भी रूबरू कराती रहती हैं। इस कला में फ़लों , सब्जियों से की गयी खूबसूरत सजावट के बारे में बताया गया है।शिखा दीपक की भाषा प्रवाहमयी और सुगम तो है ही इनकी कथ्य को प्रस्तुत करने की शैली भी अनूठी है जो इनके ब्लाग को अन्य ब्लागों से अलग करती है।
इन सभी ब्लाग्स के पते हैं----
1चवन्नी चैप-- http://chavannichap.blogspot.com/
2कथाचक्र------http://katha-chakra.blogspot.com/
4-अनजानाशहअजनबीलोग--http://dayinsiliconvalley.blogspot.com/
5बालमन---http://bm.samwaad.com/
7--शिखादीपक--http://www.shikhadeepak.com/
                                                                   0000
हेमन्त कुमार


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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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