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बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग

शनिवार, 21 अगस्त 2021

 बाल साहित्य--पुस्तक समीक्षा



बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग



                           पुस्तक: बाघू के किस्से


                           (बाल नाटक संग्रह)





                          लेखिका: दिशा ग्रोवर


                        प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन प्रा०लि०


                          702,जे/50, एवेन्यू-जे,ग्लोबल सिटी


                           ठाणे,महाराष्ट्र-401303

      

                                   

        हिन्दी बाल साहित्य में इस समय काफी कुछ लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है।बाल कहानी,कविता,गीत,उपन्यास,चित्रात्मक कहानियां हर विधा में काफी कुछ लिखा जा रहा है बस एक विधा को छोड़ कर।और वह विधा है बाल नाटक।हिन्दी में बाल नाटक बहुत कम लिखे जा रहे हैं और लिखे भी जा रहे हैं तो उनके मंचन की गुंजाइश काफी कम या कठिन है।इसके पीछे कारण तो बहुत से हैं लेकिन मुख्य कारण है बाल नाटक लेखकों की बाल रंगमंच से दूरी।जो लेखक बाल नाटक लिख भी रहे हैं वो सिर्फ नाटक लिखने के लिए लिख रहे हैं।वो नाटक मंचित हो सकेगा या नहीं,उसमें मंचन की संभावनाएं हैं या नहीं इस बात से उन्हें कोई ज्यादा मतलब नहीं है।बस उन्होंने नाटक लिखे।वो पहले किसी पत्रिका में फिर पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो गए और उन्होंने अपना काम पूरा समझ लिया।

         

                 

                        बाल नाटकों के ऐसे ही परिदृश्य के बीच दिशा ग्रोवर के बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” का प्रकाशन हमारे समक्ष बाल नाटकों के लिए एक नई उम्मीद जगाता है।इस संकलन में दिशा ग्रोवर के कुल छह नाटक संकलित हैं।नाटकों के शीर्षक भी ऐसे हैं जो बाल पाठकों के साथ ही रंगकर्मियों के मन में भी इन्हें पढने और मंच पर नन्हें बाघू को बच्चों से रूबरू कराने की उत्सुकता जगाते हैं।“बाघू और जंगल:पहला अनुभव”,“बाघू और हाथी की सूँड़”,“बाघू ने गधे से सीखा”,“बाघू और धरती के कान”,“बाघू,छुटमुट और जादुई शब्द” और अंतिम नाटक “बाघू चला घास खाने”।    

   

                     

                      मैं प्रायः किताबें पढने में थोड़ा ज्यादा समय लगाता हूँ।लेकिन इस किताब के साथ ऐसा नहीं हुआ।किताब मिलने के बाद ही मैंने इसे पढ़ना शुरू कर दिया और जब पढ़ना शुरू किया तो दो बैठक में इसे पूरा पढ़ भी डाला।इसका पहला कारण तो ये कि ये बाल नाटकों का संकलन था।और नाटकों और मंच से जुड़ाव होने के कारण मेरे मन में घोर उत्सुकता जागनी स्वाभाविक भी थी।दूसरा जो बहुत महत्वपूर्ण कारण था वो यह कि इसके प्रमुख पात्र बाघू से पहला नाटक ख़तम होते होते ही मैंने खुद में इतना अधिक जुड़ाव महसूस किया कि देखूँ आगे-आगे ये प्यारा बाघू क्या करने वाला है?(यह एक संयोग ही था कि “बाघू के किस्से” किताब मिलने के ठीक दो दिनों पहले मैं अपने और अपनी बहन के परिवार के साथ लखनऊ चिड़ियाघर भी देखने गया था।और वहां भी हम सभी ने बाघ के चार नन्हें शावकों को उछलते-कूदते और आपस में खेलते देखा था।)शायद इसीलिए इन नाटकों को पढने के दौरान मुझे लगातार महसूस होता रहा कि अरे ये तो चिड़ियाघर में बाघू ही था अपने भाइयों बहनों के साथ।

     

                             

                                 दिशा के इन सभी नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता इन नाटकों का बाल मनोभावों के अनुकूल होना है।बाघू और उसके छोटे-छोटे भाई बहनों के माध्यम से लेखिका ने उन सभी प्रश्नों,उत्सुकताओं,शंकाओं को उठाया है जो किसी भी मनुष्य के बच्चे के मन में छुटपन या कहूँ शैशवकाल के दौरान उठती हैं।बाघू का जंगल में पहली बार निकलने पर हर चीज को हर जीव को जानने समझने की जिज्ञासा,शिकारी से मिलने जाना,हाथियों के झुण्ड तक पहुँचना,हाथी के बच्चे की सूंड खींचने की कोशिश,खरगोश के कान को धरती का कान समझना---ये सभी घटनाएँ ठीक उसी तरह घटित होती चलती हैं जैसे मनुष्य का कोई छोटा बच्चा जब पहली बार घर से बाहर निकलता है तो वो हर चीज को,हर वस्तु को छू कर,देख कर महसूस करने उन्हें समझने की कोशिश करता है।

    

                           

                           सभी नाटकों में घटित होने वाली घटनाएँ,बात चीत,दृश्य इस बात को पुख्ता करते हैं कि लेखिका को बाल मनोभावों की अच्छी समझ है और उसने उसी के अनुरूप इन छहों नाटकों के कथानक,घटनाओं,दृश्यों का तानाबाना बुना है।

     

                    

                     दिशा के ये नाटक इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इनमें कहानी और नाटक के एक नए मिक्स फार्मेट का प्रयोग किया गया है जो अपने आपमें अनूठा है और इन नाटकों को आज के समय में लिखे जा रहे अन्य बाल नाटकों से अलग करता है।दूसरी बात इनका कथानक। कथानक का तानाबाना भी इस हिसाब से है कि हर नाटक अपने आप में अलग भी है और आपस में मिला हुआ भी।यानि की मंचन के समय नाट्य निर्देशक या रंगकर्मी के लिए इस बात की भी गुंजाइश रखी गयी है कि वो चाहे तो इन नाटकों को अलग अलग भी मंचित कर सकता है या इनमें दो,तीन या चार नाटकों को  एक साथ मिला कर भी मंचित कर सकता है।

    

                             

                              वैसे तो इस संकलन के सभी नाटक एक से बढ़ कर एक मजेदार घटनाओं,संवादों से भरे हैं लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर “धरती के कान” वाला प्रसंग बेहद मजेदार लगा जिसे पढ़ते या मंच पर देखते समय निश्चित ही बच्चा आनंदित होगा और उसके अन्दर घोर उत्सुकता भी अंत तक बनी रहेगी।ये नाटक पढ़ते समय मुझे सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” याद आ गयी।उसमें भी जड़ी बूटियों की तलाश में जंगल में भटक रहे तुलसी बाबू को धरती पर एक अजीब सा अंडा दिखा था।जो उन्हीं के सामने चिटका और उसमें से एक पीले रंग का विचित्र पक्षी निकल कर उनके पीछे चल पड़ा और उनके साथ घर तक आया।

      

                               

                   खैर वो कहानी तो अलग है।लेकिन “बाघू और धरती के कान” में बाघू के बुलाने पर जमीन के अंदर से खरगोश के कान का बाहर आना तथा बाघू द्वारा उसे धरती का कान समझना और सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” की इस अंडे से चिड़िया निकलने की घटना----दोनों में सबसे बड़ी समानता है बच्चों के भीतर घोर उत्सुकता पैदा करना।और दोनों ही रचनाएं अपने इस प्रयास में पूरी तरह सफल कही जा सकती हैं।

   

                                     

                  इस मजेदार और सराहनीय नाटक संकलन में कुछ थोड़ी बहुत कमियाँ भी मुझे नजर आईं जिनका उल्लेख मैं जरूरी समझता हूँ।पहली बात तो वन अधिकारी के संवाद थोड़ा ज्यादा लम्बे लम्बे हैं उन्हें छोटा किये जाने की गुंजाइश भी है।खासतौर से वहां जहां वह बाघ के बच्चों को गधे के बारे में बता रहा है।दूसरी बात कहीं कहीं नाटकों में ड्रामेटिक एलीमेंट या कहूँ तो ड्रामेटिक सिचुएश्न की कमी।जैसे हाथी के बच्चे के सूंड वाले प्रसंग में।यहाँ पर बाघू द्वारा किसी टहनी या बड़े पत्ते को लपेट कर अपने चेहरे पर सूंड बनाने जैसी कोशिश एक अच्छी बच्चों को हंसाने वाली सिचुएशन पैदा कर सकती है।हालांकि ये काम नाटक मंचित होते समय भी किया जा सकता है।

   

                                   

                          यहाँ मैं इन नाटकों की लेखिका दिशा ग्रोवर को कुछ सुझाव भी देना चाहूँगा।पहली बात तो ये कि अगर इन नाटकों को थोड़ा लिरिकल भी बना दें मतलब बीच बीच में सिचुएशन के अनुसार कुछ संवाद गीत के रूप में लिख दें तो ये नाटक और बेहतर बन सकेंगे क्योंकि जिस उम्र के बच्चों के लिए ये नाटक लिखे गए हैं---उन्हें गीत सुनना संगीतात्मक कवितायें सुनना ज्यादा अच्छा लगेगा।

    

                          

                           दूसरा सुझाव जो मैं हर बाल नाटक लेखक के साथ ही दिशा ग्रोवर को भी दूँगा कि समय मिलने पर बाल नाटकों के मंचन जरूर देखें और अगर संभव हो तो कोई भी नाटक लिखना शुरू करने के पहले किसी अच्छे बाल नाट्य निर्देशक/रंगकर्मी जिनकी बाल नाटकों पर अच्छी पकड़ हो---उससे अपने लिखे जाने वाले नाटक की स्टोरी लाइन,दृश्य,पात्र आदि पर विचार विमर्श जरूर कर लें।इससे लिखा जाने वाला नाटक निश्चित रूप से बेहतर बन सकेगा।     

   

                          

             वैसे “बाघू के किस्से” का गहन विश्लेषण करने पर कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिन्दी बाल साहित्य को दिशा ग्रोवर जैसी एक बाल मनोभावों पर अच्छी पकड़ रखने के साथ ही नाटकों और कहानी दोनों की समझ रखने वाली एक अच्छी बाल नाट्य लेखिका मिल रही है।जिसके नाट्य लेखन में एक नयापन और प्रयोगधर्मिता साफ़ नजर आ रही है।और उम्मीद है वो भविष्य में हिंदी बाल रंगमंच को और भी अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स देकर समृद्ध करती रहेंगी।

                        

००००


समीक्षक:डा०हेमन्त कुमार                       

                     

                

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बाल नाटकों क एक अच्छा संकलन: “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक

रविवार, 13 दिसंबर 2015

   

हिन्दी में बाल नाटकों की कमी हमेशा महसूस की जाती रही है।खासकर इधर के कुछ वर्षों में तो बाल नाटक कम लिखे गये या जो लिखे गये वो बाल रंगमंच से जुड़े लोगों तक पहुंचे नहीं।यह कमी उस समय और महसूस होती है जब गर्मियों में पूरे देश में बच्चों के लिये तमाम रंग संस्थाएं,रंगकर्मी और स्कूल्स के अध्यापक बच्चों के नाटकों की स्क्रिप्ट्स खोजने लगते हैं।
        ऐसे में या तो उन्हें बहुत बड़े और मोटे साथ ही महंगे बाल नाटकों के संग्रह खरीदने पड़ते हैं या कोई सामान्य नाटक लेकर ही काम करना पड़ता है।।ऐसी स्थिति में “उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान”(लखनऊ) द्वारा संस्थान द्वारा प्रकाशित की जा रही बाल पत्रिका “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक निकालना एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य है।
   “बालवाणी”-नवम्बर-दिसम्बर-2015 के इस बाल नाटक विशेषांक में पुराने और नये मिलाकर कुल बारह रचनाकारों के बाल नाटक शामिल किये गये हैं।“पानी आ गया”(विष्णु प्रभाकर),“भों भों-खों खों”(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना),“बाल दिवस की रेल”(अमृत लाल नागर),“अपने अपने छक्के”(के0पी0 सक्सेना),“नन्हा सिपाही”(मनोहर वर्मा),“परिवर्तन”(डा0श्री प्रसाद),“ताबीज”(देवेन्द्र मेवाड़ी),“देश की खातिर”(भगवती प्रसाद द्विवेदी),“वीर बालक भीमा”(प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव),“चिड़ियों का अनशन”(डा0हेमन्त कुमार),“प्रकृति का बदला”(रमाशंकर),“कहां गये रूपये”(ज़ाकिर अली ‘रजनीश’।
        “बालवाणी” का यह विशेषांक कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।पहली बात तो आज की महंगाई के जमाने में बाल पाठकों,बाल रंगकर्मियों,नाट्य निर्देशकों को मात्र 15रूपयों(पत्रिका का मूल्य) में एक साथ 12 अच्छे बाल नाटकों का आलेख प्रदान करना।जिसका आनन्द पढ़ने और मंचन दोनों में ही मिलेगा। दूसरी बात इन नाटकों में विषय की विविधता है।पाठकों रंगकर्मियों को हर तरह के नाटक मिलेंगे-- मनोरंजक,ऐतिहासिक,वैज्ञानिक सोच पैदा करने वाले,पर्यावरण की चेतना जगाने वाले आदि।इन नाटकों के चयन में इस बात का पूरी तरह ध्यान रखा गया है कि नाटक आसानी से मंचित किये जा सकें।उनके मंचन में कोई बहुत बड़ा सेट न लगाना पड़े,बहुत ज्यादा प्रापर्टीज न इकट्ठी करनी हो।यह इन नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है।नाटकों में छोटे छोटे संवाद और दृश्य हैं जो कि बच्चों को आसनी से याद हो सकेंगे।ज्यादातर नाटकों की भाषा सरल और सहज है जिसे समझने में बच्चों को दिक्कत नहीं आयेगी।
    दूसरी बात यह कि इस विशेषांक में ही आदरणीय अमृत लाल नागर जी का एक बहुत महत्वपूर्ण लेख है—“आओ बच्चो नाटक लिखें।”नागर जी का यह लेख बच्चों को तो नाटक लिखने की जानकारी देगा ही साथ ही नये बाल नाटक लेखकों का भी मार्ग दर्शन करेगा।इस लेख में बच्चों के नाटक लिखते समय किन किन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये इसका बहुत अच्छा और सम्यक विश्लेषण किया गया है।
     “बालवाणी” के इस विशेषांक में एक और भी महत्वपूर्ण और उपयोगी लेख है—“लोरियों की विशिष्ट रचनाकार शकुन्तला सिरोठिया”—जिसे बन्धु कुशावर्ती ने लिखा है।यह लेख भी इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों को बाल साहित्य तो हम पठन सामग्री के रूप में देते हैं।लेकिन बाल पाठक प्रायः उन रचनाकारों से अन्जान रहता है जो उसके मनोरंजन,शिक्षा और मार्गदर्शन के लिये दिन रात मेहनत करते रहते हैं। अगर बाल साहित्यकारों का सम्यक परिचय देने वाली एक शृंखला पत्रिका द्वारा शुरू की जाय तो यह एक और सार्थक प्रयास होगा बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में।
      “बालवाणी” के इस अंक में इन नाटकों लेखों के साथ ही बाल पाठकों के लिये दिविक रमेश जी और राजेन्द्र निशेश जी के मनोरंजक और प्यारे बालगीत भी हैं।जिन्हें पढ़ कर हर बच्चे का मन इन्हें एक बार जरूर गुनगुनाएगा।उषा यादव के बाल नाटक संग्रह “ममता का मोल” की योगीन्द्र द्विवेदी द्वारा की गयी समीक्षा बच्चों को कुछ और नाटकों से परिचित कराएगी और उन्हें पढ़ने के लिये प्रेरित भी करेगी।
   एक बात मैं यह भी कहना चाहूंगा कि यदि “बालवाणी” का यह बाल नाटक विशेषांक किसी तरह से हमारे प्रदेश के समस्त सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में पहुंच सके तो इस विशेषांक की सार्थकता और बढ़ जाएगी।
        कुल मिलाकर “बालवाणी” का यह बाल नाटक विशेषांक बाल पाठकों के साथ ही बाल रंग कर्म से जुड़े हर व्यक्ति के लिये काफ़ी उपयोगी साबित होगा।इस अच्छे और सराहनीय कार्य के लिये उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान को ढेरों बधाई।
                        0000

डा0हेमन्त कुमार

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“नया तमाशा नयी कहानी”

सोमवार, 25 मई 2015

“नया तमाशा नयी कहानी”
(बाल नाटक)—डा0हेमन्त कुमार
(मंद बुद्धि बच्चों के मनोभावों को आप तक पहुंचाने की एक कोशिश)
मैं आज आपके सामने अपने लगभग पूरे हो चुके बाल नाटक “नया तमाशा नयी कहानी” के दो दृश्य प्रकाशित कर रहा हूं।आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे नाटक को सुधारने/घटाने /बढ़ाने मे मदद करेंगी।
(दृश्य—3)
(गनेसी के घर का बराम्दा।नन्हकऊ एक नया पीढ़ा बना रहा है।पास में ही गनेसी बसेहटी खटिया पर पालथी मार कर बैठा मोटर चलाने का अभिनय कर रहा है।उसके हाथ में किसी छोटी साइकिल का टायर है।वह उसी को स्टेयरिंग की तरह इधर उधर घुमा रहा है साथ ही मुंह से तरह तरह की आवाजें भी निकाल रहा है।)
गनेसी:(टायर को स्टेयरिंग की तरह घुमाते हुए) घुल्ल—घुल्ल—पों—पों—पीं—पींप—हतो भाई हतो—मेली मोतल चल पड़ी—हत जाओ बापू सामने छे हत जाओ ---पीं—पींप---।
(गनेसी की मां पार्वती का प्रवेश।पार्वती के एक हाथ में एक थैला है।दूसरे में गत्ते का एक छोटा डिब्बा।)
पार्वती:(गनेसी से)ले बेटा गनेसी—ये थैला जरा भीतर रख आ---और इस डिब्बे में कुछ है खा ले।–सुबह से भूखा होगा मेरा---लाल।
   (गनेसी के पास जाकर आंचल से उसका मुंह पोंछती है।गनेसी उसी तरहा टायर घुमाता रहता है।जैसे उसने सुना ही न हो।)
गनेसी:पीं—पींप—हत्तो अम्मा—हज्जाओ—मेली मोटल आ र्रर्रर्रर्रही है---देखो अम्मा हम ल को र्रर्रर्र बोल दिये---पीं पींप---।
पार्वती:अरे बेटवा---पहिले कुछ खाई ले फ़िर चलाना मोटर।
गनेसी:(टायर घुमाते हुए)मिथाई लाई हो का अम्मा?
पार्वती:मिठाई नहीं तो बाबा जी का ठुल्लू लाए हैं। अरे सबेरे से एक बोरा गेहूं साफ़ किया तो ठकुराइन ने चार ठो बासी पूड़ी औ सब्जी दी है।ले बइठ के खाई ले।
(गनेसी टायर छोड़ कर  बहुत जोर से ताली पीटता है और हंसता है)
गनेसी: हा –हा—हा—हा—बाबा जी का थुल्लू।लाओ अम्मा देखें कैसा होता है बाबा जी का थुल्लू?मीठा होता है का--?
(पार्वती उसके सामने दफ़्ती का डिब्बा रख कर माथा पकड़ कर बैठ जाती है।नन्हकऊ अपने काम में लगा रहता है।गनेसी गत्ते का डिब्बा लेकर नन्हकऊ के सामने जाता है।)
गनेसी:(नन्हकऊ से)बापू—बापू लो तुम भी खा लो—अम्मा बाबा जी का थुल्लू लाई हैं।
(नन्हकऊ बोलता नहीं अपने काम में लगा रहता है।)
गनेसी:बापू,कभी खाए हो बाबा जी का थुल्लू?
(नन्हकऊ गुस्से में एक बार गनेसी की तरफ़ देखता है फ़िर उसे कस कर एक झापड़ मारता है।गनेसी हतप्रभ हो जाता है।)
नन्हकऊ:भाग साले इहां से—पागल कहीं का—काम नहीं करने दे रहा।सबेरे से घुरुर घुरुर लगाए है।इस्कुलवौ में बैठते नहीं बनता—जा भाग।
(गनेसी हक्का बक्का हो कर नन्हकऊ को करुणा भरी निगाहों से देखता है।फ़िर पूड़ियों का डिब्बा नन्हकऊ की तरफ़ फ़ेंक कर हंसता हुआ तेजी से बाहर की ओर भागता है।)
गनेसी:हा—हा—हा—बाबा जी का थुल्लू---थुल्लू---।
(पार्वती उसे आवाज देती है)
पार्वती:अरे रुक जा बेटा—पूड़ी खा ले फ़िर जा---।
    (गनेसी रुकता नहीं तेजी से भाग जाता है।)
पार्वती:क्यों मार दिया बिचारे को?पूड़ी तो खा लेने दिये होते उसको----।
नन्हकऊ:(गुस्से में)मारें न तो का पूजा करें?साला पागल—ढपोंग का पंडवा होइ गया।इसकी उमर के बच्चे काम धाम करके कमा रहे हैं।ई ससुरा सबेरे से घरवै में कोहराम मचाए रहता है।मर भी नहीं जाता साला।
पार्वती:(करुण स्वरों में)काहे कोस रहे हो बिचारे को---अब भगवान ने कम बुद्धि दे के भेजा है तो ऊ का करै?कहां से हो जाए और लड़कन की तरह—बिचारे को पूड़ी भी नहीं खाए दिये---।
(नन्हकऊ गुस्से में पीढ़ा हथौड़ी पटक कर बाहर की तरफ़ निकल जाता है।करुण संगीत।दृश्य यहीं  फ़ेड आउट होता है।)
दृश्य-7
(गांव का ही दृश्य।मंच पर हल्का प्रकाश।मंच के एक तरफ़ से गनेसी,गुड़िया,शंकर और तीन चार अन्य मंद बुद्धि बच्चे कतार बद्ध होकर बहुत धीरे-धीरे आते हैं।मंच के बीचोबीच रुक जाते हैं।दर्शकों की तरफ़ मुंह करके उन्हें संबोधित करते हैं।)
गनेसी:(हाथ उठाकर दुखी स्वरों में)
            हम हैं बड़े अभागे बच्चे
            हम हैं बड़े उपेक्षित बच्चे
            कुछ भी कह लें आप सभी पर
            आखिर हम भी आप के बच्चे।
            फ़िर भला हमारी क्या है गलती
            क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
गुड़िया:(दर्शकों की तरफ़ झुक कर)
             फ़िर भला हमारी क्या है गलती
             क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
बच्चा(तीन):   घरों पे मिलती हमें उपेक्षा
             स्कूल भी दोस्त नहीं क्यूं सच्चा
             हमें चिढ़ाता क्यूं हर बच्चा
             शिक्षक कहते पगला बच्चा।
             फ़िर भला हमारी क्या है गलती
             क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
बच्चा(चार):   हम भी कभी थे प्यारे बच्चे
            गोल मटोल बबुओं के जैसे
            बढ़ता गया आकार हमारा
            दिखता गया विकार हमारा।
            फ़िर भला हमारी कहां थी गलती
            क्यूं मिलती रोज हमें है झिड़की।
(पूरे मंच पर अंधकार।केवल एक स्पाट लाइट मंच के बीच बैठे गनेसी के ऊपर पड़ेगी।गनेसी मंच के बीच में उकड़ूं बैठ कर दोनों पांवों के बीच अपना सर छुपा लेता है।बाकी सारे बच्चे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उसके चारों ओर घूमते रहते हैं।)
सारे बच्चे(सामूहिक स्वर में):
         आखिर हमने क्या की गलती
         रोज हमें क्यूं मिलती झिड़की।
(बच्चों के घूमने की गति तेज होती है।तेजी से घूमने के साथ ही सारे बच्चे“आखिर हमने क्या--।”
गाते रहते हैं।बीच में गनेसी और अधिक सिकुड़ कर बैठता जाता है।गनेसी सिसकता भी हैऽन्त में सारे बच्चे गनेसी के ऊपर झुक जाते हैं। दृश्य यहीं फ़्रीज होकर फ़ेड आउट हो जाता है।)
         (यह अन्त नहीं एक शुरुआत है…)


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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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