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बेसिक शिक्षा के बढ़ते कदम---“उम्मीद के रंग”

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

  पुस्तक समीक्षा  


बेसिक शिक्षा के बढ़ते कदम---“उम्मीद के रंग”

                                                                             

                   “उम्मीद के रंग”




प्रकाशक

एकलव्य फाउंडेशन

जमानालाल बजाज परिसर

जाटखेड़ी,भोपाल(म०प्र०)

       प्राथमिक शिक्षा के विकास और सुधार की बुनियाद ही निरंतर किये जा रहे नए प्रयोगों और नवाचार पर टिकी है।हमारे देश भारत में भी जब हम आज़ादी के बाद से अब तक के प्राथमिक शिक्षा के परिदृश्य पर निगाह दौड़ाते हैं तो हमें इस दिशा में काफी कुछ सकारात्मक बदलाव साफ़ दिखाई पड़ते हैं।ख़ास तौर से जब हम सरकारी या परिषदीय विद्यालयों की बात करते हैं तो उनमें भी आज के परिदृश्य में काफी कुछ गुणात्मक बदलाव दिखाई पड़ेगा।चाहे वो स्कूल भवनों की बात हो,शिक्षा के स्तर की बात हो,सीखने-सिखाने की प्रक्रिया की बात हो,शिक्षकों-बच्चों के बीच के रिश्तों और व्यवहार की बात हो सभी में कुछ न कुछ सकारात्मक बदलाव आता दिखाई पड़ रहा है।हाँ ये बात जरूर है कि इस बदलाव की गति उतनी तेज नहीं है जितनी होनी चाहिए।लेकिन जो भी बदलाव आया है वह हमारी प्राथमिक शिक्षा के सुनहले भविष्य की और संकेत करता है।

         

           

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में यह जो सकारात्मक और गुणात्मक परिवर्तन आ रहा है इसके पीछे शिक्षा विभाग के कर्मठ और सृजनात्मक ऊर्जा वाले उच्च अधिकारियों का हाथ तो है ही।इसके साथ ही हमारे प्राथमिक विद्यालयों के उन मेहनती और अपने कार्य के प्रति समर्पित शिक्षकों का भी बहुत बड़ा हाथ है जो निरंतर अपने विद्यालयों की भौतिक और बौद्धिक स्थिति को सुधारने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं।

           

हमारे ऐसे ही कुछ चुनिन्दा शिक्षकों की लगन,मेहनत और खूबसूरत अनुभवों की कहानियों का संकलन है –“उम्मीद के रंग”।एकलव्य फाउन्डेशन,भोपाल द्वारा प्रकाशित “उम्मीद के रंग” किताब में बेसिक शिक्षा विभाग,उत्तर प्रदेश के उन विद्यालयों के शिक्षकों की सफलता की कहानियां संकलित हैं जिन विद्यालयों में जाना शिक्षकों को पसंद नहीं था।जहां जाते ही उनके सामने मुसीबतों के पहाड़ आ खड़े होते थे।जहां पहुँचने के रास्ते अत्यंत दुर्गम थे।जहां बच्चे भी नहीं आते थे।जहां पहुँचने के बाद अक्सर शिक्षक हिम्मत हार कर अपना तबादला करवा लेते थे।

                               

     ऐसे विद्यालयों में पहुँच कर इन शिक्षकों ने इन विद्यालयों की भौतिक सूरत को बदलना,बच्चों का नामांकन बढ़ाना,स्कूलों के प्रति अभिभावकों और ग्रामीणों की सोच को बदलना,सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में नए प्रयोग करके शिक्षण की घिसी-पिटी परिपाटी को तोड़ कर एक नवाचार की मिसाल कायम करना ही अपने जीवन और शिक्षक जीवन का लक्ष्य बना लिया है।

           

        

                                    “उम्मीद के रंग” किताब में प्राथमिक शिक्षा विभाग,उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत 24 शिक्षकों के संघर्ष,जद्दोजहद और सफलता की कहानियां उन्हीं  के द्वारा कलमबद्ध करके संकलित की गयी हैं।यह किताब बेसिक शिक्षा विभाग,उ०प्र० के ऊर्जावान और सृजनशील निदेशक डा0सर्वेन्द्र विक्रम सिंह की परिकल्पना और परिषदीय विद्यालयों के शिक्षकों के अन्दर एक नयी ऊर्जा और आत्मविश्वास भरने की वृहद् योजना का एक हिस्सा है।इस किताब के आमुख में ही डा0 सर्वेन्द्र जी ने लिखा है की “गत दो-तीन वर्षों में अनेक शिक्षकों द्वारा विद्यालयों में किये जा रहे प्रयासों,यथा—विद्यालय परिवेश को आकर्षक बनाना,छात्र नामांकन तथा उपस्थिति में वृद्धि,पाठ्य-सहगामी क्रिया-कलापों के संयोजन आदि से गुणात्मक परिवर्तन देखा जा रहा है।इसके दृष्टिगत यह अनुभव किया गया की यदि इन प्रयासों को उन्हीं शिक्षकों द्वारा लिपिबद्ध कराया जाय तथा उसे अन्य शिक्षकों के साथ साझा किया जाय तो इसके व्यापक परिणाम संभव होंगे।”

                              

यद्यपि शिक्षकों के इन अनुभवों और सफलता की कहानियां इसके पहले भी हमारे सामने आ चुकी हैं।राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान उत्तर प्रदेश ने पूरे प्रदेश के कई जिलों में घूम-घूम कर प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों की सफलता की कहानियों पर फ़िल्में बनाई हैं जो कि समय-समय पर लखनऊ दूरदर्शन से प्रसारित होने वाले शैक्षिक कार्यक्रम “दीक्षा” तथा सी0आई0ई0टी0,एन0सी0ई0 आर0टी0,नई दिल्ली द्वारा प्रसारित राष्ट्रीय शैक्षिक प्रसारण “ज्ञानदर्शन” में समय-समय पर प्रसारित होती रही हैं।इसके साथ ही प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी विभिन्न पत्रिकाओं “शिक्षा की बुनियाद”, “लर्निंग कर्व”(अजीम प्रेम जी फाउंडेशन,बैंगलोर), “शैक्षिक दखल”(पिथौरागढ़ उत्तराखंड से प्रकाशित),“शैक्षिक सन्दर्भ”(एकलव्य भोपाल”,“प्रारम्भ” (नालंदा,लखनऊ)में भी प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के अनुभवों और सफलता की कहानियां प्रकाशित हुई हैं।लेकिन ये कहानियां दूसरों द्वारा कही गयी हैं।शैक्षिक प्रसारणों में इनकी कहानी  प्रोड्यूसरों द्वारा बनायी गयी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाई गयी हैं तो पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ कहानियों दूसरे पेशेवर लेखकों,शिक्षाविदों द्वारा बताई गयी हैं।कुछ कहानियां इन पत्रिकाओं ने भी शिक्षकों से ही लिखवाई भी हैं।

                            

                  जबकि “उम्मीद के रंग” इन सबसे कुछ अलग हट कर है।इस किताब में शामिल हर शिक्षक खुद अपनी कहानी का लेखक है।और निश्चित रूप से किसी और के द्वारा बयान की गयी संघर्ष की कहानी और खुद शिक्षक द्वारा बताई गयी कहानी में बहुत बड़ा अंतर होगा ही।किसी और द्वारा सुनाई या लिखी गयी किसी शिक्षक की सफलता की कहानी में बहुत कुछ छूट जाने या बदल जाने का खतरा है।जबकि शिक्षक द्वारा लिखे शब्दों में इस बात की कोई गुंजाइश नहीं है।अपने संघर्षों,प्रयासों,और सफलता की कहानियों को शिक्षकों द्वारा खुद लिखने और एक पुस्तक के रूप में उनके प्रकाशन की यह कोशिश उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग की यह संभवतः पहली कोशिश है।

                                       

                       वैसे तो इस किताब में हर शिक्षक द्वारा बयान की गयी हर कहानी अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरक होने के साथ ही प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिए पठनीय है।लेकिन कुछ स्कूलों की कहानियां तो पढ़ कर बड़ा आश्चर्य होता है कि वहां की विषम  परिस्थितियों को बदलने के लिए शिक्षक ने कितनी मेहनत की।जैसे “स्पेलिंग गार्डन”(महेश चन्द्र),“विज्ञान क्या किसी आदमी का नाम है?”(वर्षा श्रीवास्तव),“बैलगाड़ी में बच्चे”(सुमन), “तराई में एक दोस्त पुस्तकालय”(जय शेखर)।सबसे सुखद तो “न पूछे गए सवालों के जवाब”(जैतून जिया) पढ़ते समय तो ऐसा लगा जैसे शिक्षिका ने बच्चों को शान्ति निकेतन पहुंचा दिया हो।इसी तरह “स्पेलिंग गार्डन” पढ़ कर हम कल्पना कर सकते हैं उस कक्ष की जिसमें स्पेलिंग गार्डन बनाया गया होगा।जहां पहुँच कर हर बच्चा शिक्षक के निर्देशों और अपने खुद के प्रयासों द्वारा बनाए गए उस अद्भुत शब्दकोष के बगीचे में पहुच कर अपने द्वारा लगायी गयी वस्तुओं के अंग्रेजी नाम और स्पेलिंग समझ सकेगा।

                                      

इस किताब में शामिल सभी लेखक शिक्षकों-–आसिया फारुकी,वीरेन्द्र कुमार शुक्ल, डा०कौसर जहां,राखाराम गुप्ता,सदाशिव तिवारी,सुनील सिंह,सुमन,अंजू जायसवाल,सर्वेष्ट मिश्रा,जैतून जिया,वर्षा श्रीवास्तव,महेश चन्द्र,जयशेखर,अनंत तिवारी,सपना सिंह,पूजा यादव,डा0रचना सिंह,श्वेता श्रीवास्तव,हृदयेश गोस्वामी,श्रीप्रकाश सिंह,रश्मि मिश्रा,आभा त्रिपाठी,गीता यादव,विवेक पाठक के प्रयास निश्चित ही पूरे प्रदेश ही नहीं देश के प्राथमिक शिक्षकों के लिए प्रेरणा बनेंगे।दोनों ही क्षेत्रों में—अपने स्कूलों को बेहतर बनाने की दिशा में और खुद अपनी कहानियां लिखने की दिशा में।यहाँ एक ख़ास बात मैं और लिखूँगा—कि मुझे इन सभी शिक्षकों की कहानियां पढ़ते समय ऐसा लग रहा था कि ये कहानियां एक अच्छे लेखक द्वारा लिखी गयी हैं।मतलब इन सभी शिक्षकों में लेखन कार्य से जुड़ने की भी काफी संभावनाएं दिख रही हैं।यदि इन्हें बराबर लिखने का समय और प्रकाशन का प्लेटफार्म मिले तो ये बहुत अच्छी रचनाएं भी समाज को दे सकेंगे।

                                       

                     इन सभी शिक्षकों की सफलता की कहानियों में जो सबसे बड़ा बिंदु है वो है उनके द्वारा गाँव की जनता,अभिभावकों और बच्चों को भी एक बेहतरीन स्कूली शिक्षा और खूबसूरत भविष्य के लिए मानसिक रूप से तैयार करना।और अपने विद्यालयों को सुसज्जित, खूबसूरत और बच्चों के मनोनुकूल बनाने के लिए करवाए गए सामूहिक और सामुदायिक प्रयास।जिसके बिना वो अपने विद्यालयों की सूरत बदल नहीं सकते थे।मुझे लगता है कि इन शिक्षकों की सफलता की कुछ कहानियों पर आधारित लघु फ़िल्में बनवा कर बेसिक शिक्षा विभाग उनके प्रसारण की व्यवस्था यदि करे तो संभवतः इन शिक्षकों के सफलता की ये कहानियां हमारे समाज के उस तबके की मानसिकता बदलने में भी कामयाब होंगी जो आज भी प्राइवेट स्कूलों के पीछे भागता है और जिसकी मानसिकता आज भी ये बनी है कि सरकारी स्कूलों या परिषदीय विद्यालयों में कुछ नहीं होता।कम से कम वो लोग भी देख सकेंगे कि आज परिषदीय विद्यालयों में भी शिक्षकों की मेहनत से उम्मीदों के जो रंग भरे जा रहे हैं।वो रंग हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को कितना खूबसूरत बना रहे हैं।

      

                                   इस किताब का खुबसूरत कवर और अन्दर बने सुन्दर चित्र इसे और पठनीय बनाते हैं।पुस्तक से जुड़ी पूरी टीम को हार्दिक बधाई।


००००



समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार


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प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिये पठनीय पत्रिका-खोजें और जानें

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

खोजें और जानें
  
संपादक मंडल
विश्व विजया सिंह
वीरेन्द्र शर्मा
लक्ष्मी लाल वैरागी
पुष्पराज सिंह राणावत
राजेश उत्साही
कुमार अनुपम
जया राठौड़

पत्रिका का पता:
विद्या भवन शिक्षा सन्दर्भ केन्द्र
विद्या भवन सोसायटी परिसर,
मोहन सिंह मेहता मार्ग
फ़तहपुरा,उदयपुर(राजस्थान)313001
फ़ोन-0294-2451497
             प्राथमिक शिक्षा के विकास में जो अवरोध हैं उनमें से एक प्रमुख है--शिक्षकों,अभिभावकों,या प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले सभी व्यक्तियों को सही दिशा निर्देश न दे पाने वाले साहित्य का अभाव।खासकर शिक्षकों के लिये।शिक्षकों को उनके सेवा काल में समय समय पर दिये जाने वाले प्रशिक्षणों के दौरान जो भी मुद्रित,प्रकाशित सामग्रियां दी जाती हैं उनको वो कितना पढ़ते हैं या उसके निर्देशों को अपनाते हैं ये कह पाना तो कठिन होगा।हां यह जरूर है कि उन्हें दी जाने वाली सामग्री में सैद्धान्तिक पक्ष अधिक होने के कारण वो उनके लिये बोझिल अधिक होती है।सम्भवतः इसी वजह से उस सामग्री का उपयोग जितना उन्हें करना चाहिये वो नहीं कर पाते।
   पिछले दिनों मुझे प्राथमिक शिक्षा से जुड़े सरोकारों वाली पत्रिका खोजें और जानेंके दस अंकों को पढ़ने का मौका मिला।इन सभी अंकों को पढ़ना मेरे लिये अपने देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था के बीच से गुजरने जैसा था।
        “खोजें और जानें का हर अंक प्राथमिक शिक्षा और बच्चों से जुड़े किसी न किसी मुद्दे पर केन्द्रित है।यह पत्रिका जितनी उपयोगी शिक्षकों के लिये है उतनी ही अभिभावकों या प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिये। क्योंकि इसमें बहुत से लेख,कहानियां शिक्षकों के अपने अनुभवों और बच्चों के साथ सीखने सिखाने की प्रक्रिया के दौरान कक्षा में किये गये प्रयोगों,बातचीत पर आधारित हैं।जिससे शिक्षक,अभिभावक या बाल साहित्य लेखक भी लाभान्वित होंगे।वो बच्चों की आवश्यकताओं के साथ ही उनके मनोभावों को भी समझ सकेंगे।कविताएं हैं जो पाठकों के सामने समाज की सच्चाइयां भी रखती हैं।अध्यापकों के लिये निर्देश भी हैं जो उन्हें बच्चों के मनोभावों को समझने में मदद करेंगे।
    
मैं यहां इस पत्रिका के “पर्यावरण और शिक्षा विषय पर केन्द्रित विशेषांक के सिर्फ़ एक लेख जमावट का उल्लेख करूंगा जिससे स्पष्ट हो जाता है कि यह पत्रिका शिक्षकों के लिये कैसे उपयोगी और मददगार साबित होगी।
तो ऐसा करो तुम सब जो पत्तियां अपने साथ लाये हो उनको अलग-अलग गुण धर्मों के आधार पर समूह बनाते हुये कागज की शीट पर जमाकर चिपकाओ।
   मास्साब थोड़ा रुक कर बोले—“जैसे कि चिकनी पत्ती,नुकीली पत्ती।लच्छू अचानक खड़े होकर एक ही सांस में बोलाजैसे कि दूध वाली पत्ती।
मास्साब ने कहा-शाबाश।
रघु बोलाजैसे कि कटे किनारे वाली पत्ती।
मास्साब के चेहरे पर खुशी थी।
भोली राम बोला-एक तरफ़ चिकनी दूसरी तरफ़ खुरदुरी। मास्साब हंसते जा रहे थे।
शाकिर-खुशबूदार पत्ती।
मास्साबबिल्कुल थीक।
डमरू-पीली पत्ती।----।
    यह अध्यापक और बच्चों के बीच कक्षा में चल रही बात चीत का एक हिस्सा भर है।इसमें न बच्चों के सर पर पढ़ाई का बोझ है न अध्यापक की मार का भय। न शिक्षक के ऊपर पढ़ाने का दबाव न ही न सिखा,समझा पाने की खीझ। अध्यापक ने नही बच्चों को रट्टा लगवाने की कोशिश की,न निबन्ध लिखवाया।न कोई बच्चा मुर्गा बनाया गया,न ही किसी को मार पड़ी।फ़िर भी सब सीख रहे समझ रहे और दनादन जवाब भी देते जा रहे।बच्चे भी खुश शिक्षक भी। पर ऐसा हुआ कैसे?
   सिर्फ़ पढ़ाने और सिखाने का थोड़ा सा तरीका बदल देने से। अध्यापक ने सिर्फ़ इतना किया कि बच्चों को कक्षा से बाहर ले गये।खेतों,पेड़ पौधों के बीच घुमाया।उन्हें तरह तरह के पौधे दिखाए पत्तियां दिखायीं।उनकी संरचना समझाई।सिर्फ़ समझाया ही नहीं बल्कि बच्चों से कहा कि वो पत्तियां देख कर खुद समझें।फ़िर बच्चों से तरहतरह की पत्तियां इकट्ठी करवाईं।और कक्षा में लौटकर उनसे ही खेल खेल में पत्तियों का वर्गीकरण भी करवा दिया।
   अब हम सभी को समझना चाहिये कि पढ़ाने का कौन सा तरीका बेहतर है?इस अध्यापक द्वारा अपनाया गया गतिविधियों से पूर्ण मनोरंजक तरीका?या फ़िर रटवाने,पेड़-पौधों पर निबन्ध लिखवाने उनको डांट डपट कर सिखाने का?उस प्रक्रिया से तो बच्चा भय से सिर्फ़ रट्टा लगा लेगा।पर सीखेगा कुछ भी नहीं यह निश्चित है।जबकिखोजें और जानें के लेख में दिये गये तरीके को अपनाने से बच्चों का मनोरंजन भी होगा,वह खुद करके अपने अनुभवों से तथ्यों को समझेगा,साथ ही जो बातें सीखेगा वो भविष्य के लिये उसके मस्तिष्क में संरक्षित भी होंगी।
         ये तो इस पत्रिका के पर्यावरण विशेषांक का सिर्फ़ एक उदाहरण भर है।इसी तरह पत्रिका का हर अंक हमारी प्राथमिक शिक्षा से सीधे जुड़े विभिन्न मुद्दों और—“सेवापूर्व एवं सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण,बालिका शिक्षा दशा और दिशा,सामाजिक विज्ञान शिक्षण,अभिव्यक्ति,समावेशी शिक्षा की चुनौतियां,जैसे महत्वपूर्ण सरोकारों पर केन्द्रित हैं।जो निश्चित ही हमारे शिक्षकों,अभिभावकों,बाल साहित्यकारों,या बच्चों के लिये काम करने वाली स्वयंसेवी/सरकारी संस्थाओंसभी के लिये उपयोगी होंगे।उनकी सोच को नयी दिशा देने में कामयाब होंगे।शिक्षकों द्वारा एक ही लीक पर चलाये जा रहे शिक्षण के  पारम्परिक तरीकों को बदल सकेंगे।
     खोजें और जानें पत्रिका हर शिक्षक,अभिभावक के हाथों में पहुंच सके ऐसी कोशिश होनी चाहिये।तभी इस पत्रिका को प्रकाशित करने की सार्थकता होगी।पत्रिका के बहुत ही उपयोगी विषय वस्तु चयन,सम्पादन और प्रकाशन के लिये सम्पादक मण्डल को हार्दिक बधाई।

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डा0हेमन्त कुमार 

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समय की आवश्यकता है----पाठ्यक्रम में रंगमंच

शनिवार, 11 मई 2013


               
 प्रसिद्ध नाटक "कहानी तोते राजा की"
का एक दृश्य
इसे सामाजिक विडम्बना ही कहा जाएगा कि आज भी हम बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिये पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं।यह लोकतन्त्र की प्राथमिक आवश्यकता है और हमारा राष्ट्रीय धर्म भी। आज बच्चों को स्कूलों में हर विषय की शिक्षा देने का प्राविधान है।जिसमें संगीत, नृत्य, चित्रकला,खेल-कूद और कम्प्यूटर जैसे विषय सम्मिलित हैं।इन विषयों के लिये स्कूलों में अलग से शिक्षक भी हैं,और अध्ययन की सुविधा भी। परन्तु एक विषय की ओर अभी तक विद्यालयों में ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वह है पंचम वेद के नाम से जाना जाने वाला नाट्यशास्त्र यानि रंगमंच और रंग कर्म। इसे आसान बोलचाल की भाषा में नाटक या थियेटर भी कह सकते हैं।
             मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार बच्चों के सर्वांगीण विकास में रंगमंच का एक बहुत बड़ा योगदान है।यही वह माध्यम है जिसके द्वारा बच्चा एक बड़े समुदाय के साथ जुड़ सकता है।जन सामान्य के सामने अपने को प्रस्तुत करने की उसकी झिझक दूर होती है और उसकी वाक शक्ति का विकास होता है। उसके अंदर समूह में कार्य करने के साथ ही नेतृत्व की क्षमता भी विकसित होती है।
            शिक्षा में रंगमंच की अवधारणा कोई नई बात नहीं है। इसकी आवश्यकता का अनुभव सर्व प्रथम यूरोप में किया गया। जहां सन 1776 में मैडम जेनेसिस ने थिएटर आफ़ एजूकेशन की स्थापना की और बच्चों को प्रशिक्षित करके नाटकों का मंचन किया। इस प्रकार रंगमंच को शिक्षा में लाने की शुरुआत हुई। हमारे देश में भी समय के साथ इसकी आवश्यकता महसूस की गयी। और सन 1965 में शैक्षिक रंगमंच की शुरुआत हुयी।किन्तु यह प्रयास मात्र चर्चाओं और गोष्ठियों का विषय बन कर रह गया। वर्ष 1980 के बाद संगीत नाटक अकादमी,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और भारतेन्दु नाट्य एकेडमी की ओर से किये गये प्रयासों से कुछ चेतना तो आई पर वह अपना कोई स्वरूप नहीं बना पाया।
             बच्चे किसी भी देश के भविष्य होते हैं।बचपन से ही यदि उनमें रंग संस्कार पड़ जायें तो यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होगा।इस माध्यम से बच्चों में कल्पना शक्ति,वाक्शक्ति,अनुभूति प्रदर्शन,अभिव्यक्ति की क्षमता,चलने फ़िरने का ढंग,नेतृत्व क्षमता एवं व्यक्तिगत कौशल का विकास होता है।रंगमंच बच्चों को जिम्मेदार बनाता है।उनमें अनुशासन के साथ साथ समयबद्धता के गुण लाता है। यही वो तत्व हैं जो लोकतन्त्र की नींव हैं और बच्चों को एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।परन्तु यह देखकर दुख होता है कि इस विधा का जितना लाभ बच्चों को मिलना चाहिये उतना लाभ बच्चे उठा नहीं पा रहे हैं।मात्र गर्मी की छुट्टियों और विद्यालयों के वार्षिक उत्सवों तक बाल रंगमंच को सीमित करके कहीं हम उनके विकास में बाधक तो नहीं बन रहे हैं? यह एक चर्चा का विषय है।
          बाल रंगमंच प्रशिक्षक के नाते यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जो नाटक बच्चों के लिये मंचित किये जाते हैं,उन्हें बच्चे बड़ी ही रुचि से देखते हैं।यदि नाटक बच्चों की मानसिकता को ध्यान में रखकर लिखा गया है तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ेगा ही,क्योंकि बच्चों में अनुकरण की अपूर्व शक्ति होती है। दृश्य एवं श्रव्य दोहरा माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव भी दोहरा होता है। वर्तमान समय में व्यक्ति परिवार और समाज की व्यस्तताएं कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी  हैं। जिसके कारण कदम-कदम पर भटकाव बढ़ रहा है। सामाजिक परिवेश प्रदूषित सा हो रहा है।टेलीविजन और इण्टरनेट संस्कृति का दुरुपयोग हमें अपसंस्कृति की ओर ले जा रहा है।इसका प्रभाव बच्चों पर कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है। ऐसे में बाल रंगमंच जैसे सार्वजनिक और सशक्त माध्यम की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। बच्चों की इसमें सीधी सहभागिता होने के कारण बच्चों में आत्मविश्वास,सृजनात्मक क्षमता,संवेदनशीलता और टीम वर्क की भावनाएं स्वतः ही जागृत हो जाती हैं। अपनी वाक्शक्ति के प्रदर्शन से वे आत्मविश्वास से भर जाते हैं।कभी-कभी यह भी देखा गया है कि कुछ ऐसे बच्चे जिनमें हकलाहट की समस्या थी थियेटर ज्वाइन करने के बाद उनकी समस्या खतम हो गयी। उनमें खोया हुआ आत्म विश्वास वापस आ गया। ऐसे  बच्चों में एकाग्रता,स्मरण शक्ति भी बढ़ती है। उनमें एक आंतरिक अनुशासन आता है। यह जागरूकता उन्हें अपने समय और परिवेश के साथ सीधे जोड़ने का काम करती है।
       एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि बच्चा 6 वर्ष की आयु तक 40 प्रतिशत और 18 वर्ष की आयु तक 80 प्रतिशत संस्कार ग्रहण कर लेता है। और ये संस्कार उस बच्चे के साथ जीवन भर चलते हैं।केवल 20 प्रतिशत संस्कार ही आगे जुड़ते हैं या परिवर्तित होते हैं। बच्चों द्वारा खेले जाने वाले बाल मनोविज्ञान पर आधारित नाटक ही सही मायनों में बाल रंगमंच कहलाता है।जटिल से जटिल विषयों को भी रंगमंच के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है। बाल रंगमंच के विकसित न हो पाने का एक कारण और भी है। अधिकांश माता पिता रंगकर्म को पढ़ाई से अलग मानकर उसे पढ़ाई में बाधा मानते हैं। सारा माहौल पढ़ाई और कैरियर पर ही केन्द्रित रहता है। ऐसे में रंगमंच जैसे माध्यम को समझने या अपनाने की न तो कोई इच्छा होती है और न ही इसके लिये अलग से कोई समय।
                बाल रंगमंच का व्यापक और प्रभावी विकास तभी हो सकता है जब इसे स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षा से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। इसकी उपादेयता को स्वीकार तो सभी करते हैं पर शासन द्वारा इस दिशा में कोई प्रयत्न न किये जाने के कारण बात आई-गई रह जाती है।
          विगत दो दशकों से बाल रंगमंच के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। जागरूकता भी आई है। पर यह केवल कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित है। यदि बाल रंगमंच की संभावनाओं को कुछ अधिक व्यावहारिक आधार मिले तो इसका विकास निश्चित ही सम्भव है। इसके लिये शासन,विद्यालय,अभिभावक तथा रंगकर्मियों को मिलकर कुछ ठोस सामूहिक प्रयास कर अपने दायित्व निभाने होंगे।
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अभिनव पाण्डेय
मोबाइल-07275866955
युवा रंगकर्मी अभिनव पाण्डेय ने भारतेन्दु नाट्य एकेडमी,लखनऊ से रंगकर्म सीखा है।अभिनव पाण्डेय ने कई टी0वी0 सीरियल्स में सहायक निर्देशक का कार्य करने के साथ ही कुछ डाक्युमेण्ट्री फ़िल्मों का भी निर्माण किया है। टी वी से जुड़ने के बावजूद इनका मन और दिल रंगकर्म में अधिक बसता है,खासकर बच्चों के साथ काम करना इन्हें अधिक प्रिय है। दिल्ली,पुणे, लखनऊ,मुम्बई में काम करने के बाद फ़िलवक्त कानपुर में रहकर बच्चों के लिये रंगमंच  की पृष्ठभूमि बनाने का काम कर रहे हैं।
                

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घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का------

शनिवार, 9 मार्च 2013


      स्कूलों में जाकर अक्सर अभिभावक यह शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे का मन पढ़ाई में लगता ही नहीं है। या कि मास्साब आप कैसे पढ़ाते हैं कि इसे कुछ याद ही नहीं रहता।कभी कभी यह भी शिकायत करते हैं कि आप इसे होमवर्क नहीं देते इसीलिये यह घर पर कुछ पढ़ता ही नहीं। कुछ अभिभावकों को मैंने यह भी कहते हुये सुना है कि अरे फ़लां स्कूल---अब तो बेकार हो चुका हैकभी होती थी वहां भी अच्छी पढ़ाई--- अब तो बस उस स्कूल का नाम भर रह गया है।
       यानी कि बच्चा घर में पढ़े न,उसका मन पढ़ने में न लगे,वह हमेशा टी0वी0 से चिपका रहे,खेलता रहे -----इन सब की जिम्मेदारी स्कूल की और मास्साब की। अभिभावक ने ले जाकर स्कूल में नाम लिखा दिया और उनकी जिम्मेदारी खत्म।अब बच्चे के पढ़ने,विकसित होने,अच्छे नंबर लाने सबका दारोमदार मास्टर जी के ऊपर।
          यहां सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों के पढ़ाने,लिखाने की अभिभावक या मां बाप की कोई जिम्मेदारी नहीं है?क्या उनकी जिम्मेदारी बस बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की है?जबकि बच्चा स्कूल में 24घण्टों में से सिर्फ़ 5-6 घण्टे रहता है। बाकी के 18घण्टे वो आपके साथ बिताता है। स्कूल तो एक जगह भर है जहां उसे शिक्षा का एक रास्ता बताया जाता है। सीखने सिखाने की एक प्रक्रिया से परिचित करा कर ज्ञान के एक अथाह समुद्र की तरफ़ बढ़ाया जाता है। ज्ञान के इस समुद्र में बच्चे को तैरना सिखाया जाता है। अब इस अथाह समुद्र के नये तैराक को एक कुशल,बेहतरीन तैराक बनाने में शिक्षकों के साथ अभिभावकों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब तक वो अपनी भी जिम्मेदारियां नहीं निभायेंगे बच्चा ज्ञान के सागर का एक कुशल तैराक नहीं बन पायेगा।पढ़ने लिखने में आगे नहीं बढ़ सकेगा।
 क्या जिम्मेदारियां हैं एक अच्छे अभिभावक की----- ?
                                            बच्चे को पढ़ने लिखने के लिये सबसे जरूरी चीज है अच्छे और खुशनुमा माहौल की। स्कूल में भी और घर पर भी। खुशनुमा माहौल का मतलब है ऐसा माहौल जिसमें बच्चा सहज ढंग से शान्तिपूर्ण वातावरण में पढ़ लिख सके। उसके ऊपर किसी तरह का मानसिक दबाव न हो। वह संकुचित या भयभीत न रहे। वह अपने मन में उठने वाले प्रश्नों को आपसे बिना किसी संकोच के पूछ सके। माना कि ऐसा वातावरण उसे स्कूल में अध्यापकों की कृपा और सहयोग से मिल जाता है। लेकिन क्या हम उसे घर पर ऐसा माहौल दे पा रहे हैं? अगर दे रहे हैं तो बहुत अच्छा है। यदि नहीं तो क्यों? और साथ ही हमें यह भी विचार करना पड़ेगा कि हम अपने घर का कैसा माहौल बनायें जिसमें बच्चा अच्छे ढंग से पढ़ लिख सके। यहां मैं कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर इंगित करूंगा जिन पर ध्यान देकर आप घर का वातावरण बच्चों की पढ़ाई के अनुकूल बना सकते हैं।
*शान्तिपूर्ण माहौल
 बच्चों को पढ़ने के लिये सबसे जरूरी शन्तिपूर्ण माहौल होता है। बच्चों की पढ़ाई के  समय उनके पढ़ने की जगह पर तेज आवाज में बातचीत न करें। टी0वी0,रेडियो धीमी आवाज में बजायें। यदि उनके पढ़ने के समय में घर में कोई मेहमान आ जाता है तो कोशिश करें कि बच्चे की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो। मेहमानों को आप दूसरे कमरे में बैठा कर उनका स्वागत कर सकते हैं।
*समय का निर्धारण---
  स्कूल के अलावा बच्चे 18घण्टों का जो समय आपके साथ बिताते हैं उनका सही उपयोग करना बच्चों को आप ही सिखला सकते हैं। इसके लिये यह जरूरी है कि आप अपने बच्चे के लिये एक संक्षिप्त टाइम टेबिल बनायें। जिसमें उसके सुबह उठने,स्कूल जाने,खेलने कूदने,मनोरंजन ,पढ़ाई और सोने का समय निर्धारित हो। यह जरूरी नहीं कि आपका बच्चा एकदम उसी समय सारिणी पर चले। जरूरत पड़ने पर उसमें आप या बच्चा फ़ेर बदल भी कर सकते हैं। लेकिन इससे उसके अंदर काम को समय पर और सही ढंग से करने की आदत पड़ेगी।
*टी0वी0,कम्प्युटर का समय निश्चित करें---
 आजकल बच्चों का ध्यान सबसे ज्यादा टी0वी0,वीडियो गेम्स और कम्प्युटर में लगता है। आप इससे उन्हें पूरी तरह रोक नहीं सकते।क्योंकि आज तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों का ही युग है। इनके बिना वह बहुत सारे ज्ञान और सूचनाओं से वंचित रह जाएगा। लेकिन इस पर बहुत ज्यादा समय देना भी स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिये अपने बच्चों को इन माध्यमों के फ़ायदों और हानियों से परिचित करा दें।
तथा इनके उपयोग का समय भी तय कर दें। जिससे वह अपना समय अन्य गतिविधियों को भी दे सके।
*खुद भी पढ़ें---
   बच्चों को पढ़ाई के लिये उचित माहौल देने के लिये यह बहुत जरूरी बिन्दु है। क्योंकि बच्चे बहुत सी बातें अनुकरण से भी सीखते हैं। आप को कोशिश यह करनी चाहिये कि आप बच्चों के पढ़ने के समय में खुद भी अपनी रुचि की कोई पुस्तक,पत्रिका या अखबार पढ़ें। आपको पढ़ता देखकर बच्चे के अंदर भी पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत होगी। उसे यह महसूस होगा कि मेरे पिता या मां भी मेरे साथ पढ़ रहे हैं।
*कुछ बाल पत्रिकाएं और रोचक बाल साहित्य बच्चों को दें----
       हर भाषा में आजकल हर उम्र के बच्चों के लिये बहुत सी पत्रिकाएं बाजार में उपलब्ध हैं। आप अपने बच्चे की आयु के अनुरूप कुछ बाल पत्रिकाएं घर में लायें। उनसे बच्चों का मनोरंजन तो होगा ही,उनके ज्ञान में बढ़ोत्तरी भी होगी। क्योंकि इन पत्रिकाओं में सिर्फ़ कहानी,कविता ही नहीं बल्कि बच्चों के लिये ढेरों सामग्री रहती है। जैसे चित्रों में रंग भरने,वर्ग पहेली,च्त्र देखकर कहानी लिखने,वाक्य पूरा करने,आदि के अभ्यास इनसे बच्चे की बुद्धि तीव्र होने के साथ उसका मनोरंजन भी होगा। और पत्रिकाओं में सामग्री की विविधता के कारण उसकी पढ़ने में रुचि भी  जागृत होगी।
          यहां कुछ अभिभावक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि बच्चों के ऊपर वैसे ही बस्ते का इतना बड़ा बोझ है। उसमें ये पत्रिकायें या बाल साहित्य---?उनके प्रश्न का सीधा सा जवाब यह है कि जैसे आप आफ़िस में अपने काम से ऊबने लगते हैं तो क्या करते हैं?दोस्तों से गप शप,टहलना घूमना।फ़िर तरोताजा होकर अपना काम शुरू कर देते हैं। ठीक वैसे ही बच्चों की ये पत्रिकाएं या बाल साहित्य,बच्चों के लिये थोड़े समय का मनोरंजन का काम करेगा। यानि कि वो कुछ समय के लिये कोर्स की किताबों से हट कर ज्ञान के ऐसे संसार में जायेंगे जहां उन्हें ज्ञान और मनोरंजन दोनों मिलेगा।जहां उनकी कल्पनाओं के भी पंख लगेंगे। उन्हें आनन्द की अनुभूति होगी।
*बच्चों को घर पर ही कभी कभी रोचक शैक्षिक फ़िल्में दिखाएं---
   आज तो पढ़ाई में भी इलेक्ट्रानिक माध्यमों का वर्चस्व होता जा रहा है। पत्रिकाओं की ही तरह बाजर में हर कक्षा,हर विषय की पाठ्यक्रम आधारित या पूरक कार्यक्रमों की सी0डी0 उपलब्ध हैं। यद्यपि इनकी संख्या अभी उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये। आज हर घर में टी0वी0 और सी0डी0प्लेयर भी मौजूद हैं। आप बच्चों के लिये उनकी कक्षा के अनुरूप शैक्षिक फ़िल्मों या इण्टरैक्टिव(ऐसे कार्यक्रम जिसमें बच्चे के लिये भी काफ़ी कुछ करने की गुंजाइश रहती है।) कार्यक्रमों की सी0डी0लाकर बच्चों को दिखायें। इनसे भी बच्चों  के अंदर पढ़ने की रुचि पैदा होगी।
         ये कुछ ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जिन पर ध्यान देकर इन्हें अपनाकर आप अपने घर का माहौल बच्चों की पढ़ाई लिखाई के अनुरूप बना सकते हैं बच्चों के अंदर पढ़ने लिखने की रुचि जगा सकते हैं। उन्हें यह महसूस करा सकते हैं कि उनके पढ़ने की जगह सिर्फ़ स्कूल में ही नहीं बल्कि घर पर भी है।
                                 

डा0हेमन्त कुमार

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शिक्षक दिवस पर ----मेरे मन में ---------

शनिवार, 5 सितंबर 2009


आज शिक्षक दिवस है। इस शुभ अवसर पर सभी शिक्षक बन्धुओं को हार्दिक बधाई । इस अवसर पर मैं अपने शिक्षक बन्धुओं खासकर प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से कुछ अनुरोध करना चाहूंगा। कि ------
0बच्चों का मन बहुत कोमल होता है।
0इस उम्र में बच्चों के मन पर जो छाप पड़ती है वह जीवन पर्यन्त
उनके साथ बनी रहती है।
0इस उम्र में सीखी गयी बातें ही उन्हें ताउम्र अच्छाई और बुराई
का भेद करना सिखाती हैं।
0 यही वह उम्र है जब उनका सम्पूर्ण विकास हम कर सकते हैं।
इसीलिये आप
0अपने सभी शिष्यों (बच्चों ) से मित्रवत व्यवहार करें।
0उनके ऊपर दण्डात्मक कार्यवाई(मारना,पीटना,बेंच पर खड़े
कराना,मुर्गा बनाना आदि) न करके उन्हें हर बात प्यार से
समझायें।
0उनके खिलाफ़ कोई ऐसी कार्यवाई न करें जिसका बोझ उसे पूरी उम्र
भर अपने पीठ पर ढोना पड़े।
0उसे भी अपने ही परिवार का एक सदस्य मान कर उसके साथ
सयंमित भाषा एवं व्यवहार अपनायें।
तभी शायद हम
0 दे सकेंगे बच्चों को उनके अधिकार।
0 बना सकेंगे उनका उज्ज्वल भविष्य।
0रोक सकेंगे स्कूलों में ड्राप आउट रेट ।
0 पूरा कर सकेंगे बच्चों के साथ ही सम्पूर्ण साक्षरता का सपना।
0 और ला सकेंगे हर बच्चे के चेहरे पर वह मोहक मुस्कान ---
जिसका वह हकदार है।
माहौल स्कूलों का बना दें ऐसा
बच्चा महसूस करे घर जैसा।
****************
हेमन्त कुमार

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कहानी कहना…… सुनाना………(भाग-4)

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

कहानी से चित्र/चित्र से कहानी



कहानी सुनाने, कहानी पढाने या कहने का एक और तरीका है। वह है कहानी को बच्चों से चित्रित करवाना या कुछ चित्रों के आधार पर उनसे कहानी लिखवाना। इस प्रक्रिया में भी सभी श्रोता बच्चे कहानी के साथ तुरंत ही इन्वाल्व हो जाते हैं। उन्हें यह लगता है कि वे केवल कहानी सुनने के लिये यहां नहीं बैठे हैं ।उन्हें कुछ और भी करना है। कहानी सुनाने के इस तरीके का प्रयोग मैंने फ़रवरी 08 में दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में बच्चों के लिए आयोजित एक वर्कशाप में किया था।
नॅशनलबुक ट्रस्ट ने पुस्तक मेले में प्रथम ( एन जी ओ) के सहयोग से बच्चों की एक कार्यशाला आयोजित की। मुझे इस कार्यशाला में बच्चों को कहानी सुनाने और उनसे कोई कहानी से संबंधित गतिविधि करवाने के लिए कहा गया। अपने चित्रकार मित्रों से बात चीत के बाद मैंने अपने प्रस्तुतीकरण का खाका तय कर लिया। मैं उस वर्कशाप में अपने साथ अपनी दो-तीन कहानियों की कई छाया प्रतियां करवाकर ले गया। साथ ही उन कहानियों के लिए बनाए गए चित्रों की कई प्रतियां भी। इससे मेरा काम बहुत आसान हो गया था।
मैंने वर्कशाप शुरु होते ही पहले बच्चों से सामान्य बातचीत की। उन्हें एक छोटी कहानी सुनाई। कुछ उनकी कहानियां सुनी। कुछ बच्चों से गाने सुने, कुछ से पहेलियां। यह कार्यक्रम लगभग 15-20 मिनट तक चला। अब तक बच्चे मुझसे और प्रथम के कार्यकर्ताओं से काफ़ी घुल मिल चुके थे। अब मैंने बच्चों को दो समूहों में बॉट दिया। एक समूह उन बच्चों का जो चित्र बनाना चाह रहे थे। दूसरा उनका जो कहानियॉ लिखना चाह रहे थे। फ़िर मैंने दोनों समूहों को कहानी और चित्र बॉट दिये।
और आप यकीन मानिए एक घण्टे बाद बच्चों की कलम से चित्रों को
देखकर जो कहानियॉ निकली : उनकी कल्पनाओं ने जो उड़ान भरी……शायद वहॉ तक मैं भी कल्पना नहीं कर सकता था। मेरी तीन कहानियों के चित्रों से कम से कम 45-50 के आस पास कहानियॉ तैयार हुईं। इतना ही नहीं हर कहानी के शीर्षक…… कथावस्तु……भाषा सबमें एक नयापन्।
ठीक यही बात हुई कहानियों के आधार पर बनाए गए चित्रों की। हर कहानी के बच्चों ने अलग ढंग से चित्र बनाये। हर बच्चे की कल्पना एकदम अलग्……इतना ही नहीं वर्कशाप के अंत में बाकायदा बच्चों ने कहानियॉ सुनाईं……किसी किसी बच्चे ने कहानी के किसी पात्र का अभिनय भी किया। किसी ने कहानी को पद्य के रूप में सुनाने की कोशिश की।
इस वर्कशाप के बारे में इतना विस्तार से बताने का मेरा मकसद सिर्फ़ यह है कि ……… कहानी से चित्र और चित्र से कहानी बनाने के इस औजार को भी कक्षा में हमारे अध्यापक मित्र प्रयोग कर सकते हैं। निश्चित रूप से उन्हें कहानी सुनाने…… पढाने के इस तरीके के अच्छे परिणाम मिलेंगे।
**********
हेमन्त कुमार

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कहानी …कहना ---- सुनाना ( भाग – 3)

गुरुवार, 27 अगस्त 2009


मेरे अब तक के पिछले दोनों लेखों से पाठक, अभिभावक, शिक्षक बन्धु यह बात समझ ही चुके होंगे कि हानी सुनाने में स्वरों के उतार चढाव की क्या भूमिका है? स्वर,गति और लय का क्या महत्व है?

अब मैं आपके सामने कथा वाचन या कहानी कहने का एक तरीका और रख रहा हूं। वह है कहानी को बच्चों से अभिनीत करवाना। इसे कहानी का नाट्य रुपांतरण नहीं कहा जा सकता। क्योंकि किसी कहानी का नाट्य रुपांतरण करते समय हम कथावस्तु का विस्तार भी करते हैं।लेकिन यहां हम सिर्फ़ कहानी में आए पात्रों को बच्चों से अभिनीत करवायेंगे यथावत्…बिना किसी फ़ेर बदल के।

कहानी सुनाने कि या कहने की इस शैली का प्रयोग विशेष रूप से कक्षा शिक्षण के दौरान करना काफ़ी प्रभावकारी रहेगा।इससे बच्चा खुद कहानी के पात्रों से अपना तादात्म्य स्थापित कर सकेगा और उस पात्र की अच्छाइयों बुराइयों को महसूस कर सकेगा। साथ ही कहानी के मूल भाव को समझ सकेगा।

मैं बच्चों की वर्कशाप में अक्सर कहानी कहने की इस शैली का प्रयोग करता हूं।।और नतीजा बहुत आशाजनक निकलता है।सबसे पहला नतीजा तो यह है कि बच्चा तुरंत ही कहानी में इन्वाल्व हो जाता है। दूसरे कहानी सुनाने का यह टू वे कम्युनिकेशन होता है। बच्चा आपकी कहानी का सिर्फ़ श्रोता ही नहीं रह जाता बल्कि आपके साथ बच्चा भी कथा वाचन में एक मुख्य भूमिका के साथ उपस्थित हो जाता है।

कैसे करें यह प्रयोग ?

0 पहला चरण -> मान लीजिये आपको कछुए और खरगोश की दौड़ वाली ही कहानी सुनानी है। तो सबसे पहले आप कक्षा के या श्रोता बच्चों से ही पूछिए कि क्या उन्हें यह कहानी मालूम है?यदि उत्तर नहीं मिले तो आप सबसे पहले संक्षेप में यह कहानी बच्चों को सुना दें।

0 दूसरा चरण -> यदि उत्तर हाँ में मिलता है। यानी बच्चों ने पहले यह कहानी सुनी है। तो उनमें से कुछ बच्चों से आप पहले कछुआ/ खरगोश या अन्य जानवरों के संवाद/बोलियां सुनें। फ़िर उन से कछुए की तरह धीमे धीमे चलने या खरगोश की तरह उछल कर चलने को कहें। आप देखेंगे कि समूह के ज्यादातर बच्चे यह कोशिश जरूर करेंगे। यानि कि उस समय तक बच्चों का पूरा ध्यान इस कहानी की तरफ़ केन्द्रित हो चुका होगा। यही

वह बिन्दु होगा जहां से आप बच्चों को अपने हिसाब से मोड़ सकेंगे।

0 तीसरा चरण -> बस इसी बिन्दु से आप बच्चों को मूल कहानी की तरफ़ ले जाएं। सबसे पहले उन्ही बच्चों में से एक एक से कहानी का वाचन पुस्तक से करवाएं। फ़िर कुछ से मौखिक रूप से कहानी सुनें। उन्हें कहानी में आए कठिन शब्दों के अर्थ बताएं। कठिन शब्दों के सही उच्चारण बताएं। उनसे कहानी के संवाद बुलवाएं। पूरी कहानी की एक बार व्याख्या कर दें। उससे मिलने वाली शिक्षा उन्हें बता दें।

0 चौथा चरण -> फ़िर सबसे अन्तिम चरण के रूप में आप कुछ समय के लिये यह भूल कर कि आप उनके शिक्षक व वे छात्र हैं। उनके साथ घुल मिल जाइए। खेलिये……घमाचौकड़ी करिए। कक्षा के बीच वाली जगह खाली करवाकर उसे मंच बना दीजिए और शुरु कर दीजिए कछुए खरगोश की कहानी अभिनय वाला भाग। हो सकता है कुछ बच्चे शरमाएं। ऐसे में आप सबसे पहले जमीन पर खुद खरगोश की तरह कुलांचे भर कर बच्चों को प्रोत्साहित करिए। निश्चित रूप से कक्षा में अध्यापक को इस तरह उछ्लते देख कर शर्मीले से शर्मीले बच्चे भी आपके इस नाटक में शामिल हो जाएंगे।

अब आप कुछ बच्चों को कछुआ, खरगोश, शेर (निर्णायक), या अन्य जानवरों की भूमिका दीजिए। शेष बच्चों को दर्शक बना दीजिए। अगली बार आप अभिनय करने वाले बच्चों को दर्शक और दर्शक बच्चों को अभिनेता बनाइए। कछुए खरगोश की कहानी के मंचन की इस पूरी प्रक्रिया को पूरे अभ्यास के बाद आप बच्चों से ही पूछिए कि उन्हें कहानी पढाने का कौन सा तरीका पसंद है… सिर्फ़ किताब से पढ्वा देना या इस तरह खेलकूद धमाचौकड़ी वाला……… उत्तर आपको खुद ब खुद मिल जाएगा।

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हेमन्त कुमार

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चिल्ड्रेन्स वर्कशाप आन वीडियो प्रोडक्शन……एक अभिनव प्रयोग

गुरुवार, 6 अगस्त 2009


दुनिया का हर बच्चा अपने आप में अलग और अनोखा होता है। हर बच्चे के भीतर कुछ नया करने ,बनाने की ललक के साथ ही कल्पनाओं का एक विशाल भण्डार छुपा रहता है।यदि इन बच्चों को सही दिशा निर्देश मिले तो ये ऐसे काम भी कर सकते हैं ,जिन्हें हम उनकी पहुंच के बाहर मान लेते हैं ।पिछले दिनों बच्चों की सृजनात्मकता को संवरने का एक ऐसा ही अवसर मिला राज्य शैक्षिक तकनीकी सस्थान ,लखनऊ में।
सी आई ई टी ,नई दिल्ली के सहयोग से इस संस्थान ने बच्चों को वीडियो कर्यक्रम निर्माण से परिचित कराने और उन्हें कुछ नया सिखलाने के लिये 20 से 30 जुलाई 09 तक एक कार्यशाला आयोजित की।कार्यशाला का उद्देश्य परिषदीय विद्यालयों के बच्चों की सृजनात्मकता को बढ़ाना था। इस कार्यशाला में कस्तूरबा गांधी विद्यालय माल,मलीहाबाद एव काकोरी के लगभग 15 बच्चों ने हिस्सा लिया।
कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान के निदेशक डा0 दलजीत सिंह पुरी ने किया।कार्यशाला के औपचारिक उद्घाटन के बाद सबसे पहले संस्थान की डिप्टी प्रोडक्शन इन्चार्ज श्रीमती ललिता प्रदीप ने बच्चों से दूरदर्शन के विभिन्न धारावाहिकों के बारे में चर्चा करने के साथ ही उन्हें चैनलों के विस्तार के साथ ही मीडिया में आते जा रहे बदलावों के बारे में बताया।सी आई ई टी नई दिल्ली से आये विशेषज्ञ डा0
लाल सिंह एवम श्री पदम सिंह ने भी बच्चों को शैक्षिक फ़िल्मों के बारे में बताया।
राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान में दस दिनों तक चली इस कार्यशाला में बच्चों को वीडियो कर्यक्रम निर्माण से सम्बन्धित हर पहलू से परिचित कराया गया।उन्हें संस्थान के लेक्चरर प्रोडक्शन डा0हेमन्त कुमार तथा प्रस्तु्तकर्ता श्रीमती मृदुला सुशील ने वीडियो फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखना सिखलाया तो प्रस्तुतकर्ता राकेश निगम ने समचार बुलेटिन तैयार करना सिखलाया।सीनियर प्रोड्यूसर श्री विनोद धस्माना ने बच्चों को स्टूडियो एवम आउट्डोर शूटिंग के बारे में जानकारियां दीं।संस्थान के सीनियर कैमरामैन श्री दिनेश जोशी एवम श्री चिक्का मुनियप्पा ने इन बच्चों को कैमरा संचालन के साथ ही एडिटिंग एवम साउन्ड रिकार्डिंग की बारीकियों से परिचित कराया।
फ़िल्म निर्माण के प्रति बच्चों के उत्साह को देखते हुये उन्हें दो समूहों में विभाजित कर दिया गया।बच्चों की ही सहमति से यह तय हुआ कि बच्चों का एक समूह समाचारों पर आधारित कार्यक्रम बाल समाचार का निर्माण करेगा तथा दूसरा समूह अपने शिक्षकों की शिक्षण पद्धति पर आधारित एक हास्य नाटक का निर्माण करेगा। इस समूह विभाजन के साथ ही खुल गया बच्चों के दिमाग का पिटारा। और निकलने लगे उनमें से रोचक समाचार,रोचक घटनायें और रोचक कहानियों के प्लाट।
बच्चों ने अपने समूह के साथ मिलकर शुरू कर दिया समाचारों का संकलन,नाटक के दृश्यों और संवादों का लेखन। बच्चों की यह दिमागी कसरत तीन दिनों तक चलती रही। इन तीन दिनों में बच्चों ने बहुत सारे आइडिया प्रस्तुत किये ,उन पर विचार विमर्श किया।उन्हें रद्द भी कर दिया।फ़िर से नये आइडिया, कहानी का प्लाट ढूंढ़ा और अन्ततः फ़ाइनल न्यूज बुलेटिन बाल समाचार और एक हास्य नाटक अद्भुत विद्यालय की स्क्रिप्टें हेमन्त कुमार के दिशा निर्देशन में तैयार हो गयीं।
25-26 जुलाई दो दिनों तक बच्चे जुटे रहे अपने दोनों कार्यक्रमों के गहन रिहर्सल में। और इस काम में उनको दिशा निर्देश मिल रहा था संस्थान की प्रस्तुतकर्ता मृदुला सुशील एवम अमरेन्द्र सहाय से।इन दो दिनों में बच्चों ने सीखा शुद्ध उच्चारण ,संवाद बोलना,संवादों में स्वरों का उतार चढ़ाव तथा शारीरिक अभिनय के साथ चेहरे पर लाये जाने वाले भावों और भंगिमाओं को।
और 27 एवम 28 जुलाई को तो संस्थान परिसर में अजीब नजारा था। हर गैलरी
में बच्चे रंग बिरंगी ड्रेस पहने हुये टहल रहे थे। कहीं बच्चे लाइट,रोल कैमरा,ऐक्शन्……जैसे कमाण्ड बोलते सुने गये।तो कहीं अपने सवादों को दुहराते हुये।27जुलाई को बच्चों ने संस्थान के मिनी स्टूडियो में अपने समाचार बुलेटिन की और 28 को मुख्य स्टूडियो में अपने नाटक अद्भुत विद्यालय की रिकार्डिंग पूरी की।इन दोनों ही दिनों बच्चों के अन्दर एक अलग ढंग का उत्साह दिखाई पड़ा। आखिर उनका फ़िल्म बनाने का स्वप्न जो पूरा हो रहा था।
29 जुलाई को सभी बच्चे इकट्ठा हुये एडीटिंग रूम में। और नान लीनियर एडीटिंग सेटप पर श्री चिक्का मुनियप्पा द्वारा अपनी फ़िल्मों को एडिट होते देख कर आनन्दित होते रहे। अन्ततः तैयार हो गयी उनकी दोनों फ़िल्में बाल समाचार और अद्भुत विद्यालय।
वीडियो प्रोडक्शन सीखने की इस प्रक्रिया के दौरान बच्चे अनुभवों के विभिन्न
दौरों से गुजरे।कभी लाइट चली गयी कभी कहीं किसी उपकरण का कनेक्शन लूज हो गया।पर इस समय का उपयोग भी उन्होंने गाना गाकर,डांस करके और अभिनय दिखाकर किया।इस वर्कशाप का उद्देश्य बच्चों को वीडियो कार्यक्रमों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया से परिचित कराना था न कि उन्हें उसमें निपुण बनाना।इस दृष्टि से यह वर्कशाप पूरी तरह सफ़ल थी।
00000000
हेमन्त कुमार




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( कहानी कहना -----कहानी सुनाना एक कला (भाग-2)

सोमवार, 13 जुलाई 2009

स्वर+गति+लय+अभिनय =अच्छी कहानी

मेरे लेखन की शुरुआत आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से हुई थी ।वह भी बच्चों के लिये प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘बालसंघ’ से ।1974 के आसपास ‘बालसंघ’ कार्यक्रम का संचालन आदरणीय श्री विजय बोस जी किया करते थे ।श्री विजय बोस एक बेहतरीन ड्रामा आर्टिस्ट होने के साथ ही एक बढ़िया प्रस्तोता एवम वाचक भी थे …खासकर कहानियां सुनाने के मामले में तो उनका कोई जवाब नहीं था ।साधारण कहानी को भी विजय भैया इतने बढ़िया ढंग से सुनाते थे कि वह कहानी
खास बन जाती थी । और यही साधारण सी कहानी का खास बन जाना ही बच्चों का मनोरंजन करता है।उन्हें कहानी के प्रति आकर्षित करता और अन्त तक बांधे रहता है।बच्चों को कहानी सुनाना मैनें आदरणीय विजय बोस से ही सीखा था।यद्यपि बचपन में दादी,नानी,अपनी माता जी एवम अन्य बुजुर्गों से भी कहानी सुनी थी ---लेकिन कहानी सुनने का असली तरीका आकाशवाणी में ही सीख सका ।
दरअसल बच्चों को कहानी सुनाते समय हमें कई कलाओं एवम दक्षताओं का इस्तेमाल करना होता है ।इनमें वाचन,अभिनय,चित्रकला,पुतुल(पपेट),चार्ट आदि प्रमुख हैं ।यहां मैं पहले वाचन और अभिनय का ही उल्लेख करूंगा ।क्योंकि ये दोनों ही दक्षतायें कहानी को ज्यादा आकर्षक और प्रभावशाली बनाती हैं।
1-स्वर का उतार चढ़ाव :
यह तो कहानी सुनाने का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।यदि हम किसी बच्चे या बच्चों के समूह को एकदम साधारण ढग से ,सामान्य स्वर में कोई कहानी सुना देंगे तो वह कहानी कितनी भी अच्छी हो एकदम बेअसर हो जायेगी हो सकता है बच्चे उसे ठीक से सुनें भी न । हो सकता है कुछ बच्चे कहानी सुनते समय सोने लगें । लेकिन यही कहानी अगर कहानी के पात्रों,दृश्यों ,स्थितियों और भावों के अनुरूप अपनी आवाज में उतार चढ़ाव लाकर सुनायी जायेगी तो उसका प्रभाव ही अलग पड़ेगा ।
2-गति एवम लय :
जैसे किसी गीत को लय और गति प्रभावशाली बनाते हैं ,वैसे ही कहानी को भी यही दोनों तत्व सुनने योग्य बनाते हैं ।मान लीजिये कोई परियों की कहानी है ।उसमें परी के विवाह का वर्णन है अब उसे अगर आप कर्कश स्वरों में जल्दी जल्दी सुना देंगे तो क्या उसे बच्चे पसन्द करेंगे---नहीं न । और उसी विवाह के वर्णन को अगर आप थोड़ा कोमल स्वरों में धीरे धीरे सुनायेंगे तो उसका प्रभाव ही एकदम अलग होगा।इसी तरह अगर किसी कहानी में किसी युद्ध का वर्णन है तो आपको उसी दृश्य के अनुरूप अपने स्वरों में थोड़ा तेजी और उत्साह लाना होगा।
3-अभिनय :
कहानी सुनाने में जितनी बड़ी भूमिका स्वर,गति,लय की है उतनी ही बल्कि उससे कहीं ज्यादा अभिनय की है ।आप पूछेंगे वह कैसे ?भाई सीधी सी बात है हम सभी को राम की कहानी पढ़ने, उससे ज्यादा किसी अच्छे कथावाचक से सुनने और उससे भी ज्यादा उसे रामलीला के रूप में देखने में आनन्द आता है ।ठीक यही बात हम हर कहानी के साथ लागू कर सकते हैं।खासतौर से बच्चों को कहानी सुनाते समय तो हमें अपने अन्दर एक अच्छे अभिनेता को जगाना ही होगा।तभी हम कहानी सुनने का पूरा आनन्द बच्चों को दे सकेंगे।
मान लीजिये शेर और खरगोश की ही कहानी बच्चों को सुनानी है ।तो एक तरीका तो यह है कि हम सीधे सीधे सत्यनारायण की कथा की तरह बच्चों को यह कहानी सुना दें और फ़ुरसत पा जायें।दूसरा और मेरे हिसाब से सही तरीका यह है कि हम इस कहानी को धीरे धीरे सुनाने के साथ ही शेर और खरगोश के साथ ही अन्य जानवरों के बीच हुये संवादों को उन्हीं जानवरों की आवाजों में सुनायें। आप खुद सोच कर देखिये बच्चे आपके मुंह से शेर की दहाड़ या खरगोश की डरी हुई आवाज सुन कर कितना आनन्दित होंगे।इतना ही नहीं अगर हम खुद या फ़िर बच्चों से इन पात्रों के अभिनय करवायें तो सम्भवतः कहानी का प्रभाव दूना हो जायेगा ।
हम अभिनय के माध्यम से सिर्फ़ कहानी को ही प्रभावशाली नहीं बनाते हैं ।हम इसके माध्यम से बच्चों को कहानी में शामिल विभिन्न जानवर पात्रों के व्यवहार,उनकी बोलियों,उनके स्वभाव से भी परिचित करते हैं।इतना ही नहीं कहानी यदि किसी ऐतिहासिक घटना पर आधारित है तो उसके पात्रों के माध्यम से उस समय के लोगों की बोलने ,बातचीत की शैली भी सीखते हैं ।
हमारे प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक बन्धुओं को तो खासातौर से अपनी कक्षाओं में कहानी सुनाते समय इन तीनों ही तत्वों स्वरों का उतार चढ़ाव,गति एवम लय तथा अभिनय का ध्यान जरूर रखना चाहिये तभी वे एक अच्छे कथावाचक की भूमिका निभा सकते हैं ।
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हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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