पुस्तक समीक्षा--हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लेखन एक बड़ी चुनौती
बुधवार, 19 अगस्त 2026
पुस्तक समीक्षा
हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लेखन एक बड़ी चुनौती
पुस्तक-हिंदी
बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास
लेखक-प्रो०सुरेन्द्र
विक्रम
प्रकाशक: के एल
पचौरी प्रकाशन
हिंदी बाल साहित्य का फलक अब बहुत विस्तृत हो चुका है ।अब वह समय बीत चुका है जब तमाम
साहित्यकार यह कहते सुने जाते थे कि जो रचनाकार हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा के
लिए लिखने में असफल हो गए उन्होंने बाल साहित्य लिखना शुरू कर दिया ।या कि बाल साहित्य लिखना कौन कठिन काम
है ।चार लाइन की तुकबंदी कर दो और हो गया बाल साहित्य ।लेकिन ये सब आज से तीन दशक
चार दशक पहले की बातें थीं।आज की तारीख में हिन्दी बाल साहित्य खूब लिखा जा रहा है,प्रकाशित हो रहा
है और बच्चों तक पहुंच भी रहा है ।
एक बात और है।पहले के मुख्य धारा के
हिन्दी साहित्यकारों ने तो कुछ बाल साहित्य लिखा भी है लेकिन आज के वरिष्ठ
साहित्यकार गण इस दिशा में कोई प्रयास करते नहीं दिखते ।जबकि जिन बाल साहित्यकारों
ने बाल साहित्य लिखने से शुरुआत की थी वो आज किसी न किसी विधा में बड़ों का साहित्य
भी लिख रहे ।भले ही कम मात्रा में लेकिन लिख रहे हैं ।बहरहाल ये एक अलग विषय है और
इस पर मैं आगे फिर कभी लिखूंगा ।
अभी मुख्य मुद्दा है हिन्दी का बाल
साहित्य।हिन्दी में बाल साहित्य लगभग हर विधा में काफी प्रचुर मात्रा में लिखा जा
रहा है ।कहानी,कविता,गीत, नाटक,संस्मरण,उपन्यास सभी में ।किसी में कम तो किसी में
ज्यादा ।लेकिन सबसे दुःख की बात है कि इतनी ज्यादा मात्रा में बाल साहित्य लिखे
जाने के बावजूद उनके सही मूल्यांकन,समीक्षा,आलोचना के क्षेत्र में बहुत कम और सिर्फ गिने
चुने बाल साहित्यकारों द्वारा ही काम किया जा रहा है ।जबकि इस दिशा में काफी काम
किए जाने की जरूरत और गुंजाइश दोनों ही है ।
प्रो०सुरेन्द्र विक्रम उन गिने चुने बाल
साहित्यकारों में से एक हैं जिन्होंने बाल कविताएं लिखने के साथ ही समीक्षा और
आलोचना की दिशा में काफी काम किया है ।उनकी हिन्दी बाल साहित्य की समीक्षा,आलोचना और शोध की अब तक कई किताबें
प्रकाशित हो चुकी हैं ।और उसी क्रम में आई है उनकी नई किताब “हिंदी
बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास” ।करीब 290 पेज की यह किताब के०एल०पचौरी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।इस पुस्तक का स्वागत होना ही चाहिए ।
कोई भी इतिहास लिखते समय सबसे महत्वपूर्ण
बात होती है इतिहास लेखक की दृष्टि या नजरिये की ।चाहे वह किसी देश का इतिहास हो
या फिर किसी साहित्य का ।किसी देश के किसी कालखंड का इतिहास हो या फिर किसी भाषा
का या भाषा के किसी भी रूप में लिखे गए साहित्य का ।महत्वपूर्ण यह है कि उस साहित्य
के इतिहास को लिखते समय या लिखने के पहले लेखक की सोच,दृष्टि नजरिया क्या था ?लेखक उस
साहित्य को कितनी समग्रता के साथ देखता है ?लेखक का उस साहित्य का कितना अध्ययन है
?या सरल शब्दों में कहूँ तो लेखक की उस साहित्य में कितनी गहरी पैठ है ?उसके पास
समीक्षा,आलोचना,शोध
का कितना अनुभव है ?क्या लेखक के पास उस साहित्य का इतिहास लिखने के पर्याप्त
संसाधन मौजूद हैं ? क्या लेखक ने उस साहित्य के अधिकांश रचनाकारों से संपर्क बना
रखा है ? ये बहुत सारे बिंदु हैं जिन्हें किसी साहित्य का इतिहास लिखते समय इतिहास
लेखक को बराबर ध्यान में रखना ही होगा ।
और इन बिन्दुओं के मद्देनजर अगर हम प्रो०सुरेन्द्र विक्रम की किताब “हिन्दी
बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास” पर नजर डालते हैं तो हमें इनमे से हर बिंदु या
प्रश्न का उत्तर हां में ही मिलता है।कारण प्रो०सुरेन्द्र विक्रम एक शिक्षक तो हैं
ही उससे पहले वो एक शोधार्थी भी हैं।उनके पास पुस्तक समीक्षा,आलोचना के साथ ही शोध
कार्यों का भी एक विस्तृत अनुभव भी जुड़ा हुआ है ।उनके पास बाल साहित्य की शुरूआती
दौर की पत्रिकाओं,पुस्तकों,लेखों, आलोचनात्मक पुस्तकों के साथ ही नई प्रकाशित किताबों पत्रिकाओं,अखबारों का भी अद्भुत खजाना है ।या हम
यूं भी कह सकते हैं कि उनके पास अपना बाल साहित्य और उसकी पुस्तकों का एक बड़ा
पुस्तकालय भी है ।हिन्दी के बाल साहित्यकारों से भी उनके अच्छे सम्बन्ध हैं ।और
सबसे बड़ी बात उनके भीतर प्रारम्भ से लेकर आज तक के लिखे जा रहे हिन्दी बाल साहित्य की सूचना, जानकारी शोधार्थियों तक पहुंचाने की जिजीविषा और हिम्मत भी है ।कुल मिलाकर उनके पास
वो पूरा माहौल है जिसमें वो हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास लिखने महत्वपूर्ण
कार्य कर सके ।
मेरे विचार से किसी साहित्य का इतिहास लेखन कोई
आसान काम नहीं है।यह एक श्रमसाध्य काम है ।इसमें लगने वाले समय की कोई सीमा नहीं
निर्धारित की जा सकती है।और खासतौर से जब यह काम कोई एक व्यक्ति या लेखक कर रहा
हो।क्योंकि इसमें श्रम के साथ बहुत से खतरे भी हैं ।खतरे इस बात के कि किसी काल
खंड का जिक्र होने से रह न जाय,किसी वरिष्ठ साहित्यकार की चर्चा रह न जाय ।हर कालखंड में हर विधा
में लिखे गए बाल साहित्य का आकलन होने की सुनिश्चितता बनी रहे ---इत्यादि इत्यादि
।लेकिन सुरेन्द्र विक्रम जी ने इन सारे खतरों को उठाते हुए अंततः “हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास” काफी
कम समयावधि में तैयार किया इसके लिए वो बधाई के पात्र हैं ।
अब कुछ बातें इस संक्षिप्त इतिहास और
पुस्तक के बारे में ।अपनी इस किताब में प्रो०सुरेन्द्र विक्रम ने काल विभाजन अन्य
बाल साहित्य के लिखे गए इतिहासों से अलग हट कर किया है।सुरेन्द्र विक्रम ने अपनी
किताब के प्रारम्भिक अध्याय “काल विभाजन” में पूर्व के इतिहास लेखकों –डा०हरिकृष्ण
देवसरे,डा०परशुराम शुक्ला,डा०मस्तराम कपूर,डा०रोहिताश्व अस्थाना,डा०प्रकाश मनु द्वारा उनके द्वारा किये गए बाल
साहित्य के इतिहास के काल विभाजनों का उदाहरण देते हुए अपना काल विभाजन प्रस्तुत
किया है ।अपना काल विभाजन प्रस्तुत करते हुए सुरेन्द्र विक्रम ने लिखा है—“कुल
मिलाकर हिन्दी बाल साहित्य की यह विकास यात्रा मोटे तौर पर लगभग डेढ़ सौ वर्षों की
मानी जा सकती है ।कुछ ग्रंथों में कहीं कहीं सन 1850 से भी बाल साहित्य का उदय
माना गया है ।सारे ग्रंथों को खंगालने और व्यापक विचार विमर्श के बाद मेरा मानना
है कि हिन्दी बाल साहित्य की विकास यात्रा को इस प्रकार देखा जा सकता है ----
(1) आरम्भ से 19वीं शताब्दी के अंत तक
(सन 1882 से 1900 तक )
(2) बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक
(सन
1901 से 1947 तक )
(3) स्वतंत्रता प्राप्ति से बीसवीं शताब्दी के अंत तक
(सन 1948 से 2000 तक )
(4) इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ से आज तक
(सन 2001 से अद्यतन )----”
(हिंदी
बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास-प्रो०सुरेन्द्र विक्रम,पृष्ठ-27)
निश्चित
ही सुरेन्द्र विक्रम
ने अपनी एक नई दृष्टि से बाल साहित्य के इतिहास का यह काल विभाजन किया है ।
इस किताब की एक और महत्वपूर्ण खासियत का मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा
वो यह है कि अपने इस इतिहास में सुरेन्द्र विक्रम जी ने बाल साहित्य के डेढ़ सौ
सालों के इतिहास को समेटने का पूरा प्रयास किया है ।चाहे वह बाल कविता हो,बाल कहानी हो,बाल उपन्यास हो या बाल
नाटक या जीवनी ।इसके साथ ही इन्होंने आधुनिक समय में सक्रिय हर वरिष्ठ कनिष्ठ बाल
साहित्यकारों को इसमें शामिल किया है ।भले ही कुछ साहित्यकारों का उनके अभूतपूर्व
योगदान के बावजूद कहीं मात्र नामोल्लेख कर दिया गया हो और बहुत से साहित्यकारों की
कई कई पुस्तकों की विस्तृत चर्चा
की गई हो ।
बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास होने के
बावजूद इसमें कुछ कमियां भी हैं यहां जिनका उल्लेख होना जरूरी है ।उल्लेख होना
इसलिए जरूरी है कि जब भी किसी साहित्य का कोई नया इतिहास किसी लेखक द्वारा लिखा
जाता है तो निश्चित तौर पर पहले लिखे गए इतिहासों में रह गई कमियों को दूर करने का
महत्वपूर्ण भार उसके कन्धों पर होता है।
सबसे बड़ी कमी जो मेरी दृष्टि से गुजरी वह है “चित्रात्मक
बाल कहानियों” की कहीं भी चर्चा न होना।जबकि
आज की तारीख में छोटे बच्चों के लिए प्रकाशित चित्रात्मक कहानी पुस्तकों का अपार
भण्डार बाजार के साथ ही स्कूलों के पुस्तकालयों तक पहुंच रहा है ।सिर्फ एक प्रकाशन
संस्थान की यदि बात करूं तो छोटे बच्चों के लिए केवल नेशनल बुक ट्रस्ट से ही
सैकड़ों की संख्या में खूबसूरत चित्रों के साथ पतली पतली खुबसूरत किताबें प्रकाशित
हुई हैं।इसके साथ ही एकलव्य प्रकाशन,प्रथम बुक्स,इकतारा ट्रस्ट,नालंदा एन जी ओ जैसे
संस्थानों द्वारा प्रकाशित हजारों की संख्या में खुबसूरत चित्रों के साथ सजी
चित्रात्मक कहानियां उपलब्ध हैं।वैसे केवल सुरेन्द्र विक्रम से ही चित्रात्मक
कहानियों की बात छूट जाना कोई बड़ी बात नहीं है ।दरअसल इन खूबसूरत चित्रात्मक
कहानियों,पहले
प्रकाशित होने वाली मजेदार कामिक्स,अमर चित्रकथा सीरीज का पहले लिखे गए हिन्दी बाल
साहित्य के इतिहासों में भी कहीं उल्लेख नहीं मिलता।न ही किसी समीक्षक,लेखक,आलोचक ने इस दिशा में कोई पहल की या
समीक्षात्मक,आलोचनात्मक
काम ही किया है ।
दूसरी कमी इंटरनेट पर ब्लाग्स,वेबसाइट्स और आडियो बुक्स,वीडियो कार्यक्रमों में भी आज की तारीख
में प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य मौजूद है।उनका भी किसी इतिहास में उल्लेख नहीं
है।वैसे 2008के पहले लिखे गए हिन्दी बाल साहित्य के इतिहासों में इनका उल्लेख न
होना कोई बड़ी बात नहीं है ।क्योंकि भारत
वर्ष में ख़ास तौर से हिन्दी ब्लागिंग की शुरुआत ही लगभग 2008 से हुई है ।और इस समय
कम से कम सौ ब्लॉग तो ऐसे होंगे ही जो लगातार बाल साहित्य का प्रकाशन कर रहे हैं ।तो
उन पर प्रकाशित हो रहे बाल साहित्य का मूल्यांकन कौन और कब करेगा ।उन्हें भी हिंदी
बाल साहित्य के इतिहास में कब दर्ज किया जाएगा
यह विचारणीय मुद्दा है ।
तीसरी कमी जिसका मैं यहां उल्लेख करना
चाहूँगा।वर्त्तमान समय के कई बहुत प्रतिष्ठित और वरिष्ठ,कनिष्ठ बाल साहित्यकारों का इस इतिहास
में कहीं कोई उल्लेख ही न होना बहुत आश्चर्यचकित करता है ।ऐसे प्रतिष्ठित
रचनाकारों का यदि मैं नामोल्लेख करूंगा तो उचित नहीं होगा फिर भी एक दो नामों का
उल्लेख करना चाहूँगा ।प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट और लेखक श्री आबिद सुरती,प्रसिद्ध साहित्यकार,रंगकर्मी और बाल
साहित्य लेखक श्री आर्य रत्न व्यास अजामिल। ऐसे और भी बहुत से नाम हैं ।
बाल साहित्य का इतिहास लिखते समय यह भी
ध्यान में रखना आवश्यक है कि पिछले कई कई सालों से बहुत से रचनाकार सिर्फ पत्र-
पत्रिकाओं में लिखते छपते रहे हैं ।और उनका बाल साहित्य भी मात्रा में बहुत है।बावजूद
इसके उन रचनाकारों ने किन्हीं कारणों से कभी अपनी रचनाओं को संकलित करवाने या
पुस्तक रूप में छपवाने की कोई कोशिश नहीं की ।जबकि आज की तारीख में प्रकाशित
पुस्तकों की तुलना में उनकी रचनाओं का स्तर भी बहुत अच्छा है।तो इतिहास लिखते समय
इतिहास लेखक को खोजी लेखक की तरह ऐसे भूले बिसरे बाल साहित्यकारों से संपर्क करके
या पत्रिकाओं से खोज कर उनकी श्रेष्ठ रचनाओं का उल्लेख भी अपने इतिहास में दर्ज
करना होगा।
आशा करता हूं कि प्रो०सुरेन्द्र विक्रम जी अपनी
इस महत्वपूर्ण कृति “हिन्दी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास” के आगे के संस्करणों
में या “हिन्दी बाल साहित्य का प्रवृत्तिपरक इतिहास” लिखते समय मेरे द्वारा इंगित
किये गए बिन्दुओं पर ध्यान देंगे ।
पुनः
इस महत्वपूर्ण और जरूरी कृति का हिन्दी बाल साहित्य जगत में स्वागत होना ही चाहिए।निश्चित
ही सुरेन्द्र जी की यह कृति बाल साहित्य के आलोचकों, रचनाकारों,शोधार्थियों के लिए उपयोगी साबित होगी ।प्रो0
सुरेन्द्र विक्रम जी को मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
००००
समीक्षक—
डा०हेमन्त
कुमार



