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प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन के बहाने--समकालीन हिंदी बाल कविता का अवलोकन

सोमवार, 28 जून 2021

 

पुस्तक समीक्षा


प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन के बहाने--समकालीन हिंदी बाल कविता का अवलोकन



                         प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन


                       चयन एवं संपादन –दिविक रमेश


प्रकाशक-साहित्य अकादेमी 

पृष्ठ-706,मूल्य-रू-550/-

(पेपरबैक)प्रथम संस्करण-2020

                                          

               हिंदी बाल साहित्य के आज के सम्पूर्ण परिदृश्य को देखने पर एक बात बहुत साफ़ तौर पर नजर आती है-–वह है पूर्व में प्रकाशित और नए प्रकाशित हो रहे हिंदी बाल साहित्य की समीक्षा,शोध और मूल्यांकन की कमी।बाल साहित्य पर आलोचनात्मक और समीक्षात्मक किताबें कम लिखी जा रही हैं।बाल साहित्य पर शोध कार्य भी कम हो रहे हैं।हो भी रहे हैं तो बाल साहित्य की किसी विधा को लेकर,या उसकी सम्पूर्णता को लेकर नहीं बल्कि सिर्फ कुछ लेखकों पर केन्द्रित।चिंता का विषय यह भी है कि कुछ दिग्गज बाल साहित्यकार तो खुद अपने साहित्य पर ही शोध करवाकर उसे अपने ही खर्च से प्रकाशित भी करवा दे रहे हैं।इतना ही नहीं बाल साहित्य पर गंभीरता से सोच विचार करने वाले चिन्तक और लेखक भी कम ही हैं।

   

      


          इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है बाल साहित्य की हर विधा की रचनाओं का बिखराव।यहाँ बिखराव से मेरा तात्पर्य है बच्चों के लिए लिखी जा रही कहानियों,कविताओं,नाटकों या किसी भी विधा के साहित्य का एक जगह एकत्रित न हो पाना।दरअसल होता यह है कि जब भी कोई बाल साहित्य पर काम करने वाला शोधार्थी किसी विधा विशेष पर काम करना चाहता है तो उसे उस विधा की वो रचनाएँ तो मिल जाती हैं जो रचनाकारों के प्रयासों से पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन उसी विधा की ढेरों ऐसी सामग्री जो पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं उन तक वह शोधार्थी नहीं पहुँच पाता।और यह समस्या बाल कविताओं को लेकर कुछ ज्यादा ही है।

      

  


                    यहाँ अगर हम तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो संभवतः बाल साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा बाल कवितायें ही सबसे ज्यादा संख्या में लिखी जा रही और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो रही हैं।लेकिन दूसरी दिक्कत यह भी है कि बाल कविताओं के संग्रह का प्रकाशन भी सबसे ज्यादा कठिन काम है।सरकारी,स्वायत्तशाषी या पूर्णतः प्राइवेट प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित बाल साहित्य की तरफ अगर देखिये तो आपको सबसे अधिक संख्या कहानियों,उपन्यासों की मिलेगी।नाटकों,कविताओं की किताबें या संग्रह कम ही प्रकाशित हो रहे हैं।इनमें भी अच्छे बाल कविताओं के संग्रह तो संख्या में शायद सबसे कम प्रकाशित हो रहे।यद्यपि अगर हम बहुत से बाल साहित्यकारों और कवियों द्वारा लिखे गए और प्रकाशित ऐसे बाल कविता संकलनों को छोड़ दें जिनमें सिर्फ उन्हीं की रचनाएँ संकलित हैं तो ऐसे संग्रह या संकलन संख्या में कम और सिर्फ गिने चुने ही हैं जिनमें देश के प्रतिष्ठित बाल रचनाकारों की कविताएं संकलित हैं।यद्यपि इस दिशा में काम हुए हैं और अच्छे संकलन भी निकले हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है।हरिकृष्ण देवसरे द्वारा संपादित “बच्चों की सौ कवितायें”,जयप्रकाश भारती द्वारा संपादित “हिंदी की श्रेष्ठ बाल कवितायेँ”,“बचपन एक समंदर”(संपादक-कृष्ण शलभ),“प्रतिनिधि बालगीत”(सम्पा०डा0श्रीप्रसाद),“एक सौ इक्यावन बाल कवितायेँ”(सम्पा०-ज़ाकिर अली रजनीश),“चुने हुए बालगीत”-दो खंड(सम्पा०-रोहिताश्व अस्थाना),“बच्चों के प्रिय कवि”(सीरीज)-(सम्पा०-प्रकाश मनु),“इब्नबतूता का जूता”-(सम्पा०-प्रभाकिरण जैन)अथवा ऐसे ही कुछ गिने चुने संकलन और भी होंगे जिनमें बच्चों के लिए विभिन्न बाल साहित्यकारों द्वारा लिखे गए बहुत से बाल गीत संकलित हुए हैं।लेकिन इनकी संख्या इतनी नहीं है कि इनके आधार पर कोई शोधार्थी या बाल कविताओं पर काम करने वाला लेखक समीक्षक बाल कविताओं पर काम कर सके।और वह समकालीन बाल कविता के परिदृश्य का मूल्यांकन,आकलन कर सके।क्योंकि इनमें भी सबसे बड़ी समस्या यही है कि जिस समय ये संकलन तैयार होकर प्रकाशित हुए उस समय के बहुत से महत्वपूर्ण बाल कवियों की रचनाएं इनमें नहीं पहुँच सकीं।ऐसे में उन साहित्यकारों की बाल कवितायें अच्छी और महत्वपूर्ण होते हुए भी समीक्षकों,आलोचकों या बाल साहित्य का इतिहास लिखने वाले विद्वानों की नजर में नहीं आ सकीं।          

                

     अब इसके कारण खोजने पर तो बहुत से दिख जायेंगे।लेकिन उन कारणों पर यहाँ बात करना मेरा मकसद नहीं है।यहाँ एक बात और मैं कहना चाहूँगा कि कई बार ऐसा होता है कि बहुत से रचनाकारों की अच्छी बाल कवितायें सिर्फ किसी संकलन में न आने के कारण भी समीक्षकों,आलोचकों या शोधार्थियों की नज़रों में आने से छूट जाती हैं।और उनको कभी नोटिस में ही नहीं लिया जाता।न ही इतिहास में और न ही समीक्षकों के समीक्षात्मक लेखों में।

           


    इस दृष्टि से साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित और हिन्दी के वरिष्ठ कवि,आलोचक और बाल साहित्यकार दिविक रमेश जी द्वारा संपादित “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” एक बहुत सार्थक और महत्वपूर्ण किताब है।इस कविता संकलन के बारे में कुछ लिखने से पहले मैं हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी की एक बात उद्धृत करना चाहूँगा जो नरेश जी अक्सर मंचों पर कहा करते हैं।“एक सफल आलोचक,समीक्षक वही है जो किसी भी रचना,सृजन,काव्यकृति,पेंटिंग, या किसी भी क्रिएटिव रचना की सबसे पहले कोई एक विशेषता बता दे---फिर चाहे वह उस कृति की धज्जियां ही क्यों न उड़ा दे।और हर कृति रचना में कहीं न कहीं एक विशेषता या खूबी जरूर छुपी होती है।”

    


      मैं वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी के इस कथन से पूरी तरह से सहमत हूँ।और इस दृष्टि से अगर इस बाल कविता संचयन का विश्लेषण किया जाय तो इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें एक साथ वरिष्ठ और एकदम नवोदित रचनाकारों की रचनाएं एक साथ संकलित हैं।आमतौर पर होता यही है कि जब भी ऐसे किसी संकलन की बात आती है तो प्रायः सम्पादक या संकलनकर्ता उन्हीं रचनाकारों से संपर्क करने की कोशिश करते हैं जिनकी कवितायें पर्याप्त मात्रा में प्रकाशित हो चुकी हों या जो काफी चर्चित हो चुके हों।एकदम से नवोदित रचनाकारों की रचनाएं अच्छी श्रेष्ठ होते हुए भी वो संकलन में उन्हें लाने का खतरा नहीं उठाना चाहते।खतरा इस सन्दर्भ में कि आलोचकों,समीक्षकों द्वारा वरिष्ठतम रचनाकारों की कविताओं के साथ एकदम से नए रचनाकारों को भी संकलन में रखने के औचित्य पर उठने वाले सवालों का खतरा।

   


      इस दृष्टि से निश्चित रूप से इस संकलन के सम्पादक दिविक रमेश जी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इस संकलन में श्रीनाथ सिंह,द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,जयप्रकाश भारती,भवानी प्रसाद मिश्र जैसे दिग्गज साहित्यकारों के साथ ही सृष्टि पाण्डेय,नूरेनिशा,दिशा ग्रोवर,मोनिका अग्रवाल,रोचिका शर्मा जैसी एकदम नवोदित रचनाकारों की कवितायें शामिल करने का खतरा उठाया है।इस सन्दर्भ में दिविक जी ने इस संकलन के सम्पादकीय में लिखा भी है कि—“नामी रचनाकारों के नामों की महिमा मात्र के स्थान पर उनकी रचनाओं को खंगालकर मतलब की रचनाओं को ही चुनने और फिलहाल कम जाने,अपरिचित और नए से नए रचनाकार की भी रचनाओं से भरसक पूरी तरह गुजरते हुए उचित रचनाओं के चयन की चुनौती को स्वीकार करने का संकल्प लिया।इस क्रम में किसी रचनाकार के रह जाने या उसकी तथाकथित प्रचलित रचना के छूट जाने की चुनौती थी।वस्तुतः कहीं न कहीं मन में अधिक से अधिक नए रचनाकारों और उनकी सुयोग्य रचनाओं को स्थान देने की प्रबल इच्छा मन में थी ताकि बाल साहित्य के वर्तमान परिदृश्य के बारे में आकलन हो सके कि वह कितना समृद्ध है अथवा कितना कमजोर है।”(पृष्ठ-5)

   


      बाल कविता के वर्तमान परिदृश्य को जानने समझने के लिए दिविक रमेश जी का नये रचनाकारों के प्रति यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से सराहनीय कदम है।क्योंकि बाल साहित्य की किसी भी विधा में जब भी ऐसे संकलनों को किसी बड़ी प्रतिष्ठित संस्था द्वारा प्रकाशित करने की योजना बनती है तो अक्सर संकलनकर्ता या सम्पादक का यही प्रयास रहता है कि वह उस संकलन को बेहतर बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा बहु-प्रतिष्ठित,बहु-चर्चित रचनाकारों की ही रचनाएँ शामिल करें ताकि उस भारी-भरकम संकलन को अधिक से अधिक प्रतिष्ठा मिले।लेकिन उस वक्त संभवतः वो इस बात की तरफ ध्यान नहीं देते कि जिस संकलन को वो तैयार करने जा रहे वह उनके समसामयिक बाल साहित्य को प्रतिबिंबित भी करेगा।वो संकलन बाल साहित्य के इतिहास में भी दर्ज होगा।और भविष्य में उस संकलन के माध्यम से शोधार्थी,बाल साहित्य के अध्ययनकर्ता तत्कालीन बाल साहित्य का आकलन मूल्यांकन भी करेंगे।इसलिए उसमें निश्चित रूप से बहुत प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ ही उन रचनाकारों को भी स्थान देना चाहिए जिन्होंने अभी पिछले पांच-सात सालों से ही बाल साहित्य की और कदम बढ़ाया है।जिनकी अभी बहुत कम रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुयी हैं।इस दृष्टि से भी यह संकलन बाल साहित्य में एक बेहतरीन काम है।

  


        एक बात और जो इस संकलन को बेहद महत्वपूर्ण बनाता है वह है विषयों की विविधता और संकलित रचनाओं का नयापन।संकलन में एक तरफ प्रकृति के विविध रंग हैं,पेड़,पौधे,फूल,बादल,पहाड़,नदियाँ और सागर हैं तो दूसरी और चिड़ियों,पाखियों और अन्य जीवों की बातें हैं।मनुष्य जीवन के विविध रंग हैं तो बच्चों की किलकारियां और खिलौने भी हैं।यातायात के विभिन्न साधन ट्रेन,बस,साइकिल,रिक्शा, बैलगाड़ी है तो ऊपर उड़ते हवाई जहाज भी हैं।बच्चों को आश्चर्यचकित करने वाले कम्प्यूटर,मोबाइल हैं तो उन्हें घुमाने वाले चिड़ियाघर,पार्क बाग़ बगीचे भी हैं।यानि बाल मन की कल्पनाएँ जहां जहां तक विचरण कर सकती हैं वो सारे विषय कविता के रूप में इस संकलन में मौजूद मिलेंगे।

   


       “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” के संदर्भ में मैं एक बिंदु की तरफ और ध्यान दिलाना चाहूँगा वो यह एक ही विषय पर अलग- अलग समय के कवियों द्वारा लिखी गयी बाल कवितायें और उनकी अभिव्यक्ति।यह बात तो निश्चित रूप से एकदम साफ़ है कि किसी एक विषय या वस्तु को देखने परखने का हर व्यक्ति का दृष्टिकोण,हर रचनाकार का एंगिल अलग होगा और वह उस विषय या वस्तु पर अपने हिसाब से लिखेगा।इस दृष्टिकोण,विजन या देखने के ढंग में और साफ़ अंतर हम तब देख सकते हैं जब किसी विषय पर अलग अलग समय के रचनाकारों ने सृजन किया हो।इस कविता संकलन में से ऐसे ही कुछ उदाहरण मैं यहाँ दूँगा।

  


      अब बच्चों के लिए छुट्टी का मतलब और आनंद क्या होता है ये आप इस संकलन के तीन रचनाकारों की कविताओं में अलग-अलग रूपों में देख सकते हैं।चंद्रपाल सिंह यादव मयंक अपनी कविता “छुट्टी का दिन” में लिखते हैं –“हफ्ते में जब हो रविवार/मौज मजा आता तब यार/विद्यालय में छुट्टी रहती/मचती मौज मजे की धूम—(पृष्ठ-68)अब इसी छुट्टी विषय को लेकर कृष्ण शलभ की कविता “छुट्टी नहीं मनाते”में बाल मनोभावों की अलग ही अभिव्यक्ति दिखती है---“सूरज जी तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो/लगता तुमको नींद न आती/और न कोई काम तुम्हें/ज़रा नहीं भाता क्या मेरा/बिस्तर पर आराम तुम्हें।”(पृष्ठ-243)इसी छुट्टी को लेकर हेमन्त कुमार ने बच्चों की एकदम अलग ऎसी कल्पना को पंक्तिबद्ध किया है जो बच्चों के साथ बड़ों को भी हंसा देगी।हेमन्त कुमार अपनी कविता“आज हमारी छुट्टी है” में लिखते हैं—“आज हमारी छुट्टी है/स्कूल से हो गयी कुट्टी है/सब कुछ उलटा पुल्टा घर में/झाडू पोंछा बर्तन पल में/अब पापा निपटायेंगे/मां की हो गयी छुट्टी है।(पृष्ठ-433)अब एक ही विषय पर तीन अलग अलग अभिव्यक्ति वाली कविता निश्चित ही बच्चों को आनंदित करेगी।

    


      इसी तरह पतंग विषय को लेकर सीताराम गुप्त की कविता-“उड़ चली गगन छूने पतंग”,शकुन्तला कालरा की“पतंग और डोरी”,रावेन्द्र कुमार रवि की“उस पतंग को ख़ूब छाकाएं”,प्रीति प्रवीण खरे की कविता “पतंग”,और मधु माहेश्वरी की कविता“पतंग रानी”---इन सभी पांच कविताओं के रचनाकारों का समय अलग-अलग,परिवेश अलग-अलग –और पतंग को लेकर बच्चों के मनोभावों को इंगित करती कविताओं की अभिव्यक्ति का ढंग भी अलग-अलग है।इस बिंदु का उल्लेख यहाँ करने का मेरा मकसद सिर्फ यह इंगित करना है कि भविष्य के शोधार्थियों,आलोचकों को इस संकलन में ऎसी एक ही विषय पर अलग ढंग की अभिव्यक्ति वाली और भी कवितायेँ मिलेंगी और इस विषय पर भी शोधार्थी आगे काम कर सकते हैं।वो इन कविताओं के माध्यम से उनके रचनकारों के समय,काल उनके समय प्रचलित शब्दों के साथ ही उस समय की परम्पराओं,संस्कृतियों पर भी दृष्ट डाल सकते हैं।

    


          इस ढंग के किसी भी संकलन,संग्रह के लिए रचनाओं का चयन करते समय संकलनकर्ता का दृष्टिकोण क्या है?वह संकलन को क्या दिशा देना चाहता है यह बात भी बहुत महत्वपूर्ण है।जैसा की पहले ही लिखा जा चुका है कि दिविक जी की सोच इसे मात्र एक संकलन तैयार करने की न होकर इसे समकालीन बाल साहित्य का प्रतिबिम्ब भी बनाने की थी।साथ ही उनका एक दृष्टिकोण यह भी था कि कवितायें विज्ञानिक सोच वाली हों।उन्होंने संकलन की भूमिका में लिखा भी है कि-–“मेरी निगाह में कविताएं वैज्ञानिक सोच,प्रतिकूल मूल्यों और अंश्विश्वासों से मुक्त,कल्पना और जिज्ञासा को प्रेरित करने वाली लेकिन शैली में विश्वसनीयता की बुनियाद पर टिकी,नए प्रयोगों और नए ट्रीटमेंट से समृद्ध हों।कविताएं पहले की तरह सीधे-सीधे उपदेशात्मक शैली की न हों।समझ पिरोई हुयी हो सकती है।”(पृष्ठ संख्या-7) निश्चित रूप से दिविक जी ने अपनी इसी सोच और दृष्टिकोण के अनुरूप ही इस कविता संचयन में बाल कविताओं को संकलित किया है।इस संकलन को तैयार करने,संपादित करने और उसे प्रकाशन की पूर्णता तक पहुंचाने के लिए दिविक जी और साहित्य अकादेमी को ढेरों बधाई शुभकामनाएं।

   


         लगभग 195 कवियों की 518 बाल कविताओं वाले इस संकलन की इतनी विशेषताओं के साथ ही इसे औरबेहतर बनाने के लिए मेरे कुछ सुझाव भी हैं।जिनकी तरफ भी साहित्य अकादेमी द्वारा संकलन के आगे के संस्करण में ध्यान दिया जाना जरूरी है।पहली बात इसके हर पृष्ठ पर न सही कम से कम कुछ पृष्ठों पर कविता से सम्बन्धित रेखांकन अगर करवाया गया होता तो ये किताब थोड़ा और आकर्षक तो बन ही जाती।इसके पन्ने पलटते हुए भी पाठक को यह अहसास होता कि यह बाल कविताओं का संकलन है।जबकि कुछ पृष्ठों पर तो बहुत सारा स्पेस खाली और व्यर्थ ही गया।दूसरी बात इस महत्वपूर्ण और वृहत संकलन में इस बात की भी गुंजाइश थी कि संकलन में शामिल किये गए रचनाकारों का बहुत संक्षिप्त (अधिकतम 6-8 पंक्तियों का) परिचय और एक छोटा चित्र भी दिया जा सकता था।साहित्य अकादेमी चाहे तो इस संकलन के आगे के संस्करण में इन दो सुझावों पर विचार कर सकती है।

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समीक्षक--डा0 हेमन्त कुमार

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पुस्तक समीक्षा-- बच्चे पढ़ें—मम्मी पापा को भी पढ़ाएं—“लू लू की सनक”

मंगलवार, 9 जून 2015

पुस्तक-लू लू ली सनक
(बाल कहानी संग्रह)
लेखक-दिविक रमेश
चित्र-अतुल वर्धन
प्रकाशक-नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया
नेहरू भवन,5,इंस्टीट्युशनल एरिया,फ़ेज-2
वसंत कुंज,नई दिल्ली-110070

संस्करण-2014 मूल्य-रू075/मात्र।

        हिन्दी में बाल साहित्य लिखा तो खूब जा रहा है,प्रकाशित भी हो रहा है।लेकिन इसमें नये प्रयोग बहुत कम हो रहे हैं।प्रयोग से यहां मेरा तात्पर्य रचनात्मक खिलन्दड़ेपन से है।मतलब रचनाओं से रचनाकार कुछ इस तरह खेले जो बाल मन को भाए,आकर्षित करे।उनके अंदर किताब को पढ़ने की ललक बढ़ाए।
     अभी कुछ ही दिनों पहले(2014) नेशनल बुक ट्र्स्ट से प्रकाशित दिविक रमेश जी का बाल कहानी संग्रह लू लू की सनक एक ऐसा ही प्रयोगधर्मी बाल कहानियों का संकलन है।इस संकलन में दिविक जी की कुल छः कहानियां संकलित हैं।लू लू की मां,लू लू की सनक,लू लू बड़ा हो गया,लू लू की बातें,लू लू का गुस्सा,और लाल बत्ती पर।संकलन की खास बात यह है कि इसकी सभी कहानियों का नुख्य पात्र लू लू नाम का स्कूल जाने वाला एक बच्चा है।हर कहानी में लू लू के साथ ही ्घटने वाली घटनाओं,उसके मन में उठने वाले प्रश्नों,उसकी मां द्वारा दिये गये उत्तरों और उसके आस-पास के वातावरण के माध्यम से दिविक जी ने सारी कहानियों का ताना बाना बुना है।
   एक ही पात्र को लेकर कई कहानियां लिखना किसी भी लेखक के लिये एक रचनात्मक प्रयोग तो है पर इसमें एक बड़ा खतरा भी है।खास तौर से तब जब कहानियां छोटे बच्चों के लिये लिखी जा रही हों।खतराघटनाओं,दृश्यों,शब्दों के दुहराव काखतरा रोचकता की कमी आने से पाठकों की ऊब कामुख्य पात्र के अतिरिक्त अन्य पात्रों से पकड़ छूट जाने का।लेकिन बाल मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ और बाल मनोभावों की गहराई तक पैठ बनाने वाले दिविक रमेश जी ने  यह प्रयोग बहुत सफ़लता पूर्वक किया है।
       संकलन की पहली कहानीलू लू की मां।इसमें लू लू के माध्यम से लेखक ने उन बच्चों को रिप्रजेण्ट किया है जो आलसी होते हैं।अपना काम खुद नहीं करना चाहते्।दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं।जैसे कहानी का मुख्य पात्र लू लू अपना हर काम अपनी मां से करवाता है।क्योंकि यह उसे अच्छ लगता है।मां परेशान।पर लू लू के पड़ोसी टी लू की मां ने लू लू की मां को जो मन्त्र दिया उससे लू लू पूरी तरह बदल गया। और अपना हर काम खुद करने लगा।
      दूसरी कहानी—“लू लू ली सनकउन बच्चों के ऊपर आधारित है जो खाने पीने में आनाकानी करते हैं।सिर्फ़ किसी एक चीज को खाने के लिये अपने मां बाप से जिद करते हैं।कहानी में लू लू रोज स्कूल के टिफ़िन में सिर्फ़ चिप्स ले जाता है।कोई और चीज उसे पसंद नहीं।पर टी लू की मां और स्कूल की शिक्षिका ने जो मजेदार योजना उसे सुधारने की बनायी यह कहानी पढ़ कर ही समझा जा सकता है। और अन्ततः लू लू सुधर गया।
   संकलन की तीसरी कहानी लू लू बड़ा हो गयामें लू लू के माध्यम से लेखक ने ऐसे बच्चों के जीवन को दिखाने की कोशिश की है जो सिर्फ़ अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं और किसी से कोई मतलब नहीं रखना चाहते।लू लू अपने जन्म दिवस के उपहारों के लिये इतनी बेसब्री दिखाता है कि अगले जन्मदिन के इन्तजार का एक एक दिन उसके लिये काटना मुश्किल।लेकिन मां द्वारा ढंग से समझाने पर उसे यह समझ में आ गया कि जितनी खुशी उपहार पाने पर है उससे कहीन अधिक खुशी उपहार देने पर होती है।जिस दिन उसने अपने घर की कमवाली के बेटे को उसके जन्मदिवस पर अपना प्यारा पिग्गी बाक्स उपहार में दे दिया उस दिन उसे सच्ची खुशी मिली।
    संकलन की चौथी कहानी लू लू की बातें,पांचवीं लू लू का गुस्सा,और अंतिम रेड लाइट पर”—में भी दिविक लेखक ने एक छोटे बच्चे के मनोभावों को बड़ी सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत किया है।लू लू के मन में उठने वाले तरह तरह के सवालों के मां द्वारा दिए जाने वाले उत्तर उसे संतुष्ट करते हैं।लू लू का मेढक की तरह उचक उचक कर चलना फ़िर सोचना कि मेढक इस तरह उचक उचक कर चलते हुये क्या सोचता होगा?ये बातें बाल मन का कोई बहुत सूक्ष्म पारखी ही लिख सकता है। और यह काम लेखक ने बखूबी किया है।
   संकलन की सभी कहानियों की भाषा इतनी सरल और सहज है कि बच्चा इन कहानियों को बहुत ही आसानी से समझ सकेगा।सबसे बड़ी बात कथानक को शब्दों में इस तरह से बांधा गया है कि बच्चे के मन में बराबर ये उत्सुकता भी बनी रहेगी  कि लू लू अगली कहानी में क्या गुल खिलाने वाला है?वह अपनी मां से क्या बातें पूछेगा?
    एक बात औरयह संकलन जितनाबच्चों के लिये रोचक,मनोरंजक प्रेरणापद और पठनीय है उतना ही यह अभिभावकों के लिये भी महत्वपूर्ण है।क्योंकि हर कहानी में लू लू की मां को जिस ढंग से लू लू को हैण्डिल करते दिखाया गया है वह काबिले तारीफ़ है।लू लू की मां लू लू की हर सनक को,उसके हर प्रश्न को बिना गुस्सा हुये बहुत ही सहजता के साथ हैण्डिल करती है,उसका समाधान निकालती है। जबकि आज की तारीख में ज्यादा संख्या ऐसे अभिभावकों की है जो बच्चों के प्रश्नों पर या तो खीझते हैं या फ़िर उन्हें टाल देते हैं। ऐसे अभिभावकों को लू लू की सनक से निश्चित ही प्रेरणा मिलेगी। और यह इस संकलन की सबसे बड़ी सफ़लता होगी।
     पुस्तक में अतुल वर्धन द्वारा बनाए गये चित्रों ने पात्रों को सजीव तो किया ही है कथानक को औअ सुसज्जित कर दिया है।इस पठनीय और अच्छी पुस्तक के प्रकाशन के लिये दिविक जी के साथ ही नेशनल बुक ट्रस्ट को भी बधाई।
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समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार

डा0दिविक रमेश
डा0 दिविक रमेश हिन्दी साहित्य  के प्रतिष्ठित कथाकार,कवि, एवम बाल साहित्यकार हैं।
आपकी अब तक कविता,आलोचनात्मक निबन्धों,बाल कहानियों,बालगीतों की 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।तथा आप कई राष्ट्रीय एवम अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं।पिछले वर्ष आपको उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा बाल साहित्य भारती सम्मान से नवाजा गया है।फ़िलवक्त आप दिल्ली में रह कर स्वतन्त्र लेखन कर रहे हैं।

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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