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वह सांवली लड़की

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

 

आज मेरे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की दसवीं पुण्य तिथि है । 2016 में आज ही के दिन वो हम सभी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गए थे । अब उनके अप्रकाशित साहित्य को पाठकों के सामने लाना ही मेरा लक्ष्य है ।इसी लिए आज मैं उनकी एक अप्रकाशित कहानी “वह सांवली लड़की” अपने ब्लाग “क्रिएटिव कोना” पर प्रकाशित कर रहा हूं ।


 कहानी 

                                                     


                                                       वह सांवली लड़की                                              

                                                                                                  

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

           

            


रंग पक्का सांवला और नाम हो चांदनी । क्या सोचेंगे आप ? यही न कि नाम और रूप रंग में कोई तालमेल नहीं । जिस दिन चांदनी ने उस कालेज में  बी. ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया उसी दिन से छात्रों के जेहन में यही बात कौंधने लगी । किसी की आंखों में व्यंग होता, किसी की मुस्कराहट में । कोई ऐसे ढंग से हाय हैलो करता कि उसमें भी व्यंग जरूर झलक उठे । चांदनी सब समझती थी । मगर वह इन सब से बेखबर बन केवल एक हल्की सी मुस्कान बिखेरती सीधे अपनी क्लास में चली जाती ।

            

 केवल नाम और रंग ही होता तो कोई बात नहीं थी । वह तो साफ साफ एक कस्बाई लड़की नजर आती थी । किसी छोटे मोटे कस्बे से इण्टर पास कर आई हुई । बड़े शहर के उस कालेज के आधुनिक रूप रंग में ढले हुए छात्र छात्राओं को भला उसकी शालीनता क्या नजर आती । हां दस पांच दिनों में ही पूरी क्लास ने यह जरूर जान लिया कि वह मेधावी भी है । बोर्ड परीक्षा की मेरिट लिस्ट में एक स्थान बनाने वाली लड़की । इस बात की गवाही हर टीचर का चेहरा देने लगता जो उसका प्रोजेक्ट देखते । वे कभी प्रोजेक्ट की फाइल देखते कभी चांदनी का चेहरा ।

            

रंगनाथ क्लास का मुंहफट छात्र था । एक दिन वह  चांदनी से पूछ बैठा – “मैडम, क्या हमें बताएंगी कि आप कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हैं ?”

            


चांदनी कुछ नहीं बोली । बस चुपचाप उसे देख भर लिया । तभी नीलम के मुंह से भी निकला - “हां हां, जरूर बताइए । हम भी तो उसे खा कर अपने दिमाग को तरो ताजा रख सकें ।

            


रंगनाथ और नीलम की ये फब्तियां सुन पूरी क्लास ठठा कर हंस पड़ी । मगर चांदनी के चेहरे का सौम्य भाव इससे जरा भी नहीं प्रभावित हुआ । वह मुस्करा कर केवल इतना बोली - “हां हां, क्यों नहीं बताऊंगी, जरूर बताऊंगी ।” फिर उसका ध्यान अपनी कापी पर चला गया ।

             


चांदनी गर्ल्स हास्टल में रहती थी । वह छुट्टी का दिन था । लड़कियां हास्टल के मैदान में बालीबाल खेल रही थीं । कुछ हरी घास पर बैठी गपशप कर रही थीं । कोई मिलने आए अपने परिजनों से बातचीत में व्यस्त थीं । साथ आए बच्चे हरी घास पर लोट पोट लगा रहे थे । वहीं कारीडोर में एक किनारे कुर्सी पर बैठी हास्टल वार्डन मिसेज भटनागर सारे दृश्य देख रही थीं । उनके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी । इन सारे दृश्यों को देखते हुए भी उनकी आंखें जैसे कहीं और खोई हुई थीं । उनका हमेशा प्रसन्न रहने वाला चेहरा इस वक्त चिन्ता में डूबा हुआ था । कारीडोर में लड़कियां इधर से उधर भाग दौड़ मचाए हुई थीं । मगर शायद किसी का भी ध्यान मिसेज भटनागर पर नहीं गया । अगर गया भी हो तो किसी ने उनके चेहरे की उदासी के बारे में पूछने की जरूरत नहीं समझी ।

            


अचानक मिसेज भटनागर के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा । उन्होंने  सिर उठा कर देखा - वह चांदनी थी । “कहां खोई हुई हैं मैडम ? आपकी तबियत तो ठीक है न ?” चांदनी ने पूछा ।

           


“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । मैं ठीक हूं चांदनी ।” मिसेज भटनागर बोलीं ।

           


“नहीं मैडम । कुछ तो है । छिपाइए मत । आपका चेहरा बता रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं ।

            


मिसेज भटनागर की आंखें नम हो आईं । चांदनी के शब्दों में न जाने कैसा अपनापन था कि उनसे बताए बिना नहीं रहा गया । वे अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को आंचल से पोंछती हुई भरे गले से बोलीं -  “ चांदनी, कुछ देर पहले ही मेरे घर से फोन आया है कि मेरे बेटे की तबियत ठीक नहीं है । वह मुझे बहुत याद कर रहा है । मैं कुछ समय के लिए उसे यहां ले आना चाहती हूं । मगर यहां मैं हर समय तो उसके पास रह नहीं सकती । घर से कोई और आ नहीं सकता । ऐसे में कौन रहेगा उसके पास ?”

            


“बस इतनी सी बात के लिए आप परेशान हैं । वाह मैडम, बस समझ लीजिए कि आपकी प्राब्लम दूर हो गई । उदासी और चिन्ता को दूर भगाइए । घर जाकर बच्चे को ले आएं ।”

          

 


“मगर कैसे ?”

           


“मैं हूं न यहां ।” चांदनी बोली ।

            


मिसेज भटनागर ने उसका हाथ पकड़ लिया । वे चकित होकर उसे देखती भर रहीं । उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । क्या हास्टल की एक सामान्य छात्रा इतना आत्मीय भाव प्रकट कर सकती है । आज ऐसा पहली बार हुआ था । पर चांदनी की आंखों में से झांकती निश्छलता कह रही थी - हां मैडम, यह सच है । मुझे हर किसी के दर्द और चिन्ता की पहचान हो जाती है । मिसेज भटनागर की आंखों में फिर एक बार आंसू छलक आए ।

          

  


“ना ना ना ----- मैडम, आपकी ये आंखें आंसू बहाने के लिए नहीं हैं । जो मैने कहा है उसे कीजिए ।” चांदनी इस बार स्वयं अपने रूमाल से उनके आंसू पोंछती हुई बोली ।

            



धीरे धीरे साल बीत गया । चांदनी बी. ए.द्वितीय वर्ष में पहुंच गई । वह टैलेन्टेड तो थी ही, उसके व्यवहार ने भी अब तक कालेज में उसकी अपनी एक पहचान बना दी थी । मगर रंगनाथ जैसे साहबजादों को अभी भी यह सब चांदनी का एक ढोंग मात्र लगता था । अब भी वे मौका पाने पर उस पर व्यंग कसने से नहीं चूकते थे ।

            


नया सत्र शुरू होते ही हमेशा की तरह इस बार भी अपनी अपनी कक्षाओं में प्रथम आए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित करने की घोषणा हुई । इसमें उन छात्र छात्राओं को अपने अभिभावकों को भी साथ ले आने के लिए कहा जाता था । चांदनी अपनी कक्षा में प्रथम आई थी ।

            


रंगनाथ के लिए चांदनी पर फब्ती कसने का यह अच्छा मौका था । उसने अपने दोस्तों से कहा -“चलो अच्छा है । इस बार हमें भी मैडम के मम्मी पापा के दर्शन हो जायेंगे ।”

            


“ मम्मी पापा --- अरे बेवकूफ राम, मैडम गांव से आई हैं । वहां मम्मी पापा कहां होते हैं ।” एक दोस्त बोला ।

           


“फिर ?” रंगनाथ ने पूछा ।

           


“अपनी अम्मा और बापू को ले कर आएंगी मैडम ।” दोस्त के इस जुमले पर पूरी दोस्त मंडली खिलखिला पड़ी ।

            


“चलो, तब तो यह भी देख लेंगे कि मखमल की चादर पर टाट का पैबन्द कैसा नजर आता है ?” रंगनाथ इस पर भी चुटकी लेने से नहीं चूका ।

           


समारोह का दिन आया । प्रिंसिपल और स्टाफ के साथ शहर के कुछ माननीय भी सामने स्टेज पर बैठे हुए थे । तभी प्रिंसिपल ने सब लोगों के स्वागत की औपचारिकता पूरी करने के बाद एक एक कर सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को बुलाना शुरू किया । चांदनी का नाम लेते ही पूरे कालेज की नजर उधर उठ गई ।

            


चांदनी एक अधेड़ उम्र की औरत का हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हुई धीरे धीरे स्टेज की ओर बढ़ रही थी । वह एक सामान्य हिन्दुस्तानी औरत जैसी थी । वहां उपस्थित दर्जनों सजी संवरी शहरी औरतों से बिलकुल अलग । मगर सलीके से पहनी हुई सफेद साड़ी, खिचड़ी हुए बालों के बीच सिन्दूर विहीन मांग, थकी हुई दृष्टि के बावजूद सजग आंखें, चेहरे पर झलकता उसका आत्मविश्वास । सब मिला कर उसे मामूलीपन में भी एक खासियत प्रदान कर रहे थे । वह चांदनी की मां थी । वहां उपस्थित अभिभावकों में पहली ऐसी मां थी जिसे कोई छा़त्र अपने साथ ही स्टेज पर ले गया ।

           


उसके स्टेज पर पहुंचते ही प्रिंसपल ने खड़े होकर उसका स्वागत किया । फिर एक कुर्सी मंगा कर उसे बैठाया । अब आगे चांदनी को बोलना था । उसने थोड़े से नपे तुले शब्दों में बताया -“ये मेरी मां है । गांव में ही रहती है । पिता जी के जाने के बाद मुझे कभी उनकी कमी नहीं अनुभव होने दी इन्होंने । मां और पिता दोनों की जगह ले ली । मुझे पढ़ाने के इनके इरादों में जरा भी कमी नहीं आई । आज मैं जो आप लोगों के बीच हूं वह इन्हीं की बदौलत ।”

            


“काफी समय पहले मेरे कुछ मित्रों ने पूछा था - मैं कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हूं । मैंने उनसे वादा किया था कि समय आने पर जरूर बताऊंगी । आज वह वादा पूरा करने का समय आ गया है । मैं अपने उन प्रिय मित्रों को बताना चाहूंगी कि वह चक्की है मेरी मां । तमाम मुश्किलों और तकलीफों में पिस कर भी इन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया । इनका प्रोत्साहन पा कर ही मैं आगे बढ़ रही हूं । मेरा आज का मुकाम आपके सामने है । इससे भी बड़े मुकाम को मैं हासिल करना चाहती हूं । उसके लिए मुझे आपकी शुभकामनाएं चाहिए ।”

           


चांदनी के चुप होते ही पूरा हाल तालियों से गड़गड़ा उठा । प्रिंसिपल ने स्वयं उठ कर मां को स्टेज की सीढ़ियों से नीचे उतरने के लिए सहारा दिया । रंगनाथ और उसके दोस्तों को आज पहली बार अनुभव हुआ - उस सांवली लड़की का नाम ही चांदनी नहीं है, उसके भीतर चांदनी सा उजला एक दिल भी है ।

            


बाहर निकलते ही चांदनी को बधाई देने वाला पहला व्यक्ति था रंगनाथ, दोनों हाथ जोड़े और आंखों में क्षमा याचना लिए हुए । चांदनी ने गद्गद् होकर उसके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया ।



०००



प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव



परिचय: 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में पैदा हुए प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव मुख्यतः ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं.चाहे उनका बाल साहित्य हो या फिर बड़ों के लिए लिखी गई कहानियां या नाटक--- उनकी अधिकांश रचनाओं में हमें गांव की मिट्टी का सोंधापन जरूर मिलेगा.

शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों, नाटकों, लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों,नाटकों, की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)“अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का तारा”आदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।सन 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशित बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” काफी चर्चित।

नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से  प्रकाशितही  बाल नाटक संग्रह”एक तमाशा ऐसा भी”। 

   इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।  31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।

 

 

 

 

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एक हिन्दी कथाकार का बालसाहित्यकृती होना

गुरुवार, 10 मार्च 2022

 आज मेरे पिताजी हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्व०श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का 93वां जन्म दिवस है।आज वो हमारे बीच न होकर भी अपने साहित्य के माध्यम से हम सभी के बीच उपस्थित हैं।उनका लेखन हिन्दी कहानियों और हिन्दी बाल साहित्य के लिए बहुत बड़ा योगदान है।उनका आशीर्वाद हम सभी का मार्गदर्शन करता रहेगा।उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है हिंदी बाल साहित्य के प्रतिष्ठित आलोचक श्री बंधु कुशावर्ती द्वारा लिखा गया यह मूल्यांकनपरक,समीक्षात्मक लेख।


 

             एक हिन्दी कथाकार का बालसाहित्यकृती होना

                                                  लेखक-बंधु कुशावर्ती 



  

     

  प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्वातंत्र्योत्तर कालीन हिन्दी बाल साहित्यकार हैं।बाल साहित्य लेखन से पहले वह हिन्दी कथाकार के रूप में 1950 से निरंतर हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं(कल्पना, ज्ञानोदय,विशाल भारत,नई कहानी,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग आदि)में प्रकाशित होते हुए स्वयं को प्रतिष्ठित कर चुके थे।सन1965-66 से वह बाल साहित्य लेखन में संलग्न हुए तो इस दिशा में भी क्रमशः लिखते हुए न केवल हिन्दी बालसाहित्य को समृद्ध किया बल्कि समकालीन बाल साहित्यकारों में एक रचनाशील व्यक्तित्व के रूप में भी पहचाने गए।

             

                 


      उत्तर प्रदेश का शिक्षा प्रसार विभाग भी आजादी के बाद पहली बार संपूर्णानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में नई सोच समझ के साथ नवोन्मेषित हुआ था।तब वह इस विभाग में एक प्रचार अधिकारी के रूप में आये।अब के प्रचार अधिकारीयों के बजाय तब के प्रचार अधिकारी  सर्जनात्मक प्रतिभा से भी संपन्न हुआ करते थे।द्वितीय पंचवर्षीय योजना में देश के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी शिक्षा के तंत्र समेत विद्यालयों को शिक्षनेतर सक्रियताओं के द्वारा अग्रगामी बनाए जाने संबंधी अनेकानेक योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा था।शिक्षा विभाग ने इलाहाबाद से जहां कुछ कल्पनाशील व अन्यान्य बालोपयोगी साहित्य का प्रकाशन शुरू किया,वहीं सीधे विद्यालयों तक पहुंचाने के उद्देश्य से “बेसिक बाल शिक्षा” नामक स्तरीय बाल पत्रिका के विभागेतर स्तर पर मुद्रण एवं सम्पादन प्रकाशन को प्रोत्साहन दिया।इसी दौर में शिक्षा प्रसार विभाग में स्थापित अत्यंत समृद्ध फिल्म यूनिट देश में पहली थी जिसमें अपने स्टूडियो,कैमरा,लैब,तकनीशियन,फिल्म अधिकारी समेत फिल्म निर्माण की सम्पूर्ण व्यवस्था भी थी।

    

             


       यही कालखंड है जब प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव हिन्दी बाल साहित्य के लेखन और विभागीय फिल्म निर्माण से भी सक्रिय रूप से जुड़े।उन्होंने अपने पद के दायित्व निर्वाह के साथ ही विभाग द्वारा बनायी जाने वाली शैक्षिक फिल्मों के अलावा निराला जी आदि कई हस्तियों पर बनाई जा रही फिल्मों के आलेख आदि भी लिखे।तो यथा आवश्यकता बच्चों के लिए कहानियां,नाटक एवं प्रेरक प्रेरणादायक सामग्री भी प्रायः लिखने लगे।

  


      ऎसी प्रारम्भिक सामग्री की उनकी पुस्तकों में सन 1971 में प्रकाशित एक उल्लेखनीय कृति है—“जिस देश में हमने जन्म लिया”।इससे पहले “मंदिर का कलश”, “हम सेवक आपके”, “यह धरती है बलिदान की”, “अरुण यह मधुमय देश हमारा” आदि उनकी बच्चों के लिए लिखी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।इस पुस्तक में प्रकाशक का वक्तव्य है –“प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव-गत बीस वर्षों से प्रेरक और जीवंत साहित्य का सृजन कर रहे हैं।उनकी सैकड़ों कहानियां उच्च कोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुयी हैं।

     


      इससे स्पष्ट है कि प्रेमस्वरूप जी आजादी के बाद से ही मुख्य धारा के लेखन में प्रवृत्त लेखकों की कतार में शामिल हो गए थे।परन्तु यहाँ मैं उन्हें उनके बाल साहित्य लेखन तक न रखते हुए कहूँगा कि बच्चों के लिए उनका लिखना महज औपचारिक नहीं था।अपने लेखन से वह बच्चों को महत्वपूर्ण लेखन देते हुए उनके मानस और चरित्र निर्माण का उद्द्येश्य भी पूरा करते थे।मसलन “जिस देश में हमने जन्म लिया” के “स्वर्ग से महान” लेख को पढ़ते हुए बच्चे को सहज ही अपने देश भारत की बहुत सी विशेषताएं जानने को मिल जाती हैं।तो “संतों का प्रकाश” उसे देश के अनेक संतों-महात्माओं,जगद्गुरु शंकराचार्य,गौतम बुद्ध,कबीर,नानक,चैतन्य महाप्रभु,स्वामी रामतीर्थ,महात्मा गांधी आदि से परिचित करा देता है।इन्द्रधनुष के जैसा रोचक परिचय इस पुस्तक से मिलता है,वह अन्यत्र दुर्लभ ही होगा।एक वाक्य में कहें तो यह पुस्तक अपनी सामग्री से अपने विविधवर्णी भारत देश का अनेकविध  परिचय करा देती है।

      


           सच बात यह है कि प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का बाल साहित्य प्रारम्भ से ही बच्चों को अपने देश,उसकी महत्ता,उसकी विभूतियों,उसकी बहुरंगी छवियों और सुषमा से इस तरह परिचित कराते हैं कि वे देश प्रेम के रंग में स्वतः ही रंग जाएं।दूसरी ओर हाथी,घोड़ा,ऊंट और लामा जैसे मित्र पशुओं की रोचक जानकारी वह अपनी पुस्तक“हमारे ये सच्चे मित्र”(1986) पुस्तक से देते हैं।तो “हम सेवक आपके”(1986) कृति के द्वारा रेनडियर,याक,भेड और कुत्ता जैसे जानवरों का परिचय देते हुए बताते हैं कि एक से लगते हुए भी ये जीव दुनिया के अलग-अलग देशों में किस रूप में जाने जाते हैं।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(1981) में“जिस देश में हमने जन्म लिया” पुस्तक से मिलती जुलती सामग्री होने के बावजूद बच्चों को अपने देश भारत की व्यापक छवि का परिचय मिलता है।

     


        प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के पूर्वोक्त बालसाहित्य से गुजरते हुए उनकी  प्रवाहमयी भाषा और रोचक लेखन शैली गवाही देती चलती है कि उनमें बच्चों के कथाकार,उपन्यासकार और नाटककार की समर्थ रचनात्मकता भी साँसें लेती रही हैं।आकाशवाणी के इलाहाबाद केंद्र के लिए प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रारम्भ से ही बच्चों के लिए नाटक लिखते रहे हैं।आकाशवाणी यानि रेडियो के लिए नाटक लिखना वो भी बच्चों के नाटक,सामान्य या मंच-नाटक से भिन्न कोटि का लेखन होता है।संवादों का स्वरूप ही नहीं शब्द चयन भी मंच की शब्दावली से अलग होता है।परन्तु रेडियो के नाटक चूंकि ज्यों का त्यों छापे जाने का चलन नहीं है,अतः प्रेमस्वरूप जी रेडियो के नाटकों को बच्चों के लिए बहुधा मंचीय नाटकों में रूपांतरित करते रहे हैं।

 


                “मेरा देश जागे”(1971)उनके ऐसे 4 मंचीय बाल नाटकों का संकलन है।जो आपसी द्वेष-वैमनस्य के बजाय प्रेम और सौहार्द्र की चेतना जगाते हैं।“मानस के चार फूल”(1974)रामकथा के विभिन्न रोचक और प्रेरक प्रसंगों पर केन्द्रित नाटकों का संकलन है।यह भरत और जटायु जैसे चरित्रों पर केन्द्रित होने के साथ ही “यज्ञ की रक्षा” तथा “सीता की खोज” शीर्षक से तुलसीकृत मानस के प्रसंगों को बाल नाटक के रूप में प्रस्तुत करती महत्वपूर्ण कृति है।“मदारी का खेल” भी 4 बाल नाटकों का संकलन है जो नवोदितों यानी नई पीढी को देश की शक्ति के अक्षय स्रोत मान कर लिखे गए हैं।“वीर बालक भीमा”(1992 संस्करण) राजस्थान के शूरवीर महाराणा प्रताप के युद्ध काल में एक ऐसे भील बालक के चरित्र को प्रस्तुत करता है जिसमें राणा प्रताप की तरह मातृ भूमि के प्रति त्याग और समर्पण का जज्बा है।यह प्रेमस्वरूप जी की बहु चर्चित,बहु मंचित और बहु प्रशंसित बाल नाट्य कृति है।

     


     उपर्युक्त क्रम में मैं कृती बाल साहित्यकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव की दो और बाल नाट्य कृतियों की चर्चा यहाँ विशेष रूप से करूंगा।एक—“आँखों का तारा”(1990) एवं दो-“एक तमाशा ऐसा भी”(2018)।

         


        “आँखों का तारा” इस कृति शीर्षक के अलावा दूसरा बाल नाटक “वन की पुकार” है।जिसमें वनप्रांतर और जंगलों यानि पेड़ों के अंधाधुंध कटाई के दुष्परिणाम को बहुत ही मार्मिकता से उजागर किया गया है।इस नाटक का मूल कथ्य इतना भर है कि पेड़ों के कटने से जंगल के जीव जंतुओं के प्रति असहिष्णुता किस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित करती है। एक दिन ऐसा भी आ जाता है की स्वयम मानव जीवन के लिए हमारा वातावरण और पर्यावरण कैसा मरणान्तक बन जाता है।विभिन्न वृक्ष,वन्य-जीव,वनदेवता और वनदेवी के साथ मनुष्य इसके चरित्र और पात्र हैं।शीर्षक नाट्य कृति “आँखों का तारा” का कथ्य भी नया यानि देश में“सर्वश्रेष्ठ नगर” का चयन है।इसमें देश के वाराणसी,लखनऊ,इलाहाबाद,बंबई, दिल्ली,कलकत्ता,शिमला,बैंगलोर,पंजिम,चितारंचन,उदयपुर आदि अपनी अचल नगरीय वेशभूषा में मंच पर आकर अपनी विशेषताएं बताते हैं।और अंत में सौहार्द्र पूर्वक राजस्थान के शहर उदयपुर को देश के सभी नगरों में आँख का तारा चुना जाता है।इसलिए कि वह वीरता और प्राणोंत्सर्ग की भूमि है।इसके माध्यम से पूरे देश को सदैव देश-रक्षा में प्रस्तुत होने का सन्देश जाएगा और देश सुरक्षित रहेगा तो यहाँ की प्राकृतिक सुषमा,संपदा,धन-धान्य,कल-कारखाने,उद्योग-धंधे यानि सब कुछ बचा रहेगा और देश समृद्ध होगा।



          “एक तमाशा ऐसा भी”(2018)प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का नवीनतम प्रकाशित बाल नाट्य संकलन है।इसमें पूर्व प्रकाशित बाल नाटकों “वीर बालक भीमा”, “वन की पुकार”, “आँखों का तारा” के अलावा “शेर बच्चे”, “मौत के चंगुल में”, “कृति शीर्षक बाल नाटक “एक तमाशा ऐसा भी” संकलित हैं।“शेर बच्चे “देशभक्ति के प्रति गहरे समर्पण से जुड़ा है।जिसमें गुलाब और असगर दो सहपाठी बच्चे आगे पढाई के लिए शहर जाने के बजाय देश की सीमा पर बसे गाँवों में आगजनी और जन-धन की हानि पहुंचाने वाले दुश्मनों का सुराग लाने का निश्चय प्रतिफलित कर दिखाते हैं।“मौत के चंगुल में”,शमशेर और बालचंद नामक दो दिलेर बच्चे छुट्टन और कतलू खां जैसे खूंखार डाकुओं को अपनी बुद्धि से रस्सियों में बाँध कर पुलिस के हवाले करने का साहसिक कारनामा जिस तरह कर दिखाते हैं,उसमें हास्य नाटक का भी रोचक पुट है।“एक तमाशा ऐसा भी” सामाजिक समरसता का बाल नाटक है।मौलवी और पंडित जैसे वयस्क पात्रों को एकता का सन्देश देने में बेटे करीम व रामू के साथ उनके साथी बच्चों की सूझ बूझ उभर कर आती है।संक्षेप में कहूँ तो प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के बाल नाटक बच्चों को सचमुच देश का सजग,सुयोग्य नागरिक और जिम्मेदार सामाजिक सदस्य बनने का सन्देश देते हैं।विषयानुरूप एवं पात्रानुकूल भाषा श्री प्रेमस्वरूप जी के बाल नाटकों की विशेषता है।

    


श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी एक सफल बाल नाटककार के साथ ही एक कुशल बाल कहानीकार, किस्सागो और उपन्यासकार भी थे।मैं यहाँ उनकी बाल कहानियों की चर्चा न करके उनके 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित उपन्यास “मौत के चंगुल में” की चर्चा विशेष रूप से करना चाहूँगा क्योंकि इसका कथ्य और पात्र दोनों ही आम बाल उपन्यासों से अलग हटकर हैं।     

   


           साहसिक समुद्री यात्रा का श्रेष्ठ बाल उपन्यास :मौत के चंगुल में ---प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव बच्चों के कथाकार और उपन्यासकार के रूप में भी सिद्धहस्त और सफल हैं।“मौत के चंगुल में” उनका बहुचर्चित और सफल बाल उपन्यास है।इसे किसी भी विदेशी श्रेष्ठ उपन्यास के समकक्ष रखा जा सकता है।यह पानी के जहाज से ऐसे बच्चों की समुद्री यात्रा का रोमान्चक वृत्तांत है जिनमें किसी न किसी तरह की शारीरिक अपंगता अक्षमता है।इन्हें वाटसन नामक व्यक्ति(शिक्षक)अपने स्कूल में अपने खर्चे पर रखता है।उनका पालन पोषण करते हुए महसूस कराता है कि वे शारीरिक अक्षमता के बावजूद दयनीय नहीं हैं।अपने चार दोस्तों के साथ यह स्कूल चलाने के लिए वाटसन समर्थ और धनिक लोगों की सहायता भी जुटा लिया करता था।इस सब में उसे असीम खुशी महसूस होती है।हालांकि उसके जीवट और कुशलता का लोहा मानते हुए भी लोग उसे सनकी कहा करते थे।ऐसे ही जब वाटसन ने तय कर लिया किया कि उसको स्कूल के अंधे,बहरे,गूंगे लंगड़े-लूले व बदसूरत बच्चों जैसे कुछ और भी बच्चे अगर मिल जाएँ  और कुछ मदद करने वाले भी उसका साथ दें तो वह समुद्री जहाज से ऐसे बच्चों को पूरी दुनिया की सैर करवा देगा।संयोग कुछ ऐसा बना कि वाटसन को इस काम में सहायता देने वाले तो मिले ही,दुनिया भर से लगभग 650 बच्चे जुट गए।यह समुद्री जहाज “एटलस” जब भारत पहुंचा तो इसमें 50 भारतीय बच्चे और शामिल हो जाते।

   


                भरपूर तैयारियों के बाद 25 दिसंबर को जहाज के कप्तान और इतने सारे बच्चों की देखभाल के माकूल इंतजाम समेत “एटलस” नमक समुद्री जहाज न्यूयार्क बंदरगाह से अपनी विश्व-यात्रा परा निकल पडा।दुनिया के मशहूर बंदरगाहों –जार्जटाउन,सौथैम्प्तन,जिब्राल्टर,पोर्ट सईद,मुम्बई,सिडनी,शंघाई,याकोहामा,होते हुए सैन्फ्रंसिसको,लौट कर यह यात्रा पूरी होनी थी।यह समुद्री जहाज भारत के मुम्बई बंदरगाह पर पहुंचा जहां सारे बच्चों का खूब स्वागत सत्कार हुआ और भारतीय बच्चों का दल भी इसमें शामिल हो गया।पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार सारे बच्चों की भारत दर्शन यात्रा भी हुयी।जयपुर में सहसा एक संन्यासी इन सबसे मिला और इन्हें आगाह भी किया की आगे की यात्रा के दौरान रास्ते में इनके ऊपर भयानक संकट भी आ सकता है।पर हिम्मत बनाए रखने और भगवान पर भरोसा करने से वो संकट दूर भी हो सकेगा।सचमुच ऎसी ही कुछ घटनाएँ घटी भी लेकिन किसी जान-माल का नुक्सान नहीं हुआ।परन्तु जापान के याकोहामा बंदरगाह से जब एटलस आगे की यात्रा परा था कि समुद्री तूफ़ान की चपेट में आ गया।और उसका सन्देश संवाहक यंत्र खराब हो जाने से जहाज का पूरी दुनिया से संपर्क भी ख़तम हो गया।जब तक सूचना थी उसी के आधार पर “एटलस”की खोज और रक्षा के लिए विभिन्न देशों के जहाज बचाव के लिए निकल पड़े।अंततः “एटलस” की इस रोमांचक समुद्री यात्रा का सुखद अंत हुआ और उसे तथा सारे बच्चों के साथ ही जहाज पर सवार शिक्षकों,नर्सों,सेवकों सभी को बचा लिया गया।

   


      प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के इस बाल उपन्यास की प्रवाहमयी भाषा,रोचक शैली और सबसे बढ़कर यह रोमांच कि अब आगे क्या होगा--–ये कुछ ऐसे गुण हैं जो बच्चों को क्या बड़ों को भी इस बात के लिए मजबूर कर देंगे कि वो उपन्यास पूरा पढ़ कर ही छोड़ें।

     


     यदि हम समग्र रूप से श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य पर विहंगावलोकन करें तो पायेंगे कि उनके नाटक,कहानियां,बाल उपन्यास सभी कुछ बच्चों का मनोरंजन करने के साथ ही उनमें नैतिकता,देश-प्रेम,सौहार्द्र,सामाजिकता जैसे गुणों का विकास भी करेंगे।उनका साहित्य इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वो 1950 में लिखना शुरू करके आज की परिस्थितियों,बदलावों से भी रूबरू होते रहे और अपनी रचनाओं को आज के बच्चों की डिमांड के अनुरूप सर्जित किया।यह उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है।

                          

                                       

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लेखक-बंधु कुशावर्ती



परिचय:० अवध-क्षेत्रीय शहर सुल्तानपुर(उ०प्र०) के सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले मध्यवर्गीय परिवार में 5 अक्टूबर1949 को जन्म।14-15वर्ष की छात्रावस्था से ही लेखन की शुरुआत।मूर्धन्य लेखकों का निरंतर सान्निध्य लाभ।विविध विधाओं में मुख्य-धारा के लेखन-प्रकाशन का पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत सिलासिला।समानांतर ही बाल साहित्य,बाल रंगमंच के बहुविध लेखन व क्रियाकलापों में संलग्न।सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रकारिता से भी सघन-जुड़ाव।बाल-साहित्य विषयक गहन मूल्यांकन व विवेचानापरक साहित्य इतिहास लेखन।समीक्षा-आलोचना केन्द्रित 3 खण्डों की लेखानाधीन शोधकृति।बाल्साहित्यालोचन:अभिनव हस्तक्षेप” प्रकाशित।

०2014में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा बाल साहित्य पत्रकारिता के लिए “लल्ली प्रसाद पाण्डेय बाल साहित्य पत्रकारिता” सम्मान से समादृत।  

संपर्क:456/247,दौलतगंज,(साजन मैरिज हाल के सामने),डाकघर:चौक,लखनऊ-226003,मोबाइल-08840655314           

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