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यादें झीनी झीनी रे(आत्मीय संस्मरण)

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

(आज 31 जुलाई को मेरे पिता जी प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की पुण्य तिथि है।2016 की 31 जुलाई को ही 87 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था।इस बार कोरोना संकट को देखते हुए मैं उनकी स्मृति में कोई साहित्यिक आयोजन भी नहीं कर पा रहा।मेरे बड़े भाई तुल्य प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय कौशल पाण्डेय जी का यह बेहद आत्मीय संस्मरण ”बालवाटिका” के श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव पर केन्द्रित मार्च-2019 अंक में प्रकाशित हुआ था।आज इसे अपने ब्लॉग क्रिएटिवकोना पर मैं पुनः प्रकाशित कर रहा हूं।डा०हेमन्त कुमार)  

 



          यादें झीनी झीनी रे----



       

दिसंबर १९८५ के अंतिम सप्ताह की एक सर्द भारी शाममैं इलाहाबाद के अल्लापुर मोहल्ले की भूल-भुलैया जैसी गलियों में अपने एक मित्र के साथ एक पर्ची पर लिखे पते को तलाश रहा था।उस पर लिखा था श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव,90-ए/17एस,बाघम्बरी गद्दी के पीछे,(अल्लापुर)इलाहाबाद।और यह पर्ची देने वाले थे आकाशवाणी इलाहाबाद में मेरे सहयोगी राम पाण्डेय।दरअसल मुझे आकाशवाणी इलाहबाद में ज्वाइन किये करीब एक वर्ष हो चुका था,पर जिस घर में मैं किराए पर रह रहा था वह काफी बंद-बंद सा था।मुझे एक ऐसे घर की तलाश थी जहां हवा और धूप का खुलकर सेवन कर सकूं।यह बात जब मैंने अपने सहयोगी राम पाण्डेय को बताई तो राम पाण्डेय ने मुझसे एक दिन कहा कि, “मैं एक घर का पता दे रहा आप जा कर देख लीजिये।”बस मैं मकान की खोज में निकल पड़ा था।बेतरतीब नंबरों वाले मोहल्ले में भी नाम बताने पर घर आसानी से मिल गया।दरवाजा खटखटाया तो अन्दर से एक दुबले पतले और थोड़ा लम्बे व्यक्ति ने जब दरवाजा खोला तो मैंने अपनी बात बताई।वह श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव से मेरी पहली मुलाक़ात थी।उन्होंने घर का वह ऊपरी हिस्सा दिखाया जो उन्हें किराए पर देना था।चाय पिलाई और अपने परिवार के बारे में बताया तथा मेरे परिवार के बारे में जानकारी ली।साथ ही एक दिन सोचने का मौक़ा भी माँगा। संभवतः वह राम पाण्डेय से मेरे बारे में और विस्तार से जानना चाहते होंगे।अगले ही दिन वह सुबह-सुबह राम पाण्डेय से घर पर मिलते हुए बाद में मेरे पास दफ्तर आये और बोले कि, “आप जिस दिन चाहें सामान लेकर रहने आ जाएं।”

   अगले दिन मैं पत्नी और बच्चों को घर दिखाने ले गया।पत्नी की ओर से थोड़ी ना-नुकुर हुई कि घर मुख्य सड़क से काफी अन्दर है।अंततःघर का खुलापन और घर के लोगों का सरल स्वभाव इस एक पर भारी पड़ा और हम लोग एक सप्ताह बाद ही वहां शिफ्ट हो गए।5,जनवरी 1986 को मेरा इलाहाबाद का स्थानीय पता हो गया---श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का मकान,बाघम्बरी गद्दी के पीछे...जो कि मेरे इलाहाबाद छोड़ने तक बराबर बना रहा।यहाँ तक कि अगस्त-1990 में इलाहाबाद से मुंबई स्थानान्तरण के करीब दो वर्ष बाद तक भी।इस दौरान मैं मुंबई रहा और मेरा परिवार अकेले इलाहाबाद में।उन दिनों वो ऊ०प्र० सरकार के राज्य शिक्षा संस्थान में शोध प्राध्यापक थे और आकाशवाणी के नियमित नाटककार।बाद में पता चला कि उनके लेखन की शुरुआत पचास के दशक में ‘धर्मयुग’और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में कहानियां लिखने से हुयी थी।और फिर धीरे-धीरे यह भी पता चला कि वो जितने बड़े रेडियो नाटककार हैं उससे भी कहीं ज्यादा योगदान उनका बाल साहित्य लेखन में है।वो बहुत संकोची स्वभाव के थे।इसीलिए प्रायः अपने लेखन के बारे में चर्चा कम ही करते थे।लगभग तीन सौ रेडियो नाटक और पचास के करीब बाल साहित्य की पुस्तकें लिखने के बावजूद—मैंने कभी यह नहीं सुना या देखा कि उन्होंने कभी किसी से अपनी किताबों पर समीक्षा या चर्चा करने को कहा हो।रडियो की नौकरी के नाते मैं उन्हें केवल रेडियो नाटककार के रूप में ही जानता था।उनके तमाम नाटक आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण का हिस्सा रहे।सुप्रसिद्ध नाटककार और आकाशवाणी के तत्कालीन महानिदेशक स्व० जगदीश चन्द्र माथुर का वह पत्र भी मैंने उनकी पुरानी फ़ाइल में देखा जिसके द्वारा उन्होंने इनसे रेडियो के लिए लिखते रहने का अनुरोध किया था।

   उन्होंने शिक्षा विभाग में हिन्दी प्रवक्ता के रूप में नौकरी की शुरुआत की थी।बाद में 1964 में शिक्षा प्रसार विभाग में पहले प्रचार अधिकारी फिर पटकथा लेखक हुए।और करीब दो-ढाई सौ वृत्त चित्रों के लिए पटकथाएं लिखीं।सेवानिवृत्त होने के कुछ समय पहले वह प्राथमिक कक्षाओं की हिन्दी पाठ्य पुस्तकों के निर्माण कार्य से भी जुड़े थे।बाद में भी कई वर्षों तक वह इस कार्य से जुड़े रहे।

       उनकी देखा-देखी मैंने भी उन्हीं दिनों बच्चों के लिए लिखना शुरू किया।खूब बाल कवितायेँ लिखीं।मेरी कवितायेँ पराग,बाल भारती,बालहंस,दैनिक जागरण में खूब छपीं।उन्होंने मेरी हर कविता पढी,सराहा,पर कमी निकालने के भाव से या कभी संशोधन करने के लिए नहीं कहा।सच पूछा जाय तो मैं आज तक उन रिश्तों को कोई नाम नहीं दे पाया जो उनके घर में रहते हुए मेरे और उनके बीच तथा उनके घर के अन्य सदस्यों के बीच पनपे।अम्मा जी के सरल स्वभाव ने कभी भी हम दोनों को माँ,और बच्चों को दादी की कमी खलने नहीं दिया।अनायास ही मैं उस परिवार का सबसे बड़ा भाई बन गया।डा०मुकुल,डा०हेमन्त,डा०कविता और सबसे छोटी अलका सभी मेरे बच्चों के प्रिय चाचा और बुआ।और हम दोनों सबके भैया-भाभी।इन सभी की शादियों में सारे रीति-रिवाजों के साथ परिवार की तरह सहभागिता रही हम सभी की।

      घर में सब की ही तरह श्रीवास्तव जी को मैं भी भाई कहता था पर राय- मशविरे के समय वे मुझे सबसे करीबी मित्र की तरह काम आते थे। और किसी समस्या के समय पिता की ही तरह मैं उनका हाथ अपने कंधे पर रखा हुआ पाता था।अगस्त 1990 में उनके घर में रहते हुए मेरा स्थानान्तरण इलाहाबाद से मुंबई हो गया।मैं जाना नहीं चाहता था,पर काफी प्रयासों के बाद न तो मेरा स्थानान्तरण निरस्त हुआ और न ही स्थान बदला गया।मैं अकेले ही दुखी मन से मुम्बई गया।बच्चे बहुत छोटे थे।मुम्बई में परिवार रखने लायक आवास की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी।इसके करीब डेढ़-पौने दो बरस तक मेरा परिवार उन्हीं के घर में इलाहाबद में ही रहा।परिवार की देख-भाल के लिए मैं हर डेढ़-दो महीने पर इलाहाबाद आता था।कभी ऐसा नहीं हुआ कि वे मुझे स्कूटर से स्टेशन छोड़ने न गए हों।हर बार कंधे पर रखा उनके आश्वासन का हाथ मुझे मुम्बई में बराबर यह तसल्ली देता था कि इलाहाबाद में मेरे परिवार को कोई भी दिक्कत उनके रहते नहीं आयेगी।यह धर्म उनहोंने मेरी गैर मौजूदगी में हमेशा निभाया।अंततः जून 1992 में मैंने वह घर खाली कर दिया।

   बाद में 1996 से 2000 तक पुनः इलाहाबाद रहा पर अकेले ही।उनका बराबर आग्रह रहा कि मैं उनके घर कभी भी रहने आ सकता हूं।पर ऐसा हो नहीं पाया।हाँ ये जरूर है कि उनसे मेरा बराबर मिलना होता रहा।वो कभी आकाशवाणी में या कभी हमारे आफिस के आस-पास आते तो बिना मुझसे मिले न जाते।और मौक़ा मिलने पर मैं  भी भाई के घर पहुँच जाता।पर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि भोजन किये बिना उन्होंने मुझे वापस आने दिया हो।

   इलाहाबाद से दिल्ली और फिर पुणे रहते हुए मिलना तो कम रहा पर फोन पर खूब बातें होती थीं।अक्टूबर 2012 में अपने बड़े बेटे डा०मुकुल के रोड एक्सीडेंट में असामयिक निधन के बाद वो बिल्कुल टूट से गए थे।अम्मा जी का स्वास्थ्य भी काफी नाजुक स्थिति में आ गया।लगभग तीन साल तक बिस्तर पर रहने के बाद नवम्बर 2013 में अम्मा जी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।भाई की मनःस्थिति भी अच्छी नहीं रही।पर इतने झंझावातों के बाद भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा।उस दौरान भी लेखकीय सक्रियता उन्हें बहुत बल दे रही थी।

   मैं भी मई 2013 में पुणे से गोरखपुर आ गया था।पर उन दिनों  मैं भी कुछ पारिवारिक समस्याओं से बुरी तरह घिरा था।अक्सर गोरखपुर से कानपुर आना-जाना होता ही था।कार से आने-जाने के कारण लखनऊ रुकना आसान होने लगा।दिसंबर 2012 से वो भी स्थाई रूप से छोटे बेटे डा० हेमन्त के पास लखनऊ में ही रहने लगे थे।अक्सर मैं लखनऊ में उनसे मिलते हुए ही गोरखपुर जाता ।उन्हीं दिनों 2012 में उनका बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” नेशनल बुक ट्रस्ट से छप कर आया था।मुझे उसकी प्रति भेट करके उन्होंने उपन्यास पढने का आग्रह किया।मुझे अच्छा लगा कि मैंने उसकी समीक्षा लिखी और वह एक अच्छी पत्रिका में छपी।बीमारी की हालत में भी मेरी समीक्षा पढ़कर वो फोन करके धन्यवाद देना न भूले।

    इस बीच मैं मार्च 2015 में ट्रांसफर होकर तीसरी बार फिर इलाहाबाद आ गया था।मेरी सिर्फ डेढ़ वर्ष की नौकरी बची थी।उधर वर्ष 2016 की शुरुआत से ही उनका स्वास्थ्य काफी गड़बड़ रहने लगा था।घुटनों की तकलीफ काफी बढ़ गयी थी।अब बिना वाकर की सहायता के उनका चलना-फिरना बहुत मुश्किल हो गया था।इस दशा में भी वो बच्चों की कहानियां लिखते रहे,और कुछ प्रकाशित भी हो रही थीं।दिसंबर 2012 में लखनऊ आने के बाद उनकी कुछ बाल कहानियाँ नंदन,बालवाणी,सुमन सौरभ,बाल भारती में छपीं भी।तीन चार बड़ों की कहानियां कथा-क्रम,जनसत्ता(दीपावली विशेषांक),चौथी  दृष्टि जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुयी थीं।उनकी लेखन ऊर्जा और सक्रियता देख कर बहुत खुशी होती थी।

    अचानक एक दिन मेरे पास उनका फोन आया।शायद 25जुलाई 2016 का दिन था वो।उस दिन मैं कानपुर में था।बहुत ही भावुक होकर निराशा भारी बातें करने लगे।मुझसे मिलने की इच्छा भी व्यक्त की।अगले दिन ही मैं सुबह-सुबह लखनऊ उनसे मिलने पहुँच गया।उस दिन उन्होंने मुझसे जी भर कर बातें की।खूब खुश हुए।सबका हाल पूछा।मेरा हाथ पकड़कर काफी देर बैठे थे।खुद भोजन नहीं किया पर मुझे भोजन करते देखते रहे,खुश होते रहे।फिर मिलने का वादा करके मैं भारी मन से कानपुर लौट आया।क्या पता था कि ये हम लोगों की आखिरी मुलाक़ात थी।

    31 जुलाई की रात्रि में डा०हेमन्त का फोन आया कि भाई नहीं रहे।अगले दिन वो उनका पार्थिव देह लेकर इलाहाबाद पहुंचेंगे।बहुत कष्टकारक बात ये हुयी कि डा०हेमन्त ने अपने जन्मदिवस यानि 1 अगस्त को ही अपने पिताश्री को मुखाग्नि दी।शायद ईश्वर को यही मंजूर था।अगस्त 2016की अंतिम तारीख को मेरी सेवानिवृत्ति भी हो गयी।

   कितनी विचित्र बात हुयी कि इलाहाबाद शहर से मेरा रिश्ता उन्हीं के साथ जुडा  और उनके जाने के साथ ही ख़त्म भी हो गया।

                    ०००००

० कौशल पाण्डेय


परिचय:जन्म 3 अगस्त 1956 अन्किन कानपुर।1977 से बच्चों एवं बड़ों के लिए भारत की स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में लेखन।प्रकाशित पुस्तकें: “जंगल की और”, “सोन मछरिया गहरा पानी”(बाल कवितायें), “पासा पलट गया”(बाल नाटक मराठी में भी अनूदित), “बाल साहित्यकार-कौशल पाण्डेय:सृजन और संवाद”, “शेष कुशल है”, “इतना छोटा सफ़र”(कहानी संग्रह), “प्रयोजनमूलक हिन्दी:विविध सन्दर्भ(संपादित लेख संग्रह)।देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से समादृत।सदस्य-,हिन्दी पाठ्यक्रम समिति (महाराष्ट्र सरकार)।34 वर्षों ताका आकाशवाणी में सहायक निदेशक राज  भाषा पद पर कार्य कर के सेवानिवृत्त।सम्प्रति स्वतन्त्र लेखन।      

संपर्क:1310-ए,बसंत विहार,कानपुर-208021 मोबाइल नंबर-9532455570          

                                          

               


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कहानी -- मुंशी जी

मंगलवार, 30 जुलाई 2019


(कल 31जुलाई को मेरे स्व०पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की तीसरी पुण्य तिथि है।इस अवसर पर पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी एक कहानी “मुंशी जी”।यह कहानी पिता जी ने संभवतः सन 2014 में लिखी थी।यह कहानी पिता जी के पैतृक गाँव खरौना के किसी मुंशी जी की कहानी है या उनके किसी दूसरे शिक्षक की कहानी—यह बात तय कर पाना थोडा मुश्किल है।लेकिन इतना जरुर है की आज जो भी युवा अध्यापन से जुड़ रहे हैं चाहे वो प्राथमिक स्तर पर या उच्च शिक्षा में---उनके लिए ये कहानी निश्चित ही एक प्रेरणा देने वाली कहानी है।युवा शिक्षकों को मुंशी जी के चरित्र से प्रेरणा लेनी चाहिए।–-डा0हेमन्त कुमार)

कहानी
मुंशी जी


                                                                                                                                         प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

              गाँव के दक्खिन एक ऊसर भूमि पर मुंशी राम दयाल की पाठशाला थी।पास की बंसवाड़ी से झरती पत्तियाँ पाठशाला में भर जातीं। मुंशी जी के पहुँचने से पहले ही बच्चे अरहर की झाड़ू से उसे साफ कर डालते।उससे उठती धूल गाँव वालों को बता देती कि बच्चे पहुँच गये हैं, मुंशी जी अब पहुँचने ही वाले हैं। महुअरिया से लगे हुए दूर दूर तक फैले पीले पके धान के खेत।इनके बीच से गुजरती पगडंडी पर जब मुंशी जी आते दिखायी पड़ते बच्चों का शोरगुल एकदम थम जाता।
जब ऊपर तक खुँटियाई धोती पर गाढ़े का कुरता पहने, आँखों पर तागे से जोड़ी पीतल की कमानी वाली ऐनक चढ़ाये, दोनों हाथों में थमी नारियल की गुड़गुड़ी से धुँए के कश खींचते मुंशी जी के पाठशाला में प्रवेश करते ही सभी शरारती बच्चे विनम्रता की मूर्ति बन खड़े हो जाते। इस तरह वे अपने मुंशी जी के प्रति आदर प्रकट करते।उनके आसन ग्रहण कर लेने के बाद ही सब अपनी जगह बैठते।कुछ पढ़ाना शुरू करने से पहले ऐनक के पीछे से मुंशी जी की आँखें एक बार सभी बच्चों को अवश्य झाँक लेतीं।
मुंशी जी की पाठशाला को कहीं बाहर से कोई सहायता नहीं मिलती थी।फिर भी उन्होंने जिन्दगी में कभी निराशा या गिरावट का अनुभव नहीं किया।साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में कब रविवार आता है, कब दशहरा दिवाली पड़ते हैं, वे नहीं जानते थे।पर्वों पर भी बच्चे आयें या न आयें, मुंशी जी अपनी ऐनक संभालते अक्सर  अपने निर्वाण पद प्राप्त आसन पर जमे दिखायी पड़ते।कोई छात्र कई दिन न दिखायी पड़ता तो उसका हालचाल लेने उसके घर जरूर पहुँच जाते।अभिभावकों के हृदय में भी समय की मार से असमय वृ़द्ध हो चले उस व्यक्ति के प्रति कुछ ऐसा लगाव था कि वे अपने बच्चे तो पाठशाला भेजते ही, उसकी झोली भी अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुरूप भर देते।
मुंशी जी एक तार थे जो किसी न किसी रूप में हर किसी के दिल में बजते रहते थे।
   उस दिन माघ महीने की सारी ठंड जैसे उस गाँव में ही समाने का प्रयास कर रही थी।मुंशी जी ने भाप से धुंधले पड़ गये अपनी ऐनक के शीशों को धोती की खूँट से पोंछ कर आँखें आसमान पर उठायीं।बादलों के सफेद भूरे फाहे तह बना रहे थे।दाँत कटकटाती हवा शरीर बेध रही थी।पानी गिरने के आसार थे।मुंशी जी ने एक लम्बी साँस ली।आज पाठशाला जमने के लक्षण न थे।गुड़ की चाय पी कर जो एक गर्मी उनके शरीर में आ गई थी वह इस विचार के आते ही शीतलहर बन गई।सामान्य व्यक्ति उस दशा में  घर से बाहर निकलने की कल्पना तक न करता।किन्तु मुंशी जी असामान्य व्यक्ति थे।उन्होंने कमला को आवाज दी -बेटी, खिचड़ी तैयार हो गई हो तो परोस दे।
मगर भीतर तो अभी चूल्हा तक नहीं जला था।उनकी पत्नी ने  हैरत से पूछा -क्या पाठशाला ऐसे मौसम में भी खुलेगी ?
क्या ? यह सुन कर मुंशी जी को पत्नी से भी ज्यादा हैरत हुई।
ठीक है।लगता है कि पैर अब ठीक से फैलने लगे हैं।रात भर मालिश करवाओ, सिंकवाओ और अब ठंड में निकलने की बात करो।मरना तो मुझे होता है। पत्नी ने कुछ झल्लाहट से कहा।तब अकस्मात मुंशी जी को एहसास हुआ कि वे तो गठिया के मरीज हैं।अभी पिछली पूरी रात उन्होंने कितने दर्द और बेचैनी से बितायी थी।
कई मिनटों तक मुंशी जी छप्पर वाले ओसारे की एक थून का सहारा लिए खड़े रहे।उनके भीतर एक भयानक कोलाहल उत्पन्न हो गया था।जीवन का जो व्रत कभी भंग नहीं हुआ क्या उसकी कड़ी आज टूट कर रहेगी ? यह व्रत कैसा और तपस्या क्यों ? कौन सी सिद्धि प्राप्त होने वाली है इससे उन्हें ?
केवल कुछ वर्षों का समय बीतते ही कमला विवाह के योग्य हो जायगी।उसके हाथ पीले करने के लिए उन्होंने अब तक किस पूँजी का संचय किया था? क्या यह सहस्त्र छिद्रों वाला आवास बेच कर भी वे अपने एक सब से बड़े उत्तरदायित्व को निबाह सकेंगे? उन्होंने रात को रात और दिन को दिन नहीं समझा।माघ पूस की ठारी भी जर्जर वस्त्रों में काट दी।कभी यह भी नहीं देखा कि भोजन की थाली में साग है तो नमक नहीं, रोटी है तो दाल नहीं।जीवन का सारा विष वे शंकर की तरह पचाते  चले गये। मगर अबोध बेटी और रोग जर्जर पत्नी-इन दो निरीह प्राणियों को उन्होंने क्या दिया ? पत्नी आज भी पैबंद लगी धोती में अपने नारीत्व की मर्यादा छिपाये घर में पड़ी रहती है।बेटी के लिये एक छँटाक दूध की कौन कहे, कभी ढंग से रोटियाँ भी वे न उपलब्ध कर सके।बेटे को दूध के नाम पर आटे का घोल पिलाने वाले आचार्य द्रोण की तो सारी व्यथा उस दिन दूर हो गई जब वे राजगुरू बनाये गए। मगर कहाँ से आते मुंशी रामदयाल के लिए राजकुमार।
मगर जब मुंशी जी ने पाठशाला शुरू की थी तब सारी बातों का स्वरूप कुछ और ही था।उनकी पनीली आंखों के आगे आज भी वे दिन जीवन्त हो उठते हैं।उन्होंने कैसे गाँव के जमींदार से चिरौरी विनती कर के दस हाथ ऊसर भूमि पाठशाला के लिये प्राप्त की थी।पिता ने उन्हें सनकी कहा था और गाँव के लोगों ने जी भर  खिल्ली उड़ायी थी।मगर अपमान और उपेक्षा की सारी कड़वी घूटों को पी कर उस सनकी युवक राम दयाल ने अकेले ही गाँव के ताल की मिट्टी से पाठशाला की दीवारें खड़ी करनी शुरू कर दी।जिस दिन एक कमरे की आधी दीवार गर्व से सीना ताने ऊपर उभर आयी थी, गाँव वालों ने अनुभव किया था, वह मिट्टी भर नहीं है।उसके एक एक कण में श्रम और लगन की झंकार भी निहित है।तब उन्हें पागल कहने वालों ने ही उनके कार्य को हाथों हाथ ले लिया था।महीने भर के भीतर नई खपरैलों का ताज सिर पर लगाये पाठशाला की सफेद पुती दीवारें दूधिया चाँदनी में श्वेत संगमर्मर निर्मित विद्या मंदिर बन गई थीं।पहले दिन जब गाँव के पाँच सात बच्चे वहाँ पढ़ने के लिए आये, उन्होंने कितने उल्लास से अपने घर का बना नया गुड़ सब को खिलाया था।
किन्तु उत्साह का जो स्थायी रूप मुंशी राम दयाल के हृदय में था, गाँव वाले उससे वंचित थे।पाठशाला  कुछ सालों तक अपनी इन्द्रधनुषी आभा के साथ खूब चमकती रही।भीतर जगह भर गई तो बच्चे बाहर खुले में बैठ कर पढ़ते थे।फिर धीरे धीरे लोगों के मन में इस ओर से एक उदासीनता सी पैदा हो चली।मुंशी जी उसका कारण जानते थे।लोगों का जीवन इतना संघर्षमय और जटिल हो चला कि जीवन के सारे ओज और उमंग, तीज और त्योहारों का उल्लास न जाने किस दानवी के पेट में समाने लगे।जीवन की सारी स्वाभाविक मधुरता पर जैसे किसी ने कृत्रिमता का काला पेंट पोत दिया।इंसान हाड़ मांस न हो, एक मशीन भर हो चला।अब लोगों के पास इतना वक्त न था कि वे पाठशाला की ओर ध्यान देते।फिर भी मुंशी जी ढीले न पड़े।जब हवा और पानी की मार से दीवारें जर्जर होने लगीं, मुंशी जी ने अकेले ही उनकी मरम्मत करने की कोशिश की।परन्तु अब वह पहले वाला शरीर न था। वह जवानी की उमंग और मजबूत हड्डियाँ स्वप्न पट के चित्र भर रह गई थीं।
इतने पर भी उनका पढ़ाने जाने का क्रम एक दिन के लिए भी नहीं टूटा।जो कुछ उनके मस्तिष्क में था उसे बच्चों को देने में कभी कृपणता नहीं की।उन्हें प्रसन्नता थी कि उनके पढ़ाये कुछ बच्चे ऊँचे ऊँचे पदों पर कार्य कर रहे थे।जब वे गाँव आते और अपने इस आदि गुरू के चरणों का स्पर्श करते, मुंशी जी अपनी सारी व्यथा भूल जाते।
मुंशी जी ने थोड़ा झिटक कर अपनी दोनों बाहें फैलायीं।ठंड से वे कुछ अकड़ चली थीं।खड़े रहने के कारण घुटनों में दर्द होने लगा था।अच्छा हो कि आज आराम कर लिया जाय।जीवन भर तो उसी आग में झुलसा, एक दिन नहीं ही सही।यह सोच वे भीतर जाने के लिए मुड़ने को थे कि याद हो आया -- लछमन वजीफे की परीक्षा में बैठने वाला है।आज वह अवश्य आया होगा।गणित के जरूरी सवाल जो समझने हैं उसे।लछमन ही नहीं, गोविन्द, महेश, धनकू को भी तो इसी महीने शहर के अंग्रेजी स्कूल में भरती होना है।उन लोगों के लिए तो एक एक दिन कीमती है।नहीं -- अब वे घर पर नहीं रूकेंगे।
कमला! उन्हों ने ऐसे पुकार कर कहा जैसे उनके भीतर कहीं यकायक सौ पावर का बल्ब जल गया हो। मैं पाठशाला जा रहा हूँ।बन जाने पर मेरा खाना थाली में ढँक कर रख देना। लौट कर खाऊँगा। फिर किसी भी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उन्होंने अपनी सूती चादर कंधे और सीने के चारों ओर लपेटी और बाहर निकल गए।
पीछे दरवाजे की चौखट से झाँकती चार आँखों में कितनी अकुलाहट थी, मुंशी जी ने मुड़ कर इसे भी न देखा।
पाठशाला में एक भी छात्र नहीं आया था।मगर मुंशी रामदयाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।उन्होंने लछमन के घर पहुँच कर वहीं महेश धनकू और गोविन्द को भी बुलवा लिया।बच्चों के लिए यह चौंकाने वाली बात नहीं थी।क्योंकि उनके लिए यह कुछ भी नया नहीं था।उनका यह स्वभाव बच्चों में हमेशा से एक अनिर्वचनीय पुलक भरता आया था।
उस रात मुंशी रामदयाल को बड़ा तेज ज्वर चढ़ आया।पैर की नसें बुरी तरह सूज आयी।चारपाई पर हिलना डुलना तक मुश्किल हो गया।दो हफ्ते रोग से लड़ने के बाद वे चलने फिरने के योग्य हुए।
आगे के कुछ सालों में गाँव में बड़े बदलाव आये।देश में पुनरूत्थान और जागृति की जो बयार बही उसके स्पर्श से वह गाँव भी अछूता नहीं रहा।पास के कस्बे में प्लास्टिक का एक कारखाना खुल गया। गाँव के काफी लोगों को उसमें रोजगार मिल गया।कारखाने की तरफ से गाँव के बगल एक स्कूल भी खुल गया।स्कूल की सुन्दर पक्की इमारत थी।योग्य और अनुभवी अध्यापक थे।वहाँ पढ़ने वाले बच्चों  की फीस माफ थी।जो गरीब थे उन्हें वजीफा मिलता था।गाँव के भाग्य खुल गये।
मुंशी रामदयाल की पाठशाला अब सूनी हो गई थी।जब तक पौरूष चला मुंशी जी अपने लंगड़े आसन पर बैठे दिखायी पड़ते रहे।आँखों पर वही ऐनक तथा हाथों में वही पुरानी गुड़गुड़ी रहती।उनका चेहरा अवश्य पहले से काफी बदल गया था।आँखों की रोशनी थक चली थी।चेहरे की झुर्रियाँ जीवन के सतत संघर्षों की दास्तान बन कर नीचे लटक आयी थीं।उनकी आँखों के आगे जब तब अपने खंडहर घर की दीवारें आ खड़ी होतीं।पत्नी का करूणार्द्र मुख उन्हें विचलित कर देता।जब विवाह की उम्र पार कर रही बेटी उनके हृदय के घावों को कुरेदने लगती उनका सारा धैर्य आँखों की राह बह निकलता।
      नये स्कूल में लम्बी लम्बी छुट्टियाँ पड़ती थीं।अध्यापक उन छुट्टियों में कभी स्कूल की ओर आँख उठा कर भी न देखते।उनका कोई छात्र हफ्तों अनुपस्थित रहे तो उन्हें उसकी कोई चिन्ता न होती।अभिभावकों छात्रों और टीचर्स का सम्बन्ध बस महीने में एक दिन पड़ने वाली पैरेन्ट टीचर्स मीटिंग तक ही सीमित था।मुंशी जी के लिए यह सब एकदम नयी बात थी।पाठशाला, अध्यापक और छात्रों का यह सम्बन्ध कभी भी उनकी कल्पना का विषय नहीं रहा।वे तो पाठशाला की हृद्तंत्री में झंकार बन समा जाने वाले जीव थे।बाहर खड़े रह कर केवल उसका स्वर सुनने का उन्हें कोई अभ्यास न था।
आज ऐसे में हम सोच भी कैसे सकते हैं कि कभी मुंशी जी जैसी शख्सियत भी हुआ करती थी।
                             ००००००

लेखक-प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव
11 मार्च, 1929 को जौनपुर के खरौना गांव में जन्म। 31 जुलाई 2016  को लखनऊ में आकस्मि निधन।शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम00।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र पत्रिकाओं सरस्वती,कल्पना, प्रसाद,ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,कहानी, नई कहानी, विशाल भारत,आदि में कहानियों,नाटकों,लेखों,तथा रेडियो नाटकों, रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।
     आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों, नाटकों,लेखों की अब तक पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य।1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र मृत्यु पर्यंत जारी रहा। 2012में नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया से बाल उपन्यासमौत के चंगुल में तथा 2018 में बाल नाटकों का संग्रह एक तमाशा ऐसा भी” प्रकाशित।


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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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