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पुस्तक समीक्षा --दृष्टिबाधितों के अंधेरों पर रोशनी डालता उपन्यास----ब्लाइंड स्ट्रीट

शुक्रवार, 11 जून 2021

 

                       प्रकाशक-नई किताब प्रकाशन


                         1/11829,ग्राउंड फ्लोर,


                       पंचशील गार्डेन,नवीन शाहदरा,


                        दिल्ली-110032

                    


        हमारी यह दुनिया बहुत खूबसूरत है।रंग बिरंगी है।चारों ओर प्रकृति के अद्भुत नज़ारे बिखरे हैं।खूबसूरत पहाड़ हैं,फूलों की रंगीन सुन्दर वादियाँ हैं।सूर्योदय सूर्यास्त के अद्भुत नज़ारे हैं---और भी बहुत कुछ है जिन्हें हम अपनी आँखों से देखते और सराहते हैं।लेकिन इस दुनिया में ऐसे भी लाखों लोग हैं जो इस खूबसूरत दुनिया को कभी नहीं देख सकते।जिनकी दुनिया में लाल,पीला, नीला,हरा कोई रंग नहीं है।उनकी दुनिया में सिर्फ एक रंग है---काला स्याह रंग।रोशनी की जगह सिर्फ और सिर्फ स्याह अँधेरा है।वरिष्ठ पत्रकार,स्तंभकार,छायाकार और उपन्यासकार प्रदीप सौरभ का नया उपन्यास “ब्लाइंड स्ट्रीट” हमारे समाज के ऐसे ही हजारों लाखों दृष्टि बाधित व्यक्तियों के जीवन की गाथा है।

   


       यद्यपि इस विषय पर पहले बालीवुड में फ़िल्में भी  बनी हैं लेकिन उन फिल्मों में सिर्फ किसी एक नायक नायिका के माध्यम से दृष्टि बाधितों के जीवन के किसी एक पहलू को देखने या दिखाने की कोशिश की गयी है।दूसरी बात फिल्म की अपनी सीमाएं भी होती हैं।फ़िल्में दर्शकों को किसी विषय की तह तक नहीं पहुंचा सकती।जबकि किसी उपन्यासकार के लिए किसी विषय पर काम करने  के लिए एक बहुत बड़ा फलक मौजूद रहता है।बस उसे जरूरत होती है उस विषय की गहराई में डूब कर चीजों को निकालने की।इस दृष्टि से यह संभवतः हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी दृष्टि बाधित लोगों पर लिखा गया पहला उपन्यास है।

      


              इस उपन्यास की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें अन्य उपन्यासों की तरह नायक-नायिका,कुछ प्रमुख पात्र,कुछ गौण चरित्र,कुछ सपोर्टिंग पात्र जैसी कोई चीज नहीं है।उपन्यास में कई किरदार हैं।और हर किरदार की अपनी कहानी है,उसके जीवन की घटनाएं हैं,उसके मन के अन्तर्द्वन्द हैं,उसके संघर्ष हैं और सबसे बड़ी बात कि उपन्यास का हर पात्र कहीं न कहीं आपको नायक या नायिका की भूमिका में खड़ा दिखेगा।वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक सुधीश पचौरी के शब्दों में—“ब्लाइंड स्ट्रीट हिन्दी का शायद पहला उपन्यास है,जो बहुत सारे ‘डिफरेंटली एबिल्ड’की अंधी दुनिया के उन अँधेरे-उजालों को परत-दर-परत उघाड़ता चला जाता है,जिनकी हिन्दी के कथा साहित्य में प्रायः उपेक्षा ही की जाती रही है।यह एक नायक-नायिका वाला उपन्यास नहीं है,बल्कि बहुत से नायक-नायिकाओं वाला उपन्यास है।हर नायक-नायिका की कहानी अलग होते हुए भी एक दूसरे से मिक्स होते हुए चलती  है।यह उपन्यास बहुत  सारी कहानियों का धारा प्रवाह ‘मेडले’ और ‘फ्यूजन’ है।”(“ब्लाइंड स्ट्रीट” के फ्लैप से)।

           


        

         प्रदीप सौरभ एक खोजी पत्रकार हैं।इसीलिए वो अपने लेखन के विषय की पूरी तह तक शोध करते हैं तभी उस विषय पर कलम चलाते हैं।और उनकी यह खोज और अनुसंधान की छाप उनके पूर्व में प्रकाशित सभी उपन्यासों(मुन्नी मोबाइल,तीसरी ताली,देश भीतर देश,और सिर्फ तितली) की ही तरह इस उपन्यास में पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।प्रदीप सौरभ ने अपने इस उपन्यास के भी सभी किरदारों से मुलाक़ात कर उनसे बातचीत करके उनकी पूरी गाथा को निकाला है।उनके पात्रों का सृजन कहीं सुनी सुनाई या पढ़ी गयी बातों के आधार पर नहीं हुआ है।यही कारण है की इस उपन्यास को पढ़ते हुए दृष्टि विहीनों की दुनिया से गुजरते हुए हमें महसूस  होता है कि क्या हमारे समाज में ऐसा भी हो रहा है।क्योंकि हमने या कह सकते हैं कि हमारे समाज के सामान्य व्यक्ति ने कभी अंधों की उस दुनिया में झांकने या पहुँचने की कोशिश ही नहीं की है।हमारे लिए तो अंधे व्यक्ति का मतलब बस सूरदास---गा बजा कर कमाने वाला व्यक्ति या फिर सड़क पर भीख माँगने वाला एक भिखारी है।इससे अधिक हमारे समाज का आदमी उनके बारे में कुछ सोचता ही नहीं है।वह कभी नहीं जानना चाहता कि हमारी दुनिया के बारे में दृष्टि विहीनों की क्या सोच है?उनके अपने अंधेरों में वो किन रंगों को देखते और महसूस करते हैं।समाज से उपेक्षित ये दृष्टि विहीन या अंधे लोग अपनी अंधेरी दुनिया को कैसे किस शक्ति से रोशनी में बदलने की कोशिश करते हैं।उनके अन्दर क्या भावनाएं कुलबुलाती रहती हैं?वो समाज से हर पल मिलने वाली उपेक्षाओं तिरस्कारों से किस तरह दिन-रात संघर्ष करते हैं।समाज की इस उपेक्षा को हम इसी उपन्यास की एक प्रमुख पात्र पार्वती के साथ घटी एक छोटी सी घटना में देख सकते हैं।“पार्वती में गेट के बाहर आकर जमीन पर अपनी स्टिक(अंधों की लाइफ लाइन)पटक रही थी,ताकि कोई सड़क पार करने में उसकी मदद के लिए आ जाय।ब्लाइंड इस तरह लोगों का अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं।तभी उसे अहसास हुआ कि कोई उसके पास खड़ा है।पार्वती ने उससे पूछा,“सर क्या रोड पार करा देंगे?”

“करा तो सकते हैं लेकिन कराऊँगा नहीं।”उस व्यक्ति ने हिकारत के भाव से जवाब दिया।‘ईश्वर ने तुम्हारे पाप के कारण तुम्हें अंधा बनाया है।रोड पार कराकर तेरा पाप तो मैं अपने सर पर लूंगा नहीं।”( पृष्ठ-21)

       


             इतना ही नहीं हमारे समाज में इस तिरस्कार और उपेक्षा की शुरुआत बच्चे के पैदा होने पर उसके अंधे होने की बात पता लगते ही हो जाती है।अक्सर मां-बाप उसे या तो किसी मंदिर के बाहर छोड़ आते हैं,या किसी अंधेरी रात में सोते  भिखारियों के बीच छोड़ आते हैं।जिससे कि वह मासूम बाक़ी का पूरा जीवन उन्हीं भिखारियों की तरह भीख मांग कर गुजार दे।क्योंकि उस अंधे बच्चे को जीवन भर सम्हालेगा कौन?बचपन की इसी हिकारत का शिकार इसी उपन्यास का पात्र महेश भी हुआ।-----“आँखों के डाक्टर ने बताया की उसका कार्निया जन्म से ही डैमेज है।उसे अब ठीक भी नहीं किया जा सकता है।बच्चे के अंधे होने की बात सुनकर पूरे परिवार को जैसे सांप सूँघ गया।इस जानकारी के बाद उसका लाड़-प्यार सब कम होने लगा।बात जब उसका नाम रखने की आई थी तो उसके पिता ने बेरुखी से कहा था कि इसका नाम सूरदास रख दो।इस बात का उसकी मौसी ने बहुत विरोध किया था।उनके इस विरोध का नतीजा ही था कि अंततः उसका नाम महेश तय कर दिया गया।महेश तनेजा।”(पृष्ठ-9-10)

    


                                    पच्चीस अध्यायों में विभक्त इस उपन्यास की कहानी---महेश,पार्वती,गुंजन,मनीष,प्रताप, नितिन,राजेश ठाकुर,शिवतेज,सोनी गिल,मुकेश सक्सेना,पल्लवी,महेश तनेजा,सुरेश सरीन, बाबुल,कोयल,विवेक आदि पात्रों के इर्द गिर्द बुनी गयी है।जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि इन सभी पात्रों की अपनी अलग-अलग कहानियां हैं ।और सभी की कहानी आपस में एक दूसरे से लिंक्ड भी हैं।महेश जन्मांध है और अपने परिवार की घोर उपेक्षा का शिकार होकर अपनी मौसी के घर रहने को मजबूर था।महेश की मौसी ने ही उसका ब्लाइंड स्कूल में एडमिशन करवा कर उसकी पढाई लिखाई की व्यवस्था की।पार्वती जन्मांध नहीं थी।उसकी आंख बचपन में करेंट लगाने की एक दुर्घटना में चली गयी थी।लेकिन वो अपनी मेहनत और लगन की बदौलत दिल्ली में जे एन यू  से एम् फिल करने पहुँच गयी थी।इसी तरह बहुत बड़े घर की बेटी सोनी गिल अपने साईटेड पति पंकज से अलग होकर ब्लाइंड तलाकशुदा औरतों का हास्टल चलाती है।लेकिन उसका दुर्भाग्य ---उसका बहुत ही धूर्त और चालाक मैनेजर सोनी गिल की गैर मौजूदगी में उस हास्टल को एकदम चकलाघर में तब्दील कर देता है।–अंततः पुलिस रेड के बाद उसका वह हास्टल भी बंद हो जाता है।इसी तरह सुरेश सरीन ने खुद को अंधों के लिए काम करने के लिए सपर्पित कर दिया।मस्जिद में मौलवी साहब के साथ रहने वाला शिवतेज की अपनी अलग व्यथा कथा है।वह अंधा होने के कारण अपने ही भाई द्वारा सारी जमीन हडप कर घर से निकाल दिए जाने जैसी घटना का शिकार हुआ।लेकिन मौलवी साहब की कृपा  से पढ़ लिख कर इस योग्य हो सका की एक स्कूल में शिक्षक का काम करके कमाई करके गाँव जाकर भाई से जमीन वापस लेकर उसे ही भीख के रूप  में देकर वापस लौट आता है। ----इनके अलावा भी महेश तनेजा,मुकेश सक्सेना,पल्लवी,तिलक ब्रिज पर रहने वाला अंधा परिवार सभी कहीं न कहीं अपने अपने जीवन संघर्षों,उठा-पटक के बीच खुद को स्थापित करने का प्रयास करते दिखते हैं।                                      

              


          उपन्यास के इन सभी पात्रों में कुछ बातें तो एक सामान  रूप से दिखती है---सभी जीवन के प्रति संघर्षरत हैं।सभी घोर सामाजिक,पारिवारिक उपेक्षाओं के शिकार हैं।सभी अपने अपने घोर अंधकारों के बीच कहीं न कहीं से एक रोशनी की किरण को तलाश रहे हैं जो शायद उनके जीवन के इन अंधेरों को दूर कर सके।और सभी के अन्दर इन संघर्षों,जीवन की लालसाओं के बावजूद एक असीम पीड़ा का भाव भी दिखता है जो उनके अन्दर  समाज से मिली उपेक्षाओं,समाज से मिली कटुताओं के कारण पैदा हुआ है। 

    

            लेकिन इस उपन्यास को पढ़ते समय कहीं भी आपको यह नहीं महसूस होता है कि इन पात्रों का सृजन लेखक ने किसी कल्पना के आधार पर किया है।क्योंकि इन दृष्टि बाधितों के रहन-सहन,बातचीत,उठने-बैठने,उनकी दिनचर्याओं,जीवन की घटनाओं को बिना उनसे घुले-मिले,बिना उनका सूक्ष्म अध्ययन किये लिखना संभव ही नहीं है।इस दृष्टि से भी यह उपन्यास अपने आप में एकदम अलग कहा जा सकता है।

    

        इस पूरे उपन्यास में दृष्टि बाधितों के जीवन के साथ ही उनकी सहायता सुविधा के नाम पर हमारे देश भर में चल रहे एन जी ओ,अंधों के स्कूल कालेजों,होस्टल्स में चल रही लूट का भी खुलासा किया गया है।साथ ही वहां इन दृष्टि विहीनों के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक,यौनाचार,उपेक्षा की भी पूरी पड़ताल की गई है।सोनी गिल द्वारा शुरू किये गए अंधी तलाकशुदा महिलाओं के हास्टल को वहां के मैनेजर द्वारा चकलाघर में तब्दील कर देना---यह हमारी व्यवस्था का एक बदरंग चेहरा है।

        

                

      प्रदीप सौरभ के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वो अपनी कृति के मूल विषय के साथ ही देश,समाज की परिस्थितियों पर भी पूरी दृष्टि डालते हैं।इस उपन्यास में भी जे एन यू और जामिया मिलिया में चल रही राजनीति,उठा पटक को बहुत ही बेबाक ढंग से लिखना प्रदीप सौरभ के ही वश की बात थी।जे एन यू कैम्पस में विद्यार्थी परिषद् के गुंडों द्वारा किस कदर तांडव मचाया गया यह भी इस उपन्यास में आप देख सकते हैं।उन गुंडों की क्रूरता और आक्रामकता का अंदाजा आप इसी घटना से लगा सकते हैं कि पार्वती द्वारा यह बताने पर भी कि वो अंधी है—उसे भी एक नकाबपोश लड़की ने डंडों से पीटा और उसका सर तक फोड़ दिया।लेकिन ये घटनाएं या उनका वर्णन मुख्य कथानक से कहीं अलग नहीं दिखते बल्कि उपन्यास को और सार्थक बनाते है।

  


               पूरे उपन्यास को पढ़ कर एक बात साफ़ तौर पर उभर कर आती है—वो यह कि हमें यानि हमारे इस पूरे समाज को यह जानना होगा कि इन दृष्टि बाधितों के अन्दर भी हमारी तरह ही एक दिल धड़कता है।उसमें भी भावनाएं होती हैं।उसमें भी संवेदनाएं पनपती हैं।हमारी ही तरह उनकी भी शारीरीक जरूरतें होती हैं।वो भी प्यार करना और प्यार पाना चाहते हैं।उनके अन्दर भी यौन इच्छाएँ होती हैं।उनमें भी धूर्तता,मक्कारी,इर्ष्या,द्वेष, जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ होती हैं।---उनमें और हममें बस फर्क इतना ही है कि हमारी दुनिया रंगों से भरपूर है।हम देख सकते हैं।और उनकी दुनिया बिलकुल अंधेरी---स्याह और रोशनी से विहीन है।लेकिन वो इस कमी को स्पर्श,ध्वनि,शब्दों,आहटों,सूंघने जैसी शक्तियों से पूरा करते हैं।----उन्हें हमारे इस समाज से दया की नहीं बराबरी तक पहुंचाने की दरकार है,उन्हें हमारी उपेक्षा,घृणा नहीं हमारे सहारे की जरूरत है।और समाज से यही कहना या बताना इस पूरे उपन्यास और लेखक का मंतव्य भी है।



                                  ००००००



समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार                  

                 

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पुस्तक समीक्षा --संवाद जारी है

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

                     संवाद जारी है

                लेखक:कौशल  पाण्डेय


                   संवाद जारी है”, रहना भी चाहिएक्योंकि जब संवाद नहीं होगा तो बात कैसे जारी रह सकेगी lमैं एक ऐसे रचनाकार कौशल पाण्डेय की बात कर रहा हूँ जो शिक्षा के दरम्यान मेरा मित्र बना,बातें आगे बढ़ी खासकर मिलना मिलाना भी हुआ।हो सकता है पुस्तक समीक्षा करते हुये मैं पुस्तक से ज्यादा ही जुड़ाव महसूस करूं।बहरहाल बात करता हूँ एक ऐसे लेख  "मेरा  गांव-मेरा  बचपन "से जिसमें खासकर भारत-चीन के युद्ध से आये खाद्यान्न संकट का जिक्र बड़ी शिद्दत से किया गया है फिर संकट से झूझते परिवार की तमाम-तमाम बातें भी। 


अचर्चित व्यक्तित्व” लेख में उन दिनों का युवा छात्र लेखक कितनी साफगोई से साधारण भाषा में बाबू प्रतापनारायण श्रीवास्तव जैसे कालजयी उपन्यासकार से मिलने व उनके सानिध्य को प्राप्त कर संवेदनाओं की देहलीज पर खरा उतरता है क्योंकि मैं इसका गवाह भी रहा हूँ।कई बार सांसद रहते हुये भी जनता के हकों की लड़ाई सड़क पर लड़ने वाले कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया पर लिखा आलेख ये बताने के लिये काफी है कि जनता की लड़ाई सड़कों पर कैसे लड़ी जाती है।

                 

                                      रचनाकार,चाहे वो गद्य में लिखे या पद्य में,आलोचना समालोचना संस्मरण आदि पर कलम चलाये, होता साहित्यकार ही है परन्तु उसका आकलन तत्कालीन लेखन या समुदाय न करे ये दुःख की बात है।कौशल जी ने बालकृष्ण बलदुआ जैसे साहित्यकार पर लिखकर उन्हें जीवन दान सा दिया है ऐसा मुझे लगता है।यादें झीनी झीनी रे” के जरिये ये पता चलता है कि आकाशवाणी का महानिदेशक एक प्रतिष्ठित कहानीकार और बाल साहित्यकार श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव  से यह अनुरोध करे  कि वह  रेडियो के लिए  नाटक लिखेंl


घर गृहस्थी के कार्य सुचारू रूप से चलते रहें प्रत्येक स्त्री का दायित्व होता है। परन्तु व्यस्त समय से समय निकाल कर बचे हुये समय का उपयोग कोई रचनात्मकता के हवाले कर दे तो ये काम कम महत्वपूर्ण नहीं।“संवाद जारी है” के आवरण का चित्रांकन इसी की परिणिति है, निःसन्देह किरण चोपड़ा जी धन्यवाद की पात्र हैं।

              

लघुपत्रिकाओं का आकर्षण आज भले ही कम हो गया हो परन्तु एक समय था जब लघुपत्रिकाएँ आज के चर्चित रचनाकारों का संबल हुआ करती थीं।ऐसी ही एक लघु पत्रिका “प्रश्नचिन्ह” अस्सी के दशक में चर्चा में रही। उसमें छपने वाले रचनाकार खास कर कौशल पाण्डेय,हरभजन सिंह मेहरोत्रा,राजकुमार सिंह,शिव चरण चौहान, रमाकांत पांडे आदि किसी परिचय के मोहताज नहीं।बंद हुयीं या प्रकाशित हो रहीं लघु पत्रिकाओं का महत्व कम कर नहीं आंका जा सकता।एक आलेख में लेखक ने इस पर प्रकाश डाला है।

                   

 स्मृतियों में पिता” पुस्तक का एक मार्मिक प्रसंग है,अपने स्वाभिमानी पिता और माता के संघर्षों का जिक्र बड़ी संवेदनाओं के साथ किया है।एक संघर्षशील पिता किस तरह से अपने पालकों  को उचित दर्जा दिलाकर एक जघन्य कांड का शिकार हो जाता है।सुप्रसिद्ध समीक्षक एवं रंगकर्मी अंबिकासिंह वर्मा के साथ अपने साक्षात्कार के दौरान कौशल जी ने अपने बाल साहित्य के रुझान से अवगत कराया। बाल साहित्यकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का सान्निध्य मिलते ही वे बाल साहित्य का जाना माना हस्ताक्षर बन गये।


साहित्य समाज का दर्पण है, मुंशी प्रेम चंद के इस कथन को झुठलाया नहीं जा सकता।शब्द संस्कृति और पुस्तकें,के माध्यम से सामाजिक दर्शन को समझाने का प्रयास बढ़िया है।शब्द और बीज (संस्कृति)सदैव जिन्दा रहते हैं,कोई भी परिस्थितियां होंमैंने पढ़ा भी है और समझने का प्रयास भी किया है,माध्यम कोई भी हो शब्दों की अमरता को झुठलाया नहीं जा सकता,हजारों हजार साल से बीज  उर्वरक होकर अपना नया रूप धारण कर ही लेते हैं।कौशल जी के अनुसार आदिम युग से आगे निकल कर जब हाव-भाव से काम नहीं चला तब शब्दों ने अपना अंतरजाल फैलाया,आज इंटरनेट के माध्यम से बहुत सारी बातें हम शेयर कर लेते हैं।ये सारी विधायें एक तरह से शब्दों का पुनर्जन्म ही हैं, शब्द देव हैं संत तुकाराम ने कहा है।शब्दों का प्रयोग शस्त्र रूप में न कर मानवता की रक्षा के लिये होना चाहिए।

              


भाषा समन्वय की कड़ी बनें हमारी सोच होनी चाहिए।“संवाद जारी है” के एक आलेख में आजादी से लेकर अब तक हुये आन्दोलनों की सफलता का कारण भाषा की सफलता ही रही है।“सांस्कृतिक समन्वय का सेतु”,सदी का हिन्दी बाल साहित्य” जैसा आलेख बाल साहित्य पर पैनी दृष्टि को उजागर करता हुआ सा लगता है।

              


ये पुस्तक पढ़ी जाय,समझी जाय और कई आलेखों के माध्यम से उजागर हुयीं लेखकीय भावनाओं का स्तंभ बने।

                      ०००००




समीक्षक:








अरुणप्रिय


54,जागेश्वर मंदिर परिसर,


मैनावती मार्ग,आजादनगर,कानपुर-2


मोबाइल नम्बर:7565951426

 

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बाल साहित्य की वर्तमान स्थिति:लेखन एवं चित्रांकन

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

                   

                  


             जब हम बाल साहित्य के आज के पूरे परिदृश्य की बात करते हैं तो हमारे सामने विभिन्न प्रदेशों की कई भाषाओं-बोलियों का एक लंबा-चौड़ा फलक आ जाता है, जिसमें हजारों प्रकाशकों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में विभिन्न भाषाओं में बाल साहित्य का प्रकाशन किया जा रहा है।किताबों की मूल भाषा के साथ ही बहुत सारे अनुवाद भी प्रकाशित हो रहे हैं। पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में देश के सबसे बड़े प्रतिष्ठान राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के साथ ही एकलव्य, प्रथम,चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट,साहित्य अकादेमी जैसी संस्थाएं भी बाल साहित्य के प्रकाशन की दिशा में काफी काम कर रही हैं। प्रकाशित हुयी बाल साहित्य की पुस्तकें बुक स्टोर्स तक भी पहुँच रही हैं।बहुत से बड़े बुक स्टोर्स पर तो बाल साहित्य के लिए अलग से चिल्ड्रेन बुक कार्नर भी बनाए गए हैं। कुल मिलाकर बाल साहित्य का परिदृश्य और भविष्य बहुत अच्छा दिखाई पड़ता है।

     

लेकिन अभी भी बराबर ये कहा जा रहा है कि बच्चों में पढने के प्रति रूचि कम होती जा रही है या बच्चों के हाथो तक अच्छा साहित्य नहीं पहुँच रहा है।तो इसके पीछे कारण क्या हैं? हमें उन कारणों को खोजना होगा। क्या टेलीविजन चैनल, इंटरनेट, मोबाइल बच्चों की पठनीयता में बाधक बन रहे? या फिर बच्चों के हाथों तक ऎसी किताबें नहीं पहुँच पा रही हैं जो उसे बाँध सकें, उसके अन्दर पढने की रूचि जगा सकें?     


बाल साहित्य के विकास के लिए कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें काफी कुछ प्रयास किये जाने की जरूरत है। मैं यहाँ मुख्य रूप से दो बिन्दुओं पर बात करूंगा जिन पर काम करके बाल साहित्य को और भी समृद्ध किया जा सकता है और संभवतः बाल पाठकों के अन्दर पढने की रूचि भी जागृत की जा सकती है।


1-किताबों का कंटेंट:

सबसे पहले बात आती है बाल साहित्य के कंटेंट की। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे यहाँ पंचतंत्र, हितोपदेश जैसा साहित्य उपलब्ध है जो आज भी बच्चों के साथ ही बड़ों को भी आकर्षित करता रहा है। दूसरी तरफ साहित्य की मुख्य धारा के लेखकों द्वारा लिखा गया बाल साहित्य। भले ही वो साहित्य बच्चों का मनोरंजन करने के लिए कम और उन्हें उपदेश देने के लिए अधिक लिखा गया। फिर भी उसे आज भी पाठ्यक्रमों में बाल साहित्य के रूप में ही उपयोग किया जा रहा है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि आज भी हमारे देश में बच्चों का पहला सामना पाठ्यक्रम की किताबों से ही होता है जब वो स्कूल जाना शुरू करता है।और उसके बालमन पर पाठ्यक्रम में शामिल की गयी उन्हीं उपदेशात्मक कहानियों, कविताओं की एक अमिट छाप सी पड़ जाती है।क्योंकि उन बच्चों तक संभवतः बाल साहित्य की अच्छी किताबें पहुँच ही नहीं पाती। अब बच्चों तक अच्छा बाल साहित्य कैसे पहुँच सके इस बात की चर्चा मैं आगे करूंगा।       

     


अभी मै बात करूंगा कंटेंट या विषय वस्तु की। हम कैसा कंटेंट बच्चों को दें जिसे वो रूचि लेकर पढ़े। जो उसे बराबर बांधे रह सके। किताब को शुरू से आखिर तक पढने को मजबूर कर दे। इस दृष्टि से मैं पहले यहाँ कुछ किताबों का ख़ास तौर से उल्लेख करना चाहूँगा जो बाल साहित्य की बेहतरीन किताबें हैं मेरी दृष्टि में जिन्हें हर बच्चे,बाल साहित्य लेखक और शिक्षकों,अभिभावकों को जरूर पढना चाहिए।

      


सबसे पहली किताब है “छोटी लाल मुर्गी”।एकलव्य से प्रकाशित लगभग 16 गुणे 12 सेंटीमीटर आकार वाली इस छोटी सी आकर्षक चित्रकथा के लेखक हैं कैरन हेडाक।कुल 24 पृष्ठ की इस किताब में लगभग 150 शब्द हैं।और हर पृष्ठ पर खूबसूरत चित्र हैं।एक लोक कथा पर आधारित इस किताब में कहानी मात्र इतनी है कि एक मुर्गी को गेहूं के कुछ दाने मिलते हैं तो वो सोचती है कि इन्हें बो दूं या खाऊं?उसने बोने,सींचने,फसल काटने,माड़ने, फटकने,पीसने,रोटी बनाने के लिए कई जानवरों से सहायता मांगी पर सबने इनकार कर दिया।लेकिन खाने के वक्त सब हाजिर पर वो अकेले हो रोटियाँ खाती है।अब इतनी सी कहानी को जितने खूबसूरत ढंग से बहुत कम शब्दों में खूबसूरत चित्रों के साथ प्रकाशित किया गया है वो प्रशंसनीय है।

   


ऎसी ही एक किताब और जिसका मैं उल्लेख करूंगा,वो है नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित दिविक रमेश की कहानियों की किताब “लू लू की सनक” लू लू की सनक एक प्रयोगधर्मी बाल कहानियों का संकलन है।इस संकलन में दिविक जी की कुल छः कहानियां संकलित हैं। लू लू की मां,लू लू की सनक,लू लू बड़ा हो गया,लू लू की बातें,लू लू का गुस्सा, और लाल बत्ती पर।संकलन की खास बात यह है कि इसकी सभी कहानियों का मुख्य पात्र लू लू नाम का स्कूल जाने वाला एक बच्चा है।हर कहानी में लू लू के साथ ही घटने वाली घटनाओं,उसके मन में उठने वाले प्रश्नों,उसकी मां द्वारा दिये गये उत्तरों और उसके आस-पास के वातावरण के माध्यम से दिविक जी ने सारी कहानियों का ताना बाना बुना है।

     


इसी ढंग की कुछ और हिंदी में अनूदित किताबें हैं जो हमारे भारतीय बाल साहित्य को समृद्ध करती हैं।अण्डमान का लड़का”---इसकी लेखिका हैंजाई व्हिटेकर।यह एक छोटे बच्चे की ऐसी रोमांचक कहानी है जिसे हर अभिभावक,शिक्षक और बच्चे को जरूर पढ़ना चाहिये।इसकी भी कहानी है तो बहुत साधारण सामान्य सीअपने अभिभावकों(चाचा-चाची) द्वारा प्रताड़ित बच्चे के घर से पलायन की।पर उसकी घर से पलायन की यह यात्रा इतनी रोचक और रोमांचक है जो पाठक को अन्त तक बांधे रहती है।इसी क्रम में मैं सत्यजीत राय की बाल कहानियों की किताब “हंसने वाला कुत्ता”,मराठी के प्रसिद्ध बाल साहित्यकार ना०धो० ताम्हनकर की किताब “गोट्या”,मराठी के ही लेखक गंगाधर गाडगील के बाल उपन्यास “पक्या और उसका गैंग” का उल्लेख करना चाहूँगा।ये सभी किताबें ऐसी हैं जिन्हें उठाने के बाद इन्हें बिना ख़तम किये बच्चा रखेगा नहीं।इन सभी में बने खूबसूरत चित्रों ने इनकी पठनीयता और बढ़ा दी है।ऎसी किताबों की सूची तो लम्बी है लेकिन यहाँ मेरा मकसद किताबों की सूची गिनाना नहीं है बल्कि किताबों के कंटेंट पर बात करना है।इन सभी किताबों को पढने से कुछ ख़ास बिंदु उभर कर हमारे सामने आते हैं।


0 पहली बात सभी में जो सामान है वो ये कि सभी में बाल पाठकों की उम्र के हिसाब से उनके बाल मनोभावों का पूरा ध्यान रखा गया है।


0 दूसरी बात ये कि सभी पात्रों के नाम भी ऐसे रखे गए हैं जिससे पढ़ते समय बच्चों को लगे कि अरे ये तो मैं ही या मेरा फलां दोस्त ही है इस किताब का पात्र।


0 बच्चों के परिवेश,उनके पर्यावरण,उनकी आर्थिक सामाजिक स्थितियों,और उनके सामाजिक सांस्कृतिक सरोकारों को भी इन किताबों में समाहित किया गया है।जिससे इन किताबों को पढ़ते समय बच्चा बराबर ये महसूस करेगा कि ये तो हमारे ही बीच की घटना है।अरे ऐसा तो अभी पिछले दिनों हमारे गाँव में भी हुआ था।


और यही बातें हैं जो इन किताबों को  बेहतरीन किताबों की श्रेणी में रखती हैं।तो इस तरह बाल साहित्य के कंटेंट को लेकर जो महत्त्व पूर्ण बातें हमारे सामने आती हैं वो हैं—


1-कंटेंट बाल मनोभावों के अनुरूप हो।


2-किताब में पात्रों के नामों का चयनकरते समय पाठक बच्चों के परिवेश का ध्यान रखा जाय।


3-उनके पर्यावरण,उनकी आर्थिक,सामजिक स्थितियों पर निगाह एकही जाय ।


4-उनके सामाजिक,सांस्कृतिक सरोकारों रीति-रिवाजों को जरूर शामिल किया जाय जिससे वो खुद अपने चारों और की घटनाओं स्थितियों को वहां महसूस कर सकें।  


5-उनके परिवेश के अनुरूप ही शब्दों और भाषा का चयन।

मेरे हिसाब से किसी भी बाल साहित्यकार को इन पांच बिन्दुओं को निश्चित ही ध्यान में रखकर अपनी कहानी,कविता,नाटक या किसी भी विधा में लिखे जाने वाले बाल साहित्य का सृजन करना चाहिए।


2-किताबों में चित्र:

यह बात तो हम सभी जानते हैं कि बच्चों के लिए लिखी जाने वाली किताबों में रंग-बिरंगे चित्रों की क्या आवश्यकता,क्या अनिवार्यता है।लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि चित्र हों कैसे ? क्योंकि चित्र आकर्षक और बच्चों के परिवेश के अनुरूप होंगे तभी बच्चा उस किताब के प्रति आकर्षित होगा और पढ़ेगा भी।अन्यथा प्रकाशित होने वाली ज्यादातर किताबों की तरह ही नई किताबें भी सरकारी खरीद का हिस्सा बन कर आलमारियों की शोभा बढ़ाती रहेंगी।

     

ध्यान देने वाली बात ये है कि आज कुछ प्रकाशन संस्थानों को छोड़कर ज्यादातर प्रकाशकों द्वारा छापी जाने वाली बच्चों की किताबों में चित्र किताबों के अनुरूप होते ही नहीं।वो सिर्फ चित्र लगाने के लिए ही चित्र लगा रहे।वो भी गूगल से साभार लिए हुए।क्योंकि


बच्चों की किताबों के लिए चित्र बहुत मेहनत से बनते हैं और जाहिर सी बात है कि इसके लिए चित्रकार को पारिश्रमिक भी ज्यादा देना होगा।इंटरनेट के आने के बाद से प्रकाशकों ने सस्ते चित्रों का भी जुगाड़ कर ही लिया है।वो इस तरह कि जरुरत के मुताबिक़  इंटरनेट से चित्र उठा लो,उसमें थोड़ा टचिंग करवाकर गूगल से साभार की चिप्पी लगा कर छाप दो।नतीजा क्या हो रहा? कहानी में पात्र तो रहते हैं भारत के किसी गाँव के रामू,श्यामू, मनोहर,सीता,गुडिया,चम्पा और उनकी जगह चित्र लगे होते हैं,टामी,जोजफ,माइकल,टीना, जोजो,या कैटी के।


तो आप खुद देखिये उन चित्रों को देख कर भला हमारे भारत का बाल पाठक कैसे खुद को हजारों की संख्या में प्रकाशित होने वाले बाल साहित्य से जोड़ सकेगा?टामी,जोजफ का चित्र देख कर मनोहर और रामू को कैसे ये महसूस होगा कि अरे ये तो उनके जैसे ही किसी बच्चे की कहानी है।

      

इस सन्दर्भ में मुझे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सम्पादक श्री पंकज चतुर्वेदी की बातें याद आ जाती हैं जिसका उल्लेख यहाँ जरूरी है।फेसबुक पर जब कोई बाल साहित्य लेखक बहुत प्रसन्नता से किसी प्राइवेट प्रकाशक को पैसे देकर छपवाई हुई अपनी किताब को शेयर करता है तो पंकज भाई तुरंत उसको कहते भी हैं कि भाई कहानी तो आपकी अच्छी है पर कम से कम चित्र तो भारतीय बच्चों,पात्रों के लगवा देते।


इस बात का उल्लेख यहाँ सिर्फ इसलिए क्योंकि जब हम भारतीय बच्चों के लिए प्रकाशित होने वाले बाल साहित्य की बात करते हैं तो बहुत जरूरी है उन किताबों में प्रकाशित होने वाले चित्रों में भारतीयता का होना।यहाँ भारतीयता के होने से मेरा आशय है कि—


1-किताबों के लिए चित्र गूगल से साभार न लिए जायं।


2-प्रकाशकगण चित्र किसी अच्छे चित्रकार से पैसे देकर बनवाएं।


3-चित्र हमारे गाँवों,शहरों के परिवेश,पर्यावरण,सामाजिक स्थितियों को ध्यान में रखकर ही इस्तेमाल हों।


4-जिससे बच्चा भी उस किताब से खुद को जोड़ सके।उसमें खुद को महसूस कर सके।

      

अंत में 2017 में साहित्य अकादमी से प्रकाशित प्रसिद्ध चित्रकार,कार्टूनिस्ट और लेखक श्री आबिद सुरती जी की एक किताब का उल्लेख करूंगा।किताब का नाम ही है “मेरा नाम है”। इस खूबसूरत रंगबिरंगे चित्रों से सजी किताब में कुल चार मजेदार कहानियाँ हैं-–चकमक चश्मे वाला, तैयबअली टाई वाला,फोफो फोटो वाला और रानी फूल-पत्ती वाला।

   

इन चारों खूबसूरत कहानियों को खुद आबिद जी ने इतने सुन्दर चित्रों से सजाया है कि ये किताब देखते ही कोई भी बच्चा इसे पढने को मचल उठेगा।इसके हर पृष्ठ पर दो पंक्तियाँ दी हैं “बहते चलो बच्चों बहते चलो” और “लहराते चलो बच्चों लहराते चलो”। इन्हें हम इस किताब की टैग लाइन भी कह सकते हैं जो किताब को आगे पढने के लिए प्रेरित करती हैं।किताब की ख़ास बात ये है कि इसका हर पृष्ठ अपने आप में मुकम्मल एक कहानी,एक कविता का आनंद देता है।और इसके चित्रों की तो बात ही निराली है।चित्रों से भरपूर इस किताब का वो बच्चा भी आनंद उठा सकता है जिसे अभी अक्षर ज्ञान भी नहीं है।आज भारतीय बच्चों के लिए ऎसी ही रंग-बिरंगी चित्रात्मक किताबों की ज्यादा जरूरत भी है और बच्चों को ऎसी किताबें पसंद भी आयेंगी।

                


०००००

डा0हेमन्त कुमार

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