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पिता (दस क्षणिकाएं)

शनिवार, 18 जून 2022

 


आज पितृ दिवस पर हिन्दी के प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार और कहानीकार अपने आदरणीय पिता श्री प्रेमस्वरूप श्रीवस्तव जी को याद करते हुए


पिता


(दस क्षणिकाएं)

 


(एक)


पिता


विशाल बाहुओं का छत्र


वट वृक्ष


हम पौधे


फ़लते फ़ूलते


वट वृक्ष की


छाया में।


000

 


(दो)


पिता


अनन्त असीमित आकाश


हम सब


उड़ते नन्हें पाखी।


000

 


(तीन)


हम


लड़खड़ाते


जब जब भी


सम्हालते पिता


आगे बढ़ कर


बांह पसारे।


000


 (चार)


आंसू


बहते गालों पर


ढाढ़स देता


पिता के खुरदरे


हाथों का स्पर्श।


000


(पांच)


पिता


बन जाते उड़नखटोला


हम करते हैं सैर


दुनिया भर की।


000


 (छः)


हमारी ट्रेन


खिसकती प्लेटफ़ार्म से


पिता


पोंछ लेते आंसू


पीछे मुड़कर।


000


 (सात)


पिता


बन जाते हिमालय


कोई आक्रमण


होने से पहले


हम पर।


000


 (आठ)


जब भी


आया तूफ़ान कोई


हमारे जीवन में


पिता बन गये


अजेय अभेद्य


दीवार।


000


 (नौ)


पिता


बन गये बांध


समुन्दर को


बढ़ते देख


हमारी ओर।


000


(दस)


पिता


बन गये बिछौना


हमें नंगी जमीन पर


सोते देख कर।


000


डा0हेमन्त कुमार

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बाल मन को गुदगुदाती “शब्दों की शरारत”

शनिवार, 26 मार्च 2022

 बाल साहित्य समीक्षा


            बाल मन को गुदगुदाती “शब्दों की शरारत”




                    पुस्तक-शब्दों की शरारत


                     कवयित्री-दिशा ग्रोवर


                     प्रकाशक-प्रकाशन विभाग


                      सूचना और प्रसारण मंत्रालय


                          भारत सरकार

   


हिंदी बाल साहित्य में अगर किसी विधा में सबसे ज्यादा लिखा जा रहा है तो वह है बाल कविता।इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लिखने वालों का एक बड़ा भ्रम भी है कि किसी विषय को लेकर कुछ भी तुकबंदी कर दी जाय तो वह बाल कविता बन जाती है।दूसरे पात्र पत्रिकाओं के अलावा इंटरनेट द्वारा मुफ्त में दिया गया स्पेस और अभिव्यक्ति के फेसबुक,ब्लाग, व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफार्म।जिनपर कुछ ही सेकंड्स में लिखी गयी रचना आप पूरी दुनिया के सामने परोस सकते हैं।हां यह बात जरूर है कि इन दिनों लिखी जा रही सभी बाल कवितायेँ बाल मन के कितनी अनुरूप हैं,उनमें लिखा गया विषय कितना महत्वपूर्ण है इस बात से रचनाकारों को ज्यादा मतलब नहीं।

    

लेकिन इन सब परिस्थितियों के बावजूद कुछ चुनिन्दा युवा बाल साहित्यकार ऐसे भी हैं जो बेहतरीन बाल कवितायें लिख रहे हैं और लगातार प्रकाशित भी हो रहे हैं।जिन्होंने अपनी बेहतरीन बाल कविताओं के बल पर बाल कविता लिखने वालों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बना ली है।ऐसे युवा रचनाकारों में शादाब आलम,फहीम अहमद,निश्चल,पूनम श्रीवास्तव,रोचिका शर्मा,दिशा ग्रोवर,सृष्टि पाण्डेय जैसे कुछ नाम यहाँ रेखांकित किये जा सकते हैं।

        

दिशा ग्रोवर वैसे तो काफी पहले से बाल कवितायेँ लिख रही हैं।देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं-–बाल भारती,बाल किलकारी,बच्चों का देश,उजाला,देवपुत्र आदि के साथ ही कई अखबारों-–दैनिक ट्रिब्यून,समाज्ञा,बाल भास्कर आदि में दिशा की बाल कवितायें प्रकाशित होती रही हैं और सराही भी जाती रही हैं।इनकी कविताएँ साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” में भी संकलित हैं।बाल साहित्य की स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में दिशा का एक बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” भी कुछ दिनों पहले ही प्रकाशित हुआ है और अपनी अलग बुनावट और कहानी और नाटक के सम्मिश्रण की अलग तकनीक के कारण काफी चर्चित भी हुआ है।इस तरह पिछले कुछ समय में ही दिशा ने अपनी बाल साहित्य की रचनाओं के माध्यम से उभरते बाल साहित्यकारों में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी है।

    

लेकिन अभी हाल में ही भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित दिशा ग्रोवर का बाल कविता संग्रह “शब्दों की शरारत” दिशा का पहला बाल कविता संग्रह है।


“शब्दों की शरारत” में दिशा की कुल 52 बाल कवितायें संकलित हैं।मैंने पहले भी पत्र पत्रिकाओं में दिशा ग्रोवर की कवितायेँ पढी हैं।लेकिन इस कविता संकलन के माध्यम से एक बार फिर से दिशा की बाल कविताओं को फिर से पढने और बार बार पढने का अवसर मिला है।दिशा की इन कविताओं में एक नयापन,सम्प्रेषण की एक नयी दृष्टि,शब्दों से सचमुच खेलने की एक नई तकनीक दिखाई पड़ती है जो दिशा की इन बाल कविताओं को भीड़ से अलग करती है और दिशा ग्रोवर को एक अलग पहचान देती है।

  

दरअसल इस कविता संकलन का शीर्षक “शब्दों की शरारत” ही अपने आप में अलग अनूठा है।शीर्षक ही हमे यह बताता है कि इस संकलन की कविताओं में कवयित्री ने बच्चों के स्तर पर उतर कर उनके मनोभावों के अनुकूल ही शब्दों की शरारत की है और उन्हें अपनी कविताओं में पिरोया है।शरारत का मतलब ही है कुछ चुलबुलापन,कुछ शैतानी,कुछ धमाचौकड़ी,कुछ गड़बड़झाला,कुछ चेंचामेंची और कुछ खिलान्दडापन।और इस संकलन की बाल कविताओं में ये सभी बातें मौजूद हैं जो इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको बच्चों के मनोभावों के एकदम नजदीक पहुंचाती हैं।और हमें बाल मन की गहराइयों में उठने वाले प्रश्नों,सवालों,जरूरतों से रूबरू कराती हैं।

  

अगर इस संकलन की शीर्षक कविता “शब्दों की शरारत” की ही बात करें तो कविता की पहली चार पंक्तियाँ ही बच्चों को शब्द शक्ति के बारे में बताती है ---


“शब्दों की क्या ख़ूब शरारत


देते किस्से गढ़ हजार।


कहानी,कविता या कहावत


रचते रहते बार बार।”


ये पंक्तियाँ एक तरह से इस कथन की व्याख्या है कि शब्दों में बहुत शक्ति होती है तभी तो शब्द को काव्यशास्त्र के विद्वानों ने ब्रह्म का दर्जा दिया है।

   

इस कविता संकलन में हमें विषयों की विविधता तो मिलती ही है साथ ही हर विषय की कविता नए प्रयोग भी मिलते हैं।संकलन में एक तरफ सर्दी आई,छमछम बरसे पानी,सुन्दर चन्दा,बूंदों ना ललचाओ,सुबह सुहानी बादल तो हैं दोस्त हमारे जैसी कविताओं के माध्यम से कवयित्री पाठकों को प्रकृति के नजदीक ले जाकर उनका बहुत सूक्ष्मता से दर्शन कराती है तो दूसरी और मेरा परिवार,मां तुम हो या नानी,मां का प्यार,शिक्षक मेरे देव समान,दादी नानी,नानी की चाय,चुटकुले से मामा जी,राखी किसको बांधूं मैं,जैसी कविताओं के माध्यम से पाठक सामाजिक सरोकारों,रिश्तों की गरमाहट और सामाजिक बोधों से मिलता चलता है।एक तरफ — तितली रानी,चिड़िया रानी,जंगल में कोरोना,बन्दर भागा जान बचाकर,मस्तराम हाथी जैसी कविताओं के माध्यम से पाठकों को जीव जंतुओं से मिलवाया गया है,उनके प्रति संवेदना जगाई गयी है तो दूसरी तरफ-- तरह-तरह की गुदगुदी,परछाईं-- जैसे एकदम अनछुए विषयों पर बहुत रोचक बाल कवितायेँ भी कवयित्री ने लिखी हैं।

    

यहाँ मैं कुछ कविताओं की चुनिन्दा पंक्तियों का भी उल्लेख करूंगा जिनसे कवयित्री द्वारा की गयी “शब्दों की शरारत” उभर कर सामने आ जायेगी।“मेरा बस्ता” शीर्षक कविता में कवयित्री की पंक्तिया हैं—


बसते को भी छुट्टी के दिन


क्या आलस मुझसा है भाता?


दिन भर कैसे-कैसे यह भी,


सोते-सोते अरे बिताता।

---अब इन पंक्तियों को पढ़ कर बाल पाठकों को लगेगा अरे मेरा बस्ता भी दिन भर सोता है?और निश्चित ही वो इस कल्पना मात्र से आनंदित होगा।इसी तरह “उलटम-पलटम” कविता की ये पंक्तियाँ भी बच्चों को आनंदित करेंगी---


उलटम-पलटम जब हो जाए


शेर घास से भोज बनाए।


छेड़े राग संग जूं जूं जूं


राजा मच्छर रौब जमाए।


अब यहाँ देखिये बच्चा इस कविता को पढ़ कर ही प्रफुल्लित होगा कि शेर घास का खाना बना रहा,मच्छर जंगल का राजा बन गया---मतलब उस जंगल में सबकुछ उलटा पुलटा हो गया है।अब बाल मन को कल्पना के घोड़ों पर उड़ाने वाली अनुभूति को “जी चाहे जब मजे से”—कविता की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है—


मछली के समंदर में


घर मेरा भी होता,


जी चाहे जब मजे से


झूल लहर पर जाता।

      


एक बात का मैं यहाँ और उल्लेख करना चाहूँगा जो सभी प्रतिष्ठित और नवोदित बाल साहित्यकारों के लिए एक सन्देश भी है।दिशा ग्रोवर ने इस संकलन के शुरू में “कुछ बातें:अपनों से अपनी-सी” शीर्षक से लिखे गए अपने वक्तव्य में लिखा है ----“मैं मानती हूँ की बाल साहित्य बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी होता है।सो बड़ों को भी जरूर पढ़ना चाहिए।”कवयित्री का यह सन्देश सभी रचनाकारों के साथ ही अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर वो भी बाल साहित्य—कहानियां,कवितायें, नाटक, उपन्यास नहीं पढेंगे तो अपने बच्चों को पढने के लिए प्रेरित कैसे करेंगे।और फिर बालसाहित्य में बड़ों,अभिभावकों के लिए भी बहुत कुछ मनोरंजक सीख देने वाले तत्व मौजूद रहते ही हैं।इस दृष्टि से कवयित्री की “सुबह सुहानी” शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भी बहुत सार्थक और महत्वपूर्ण हैं----


बूढों को भी सुबह सुहानी


आस दिलाती है जीने की।


जैसे छलकें प्याले में से


बूंदें भैया अमृत की सी।

 

     


कुल मिलाकर रंग-बिरंगे चित्रों से सजा हुआ दिशा ग्रोवर का यह बाल कविता संकलन निश्चित रूप से बाल पाठकों को शब्दों की नयी नयी शरारतों से तो मिलवायेगा है,उनके मन को जगह-जगह आंदोलित करेगा,उन्हें गुदगुदायेगा,उनके अन्दर उत्साह भरेगा,उनका मनोरंजन करेगा तो दूसरी ओर उनके भीतर सामजिक रिश्तों,परिवार,घर के बीच संबंधों की मिठास भी घोलेगा।प्रकृति के नजदीक ले जाएगा तो जीव जंतुओं के प्रति संवेदनशील भी बनाएगा।देश,मातृ-भूमि के प्रति सजग बनाएगा तो उन्हें एक बेहतर इंसान भी बनाएगा।दिशा ग्रोवर का यह बाल कविता संकलन निश्चित रूप से हिन्दी के बाल साहित्य को समृद्ध करेगा।

                    

                                    ००००


समीक्षक:


हेमन्त कुमार


        

                     

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“काफिला” लोक नाट्य संस्थान का बेहतरीन पुतुल उत्सव

मंगलवार, 22 मार्च 2022

 

“काफिला” लोक नाट्य संस्थान का बेहतरीन पुतुल उत्सव

     


कठपुतली नाटिका के दृश्य 

                   आज इंटरनेट,टी०वी०चैनल्स और मोबाइल के दौर में हम सभी और हमारे बच्चे दुनिया के एक बेहतरीन सम्प्रेषण माध्यम और लोक कला “कठपुतलियों” को भूलते जा रहे हैं।बच्चों को तो छोडिये समाज का आम आदमी भी इन बेजान लेकिन खुबसूरत,आकर्षक कठपुतलियों को भूलता जा रहा है।जबकि आज से कुछ ही वर्षों पहले तक ये कठपुतलियाँ मेलों,उत्सवों,धार्मिक एवं सामाजिक समारोहों की शान हुआ करती थीं।लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही बच्चों को शिक्षा देने,किसी विषय के लिए समाज में जागरूकता फैलाने के लिए भी इनका उपयोग किया जाता था।

          


इतना ही नहीं प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए कटिबद्ध एन सी ई आर टी,सी आई ई टी नई दिल्ली,एस आई टी लखनऊ,यूनिसेफ,आई सी ड़ी एस,दूरदर्शन  जैसी प्रतिष्ठित और बड़ी संस्थाओं ने स्कूलों के लिए दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले शैक्षिक वीडियो कार्यक्रमों में भी इन कठपुतलियों का विभिन्न रूपों में प्रयोग किया और विभिन्न कठपुतली संचालकों की सहायता से कठपुतली आधारित विभिन्न विषयों के कार्यक्रम बनाए।इन संस्थाओं द्वारा बनाए गए कठपुतली आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों की संख्या दो हजार से ऊपर ही होगी।दुःख की बात है कि इनमें से हजारों कार्यक्रम तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों में परिवर्तन होने के कारण आज भी वीडियो टेप लाइब्रेरीज में दफन हैं लेकिन कुछ कार्यक्रम आज भी सी आई ई टी नई दिल्ली के पोर्टल एन आर ओ ई आर पर देखे जा सकते हैं।      

             


            आज जब कि तमाम इलेक्ट्रानिक और डिजिटल माध्यमों की चकाचौंध में ये महत्वपूर्ण कठपुतली कला लुप्त होती जा रही है,इसे बचाने के लिए कुछ गिनी चुनी संस्थाएं और कठपुतली कलाकार बिना किसी सरकारी सहायता के इस कला को बचाने और जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं।

          

उपस्थित बच्चे शिक्षक 


           ऎसी ही एक महत्वपूर्ण संस्था है लखनऊ की “काफिला लोक नाट्य संस्थान”। जो पिछले लगभग बीस सालों से कठपुतली कला को बचाने और संरक्षित करने के लिए कटिबद्ध है।“काफिला”देश के विभिन्न ग्रामीण,शहरी इलाकों में कठपुतली नाटकों के प्रदर्शन के साथ ही हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस के अवसर पर विभिन्न आयोजन करती है।

  

मेराज आलम 


        इस साल भी “काफिला” ने अपना 17वां विश्व पुतुल दिवस 21मार्च 2022 को  लखनऊ के सेंट जेम्स स्कूल,गोमती नगर के सभागार में आर0जी० गुप्ता जी के संयोजन में आयोजित किया।इस अवसर पर “काफिला” के निदेशक श्री मेराज आलम ने उपस्थित बच्चों और शिक्षिकाओं तथा अभिभावकों को कठपुतली कला के इतिहास,विश्व पुतुल दिवस के विषय में विस्तृत जानकारी दी।साथ ही काफिला नाट्य संस्थान की तरफ से श्री चन्द्र शेखर शुक्ल द्वारा लिखित और श्री मेराज आलम द्वारा निर्देशित दो कठपुतली नाटकों “इज्जत घर” तथा “पढ़ना जरूरी है” का मंचन भी किया गया।इन दोनों ही पुतुल नाटिकाओं के मंचन में अजरा मेराज,ताने मेराज,तान्या मेराज,चंद्रशेखर शुक्ल,उमा शुक्ल,तारा देवी यादव,बलराम यादव,नाजिया सिद्दीकी,संतोष मौर्या आदि कलाकारों ने दोनों नाटिकाओं के मंचन में पुतुल सञ्चालन,स्वर देने एवं प्रस्तुति को बेहतर बनाने में मेराज आलम का सहयोग किया।

   

    

       


     दोनों ही नाटिकाएं समाज के लिए महत्वपूर्ण सन्देश देने वाली थीं तथा सभागार में उपस्थित सभी दर्शकों का मनोरंजन भी कर रही थीं।इस अवसर पर सभागार में अन्य गणमान्य दर्शकों के साथ ही प्रसिद्ध कवि एवं बाल साहित्यकार डा0हेमन्त कुमार एवं प्रतिष्ठित कवयित्री और ब्लॉगर श्रीमती पूनम श्रीवास्तव जी भी उपस्थित थीं।


                   ००००


रिपोर्ट एवं फोटोग्राफ्स:

डा0हेमन्त कुमार              

 

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अम्मा अरुणpriya अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा। समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत होलीनामा हौसला accidents. 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