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संस्मरण---जिन्होंने मुझे रोशनी दिखाई----।

गुरुवार, 5 सितंबर 2019


जिन्होंने मुझे रोशनी दिखाई----।
                                        
डा0रघुवंश जी 
              
 
 हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कोई न कोई ऐसा शख्स जरूर आता है जो उसकी पूरी जीवन धारा या पूरा जीवन दर्शन ही बदल देता है।वैसे तो इस बदलाव का प्रेरक कोई भी हो सकता है।मां-पिता,भाई-बहन,मित्र,शिक्षक यहां तक कि कोई अनजान व्यक्ति भी।लेकिन अक्सर बदलाव की इस प्रेरणा में शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान रहता है।क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का सबसे सुनहरा यानि बचपन का समय दो ही लोगों के साथ सबसे ज्यादा बिताता है।वो हैं मां-पिता या फ़िर शिक्षक।स्कूल के समय के पहले और बाद का सारा समय अपने मां-पिता के साथ और स्कूल का समय शिक्षक के साथ।इन्हीं लोगों के द्वारा सिखाई गयी बातें बच्चे के पूरे जीवन को प्रभावित करती हैं।
         अगर मैं खुद अपने शिक्षकों की बात करूं तो मेरे जीवन को बदलने वाले दो शिक्षक हैं।पहले स्व0डा0अश्विनी कुमार चतुर्वेदी‘राकेश’और दूसरे स्व0डा0रघुवंश।
मेरा सौभाग्य कि मैं इलाहाबाद युनिवर्सिटी में दोनों ही शिक्षकों का छात्र रहा हूं।डा0 राकेश चतुर्वेदी जी ने मुझे साहित्य लेखन की ओर प्रेरित किया और डा0रघुवंश जी ने मुझे जीवन में साहस,मेहनत और ईमानदारी का पाठ पढ़ाया।
   पहले मैं बात करूंगा डा0राकेश चतुर्वेदी जी की।बात लगभग 1976 की है।मैंने बस इलाहाबाद युनिवर्सिटी में बी0ए0 में दाखिला लिया ही था।और दूसरे छात्रों की ही तरह मेरा भी मकसद बी0ए0 करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना था।ड़ा0राकेश चतुर्वेदी जी मुझे हिन्दी में भाषा विज्ञान पढ़ाते थे।क्लास शुरू होने पर पहले दिन सबसे उन्होंने औपचारिक परिचय लेना शुरू किया।मेरा भी नम्बर आया तो मैंने अपना नाम बता दिया।उन्होंने पूछा कि “हिन्दी पढ़ने के अलावा कभी कुछ लिखा भी है?”(ये प्रश्न वो सबसे पूछ रहे थे पर सभी का जवाब नकारात्मक था।)मैंने यूं ही कह दिया कि हां कहानियां लिखने की कोशिश करता  हूं।डा0 राकेश जी काफ़ी खुश हुये।उन्होंने कहा “चलो कोई तो निकला लिखने पढ़ने वाला।”उन्होंने मुझे अगले दिन शाम को चाय पीने के लिये अपने घर बुलाया और यह भी हिदायत दी कि जो कुछ भी लिखा है साथ में लेते आना।अब मेरी हालत खराब।अभी तक मैंने कोई कहानी तो क्या छोटी सी कविता नहीं लिखी थी।खैर---रात में जाग कर काफ़ी सोच विचार कर मैंने अपनी डायरी में एक कहानी लिख मारी।आखिर सिर ओखली में तो मैंने ही डाला था।कहानी उस समय के अनुकूल थी।संक्षेप में कथानक ये था कि एक बेरोजगार बी0ए0पास युवक नौकरी की खोज में भाग कर बम्बई जाता है और काफ़ी असफ़लताएं झेलने के बाद एक दिन हत्या करके जेल पहुंच जाता है।
       युनिवर्सिटी के पास ही डा0राकेश जी का आवास था।अगले दिन मैं अपनी डायरी लेकर डा0राकेश जी के घर पहुंच गया।उन्होंने मेरे स्वागत का पूरा इन्तजाम किया था।चाय,पकौड़ी,मिठाई।मैंने जम कर नाश्ता किया और चाय पी।फ़िर बारी आई कहानियों की।मैंने डरते-डरते डायरी उन्हें पकड़ा दी।और चुपचाप बैठ गया।मन ही मन डर रहा था कि अब डांट पड़ेगी।पर राकेश जी ने तन्मयता के साथ दस-पन्द्रह मिनट में कहानी खतम कर दी।और मुझसे मुखातिब हुये।
           “हां तो बाबू हेमन्त कुमार जी—आगे क्या इरादा है?”डा0राकेश जी ने मुस्कुराकर पूछा।
  “सर---आगे कम्पटीशन---और ये कहानी तो बस ऐसे ही----।”मेरी हालत खराब।
“कल ही लिखी है न?”
“सर---क्या बताऊं—मैंने तो बस क्लास में वाह वाही पाने के लिये कह दिया था---कभी कहानी लिखी नहीं थी---इसी लिये कल रात जाग कर लिखी।”मैं लगभग हकलाते हुये बोला।
    “बर्खुरदार—ये बताओ इतनी शानदार कहानी लिखी है तुमने ---और वो भी पहली कहानी।और ऊपर से घबरा रहे।क्यों तुम कम्पटीशन देने के चक्कर में हो?कहानियां क्यों नहीं लिखते भाई?”डा राकेश की बातों पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था।मैं अपलक उनकी ओर देख रहा था।
        “देखो मैं ये नहीं कह रहा कि तुम कम्पटीटिव एक्जाम्स मत दो तैयारी करो--पढ़ो लिखो--लेकिन तुम एक अच्छे कहानीकार भी बन सकते हो।तुम्हारे पास शब्द,भाषा,विचार,भावनाएं सभी गुण हैं एक कहानीकार के।---और इसे ले जाओ थोड़ा और संशोधन करके युनिवर्सिटी की मैगज़ीन में दे देना।”कहकर उठते हुये उन्होंने मुझे डायरी पकड़ा दी।
   मेरी वो कहानी “जंजीरें” युनिवर्सिटी पत्रिका में तो छपी ही उसे युनिवर्सिटी की ही एक कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कार भी मिला।फ़िर तो मेरे पंख से लग गये।रोज एक नयी कहानी।और डा0राकेश जी का साथ।एम0ए0 फ़ाइनल में आने के पहले मेरा एक बाल कहानी संग्रह आ चुका था।और मैंने इसी दिशा में आगे बढ़ना अपना लक्ष्य बना लिया।
         मेरे दूसरे प्रेरक थे मेरे रिसर्च गाइड डा0 रघुवंश।मैंने 1979 में रघुवंश जी के निर्देशन में रिसर्च ज्वाइन किया था।रघुवंश जी हाथों की दिक्कत(उनके हाथ बचपन से ही बहुत पतले और अंदर की ओर मुड़े हुए थे।)के कारण अक्सर अपनी यात्राओं के दौरान मुझे सहायक के रूप में साथ ले जाते थे।
       मैं अक्सर यात्राओं के दौरान अपना भारी  सामान खुद उठाने के बजाए कुलियों के भरोसे रहता था।क्योंकि मुझे लगता था कि जब यू0जी0सी0वाले पैसा दे रहे तो अपने सामान मैं क्यों उठाऊं।पर रघुवंश जी के साथ की गयी एक यात्रा ने इस मामले में मेरी विचारधारा ही बदल दी।
       मुझे रघुवंश जी के साथ इलाहाबाद से गोरखपुर किसी सेमिनार में जाना था।उन दिनों भटनी से आगे की यात्रा छोटी लाइन(नैरो गेज)की ट्रेन से होती थी।ट्रेन बदलने हमें दूसरे प्लेटफ़ार्म पर जाना था।सिर्फ़ दो मिनट थे ट्रेन छूटने में।कुली दिख नहीं रहे थे।मैंने कहा सर ट्रेन छूट जायेगी क्या?रघुवंश जी ने कहा “---अरे ऐसे कैसे छूटेगी ट्रेन।अभी देखो ---।”और अपने मुड़े हुये हाथों में ही एक में बैग और एक में छोटी अटैची उठा कर रघुवंश जी दौड़ पड़े दूसरे प्लेटफ़ार्म की ओर---उनकी इस हिम्मत और जज्बे को देख मुझे खुद पर बड़ी शर्म आयी।“एक वृद्ध और हाथों से अशक्त व्यक्ति मेरे सामने सामान उठा कर दौड़ रहा और मैं कुली का इन्तजार कर रहा हूं।”मैंने खुद को धिक्कारा और जल्दी से मैं भी पीछे पीछे दो भारी वाली अटैचियां लेकर दौड़ा---और अन्ततः हमें गाड़ी मिल गयी।उसी दिन से मैंने निर्णय किया कि अपने सारे काम खुद करूंगा।किसी के भरोसे नहीं रहूंगा।
     वो दिन था और आज का दिन मैं यथा संभव अपने सारे काम खुद ही करने की कोशिश करता हूं।यहां तक कि अपने घर का फ़्लश बेसिन तक खुद साफ़ करता हूं।और इससे मुझे जो आत्म सन्तोष मिलता है उसे मैं शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता।
          मैं आज जो कुछ भी हूं उसके प्रेरक आदरणीय डा0राकेश चतुर्वेदी और डा0रघुवंश जी दोनों ही लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा दी गयी सीखें आज भी मुझे प्रेरणा देती हैं।दोनों ही गुरुओं को मेरा हार्दिक नमन और अभिनन्दन।
     00000
डा0हेमन्त कुमार

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सिर्फ़ साहित्यकार,समालोचक और समाजवादी चिंतक ही नहीं थे ---डा0रघुवंश।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

         
पिछले वर्ष 23 अगस्त2013 को अचानक ही सुबह डा0अनुपम आनन्द ने खबर दी कि डा0रघुवंश जी का निधन हो गया।सुन कर स्तब्ध हो गया था मैं। तुरन्त ही मैंने उनके मझले पुत्र श्री ज्योति मित्र को फ़ोन किया।तो इस दुखद समाचार की पुष्टि हो गयी।काफ़ी देर तक वैसे ही जड़वत बैठा रहा।---आंखों के आगे आदरणीय डा0 रघुवंश जी के साथ बिताये एक एक सुखद पल कैमरे के फ़्लैश की चमकते गये थे।
        सन1979 में डा रघुवंश जी से मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद में उनके बैंक रोड स्थित आवास पर हुयी थी।मैं उनके निर्देशन में शोध करना चाहता था।पहले तो उन्होंने एकदम साफ़ मना कर दिया।पर दो तीन दिन लगातार जाने के बाद जब मैंने उनसे कहा कि मैं रिसर्च आपके साथ ही करूंगा, नहीं तो नहीं तब मुझे उनके साथ रिसर्च ज्वाइन करने का सौभाग्य मिल सका।
            डा0रघुवंश जी के साथ मैं लगभग सात-आठ साल रहा।चार साल शोध,तीन--चार साल रिसर्च असिस्टेण्ट के रूप में। इस दौरान मुझे उन्होंने एक गुरु,पिता और मित्र तीनों ही का स्नेह दिया।उनके साथ मैंने देश के हर कोने की लंबी लंबी यात्राएं की।बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिला और खूब अच्छी अच्छी दावतें भी उड़ाईं।ऐसी ही एक यात्रा के दौरान घटित एक घटना का उल्लेख मैं यहां करूंगा जिससे रघुवंश जी की जीवटता और हिम्मत का अंदाजा लग सकता है।
     मुझे रघुवंश जी के साथ इलाहाबाद से गोरखपुर किसी सेमिनार में जाना था। उन दिनों भटनी से आगे की यात्रा छोटी लाइन(नैरो गेज)की ट्रेन से होती थी।ट्रेन बदलने हमे दूसरे प्लेटफ़ार्म पर जाना था।सिर्फ़ दो मिनट थे ट्रेन छूटने में।कुली दिख नहीं रहे थे।मैंने कहा सर ट्रेन छूट जायेगी क्या?रघुवंश जी ने कहा ---अरे ऐसे कैसे छूटेगी ट्रेन।अभी देखो ---। “और अपने मुड़े हुये हाथों में ही एक में बैग और एक में छोटी अटैची उठा कर रघुवंश जी दौड़ पड़े दूसरे प्लेटफ़ार्म की ओर---अब मैं भी पीछे पीछे दो भारी वाली अटैचियां लेकर दौड़ा---और अन्ततः हमें गाड़ी मिल गयी। तो ऐसे कर्मठ,और हिम्मत वाले इन्सान थे रघुवंश जी। ऐसे महान और बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्ति का इस तरह जाना---सच में हिन्दी साहित्य के साथ ही भारत के बुद्धिजीवियों की अपूरणीय क्षति कही जायेगी।
              ड़ा रघुवंश जी का जन्म 30 जून 1921 को उत्तर प्रदेश के गोपामऊ कस्बे में हुआ था।बचपन से ही हाथों की विकलांगता के बावजूद  भी आपने पढ़ाई की।अँगूठे साल तक सिर्फ़ पढ़ना ही हो सका।पर अन्ततः एक दिन अपने हाथों और पैर के अंगूठों में कलम फ़ंसा कर लिखने भी लगे।लिखने पढ़ने का ये जो सिलसिला शुरु हुआ तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम0ए0,डी0फ़िल0 भी कर लिया।और वहीं पर अध्यापन भी करने लगे।
                    डा0रघुवंश जी ने कभी किसी को यह अहसास होने ही नहीं दिया कि उनके दोनों हाथ खराब हैं।वो अपने सारे ही काम दोनों हाथों और पैरों के सहारे बखूबी सम्पन्न कर लेते थे।लिखने के लिये वो तखत य चौकी पर बैठ कर अपने दाहिने पैर के अंगूठे में पेन फ़ंसा कर अपने दाहिने हाथ की सहायता से काफ़ी तेज गति से लिख लेते थे।दाढ़ी बनाना,कंघी करना,खाना खाना, कपड़े बदलना हर काम वो खुद ही करते थे---हां कभी कभी बटन लगाने में उन्हें जरूर थोड़ी दिक्कत होती थी ----वो भी जल्दी रहने पर।समय रहता था तो ये भी वो खुद ही करते थे। उनके अंदर जीवन के प्रति जो जिजीवषा,कर्मठता,और कुछ अलग और नया करने की इच्छा थी शायद उसी ने उन्हें इतने बड़े बड़े उपन्यास,शोध और आलोचना की पुस्तकें लिखने के लिये प्रेरित किया। 
     एक अध्यापक के रूप में रघुवंश जी ऊपर से दिखने में जितने कठोर थे अंदर से उतने ही मृदु और कोमल स्वभाव वाले।अक्सर छात्रों को डांटते तो कुछ समय बाद ही माहौल को हलका करने के लिये उनसे मजाक भी कर देते।एक अध्यापक के साथ ही  आप देश के प्रमुख समाजवादी चिंतकों में से एक  थे।एक जमाने में इलाहाबाद में उनके बैंक रोड स्थित आवास पर हमेशा साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का जमावड़ा रहता था।

                                                                          साहित्यकार के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य को छायातप,तंतुजाल,अर्थहीन,वह अलग व्यक्ति,हरी घाटी जैसे उपन्यास दिये दूसरी ओर प्रकृति और काव्य,नाट्यकला,साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य,कबीर,सर्जनशीलता का आधुनिक संदर्भ जैसी आलोचनात्मक पुस्तकें। इमर्जेंसी में जेल में बन्दी जीवन बिताते हुये “जेल और स्वतन्त्रता”जैसी पुस्तक तैयार करना डा0रघुवंश जैसे कर्मठ व्यक्ति के बस की ही बात थी। नहीं तो इमर्जेन्सी में मीसा बन्दियों की जेल में क्या हलत होती थी इसे कौन नहीं जानता। इसके साथ ही रघुवंश जी ने “आलोचना”,”आलोचना समीक्षा”,”क ख ग”जैसी पत्रिकाओं का संपादन कार्य भी संभाला।
         डा0रघुवंश को 1992मेंउ0प्र0हिन्दी संस्थान” से “साहित्य भूषण”,के के बिड़ला फ़ाउण्डेशन से शंकर पुरस्कार1994 में उ0प्र0हिन्दी संस्थान से”साहित्य-भारती”,2008 में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा”मूर्तिदेवी”पुरस्कार प्रदान किया गया। सामन्यतः 80 वर्ष के बाद साहित्य सृजन कम ही लोग कर पाते हैं परन्तु रघुवंश जी 92 साल की उम्र में भी सक्रिय थे।उनकी अंतिम पुस्तक ”यूरोप के इतिहास की प्रभावी शक्तियां” अभी एक डेढ़ साल पहले ही प्रकाशित हुयी है।
        रघुवंश जी के साथ मेरी अंतिम मुलाकात 2009 में दिल्ली में उनके मझले पुत्र श्री ज्योति मित्र के घर पर हुयी थी। मैं एन सी ई आर टी में किसी वर्कशाप में गया था।डा0साहब को फ़ोन किया तो उन्होंने कहा कि बेटा हेमन्त इस बार मुझसे मिल कर ही जाना। अगले दिन सुबह मैं गया। तब शायद आदरणीया सावित्री जी जीवित थीं। मेरे लिये ढेर सारा नाश्ता बनवा कर रखा था रघुवंश जी ने। काफ़ी देर बातें होती रहीं। पेट भर नाश्ता करके जब मैं चलने को हुआ तो रघुवंश जी ने मुझसे कहा”हेमन्त मैं चाहता हूं तुम एक नयी परम्परा को जन्म दो?” मैं बत समझा नहीं और उनकी तरफ़ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगा। मेरा आशय समझकर वो बोले, “देखो ये तो आम बात है कि कोई गुरु अपने शिष्य की किसी पुस्तक की भूमिका लिखता है। मैं चाहता हूं तुम उल्टा करो। मतलब मेरे नये उपन्यास की भूमिका तुम लिखो। यह एक नयी परम्परा होगी।कि एक शिष्य अपने गुरु की किताब की भूमिका लिखेगा।?”
    ऐसे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति इतने बड़े बुद्धिजीवी,साहित्यकार और चिन्तक का जाना सच में एक बड़े शून्य का बन जाना है--- जिसके भरने में वक्त तो लगेगा ही। हमारे आज के युवाओं के साथ ही उन विकलांग व्यक्तियों को भी डा0रघुवंश जी के जुझारू और सौम्य सरल व्यक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिये जो अपनी शारीरिक विकलांगता को अपनी कमी मान कर हिम्मत हार बैठे हैं या किसी हीन भाव से ग्रस्त हैं। यही आदरणीय डा रघुवंश जी के प्रति सबसे बड़ी  श्रद्धांजलि होगी।
                              000000

डा0हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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