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पुस्तक समीक्षा --दृष्टिबाधितों के अंधेरों पर रोशनी डालता उपन्यास----ब्लाइंड स्ट्रीट

शुक्रवार, 11 जून 2021

 

                       प्रकाशक-नई किताब प्रकाशन


                         1/11829,ग्राउंड फ्लोर,


                       पंचशील गार्डेन,नवीन शाहदरा,


                        दिल्ली-110032

                    


        हमारी यह दुनिया बहुत खूबसूरत है।रंग बिरंगी है।चारों ओर प्रकृति के अद्भुत नज़ारे बिखरे हैं।खूबसूरत पहाड़ हैं,फूलों की रंगीन सुन्दर वादियाँ हैं।सूर्योदय सूर्यास्त के अद्भुत नज़ारे हैं---और भी बहुत कुछ है जिन्हें हम अपनी आँखों से देखते और सराहते हैं।लेकिन इस दुनिया में ऐसे भी लाखों लोग हैं जो इस खूबसूरत दुनिया को कभी नहीं देख सकते।जिनकी दुनिया में लाल,पीला, नीला,हरा कोई रंग नहीं है।उनकी दुनिया में सिर्फ एक रंग है---काला स्याह रंग।रोशनी की जगह सिर्फ और सिर्फ स्याह अँधेरा है।वरिष्ठ पत्रकार,स्तंभकार,छायाकार और उपन्यासकार प्रदीप सौरभ का नया उपन्यास “ब्लाइंड स्ट्रीट” हमारे समाज के ऐसे ही हजारों लाखों दृष्टि बाधित व्यक्तियों के जीवन की गाथा है।

   


       यद्यपि इस विषय पर पहले बालीवुड में फ़िल्में भी  बनी हैं लेकिन उन फिल्मों में सिर्फ किसी एक नायक नायिका के माध्यम से दृष्टि बाधितों के जीवन के किसी एक पहलू को देखने या दिखाने की कोशिश की गयी है।दूसरी बात फिल्म की अपनी सीमाएं भी होती हैं।फ़िल्में दर्शकों को किसी विषय की तह तक नहीं पहुंचा सकती।जबकि किसी उपन्यासकार के लिए किसी विषय पर काम करने  के लिए एक बहुत बड़ा फलक मौजूद रहता है।बस उसे जरूरत होती है उस विषय की गहराई में डूब कर चीजों को निकालने की।इस दृष्टि से यह संभवतः हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी दृष्टि बाधित लोगों पर लिखा गया पहला उपन्यास है।

      


              इस उपन्यास की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें अन्य उपन्यासों की तरह नायक-नायिका,कुछ प्रमुख पात्र,कुछ गौण चरित्र,कुछ सपोर्टिंग पात्र जैसी कोई चीज नहीं है।उपन्यास में कई किरदार हैं।और हर किरदार की अपनी कहानी है,उसके जीवन की घटनाएं हैं,उसके मन के अन्तर्द्वन्द हैं,उसके संघर्ष हैं और सबसे बड़ी बात कि उपन्यास का हर पात्र कहीं न कहीं आपको नायक या नायिका की भूमिका में खड़ा दिखेगा।वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक सुधीश पचौरी के शब्दों में—“ब्लाइंड स्ट्रीट हिन्दी का शायद पहला उपन्यास है,जो बहुत सारे ‘डिफरेंटली एबिल्ड’की अंधी दुनिया के उन अँधेरे-उजालों को परत-दर-परत उघाड़ता चला जाता है,जिनकी हिन्दी के कथा साहित्य में प्रायः उपेक्षा ही की जाती रही है।यह एक नायक-नायिका वाला उपन्यास नहीं है,बल्कि बहुत से नायक-नायिकाओं वाला उपन्यास है।हर नायक-नायिका की कहानी अलग होते हुए भी एक दूसरे से मिक्स होते हुए चलती  है।यह उपन्यास बहुत  सारी कहानियों का धारा प्रवाह ‘मेडले’ और ‘फ्यूजन’ है।”(“ब्लाइंड स्ट्रीट” के फ्लैप से)।

           


        

         प्रदीप सौरभ एक खोजी पत्रकार हैं।इसीलिए वो अपने लेखन के विषय की पूरी तह तक शोध करते हैं तभी उस विषय पर कलम चलाते हैं।और उनकी यह खोज और अनुसंधान की छाप उनके पूर्व में प्रकाशित सभी उपन्यासों(मुन्नी मोबाइल,तीसरी ताली,देश भीतर देश,और सिर्फ तितली) की ही तरह इस उपन्यास में पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।प्रदीप सौरभ ने अपने इस उपन्यास के भी सभी किरदारों से मुलाक़ात कर उनसे बातचीत करके उनकी पूरी गाथा को निकाला है।उनके पात्रों का सृजन कहीं सुनी सुनाई या पढ़ी गयी बातों के आधार पर नहीं हुआ है।यही कारण है की इस उपन्यास को पढ़ते हुए दृष्टि विहीनों की दुनिया से गुजरते हुए हमें महसूस  होता है कि क्या हमारे समाज में ऐसा भी हो रहा है।क्योंकि हमने या कह सकते हैं कि हमारे समाज के सामान्य व्यक्ति ने कभी अंधों की उस दुनिया में झांकने या पहुँचने की कोशिश ही नहीं की है।हमारे लिए तो अंधे व्यक्ति का मतलब बस सूरदास---गा बजा कर कमाने वाला व्यक्ति या फिर सड़क पर भीख माँगने वाला एक भिखारी है।इससे अधिक हमारे समाज का आदमी उनके बारे में कुछ सोचता ही नहीं है।वह कभी नहीं जानना चाहता कि हमारी दुनिया के बारे में दृष्टि विहीनों की क्या सोच है?उनके अपने अंधेरों में वो किन रंगों को देखते और महसूस करते हैं।समाज से उपेक्षित ये दृष्टि विहीन या अंधे लोग अपनी अंधेरी दुनिया को कैसे किस शक्ति से रोशनी में बदलने की कोशिश करते हैं।उनके अन्दर क्या भावनाएं कुलबुलाती रहती हैं?वो समाज से हर पल मिलने वाली उपेक्षाओं तिरस्कारों से किस तरह दिन-रात संघर्ष करते हैं।समाज की इस उपेक्षा को हम इसी उपन्यास की एक प्रमुख पात्र पार्वती के साथ घटी एक छोटी सी घटना में देख सकते हैं।“पार्वती में गेट के बाहर आकर जमीन पर अपनी स्टिक(अंधों की लाइफ लाइन)पटक रही थी,ताकि कोई सड़क पार करने में उसकी मदद के लिए आ जाय।ब्लाइंड इस तरह लोगों का अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं।तभी उसे अहसास हुआ कि कोई उसके पास खड़ा है।पार्वती ने उससे पूछा,“सर क्या रोड पार करा देंगे?”

“करा तो सकते हैं लेकिन कराऊँगा नहीं।”उस व्यक्ति ने हिकारत के भाव से जवाब दिया।‘ईश्वर ने तुम्हारे पाप के कारण तुम्हें अंधा बनाया है।रोड पार कराकर तेरा पाप तो मैं अपने सर पर लूंगा नहीं।”( पृष्ठ-21)

       


             इतना ही नहीं हमारे समाज में इस तिरस्कार और उपेक्षा की शुरुआत बच्चे के पैदा होने पर उसके अंधे होने की बात पता लगते ही हो जाती है।अक्सर मां-बाप उसे या तो किसी मंदिर के बाहर छोड़ आते हैं,या किसी अंधेरी रात में सोते  भिखारियों के बीच छोड़ आते हैं।जिससे कि वह मासूम बाक़ी का पूरा जीवन उन्हीं भिखारियों की तरह भीख मांग कर गुजार दे।क्योंकि उस अंधे बच्चे को जीवन भर सम्हालेगा कौन?बचपन की इसी हिकारत का शिकार इसी उपन्यास का पात्र महेश भी हुआ।-----“आँखों के डाक्टर ने बताया की उसका कार्निया जन्म से ही डैमेज है।उसे अब ठीक भी नहीं किया जा सकता है।बच्चे के अंधे होने की बात सुनकर पूरे परिवार को जैसे सांप सूँघ गया।इस जानकारी के बाद उसका लाड़-प्यार सब कम होने लगा।बात जब उसका नाम रखने की आई थी तो उसके पिता ने बेरुखी से कहा था कि इसका नाम सूरदास रख दो।इस बात का उसकी मौसी ने बहुत विरोध किया था।उनके इस विरोध का नतीजा ही था कि अंततः उसका नाम महेश तय कर दिया गया।महेश तनेजा।”(पृष्ठ-9-10)

    


                                    पच्चीस अध्यायों में विभक्त इस उपन्यास की कहानी---महेश,पार्वती,गुंजन,मनीष,प्रताप, नितिन,राजेश ठाकुर,शिवतेज,सोनी गिल,मुकेश सक्सेना,पल्लवी,महेश तनेजा,सुरेश सरीन, बाबुल,कोयल,विवेक आदि पात्रों के इर्द गिर्द बुनी गयी है।जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि इन सभी पात्रों की अपनी अलग-अलग कहानियां हैं ।और सभी की कहानी आपस में एक दूसरे से लिंक्ड भी हैं।महेश जन्मांध है और अपने परिवार की घोर उपेक्षा का शिकार होकर अपनी मौसी के घर रहने को मजबूर था।महेश की मौसी ने ही उसका ब्लाइंड स्कूल में एडमिशन करवा कर उसकी पढाई लिखाई की व्यवस्था की।पार्वती जन्मांध नहीं थी।उसकी आंख बचपन में करेंट लगाने की एक दुर्घटना में चली गयी थी।लेकिन वो अपनी मेहनत और लगन की बदौलत दिल्ली में जे एन यू  से एम् फिल करने पहुँच गयी थी।इसी तरह बहुत बड़े घर की बेटी सोनी गिल अपने साईटेड पति पंकज से अलग होकर ब्लाइंड तलाकशुदा औरतों का हास्टल चलाती है।लेकिन उसका दुर्भाग्य ---उसका बहुत ही धूर्त और चालाक मैनेजर सोनी गिल की गैर मौजूदगी में उस हास्टल को एकदम चकलाघर में तब्दील कर देता है।–अंततः पुलिस रेड के बाद उसका वह हास्टल भी बंद हो जाता है।इसी तरह सुरेश सरीन ने खुद को अंधों के लिए काम करने के लिए सपर्पित कर दिया।मस्जिद में मौलवी साहब के साथ रहने वाला शिवतेज की अपनी अलग व्यथा कथा है।वह अंधा होने के कारण अपने ही भाई द्वारा सारी जमीन हडप कर घर से निकाल दिए जाने जैसी घटना का शिकार हुआ।लेकिन मौलवी साहब की कृपा  से पढ़ लिख कर इस योग्य हो सका की एक स्कूल में शिक्षक का काम करके कमाई करके गाँव जाकर भाई से जमीन वापस लेकर उसे ही भीख के रूप  में देकर वापस लौट आता है। ----इनके अलावा भी महेश तनेजा,मुकेश सक्सेना,पल्लवी,तिलक ब्रिज पर रहने वाला अंधा परिवार सभी कहीं न कहीं अपने अपने जीवन संघर्षों,उठा-पटक के बीच खुद को स्थापित करने का प्रयास करते दिखते हैं।                                      

              


          उपन्यास के इन सभी पात्रों में कुछ बातें तो एक सामान  रूप से दिखती है---सभी जीवन के प्रति संघर्षरत हैं।सभी घोर सामाजिक,पारिवारिक उपेक्षाओं के शिकार हैं।सभी अपने अपने घोर अंधकारों के बीच कहीं न कहीं से एक रोशनी की किरण को तलाश रहे हैं जो शायद उनके जीवन के इन अंधेरों को दूर कर सके।और सभी के अन्दर इन संघर्षों,जीवन की लालसाओं के बावजूद एक असीम पीड़ा का भाव भी दिखता है जो उनके अन्दर  समाज से मिली उपेक्षाओं,समाज से मिली कटुताओं के कारण पैदा हुआ है। 

    

            लेकिन इस उपन्यास को पढ़ते समय कहीं भी आपको यह नहीं महसूस होता है कि इन पात्रों का सृजन लेखक ने किसी कल्पना के आधार पर किया है।क्योंकि इन दृष्टि बाधितों के रहन-सहन,बातचीत,उठने-बैठने,उनकी दिनचर्याओं,जीवन की घटनाओं को बिना उनसे घुले-मिले,बिना उनका सूक्ष्म अध्ययन किये लिखना संभव ही नहीं है।इस दृष्टि से भी यह उपन्यास अपने आप में एकदम अलग कहा जा सकता है।

    

        इस पूरे उपन्यास में दृष्टि बाधितों के जीवन के साथ ही उनकी सहायता सुविधा के नाम पर हमारे देश भर में चल रहे एन जी ओ,अंधों के स्कूल कालेजों,होस्टल्स में चल रही लूट का भी खुलासा किया गया है।साथ ही वहां इन दृष्टि विहीनों के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक,यौनाचार,उपेक्षा की भी पूरी पड़ताल की गई है।सोनी गिल द्वारा शुरू किये गए अंधी तलाकशुदा महिलाओं के हास्टल को वहां के मैनेजर द्वारा चकलाघर में तब्दील कर देना---यह हमारी व्यवस्था का एक बदरंग चेहरा है।

        

                

      प्रदीप सौरभ के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वो अपनी कृति के मूल विषय के साथ ही देश,समाज की परिस्थितियों पर भी पूरी दृष्टि डालते हैं।इस उपन्यास में भी जे एन यू और जामिया मिलिया में चल रही राजनीति,उठा पटक को बहुत ही बेबाक ढंग से लिखना प्रदीप सौरभ के ही वश की बात थी।जे एन यू कैम्पस में विद्यार्थी परिषद् के गुंडों द्वारा किस कदर तांडव मचाया गया यह भी इस उपन्यास में आप देख सकते हैं।उन गुंडों की क्रूरता और आक्रामकता का अंदाजा आप इसी घटना से लगा सकते हैं कि पार्वती द्वारा यह बताने पर भी कि वो अंधी है—उसे भी एक नकाबपोश लड़की ने डंडों से पीटा और उसका सर तक फोड़ दिया।लेकिन ये घटनाएं या उनका वर्णन मुख्य कथानक से कहीं अलग नहीं दिखते बल्कि उपन्यास को और सार्थक बनाते है।

  


               पूरे उपन्यास को पढ़ कर एक बात साफ़ तौर पर उभर कर आती है—वो यह कि हमें यानि हमारे इस पूरे समाज को यह जानना होगा कि इन दृष्टि बाधितों के अन्दर भी हमारी तरह ही एक दिल धड़कता है।उसमें भी भावनाएं होती हैं।उसमें भी संवेदनाएं पनपती हैं।हमारी ही तरह उनकी भी शारीरीक जरूरतें होती हैं।वो भी प्यार करना और प्यार पाना चाहते हैं।उनके अन्दर भी यौन इच्छाएँ होती हैं।उनमें भी धूर्तता,मक्कारी,इर्ष्या,द्वेष, जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ होती हैं।---उनमें और हममें बस फर्क इतना ही है कि हमारी दुनिया रंगों से भरपूर है।हम देख सकते हैं।और उनकी दुनिया बिलकुल अंधेरी---स्याह और रोशनी से विहीन है।लेकिन वो इस कमी को स्पर्श,ध्वनि,शब्दों,आहटों,सूंघने जैसी शक्तियों से पूरा करते हैं।----उन्हें हमारे इस समाज से दया की नहीं बराबरी तक पहुंचाने की दरकार है,उन्हें हमारी उपेक्षा,घृणा नहीं हमारे सहारे की जरूरत है।और समाज से यही कहना या बताना इस पूरे उपन्यास और लेखक का मंतव्य भी है।



                                  ००००००



समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार                  

                 

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हमारे विकास के तीन दशकों का जीवंत दस्तावेज----“मुन्नी मोबाइल”

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010


पुस्तक:मुन्नी मोबाइल
लेखक:प्रदीप सौरभ
  प्रकाशक:वाणी प्रकाशन
 4695,21-ए,दरियागंज,
नई दिल्ली-110002
                                                                                                                                                                       मुन्नी मोबाइल नाम किसी फ़िल्म या टी0वी0 सीरियल का नहीं बल्कि प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक प्रदीप सौरभ के हाल में ही प्रकाशित उपन्यास का है। यह उपन्यास मैनें पिछले पन्द्रह दिनों में तीन बार पढ़ा है। और हर बार इसमें मुझे प्रदीप सौरभ की कलम का एक नया रूप दिखाई पड़ा है।                            
              दरअस्ल यह उपन्यास मात्र एक उपन्यास न होकर हमारे देश में पिछले तीन दशकों में हुये भौतिकता के अन्धाधुन्ध विकास का प्रामाणिक दस्तावेज कहा जा सकता है। मुन्नी नाम की काम वाली और उसका नया मोबाइल---ये तो माध्यम मात्र हैं।
         उपन्यास के मुख्य पात्र तो पत्रकार आनन्द भारती और मुन्नी मोबाइल हैं। उपन्यास का पूरा ताना बाना पत्रकार आनन्द भारती और उनके घर में काम करने वाली बिन्दू यादव उर्फ़ मुन्नी मोबाइल के इर्द गिर्द बुना गया है। आनन्द भारती एक तेज तर्रार और गंभीर पत्रकार हैं। जो मन में ठान लिया उसे पूरा करना उनके जीवन का मकसद बन जाता है।
        मुन्नी मोबाइल है तो घरों में काम करने वाली---बिहार से आकर दिल्ली के साहिबाबाद में बसी हुयी एक साधारण नौकरानी लेकिन उसके चरित्र का भी एक विशिष्ट पहलू है। वह है उसके अंदर की दबंगता और महत्वाकांक्षा। एक आम आदमी की ही तरह उसकी भी इच्छा थी कि उसकी बेटियां पढ़ लिख कर साहब बन जायं। उन्हें लोगों के घरों में बर्तन चौका न करना पड़े। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये मुन्नी मोबाइल ने जो सफ़र पत्रकार आनन्द भारती के घर से शुरू किया वो काम वालियों की यूनियन,साहिबाबद के चौधरियों से पंगा,डाक्टरनी के साथ नर्सिंग के अवैध धन्धों,गाजियाबाद और पहाड़गंज रूट की बसों के फ़र्राटा भरते पहियों के साथ चलता हुआ अन्त में कालगर्ल्स के रैकेट और मुन्नी मोबाइल के मर्डर के साथ पूरा होता है।
                 ध्यान देने वाली बात यह है कि जब मुन्नी मोबाइल बस चलाने वाले ठेकेदारों के अड्डे पर जाकर सीधे उनसे कहती है कि मेरा नाम मुन्नी मोबाइल है और बिहार की रहने वाली हूं।मैं किसी से डरती नहीं हूं। आप अपना काम करो और मुझे अपनी बस चलाने दो। तो यह संवाद सिर्फ़ मुन्नी का नहीं रह जाता ।यहां मुन्नी के माध्यम से प्रदीप सौरभ ने बस ठेकेदारों को उस तबके से चेतावनी दिलवायी है जो हमेशा से दबाया जाता रहा है। जो भारत के दूर दराज के गांवों से भागकर महानगरों में सिर्फ़ इस लिये आता है कि ---इन महानगरों में शायद उसका भाग्य उसे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करवा देगा। लेकिन यहां भी पहले से काबिज रसूखदार ऐसे लोगों को पनपने का मौका नहीं देते।
                      मुन्नी मोबाइल के माध्यम से जहां एक वर्ग विशेष कि गाथा लिखी गयी है वहीं लेखक ने हमारे देश में पिछले तीन चार दशकों में हुये परिवर्तनों ,बदलावों ,भौतिकतावाद की चपेट में आते जा रहे सम्पूर्ण देश,मोबाइल क्रान्ति,कालसेण्टरों के भयावह सच के साथ ही राजनीति में जाति,धर्म,और नारों के साथ जनता की भावनाओं के साथ खेले जा रहे भयावह खेल के सच की एक एक परतों को भी बहुत सच्चाई और निष्पक्षता के साथ उधेड़ा है।
        उपन्यास की शुरुआत से ही पता चल जाता है कि आनन्द भारती किस मिट्टी के बने पत्रकार हैं। वह एक तेज तर्रार और गंभीर पत्रकार हैं। जो मन में ठान लिया उसे पूरा करना उनके जीवन का मकसद बन जाता है। कभी किसी किस्म का समझौता करके जीवन बिताना उन्हें पसन्द नहीं। और उनकी इसी दृढ़ता का परिणाम उन्हें गुजरात में भुगतना पड़ा। ----मोदी को जीत का नशा था। हिन्दू ब्रिगेड भी नशे में चूर थी। चुन चुन कर विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा था। मीडिया पहले निशाने पर था। आनंद भारती पर भी हमला हुआ। उन्हें कार से उतार कर पानी से नहलाया गया। पानी के प्लास्टिक पाउचों से मारा गया।फ़िर छोड़ दिया गया। एक बार फ़िर इस हमले में उन्हें भारत माता की जय बोलने के लिये मजबूर किया गया।
                       और यह परिणाम भुगतना पड़ता है आनद भारती को दंगों की आग में जल रहे गुजरात की आंखों देखी,नंगी और भयावह सच्चाई को अखबार में लिख कर आम जनता को पढ़वाने की सजा के रूप में। नरेन्द्र मोदी और उनकी हिन्दू ब्रिगेड को जनता के सामने बिल्कुल नंगा कर देने के एवज में। मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जीवन की इन सच्चाइयों को उपन्यास में लिखना प्रदीप सौरभ के ही बूते की बात है।
             उपन्यास में हमें आनन्द भारती के तेज तर्रार,खुर्रैट, गम्भीर रूप के साथ ही एक बेहद संवेद्नशील और भावुक हृदय भी देखने को मिलता है जो सिर्फ़ मानसी के लिये सोचता है। इस दिल में हर वक्त हर समय आनन्द भारती के साथ मानसी बसती है। मानसी एक तरह से आनंद भारती के जीवन का प्रेरणा स्रोत भी है। जो हर उस मोड़ पर आनंद भारती के साथ है जब वो किसी अनिर्णय की स्थिति में होते हैं।
   उपन्यास की मुख्य चरित्र मुन्नी की कहानी के साथ ही कई अन्य प्रसंग भी साथ साथ चलते हैं जो उपन्यास को और अधिक रोचक,गतिशील और पठनीय बनाते हैं। आनंद भारती की लंदन यात्रा,पत्नी शिवानी से अलगाव,मानसी से इमोशनल अटैचमेण्ट,सुधा पाण्डेय के साथ कोलकाता यात्रा और आनंद भारती का इलाहाबाद से लगाव। ये प्रसंग उपन्यास की कथावस्तु से सीधे जुड़े न होकर भी उसे आगे बढ़ाने के साथ ही  उपन्यास की मूल कथा को समृद्ध करते हैं।
         मसलन आनंद भारती की लंदन यात्रा एक सम्पूर्ण लेखा जोखा है प्रवासी भारतीयों के मन का,उनके हालातों का और उनके अन्दर वतन से दूर रहने के दर्द का। अपनी जमीन से दूर रहने का यही दर्द,यही संवेदना हमें बार बार आनंद भारती की इलाहाबाद यात्राओं और प्रसंगों में दिखाई पड़ती है। इलाहाबाद के प्रति यह दर्द और संवेदना आनंद भारती का नहीं बल्कि प्रदीप सौरभ के साथ हर उस सर्जक मन का दर्द है जो रोजी रोटी की तलाश में इलाहाबाद से दूर पहुंच गया है। मैं खुद पिछले पच्चीस सालों से इलाहाबाद से दूर हूं और प्रदीप सौरभ की इस पीड़ा को समझ सकता हूं।
          कथानक के साथ ही अगर हम भाषा और शैली की बात करें तो मुन्नी मोबाइल अपने में एकदम अलग तरह का उपन्यास है।यह लीक से हट कर लिखा गया एक नया एक्स्पेरीमेण्ट कहा जा सकता है। इसे पढ़ते समय कभी आपको लगेगा कि हम किसी लेखक की डायरी का अंश पढ़ रहे हैं,कहीं लगेगा कि लेखक रिपोर्टिंग कर रहा है,भावुकता भरे क्षणों में आप इसे कविता के रूप में भी पायेंगे। और उपन्यास की शैली की यह विविधता स्वाभाविक भी है। क्योंकि प्रदीप सौरभ सबसे पहले कवि,फ़ोटोग्रैफ़र और पत्रकार हैं फ़िर उपन्यासकार। और उनका यह कवि,पत्रकार ,फ़ोटोग्रैफ़र और चित्रकार का रूप इस उपन्यास में हमें हर जगह परिलक्षित होता है।
                   कुल मिलाकर मैं  इतना दावे के साथ कहूंगा कि आपको भी अगर भारत के पिछले तीन दशकों के विकास के साथ ही भारतवर्ष में भगवा राजनीति और उसकी आड़ में जनता की भावनाओं,संवेदनाओं और अस्तित्व के साथ चल रहे खिलवाड़ को अगर नंगी सच्चाई के रूप में देखना है तो इस उपन्यास को एक बार जरूर पढ़ने की कोशिश करियेगा----आपको निराशा नहीं होगी।
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प्रदीप सौरभ: 
पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में   सहायक संपादक।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक।कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार। फ़िलहाल हिन्दुस्तान दिल्ली के संपादकीय विभाग में कार्यरत

हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित
             

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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