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यादें झीनी झीनी रे(आत्मीय संस्मरण)

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

(आज 31 जुलाई को मेरे पिता जी प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की पुण्य तिथि है।2016 की 31 जुलाई को ही 87 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था।इस बार कोरोना संकट को देखते हुए मैं उनकी स्मृति में कोई साहित्यिक आयोजन भी नहीं कर पा रहा।मेरे बड़े भाई तुल्य प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार आदरणीय कौशल पाण्डेय जी का यह बेहद आत्मीय संस्मरण ”बालवाटिका” के श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव पर केन्द्रित मार्च-2019 अंक में प्रकाशित हुआ था।आज इसे अपने ब्लॉग क्रिएटिवकोना पर मैं पुनः प्रकाशित कर रहा हूं।डा०हेमन्त कुमार)  

 



          यादें झीनी झीनी रे----



       

दिसंबर १९८५ के अंतिम सप्ताह की एक सर्द भारी शाममैं इलाहाबाद के अल्लापुर मोहल्ले की भूल-भुलैया जैसी गलियों में अपने एक मित्र के साथ एक पर्ची पर लिखे पते को तलाश रहा था।उस पर लिखा था श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव,90-ए/17एस,बाघम्बरी गद्दी के पीछे,(अल्लापुर)इलाहाबाद।और यह पर्ची देने वाले थे आकाशवाणी इलाहाबाद में मेरे सहयोगी राम पाण्डेय।दरअसल मुझे आकाशवाणी इलाहबाद में ज्वाइन किये करीब एक वर्ष हो चुका था,पर जिस घर में मैं किराए पर रह रहा था वह काफी बंद-बंद सा था।मुझे एक ऐसे घर की तलाश थी जहां हवा और धूप का खुलकर सेवन कर सकूं।यह बात जब मैंने अपने सहयोगी राम पाण्डेय को बताई तो राम पाण्डेय ने मुझसे एक दिन कहा कि, “मैं एक घर का पता दे रहा आप जा कर देख लीजिये।”बस मैं मकान की खोज में निकल पड़ा था।बेतरतीब नंबरों वाले मोहल्ले में भी नाम बताने पर घर आसानी से मिल गया।दरवाजा खटखटाया तो अन्दर से एक दुबले पतले और थोड़ा लम्बे व्यक्ति ने जब दरवाजा खोला तो मैंने अपनी बात बताई।वह श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव से मेरी पहली मुलाक़ात थी।उन्होंने घर का वह ऊपरी हिस्सा दिखाया जो उन्हें किराए पर देना था।चाय पिलाई और अपने परिवार के बारे में बताया तथा मेरे परिवार के बारे में जानकारी ली।साथ ही एक दिन सोचने का मौक़ा भी माँगा। संभवतः वह राम पाण्डेय से मेरे बारे में और विस्तार से जानना चाहते होंगे।अगले ही दिन वह सुबह-सुबह राम पाण्डेय से घर पर मिलते हुए बाद में मेरे पास दफ्तर आये और बोले कि, “आप जिस दिन चाहें सामान लेकर रहने आ जाएं।”

   अगले दिन मैं पत्नी और बच्चों को घर दिखाने ले गया।पत्नी की ओर से थोड़ी ना-नुकुर हुई कि घर मुख्य सड़क से काफी अन्दर है।अंततःघर का खुलापन और घर के लोगों का सरल स्वभाव इस एक पर भारी पड़ा और हम लोग एक सप्ताह बाद ही वहां शिफ्ट हो गए।5,जनवरी 1986 को मेरा इलाहाबाद का स्थानीय पता हो गया---श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का मकान,बाघम्बरी गद्दी के पीछे...जो कि मेरे इलाहाबाद छोड़ने तक बराबर बना रहा।यहाँ तक कि अगस्त-1990 में इलाहाबाद से मुंबई स्थानान्तरण के करीब दो वर्ष बाद तक भी।इस दौरान मैं मुंबई रहा और मेरा परिवार अकेले इलाहाबाद में।उन दिनों वो ऊ०प्र० सरकार के राज्य शिक्षा संस्थान में शोध प्राध्यापक थे और आकाशवाणी के नियमित नाटककार।बाद में पता चला कि उनके लेखन की शुरुआत पचास के दशक में ‘धर्मयुग’और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में कहानियां लिखने से हुयी थी।और फिर धीरे-धीरे यह भी पता चला कि वो जितने बड़े रेडियो नाटककार हैं उससे भी कहीं ज्यादा योगदान उनका बाल साहित्य लेखन में है।वो बहुत संकोची स्वभाव के थे।इसीलिए प्रायः अपने लेखन के बारे में चर्चा कम ही करते थे।लगभग तीन सौ रेडियो नाटक और पचास के करीब बाल साहित्य की पुस्तकें लिखने के बावजूद—मैंने कभी यह नहीं सुना या देखा कि उन्होंने कभी किसी से अपनी किताबों पर समीक्षा या चर्चा करने को कहा हो।रडियो की नौकरी के नाते मैं उन्हें केवल रेडियो नाटककार के रूप में ही जानता था।उनके तमाम नाटक आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण का हिस्सा रहे।सुप्रसिद्ध नाटककार और आकाशवाणी के तत्कालीन महानिदेशक स्व० जगदीश चन्द्र माथुर का वह पत्र भी मैंने उनकी पुरानी फ़ाइल में देखा जिसके द्वारा उन्होंने इनसे रेडियो के लिए लिखते रहने का अनुरोध किया था।

   उन्होंने शिक्षा विभाग में हिन्दी प्रवक्ता के रूप में नौकरी की शुरुआत की थी।बाद में 1964 में शिक्षा प्रसार विभाग में पहले प्रचार अधिकारी फिर पटकथा लेखक हुए।और करीब दो-ढाई सौ वृत्त चित्रों के लिए पटकथाएं लिखीं।सेवानिवृत्त होने के कुछ समय पहले वह प्राथमिक कक्षाओं की हिन्दी पाठ्य पुस्तकों के निर्माण कार्य से भी जुड़े थे।बाद में भी कई वर्षों तक वह इस कार्य से जुड़े रहे।

       उनकी देखा-देखी मैंने भी उन्हीं दिनों बच्चों के लिए लिखना शुरू किया।खूब बाल कवितायेँ लिखीं।मेरी कवितायेँ पराग,बाल भारती,बालहंस,दैनिक जागरण में खूब छपीं।उन्होंने मेरी हर कविता पढी,सराहा,पर कमी निकालने के भाव से या कभी संशोधन करने के लिए नहीं कहा।सच पूछा जाय तो मैं आज तक उन रिश्तों को कोई नाम नहीं दे पाया जो उनके घर में रहते हुए मेरे और उनके बीच तथा उनके घर के अन्य सदस्यों के बीच पनपे।अम्मा जी के सरल स्वभाव ने कभी भी हम दोनों को माँ,और बच्चों को दादी की कमी खलने नहीं दिया।अनायास ही मैं उस परिवार का सबसे बड़ा भाई बन गया।डा०मुकुल,डा०हेमन्त,डा०कविता और सबसे छोटी अलका सभी मेरे बच्चों के प्रिय चाचा और बुआ।और हम दोनों सबके भैया-भाभी।इन सभी की शादियों में सारे रीति-रिवाजों के साथ परिवार की तरह सहभागिता रही हम सभी की।

      घर में सब की ही तरह श्रीवास्तव जी को मैं भी भाई कहता था पर राय- मशविरे के समय वे मुझे सबसे करीबी मित्र की तरह काम आते थे। और किसी समस्या के समय पिता की ही तरह मैं उनका हाथ अपने कंधे पर रखा हुआ पाता था।अगस्त 1990 में उनके घर में रहते हुए मेरा स्थानान्तरण इलाहाबाद से मुंबई हो गया।मैं जाना नहीं चाहता था,पर काफी प्रयासों के बाद न तो मेरा स्थानान्तरण निरस्त हुआ और न ही स्थान बदला गया।मैं अकेले ही दुखी मन से मुम्बई गया।बच्चे बहुत छोटे थे।मुम्बई में परिवार रखने लायक आवास की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी।इसके करीब डेढ़-पौने दो बरस तक मेरा परिवार उन्हीं के घर में इलाहाबद में ही रहा।परिवार की देख-भाल के लिए मैं हर डेढ़-दो महीने पर इलाहाबाद आता था।कभी ऐसा नहीं हुआ कि वे मुझे स्कूटर से स्टेशन छोड़ने न गए हों।हर बार कंधे पर रखा उनके आश्वासन का हाथ मुझे मुम्बई में बराबर यह तसल्ली देता था कि इलाहाबाद में मेरे परिवार को कोई भी दिक्कत उनके रहते नहीं आयेगी।यह धर्म उनहोंने मेरी गैर मौजूदगी में हमेशा निभाया।अंततः जून 1992 में मैंने वह घर खाली कर दिया।

   बाद में 1996 से 2000 तक पुनः इलाहाबाद रहा पर अकेले ही।उनका बराबर आग्रह रहा कि मैं उनके घर कभी भी रहने आ सकता हूं।पर ऐसा हो नहीं पाया।हाँ ये जरूर है कि उनसे मेरा बराबर मिलना होता रहा।वो कभी आकाशवाणी में या कभी हमारे आफिस के आस-पास आते तो बिना मुझसे मिले न जाते।और मौक़ा मिलने पर मैं  भी भाई के घर पहुँच जाता।पर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि भोजन किये बिना उन्होंने मुझे वापस आने दिया हो।

   इलाहाबाद से दिल्ली और फिर पुणे रहते हुए मिलना तो कम रहा पर फोन पर खूब बातें होती थीं।अक्टूबर 2012 में अपने बड़े बेटे डा०मुकुल के रोड एक्सीडेंट में असामयिक निधन के बाद वो बिल्कुल टूट से गए थे।अम्मा जी का स्वास्थ्य भी काफी नाजुक स्थिति में आ गया।लगभग तीन साल तक बिस्तर पर रहने के बाद नवम्बर 2013 में अम्मा जी ने भी उनका साथ छोड़ दिया।भाई की मनःस्थिति भी अच्छी नहीं रही।पर इतने झंझावातों के बाद भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा।उस दौरान भी लेखकीय सक्रियता उन्हें बहुत बल दे रही थी।

   मैं भी मई 2013 में पुणे से गोरखपुर आ गया था।पर उन दिनों  मैं भी कुछ पारिवारिक समस्याओं से बुरी तरह घिरा था।अक्सर गोरखपुर से कानपुर आना-जाना होता ही था।कार से आने-जाने के कारण लखनऊ रुकना आसान होने लगा।दिसंबर 2012 से वो भी स्थाई रूप से छोटे बेटे डा० हेमन्त के पास लखनऊ में ही रहने लगे थे।अक्सर मैं लखनऊ में उनसे मिलते हुए ही गोरखपुर जाता ।उन्हीं दिनों 2012 में उनका बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” नेशनल बुक ट्रस्ट से छप कर आया था।मुझे उसकी प्रति भेट करके उन्होंने उपन्यास पढने का आग्रह किया।मुझे अच्छा लगा कि मैंने उसकी समीक्षा लिखी और वह एक अच्छी पत्रिका में छपी।बीमारी की हालत में भी मेरी समीक्षा पढ़कर वो फोन करके धन्यवाद देना न भूले।

    इस बीच मैं मार्च 2015 में ट्रांसफर होकर तीसरी बार फिर इलाहाबाद आ गया था।मेरी सिर्फ डेढ़ वर्ष की नौकरी बची थी।उधर वर्ष 2016 की शुरुआत से ही उनका स्वास्थ्य काफी गड़बड़ रहने लगा था।घुटनों की तकलीफ काफी बढ़ गयी थी।अब बिना वाकर की सहायता के उनका चलना-फिरना बहुत मुश्किल हो गया था।इस दशा में भी वो बच्चों की कहानियां लिखते रहे,और कुछ प्रकाशित भी हो रही थीं।दिसंबर 2012 में लखनऊ आने के बाद उनकी कुछ बाल कहानियाँ नंदन,बालवाणी,सुमन सौरभ,बाल भारती में छपीं भी।तीन चार बड़ों की कहानियां कथा-क्रम,जनसत्ता(दीपावली विशेषांक),चौथी  दृष्टि जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुयी थीं।उनकी लेखन ऊर्जा और सक्रियता देख कर बहुत खुशी होती थी।

    अचानक एक दिन मेरे पास उनका फोन आया।शायद 25जुलाई 2016 का दिन था वो।उस दिन मैं कानपुर में था।बहुत ही भावुक होकर निराशा भारी बातें करने लगे।मुझसे मिलने की इच्छा भी व्यक्त की।अगले दिन ही मैं सुबह-सुबह लखनऊ उनसे मिलने पहुँच गया।उस दिन उन्होंने मुझसे जी भर कर बातें की।खूब खुश हुए।सबका हाल पूछा।मेरा हाथ पकड़कर काफी देर बैठे थे।खुद भोजन नहीं किया पर मुझे भोजन करते देखते रहे,खुश होते रहे।फिर मिलने का वादा करके मैं भारी मन से कानपुर लौट आया।क्या पता था कि ये हम लोगों की आखिरी मुलाक़ात थी।

    31 जुलाई की रात्रि में डा०हेमन्त का फोन आया कि भाई नहीं रहे।अगले दिन वो उनका पार्थिव देह लेकर इलाहाबाद पहुंचेंगे।बहुत कष्टकारक बात ये हुयी कि डा०हेमन्त ने अपने जन्मदिवस यानि 1 अगस्त को ही अपने पिताश्री को मुखाग्नि दी।शायद ईश्वर को यही मंजूर था।अगस्त 2016की अंतिम तारीख को मेरी सेवानिवृत्ति भी हो गयी।

   कितनी विचित्र बात हुयी कि इलाहाबाद शहर से मेरा रिश्ता उन्हीं के साथ जुडा  और उनके जाने के साथ ही ख़त्म भी हो गया।

                    ०००००

० कौशल पाण्डेय


परिचय:जन्म 3 अगस्त 1956 अन्किन कानपुर।1977 से बच्चों एवं बड़ों के लिए भारत की स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में लेखन।प्रकाशित पुस्तकें: “जंगल की और”, “सोन मछरिया गहरा पानी”(बाल कवितायें), “पासा पलट गया”(बाल नाटक मराठी में भी अनूदित), “बाल साहित्यकार-कौशल पाण्डेय:सृजन और संवाद”, “शेष कुशल है”, “इतना छोटा सफ़र”(कहानी संग्रह), “प्रयोजनमूलक हिन्दी:विविध सन्दर्भ(संपादित लेख संग्रह)।देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से समादृत।सदस्य-,हिन्दी पाठ्यक्रम समिति (महाराष्ट्र सरकार)।34 वर्षों ताका आकाशवाणी में सहायक निदेशक राज  भाषा पद पर कार्य कर के सेवानिवृत्त।सम्प्रति स्वतन्त्र लेखन।      

संपर्क:1310-ए,बसंत विहार,कानपुर-208021 मोबाइल नंबर-9532455570          

                                          

               


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