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एक संवाद अपनी अम्मा से---।

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

 आज  मेरी अम्मा श्रीमती सरोजनी देवी श्रीवास्तव  की सातवीं पुण्य तिथि है।आज ही के दिन वो हम सभी को छोड़ कर अपनी अनंत ब्रह्माण्ड की यात्रा पर निकल गयी थीं।अम्मा आप भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हम सभी आपको हर वक्त अपने आस-पास महसूस करते हैं।आज उनके लिए लिखी गयी अपनी यह कविता प्रकाशित कर रहा



एक संवाद अपनी अम्मा से---।

श्रीमती सरोजनी देवी श्रीवास्तव


चाहता हूं


एक बार


बस एक बार मेरे हाथ


हो जाएं लम्बे


इतने लम्बे


जो पहुंच सकें दूर


नीले आसमान


और तारों के बीच से झांकते


आपके पैरों तक


अम्मा


और जैसे ही मैं स्पर्श करूं


आपके घुटनों को


सिर्फ़ एक बार आप


डांटें मुझे कि


बेवकूफ़ राम


चरणस्पर्श पंजों को छूकर


करते हैं


घुटनों को नहीं।


 अम्मा सुनिए


अक्सर भटकता हुआ मन


पहुंच जाता है


यादों की रसोई में


और हूक सी उठती है


दिल में


एक बार


पत्थर वाले कोयले


की दहकती भट्ठी के पास बैठूं


धीरे से आकर


डालूं कुछ तिनके भट्ठी में


आप मुझे डराएं चिमटा दिखा कर


प्यार से कहें


का हो तोहार मन पढ़ै में


ना लागत बा?


 

ज्यादा कुछ नहीं


सिर्फ़ एक बार


भट्ठी की आंच में


सिंकी


आलू भरी गरम रोटियां


और टमाटर की चटनी


यही तो मांग रहा।


 

वक्त फ़िसलता जा रहा


मुट्ठी से निकलती बालू सा


यादें झिंझोड़ती हैं


हम सभी को।


 

कहीं घर के किसी कोने में


कील पर टंगी सूप


उस पर चिपके चावल के दाने


कहते हैं सबसे


यहीं कहीं हैं अम्मा


उन्हें नहीं पसन्द


सूप से बिना फ़टके


चावल यूं ही बीन देना।


 

अभी भी जब जाता हूं


घर तो


अनायास मंदिर के सामने


झुक जाता है मेरा सर


बावजूद इसके कि आपने


नास्तिक होने का ठप्पा


मेरे ऊपर लगा दिया था।


 

पर वहां भी आपके हाथो का स्पर्श


सर पर महसूस तो करता हूं


लेकिन दिखती तो वहां भी नहीं


आप अम्मा।


 

वैसे


एक राज की बात बताऊं अम्मा


बाथरूम के दरवाजे पर बंधी मोटी रस्सी


मैंने हटाई नहीं अभी तक


पिता जी के बार बार टोकने के


बावजूद


आखिर उसी रस्सी को पकड़ कर


आप उठेंगी न कमोड से।


 

अम्मा


आप जो भी कहें


नालायक


चण्डलवा


बदमाश


नास्तिक----


सब मंजूर है मुझे


पर एक बार


सिर्फ़ एक बार


खाना चाहता हूं


आपके हाथों की


सोंधी रोटी


बेसन की कतरी


एक हल्का थप्पड़


और चन्द मीठी झड़कियां।


सुन रही हैं न अम्मा।


000


डा0हेमन्त कुमार

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बेसिक शिक्षा के बढ़ते कदम---“उम्मीद के रंग”

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

  पुस्तक समीक्षा  


बेसिक शिक्षा के बढ़ते कदम---“उम्मीद के रंग”

                                                                             

                   “उम्मीद के रंग”




प्रकाशक

एकलव्य फाउंडेशन

जमानालाल बजाज परिसर

जाटखेड़ी,भोपाल(म०प्र०)

       प्राथमिक शिक्षा के विकास और सुधार की बुनियाद ही निरंतर किये जा रहे नए प्रयोगों और नवाचार पर टिकी है।हमारे देश भारत में भी जब हम आज़ादी के बाद से अब तक के प्राथमिक शिक्षा के परिदृश्य पर निगाह दौड़ाते हैं तो हमें इस दिशा में काफी कुछ सकारात्मक बदलाव साफ़ दिखाई पड़ते हैं।ख़ास तौर से जब हम सरकारी या परिषदीय विद्यालयों की बात करते हैं तो उनमें भी आज के परिदृश्य में काफी कुछ गुणात्मक बदलाव दिखाई पड़ेगा।चाहे वो स्कूल भवनों की बात हो,शिक्षा के स्तर की बात हो,सीखने-सिखाने की प्रक्रिया की बात हो,शिक्षकों-बच्चों के बीच के रिश्तों और व्यवहार की बात हो सभी में कुछ न कुछ सकारात्मक बदलाव आता दिखाई पड़ रहा है।हाँ ये बात जरूर है कि इस बदलाव की गति उतनी तेज नहीं है जितनी होनी चाहिए।लेकिन जो भी बदलाव आया है वह हमारी प्राथमिक शिक्षा के सुनहले भविष्य की और संकेत करता है।

         

           

प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में यह जो सकारात्मक और गुणात्मक परिवर्तन आ रहा है इसके पीछे शिक्षा विभाग के कर्मठ और सृजनात्मक ऊर्जा वाले उच्च अधिकारियों का हाथ तो है ही।इसके साथ ही हमारे प्राथमिक विद्यालयों के उन मेहनती और अपने कार्य के प्रति समर्पित शिक्षकों का भी बहुत बड़ा हाथ है जो निरंतर अपने विद्यालयों की भौतिक और बौद्धिक स्थिति को सुधारने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं।

           

हमारे ऐसे ही कुछ चुनिन्दा शिक्षकों की लगन,मेहनत और खूबसूरत अनुभवों की कहानियों का संकलन है –“उम्मीद के रंग”।एकलव्य फाउन्डेशन,भोपाल द्वारा प्रकाशित “उम्मीद के रंग” किताब में बेसिक शिक्षा विभाग,उत्तर प्रदेश के उन विद्यालयों के शिक्षकों की सफलता की कहानियां संकलित हैं जिन विद्यालयों में जाना शिक्षकों को पसंद नहीं था।जहां जाते ही उनके सामने मुसीबतों के पहाड़ आ खड़े होते थे।जहां पहुँचने के रास्ते अत्यंत दुर्गम थे।जहां बच्चे भी नहीं आते थे।जहां पहुँचने के बाद अक्सर शिक्षक हिम्मत हार कर अपना तबादला करवा लेते थे।

                               

     ऐसे विद्यालयों में पहुँच कर इन शिक्षकों ने इन विद्यालयों की भौतिक सूरत को बदलना,बच्चों का नामांकन बढ़ाना,स्कूलों के प्रति अभिभावकों और ग्रामीणों की सोच को बदलना,सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में नए प्रयोग करके शिक्षण की घिसी-पिटी परिपाटी को तोड़ कर एक नवाचार की मिसाल कायम करना ही अपने जीवन और शिक्षक जीवन का लक्ष्य बना लिया है।

           

        

                                    “उम्मीद के रंग” किताब में प्राथमिक शिक्षा विभाग,उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत 24 शिक्षकों के संघर्ष,जद्दोजहद और सफलता की कहानियां उन्हीं  के द्वारा कलमबद्ध करके संकलित की गयी हैं।यह किताब बेसिक शिक्षा विभाग,उ०प्र० के ऊर्जावान और सृजनशील निदेशक डा0सर्वेन्द्र विक्रम सिंह की परिकल्पना और परिषदीय विद्यालयों के शिक्षकों के अन्दर एक नयी ऊर्जा और आत्मविश्वास भरने की वृहद् योजना का एक हिस्सा है।इस किताब के आमुख में ही डा0 सर्वेन्द्र जी ने लिखा है की “गत दो-तीन वर्षों में अनेक शिक्षकों द्वारा विद्यालयों में किये जा रहे प्रयासों,यथा—विद्यालय परिवेश को आकर्षक बनाना,छात्र नामांकन तथा उपस्थिति में वृद्धि,पाठ्य-सहगामी क्रिया-कलापों के संयोजन आदि से गुणात्मक परिवर्तन देखा जा रहा है।इसके दृष्टिगत यह अनुभव किया गया की यदि इन प्रयासों को उन्हीं शिक्षकों द्वारा लिपिबद्ध कराया जाय तथा उसे अन्य शिक्षकों के साथ साझा किया जाय तो इसके व्यापक परिणाम संभव होंगे।”

                              

यद्यपि शिक्षकों के इन अनुभवों और सफलता की कहानियां इसके पहले भी हमारे सामने आ चुकी हैं।राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान उत्तर प्रदेश ने पूरे प्रदेश के कई जिलों में घूम-घूम कर प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों की सफलता की कहानियों पर फ़िल्में बनाई हैं जो कि समय-समय पर लखनऊ दूरदर्शन से प्रसारित होने वाले शैक्षिक कार्यक्रम “दीक्षा” तथा सी0आई0ई0टी0,एन0सी0ई0 आर0टी0,नई दिल्ली द्वारा प्रसारित राष्ट्रीय शैक्षिक प्रसारण “ज्ञानदर्शन” में समय-समय पर प्रसारित होती रही हैं।इसके साथ ही प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी विभिन्न पत्रिकाओं “शिक्षा की बुनियाद”, “लर्निंग कर्व”(अजीम प्रेम जी फाउंडेशन,बैंगलोर), “शैक्षिक दखल”(पिथौरागढ़ उत्तराखंड से प्रकाशित),“शैक्षिक सन्दर्भ”(एकलव्य भोपाल”,“प्रारम्भ” (नालंदा,लखनऊ)में भी प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के अनुभवों और सफलता की कहानियां प्रकाशित हुई हैं।लेकिन ये कहानियां दूसरों द्वारा कही गयी हैं।शैक्षिक प्रसारणों में इनकी कहानी  प्रोड्यूसरों द्वारा बनायी गयी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाई गयी हैं तो पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ कहानियों दूसरे पेशेवर लेखकों,शिक्षाविदों द्वारा बताई गयी हैं।कुछ कहानियां इन पत्रिकाओं ने भी शिक्षकों से ही लिखवाई भी हैं।

                            

                  जबकि “उम्मीद के रंग” इन सबसे कुछ अलग हट कर है।इस किताब में शामिल हर शिक्षक खुद अपनी कहानी का लेखक है।और निश्चित रूप से किसी और के द्वारा बयान की गयी संघर्ष की कहानी और खुद शिक्षक द्वारा बताई गयी कहानी में बहुत बड़ा अंतर होगा ही।किसी और द्वारा सुनाई या लिखी गयी किसी शिक्षक की सफलता की कहानी में बहुत कुछ छूट जाने या बदल जाने का खतरा है।जबकि शिक्षक द्वारा लिखे शब्दों में इस बात की कोई गुंजाइश नहीं है।अपने संघर्षों,प्रयासों,और सफलता की कहानियों को शिक्षकों द्वारा खुद लिखने और एक पुस्तक के रूप में उनके प्रकाशन की यह कोशिश उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग की यह संभवतः पहली कोशिश है।

                                       

                       वैसे तो इस किताब में हर शिक्षक द्वारा बयान की गयी हर कहानी अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरक होने के साथ ही प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिए पठनीय है।लेकिन कुछ स्कूलों की कहानियां तो पढ़ कर बड़ा आश्चर्य होता है कि वहां की विषम  परिस्थितियों को बदलने के लिए शिक्षक ने कितनी मेहनत की।जैसे “स्पेलिंग गार्डन”(महेश चन्द्र),“विज्ञान क्या किसी आदमी का नाम है?”(वर्षा श्रीवास्तव),“बैलगाड़ी में बच्चे”(सुमन), “तराई में एक दोस्त पुस्तकालय”(जय शेखर)।सबसे सुखद तो “न पूछे गए सवालों के जवाब”(जैतून जिया) पढ़ते समय तो ऐसा लगा जैसे शिक्षिका ने बच्चों को शान्ति निकेतन पहुंचा दिया हो।इसी तरह “स्पेलिंग गार्डन” पढ़ कर हम कल्पना कर सकते हैं उस कक्ष की जिसमें स्पेलिंग गार्डन बनाया गया होगा।जहां पहुँच कर हर बच्चा शिक्षक के निर्देशों और अपने खुद के प्रयासों द्वारा बनाए गए उस अद्भुत शब्दकोष के बगीचे में पहुच कर अपने द्वारा लगायी गयी वस्तुओं के अंग्रेजी नाम और स्पेलिंग समझ सकेगा।

                                      

इस किताब में शामिल सभी लेखक शिक्षकों-–आसिया फारुकी,वीरेन्द्र कुमार शुक्ल, डा०कौसर जहां,राखाराम गुप्ता,सदाशिव तिवारी,सुनील सिंह,सुमन,अंजू जायसवाल,सर्वेष्ट मिश्रा,जैतून जिया,वर्षा श्रीवास्तव,महेश चन्द्र,जयशेखर,अनंत तिवारी,सपना सिंह,पूजा यादव,डा0रचना सिंह,श्वेता श्रीवास्तव,हृदयेश गोस्वामी,श्रीप्रकाश सिंह,रश्मि मिश्रा,आभा त्रिपाठी,गीता यादव,विवेक पाठक के प्रयास निश्चित ही पूरे प्रदेश ही नहीं देश के प्राथमिक शिक्षकों के लिए प्रेरणा बनेंगे।दोनों ही क्षेत्रों में—अपने स्कूलों को बेहतर बनाने की दिशा में और खुद अपनी कहानियां लिखने की दिशा में।यहाँ एक ख़ास बात मैं और लिखूँगा—कि मुझे इन सभी शिक्षकों की कहानियां पढ़ते समय ऐसा लग रहा था कि ये कहानियां एक अच्छे लेखक द्वारा लिखी गयी हैं।मतलब इन सभी शिक्षकों में लेखन कार्य से जुड़ने की भी काफी संभावनाएं दिख रही हैं।यदि इन्हें बराबर लिखने का समय और प्रकाशन का प्लेटफार्म मिले तो ये बहुत अच्छी रचनाएं भी समाज को दे सकेंगे।

                                       

                     इन सभी शिक्षकों की सफलता की कहानियों में जो सबसे बड़ा बिंदु है वो है उनके द्वारा गाँव की जनता,अभिभावकों और बच्चों को भी एक बेहतरीन स्कूली शिक्षा और खूबसूरत भविष्य के लिए मानसिक रूप से तैयार करना।और अपने विद्यालयों को सुसज्जित, खूबसूरत और बच्चों के मनोनुकूल बनाने के लिए करवाए गए सामूहिक और सामुदायिक प्रयास।जिसके बिना वो अपने विद्यालयों की सूरत बदल नहीं सकते थे।मुझे लगता है कि इन शिक्षकों की सफलता की कुछ कहानियों पर आधारित लघु फ़िल्में बनवा कर बेसिक शिक्षा विभाग उनके प्रसारण की व्यवस्था यदि करे तो संभवतः इन शिक्षकों के सफलता की ये कहानियां हमारे समाज के उस तबके की मानसिकता बदलने में भी कामयाब होंगी जो आज भी प्राइवेट स्कूलों के पीछे भागता है और जिसकी मानसिकता आज भी ये बनी है कि सरकारी स्कूलों या परिषदीय विद्यालयों में कुछ नहीं होता।कम से कम वो लोग भी देख सकेंगे कि आज परिषदीय विद्यालयों में भी शिक्षकों की मेहनत से उम्मीदों के जो रंग भरे जा रहे हैं।वो रंग हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को कितना खूबसूरत बना रहे हैं।

      

                                   इस किताब का खुबसूरत कवर और अन्दर बने सुन्दर चित्र इसे और पठनीय बनाते हैं।पुस्तक से जुड़ी पूरी टीम को हार्दिक बधाई।


००००



समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार


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पिन होल कैमरे से डिजिटल कैमरों तक की अनोखी यात्रा

बुधवार, 19 अगस्त 2020

(विश्व फोटोग्राफी दिवस पर विशेष)


पिन होल कैमरे से डिजिटल कैमरों तक की अनोखी यात्रा


डा0हेमन्त कुमार 

                                            


        आप जब भी कहीं अकेले,परिवार या मित्रों के साथ घूमने जाते हैं तमाम सुन्दर प्राकृतिक दृश्य देखते हैं।खूबसूरत पार्क,पक्षी,जीव-जंतु,ऐतिहासिक स्थल देखते हैं और उसकी सुन्दरता को फ़ौरन अपने मोबाइल या डिजिटल कैमरे में स्मृति के तौर पर सुरक्षित कर लेते हैं।कभी किसी शादी विवाह,सामाजिक समारोह में गए और वहां परिवार के कोई सदस्य वर्षों बाद मिले झट से अपना मोबाइल फोन निकाला और उनके साथ एक सेल्फी ले ली।मतलब आज कितना आसान हो गया है फोटो खींचना,खिंचवाना,उसे फ़ौरन देखना और अपनी डिवाइस(मोबाइल या कंप्यूटर) में उसे सुरक्षित कर लेना।ये सब आज के डिजिटल कैमरों, मोबाइल्स और डिजिटल तकनीक का ही तो कमाल है।

    लेकिन अगर हम आप आज से लगभग ढाई से तीन दशक पहले के समय पर निगाह डालें यानि लगभग 1990 के आस-पास।तो क्या उस समय भी फोटो खींचना इतना आसान था जितना आज है?इसका सीधा सा उत्तर है नहीं।क्योंकि उस समय फोटोग्राफी एक बहुत महँगा शौक था।फिल्म वाले कैमरे इस्तेमाल होते थे जिनमें फिल्म लगती थी।कैमरे भी हर किसी के पास नहीं थे।जिन लोगों के पास कैमरे थे भी तो वो उसमें फिल्म डलवाने,फिल्म लैब से डेवलप प्रिंट करवाने के खर्चों से बचने के लिए जल्दी कैमरों का इस्तेमाल नहीं करते थे।एक बात और भी थी कि अगर कोई व्यक्ति आज कैमरे से फोटो खींचता था या फिर स्टूडियो में खिंचवाता था तो उसे फोटो देखने का मौक़ा कम से कम एक सप्ताह बाद ही मिल पाता था।इन एक हफ़्तों में उसके सामने बड़ी असमंजस वाली या कह सकते हैं सस्पेंस की स्थितियां रहती थीं कि पता नहीं फोटो कैसी आई होगी।कहीं खराब बनी होगी तो पैसे बेकार जायेंगे वगैरह वगैरह।जबकि आज आप मोबाइल कैमरे से फोटो खींचते हैं और तुरंत देख भी लेते हैं।उसे किसी के पास भेजना हो तो भेज भी देते हैं या किसी सोशल साईट पर अपलोड भी कर देते हैं।प्रिंट करवाना हो तो किसी फोटो कलर लैब में अपने मोबाइल के मेमोरी कार्ड से फोटो लैब के कंप्यूटर में ट्रांसफर करवा कर प्रिंट करवा लेते हैं।पर क्या कभी आपने इस बात पर भी विचार किया है कि इन डिजिटल,मोबाइल या फिल्म वाले कैमरों का आकार प्रकार पहले कैसा था ? या पहली बार कैसे और किस कैमरे से फोटो खींची गयी थी ? चलिए हम आपको ले चलते हैं इन कैमरों के दादाओं पर दादाओं के पास और फोटोग्राफी के उन खोजकर्ताओं के पास जिनकी बदौलत हम आप आज इतनी आसानी से सुन्दर खूबसूरत तस्वीरें खींचते हैं।

         

सबसे पहले 965 से 1040 ई० के बीच अल्हाजेन ने लोगों को किसी दीवाल पर एक पिनहोल कैमरे के माध्यम से एक तस्वीर बना कर दिखाई।यह पहला कैमरा था जिसे कैमरा आब्स्क्युरा नाम दिया गया था।इसमें एक पिन के बराबर के छेद से रोशनी दीवाल या किसी दूसरी सतह पर आकर एक तस्वीर बनाती थी जो कि तुरंत हट भी जाती थी।फिर लोगों के ये कहने पर कि ऐसा कोई उपाय हो जिससे  ये तस्वीर वहां बनी रहे।1727 ई०में जर्मनी के एक रसायनशास्त्री जान शुल्ज ने ये खोज की कि अगर चाक,नाइट्रिक एसिड और चांदी को मिलाकर उस जगह पर लगा दें तो सूरज की रोशनी पड़ने से वहां बनी तस्वीर बाद में भी बनी रहेगी।इस घटना के लगभग 50 सालों बाद 1777 में स्वीडिश रसायनशास्त्री कार्ल शील ने उस रसायन में कुछ बदलाव कर उसमें अमोनिया मिलाकर उस तस्वीर को दीवाल या सतह पर स्थाई रूप से बनाने में सफलता हासिल की।

       इसके बाद कई देशों में कई वज्ञानिक इस दिशा में लगातार काम करते रहे।और आखिरकार फ्रांस के दो वैज्ञानिकों जोसेफ नाईसफोर और लुईस डॉगेर ने फोटोग्राफी की प्रक्रिया डोगोरोटाइप का आविष्कार करके 1826 में पहली फोटो खिंची।इसके लिए उन लोगों ने आब्स्क्युरा कैमरे का ही इस्तेमाल किया जिसमें उन्होंने चांदी और अन्य रसायन लगी एक बड़ी प्लेट लगाईं जिस पर फोटो बनी थी।लेकिन इस पहली फोटो को खींचने में उन्हें लगभग 8 घंटों का समय लगा था।और इस पहली फोटो में उन लोगों ने अपने कमरे की खिड़की के बाहर का दृश्य खींचा था।लेकिन फोटोग्राफी की इस प्रक्रिया में काफी समय लगता था।लोगों को फोटो देखने के लिए कई कई दिन इंतज़ार करना होता था।इसलिए इस लम्बे समय को कम करने की दिशा में भी दोनों वैज्ञानिकों ने काफी प्रयास किया।और 1832 में कुछ रसायनों के और इस्तेमाल के बाद उन्होंने एक दिन में फोटो तैयार करने में सफलता पाई।इस आविष्कार की घोषणा 19अगस्त1839 को फ्रांस सरकार ने आधिकारिक तौर पर की थी।इसीलिए19अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस पूरी दुनिया भर में मनाया जाता है।

  फोटोग्राफी को और बेहतर बनाने की दिशा में अब दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने काम करना शुरू कर दिया था।फोटो खींचने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले कैमरों के बड़े आकार और उसमें लगने वाली प्लेट्स के कारण अभी फोटोग्राफी सिर्फ बड़े,धनवान और अमीर लोगों के लिए ही संभव थी।इसी लिए दुनिया के वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को सरल बनाने और कैमरे का आकार छोटा करने की दिशा में काम कर रहे थे।

    इस बीच फोटोग्राफी की दिशा में स्काटलैंड के भौतिक शास्त्री क्लार्क मैक्सवेल ने एक और सफलता हासिल कर लीवो काफी लम्बे समय से रंगीन फोटो बनाने की दिशा में काम कर रहे थे।और अंततः उन्होंने सन 1861 में दुनिया की पहली रंगीन तस्वीर बनाने में सफलता हासिल की।यह तस्वीर एक फीते की थी जिसमें लाल,नीला और पीला रंग था।

  ये वो समय था जब दुनिया के हर कोने में फोटोग्राफी कला को और बेहतर बनाने के लिए नयी खोजें और प्रयोग हो रहे थे।एक तरफ वैज्ञानिक स्टिल फोटो को आम जन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे तो वहीँ कुछ वैज्ञानिक इन तस्वीरों को चलती फिरती आकृतियों या कहें फिल्म के रूप में प्रस्तुत करने के लिए काम कर रहे थे।इसकी शुरुआत एक स्टिल फोटोग्राफर एडवर्ड मुएब्रिज ने सन1872 में की थी।उन्हें दुनिया की पहली चलती फिरती तस्वीरों को खींचने में 6 साल का समय लगा था।उन्होंने घोड़ों के दौड़ने को कैमरे में कैद करने के लिए रेस ट्रैक पर 12 वायर कैमरे लगाये थे।आखिर एडवर्ड की मेहनत भी रंग लाई और वो 6 साल की मेहनत के बाद जमीन को छुए बगैर दौड़ते घोड़ों की तस्वीरें कैमरे में कैद करने में सफल रहे।इसे ही पहली मोशन पिक्चर भी कहा गया है।

      1870 के दशक में ही फोटोग्राफी की दिशा में एक और महत्वपूर्ण काम हुआ।यह काम किया रिचर्ड मैडाक्स ने।इन्होने पहली बार फोटोग्राफ को सुरक्षित रखने के लिए सूखी जिलेटिन की प्लेट्स का इस्तेमाल किया।इस प्लेट को अधिक समय तक सुरक्षित भी रखा जा सकता था।

         अभी तक फोटोग्राफी का शौक सिर्फ धनी और पेशेवरों के लिए ही था।लेकिन सन 1880 में जार्ज ईस्टमैन ने अमेरिका में कोडक नाम से एक कम्पनी बनाई।ईस्टमैन ने कैमरों में लगाने के लिए एक लचीली रोल फिल्म भी बनाई जिसे कैमरों में लगाना भी आसान था।इसी के बाद उन्हें कैमरा बनाने की भी अनुमति सरकारी तौर पर दी गयी।कोडक कंपनी ने इस दौरान लकड़ी का एक बाक्स कैमरा भी बनाया।जिसमें लगभग 100 तस्वीरें खींचने के लिए फिल्म लगी होती थी।ये कैमरा भी थोड़ा बड़ा था और इसमें सभी फोटो खींचने के बाद ग्राहक तस्वीरें बनाने के लिए पूरे कैमरे को ही कोडक कम्पनी में भेजता था।और उसे आगे फोटो खींचने के लिए लकड़ी का ही एक 100 फोटो खींचने वाला कैमरा दिया जाता था।फिर कुछ समय बाद पिछले कैमरे की तस्वीरें उसके पास आती थीं।

     

धीरे-धीरे कोडक कम्पनी ने भी अपने इस कैमरे में बदलाव किया और प्रसिद्ध कैमरा निर्माता फ्रैंक ब्राउनवेल से कह कर दुनिया का सबसे पहला छोटा कैमरा “कोडक ब्राऊनी” बनवाया जिससे एक छोटा बच्चा भी फोटो खींच सकता था।इसके बाद कोडक कंपनी लगातार अपने कैमरों को बेहतर बनाने की दिशा में और फिल्म को सुधारने की दिशा में काम करती रही।1930में कोडक ने अपनी पचासवीं वर्षगाँठ के  अवसर पर कोडक कैमरों के कई माडल बनाए।इतना ही नहीं “कोडक ब्राउनी” माडल के लगभग 5 लाख कैमरे बना कर एक फिल्म के साथ  उस साल12 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले सभी बच्चों को मुफ्त बांटा।एक तरह से देखा जाय तो कोडक कम्पनी फोटोग्राफी के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुयी।लेकिन अभी इन कैमरों में 6,8 या12 तस्वीरें लेने वाली वन ट्वेंटी साइज की बड़ी फिल्मों की रील लगती थी।

    1905 से1913 के बीच का भी समय फोटोग्राफी की दिशा में महत्वपूर्ण है।इस बीच बहुत सी कम्पनियां 35एम0एम0की छोटी फ़िल्में भी कैमरों के लिए बनाना शुरू कर चुकी थीं।और आस्कर बारनैक ने 1913 में 35एम0एम0 फिल्म वाला पहला कैमरा लाइका बनाया।पर विश्व युद्ध के कारण उन्हें अपना काम रोक देना पडा।और फिर 1925 में उन्होंने लिट्ज कैमरा कंपनी की और से लाइका कैमरा बाजार में उतारा।इसके बाद धीरे धीरे 35एम0एम0 फिल्म वाले कैमरों की ओर लोगों का आकर्षण बढ़ा और लोगों ने इनका इस्तेमाल शुरू किया।1936 में जापान की कंपनी “कैनन” ने अपना पहला रेंज फाइंडर कैमरा शुरू किया।

      फिर तो धीरे धीरे कैमरा बनाने वाली कंपनियों को पंख लग गए।रेंज फाइंडर कैमरों के बाद पहले टी0एल०आर० फिर एस0 एल0 आर०कैमरे बाजार में आने लगे।1936 से लगभग 1990 तक का लगभग 50 वर्षों का समय पूरी दुनिया में फोटोग्राफी कैमरों और फिल्मों की विकास का रहा है।इस दौरान रोलीफ्लेक्स,याशिका,निकान,कैनन,पेंटेक्स,मिनोल्टा जैसी कई बड़ी कंपनियों ने अपने कैमरों के बेहतरीन माडल्स बनाए।कैमरों के लिए ब्लैक एंड व्हाईट,कलर,गेवाकलर,अँधेरे में भी फोटो खींचने वाली फ़िल्में भी बनीं और पूरी दुनिया में फोटोग्राफी का बहुआयामी विकास होता गया।लेकिन सबसे बेहतरीन कैमरे बनाने के क्षेत्र में जापान सबसे आगे रहा।

                           

             कैमरों के इतिहास में अगर पोलोराइड कैमरे की चर्चा न हो तो बात अधूरी लगेगी।पोलोराइड वो कैमरा होता था जिसमें फिल्म की जगह केमिकल लगा फोटोग्राफी पेपर लगता था।और उसमें फोटो खींच कर 10 सेकेण्ड में ही कैमरे से बाहर आ जाती थी।हालांकिइस कैमरे की खोज एडविन ह्यूबर्ट लैंड ने 1947 में ही कर ली थी।पर वो कैमरा काफी वजनी था।इसके काफी बाद 1970 के आस-पास पहला हल्का पोलोराइड कैमरा बाजार में आया।इसका इस्तेमाल अक्सर स्टूडियो वाले ग्राहक को तुरंत फोटो देने के लिए करते थे या फिर शौकिया लोग इसका इस्तेमाल करते थे।2008 में कंपनी के बंद होने तक इन कैमरों का इस्तेमाल होता रहा।   

       फिल्म कैमरों के बाद फोटोग्राफी की दिशा में सबसे बड़ी छलांग डिजिटल युग में लगी।यद्यपि 1980 से 1990 के दशक में डिजिटल कैमरों को बनाने की दिशा में काफी काम हो रहा था।लेकिन पहला सफल डिजिटल कैमरा कोडक कंपनी ने 1991 में बनाया।बाद में दुनिया की बड़ी-बड़ी नामी गिरामी कंपनियों कैनन,निकान,पेंटेक्स,सोनी,मिनोल्टा आदि  ने भी डिजिटल कैमरे बनाने की दिशा में काम शुरू कर दिया।फिल्म कैमरों की ही तरह इन कैमरों में भी पहले रेंज फाइंडर कैमरे बाजार में आये फिर धीरे-धीरे डी0एस०एल०आर० का ज़माना आ गया।डिजिटल कैमरों की शुरुआत ने हर आम आदमी को भी फोटोग्राफर बना दिया।क्योंकि जो लोग कैमरे नहीं खरीद सकते उनके लिए मोबाइल कंपनियों ने मोबाइल में एक से एक गुणवत्ता और इफेक्ट्स वाले कैमरे लगाने  शुरू कर दिए हैं। 

            पहले जहां कैमरों में फिल्म लगती थी वहीं अब इन डिजिटल कैमरों में मेमोरी कार्ड लगने लगे।और इन कैमरों की फोटो की गुणवत्ता उनके पिक्सेल से आंकी जाती है।आज स्थिति यह है हर आम आदमी भी मोबाइल से फोटो खींचता नजर आ जाता है।आज हर आदमी के पास डिजिटल कैमरा भले ही न हो लेकिन एक अदद मोबाइल तो है ही।जिसमें डिजिटल कैमरा लगा हुआ है।अब ये बात अलग है की कौन कैसी फोटो खींचता है पर फोटो खींचता तो है।


     इस तरह फोटोग्राफी की दुनिया लगभग दो सौ सालों की यात्रा पूरी कर उस मुकाम पर पहुँच चुकी है जहां आज हर व्यक्ति को हर कदम पर फोटो की जरूरत है।चाहे वो परिचय-पत्र हो,वोटर आई0 डी0कार्ड,आधार कार्ड,राशन कार्ड,बैंक एकाउंट पासबुक,ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट,या अन्य कोई व्यक्तिगत कागजात।बिना फोटो के सब कुछ अधूरा है।

           ये तो हुयी लोगों के व्यक्तिगत जीवन में फोटो की उपयोगिता।आइये ज़रा देखें इस फोटोग्राफी का हमारे जीवन में और कहाँ कहाँ इस्तेमाल हो रहा ?अगर देश की बात करें तो हर वैज्ञानिक,औद्योगिक आविष्कारों में,अंतरिक्ष और वैज्ञानिक खोजों में,हमारे स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए होने वाले एक्स-रे,सी०टी0स्कैन,एम०आर०आई०में,हमारी सुरक्षा के लिए लगे सैनिकों के लिए नाईट विजन कैमरे.,टी0,वी०,पत्र-पत्रिकाओं और शिक्षा के क्षेत्र में ----कहाँ नहीं है फोटोग्राफी का उपयोग।

    एक बात और है कि ये कैमरा या मोबाइल कैमरा तो केवल एक फोटो खींचने की मशीन मात्र है।असली फोटो तो खींचता है दुनिया का सबसे बड़ा कंप्यूटर यानि आपका दिमाग। आपकी कल्पना शक्ति।किसी वस्तु या दृश्य को आप किस एंगिल से देखते हैं,किस लाईट में फोटो खींचते हैं,अपनी फोटो में किस वास्तु को शामिल करते या छोड़ते हैं ---इन सब बातों पर निर्भर करेगी आपकी या किसी छायाकार की फोटो की गुणवत्ता।आप भी चाहें तो एक कुशल फोटोग्राफर बन सकते हैं।बस जरूरत है आपके अन्दर कल्पनाशीलता,चीजों,दृश्यों को देखने की अपनी सोच,और फोटोग्राफी के प्रति समर्पण और जज्बा---ये सभी चीजें मिलकर आपको एक बेहतरीन छायाकार बना सकती हैं।तो सोच क्या रहे हैं--–उठाइये अपना मोबाइल कैमरा और शुरू हो जाइए दुनिया की खूबसूरती को अपने नजरिये से देखने के लिए।

                             ०००००


लेखक:डा0हेमन्त कुमार

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