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प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन के बहाने--समकालीन हिंदी बाल कविता का अवलोकन

सोमवार, 28 जून 2021

 

पुस्तक समीक्षा


प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन के बहाने--समकालीन हिंदी बाल कविता का अवलोकन



                         प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन


                       चयन एवं संपादन –दिविक रमेश


प्रकाशक-साहित्य अकादेमी 

पृष्ठ-706,मूल्य-रू-550/-

(पेपरबैक)प्रथम संस्करण-2020

                                          

               हिंदी बाल साहित्य के आज के सम्पूर्ण परिदृश्य को देखने पर एक बात बहुत साफ़ तौर पर नजर आती है-–वह है पूर्व में प्रकाशित और नए प्रकाशित हो रहे हिंदी बाल साहित्य की समीक्षा,शोध और मूल्यांकन की कमी।बाल साहित्य पर आलोचनात्मक और समीक्षात्मक किताबें कम लिखी जा रही हैं।बाल साहित्य पर शोध कार्य भी कम हो रहे हैं।हो भी रहे हैं तो बाल साहित्य की किसी विधा को लेकर,या उसकी सम्पूर्णता को लेकर नहीं बल्कि सिर्फ कुछ लेखकों पर केन्द्रित।चिंता का विषय यह भी है कि कुछ दिग्गज बाल साहित्यकार तो खुद अपने साहित्य पर ही शोध करवाकर उसे अपने ही खर्च से प्रकाशित भी करवा दे रहे हैं।इतना ही नहीं बाल साहित्य पर गंभीरता से सोच विचार करने वाले चिन्तक और लेखक भी कम ही हैं।

   

      


          इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है बाल साहित्य की हर विधा की रचनाओं का बिखराव।यहाँ बिखराव से मेरा तात्पर्य है बच्चों के लिए लिखी जा रही कहानियों,कविताओं,नाटकों या किसी भी विधा के साहित्य का एक जगह एकत्रित न हो पाना।दरअसल होता यह है कि जब भी कोई बाल साहित्य पर काम करने वाला शोधार्थी किसी विधा विशेष पर काम करना चाहता है तो उसे उस विधा की वो रचनाएँ तो मिल जाती हैं जो रचनाकारों के प्रयासों से पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन उसी विधा की ढेरों ऐसी सामग्री जो पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं उन तक वह शोधार्थी नहीं पहुँच पाता।और यह समस्या बाल कविताओं को लेकर कुछ ज्यादा ही है।

      

  


                    यहाँ अगर हम तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो संभवतः बाल साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा बाल कवितायें ही सबसे ज्यादा संख्या में लिखी जा रही और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो रही हैं।लेकिन दूसरी दिक्कत यह भी है कि बाल कविताओं के संग्रह का प्रकाशन भी सबसे ज्यादा कठिन काम है।सरकारी,स्वायत्तशाषी या पूर्णतः प्राइवेट प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित बाल साहित्य की तरफ अगर देखिये तो आपको सबसे अधिक संख्या कहानियों,उपन्यासों की मिलेगी।नाटकों,कविताओं की किताबें या संग्रह कम ही प्रकाशित हो रहे हैं।इनमें भी अच्छे बाल कविताओं के संग्रह तो संख्या में शायद सबसे कम प्रकाशित हो रहे।यद्यपि अगर हम बहुत से बाल साहित्यकारों और कवियों द्वारा लिखे गए और प्रकाशित ऐसे बाल कविता संकलनों को छोड़ दें जिनमें सिर्फ उन्हीं की रचनाएँ संकलित हैं तो ऐसे संग्रह या संकलन संख्या में कम और सिर्फ गिने चुने ही हैं जिनमें देश के प्रतिष्ठित बाल रचनाकारों की कविताएं संकलित हैं।यद्यपि इस दिशा में काम हुए हैं और अच्छे संकलन भी निकले हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है।हरिकृष्ण देवसरे द्वारा संपादित “बच्चों की सौ कवितायें”,जयप्रकाश भारती द्वारा संपादित “हिंदी की श्रेष्ठ बाल कवितायेँ”,“बचपन एक समंदर”(संपादक-कृष्ण शलभ),“प्रतिनिधि बालगीत”(सम्पा०डा0श्रीप्रसाद),“एक सौ इक्यावन बाल कवितायेँ”(सम्पा०-ज़ाकिर अली रजनीश),“चुने हुए बालगीत”-दो खंड(सम्पा०-रोहिताश्व अस्थाना),“बच्चों के प्रिय कवि”(सीरीज)-(सम्पा०-प्रकाश मनु),“इब्नबतूता का जूता”-(सम्पा०-प्रभाकिरण जैन)अथवा ऐसे ही कुछ गिने चुने संकलन और भी होंगे जिनमें बच्चों के लिए विभिन्न बाल साहित्यकारों द्वारा लिखे गए बहुत से बाल गीत संकलित हुए हैं।लेकिन इनकी संख्या इतनी नहीं है कि इनके आधार पर कोई शोधार्थी या बाल कविताओं पर काम करने वाला लेखक समीक्षक बाल कविताओं पर काम कर सके।और वह समकालीन बाल कविता के परिदृश्य का मूल्यांकन,आकलन कर सके।क्योंकि इनमें भी सबसे बड़ी समस्या यही है कि जिस समय ये संकलन तैयार होकर प्रकाशित हुए उस समय के बहुत से महत्वपूर्ण बाल कवियों की रचनाएं इनमें नहीं पहुँच सकीं।ऐसे में उन साहित्यकारों की बाल कवितायें अच्छी और महत्वपूर्ण होते हुए भी समीक्षकों,आलोचकों या बाल साहित्य का इतिहास लिखने वाले विद्वानों की नजर में नहीं आ सकीं।          

                

     अब इसके कारण खोजने पर तो बहुत से दिख जायेंगे।लेकिन उन कारणों पर यहाँ बात करना मेरा मकसद नहीं है।यहाँ एक बात और मैं कहना चाहूँगा कि कई बार ऐसा होता है कि बहुत से रचनाकारों की अच्छी बाल कवितायें सिर्फ किसी संकलन में न आने के कारण भी समीक्षकों,आलोचकों या शोधार्थियों की नज़रों में आने से छूट जाती हैं।और उनको कभी नोटिस में ही नहीं लिया जाता।न ही इतिहास में और न ही समीक्षकों के समीक्षात्मक लेखों में।

           


    इस दृष्टि से साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित और हिन्दी के वरिष्ठ कवि,आलोचक और बाल साहित्यकार दिविक रमेश जी द्वारा संपादित “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” एक बहुत सार्थक और महत्वपूर्ण किताब है।इस कविता संकलन के बारे में कुछ लिखने से पहले मैं हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी की एक बात उद्धृत करना चाहूँगा जो नरेश जी अक्सर मंचों पर कहा करते हैं।“एक सफल आलोचक,समीक्षक वही है जो किसी भी रचना,सृजन,काव्यकृति,पेंटिंग, या किसी भी क्रिएटिव रचना की सबसे पहले कोई एक विशेषता बता दे---फिर चाहे वह उस कृति की धज्जियां ही क्यों न उड़ा दे।और हर कृति रचना में कहीं न कहीं एक विशेषता या खूबी जरूर छुपी होती है।”

    


      मैं वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी के इस कथन से पूरी तरह से सहमत हूँ।और इस दृष्टि से अगर इस बाल कविता संचयन का विश्लेषण किया जाय तो इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें एक साथ वरिष्ठ और एकदम नवोदित रचनाकारों की रचनाएं एक साथ संकलित हैं।आमतौर पर होता यही है कि जब भी ऐसे किसी संकलन की बात आती है तो प्रायः सम्पादक या संकलनकर्ता उन्हीं रचनाकारों से संपर्क करने की कोशिश करते हैं जिनकी कवितायें पर्याप्त मात्रा में प्रकाशित हो चुकी हों या जो काफी चर्चित हो चुके हों।एकदम से नवोदित रचनाकारों की रचनाएं अच्छी श्रेष्ठ होते हुए भी वो संकलन में उन्हें लाने का खतरा नहीं उठाना चाहते।खतरा इस सन्दर्भ में कि आलोचकों,समीक्षकों द्वारा वरिष्ठतम रचनाकारों की कविताओं के साथ एकदम से नए रचनाकारों को भी संकलन में रखने के औचित्य पर उठने वाले सवालों का खतरा।

   


      इस दृष्टि से निश्चित रूप से इस संकलन के सम्पादक दिविक रमेश जी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इस संकलन में श्रीनाथ सिंह,द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,जयप्रकाश भारती,भवानी प्रसाद मिश्र जैसे दिग्गज साहित्यकारों के साथ ही सृष्टि पाण्डेय,नूरेनिशा,दिशा ग्रोवर,मोनिका अग्रवाल,रोचिका शर्मा जैसी एकदम नवोदित रचनाकारों की कवितायें शामिल करने का खतरा उठाया है।इस सन्दर्भ में दिविक जी ने इस संकलन के सम्पादकीय में लिखा भी है कि—“नामी रचनाकारों के नामों की महिमा मात्र के स्थान पर उनकी रचनाओं को खंगालकर मतलब की रचनाओं को ही चुनने और फिलहाल कम जाने,अपरिचित और नए से नए रचनाकार की भी रचनाओं से भरसक पूरी तरह गुजरते हुए उचित रचनाओं के चयन की चुनौती को स्वीकार करने का संकल्प लिया।इस क्रम में किसी रचनाकार के रह जाने या उसकी तथाकथित प्रचलित रचना के छूट जाने की चुनौती थी।वस्तुतः कहीं न कहीं मन में अधिक से अधिक नए रचनाकारों और उनकी सुयोग्य रचनाओं को स्थान देने की प्रबल इच्छा मन में थी ताकि बाल साहित्य के वर्तमान परिदृश्य के बारे में आकलन हो सके कि वह कितना समृद्ध है अथवा कितना कमजोर है।”(पृष्ठ-5)

   


      बाल कविता के वर्तमान परिदृश्य को जानने समझने के लिए दिविक रमेश जी का नये रचनाकारों के प्रति यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से सराहनीय कदम है।क्योंकि बाल साहित्य की किसी भी विधा में जब भी ऐसे संकलनों को किसी बड़ी प्रतिष्ठित संस्था द्वारा प्रकाशित करने की योजना बनती है तो अक्सर संकलनकर्ता या सम्पादक का यही प्रयास रहता है कि वह उस संकलन को बेहतर बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा बहु-प्रतिष्ठित,बहु-चर्चित रचनाकारों की ही रचनाएँ शामिल करें ताकि उस भारी-भरकम संकलन को अधिक से अधिक प्रतिष्ठा मिले।लेकिन उस वक्त संभवतः वो इस बात की तरफ ध्यान नहीं देते कि जिस संकलन को वो तैयार करने जा रहे वह उनके समसामयिक बाल साहित्य को प्रतिबिंबित भी करेगा।वो संकलन बाल साहित्य के इतिहास में भी दर्ज होगा।और भविष्य में उस संकलन के माध्यम से शोधार्थी,बाल साहित्य के अध्ययनकर्ता तत्कालीन बाल साहित्य का आकलन मूल्यांकन भी करेंगे।इसलिए उसमें निश्चित रूप से बहुत प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ ही उन रचनाकारों को भी स्थान देना चाहिए जिन्होंने अभी पिछले पांच-सात सालों से ही बाल साहित्य की और कदम बढ़ाया है।जिनकी अभी बहुत कम रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुयी हैं।इस दृष्टि से भी यह संकलन बाल साहित्य में एक बेहतरीन काम है।

  


        एक बात और जो इस संकलन को बेहद महत्वपूर्ण बनाता है वह है विषयों की विविधता और संकलित रचनाओं का नयापन।संकलन में एक तरफ प्रकृति के विविध रंग हैं,पेड़,पौधे,फूल,बादल,पहाड़,नदियाँ और सागर हैं तो दूसरी और चिड़ियों,पाखियों और अन्य जीवों की बातें हैं।मनुष्य जीवन के विविध रंग हैं तो बच्चों की किलकारियां और खिलौने भी हैं।यातायात के विभिन्न साधन ट्रेन,बस,साइकिल,रिक्शा, बैलगाड़ी है तो ऊपर उड़ते हवाई जहाज भी हैं।बच्चों को आश्चर्यचकित करने वाले कम्प्यूटर,मोबाइल हैं तो उन्हें घुमाने वाले चिड़ियाघर,पार्क बाग़ बगीचे भी हैं।यानि बाल मन की कल्पनाएँ जहां जहां तक विचरण कर सकती हैं वो सारे विषय कविता के रूप में इस संकलन में मौजूद मिलेंगे।

   


       “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” के संदर्भ में मैं एक बिंदु की तरफ और ध्यान दिलाना चाहूँगा वो यह एक ही विषय पर अलग- अलग समय के कवियों द्वारा लिखी गयी बाल कवितायें और उनकी अभिव्यक्ति।यह बात तो निश्चित रूप से एकदम साफ़ है कि किसी एक विषय या वस्तु को देखने परखने का हर व्यक्ति का दृष्टिकोण,हर रचनाकार का एंगिल अलग होगा और वह उस विषय या वस्तु पर अपने हिसाब से लिखेगा।इस दृष्टिकोण,विजन या देखने के ढंग में और साफ़ अंतर हम तब देख सकते हैं जब किसी विषय पर अलग अलग समय के रचनाकारों ने सृजन किया हो।इस कविता संकलन में से ऐसे ही कुछ उदाहरण मैं यहाँ दूँगा।

  


      अब बच्चों के लिए छुट्टी का मतलब और आनंद क्या होता है ये आप इस संकलन के तीन रचनाकारों की कविताओं में अलग-अलग रूपों में देख सकते हैं।चंद्रपाल सिंह यादव मयंक अपनी कविता “छुट्टी का दिन” में लिखते हैं –“हफ्ते में जब हो रविवार/मौज मजा आता तब यार/विद्यालय में छुट्टी रहती/मचती मौज मजे की धूम—(पृष्ठ-68)अब इसी छुट्टी विषय को लेकर कृष्ण शलभ की कविता “छुट्टी नहीं मनाते”में बाल मनोभावों की अलग ही अभिव्यक्ति दिखती है---“सूरज जी तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो/लगता तुमको नींद न आती/और न कोई काम तुम्हें/ज़रा नहीं भाता क्या मेरा/बिस्तर पर आराम तुम्हें।”(पृष्ठ-243)इसी छुट्टी को लेकर हेमन्त कुमार ने बच्चों की एकदम अलग ऎसी कल्पना को पंक्तिबद्ध किया है जो बच्चों के साथ बड़ों को भी हंसा देगी।हेमन्त कुमार अपनी कविता“आज हमारी छुट्टी है” में लिखते हैं—“आज हमारी छुट्टी है/स्कूल से हो गयी कुट्टी है/सब कुछ उलटा पुल्टा घर में/झाडू पोंछा बर्तन पल में/अब पापा निपटायेंगे/मां की हो गयी छुट्टी है।(पृष्ठ-433)अब एक ही विषय पर तीन अलग अलग अभिव्यक्ति वाली कविता निश्चित ही बच्चों को आनंदित करेगी।

    


      इसी तरह पतंग विषय को लेकर सीताराम गुप्त की कविता-“उड़ चली गगन छूने पतंग”,शकुन्तला कालरा की“पतंग और डोरी”,रावेन्द्र कुमार रवि की“उस पतंग को ख़ूब छाकाएं”,प्रीति प्रवीण खरे की कविता “पतंग”,और मधु माहेश्वरी की कविता“पतंग रानी”---इन सभी पांच कविताओं के रचनाकारों का समय अलग-अलग,परिवेश अलग-अलग –और पतंग को लेकर बच्चों के मनोभावों को इंगित करती कविताओं की अभिव्यक्ति का ढंग भी अलग-अलग है।इस बिंदु का उल्लेख यहाँ करने का मेरा मकसद सिर्फ यह इंगित करना है कि भविष्य के शोधार्थियों,आलोचकों को इस संकलन में ऎसी एक ही विषय पर अलग ढंग की अभिव्यक्ति वाली और भी कवितायेँ मिलेंगी और इस विषय पर भी शोधार्थी आगे काम कर सकते हैं।वो इन कविताओं के माध्यम से उनके रचनकारों के समय,काल उनके समय प्रचलित शब्दों के साथ ही उस समय की परम्पराओं,संस्कृतियों पर भी दृष्ट डाल सकते हैं।

    


          इस ढंग के किसी भी संकलन,संग्रह के लिए रचनाओं का चयन करते समय संकलनकर्ता का दृष्टिकोण क्या है?वह संकलन को क्या दिशा देना चाहता है यह बात भी बहुत महत्वपूर्ण है।जैसा की पहले ही लिखा जा चुका है कि दिविक जी की सोच इसे मात्र एक संकलन तैयार करने की न होकर इसे समकालीन बाल साहित्य का प्रतिबिम्ब भी बनाने की थी।साथ ही उनका एक दृष्टिकोण यह भी था कि कवितायें विज्ञानिक सोच वाली हों।उन्होंने संकलन की भूमिका में लिखा भी है कि-–“मेरी निगाह में कविताएं वैज्ञानिक सोच,प्रतिकूल मूल्यों और अंश्विश्वासों से मुक्त,कल्पना और जिज्ञासा को प्रेरित करने वाली लेकिन शैली में विश्वसनीयता की बुनियाद पर टिकी,नए प्रयोगों और नए ट्रीटमेंट से समृद्ध हों।कविताएं पहले की तरह सीधे-सीधे उपदेशात्मक शैली की न हों।समझ पिरोई हुयी हो सकती है।”(पृष्ठ संख्या-7) निश्चित रूप से दिविक जी ने अपनी इसी सोच और दृष्टिकोण के अनुरूप ही इस कविता संचयन में बाल कविताओं को संकलित किया है।इस संकलन को तैयार करने,संपादित करने और उसे प्रकाशन की पूर्णता तक पहुंचाने के लिए दिविक जी और साहित्य अकादेमी को ढेरों बधाई शुभकामनाएं।

   


         लगभग 195 कवियों की 518 बाल कविताओं वाले इस संकलन की इतनी विशेषताओं के साथ ही इसे औरबेहतर बनाने के लिए मेरे कुछ सुझाव भी हैं।जिनकी तरफ भी साहित्य अकादेमी द्वारा संकलन के आगे के संस्करण में ध्यान दिया जाना जरूरी है।पहली बात इसके हर पृष्ठ पर न सही कम से कम कुछ पृष्ठों पर कविता से सम्बन्धित रेखांकन अगर करवाया गया होता तो ये किताब थोड़ा और आकर्षक तो बन ही जाती।इसके पन्ने पलटते हुए भी पाठक को यह अहसास होता कि यह बाल कविताओं का संकलन है।जबकि कुछ पृष्ठों पर तो बहुत सारा स्पेस खाली और व्यर्थ ही गया।दूसरी बात इस महत्वपूर्ण और वृहत संकलन में इस बात की भी गुंजाइश थी कि संकलन में शामिल किये गए रचनाकारों का बहुत संक्षिप्त (अधिकतम 6-8 पंक्तियों का) परिचय और एक छोटा चित्र भी दिया जा सकता था।साहित्य अकादेमी चाहे तो इस संकलन के आगे के संस्करण में इन दो सुझावों पर विचार कर सकती है।

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समीक्षक--डा0 हेमन्त कुमार

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पुस्तक समीक्षा --दृष्टिबाधितों के अंधेरों पर रोशनी डालता उपन्यास----ब्लाइंड स्ट्रीट

शुक्रवार, 11 जून 2021

 

                       प्रकाशक-नई किताब प्रकाशन


                         1/11829,ग्राउंड फ्लोर,


                       पंचशील गार्डेन,नवीन शाहदरा,


                        दिल्ली-110032

                    


        हमारी यह दुनिया बहुत खूबसूरत है।रंग बिरंगी है।चारों ओर प्रकृति के अद्भुत नज़ारे बिखरे हैं।खूबसूरत पहाड़ हैं,फूलों की रंगीन सुन्दर वादियाँ हैं।सूर्योदय सूर्यास्त के अद्भुत नज़ारे हैं---और भी बहुत कुछ है जिन्हें हम अपनी आँखों से देखते और सराहते हैं।लेकिन इस दुनिया में ऐसे भी लाखों लोग हैं जो इस खूबसूरत दुनिया को कभी नहीं देख सकते।जिनकी दुनिया में लाल,पीला, नीला,हरा कोई रंग नहीं है।उनकी दुनिया में सिर्फ एक रंग है---काला स्याह रंग।रोशनी की जगह सिर्फ और सिर्फ स्याह अँधेरा है।वरिष्ठ पत्रकार,स्तंभकार,छायाकार और उपन्यासकार प्रदीप सौरभ का नया उपन्यास “ब्लाइंड स्ट्रीट” हमारे समाज के ऐसे ही हजारों लाखों दृष्टि बाधित व्यक्तियों के जीवन की गाथा है।

   


       यद्यपि इस विषय पर पहले बालीवुड में फ़िल्में भी  बनी हैं लेकिन उन फिल्मों में सिर्फ किसी एक नायक नायिका के माध्यम से दृष्टि बाधितों के जीवन के किसी एक पहलू को देखने या दिखाने की कोशिश की गयी है।दूसरी बात फिल्म की अपनी सीमाएं भी होती हैं।फ़िल्में दर्शकों को किसी विषय की तह तक नहीं पहुंचा सकती।जबकि किसी उपन्यासकार के लिए किसी विषय पर काम करने  के लिए एक बहुत बड़ा फलक मौजूद रहता है।बस उसे जरूरत होती है उस विषय की गहराई में डूब कर चीजों को निकालने की।इस दृष्टि से यह संभवतः हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी दृष्टि बाधित लोगों पर लिखा गया पहला उपन्यास है।

      


              इस उपन्यास की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें अन्य उपन्यासों की तरह नायक-नायिका,कुछ प्रमुख पात्र,कुछ गौण चरित्र,कुछ सपोर्टिंग पात्र जैसी कोई चीज नहीं है।उपन्यास में कई किरदार हैं।और हर किरदार की अपनी कहानी है,उसके जीवन की घटनाएं हैं,उसके मन के अन्तर्द्वन्द हैं,उसके संघर्ष हैं और सबसे बड़ी बात कि उपन्यास का हर पात्र कहीं न कहीं आपको नायक या नायिका की भूमिका में खड़ा दिखेगा।वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक सुधीश पचौरी के शब्दों में—“ब्लाइंड स्ट्रीट हिन्दी का शायद पहला उपन्यास है,जो बहुत सारे ‘डिफरेंटली एबिल्ड’की अंधी दुनिया के उन अँधेरे-उजालों को परत-दर-परत उघाड़ता चला जाता है,जिनकी हिन्दी के कथा साहित्य में प्रायः उपेक्षा ही की जाती रही है।यह एक नायक-नायिका वाला उपन्यास नहीं है,बल्कि बहुत से नायक-नायिकाओं वाला उपन्यास है।हर नायक-नायिका की कहानी अलग होते हुए भी एक दूसरे से मिक्स होते हुए चलती  है।यह उपन्यास बहुत  सारी कहानियों का धारा प्रवाह ‘मेडले’ और ‘फ्यूजन’ है।”(“ब्लाइंड स्ट्रीट” के फ्लैप से)।

           


        

         प्रदीप सौरभ एक खोजी पत्रकार हैं।इसीलिए वो अपने लेखन के विषय की पूरी तह तक शोध करते हैं तभी उस विषय पर कलम चलाते हैं।और उनकी यह खोज और अनुसंधान की छाप उनके पूर्व में प्रकाशित सभी उपन्यासों(मुन्नी मोबाइल,तीसरी ताली,देश भीतर देश,और सिर्फ तितली) की ही तरह इस उपन्यास में पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।प्रदीप सौरभ ने अपने इस उपन्यास के भी सभी किरदारों से मुलाक़ात कर उनसे बातचीत करके उनकी पूरी गाथा को निकाला है।उनके पात्रों का सृजन कहीं सुनी सुनाई या पढ़ी गयी बातों के आधार पर नहीं हुआ है।यही कारण है की इस उपन्यास को पढ़ते हुए दृष्टि विहीनों की दुनिया से गुजरते हुए हमें महसूस  होता है कि क्या हमारे समाज में ऐसा भी हो रहा है।क्योंकि हमने या कह सकते हैं कि हमारे समाज के सामान्य व्यक्ति ने कभी अंधों की उस दुनिया में झांकने या पहुँचने की कोशिश ही नहीं की है।हमारे लिए तो अंधे व्यक्ति का मतलब बस सूरदास---गा बजा कर कमाने वाला व्यक्ति या फिर सड़क पर भीख माँगने वाला एक भिखारी है।इससे अधिक हमारे समाज का आदमी उनके बारे में कुछ सोचता ही नहीं है।वह कभी नहीं जानना चाहता कि हमारी दुनिया के बारे में दृष्टि विहीनों की क्या सोच है?उनके अपने अंधेरों में वो किन रंगों को देखते और महसूस करते हैं।समाज से उपेक्षित ये दृष्टि विहीन या अंधे लोग अपनी अंधेरी दुनिया को कैसे किस शक्ति से रोशनी में बदलने की कोशिश करते हैं।उनके अन्दर क्या भावनाएं कुलबुलाती रहती हैं?वो समाज से हर पल मिलने वाली उपेक्षाओं तिरस्कारों से किस तरह दिन-रात संघर्ष करते हैं।समाज की इस उपेक्षा को हम इसी उपन्यास की एक प्रमुख पात्र पार्वती के साथ घटी एक छोटी सी घटना में देख सकते हैं।“पार्वती में गेट के बाहर आकर जमीन पर अपनी स्टिक(अंधों की लाइफ लाइन)पटक रही थी,ताकि कोई सड़क पार करने में उसकी मदद के लिए आ जाय।ब्लाइंड इस तरह लोगों का अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं।तभी उसे अहसास हुआ कि कोई उसके पास खड़ा है।पार्वती ने उससे पूछा,“सर क्या रोड पार करा देंगे?”

“करा तो सकते हैं लेकिन कराऊँगा नहीं।”उस व्यक्ति ने हिकारत के भाव से जवाब दिया।‘ईश्वर ने तुम्हारे पाप के कारण तुम्हें अंधा बनाया है।रोड पार कराकर तेरा पाप तो मैं अपने सर पर लूंगा नहीं।”( पृष्ठ-21)

       


             इतना ही नहीं हमारे समाज में इस तिरस्कार और उपेक्षा की शुरुआत बच्चे के पैदा होने पर उसके अंधे होने की बात पता लगते ही हो जाती है।अक्सर मां-बाप उसे या तो किसी मंदिर के बाहर छोड़ आते हैं,या किसी अंधेरी रात में सोते  भिखारियों के बीच छोड़ आते हैं।जिससे कि वह मासूम बाक़ी का पूरा जीवन उन्हीं भिखारियों की तरह भीख मांग कर गुजार दे।क्योंकि उस अंधे बच्चे को जीवन भर सम्हालेगा कौन?बचपन की इसी हिकारत का शिकार इसी उपन्यास का पात्र महेश भी हुआ।-----“आँखों के डाक्टर ने बताया की उसका कार्निया जन्म से ही डैमेज है।उसे अब ठीक भी नहीं किया जा सकता है।बच्चे के अंधे होने की बात सुनकर पूरे परिवार को जैसे सांप सूँघ गया।इस जानकारी के बाद उसका लाड़-प्यार सब कम होने लगा।बात जब उसका नाम रखने की आई थी तो उसके पिता ने बेरुखी से कहा था कि इसका नाम सूरदास रख दो।इस बात का उसकी मौसी ने बहुत विरोध किया था।उनके इस विरोध का नतीजा ही था कि अंततः उसका नाम महेश तय कर दिया गया।महेश तनेजा।”(पृष्ठ-9-10)

    


                                    पच्चीस अध्यायों में विभक्त इस उपन्यास की कहानी---महेश,पार्वती,गुंजन,मनीष,प्रताप, नितिन,राजेश ठाकुर,शिवतेज,सोनी गिल,मुकेश सक्सेना,पल्लवी,महेश तनेजा,सुरेश सरीन, बाबुल,कोयल,विवेक आदि पात्रों के इर्द गिर्द बुनी गयी है।जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि इन सभी पात्रों की अपनी अलग-अलग कहानियां हैं ।और सभी की कहानी आपस में एक दूसरे से लिंक्ड भी हैं।महेश जन्मांध है और अपने परिवार की घोर उपेक्षा का शिकार होकर अपनी मौसी के घर रहने को मजबूर था।महेश की मौसी ने ही उसका ब्लाइंड स्कूल में एडमिशन करवा कर उसकी पढाई लिखाई की व्यवस्था की।पार्वती जन्मांध नहीं थी।उसकी आंख बचपन में करेंट लगाने की एक दुर्घटना में चली गयी थी।लेकिन वो अपनी मेहनत और लगन की बदौलत दिल्ली में जे एन यू  से एम् फिल करने पहुँच गयी थी।इसी तरह बहुत बड़े घर की बेटी सोनी गिल अपने साईटेड पति पंकज से अलग होकर ब्लाइंड तलाकशुदा औरतों का हास्टल चलाती है।लेकिन उसका दुर्भाग्य ---उसका बहुत ही धूर्त और चालाक मैनेजर सोनी गिल की गैर मौजूदगी में उस हास्टल को एकदम चकलाघर में तब्दील कर देता है।–अंततः पुलिस रेड के बाद उसका वह हास्टल भी बंद हो जाता है।इसी तरह सुरेश सरीन ने खुद को अंधों के लिए काम करने के लिए सपर्पित कर दिया।मस्जिद में मौलवी साहब के साथ रहने वाला शिवतेज की अपनी अलग व्यथा कथा है।वह अंधा होने के कारण अपने ही भाई द्वारा सारी जमीन हडप कर घर से निकाल दिए जाने जैसी घटना का शिकार हुआ।लेकिन मौलवी साहब की कृपा  से पढ़ लिख कर इस योग्य हो सका की एक स्कूल में शिक्षक का काम करके कमाई करके गाँव जाकर भाई से जमीन वापस लेकर उसे ही भीख के रूप  में देकर वापस लौट आता है। ----इनके अलावा भी महेश तनेजा,मुकेश सक्सेना,पल्लवी,तिलक ब्रिज पर रहने वाला अंधा परिवार सभी कहीं न कहीं अपने अपने जीवन संघर्षों,उठा-पटक के बीच खुद को स्थापित करने का प्रयास करते दिखते हैं।                                      

              


          उपन्यास के इन सभी पात्रों में कुछ बातें तो एक सामान  रूप से दिखती है---सभी जीवन के प्रति संघर्षरत हैं।सभी घोर सामाजिक,पारिवारिक उपेक्षाओं के शिकार हैं।सभी अपने अपने घोर अंधकारों के बीच कहीं न कहीं से एक रोशनी की किरण को तलाश रहे हैं जो शायद उनके जीवन के इन अंधेरों को दूर कर सके।और सभी के अन्दर इन संघर्षों,जीवन की लालसाओं के बावजूद एक असीम पीड़ा का भाव भी दिखता है जो उनके अन्दर  समाज से मिली उपेक्षाओं,समाज से मिली कटुताओं के कारण पैदा हुआ है। 

    

            लेकिन इस उपन्यास को पढ़ते समय कहीं भी आपको यह नहीं महसूस होता है कि इन पात्रों का सृजन लेखक ने किसी कल्पना के आधार पर किया है।क्योंकि इन दृष्टि बाधितों के रहन-सहन,बातचीत,उठने-बैठने,उनकी दिनचर्याओं,जीवन की घटनाओं को बिना उनसे घुले-मिले,बिना उनका सूक्ष्म अध्ययन किये लिखना संभव ही नहीं है।इस दृष्टि से भी यह उपन्यास अपने आप में एकदम अलग कहा जा सकता है।

    

        इस पूरे उपन्यास में दृष्टि बाधितों के जीवन के साथ ही उनकी सहायता सुविधा के नाम पर हमारे देश भर में चल रहे एन जी ओ,अंधों के स्कूल कालेजों,होस्टल्स में चल रही लूट का भी खुलासा किया गया है।साथ ही वहां इन दृष्टि विहीनों के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक,यौनाचार,उपेक्षा की भी पूरी पड़ताल की गई है।सोनी गिल द्वारा शुरू किये गए अंधी तलाकशुदा महिलाओं के हास्टल को वहां के मैनेजर द्वारा चकलाघर में तब्दील कर देना---यह हमारी व्यवस्था का एक बदरंग चेहरा है।

        

                

      प्रदीप सौरभ के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वो अपनी कृति के मूल विषय के साथ ही देश,समाज की परिस्थितियों पर भी पूरी दृष्टि डालते हैं।इस उपन्यास में भी जे एन यू और जामिया मिलिया में चल रही राजनीति,उठा पटक को बहुत ही बेबाक ढंग से लिखना प्रदीप सौरभ के ही वश की बात थी।जे एन यू कैम्पस में विद्यार्थी परिषद् के गुंडों द्वारा किस कदर तांडव मचाया गया यह भी इस उपन्यास में आप देख सकते हैं।उन गुंडों की क्रूरता और आक्रामकता का अंदाजा आप इसी घटना से लगा सकते हैं कि पार्वती द्वारा यह बताने पर भी कि वो अंधी है—उसे भी एक नकाबपोश लड़की ने डंडों से पीटा और उसका सर तक फोड़ दिया।लेकिन ये घटनाएं या उनका वर्णन मुख्य कथानक से कहीं अलग नहीं दिखते बल्कि उपन्यास को और सार्थक बनाते है।

  


               पूरे उपन्यास को पढ़ कर एक बात साफ़ तौर पर उभर कर आती है—वो यह कि हमें यानि हमारे इस पूरे समाज को यह जानना होगा कि इन दृष्टि बाधितों के अन्दर भी हमारी तरह ही एक दिल धड़कता है।उसमें भी भावनाएं होती हैं।उसमें भी संवेदनाएं पनपती हैं।हमारी ही तरह उनकी भी शारीरीक जरूरतें होती हैं।वो भी प्यार करना और प्यार पाना चाहते हैं।उनके अन्दर भी यौन इच्छाएँ होती हैं।उनमें भी धूर्तता,मक्कारी,इर्ष्या,द्वेष, जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ होती हैं।---उनमें और हममें बस फर्क इतना ही है कि हमारी दुनिया रंगों से भरपूर है।हम देख सकते हैं।और उनकी दुनिया बिलकुल अंधेरी---स्याह और रोशनी से विहीन है।लेकिन वो इस कमी को स्पर्श,ध्वनि,शब्दों,आहटों,सूंघने जैसी शक्तियों से पूरा करते हैं।----उन्हें हमारे इस समाज से दया की नहीं बराबरी तक पहुंचाने की दरकार है,उन्हें हमारी उपेक्षा,घृणा नहीं हमारे सहारे की जरूरत है।और समाज से यही कहना या बताना इस पूरे उपन्यास और लेखक का मंतव्य भी है।



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समीक्षक-डा0हेमन्त कुमार                  

                 

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