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लेख-- पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017


“पिंकी--सुबह जल्दी उठना है जाकर सो जाओ।”“राजू इतने नजदीक से टी वी मत देखो--आंखें खराब होती हैं।”“मीना सीधे बैठ कर पढ़ो---झुक कर बैठने से कूबड़ निकल आएगा।”“तनु बेटा नल खुला रख कर ब्रश मत करो पानी बर्बाद हो रहा है।” ये या ऐसे ही ढेरों वाक्य हैं जो हर घर में,परिवार में सुबह शाम हर समय आपको सुनाई पड़ते होंगे।ये वाक्य या उपदेश दिये जाते हैं बच्चों को।और उपदेश देता कौन है? हम आप—हम सभी यानि कि हर अभिभावक या घर का बड़ा सदस्य।
  इन नसीहतों को सुन कर ऐसा लगता है कि बच्चे सिर्फ़ नसीहतें सुनने के लिये ही इस धरती पर आयें हैं।मतलब यह कि सारी नैतिकता,सारी नसीहतें सिर्फ़ छोटे मासूम बच्चों के लिये। और हमारे आपके लिये ?क्या जो नसीहतें जो हम उठते,बैठते ,खेलते-खाते,सोते-जागते,बच्चों को देते हैं।ये क्या सिर्फ़ उनके ऊपर ही लागू होती हैं?हमारे ऊपर नहीं?क्या टी वी नजदीक से देखने पर हमारी आंखें नहीं खराब होंगी।क्या झुक कर बैठने या पढ़ने पर हमारी रीढ़ की हड्डी नहीं मुड़ेगी?या उसमें कोई विकार नहीं आयेगा?फ़िर क्या कारण है कि हम हर समय बच्चों पर ही नसीहतें थोपते रहते हैं?हर समय टोकने,नसीहत देने का असर बच्चों पर क्या पड़ेगा?क्या अपने इस बात पर भी कभी गौर किया है?क्या हर समय की टोका टाकी बच्चों को विद्रोही नहीं बनायेगी?इन सब बातों पर भी हमें विचार करना होगा।खासकर आज के युग में जब कि हर मां-बाप अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद सतर्क और चिन्तित रहता है।
               यह सही है कि नसीहत या उपदेश हम बच्चों की बेहतरी के लिये ही देते हैं।लेकिन उसका तरीका क्या हो?यह भी हो सकता है कि हम ये नसीहतें या उपदेश बच्चों को सीधे न देकर किसी और तरीके से दें।वह तरीका कौन सा होगा उस पर विचार करने के पहले मैं आपको एक कहानी संक्षेप में सुनाना चाहूंगा।यह कहानी शायद आपमें बहुतों ने पढ़ी या सुनी भी होगी।
          कहानी है एक फ़कीर की।फ़कीर के पास एक दिन एक महिला अपने बेटे को लेकर आई।बच्चे के दांतों में बहुत तकलीफ़ थी। महिला ने शिकायत करते हुए कहा कि मेरा बेटा गुड़ बहुत खाता है।इसके दांतों में कीड़े लग गए हैं। अगर आप इसकी यह गुड़ खाने की आदत छुड़ा दें तो मैं आपका उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगी।फ़कीर ने उसकी बात ध्यान से सुनी।कुछ देर सोचते रहे फ़िर उसको यह कह कर वापस भेज दिया कि इसे लेकर दस दिनों के बाद आना। और उन्होंने बच्चे के दांतों का दर्द कम करने के लिये कुछ दवाएं भी उसे दीं।दस दिनों के बाद महिला फ़िर आई।फ़कीर ने दोनों को बैठाया और बच्चे को समझाते हुए कहा कि बेटा तुम हर समय गुड़ खाना बंद कर दो। तुम्हारे दांत बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। और हां कभी भी कुछ खाओ तो उसके बाद दांत जरूर साफ़ कर लिया करो। महिला ने उनसे पूछा कि ये बात तो आप उस दिन भी बता सकते थे।फ़कीर मुस्कराया और बोला “मैंने उस दिन इसे इसलिये नहीं समझाया क्योंकि मैं खुद भी बहुत गुड़ खाता था। सो मैं कैसे इसे समझाता। इन दस दिनों में मैंने गुड़ खाना बंद कर दिया। इस लिये अब मैं इसे समझाने का हकदार हो गया हूं।” फ़कीर और बच्चे की यह कहानी आज हम सब पर लागू होती है। यानि कि हमें भी इस कहानी से सीख लेनी चाहिये। हमें बच्चों को कोई नसीहत देने से पहले खुद भी उस पर अमल करना चाहिये। तभी हम बच्चों को सही दिशा दे सकेंगे।
            एक बात और है।हमें ऐसे मौकों पर कभी कभी अपने बचपन को भी याद कर लेना चाहिये। आप याद करिये अपने बचपन को। आप अच्छे खासे अधलेटे होकर अपना कोई कहानी की किताब पढ़ रहे होते थे और अचानक आपके पिताजी कहते थे “बेटा सीधे बैठ कर पढ़ो। ऐसे भी कहीं पढ़ाई होती है?”आपको कितनी झुंझलाहट होती थी। ठीक यही स्थिति हमारे उपदेश देने पर हमारे भी बच्चों की होती है।
  इसकी जगह अगर हम खुद टी वी दूर बैठ कर देखें,खुद सीधे बैठ कर पढ़ें,खुद ब्रश करते समय नल को बंद रखा करें तो शायद बच्चों को उपदेश देने की जरूरत ही न पड़े।क्योंकि बच्चों में अनुकरण करके सीखने की एक स्वाभाविक विशेषता होती है।वह जब आपको सुबह जल्दी उठते,रात में जल्दी सोते,समय पर नहाते-खाते,तैयार होते,सही मुद्रा में बैठ कर पढ़ते लिखते देखेगा तो वह स्वतः ही वैसा करेगा। आपको कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
                   यहां एक उदाहरण मैं और देना चाहूंगा।अपने स्कूली दिनों का।मेरे स्कूल के प्राचार्य जब भी किसी कक्षा में जाते और वहां बच्चों द्वारा फ़ाड़े गये कागज की पुड़िया या कोई दूसरा कचरा देखते तो उसे स्वयं ही उठा कर कक्षा के बाहर फ़ेंक आते। कभी वो किसी बच्चे को इसके लिये आदेश नहीं देते थे। नतीजा यह हुआ कि अगले दिन  से उस कक्षा के बच्चे थोड़ा जल्दी आने लगते। और खूद ही अपने कमरे की सफ़ाई कर लेते।
         तो यह भी एक अच्छा तरीका है बच्चों से कार्य लेने और उन्हें समझाने का।हमारे अध्यापक और अभिभावक अगर दोनों ही बच्चों को समझाने,दिशा निर्देश देने और उन्हें आगे बढ़ाने के संदर्भ में यह तरीका अपना लें तो मुझे लगता है कि बच्चों के ऊपर उपदेशों का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और उनके विकास को एक सही दिशा मिल सकेगी।
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डा0 हेमन्त कुमार 

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“बालवाटिका” के “संस्मरण” और “पर्यावरण” विशेषांक….।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

             
     आज विज्ञापनों की चकाचौंध और बाजारवाद के युग में कोई पत्रिका निकालना और उसके स्तर को बरकरार रखना अपने आप में एक कठिन काम है।खासकर बच्चों की पत्रिकाओं के सन्दर्भ में यह बात ज्यादा लागू होती है।और उस स्थिति में तो और जब आपको यह पत्रिका पूरी तरह अपने बलबूते पर निकालनी हो।जब आपके पास प्रकाशन का एक बड़ा सेटप न हो।जब आपको पत्रिका के लिये स्तरीय सामग्री जुटाने से लेकर उसके प्रकाशन और प्रचार प्रसार की व्यवस्था खुद ही सम्हालनी हो।जब आपके पास सबसे बड़ी समस्या पत्रिका में खर्च किये जा रहे धन की वापसी की हो।ऐसी ही कई गम्भीर समस्याएं हैं जिनसे एक गैर व्यावसायिक पत्रिका निकालने वाले को रूबरू होना पड़ता है।और इन सारी मुसीबतों को झेलते हुये अगर कोई बाल पत्रिका निकालने का साहस कर रहा है तो वह निश्चय ही बाल साहित्य,बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान कर रहा है।
                  कुछ ऐसे ही संघर्षों के दौर से गुजरते हुये खुद को स्थापित किया है बाल पत्रिका “बालवाटिका” ने।मैं “बालवाटिका” का कई वर्षों से पाठक हूं।पर इधर के कुछ सालों में मैं “बालवाटिका” से पाठक के साथ  ही बतौर लेखक भी जुड़ गया हूं।इसके अंकों के कलेवर में इधर जो सकारात्मक बदलाव आये हैं उसका पूरा श्रेय पत्रिका के सम्पादक डा0 भैरूंलाल गर्ग जी के साथ पत्रिका की पूरी सम्पादकीय टीम को जाता है।डा0भैरूं लाल गर्ग जी सिर्फ़ “बालवाटिका” नाम की पत्रिका नहीं निकाल रहे बल्कि “ हिन्दी बाल साहित्य “ के प्रचार और प्रसार के साथ इस पत्रिका के माध्यम से हिन्दी बाल साहित्य के नये और पुराने रचनाकारों को जोड़ने और उन्हें एक मंच पर एकत्रित करने की वह साधना कर रहे जो एक समर्पित सन्यासी ही कर सकता है।
   “बालवाटिका” के इधर आये विशेषांकों में दो विशेषांक तो बहुत ही महत्वपूर्ण और संग्रहणीय हैं।पहला “संस्मरण विशेषांक”(मई-2016) और दूसरा “पर्यावरण विशेषांक”(जून-2016)।
               पहले मैं बात करूंगा बालवाटिका के “संस्मरण विशेषांक” की।बच्चों को उपलब्ध बाल साहित्य में ज्यादातर कहानियां,कविताएं,नाटक,गीत,निबन्ध,उपन्यास,यात्रा वृत्तान्त या अन्य रोचक और रोमांचक सामग्री ही पढ़ने के लिये मिल पाती है।लेकिन कभी कभी बच्चों के मन में भी यह सवाल जरूर आता होगा कि उनके लिये ये सारा साहित्य कौन लिखता है?उनका जीवन कैसा होता होगा?या उनका बचपन कैसे बीता होगा?क्या वो लोग भी उन्हीं की तरह बचपन में शरारतें करते रहे होंगे?या इस जैसे ही और भी ढेरों प्रश्न।
                     बच्चों की ऐसी ही जिज्ञासाओं को शान्त करेगा “बालवाटिका” का संस्मरण विशेषांक।जिसमें नये पुराने लगभग 28 प्रतिष्ठित बाल साहित्यकारों के बचपन की यादों को संजोया गया है।बचपन के संस्मरणों के इस खण्ड में बच्चे अपने सभी प्रिय लेखकों प्रकाश मनु,राम दरश मिश्र,देवेन्द्र कुमार,दिविक रमेश,डा0 भैरूं लाल गर्ग,रमेश तैलंग,सूर्यनाथ सिंह,मंजुरानी जैन,प्रहलाद श्रीमाली,गोविंद शर्मा, जैसे स्थापित नामों के साथ ही नागेश पाण्डेय,रेनु चौहान,रावेन्द्र रवि जैसे युवा बाल साहित्यकारों के बचपन की यादों को पढ़ सकेंगे। और उनकी ये यादें निश्चित रूप से बच्चों के मन को गुदगुदाएंगी।यहां मेरा मकसद संस्मरण लेखकों के नाम गिनाना नहीं बल्कि मैं बाल पाठकों के उस आनन्द को बताना चाहूंगा जो इन संस्मरणों को पढ़ कर वो महसूस करेंगे।कि अरे तो ये हमारी तरह ही साहित्यकार भी बचपन में इतनी शरारतें करते थे?इन्होंने भी बगीचे से अमरूद तोड़ा है? या इन्होंने भी स्कूल की कक्षा छोड़ कर शैतानियां की।फ़िर उस समय उनका मन जिस तरह आह्लादित होगा उसे हम भी इन संस्मरणों को पढ़ कर ही महसूस कर सकते हैं।एक बात और ये संस्मरण निश्चित रूप से बच्चों को कुछ अच्छा करने की प्रेरणा भी देंगे।इस दृष्टि से “बाल वाटिका” का यह संस्मरण विशेषांक महत्वपूर्ण है।
        इन संस्मरणों के साथ ही इस अंक में बच्चों के ज्ञानवर्धन के लिये अलग अलग विषयों पर तीन लेख,मो0अरशद खान,विनायक और पंकज चतुर्वेदी की कहानियां,लगभग 14 बाल कविताएं तथा तीन पुस्तकों की समीक्षाएं प्रकाशित हैं।यानि कि वो सभी सामग्रियां जो एक अच्छी पत्रिका में होनी चाहिये।
                      अब थोड़ी बात “बालवाटिका” के “पर्यावरण विशेषांक” की।ये तो हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण इस समय हमारे पूरे विश्व की चर्चा के केन्द्र में है।पूरी दुनिया में लोग अपनी इस धरती के बिगड़ते जा रहे पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं,इस असन्तुलित होते जा रहे पर्यावरण को कैसे बचाया जाय इस पर चर्चाएं।,कोशिशें कर रहे।लोगों को सचेत कर रहे कि अभी भी समय है सम्हल जाओ और बचा लो अपनी इस धरती और यहां की प्राकृतिक सम्पदा को अन्यथा समय निकल जाने पर सिवाय धरती के विनाश के कुछ भी सम्भव नहीं रहेगा।
    तो ऐसे माहौल में हमारा यह भी कर्तव्य बनता है कि हम अपने इस पर्यावरण और धरती के प्रति अपनी सभी चिन्ताओं,विचारों,प्रयासों में अपने बच्चों को भी शामिल करें।उन्हें भी इस पर्यावरण असन्तुलन की भयावहता के बारे में बताएं।उन्हें भी इसे रोकने और धरती को बचाने के उपायों को समझाएं।क्योंकि अन्ततः धरती पर हामारे बाद हमारे बच्चों को ही रहना है।तो क्या हम उन्हें यह धरती ऐसे ही विनाश के कगार पर पहुंचा कर दे देंगे?हमें निश्चित रूप से अपनी आने वाली पीढ़ी को भी बताना होगा कि हमारी किन गलतियों के कारण हमारी धरती इस हालत तक पहुंची है?हम इसे कैसे बचा सकते हैं?
           “बालवाटिका” का पर्यावरण विशेषांक निकालने के पीछे संपादकीय टीम का भी मकसद अपने बाल पाठकों को इस धरती पर बढ़ रहे पर्यावरणीय असन्तुलन को बताना और इसे रोकने के उपायों के प्रति जागरूक करना था।यह बात इस अंक में प्रकाशित सामग्री को पढ़ने से स्पष्ट हो जाती है।इस अंक में भी बच्चों के लिये प्रतिष्ठित रचनाकारों की लगभग नौ कहानियां,नौ ही कविताएं,पांच लेख और आठ संस्मरण तथा पुस्तक समीक्षाएं हैं।यानि कि बच्चों के मनोरंजन और ज्ञानवर्धन की पूरी सामग्री।“बालवाटिका” का यह पर्यावरण विशेषांक निश्चित रूप से बच्चों तक पर्यावरण संरक्षण का सन्देश पहुंचाने मे सक्षम होगा।और यही पत्रिका के इस विशेषांक का मकसद भी है।
                “बालवाटिका” के इन दोनों अंकों का कलेवर निश्चित रूप से किसी व्यावसायिक पत्रिका से कम नहीं है।साथ ही इन अंकों में प्रकाशित सामग्री का स्तर भी पत्रिका को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।
        “बालवाटिका” से जुड़े एक प्रसंग का मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा।इसके दोनों अंकों को मेरे पास देख कर मेरे एक मित्र (प्रतिष्ठित उपन्यासकार )ने मुझसे “बालवाटिका” के दोनों अंक एक दिन के लिये उधार लिया।और अगले दिन पत्रिका वापस करते समय उन्होंने जो बात कही वह चमत्कृत करने वाली थी।उन्होंने कहा कि “भाई बालवाटिका तो बाल साहित्य की “हंस” है।“यह बालवाटिका के लिये एक बहुत ही गौरवपूर्ण टिप्पणी है।
      कुल मिलाकर “बालवाटिका” के “संस्मरण” और “पर्यावरण” दोनों ही विशेषांक बाल पाठकों का मनोरंजन, ज्ञानवर्धन तो करेंगे ही साथ ही उन्हें आगामी भविष्य के लिये एक बेहतर नागरिक के रूप में तैयार भी करने का प्रयास करेंगे। इसके लिये “बालवाटिका” की पूरी टीम को हार्दिक बधाई और साधुवाद।
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डा0हेमन्त कुमार

  

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मुद्दा--हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

   
              इधर मुझे लगातार हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित कई सेमिनारों,गोष्ठियों और सम्मान समारोहों में जाने का अवसर मिला।इन गोष्ठियों,सेमिनारों में खूब गरमागरम बहसें हुयीं,साहित्यिक चर्चायें हुयीं।हिन्दी साहित्य पर मंडरा रहे इन्टरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के खतरों की बातें भी की गयीं----लेकिन ये चर्चायें काफ़ी आधी अधूरी सी लगीं—इनमें कुछ कमी खटक सी रही थी। और वह कमी थी हिन्दी के बाल साहित्य की चर्चा।
            आज जब कि प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा जा रहा है,प्रकाशित भी  हो रहा है।ऐसे में किसी भी सेमिनार,संगोष्ठी साहित्यिक समारोह में बाल साहित्य की चर्चा न होना इस बात का द्योतक है कि आज भी हिन्दी साहित्य के मठाधीश बाल साहित्य को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखते। इतना ही नहीं आप हिन्दी साहित्य के इतिहास और आलोचनाओं से सम्बन्धित पुस्तकें उठा कर देखिये उसमें भी कहीं बाल साहित्य की चर्चा नहीं मिलेगी,या मिलेगी भी तो बहुत नाम मात्र की।
         जब कि वास्तविकता यह है कि खड़ी बोली हिन्दी के आरंभिक काल से ही बाल साहित्य लिखा जा रहा है।सभी बड़े साहित्यकारों ने भी थोड़ा बहुत तो बाल साहित्य लिखा ही है।चाहे वह बच्चों को उपदेश देने के लिये लिखा हो अथवा मनोरंजन के लिये।महादेवी वर्मा,डा0रामकुमार वर्मा,सुमित्रा नंदन पंत,मुंशी प्रेमचन्द सभी ने बच्चों के लिये साहित्य लिखा है।लेकिन उनके इस साहित्य को भी बड़ों के ही साहित्य में ही स्थान दिया गया।
                       उस समय भी बाल साहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य ही माना जाता था।इतना ही नहीं उस समय बहुत से साहित्यकारों की यह सोच भी थी कि जो साहित्यकार बड़ों के लिये साहित्य लिखने में असफ़ल हो जाते हैं वो बाल साहित्य लिखना शुरू कर देते हैं।जबकि वास्तविकता इस तथ्य से कोसों दूर है।बाल साहित्य लिखना सामान्य साहित्य लिखने की अपेक्षा बहुत कठिन है।बाल साहित्य वही लिख सकता है जिसे बाल मनोविज्ञान के साथ ही बच्चों की भावनाओं,संवेदनाओं, उनकी  रुचियों अरुचियों के साथ ही उनके स्तर की भाषा की समझ हो।बाल साहित्य लिखने के लिये लेखक को खुद भी बच्चा बनना पड़ता है।
                         आज की समस्या यह है कि बाल साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है।लोगों में बाल साहित्य को लेकर काफ़ी जागरूकता,उत्सुकता सभी कुछ है। (अब यह जरूर है कि लिखा जा रहा पूरा बाल साहित्य बच्चों के लिये उपयोगी नहीं है।कुछ बाल साहित्यकार तो बहुत अच्छा साहित्य लिख रहे हैं कुछ घटिया।और यह स्वाभाविक भी है।)लेकिन---फ़िर भी बाल साहित्य को वह दर्जा नहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिये।आज भी बाल साहित्य मुख्य धारा से हटकर हाशिये पर ही पड़ा है।यह तो हुयी बाल साहित्य को पहचान मिलने की समस्या।
                              इसके अलावा भी बाल साहित्य के ऊपर कई संकट हैं।मसलन प्रकाशन,पुस्तकों के आकर्षक उत्पादन और सबसे बढ़ कर बच्चों तक पुस्तकें पहुंचने की। बच्चों के लिये प्रकाशित ज्यादातर किताबों का उत्पादन इतने घटिया स्तर का रहता है कि बच्चे उन्हें पढ़ने के लिये आकर्षित ही नहीं होंगे। ज्यादातर प्रकाशक बाल साहित्य सिर्फ़ सरकारी खरीद के लिये प्रकाशित करते हैं।
                     बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट, चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट,और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग का योगदान महत्वपूर्ण है।इनके अलावा कुछ एन जी ओ जैसे प्रथम बुक्स,नालन्दा,एकलव्य आदि भी बच्चों तक अच्छी आकर्षक और बढ़िया किताबें पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इन संगठनों द्वारा प्रकाशित बच्चों का साहित्य विषयवस्तु और साज सज्जा दोनों ही दृष्टियों से बेहतरीन कहा जा सकता है।
       कुछ प्राइवेट प्रकाशक भी बच्चों की अच्छी किताबें छाप रहे हैं।लेकिन दिक्कत वही है इन किताबों की पहुंच बच्चों तक नहीं हो पा रही है।ये किताबें भी या तो सरकारी खरीद में जाकर पुस्तकालयों की आल्मारियों में बन्द हो जा रही हैं या फ़िर महंगी होने के कारण बच्चों के अभिभावकों की जेब से बाहर हैं।
                     यद्यपि बच्चों तक किताबें पहुंचाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट का बाल साहित्य केन्द्र(एन सी सी एल) काफ़ी प्रयास कर रहा है।इसकी तरफ़ से देश भर में स्कूलों के साथ ही मुहल्लों में भी पाठक मंचों की स्थापना करवाई जा रही है। तथा उन केन्द्रों को एन बी टी अपने प्रकाशनों के साथ ही दूसरे प्रकाशकों की भी बच्चों की अच्छी किताबें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करा रहा है।साथ ही कई एन जी ओ भी गांवों के साथ ही झुग्गी,झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के लिये बाल साहित्य उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय हैं।फ़िर भी सरकारी स्तर पर इन कार्यक्रमों को और गति देने की जरूरत है।
                      मेरे विचार से हिन्दी बाल साहित्य को हाशिये पर से उठा कर साहित्य की मुख्य धारा में लाने के लिये सरकारी स्तर पर निम्न लिखित प्रयास होने चाहिये।
0 बाल साहित्यकारों को भी साहित्य की मुख्य धारा में स्थान दिलवाना।
0 अच्छा बाल साहित्य लिखने के लिये उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था।
0 लिखे जा रहे श्रेष्ठ बाल साहित्य के आकर्षक उत्पादन एवम प्रकाशन की व्यवस्था।
0 चूंकि बच्चों की किताबों की डिजाइनिंग,ले आउट, और उत्पादन पर ज्यादा खर्च आता है।इसलिये बाल साहित्य के प्रकाशकों को बढिया स्तर का कागज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराने,सस्ती दरों पर किताबों के छपाई की व्यवस्था ---अथवा बच्चों के लिये आकर्षक किताबें छापने वाले प्रकाशकों के लिये सरकार की तरफ़ से सब्सीडी देने की व्यवस्था।
 0 और सबसे अन्तिम और मह्त्वपूर्ण बात यह कि प्रकाशित अच्छे बाल साहित्य को बच्चों के हाथों तक पहुंचाने की व्यवस्था।
0 इस सन्दर्भ में अभिभावकों को भी यह समझाना कि वो अपने ऐशो आराम के खर्च में से कुछ अंश बचा कर अपने बच्चों के लिये अच्छा साहित्य,बाल पत्रिकाएं आदि खरीदने पर भी लगाएं।
0अगर बच्चों को उपहार देना हो तो उन्हें कुछ रंग बिरंगी अच्छी किताबें भी देकर उनमें पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करें।
           यदि हमारी सरकार के साथ ही सामाजिक विकास से जुड़े कार्यकर्ता,शिक्षक,अभिभावक भी इन बिन्दुओं पर कुछ ध्यान दें तो सम्भवतः हिन्दी के  बाल साहित्य को उचित दिशा और स्थान मिल सकेगा।
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डा0हेमन्त कुमार 

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छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी

बुधवार, 19 नवंबर 2014

                         
                           हर युवा दम्पत्ति का यह सपना होता है कि उसके घर के आंगन में
 भी एक नन्हें कोमल प्यारे शिशु की किलकारियां गूंजें। शिशु अपनी अनोखी बाल लीलाओं से उनके सूने घर को गुंजारित करे। उनका यह स्वप्न पूरा भी होता है।उनके घर जब नन्हें मेहमान का आगमन होता है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता।युवा दम्पत्ति जी जान से उसकी देखभाल में तो जुट ही जाते हैं। साथ ही उसकी बाल लीलाओं का भी आनन्द उठाते हैं।
       इस शिशु के बढ़ने के साथ ही उनकी खुशियां बढ़ने के साथ ही जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगती हैं। खासकर शिशु के बकैयां चलने से लेकर उसके स्कूल जाने तक की अवधि हर अभिभावक के लिये बहुत ही ज्यादा जिम्मेदारी वाला समय होता है। इस दौरान बच्चा घुटनों के बल चलना शुरू करता है,पहले वह थोड़ी ही दूर जाता है। फ़िर घर भर में इधर उधर भागता है। हर चीज को देखकर, छू कर महसूस करने की कोशिश करता है। घर में रखे सामानों को बिखराता है। चीजों को फ़ेंकता है। उलट पलट करता है। ऐसी अवस्था में मां बाप दोनों को शिशु के ऊपर कुछ ज्यादा ध्यान देने और थोड़ा अतिरिक्त सावधानी रखने की जरूरत पड़ती है। अन्यथा शिशु को हल्के फ़ुल्के नुक्सान से लेकर बड़े हादसे तक घटित हो सकते हैं।
          मैं यहां पहले उन हादसों का जिक्र करूंगा जिन्होंने बच्चों के मां बाप के साथ ही मुझे भी बहुत गहराई तक झकझोर दिया था। और जिनकी वजह से ही आज मैं यह लेख लिख रहा हूं। आप खुद भी इन घटनाओं को पढ़कर समझ सकते हैं कि यदि उस समय थोड़ी सी सावधानी बरती गयी होती तो कुछ अबोध शिशु असमय मौत के शिकार न हुये होते। ऐसे हादसे जिनकी जिम्मेदारी उनके अभिभावकों की ही थी। ऐसा नहीं कि उन अभिभावकों ने जानबूझ कर ऐसा किया था बल्कि उनकी थोड़ी सी असावधानी ने उनके जीवन की तमाम खुशियां छीन लीं।
            पहली घटना। आज से बीस साल पहले की है। इलाहाबाद में मेरे एक पड़ोसी ठेकेदार थे। बहुत खुशहाल परिवार । घटना उनके एक साल के बहुत सुन्दर सलोने बेटे के साथ हुई। उनकी पत्नी ने कपड़े धोये। उन्हें निचोड़ा और आंगन में ही गन्दे पानी से भरी बाल्टी छोड़कर छत पर कपड़े फ़ैलाने चली गईं। पन्द्रह बीस मिनट बाद वो कपड़े फ़ैलाकर वापस नीचे आईं तो आंगन का दृश्य देखकर चीख पड़ीं। आंगन में उनका एक साल का बेटा बाल्टी में उल्टा पड़ा था। यानि उसका पैर बाल्टी के बाहर और सिर बाल्टी के अन्दर पानी में। चीख सुनकर घर के लिग इकट्ठे हुये। बच्चे को तुरन्त अस्पताल लेकर भागे । पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चिकित्सक बच्चे को नहीं बचा सके। हुआ यह था कि उनके छत पर जाते ही बच्चा वहां आया। उत्सुकतवश उसने भरी बाल्टी के अन्दर झांकने की कोशिश की। और उसी दौरान वह उसमें उलट गया। काश कि उनके छत पर जाते समय कोई उनके बच्चे को सम्हाल रहा होता। य वो बाल्टी का पानी गिराकर गयी होतीं…।
        दूसरी घटना।मेरे अपने ही घर में।मेरी छोटी बहन सपरिवार आई थी।उनका डेढ़ साल का बेटा साथ में था।बैठक में सभी लोग बातचीत में मशगूल थे।दूसरे कमरे में बच्चे खेल रहे थे।इसी बीच कोई बच्चा चीखा।हम सभी भाग कर अन्दर के कमरे में पहुंचे।वहां मेरी बहन के सुपुत्र पाउडर से पूरे नहाये  हुये चीख रहे थे। उसने ट्रन्सपरेण्ट डिब्बे में रखे विम पाउडर को कोई खाने की चीज समझ कर अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की।शायद डिब्बे का ढक्कन ढीला होने के कारण पूरा
विम पाउडर  उसके ऊपर।कुछ मुंह और आंख में भी गया।हम लोगों ने जल्दी से पहले उसे नल के नीचे अच्छी तरह नहलाया फ़िर लेकर भागे डाक्टर के घर।संयोग से विम पाउडर उसके पेट में नहीं गया था। बस थोड़ा आंखों और दांतों में लगा था ड़ाक्टर ने दवायें दीं।शाम तक उसे आराम मिल गया।
        तीसरी घटना।अभी 2साल पहले मेरे पड़ोस में घटी थी।बच्ची के पिता सरकारी नौकरी में और पत्नी शिक्षिका।एक बच्ची 4साल की दूसरी बड़ी।उस दिन पिता आफ़िस और बड़ी बेटी स्कूल में थे।घर पर छुटकी और मां।मां रसोईं में।तभी छुटकी चीखी।मां कमरे में पहुंची तो एक तरफ़ प्रेस लगा था और छुटकी पड़ी चीख रही थी।हुआ यूं कि छुटकी ने मां को किचेन में मशगूल पाया, उसने सोचा कि मैं भी अपनी बड़ी बहन की तरह फ़्राक पर प्रेस कर लूं।वह प्रेस लायी,उसे लगा कर आन किया और पहनी हुई फ़्राक पर प्रेस करने की कोशिश में अपना पैर जला बैठी।
उसे भी इन्जेक्शन,डाक्टर और अस्पताल की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।
              अब आप बताइये इन तीनों घटनाओं में उन अबोध शिशुओं की क्या गलती थी? अगर उनकी गतिविधियों पर मां बाप या किसी बड़े का ध्यान रहा होता तो शायद ये हादसे न होते। इसीलिये इस उम्र के बच्चों की देखभाल में,लालन पालन में बहुत अधिक सावधानी रखने की जरूरत है। ऐसा नहीं कि कोई मां बाप अपने बच्चे के लिये जानबूझकर ऐसी स्थितियां पैदा करता है। वह क्यों करेगा ऐसा? ये तो अनजाने में हुयी थोड़ी सी असावधानी ऐसी परिस्थितियों को जन्म देती है।
 थोड़ी सी सावधानी बच्चे कि सुरक्षा के लिये----
        आइये अब देखते हैं कि इन छोटी उम्र के बच्चों के लालन पालन के दौरान हम किस तरह की सावधानियां अपनाकर उनका जीवन सुरक्षित रख सकते हैं। मैंने पहले ही कहा है कि जब तक बच्चा गोद में ,पालने या बिस्तर पर रहता है तब तक वह आपके सहारे ही घर में इधर उधर जा सकता है। लेकिन जैसे ही वह घुटनों के बल या बकैयां  चलना शुरू करता है वह पूरे घर में घूमने लगता है। और उसकी इस क्रिया से उसके साथ आप भी आनन्दित होते हैं। इस समय बराबर  उसके ऊपर ध्यान देने की जरूरत रहती है।
0 क्या करें?
* सबसे पहले अपने घर में नीचे की तरफ़ लगे हुये सभी इलेक्ट्रिक प्लग प्वाइण्ट बन्द करवा दें। या उन्हें थोड़ा ऊंचाई पर शिफ़्ट करवा दें। क्योंकि इनके खुले रहने पर उत्सुकतावश बच्चा उनके छेदों में उंगलियां डालने की गलती कर सकता है।
*घर की आल्मारियों में नीचे के खानों में कोई भी जहरीला, खतरनाकपदार्थ(फ़िनायल,तेजाब,मिट्टी का तेल,हार्पिक्स,विम एवम डिटर्जेण्ट पाउडर इत्यादि) न रखें।इन वस्तुओं को ऐसी जगह रखें जो आपके शिशु की पहुंच से दूर हो।
*अपने घर के इलेक्ट्रानिक्स और इलेक्ट्रिकल उपकरणों को शिशु की पहुंच से दूर थोड़ा ऊंचाई पर रखें।
*घर में मौजूद दवायें हमेशा बच्चों की पहुंच से दूरऽअल्मारी के ऊपरी खानों में रखें।ताकि बच्चे उन्हें  छू न सकें।
*बाथरूम का दरवाजा हमेशा बन्द रखें।क्योंकि वहां प्रायः ही किसी न किसी बर्तन में पानी भर कर रखा ही जाता है।वहां अकेले जाना बच्चे के लिये घातक हो सकता है।
*जब भी बच्चे को फ़र्श पर छोड़ें,ध्यान रखें उसके आस पास कोई ऐसी वस्तु न हो जिसे वह मुंह में डालने की कोशिश करे। अच्छा होगा कि ऐसे समय मां बाप या कोई बुजुर्ग शिशु के साथ रहें।
*यदि आपका शिशु आंगन में खेल रहा है तो ध्यान रखें कि वह गमलों तक न पहुंचने पाये।वह  गमलों की मिट्टी या किसी जहरीले पौधे की पत्ती तोड़कर मुंह में डाल सकता है जो कि उसके  लिये हानिकर होगी।
*यदि ऊंचे बेड पर शिशु बैठा हो तो उस प्पर नजर रखें कि वह बिस्तर से गिर कर चोटिल न हो  जाय।
*शहरों में परिवार एक या दो कमरों के छोटे मकानों में रहते हैं।उन्हीं दो कमरों में पूरी गृहस्थी का सारा सामान।ऐसी स्थिति में घर का सामान शिशु के रहने के हिसाब से व्यवस्थित करें।
*शिशु को कभी रसोई के अन्दर न जाने दें।वहां वह गैस,फ़्रिज़ आदि छूने की कोशिश करके नुक्सान  उठा सकता है।
*अक्सर मां शिशु को बुरे सपनों से बचाने के लिये उसके बिस्तर के नीचे चाकू,कैंची रखती हैं।इन्हें  ऐसी जगह रखें कि बच्चा उन्हें न छू सके।
*और सबसे अन्तिम बात बकैयां चलना शुरू करने से लेकर स्कूल जाने की अवस्था आने तक मां  बाप में से कोई एक हमेशा शिशु का ध्यान रखे।ताकि कभी भी वह गलती से कोई ऐसी क्रिया न  कर बैठे जो उसके लिये घातक हो।
                ये कुछ ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जिनपर ध्यान देकर आप अपने नन्हें,सुकोमल शिशु का जीवन सुरक्षित रखने के साथ ही अपने परिवार को खुशहाल
रख सकते हैं।
                     00000000
 डा0हेमन्त कुमार

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तकनीकी के विकास में अपराधी बनते बच्चे------।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

         
(फ़ोटो-गूगल से साभार)
 
इधर अखबारों में लगातार प्रकाशित होने वाली किशोर या बाल अपराधों की खबरें बेहद चौंकाने वाली हैं।रोज ही किसी न किसी शहर,स्कूल,कालेज या गांव के कोने में कोई न कोई बालक या किशोर अपराधी बन जा रहा है।और वह भी चेन स्नैचिंग,जेबकतरी जैसे छोटे मोटे अपराधों का नहीं बल्कि समाज के सबसे संवेदनशील हिस्से यानि लड़कियों के प्रति यौन हिंसा का अपराधी।कभी किसी बच्ची के साथ उसके सहपाठियों द्वारा ही छेड़-छाड़ या अश्लील टिप्पणी,कभी मोबाइल पर अश्लील मैसेज भेजने की घटना तो कभी किसी छात्र द्वारा किसी लड़की का वीडियो बना कर उसे सोशल साइट्स पर डालना या ब्लैक मेल करना।
                 पिछली 8 मई 2014 को हिन्दुस्तान दैनिक अखबार में प्रकाशित आगरा शहर की एक खबर ने तो बड़े बड़ों के होश उड़ा दिये थे।बहुतों ने उस खबर को पढ़ा भी होगा।फ़िर भी संदर्भ के तौर पर यहां मैं उस घटना का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं।
          घटना आगरा के ताजगंज क्षेत्र में श्याम लाल मार्ग के पास की एक छोटी सी बस्ती की है।बस्ती की एक सड़क पर पांच बच्चे कंचे खेल रहे थे।कोई कक्षा एक छत्र तो कोई कक्षा तीन का।पड़ोस की एक बच्ची ने उनके पास आ कर छत पर आए बंदरों को भगाने के लिये कहा।क्योंकि उसके मां बाप मजदूरी करने गये थे और वह बंदरों से डर रही थी।पांचों उसकी छत पर गये और बंदरों को भगा दिया।इसके बाद उन्होंने जो किया वो हतप्रभ करने वाला था। पांचों लड़कों ने मिलकर उस लड़की को दबोच लिया और उसके कपड़े फ़ाड़ने लगे।बच्ची के चीखने पर पड़ोसियों ने आकर उस बच्ची को लड़कों के चंगुल से मुक्त कराया।
    पुलिस चौकी पर जब पुलिस वालों ने उन बच्चों से पूछा कि,“उन्हें मालूम है कि वो सभी गैंगरेप की कोशिश कर रहे थे?”तो उन लड़कों का जवाब सुन कर पुलिस वालों के होश फ़ाख्ता हो गये।उन्होंने कहा कि वो क्या कर रहे थे ये उन्हें नहीं मालूम लेकिन उनके पड़ोस में रहने वाले कुछ बड़ी उमर के लड़के उन्हें मोबाइल पर फ़िल्में दिखाते हैं। और उन फ़िल्मों में ऐसा करते दिखाया गया था।वही फ़िल्में देख कर उन बच्चों के मन में वैसा ही करने की बात आई।
       यह खबर सिर्फ़ पुलिस वालों को ही नहीं बल्कि हमें,आपको सभी को स्तब्ध करने वाली है।साथ ही आज के हाईटेक होते जा रहे पूरे समाज को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली है।
    आज जब कि हर हाथ में मोबाइल है।घर घर में इण्टरनेट की सुविधा उपलब्ध है। हम घर स्कूल से लेकर दफ़्तर और बाजार तक हर जगह हाईटेक होते जा रहे हैं।इन नयी बदलती परिस्थितियों के साथ चलने के लिये क्या हम अपने बच्चों को तैयार करने और सही दिशा निर्देश देने का भी काम कर रहे हैं।वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम के एक ताजा सर्वेक्षण से जानकारी मिली है कि हमारे देश के महानगरों और छोटे शहरों तक के 8 से 13 साल उम्र वाले लगभग 73 प्रतिशत बच्चे आज फ़ेसबुक,व्हाट्स ऐप जैसे सोशल नेटवर्क साइट्स पर मौजूद हैं।
    यदि इन आंकड़ों को पूरी तरह सही माना जाय तो हमारे लिये चिन्ता की बात यह है कि बच्चे इतनी कम उम्र में इन सोशल साइट्स पर क्या कर रहे हैं?जाहिर सी बात है कि वो इन साइट्स का उपयोग अपनी शैक्षिक दक्षता या कोई हुनर बढ़ाने के लिये तो नहीं कर रहे होंगे। अगर वो इस दिशा में कोई प्रयास कर रहे होते तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की।लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ये बच्चे वहां मौजूद हैं तो सिर्फ़ नये दोस्त बनाने,रोज अपनी फ़ोटो अपलोड करने,अपने दोस्तों की फ़ोटो देखने या फ़िर चैटिंग करने के लिये।
   प्रश्न यह भी है कि पढ़ने लिखने की उम्र में अविकसित बौद्धिक स्तर वाले इन बच्चों का अपने कीमती समय का ज्यादा हिस्सा इन सोशल साइट्स पर बिताना क्या देश,समाज या उनके परिवार  और खुद उनके हित में है?क्या वे इन सोशल साइट्स पर जाकर उन पर अपलोड किये गये तमाम पोर्न वीडियोज,पोर्न फ़ोटोग्रैफ़्स से बचे रह सकेंगे?क्या उनके अभिभावकों और अध्यापकों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि उनके हाथ में मोबाइल देते समय या उनकी मांग पर घर में इन्टरनेट लगवाते समय अपने बच्चों पर इस बात का प्रतिबंध लगा सकें कि अभी तुम्हारी उमर पढ़ने लिखने,खेलने कूदने की और अपनी स्किल्स को बढ़ाने की है।सोशल नेटवर्क पर सबय बिताने,सर्फ़िंग या चैटिंग करने की नहीं।
    अगर किसी अभिभावक ने अपने बच्चे को सोशल नेटवर्क पर जाने की अनुमति दी है तो भी उसे चाहिये कि वह बीच बीच में उसकी फ़्रेण्ड लिस्ट चेक करें।कभी उसकी वाल पोस्ट चेक करें।इससे उस बच्चे को वह बहुत सारे ऐसे खतरों से बचा सकते हैं जिनका शिकार हो जाने पर बच्चे का सारा विकास बाधित हो सकता है।
     अभी भी वक्त ज्यादा नहीं हुआ है।यदि समाज,देश के साथ ही हमें इन बच्चों का भविष्य बचाना है तो अभिभावकों,अध्यापकों को अपने बच्चों छात्रों को इस दिशा में जागरूक करना होगा।उन्हें समझाना होगा। जिससे भविष्य में किसी अन्य शहर,कस्बे में आगरा में घटित हुयी घटना की पुनरावृत्ति न हो सके।
          0000

डा0हेमन्त कुमार

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तितलियां

गुरुवार, 19 जून 2014


बड़े सबेरे
आंख खुलते ही
मेरे कमरे की
खिड़की से बाहर दिखने
लगता है नन्हीं नन्हीं
कोमल पंखों वाली
रंग बिरंगी तितलियों का
हुजूम।

नीले पीले  हरे लाल रंगों
वाले युनिफ़ार्म
कन्धों पर टंगे कुछ हल्के
कुछ भारी थैलों में बन्द
उंची उड़ान भरने के सपने
आंखों में फ़ूलों की
रंगीन घाटियों की तलाश
चेहरों पर कुछ कर गुजरने की तमन्ना
और अटूट आत्मविश्वास भी
बढ़ाता है इन कोमल तितलियों
का सौन्दर्य।

सुबह की नर्म धूप के
फ़ाहों के बीच से
देखते हुये इन नन्हीं सुंदर
तितलियों को
मन में पैठ जाता है एक
डर अनजाना सा
कभी कभी
कहीं कोई गिरगिट बिसखोपड़ों
या फ़िर शिकारी पक्षियों का
निरंकुश झुंड घात न लगाये हो
इन मासूम कोमल तितलियों के लिये।

उनके सारे कोमल
सुन्दर प्यारे सपनों और भावनाओं
दूर असीमित नीले आकाश में
उड़ने की तमन्ना को
कुचल देने को आतुर
तीक्ष्ण पैनी खुरदुरी
लपलपाती जीभ
लाल जलती हुयी आंखों वाले
खतरनाक
बिसखोपड़ों और गिरगिटों का झुंड।

पर इन तितलियों की
आंखों में चस्पा
एक पूर्ण आत्मविश्वास की झलक
मात्र करती है आश्वस्त
कि
अब पैने कर लिये हैं
इन मासूमों ने भी
अपने नन्हें कोमल पैरों को
और जहरीले पौधों से उधार लेकर
अपने रंगीन पंखों को
बना लिया है जहरीला और तीक्ष्ण
जिनका स्पर्श मात्र
कर देगा नेस्तनाबूद
इन खतरनाक
जीभ लपलपाते गिरगिटों के झुंड को।
इसी लिये
सिर्फ़ इसी लिये तो
अपनी बालकनी में शान्त बैठा हुआ मैं
इन कोमल तितलियों की ऊंची उड़ान
को निहार रहा अपलक अपलक ।
0000
डा हेमन्त कुमार

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नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2)

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

आदरणीय नेता जी,
सादर चरण स्पर्श।
मैंने अपने पिछले पत्र में आप से कुछ बातों का अनुरोध किया था।आशा है आप उन बातों पर तो विचार करेंगे ही। साथ में मैं अपने मित्रों और भाई बन्धुओं की कुछ और बातें भी आज आपके सामने रख रहा हूं। चुनाव जीतने पर आप इन बातों पर भी ध्यान दीजियेगा।
v     आप कभी अपने शहर में ध्यान से देखिये आपको हजारों की संख्या में ऐसी झुग्गी झोपड़ियां मिल जायेंगी जो कूड़े के ढेर के पास,नालों के किनारे या फ़िर किसी बड़ी बिल्डिंग के अगल बगल खाली पड़े मैदानों में बनी हैं।इन्हें आप बड़े लोगों ने स्लम एरिया या मलिन बस्तियों का नाम दिया है।इन बस्तियों में छोटी छोटी झोपड़ियों में हमारा पूरा कुनबा बसता है।इन्हीं में हम रहते हैं।इन्हीं में हम पैदा होते हैं और इन्हीं में मर जाते हैं।
                लेकिन ये हमारे स्थायी निवास नहीं हैं।बस यूं कह सकते हैं कि सर छुपाने का एक ठिकाना मात्र हैं।हर समय हमारे मां बाप के सर के ऊपर एक तलवार लटकती रहती है कि कब हम यहां से उजाड़ दिये आयेंगे।
आदरणीय नेता जी,मेरी उमर सिर्फ़ छः साल है। और इन छः सालों में हमारी झोपड़ी को चार बार शहर के इस कोने से उस कोने में फ़ुटबाल की तरह उछाला गया है।क्या आप चुनाव जीतने के बाद उजाड़े जाने की हमारी इस अन्तहीन यात्रा को रुकवा कर हमारे रहने का कोई पुख्ता इन्तजाम कर सकते हैं?
v     अखबार तो आप भी पढ़ते होंगे। और अक्सर ये खबर भी कि फ़लां गांव में दो साल का राजू बोरवेल के गड्ढे में गिर पड़ा।पूरे देश मैं पिछले तीन चार सालों में हम मासूमों के बोरवेल में गिरने की कम से कम पचास घटनायें तो हुई होगी (संख्या और भी ज्यादा हो सकती है)।इनमें कुछ बच्चों को अथक प्रयासों से बच्चा लिया गया . कुछ अभागे नही बच सके। माननीय महोदय क्या इन सब मौतों को रोकने के लिये कुछ कोशिश करेंगे?
v     अखबार में हर दूसरे तीसरे या कभी कभी रोज ही यह समाचार आते हैं कि “तीन वर्षीय मासूम(लड़का/लड़की) की दुराचार के बाद हत्या”। आप हमारे साथ ऐसीपाशविक और घिनौनी हरकत करने वालों से हमें बचाने की दिशा में भी कुछ काम करेंगे क्या?
v     आप सभी बड़े लोग हम बच्चों को मजदूरी करने से रोकने,बाल श्रम को खतम करने की बातें तो बहुत करते हैं---फ़िर आप अपने घर पर ही 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाने,अपनी कार में आठ नौ साल के बच्चे से पंचर जुड़वाने,अपनी कोठियों पर इसी उमर की हमारी बहनों से झाड़ू पोंछा जैसे घरेलू काम क्यों करवाते हैं?इस तरह तो बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में आप लोगों द्वारा बनायी गयी योजनायें कभी पूरी ही नहीं होंगी।
v     नेता जी,हमारे गांव में पिछले दिनों जहरीली शराब पीकर लगभग तीस आदमी(हमारे बापू सहित) मर गये थे। इस तरह सिर्फ़ हमारे गांव में लगभग मेरे जैसे सत्तर बच्चे अनाथ हो गये थे। पूरे प्रदेश और देश में हर साल ऐसे हजारों बच्चे अचानक अनाथ हो जाते हैं।आदरणीय नेता जी क्या आप इस जहर पर भी किसी तरह कोई रोक लगा सकेंगे?
v     चलते चलते एक बात और बता दूं महोदय कि मेरे कुल सात बहनें और दो भाई हैं।मेरे बापू हम सभी को आज तक कभी भर पेट खाना नहीं खिला सके।क्योंकि हमारा कुनबा बहुत बड़ा हो गया।बापू की आमदनी उतनी है नहीं।जरा सोचिए आप मेरे ही बापू की तरह हजारों बापू ऐसे होंगे जो एक अदद बेटे की चाह में कई-कई बेटियों को जन्म देते हैं।भले ही उन्हें भर पेट खाना न खिला सकें।क्या आप हमारे बापू जैसे करोड़ों इन्सानों की बेटा बेटी में फ़र्क करने की इस अमानवीय मानसिकता में बदलाव लाने के लिये कुछ प्रयास करेंगे?
          आदरणीय नेता जी,ये कुछ बातें थीं जो मैं आप तक पहुंचाना चाहता था।
हम बच्चों की इन बातों पर विचार करके,इन्हें दूर करने की दिशा में यदि आप कुछ भी प्रयास करेंगे तो शायद यह देश के हम सभी बच्चों का सौभाग्य होगा। और अपने बचपन का सही आनन्द उठा सकेंगे।
शुभकामनाओं के साथ।
 आपके गांव का
एक बच्चा

                               0000

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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