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एक हिन्दी कथाकार का बालसाहित्यकृती होना

गुरुवार, 10 मार्च 2022

 आज मेरे पिताजी हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्व०श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का 93वां जन्म दिवस है।आज वो हमारे बीच न होकर भी अपने साहित्य के माध्यम से हम सभी के बीच उपस्थित हैं।उनका लेखन हिन्दी कहानियों और हिन्दी बाल साहित्य के लिए बहुत बड़ा योगदान है।उनका आशीर्वाद हम सभी का मार्गदर्शन करता रहेगा।उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है हिंदी बाल साहित्य के प्रतिष्ठित आलोचक श्री बंधु कुशावर्ती द्वारा लिखा गया यह मूल्यांकनपरक,समीक्षात्मक लेख।


 

             एक हिन्दी कथाकार का बालसाहित्यकृती होना

                                                  लेखक-बंधु कुशावर्ती 



  

     

  प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्वातंत्र्योत्तर कालीन हिन्दी बाल साहित्यकार हैंबाल साहित्य लेखन से पहले वह हिन्दी कथाकार के रूप में 1950 से निरंतर हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं(कल्पना, ज्ञानोदय,विशाल भारत,नई कहानी,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग आदि)में प्रकाशित होते हुए स्वयं को प्रतिष्ठित कर चुके थे।सन1965-66 से वह बाल साहित्य लेखन में संलग्न हुए तो इस दिशा में भी क्रमशः लिखते हुए न केवल हिन्दी बालसाहित्य को समृद्ध किया बल्कि समकालीन बाल साहित्यकारों में एक रचनाशील व्यक्तित्व के रूप में भी पहचाने गए।

             

                 


      उत्तर प्रदेश का शिक्षा प्रसार विभाग भी आजादी के बाद पहली बार संपूर्णानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में नई सोच समझ के साथ नवोन्मेषित हुआ था।तब वह इस विभाग में एक प्रचार अधिकारी के रूप में आये।अब के प्रचार अधिकारीयों के बजाय तब के प्रचार अधिकारी  सर्जनात्मक प्रतिभा से भी संपन्न हुआ करते थे।द्वितीय पंचवर्षीय योजना में देश के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी शिक्षा के तंत्र समेत विद्यालयों को शिक्षनेतर सक्रियताओं के द्वारा अग्रगामी बनाए जाने संबंधी अनेकानेक योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा था।शिक्षा विभाग ने इलाहाबाद से जहां कुछ कल्पनाशील व अन्यान्य बालोपयोगी साहित्य का प्रकाशन शुरू किया,वहीं सीधे विद्यालयों तक पहुंचाने के उद्देश्य से “बेसिक बाल शिक्षा” नामक स्तरीय बाल पत्रिका के विभागेतर स्तर पर मुद्रण एवं सम्पादन प्रकाशन को प्रोत्साहन दिया।इसी दौर में शिक्षा प्रसार विभाग में स्थापित अत्यंत समृद्ध फिल्म यूनिट देश में पहली थी जिसमें अपने स्टूडियो,कैमरा,लैब,तकनीशियन,फिल्म अधिकारी समेत फिल्म निर्माण की सम्पूर्ण व्यवस्था भी थी।

    

             


       यही कालखंड है जब प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव हिन्दी बाल साहित्य के लेखन और विभागीय फिल्म निर्माण से भी सक्रिय रूप से जुड़े।उन्होंने अपने पद के दायित्व निर्वाह के साथ ही विभाग द्वारा बनायी जाने वाली शैक्षिक फिल्मों के अलावा निराला जी आदि कई हस्तियों पर बनाई जा रही फिल्मों के आलेख आदि भी लिखे।तो यथा आवश्यकता बच्चों के लिए कहानियां,नाटक एवं प्रेरक प्रेरणादायक सामग्री भी प्रायः लिखने लगे।

  


      ऎसी प्रारम्भिक सामग्री की उनकी पुस्तकों में सन 1971 में प्रकाशित एक उल्लेखनीय कृति है—“जिस देश में हमने जन्म लिया”।इससे पहले “मंदिर का कलश”, “हम सेवक आपके”, “यह धरती है बलिदान की”, “अरुण यह मधुमय देश हमारा” आदि उनकी बच्चों के लिए लिखी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।इस पुस्तक में प्रकाशक का वक्तव्य है –“प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव-गत बीस वर्षों से प्रेरक और जीवंत साहित्य का सृजन कर रहे हैं।उनकी सैकड़ों कहानियां उच्च कोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुयी हैं।

     


      इससे स्पष्ट है कि प्रेमस्वरूप जी आजादी के बाद से ही मुख्य धारा के लेखन में प्रवृत्त लेखकों की कतार में शामिल हो गए थे।परन्तु यहाँ मैं उन्हें उनके बाल साहित्य लेखन तक न रखते हुए कहूँगा कि बच्चों के लिए उनका लिखना महज औपचारिक नहीं था।अपने लेखन से वह बच्चों को महत्वपूर्ण लेखन देते हुए उनके मानस और चरित्र निर्माण का उद्द्येश्य भी पूरा करते थे।मसलन “जिस देश में हमने जन्म लिया” के “स्वर्ग से महान” लेख को पढ़ते हुए बच्चे को सहज ही अपने देश भारत की बहुत सी विशेषताएं जानने को मिल जाती हैं।तो “संतों का प्रकाश” उसे देश के अनेक संतों-महात्माओं,जगद्गुरु शंकराचार्य,गौतम बुद्ध,कबीर,नानक,चैतन्य महाप्रभु,स्वामी रामतीर्थ,महात्मा गांधी आदि से परिचित करा देता है।इन्द्रधनुष के जैसा रोचक परिचय इस पुस्तक से मिलता है,वह अन्यत्र दुर्लभ ही होगा।एक वाक्य में कहें तो यह पुस्तक अपनी सामग्री से अपने विविधवर्णी भारत देश का अनेकविध  परिचय करा देती है।

      


           सच बात यह है कि प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का बाल साहित्य प्रारम्भ से ही बच्चों को अपने देश,उसकी महत्ता,उसकी विभूतियों,उसकी बहुरंगी छवियों और सुषमा से इस तरह परिचित कराते हैं कि वे देश प्रेम के रंग में स्वतः ही रंग जाएं।दूसरी ओर हाथी,घोड़ा,ऊंट और लामा जैसे मित्र पशुओं की रोचक जानकारी वह अपनी पुस्तक“हमारे ये सच्चे मित्र”(1986) पुस्तक से देते हैं।तो “हम सेवक आपके”(1986) कृति के द्वारा रेनडियर,याक,भेड और कुत्ता जैसे जानवरों का परिचय देते हुए बताते हैं कि एक से लगते हुए भी ये जीव दुनिया के अलग-अलग देशों में किस रूप में जाने जाते हैं।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(1981) में“जिस देश में हमने जन्म लिया” पुस्तक से मिलती जुलती सामग्री होने के बावजूद बच्चों को अपने देश भारत की व्यापक छवि का परिचय मिलता है।

     


        प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के पूर्वोक्त बालसाहित्य से गुजरते हुए उनकी  प्रवाहमयी भाषा और रोचक लेखन शैली गवाही देती चलती है कि उनमें बच्चों के कथाकार,उपन्यासकार और नाटककार की समर्थ रचनात्मकता भी साँसें लेती रही हैं।आकाशवाणी के इलाहाबाद केंद्र के लिए प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रारम्भ से ही बच्चों के लिए नाटक लिखते रहे हैं।आकाशवाणी यानि रेडियो के लिए नाटक लिखना वो भी बच्चों के नाटक,सामान्य या मंच-नाटक से भिन्न कोटि का लेखन होता है।संवादों का स्वरूप ही नहीं शब्द चयन भी मंच की शब्दावली से अलग होता है।परन्तु रेडियो के नाटक चूंकि ज्यों का त्यों छापे जाने का चलन नहीं है,अतः प्रेमस्वरूप जी रेडियो के नाटकों को बच्चों के लिए बहुधा मंचीय नाटकों में रूपांतरित करते रहे हैं।

 


                “मेरा देश जागे”(1971)उनके ऐसे 4 मंचीय बाल नाटकों का संकलन है।जो आपसी द्वेष-वैमनस्य के बजाय प्रेम और सौहार्द्र की चेतना जगाते हैं।“मानस के चार फूल”(1974)रामकथा के विभिन्न रोचक और प्रेरक प्रसंगों पर केन्द्रित नाटकों का संकलन है।यह भरत और जटायु जैसे चरित्रों पर केन्द्रित होने के साथ ही “यज्ञ की रक्षा” तथा “सीता की खोज” शीर्षक से तुलसीकृत मानस के प्रसंगों को बाल नाटक के रूप में प्रस्तुत करती महत्वपूर्ण कृति है।“मदारी का खेल” भी 4 बाल नाटकों का संकलन है जो नवोदितों यानी नई पीढी को देश की शक्ति के अक्षय स्रोत मान कर लिखे गए हैं।“वीर बालक भीमा”(1992 संस्करण) राजस्थान के शूरवीर महाराणा प्रताप के युद्ध काल में एक ऐसे भील बालक के चरित्र को प्रस्तुत करता है जिसमें राणा प्रताप की तरह मातृ भूमि के प्रति त्याग और समर्पण का जज्बा है।यह प्रेमस्वरूप जी की बहु चर्चित,बहु मंचित और बहु प्रशंसित बाल नाट्य कृति है।

     


     उपर्युक्त क्रम में मैं कृती बाल साहित्यकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव की दो और बाल नाट्य कृतियों की चर्चा यहाँ विशेष रूप से करूंगा।एक—“आँखों का तारा”(1990) एवं दो-“एक तमाशा ऐसा भी”(2018)।

         


        “आँखों का तारा” इस कृति शीर्षक के अलावा दूसरा बाल नाटक “वन की पुकार” है।जिसमें वनप्रांतर और जंगलों यानि पेड़ों के अंधाधुंध कटाई के दुष्परिणाम को बहुत ही मार्मिकता से उजागर किया गया है।इस नाटक का मूल कथ्य इतना भर है कि पेड़ों के कटने से जंगल के जीव जंतुओं के प्रति असहिष्णुता किस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित करती है। एक दिन ऐसा भी आ जाता है की स्वयम मानव जीवन के लिए हमारा वातावरण और पर्यावरण कैसा मरणान्तक बन जाता है।विभिन्न वृक्ष,वन्य-जीव,वनदेवता और वनदेवी के साथ मनुष्य इसके चरित्र और पात्र हैं।शीर्षक नाट्य कृति “आँखों का तारा” का कथ्य भी नया यानि देश में“सर्वश्रेष्ठ नगर” का चयन है।इसमें देश के वाराणसी,लखनऊ,इलाहाबाद,बंबई, दिल्ली,कलकत्ता,शिमला,बैंगलोर,पंजिम,चितारंचन,उदयपुर आदि अपनी अचल नगरीय वेशभूषा में मंच पर आकर अपनी विशेषताएं बताते हैं।और अंत में सौहार्द्र पूर्वक राजस्थान के शहर उदयपुर को देश के सभी नगरों में आँख का तारा चुना जाता है।इसलिए कि वह वीरता और प्राणोंत्सर्ग की भूमि है।इसके माध्यम से पूरे देश को सदैव देश-रक्षा में प्रस्तुत होने का सन्देश जाएगा और देश सुरक्षित रहेगा तो यहाँ की प्राकृतिक सुषमा,संपदा,धन-धान्य,कल-कारखाने,उद्योग-धंधे यानि सब कुछ बचा रहेगा और देश समृद्ध होगा।



          “एक तमाशा ऐसा भी”(2018)प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का नवीनतम प्रकाशित बाल नाट्य संकलन है।इसमें पूर्व प्रकाशित बाल नाटकों “वीर बालक भीमा”, “वन की पुकार”, “आँखों का तारा” के अलावा “शेर बच्चे”, “मौत के चंगुल में”, “कृति शीर्षक बाल नाटक “एक तमाशा ऐसा भी” संकलित हैं।“शेर बच्चे “देशभक्ति के प्रति गहरे समर्पण से जुड़ा है।जिसमें गुलाब और असगर दो सहपाठी बच्चे आगे पढाई के लिए शहर जाने के बजाय देश की सीमा पर बसे गाँवों में आगजनी और जन-धन की हानि पहुंचाने वाले दुश्मनों का सुराग लाने का निश्चय प्रतिफलित कर दिखाते हैं।“मौत के चंगुल में”,शमशेर और बालचंद नामक दो दिलेर बच्चे छुट्टन और कतलू खां जैसे खूंखार डाकुओं को अपनी बुद्धि से रस्सियों में बाँध कर पुलिस के हवाले करने का साहसिक कारनामा जिस तरह कर दिखाते हैं,उसमें हास्य नाटक का भी रोचक पुट है।“एक तमाशा ऐसा भी” सामाजिक समरसता का बाल नाटक है।मौलवी और पंडित जैसे वयस्क पात्रों को एकता का सन्देश देने में बेटे करीम व रामू के साथ उनके साथी बच्चों की सूझ बूझ उभर कर आती है।संक्षेप में कहूँ तो प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के बाल नाटक बच्चों को सचमुच देश का सजग,सुयोग्य नागरिक और जिम्मेदार सामाजिक सदस्य बनने का सन्देश देते हैं।विषयानुरूप एवं पात्रानुकूल भाषा श्री प्रेमस्वरूप जी के बाल नाटकों की विशेषता है।

    


श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी एक सफल बाल नाटककार के साथ ही एक कुशल बाल कहानीकार, किस्सागो और उपन्यासकार भी थेमैं यहाँ उनकी बाल कहानियों की चर्चा न करके उनके 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित उपन्यास “मौत के चंगुल में” की चर्चा विशेष रूप से करना चाहूँगा क्योंकि इसका कथ्य और पात्र दोनों ही आम बाल उपन्यासों से अलग हटकर हैं।     

   


           साहसिक समुद्री यात्रा का श्रेष्ठ बाल उपन्यास :मौत के चंगुल में ---प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव बच्चों के कथाकार और उपन्यासकार के रूप में भी सिद्धहस्त और सफल हैं।“मौत के चंगुल में” उनका बहुचर्चित और सफल बाल उपन्यास है।इसे किसी भी विदेशी श्रेष्ठ उपन्यास के समकक्ष रखा जा सकता है।यह पानी के जहाज से ऐसे बच्चों की समुद्री यात्रा का रोमान्चक वृत्तांत है जिनमें किसी न किसी तरह की शारीरिक अपंगता अक्षमता है।इन्हें वाटसन नामक व्यक्ति(शिक्षक)अपने स्कूल में अपने खर्चे पर रखता है।उनका पालन पोषण करते हुए महसूस कराता है कि वे शारीरिक अक्षमता के बावजूद दयनीय नहीं हैं।अपने चार दोस्तों के साथ यह स्कूल चलाने के लिए वाटसन समर्थ और धनिक लोगों की सहायता भी जुटा लिया करता था।इस सब में उसे असीम खुशी महसूस होती है।हालांकि उसके जीवट और कुशलता का लोहा मानते हुए भी लोग उसे सनकी कहा करते थे।ऐसे ही जब वाटसन ने तय कर लिया किया कि उसको स्कूल के अंधे,बहरे,गूंगे लंगड़े-लूले व बदसूरत बच्चों जैसे कुछ और भी बच्चे अगर मिल जाएँ  और कुछ मदद करने वाले भी उसका साथ दें तो वह समुद्री जहाज से ऐसे बच्चों को पूरी दुनिया की सैर करवा देगा।संयोग कुछ ऐसा बना कि वाटसन को इस काम में सहायता देने वाले तो मिले ही,दुनिया भर से लगभग 650 बच्चे जुट गए।यह समुद्री जहाज “एटलस” जब भारत पहुंचा तो इसमें 50 भारतीय बच्चे और शामिल हो जाते।

   


                भरपूर तैयारियों के बाद 25 दिसंबर को जहाज के कप्तान और इतने सारे बच्चों की देखभाल के माकूल इंतजाम समेत “एटलस” नमक समुद्री जहाज न्यूयार्क बंदरगाह से अपनी विश्व-यात्रा परा निकल पडा।दुनिया के मशहूर बंदरगाहों –जार्जटाउन,सौथैम्प्तन,जिब्राल्टर,पोर्ट सईद,मुम्बई,सिडनी,शंघाई,याकोहामा,होते हुए सैन्फ्रंसिसको,लौट कर यह यात्रा पूरी होनी थी।यह समुद्री जहाज भारत के मुम्बई बंदरगाह पर पहुंचा जहां सारे बच्चों का खूब स्वागत सत्कार हुआ और भारतीय बच्चों का दल भी इसमें शामिल हो गया।पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार सारे बच्चों की भारत दर्शन यात्रा भी हुयी।जयपुर में सहसा एक संन्यासी इन सबसे मिला और इन्हें आगाह भी किया की आगे की यात्रा के दौरान रास्ते में इनके ऊपर भयानक संकट भी आ सकता है।पर हिम्मत बनाए रखने और भगवान पर भरोसा करने से वो संकट दूर भी हो सकेगा।सचमुच ऎसी ही कुछ घटनाएँ घटी भी लेकिन किसी जान-माल का नुक्सान नहीं हुआ।परन्तु जापान के याकोहामा बंदरगाह से जब एटलस आगे की यात्रा परा था कि समुद्री तूफ़ान की चपेट में आ गया।और उसका सन्देश संवाहक यंत्र खराब हो जाने से जहाज का पूरी दुनिया से संपर्क भी ख़तम हो गया।जब तक सूचना थी उसी के आधार पर “एटलस”की खोज और रक्षा के लिए विभिन्न देशों के जहाज बचाव के लिए निकल पड़े।अंततः “एटलस” की इस रोमांचक समुद्री यात्रा का सुखद अंत हुआ और उसे तथा सारे बच्चों के साथ ही जहाज पर सवार शिक्षकों,नर्सों,सेवकों सभी को बचा लिया गया।

   


      प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के इस बाल उपन्यास की प्रवाहमयी भाषा,रोचक शैली और सबसे बढ़कर यह रोमांच कि अब आगे क्या होगा--–ये कुछ ऐसे गुण हैं जो बच्चों को क्या बड़ों को भी इस बात के लिए मजबूर कर देंगे कि वो उपन्यास पूरा पढ़ कर ही छोड़ें।

     


     यदि हम समग्र रूप से श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य पर विहंगावलोकन करें तो पायेंगे कि उनके नाटक,कहानियां,बाल उपन्यास सभी कुछ बच्चों का मनोरंजन करने के साथ ही उनमें नैतिकता,देश-प्रेम,सौहार्द्र,सामाजिकता जैसे गुणों का विकास भी करेंगे।उनका साहित्य इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वो 1950 में लिखना शुरू करके आज की परिस्थितियों,बदलावों से भी रूबरू होते रहे और अपनी रचनाओं को आज के बच्चों की डिमांड के अनुरूप सर्जित किया।यह उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है।

                          

                                       

००००  


लेखक-बंधु कुशावर्ती



परिचय:० अवध-क्षेत्रीय शहर सुल्तानपुर(उ०प्र०) के सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले मध्यवर्गीय परिवार में 5 अक्टूबर1949 को जन्म।14-15वर्ष की छात्रावस्था से ही लेखन की शुरुआत।मूर्धन्य लेखकों का निरंतर सान्निध्य लाभ।विविध विधाओं में मुख्य-धारा के लेखन-प्रकाशन का पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत सिलासिला।समानांतर ही बाल साहित्य,बाल रंगमंच के बहुविध लेखन व क्रियाकलापों में संलग्न।सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रकारिता से भी सघन-जुड़ाव।बाल-साहित्य विषयक गहन मूल्यांकन व विवेचानापरक साहित्य इतिहास लेखन।समीक्षा-आलोचना केन्द्रित 3 खण्डों की लेखानाधीन शोधकृति।बाल्साहित्यालोचन:अभिनव हस्तक्षेप” प्रकाशित।

०2014में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा बाल साहित्य पत्रकारिता के लिए “लल्ली प्रसाद पाण्डेय बाल साहित्य पत्रकारिता” सम्मान से समादृत  

संपर्क:456/247,दौलतगंज,(साजन मैरिज हाल के सामने),डाकघर:चौक,लखनऊ-226003,मोबाइल-08840655314           

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