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बाल मन को गुदगुदाती “शब्दों की शरारत”

शनिवार, 26 मार्च 2022

 बाल साहित्य समीक्षा


            बाल मन को गुदगुदाती “शब्दों की शरारत”




                    पुस्तक-शब्दों की शरारत


                     कवयित्री-दिशा ग्रोवर


                     प्रकाशक-प्रकाशन विभाग


                      सूचना और प्रसारण मंत्रालय


                          भारत सरकार

   


हिंदी बाल साहित्य में अगर किसी विधा में सबसे ज्यादा लिखा जा रहा है तो वह है बाल कविता।इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लिखने वालों का एक बड़ा भ्रम भी है कि किसी विषय को लेकर कुछ भी तुकबंदी कर दी जाय तो वह बाल कविता बन जाती है।दूसरे पात्र पत्रिकाओं के अलावा इंटरनेट द्वारा मुफ्त में दिया गया स्पेस और अभिव्यक्ति के फेसबुक,ब्लाग, व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफार्म।जिनपर कुछ ही सेकंड्स में लिखी गयी रचना आप पूरी दुनिया के सामने परोस सकते हैं।हां यह बात जरूर है कि इन दिनों लिखी जा रही सभी बाल कवितायेँ बाल मन के कितनी अनुरूप हैं,उनमें लिखा गया विषय कितना महत्वपूर्ण है इस बात से रचनाकारों को ज्यादा मतलब नहीं।

    

लेकिन इन सब परिस्थितियों के बावजूद कुछ चुनिन्दा युवा बाल साहित्यकार ऐसे भी हैं जो बेहतरीन बाल कवितायें लिख रहे हैं और लगातार प्रकाशित भी हो रहे हैं।जिन्होंने अपनी बेहतरीन बाल कविताओं के बल पर बाल कविता लिखने वालों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बना ली है।ऐसे युवा रचनाकारों में शादाब आलम,फहीम अहमद,निश्चल,पूनम श्रीवास्तव,रोचिका शर्मा,दिशा ग्रोवर,सृष्टि पाण्डेय जैसे कुछ नाम यहाँ रेखांकित किये जा सकते हैं।

        

दिशा ग्रोवर वैसे तो काफी पहले से बाल कवितायेँ लिख रही हैं।देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं-–बाल भारती,बाल किलकारी,बच्चों का देश,उजाला,देवपुत्र आदि के साथ ही कई अखबारों-–दैनिक ट्रिब्यून,समाज्ञा,बाल भास्कर आदि में दिशा की बाल कवितायें प्रकाशित होती रही हैं और सराही भी जाती रही हैं।इनकी कविताएँ साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” में भी संकलित हैं।बाल साहित्य की स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में दिशा का एक बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” भी कुछ दिनों पहले ही प्रकाशित हुआ है और अपनी अलग बुनावट और कहानी और नाटक के सम्मिश्रण की अलग तकनीक के कारण काफी चर्चित भी हुआ है।इस तरह पिछले कुछ समय में ही दिशा ने अपनी बाल साहित्य की रचनाओं के माध्यम से उभरते बाल साहित्यकारों में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी है।

    

लेकिन अभी हाल में ही भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित दिशा ग्रोवर का बाल कविता संग्रह “शब्दों की शरारत” दिशा का पहला बाल कविता संग्रह है।


“शब्दों की शरारत” में दिशा की कुल 52 बाल कवितायें संकलित हैं।मैंने पहले भी पत्र पत्रिकाओं में दिशा ग्रोवर की कवितायेँ पढी हैं।लेकिन इस कविता संकलन के माध्यम से एक बार फिर से दिशा की बाल कविताओं को फिर से पढने और बार बार पढने का अवसर मिला है।दिशा की इन कविताओं में एक नयापन,सम्प्रेषण की एक नयी दृष्टि,शब्दों से सचमुच खेलने की एक नई तकनीक दिखाई पड़ती है जो दिशा की इन बाल कविताओं को भीड़ से अलग करती है और दिशा ग्रोवर को एक अलग पहचान देती है।

  

दरअसल इस कविता संकलन का शीर्षक “शब्दों की शरारत” ही अपने आप में अलग अनूठा है।शीर्षक ही हमे यह बताता है कि इस संकलन की कविताओं में कवयित्री ने बच्चों के स्तर पर उतर कर उनके मनोभावों के अनुकूल ही शब्दों की शरारत की है और उन्हें अपनी कविताओं में पिरोया है।शरारत का मतलब ही है कुछ चुलबुलापन,कुछ शैतानी,कुछ धमाचौकड़ी,कुछ गड़बड़झाला,कुछ चेंचामेंची और कुछ खिलान्दडापन।और इस संकलन की बाल कविताओं में ये सभी बातें मौजूद हैं जो इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको बच्चों के मनोभावों के एकदम नजदीक पहुंचाती हैं।और हमें बाल मन की गहराइयों में उठने वाले प्रश्नों,सवालों,जरूरतों से रूबरू कराती हैं।

  

अगर इस संकलन की शीर्षक कविता “शब्दों की शरारत” की ही बात करें तो कविता की पहली चार पंक्तियाँ ही बच्चों को शब्द शक्ति के बारे में बताती है ---


“शब्दों की क्या ख़ूब शरारत


देते किस्से गढ़ हजार।


कहानी,कविता या कहावत


रचते रहते बार बार।”


ये पंक्तियाँ एक तरह से इस कथन की व्याख्या है कि शब्दों में बहुत शक्ति होती है तभी तो शब्द को काव्यशास्त्र के विद्वानों ने ब्रह्म का दर्जा दिया है।

   

इस कविता संकलन में हमें विषयों की विविधता तो मिलती ही है साथ ही हर विषय की कविता नए प्रयोग भी मिलते हैं।संकलन में एक तरफ सर्दी आई,छमछम बरसे पानी,सुन्दर चन्दा,बूंदों ना ललचाओ,सुबह सुहानी बादल तो हैं दोस्त हमारे जैसी कविताओं के माध्यम से कवयित्री पाठकों को प्रकृति के नजदीक ले जाकर उनका बहुत सूक्ष्मता से दर्शन कराती है तो दूसरी और मेरा परिवार,मां तुम हो या नानी,मां का प्यार,शिक्षक मेरे देव समान,दादी नानी,नानी की चाय,चुटकुले से मामा जी,राखी किसको बांधूं मैं,जैसी कविताओं के माध्यम से पाठक सामाजिक सरोकारों,रिश्तों की गरमाहट और सामाजिक बोधों से मिलता चलता है।एक तरफ — तितली रानी,चिड़िया रानी,जंगल में कोरोना,बन्दर भागा जान बचाकर,मस्तराम हाथी जैसी कविताओं के माध्यम से पाठकों को जीव जंतुओं से मिलवाया गया है,उनके प्रति संवेदना जगाई गयी है तो दूसरी तरफ-- तरह-तरह की गुदगुदी,परछाईं-- जैसे एकदम अनछुए विषयों पर बहुत रोचक बाल कवितायेँ भी कवयित्री ने लिखी हैं।

    

यहाँ मैं कुछ कविताओं की चुनिन्दा पंक्तियों का भी उल्लेख करूंगा जिनसे कवयित्री द्वारा की गयी “शब्दों की शरारत” उभर कर सामने आ जायेगी।“मेरा बस्ता” शीर्षक कविता में कवयित्री की पंक्तिया हैं—


बसते को भी छुट्टी के दिन


क्या आलस मुझसा है भाता?


दिन भर कैसे-कैसे यह भी,


सोते-सोते अरे बिताता।

---अब इन पंक्तियों को पढ़ कर बाल पाठकों को लगेगा अरे मेरा बस्ता भी दिन भर सोता है?और निश्चित ही वो इस कल्पना मात्र से आनंदित होगा।इसी तरह “उलटम-पलटम” कविता की ये पंक्तियाँ भी बच्चों को आनंदित करेंगी---


उलटम-पलटम जब हो जाए


शेर घास से भोज बनाए।


छेड़े राग संग जूं जूं जूं


राजा मच्छर रौब जमाए।


अब यहाँ देखिये बच्चा इस कविता को पढ़ कर ही प्रफुल्लित होगा कि शेर घास का खाना बना रहा,मच्छर जंगल का राजा बन गया---मतलब उस जंगल में सबकुछ उलटा पुलटा हो गया है।अब बाल मन को कल्पना के घोड़ों पर उड़ाने वाली अनुभूति को “जी चाहे जब मजे से”—कविता की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है—


मछली के समंदर में


घर मेरा भी होता,


जी चाहे जब मजे से


झूल लहर पर जाता।

      


एक बात का मैं यहाँ और उल्लेख करना चाहूँगा जो सभी प्रतिष्ठित और नवोदित बाल साहित्यकारों के लिए एक सन्देश भी है।दिशा ग्रोवर ने इस संकलन के शुरू में “कुछ बातें:अपनों से अपनी-सी” शीर्षक से लिखे गए अपने वक्तव्य में लिखा है ----“मैं मानती हूँ की बाल साहित्य बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी होता है।सो बड़ों को भी जरूर पढ़ना चाहिए।”कवयित्री का यह सन्देश सभी रचनाकारों के साथ ही अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर वो भी बाल साहित्य—कहानियां,कवितायें, नाटक, उपन्यास नहीं पढेंगे तो अपने बच्चों को पढने के लिए प्रेरित कैसे करेंगे।और फिर बालसाहित्य में बड़ों,अभिभावकों के लिए भी बहुत कुछ मनोरंजक सीख देने वाले तत्व मौजूद रहते ही हैं।इस दृष्टि से कवयित्री की “सुबह सुहानी” शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भी बहुत सार्थक और महत्वपूर्ण हैं----


बूढों को भी सुबह सुहानी


आस दिलाती है जीने की।


जैसे छलकें प्याले में से


बूंदें भैया अमृत की सी।

 

     


कुल मिलाकर रंग-बिरंगे चित्रों से सजा हुआ दिशा ग्रोवर का यह बाल कविता संकलन निश्चित रूप से बाल पाठकों को शब्दों की नयी नयी शरारतों से तो मिलवायेगा है,उनके मन को जगह-जगह आंदोलित करेगा,उन्हें गुदगुदायेगा,उनके अन्दर उत्साह भरेगा,उनका मनोरंजन करेगा तो दूसरी ओर उनके भीतर सामजिक रिश्तों,परिवार,घर के बीच संबंधों की मिठास भी घोलेगा।प्रकृति के नजदीक ले जाएगा तो जीव जंतुओं के प्रति संवेदनशील भी बनाएगा।देश,मातृ-भूमि के प्रति सजग बनाएगा तो उन्हें एक बेहतर इंसान भी बनाएगा।दिशा ग्रोवर का यह बाल कविता संकलन निश्चित रूप से हिन्दी के बाल साहित्य को समृद्ध करेगा।

                    

                                    ००००


समीक्षक:


हेमन्त कुमार


        

                     

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“काफिला” लोक नाट्य संस्थान का बेहतरीन पुतुल उत्सव

मंगलवार, 22 मार्च 2022

 

“काफिला” लोक नाट्य संस्थान का बेहतरीन पुतुल उत्सव

     


कठपुतली नाटिका के दृश्य 

                   आज इंटरनेट,टी०वी०चैनल्स और मोबाइल के दौर में हम सभी और हमारे बच्चे दुनिया के एक बेहतरीन सम्प्रेषण माध्यम और लोक कला “कठपुतलियों” को भूलते जा रहे हैं।बच्चों को तो छोडिये समाज का आम आदमी भी इन बेजान लेकिन खुबसूरत,आकर्षक कठपुतलियों को भूलता जा रहा है।जबकि आज से कुछ ही वर्षों पहले तक ये कठपुतलियाँ मेलों,उत्सवों,धार्मिक एवं सामाजिक समारोहों की शान हुआ करती थीं।लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही बच्चों को शिक्षा देने,किसी विषय के लिए समाज में जागरूकता फैलाने के लिए भी इनका उपयोग किया जाता था।

          


इतना ही नहीं प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए कटिबद्ध एन सी ई आर टी,सी आई ई टी नई दिल्ली,एस आई टी लखनऊ,यूनिसेफ,आई सी ड़ी एस,दूरदर्शन  जैसी प्रतिष्ठित और बड़ी संस्थाओं ने स्कूलों के लिए दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले शैक्षिक वीडियो कार्यक्रमों में भी इन कठपुतलियों का विभिन्न रूपों में प्रयोग किया और विभिन्न कठपुतली संचालकों की सहायता से कठपुतली आधारित विभिन्न विषयों के कार्यक्रम बनाए।इन संस्थाओं द्वारा बनाए गए कठपुतली आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों की संख्या दो हजार से ऊपर ही होगी।दुःख की बात है कि इनमें से हजारों कार्यक्रम तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों में परिवर्तन होने के कारण आज भी वीडियो टेप लाइब्रेरीज में दफन हैं लेकिन कुछ कार्यक्रम आज भी सी आई ई टी नई दिल्ली के पोर्टल एन आर ओ ई आर पर देखे जा सकते हैं।      

             


            आज जब कि तमाम इलेक्ट्रानिक और डिजिटल माध्यमों की चकाचौंध में ये महत्वपूर्ण कठपुतली कला लुप्त होती जा रही है,इसे बचाने के लिए कुछ गिनी चुनी संस्थाएं और कठपुतली कलाकार बिना किसी सरकारी सहायता के इस कला को बचाने और जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं।

          

उपस्थित बच्चे शिक्षक 


           ऎसी ही एक महत्वपूर्ण संस्था है लखनऊ की “काफिला लोक नाट्य संस्थान”। जो पिछले लगभग बीस सालों से कठपुतली कला को बचाने और संरक्षित करने के लिए कटिबद्ध है।“काफिला”देश के विभिन्न ग्रामीण,शहरी इलाकों में कठपुतली नाटकों के प्रदर्शन के साथ ही हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस के अवसर पर विभिन्न आयोजन करती है।

  

मेराज आलम 


        इस साल भी “काफिला” ने अपना 17वां विश्व पुतुल दिवस 21मार्च 2022 को  लखनऊ के सेंट जेम्स स्कूल,गोमती नगर के सभागार में आर0जी० गुप्ता जी के संयोजन में आयोजित किया।इस अवसर पर “काफिला” के निदेशक श्री मेराज आलम ने उपस्थित बच्चों और शिक्षिकाओं तथा अभिभावकों को कठपुतली कला के इतिहास,विश्व पुतुल दिवस के विषय में विस्तृत जानकारी दी।साथ ही काफिला नाट्य संस्थान की तरफ से श्री चन्द्र शेखर शुक्ल द्वारा लिखित और श्री मेराज आलम द्वारा निर्देशित दो कठपुतली नाटकों “इज्जत घर” तथा “पढ़ना जरूरी है” का मंचन भी किया गया।इन दोनों ही पुतुल नाटिकाओं के मंचन में अजरा मेराज,ताने मेराज,तान्या मेराज,चंद्रशेखर शुक्ल,उमा शुक्ल,तारा देवी यादव,बलराम यादव,नाजिया सिद्दीकी,संतोष मौर्या आदि कलाकारों ने दोनों नाटिकाओं के मंचन में पुतुल सञ्चालन,स्वर देने एवं प्रस्तुति को बेहतर बनाने में मेराज आलम का सहयोग किया।

   

    

       


     दोनों ही नाटिकाएं समाज के लिए महत्वपूर्ण सन्देश देने वाली थीं तथा सभागार में उपस्थित सभी दर्शकों का मनोरंजन भी कर रही थीं।इस अवसर पर सभागार में अन्य गणमान्य दर्शकों के साथ ही प्रसिद्ध कवि एवं बाल साहित्यकार डा0हेमन्त कुमार एवं प्रतिष्ठित कवयित्री और ब्लॉगर श्रीमती पूनम श्रीवास्तव जी भी उपस्थित थीं।


                   ००००


रिपोर्ट एवं फोटोग्राफ्स:

डा0हेमन्त कुमार              

 

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एक हिन्दी कथाकार का बालसाहित्यकृती होना

गुरुवार, 10 मार्च 2022

 आज मेरे पिताजी हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्व०श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का 93वां जन्म दिवस है।आज वो हमारे बीच न होकर भी अपने साहित्य के माध्यम से हम सभी के बीच उपस्थित हैं।उनका लेखन हिन्दी कहानियों और हिन्दी बाल साहित्य के लिए बहुत बड़ा योगदान है।उनका आशीर्वाद हम सभी का मार्गदर्शन करता रहेगा।उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है हिंदी बाल साहित्य के प्रतिष्ठित आलोचक श्री बंधु कुशावर्ती द्वारा लिखा गया यह मूल्यांकनपरक,समीक्षात्मक लेख।


 

             एक हिन्दी कथाकार का बालसाहित्यकृती होना

                                                  लेखक-बंधु कुशावर्ती 



  

     

  प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्वातंत्र्योत्तर कालीन हिन्दी बाल साहित्यकार हैंबाल साहित्य लेखन से पहले वह हिन्दी कथाकार के रूप में 1950 से निरंतर हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं(कल्पना, ज्ञानोदय,विशाल भारत,नई कहानी,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग आदि)में प्रकाशित होते हुए स्वयं को प्रतिष्ठित कर चुके थे।सन1965-66 से वह बाल साहित्य लेखन में संलग्न हुए तो इस दिशा में भी क्रमशः लिखते हुए न केवल हिन्दी बालसाहित्य को समृद्ध किया बल्कि समकालीन बाल साहित्यकारों में एक रचनाशील व्यक्तित्व के रूप में भी पहचाने गए।

             

                 


      उत्तर प्रदेश का शिक्षा प्रसार विभाग भी आजादी के बाद पहली बार संपूर्णानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में नई सोच समझ के साथ नवोन्मेषित हुआ था।तब वह इस विभाग में एक प्रचार अधिकारी के रूप में आये।अब के प्रचार अधिकारीयों के बजाय तब के प्रचार अधिकारी  सर्जनात्मक प्रतिभा से भी संपन्न हुआ करते थे।द्वितीय पंचवर्षीय योजना में देश के साथ ही उत्तर प्रदेश में भी शिक्षा के तंत्र समेत विद्यालयों को शिक्षनेतर सक्रियताओं के द्वारा अग्रगामी बनाए जाने संबंधी अनेकानेक योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा था।शिक्षा विभाग ने इलाहाबाद से जहां कुछ कल्पनाशील व अन्यान्य बालोपयोगी साहित्य का प्रकाशन शुरू किया,वहीं सीधे विद्यालयों तक पहुंचाने के उद्देश्य से “बेसिक बाल शिक्षा” नामक स्तरीय बाल पत्रिका के विभागेतर स्तर पर मुद्रण एवं सम्पादन प्रकाशन को प्रोत्साहन दिया।इसी दौर में शिक्षा प्रसार विभाग में स्थापित अत्यंत समृद्ध फिल्म यूनिट देश में पहली थी जिसमें अपने स्टूडियो,कैमरा,लैब,तकनीशियन,फिल्म अधिकारी समेत फिल्म निर्माण की सम्पूर्ण व्यवस्था भी थी।

    

             


       यही कालखंड है जब प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव हिन्दी बाल साहित्य के लेखन और विभागीय फिल्म निर्माण से भी सक्रिय रूप से जुड़े।उन्होंने अपने पद के दायित्व निर्वाह के साथ ही विभाग द्वारा बनायी जाने वाली शैक्षिक फिल्मों के अलावा निराला जी आदि कई हस्तियों पर बनाई जा रही फिल्मों के आलेख आदि भी लिखे।तो यथा आवश्यकता बच्चों के लिए कहानियां,नाटक एवं प्रेरक प्रेरणादायक सामग्री भी प्रायः लिखने लगे।

  


      ऎसी प्रारम्भिक सामग्री की उनकी पुस्तकों में सन 1971 में प्रकाशित एक उल्लेखनीय कृति है—“जिस देश में हमने जन्म लिया”।इससे पहले “मंदिर का कलश”, “हम सेवक आपके”, “यह धरती है बलिदान की”, “अरुण यह मधुमय देश हमारा” आदि उनकी बच्चों के लिए लिखी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।इस पुस्तक में प्रकाशक का वक्तव्य है –“प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव-गत बीस वर्षों से प्रेरक और जीवंत साहित्य का सृजन कर रहे हैं।उनकी सैकड़ों कहानियां उच्च कोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुयी हैं।

     


      इससे स्पष्ट है कि प्रेमस्वरूप जी आजादी के बाद से ही मुख्य धारा के लेखन में प्रवृत्त लेखकों की कतार में शामिल हो गए थे।परन्तु यहाँ मैं उन्हें उनके बाल साहित्य लेखन तक न रखते हुए कहूँगा कि बच्चों के लिए उनका लिखना महज औपचारिक नहीं था।अपने लेखन से वह बच्चों को महत्वपूर्ण लेखन देते हुए उनके मानस और चरित्र निर्माण का उद्द्येश्य भी पूरा करते थे।मसलन “जिस देश में हमने जन्म लिया” के “स्वर्ग से महान” लेख को पढ़ते हुए बच्चे को सहज ही अपने देश भारत की बहुत सी विशेषताएं जानने को मिल जाती हैं।तो “संतों का प्रकाश” उसे देश के अनेक संतों-महात्माओं,जगद्गुरु शंकराचार्य,गौतम बुद्ध,कबीर,नानक,चैतन्य महाप्रभु,स्वामी रामतीर्थ,महात्मा गांधी आदि से परिचित करा देता है।इन्द्रधनुष के जैसा रोचक परिचय इस पुस्तक से मिलता है,वह अन्यत्र दुर्लभ ही होगा।एक वाक्य में कहें तो यह पुस्तक अपनी सामग्री से अपने विविधवर्णी भारत देश का अनेकविध  परिचय करा देती है।

      


           सच बात यह है कि प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव का बाल साहित्य प्रारम्भ से ही बच्चों को अपने देश,उसकी महत्ता,उसकी विभूतियों,उसकी बहुरंगी छवियों और सुषमा से इस तरह परिचित कराते हैं कि वे देश प्रेम के रंग में स्वतः ही रंग जाएं।दूसरी ओर हाथी,घोड़ा,ऊंट और लामा जैसे मित्र पशुओं की रोचक जानकारी वह अपनी पुस्तक“हमारे ये सच्चे मित्र”(1986) पुस्तक से देते हैं।तो “हम सेवक आपके”(1986) कृति के द्वारा रेनडियर,याक,भेड और कुत्ता जैसे जानवरों का परिचय देते हुए बताते हैं कि एक से लगते हुए भी ये जीव दुनिया के अलग-अलग देशों में किस रूप में जाने जाते हैं।“वतन है हिन्दोस्तां हमारा”(1981) में“जिस देश में हमने जन्म लिया” पुस्तक से मिलती जुलती सामग्री होने के बावजूद बच्चों को अपने देश भारत की व्यापक छवि का परिचय मिलता है।

     


        प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के पूर्वोक्त बालसाहित्य से गुजरते हुए उनकी  प्रवाहमयी भाषा और रोचक लेखन शैली गवाही देती चलती है कि उनमें बच्चों के कथाकार,उपन्यासकार और नाटककार की समर्थ रचनात्मकता भी साँसें लेती रही हैं।आकाशवाणी के इलाहाबाद केंद्र के लिए प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रारम्भ से ही बच्चों के लिए नाटक लिखते रहे हैं।आकाशवाणी यानि रेडियो के लिए नाटक लिखना वो भी बच्चों के नाटक,सामान्य या मंच-नाटक से भिन्न कोटि का लेखन होता है।संवादों का स्वरूप ही नहीं शब्द चयन भी मंच की शब्दावली से अलग होता है।परन्तु रेडियो के नाटक चूंकि ज्यों का त्यों छापे जाने का चलन नहीं है,अतः प्रेमस्वरूप जी रेडियो के नाटकों को बच्चों के लिए बहुधा मंचीय नाटकों में रूपांतरित करते रहे हैं।

 


                “मेरा देश जागे”(1971)उनके ऐसे 4 मंचीय बाल नाटकों का संकलन है।जो आपसी द्वेष-वैमनस्य के बजाय प्रेम और सौहार्द्र की चेतना जगाते हैं।“मानस के चार फूल”(1974)रामकथा के विभिन्न रोचक और प्रेरक प्रसंगों पर केन्द्रित नाटकों का संकलन है।यह भरत और जटायु जैसे चरित्रों पर केन्द्रित होने के साथ ही “यज्ञ की रक्षा” तथा “सीता की खोज” शीर्षक से तुलसीकृत मानस के प्रसंगों को बाल नाटक के रूप में प्रस्तुत करती महत्वपूर्ण कृति है।“मदारी का खेल” भी 4 बाल नाटकों का संकलन है जो नवोदितों यानी नई पीढी को देश की शक्ति के अक्षय स्रोत मान कर लिखे गए हैं।“वीर बालक भीमा”(1992 संस्करण) राजस्थान के शूरवीर महाराणा प्रताप के युद्ध काल में एक ऐसे भील बालक के चरित्र को प्रस्तुत करता है जिसमें राणा प्रताप की तरह मातृ भूमि के प्रति त्याग और समर्पण का जज्बा है।यह प्रेमस्वरूप जी की बहु चर्चित,बहु मंचित और बहु प्रशंसित बाल नाट्य कृति है।

     


     उपर्युक्त क्रम में मैं कृती बाल साहित्यकार प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव की दो और बाल नाट्य कृतियों की चर्चा यहाँ विशेष रूप से करूंगा।एक—“आँखों का तारा”(1990) एवं दो-“एक तमाशा ऐसा भी”(2018)।

         


        “आँखों का तारा” इस कृति शीर्षक के अलावा दूसरा बाल नाटक “वन की पुकार” है।जिसमें वनप्रांतर और जंगलों यानि पेड़ों के अंधाधुंध कटाई के दुष्परिणाम को बहुत ही मार्मिकता से उजागर किया गया है।इस नाटक का मूल कथ्य इतना भर है कि पेड़ों के कटने से जंगल के जीव जंतुओं के प्रति असहिष्णुता किस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित करती है। एक दिन ऐसा भी आ जाता है की स्वयम मानव जीवन के लिए हमारा वातावरण और पर्यावरण कैसा मरणान्तक बन जाता है।विभिन्न वृक्ष,वन्य-जीव,वनदेवता और वनदेवी के साथ मनुष्य इसके चरित्र और पात्र हैं।शीर्षक नाट्य कृति “आँखों का तारा” का कथ्य भी नया यानि देश में“सर्वश्रेष्ठ नगर” का चयन है।इसमें देश के वाराणसी,लखनऊ,इलाहाबाद,बंबई, दिल्ली,कलकत्ता,शिमला,बैंगलोर,पंजिम,चितारंचन,उदयपुर आदि अपनी अचल नगरीय वेशभूषा में मंच पर आकर अपनी विशेषताएं बताते हैं।और अंत में सौहार्द्र पूर्वक राजस्थान के शहर उदयपुर को देश के सभी नगरों में आँख का तारा चुना जाता है।इसलिए कि वह वीरता और प्राणोंत्सर्ग की भूमि है।इसके माध्यम से पूरे देश को सदैव देश-रक्षा में प्रस्तुत होने का सन्देश जाएगा और देश सुरक्षित रहेगा तो यहाँ की प्राकृतिक सुषमा,संपदा,धन-धान्य,कल-कारखाने,उद्योग-धंधे यानि सब कुछ बचा रहेगा और देश समृद्ध होगा।



          “एक तमाशा ऐसा भी”(2018)प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी का नवीनतम प्रकाशित बाल नाट्य संकलन है।इसमें पूर्व प्रकाशित बाल नाटकों “वीर बालक भीमा”, “वन की पुकार”, “आँखों का तारा” के अलावा “शेर बच्चे”, “मौत के चंगुल में”, “कृति शीर्षक बाल नाटक “एक तमाशा ऐसा भी” संकलित हैं।“शेर बच्चे “देशभक्ति के प्रति गहरे समर्पण से जुड़ा है।जिसमें गुलाब और असगर दो सहपाठी बच्चे आगे पढाई के लिए शहर जाने के बजाय देश की सीमा पर बसे गाँवों में आगजनी और जन-धन की हानि पहुंचाने वाले दुश्मनों का सुराग लाने का निश्चय प्रतिफलित कर दिखाते हैं।“मौत के चंगुल में”,शमशेर और बालचंद नामक दो दिलेर बच्चे छुट्टन और कतलू खां जैसे खूंखार डाकुओं को अपनी बुद्धि से रस्सियों में बाँध कर पुलिस के हवाले करने का साहसिक कारनामा जिस तरह कर दिखाते हैं,उसमें हास्य नाटक का भी रोचक पुट है।“एक तमाशा ऐसा भी” सामाजिक समरसता का बाल नाटक है।मौलवी और पंडित जैसे वयस्क पात्रों को एकता का सन्देश देने में बेटे करीम व रामू के साथ उनके साथी बच्चों की सूझ बूझ उभर कर आती है।संक्षेप में कहूँ तो प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के बाल नाटक बच्चों को सचमुच देश का सजग,सुयोग्य नागरिक और जिम्मेदार सामाजिक सदस्य बनने का सन्देश देते हैं।विषयानुरूप एवं पात्रानुकूल भाषा श्री प्रेमस्वरूप जी के बाल नाटकों की विशेषता है।

    


श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी एक सफल बाल नाटककार के साथ ही एक कुशल बाल कहानीकार, किस्सागो और उपन्यासकार भी थेमैं यहाँ उनकी बाल कहानियों की चर्चा न करके उनके 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित उपन्यास “मौत के चंगुल में” की चर्चा विशेष रूप से करना चाहूँगा क्योंकि इसका कथ्य और पात्र दोनों ही आम बाल उपन्यासों से अलग हटकर हैं।     

   


           साहसिक समुद्री यात्रा का श्रेष्ठ बाल उपन्यास :मौत के चंगुल में ---प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव बच्चों के कथाकार और उपन्यासकार के रूप में भी सिद्धहस्त और सफल हैं।“मौत के चंगुल में” उनका बहुचर्चित और सफल बाल उपन्यास है।इसे किसी भी विदेशी श्रेष्ठ उपन्यास के समकक्ष रखा जा सकता है।यह पानी के जहाज से ऐसे बच्चों की समुद्री यात्रा का रोमान्चक वृत्तांत है जिनमें किसी न किसी तरह की शारीरिक अपंगता अक्षमता है।इन्हें वाटसन नामक व्यक्ति(शिक्षक)अपने स्कूल में अपने खर्चे पर रखता है।उनका पालन पोषण करते हुए महसूस कराता है कि वे शारीरिक अक्षमता के बावजूद दयनीय नहीं हैं।अपने चार दोस्तों के साथ यह स्कूल चलाने के लिए वाटसन समर्थ और धनिक लोगों की सहायता भी जुटा लिया करता था।इस सब में उसे असीम खुशी महसूस होती है।हालांकि उसके जीवट और कुशलता का लोहा मानते हुए भी लोग उसे सनकी कहा करते थे।ऐसे ही जब वाटसन ने तय कर लिया किया कि उसको स्कूल के अंधे,बहरे,गूंगे लंगड़े-लूले व बदसूरत बच्चों जैसे कुछ और भी बच्चे अगर मिल जाएँ  और कुछ मदद करने वाले भी उसका साथ दें तो वह समुद्री जहाज से ऐसे बच्चों को पूरी दुनिया की सैर करवा देगा।संयोग कुछ ऐसा बना कि वाटसन को इस काम में सहायता देने वाले तो मिले ही,दुनिया भर से लगभग 650 बच्चे जुट गए।यह समुद्री जहाज “एटलस” जब भारत पहुंचा तो इसमें 50 भारतीय बच्चे और शामिल हो जाते।

   


                भरपूर तैयारियों के बाद 25 दिसंबर को जहाज के कप्तान और इतने सारे बच्चों की देखभाल के माकूल इंतजाम समेत “एटलस” नमक समुद्री जहाज न्यूयार्क बंदरगाह से अपनी विश्व-यात्रा परा निकल पडा।दुनिया के मशहूर बंदरगाहों –जार्जटाउन,सौथैम्प्तन,जिब्राल्टर,पोर्ट सईद,मुम्बई,सिडनी,शंघाई,याकोहामा,होते हुए सैन्फ्रंसिसको,लौट कर यह यात्रा पूरी होनी थी।यह समुद्री जहाज भारत के मुम्बई बंदरगाह पर पहुंचा जहां सारे बच्चों का खूब स्वागत सत्कार हुआ और भारतीय बच्चों का दल भी इसमें शामिल हो गया।पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार सारे बच्चों की भारत दर्शन यात्रा भी हुयी।जयपुर में सहसा एक संन्यासी इन सबसे मिला और इन्हें आगाह भी किया की आगे की यात्रा के दौरान रास्ते में इनके ऊपर भयानक संकट भी आ सकता है।पर हिम्मत बनाए रखने और भगवान पर भरोसा करने से वो संकट दूर भी हो सकेगा।सचमुच ऎसी ही कुछ घटनाएँ घटी भी लेकिन किसी जान-माल का नुक्सान नहीं हुआ।परन्तु जापान के याकोहामा बंदरगाह से जब एटलस आगे की यात्रा परा था कि समुद्री तूफ़ान की चपेट में आ गया।और उसका सन्देश संवाहक यंत्र खराब हो जाने से जहाज का पूरी दुनिया से संपर्क भी ख़तम हो गया।जब तक सूचना थी उसी के आधार पर “एटलस”की खोज और रक्षा के लिए विभिन्न देशों के जहाज बचाव के लिए निकल पड़े।अंततः “एटलस” की इस रोमांचक समुद्री यात्रा का सुखद अंत हुआ और उसे तथा सारे बच्चों के साथ ही जहाज पर सवार शिक्षकों,नर्सों,सेवकों सभी को बचा लिया गया।

   


      प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव के इस बाल उपन्यास की प्रवाहमयी भाषा,रोचक शैली और सबसे बढ़कर यह रोमांच कि अब आगे क्या होगा--–ये कुछ ऐसे गुण हैं जो बच्चों को क्या बड़ों को भी इस बात के लिए मजबूर कर देंगे कि वो उपन्यास पूरा पढ़ कर ही छोड़ें।

     


     यदि हम समग्र रूप से श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल साहित्य पर विहंगावलोकन करें तो पायेंगे कि उनके नाटक,कहानियां,बाल उपन्यास सभी कुछ बच्चों का मनोरंजन करने के साथ ही उनमें नैतिकता,देश-प्रेम,सौहार्द्र,सामाजिकता जैसे गुणों का विकास भी करेंगे।उनका साहित्य इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि वो 1950 में लिखना शुरू करके आज की परिस्थितियों,बदलावों से भी रूबरू होते रहे और अपनी रचनाओं को आज के बच्चों की डिमांड के अनुरूप सर्जित किया।यह उनके साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है।

                          

                                       

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लेखक-बंधु कुशावर्ती



परिचय:० अवध-क्षेत्रीय शहर सुल्तानपुर(उ०प्र०) के सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले मध्यवर्गीय परिवार में 5 अक्टूबर1949 को जन्म।14-15वर्ष की छात्रावस्था से ही लेखन की शुरुआत।मूर्धन्य लेखकों का निरंतर सान्निध्य लाभ।विविध विधाओं में मुख्य-धारा के लेखन-प्रकाशन का पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत सिलासिला।समानांतर ही बाल साहित्य,बाल रंगमंच के बहुविध लेखन व क्रियाकलापों में संलग्न।सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रकारिता से भी सघन-जुड़ाव।बाल-साहित्य विषयक गहन मूल्यांकन व विवेचानापरक साहित्य इतिहास लेखन।समीक्षा-आलोचना केन्द्रित 3 खण्डों की लेखानाधीन शोधकृति।बाल्साहित्यालोचन:अभिनव हस्तक्षेप” प्रकाशित।

०2014में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा बाल साहित्य पत्रकारिता के लिए “लल्ली प्रसाद पाण्डेय बाल साहित्य पत्रकारिता” सम्मान से समादृत  

संपर्क:456/247,दौलतगंज,(साजन मैरिज हाल के सामने),डाकघर:चौक,लखनऊ-226003,मोबाइल-08840655314           

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अभिनव पाण्डेय अभिभावक अम्मा अरुणpriya अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? 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