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टैलेंट हंट या पायिद पयिपर की बांसुरी

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

किसी ऊंची मीनार पर पहुँचने के लिए सीढ़ी दर सीढ़ी चढना ठीक रहता है .ये बात हम सभी जानते हैं.अगर हम मीनार पर सीढियों के सहारे चढेंगे तो हमें चढ़ने के साथ ही उतरने का रास्ता भी मालूम रहेगा.पर एक ही छलांग में अगर मीनार के ऊपर पहुँच गए तो उसी तरह धडाम से नीचे भी गिर जायेंगे.
कुछ ऐसी ही हालत हो रही है हमारे देश के शहरों और गावों में.हर शहर, मुहल्ले,गावों,गली ,कूचे का बच्चा टी वी पर चल रहे टैलेंट हंट शो में जाने को आतुर है.टैलेंट हंट टीम के आने की घोषणा हुई नहीं की शहर के सारे बच्चे निकल पड़ते हैं घरों से.अब आगे आगे चलता हा बांसुरी वालाऔर पीछे पीछे बच्चे.किसी शहर में अगर कोई चैनल अडीशन के लिए दस बजे दिन का समय तै करता है तो चौबीस घंटे पहले से ही उस शहर के साथ ही आस पास के शहरों और गावों के बच्चे लाइन लगा कर खड़े हो जाते हैं.साथ में उनके माता पिता भी.अब बच्चे का गला सुरीला हो या भोंडा,बच्चा सुर ताल की समझ रखता हो या नहीं.इससे माँ बाप को मतलब नहीं.उन्हें तो चैनल के चमकते परदे पर अपने लाडले/लाडली की गाना गाती या ठुमके लगती सलोनी छवि नजर आती है.और तो और जो बच्चा साफ मना कर देता है की उसे गाना नाचना नहीं है तो उसके माता पिता लाठी ले कर सवार.क्यों नहीं जायेगा? क्यों नहीं नाचेगा?माँ बाप को नजर आती हा चैनल से मिलने वाली मोटी रकम

अब आप देखिये जरा टलेंट हंट शो के आयोजकों की तरफ़.देश के हर शहर में घूम घूम कर नगाडा पीटते हैं.हर गली,गावों,शहर,मुहल्ले के बच्चों को इकठ्ठा करते हैं,महीनों तक बच्चों के मन में आशा जगाये रखते हैं,और अंत में कुल दस बीस बच्चों को स्क्रीन पर शकल दिखने का मौका देते हैं.

एक बात और.इस टैलेंट हंट शो का जन्मदाता भी बहुत बड़ा बिजनेस वाला रहा होगा.जैसे जब किसी जगह पर कोई फक्ट्री खुलती है या कोई उद्योग शुरू होता है तो उसके आस पास के इलाके में काफी बड़ी बस्ती बन जाती है.फ़िर उस बस्ती में ढेरों दुकानें खुल जाती हैं.कई लघु उद्योग और उनके सहायक उद्योग भी खुल जाते हैं.मतलब ये की फक्ट्री अगर दो हजार लोगों को नौकरी देती है तो उसके आस पास चार हजार लोगों के रोजगार अपना आप पैदा हो जाते हैं.
ठीक यही कम किया इन टलेंटहन्तियाचैनलों ने.पूरे देश के हर शहर, गली मुहल्ले सब जगह संगीत विद्यालय खुल गए हैं.कोई गाना सिखाता है कोई नाच.कोई मोनो एक्टिंग तो कोई जोक सुनाने या कम्पेअरिग की क्लासेज लेता है.अब इनके यहाँ की टीचरों को भले ही सुर ताल का ज्ञान हो,कभी उन टीचरों ने कोम्पेअरिंग का नाम भी सुना हो,तो भी उनका स्कूल चल रहा है धड़ल्ले से.स्कूलों की अच्छी खासी कमाई हो रही है.
अभिभावकों पर तो जैसे जूनून सवार हो गया है.कोई अपने बच्चे को गायक बनाना चाहता है,तो कोई ब्रेक डांसर.कोई राजू श्रीवास्तव तो कोई मुन्ना भाई.और इसके लिए सब कमर कास कर तैयार हैं.गली गली में खुले संगीत स्कूलों में भेज रहे हैं अपने बच्चों को.उतनी ही फीस दे रहे हैं जितनी स्कूल की देते हैं.हर माँ बाप बड़े ध्यान से हर चैनल के विज्ञापन पर नजर रखता है.अख़बार का अक्षर अक्षर चाट जाता है,की कहीं कोई टलेंट हंट का विज्ञापन छूट जाया .
अब आप ही बताइए जब चारों और इतनी कोशिशें की जा रही हैं तो हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी रहा पायेगी ? नहीं .
लेकिनबस यही एक लेकिन शब्द ऐसा है जो हमें आपको और हम सबको सोचने पर मजबूर कर रहा है.
अब सोचने का मुद्दा ये है की हजारों बच्चों में से एक जो चुना गया वह तो हीरो हो गया.सारी दक्षता ,सारा हुनर,सारा तेज उसी बच्चे में है.

लेकिन क्या बाकी हजारों बच्चों में कोई हुनर नहीं है?
बाकी बच्चे क्या शून्य हैं?
बाकी बच्चों के मन , कोमल हृदय पर क्या गुजरती होगी जब उन्हें प्रारंभिक चयन या एक समूह से एलिएनेट किया जाता होगा?
क्या इन बच्चों के मन में अपनी पूरी जिंदगी के लिए एक हीन भावना नहीं घर कर जायेगी?
चयन की पूरी प्रक्रिया/ taiyaree के दौरान बच्चों की पढ़ाई का जो नुकसान
होता है उसकी भरपाई कौन करेगा?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो मुझे अक्सर परेशां करते हैं, जब मैं टी वी पर एलिएनेशन के दौरान किसी बच्चे /बच्च्चों को रोते (बेहोश होते यहाँ तक की कोमा में जाते,) देखता हूँ.
आप लोग इस दिशा में क्या सोचते हैं जरूर बताइयेगा.
हेमंत कुमार

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