यह ब्लॉग खोजें

दिशा ग्रोवर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दिशा ग्रोवर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बाल मन को गुदगुदाती “शब्दों की शरारत”

शनिवार, 26 मार्च 2022

 बाल साहित्य समीक्षा


            बाल मन को गुदगुदाती “शब्दों की शरारत”




                    पुस्तक-शब्दों की शरारत


                     कवयित्री-दिशा ग्रोवर


                     प्रकाशक-प्रकाशन विभाग


                      सूचना और प्रसारण मंत्रालय


                          भारत सरकार

   


हिंदी बाल साहित्य में अगर किसी विधा में सबसे ज्यादा लिखा जा रहा है तो वह है बाल कविता।इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लिखने वालों का एक बड़ा भ्रम भी है कि किसी विषय को लेकर कुछ भी तुकबंदी कर दी जाय तो वह बाल कविता बन जाती है।दूसरे पात्र पत्रिकाओं के अलावा इंटरनेट द्वारा मुफ्त में दिया गया स्पेस और अभिव्यक्ति के फेसबुक,ब्लाग, व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफार्म।जिनपर कुछ ही सेकंड्स में लिखी गयी रचना आप पूरी दुनिया के सामने परोस सकते हैं।हां यह बात जरूर है कि इन दिनों लिखी जा रही सभी बाल कवितायेँ बाल मन के कितनी अनुरूप हैं,उनमें लिखा गया विषय कितना महत्वपूर्ण है इस बात से रचनाकारों को ज्यादा मतलब नहीं।

    

लेकिन इन सब परिस्थितियों के बावजूद कुछ चुनिन्दा युवा बाल साहित्यकार ऐसे भी हैं जो बेहतरीन बाल कवितायें लिख रहे हैं और लगातार प्रकाशित भी हो रहे हैं।जिन्होंने अपनी बेहतरीन बाल कविताओं के बल पर बाल कविता लिखने वालों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बना ली है।ऐसे युवा रचनाकारों में शादाब आलम,फहीम अहमद,निश्चल,पूनम श्रीवास्तव,रोचिका शर्मा,दिशा ग्रोवर,सृष्टि पाण्डेय जैसे कुछ नाम यहाँ रेखांकित किये जा सकते हैं।

        

दिशा ग्रोवर वैसे तो काफी पहले से बाल कवितायेँ लिख रही हैं।देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं-–बाल भारती,बाल किलकारी,बच्चों का देश,उजाला,देवपुत्र आदि के साथ ही कई अखबारों-–दैनिक ट्रिब्यून,समाज्ञा,बाल भास्कर आदि में दिशा की बाल कवितायें प्रकाशित होती रही हैं और सराही भी जाती रही हैं।इनकी कविताएँ साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित “प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन” में भी संकलित हैं।बाल साहित्य की स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में दिशा का एक बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” भी कुछ दिनों पहले ही प्रकाशित हुआ है और अपनी अलग बुनावट और कहानी और नाटक के सम्मिश्रण की अलग तकनीक के कारण काफी चर्चित भी हुआ है।इस तरह पिछले कुछ समय में ही दिशा ने अपनी बाल साहित्य की रचनाओं के माध्यम से उभरते बाल साहित्यकारों में अपनी अलग पहचान बनानी शुरू कर दी है।

    

लेकिन अभी हाल में ही भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित दिशा ग्रोवर का बाल कविता संग्रह “शब्दों की शरारत” दिशा का पहला बाल कविता संग्रह है।


“शब्दों की शरारत” में दिशा की कुल 52 बाल कवितायें संकलित हैं।मैंने पहले भी पत्र पत्रिकाओं में दिशा ग्रोवर की कवितायेँ पढी हैं।लेकिन इस कविता संकलन के माध्यम से एक बार फिर से दिशा की बाल कविताओं को फिर से पढने और बार बार पढने का अवसर मिला है।दिशा की इन कविताओं में एक नयापन,सम्प्रेषण की एक नयी दृष्टि,शब्दों से सचमुच खेलने की एक नई तकनीक दिखाई पड़ती है जो दिशा की इन बाल कविताओं को भीड़ से अलग करती है और दिशा ग्रोवर को एक अलग पहचान देती है।

  

दरअसल इस कविता संकलन का शीर्षक “शब्दों की शरारत” ही अपने आप में अलग अनूठा है।शीर्षक ही हमे यह बताता है कि इस संकलन की कविताओं में कवयित्री ने बच्चों के स्तर पर उतर कर उनके मनोभावों के अनुकूल ही शब्दों की शरारत की है और उन्हें अपनी कविताओं में पिरोया है।शरारत का मतलब ही है कुछ चुलबुलापन,कुछ शैतानी,कुछ धमाचौकड़ी,कुछ गड़बड़झाला,कुछ चेंचामेंची और कुछ खिलान्दडापन।और इस संकलन की बाल कविताओं में ये सभी बातें मौजूद हैं जो इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको बच्चों के मनोभावों के एकदम नजदीक पहुंचाती हैं।और हमें बाल मन की गहराइयों में उठने वाले प्रश्नों,सवालों,जरूरतों से रूबरू कराती हैं।

  

अगर इस संकलन की शीर्षक कविता “शब्दों की शरारत” की ही बात करें तो कविता की पहली चार पंक्तियाँ ही बच्चों को शब्द शक्ति के बारे में बताती है ---


“शब्दों की क्या ख़ूब शरारत


देते किस्से गढ़ हजार।


कहानी,कविता या कहावत


रचते रहते बार बार।”


ये पंक्तियाँ एक तरह से इस कथन की व्याख्या है कि शब्दों में बहुत शक्ति होती है तभी तो शब्द को काव्यशास्त्र के विद्वानों ने ब्रह्म का दर्जा दिया है।

   

इस कविता संकलन में हमें विषयों की विविधता तो मिलती ही है साथ ही हर विषय की कविता नए प्रयोग भी मिलते हैं।संकलन में एक तरफ सर्दी आई,छमछम बरसे पानी,सुन्दर चन्दा,बूंदों ना ललचाओ,सुबह सुहानी बादल तो हैं दोस्त हमारे जैसी कविताओं के माध्यम से कवयित्री पाठकों को प्रकृति के नजदीक ले जाकर उनका बहुत सूक्ष्मता से दर्शन कराती है तो दूसरी और मेरा परिवार,मां तुम हो या नानी,मां का प्यार,शिक्षक मेरे देव समान,दादी नानी,नानी की चाय,चुटकुले से मामा जी,राखी किसको बांधूं मैं,जैसी कविताओं के माध्यम से पाठक सामाजिक सरोकारों,रिश्तों की गरमाहट और सामाजिक बोधों से मिलता चलता है।एक तरफ — तितली रानी,चिड़िया रानी,जंगल में कोरोना,बन्दर भागा जान बचाकर,मस्तराम हाथी जैसी कविताओं के माध्यम से पाठकों को जीव जंतुओं से मिलवाया गया है,उनके प्रति संवेदना जगाई गयी है तो दूसरी तरफ-- तरह-तरह की गुदगुदी,परछाईं-- जैसे एकदम अनछुए विषयों पर बहुत रोचक बाल कवितायेँ भी कवयित्री ने लिखी हैं।

    

यहाँ मैं कुछ कविताओं की चुनिन्दा पंक्तियों का भी उल्लेख करूंगा जिनसे कवयित्री द्वारा की गयी “शब्दों की शरारत” उभर कर सामने आ जायेगी।“मेरा बस्ता” शीर्षक कविता में कवयित्री की पंक्तिया हैं—


बसते को भी छुट्टी के दिन


क्या आलस मुझसा है भाता?


दिन भर कैसे-कैसे यह भी,


सोते-सोते अरे बिताता।

---अब इन पंक्तियों को पढ़ कर बाल पाठकों को लगेगा अरे मेरा बस्ता भी दिन भर सोता है?और निश्चित ही वो इस कल्पना मात्र से आनंदित होगा।इसी तरह “उलटम-पलटम” कविता की ये पंक्तियाँ भी बच्चों को आनंदित करेंगी---


उलटम-पलटम जब हो जाए


शेर घास से भोज बनाए।


छेड़े राग संग जूं जूं जूं


राजा मच्छर रौब जमाए।


अब यहाँ देखिये बच्चा इस कविता को पढ़ कर ही प्रफुल्लित होगा कि शेर घास का खाना बना रहा,मच्छर जंगल का राजा बन गया---मतलब उस जंगल में सबकुछ उलटा पुलटा हो गया है।अब बाल मन को कल्पना के घोड़ों पर उड़ाने वाली अनुभूति को “जी चाहे जब मजे से”—कविता की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है—


मछली के समंदर में


घर मेरा भी होता,


जी चाहे जब मजे से


झूल लहर पर जाता।

      


एक बात का मैं यहाँ और उल्लेख करना चाहूँगा जो सभी प्रतिष्ठित और नवोदित बाल साहित्यकारों के लिए एक सन्देश भी है।दिशा ग्रोवर ने इस संकलन के शुरू में “कुछ बातें:अपनों से अपनी-सी” शीर्षक से लिखे गए अपने वक्तव्य में लिखा है ----“मैं मानती हूँ की बाल साहित्य बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी होता है।सो बड़ों को भी जरूर पढ़ना चाहिए।”कवयित्री का यह सन्देश सभी रचनाकारों के साथ ही अभिभावकों और शिक्षकों के लिए भी इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर वो भी बाल साहित्य—कहानियां,कवितायें, नाटक, उपन्यास नहीं पढेंगे तो अपने बच्चों को पढने के लिए प्रेरित कैसे करेंगे।और फिर बालसाहित्य में बड़ों,अभिभावकों के लिए भी बहुत कुछ मनोरंजक सीख देने वाले तत्व मौजूद रहते ही हैं।इस दृष्टि से कवयित्री की “सुबह सुहानी” शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भी बहुत सार्थक और महत्वपूर्ण हैं----


बूढों को भी सुबह सुहानी


आस दिलाती है जीने की।


जैसे छलकें प्याले में से


बूंदें भैया अमृत की सी।

 

     


कुल मिलाकर रंग-बिरंगे चित्रों से सजा हुआ दिशा ग्रोवर का यह बाल कविता संकलन निश्चित रूप से बाल पाठकों को शब्दों की नयी नयी शरारतों से तो मिलवायेगा है,उनके मन को जगह-जगह आंदोलित करेगा,उन्हें गुदगुदायेगा,उनके अन्दर उत्साह भरेगा,उनका मनोरंजन करेगा तो दूसरी ओर उनके भीतर सामजिक रिश्तों,परिवार,घर के बीच संबंधों की मिठास भी घोलेगा।प्रकृति के नजदीक ले जाएगा तो जीव जंतुओं के प्रति संवेदनशील भी बनाएगा।देश,मातृ-भूमि के प्रति सजग बनाएगा तो उन्हें एक बेहतर इंसान भी बनाएगा।दिशा ग्रोवर का यह बाल कविता संकलन निश्चित रूप से हिन्दी के बाल साहित्य को समृद्ध करेगा।

                    

                                    ००००


समीक्षक:


हेमन्त कुमार


        

                     

Read more...

बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग

शनिवार, 21 अगस्त 2021

 बाल साहित्य--पुस्तक समीक्षा



बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग



                           पुस्तक: बाघू के किस्से


                           (बाल नाटक संग्रह)





                          लेखिका: दिशा ग्रोवर


                        प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन प्रा०लि०


                          702,जे/50, एवेन्यू-जे,ग्लोबल सिटी


                           ठाणे,महाराष्ट्र-401303

      

                                   

        हिन्दी बाल साहित्य में इस समय काफी कुछ लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है।बाल कहानी,कविता,गीत,उपन्यास,चित्रात्मक कहानियां हर विधा में काफी कुछ लिखा जा रहा है बस एक विधा को छोड़ कर।और वह विधा है बाल नाटक।हिन्दी में बाल नाटक बहुत कम लिखे जा रहे हैं और लिखे भी जा रहे हैं तो उनके मंचन की गुंजाइश काफी कम या कठिन है।इसके पीछे कारण तो बहुत से हैं लेकिन मुख्य कारण है बाल नाटक लेखकों की बाल रंगमंच से दूरी।जो लेखक बाल नाटक लिख भी रहे हैं वो सिर्फ नाटक लिखने के लिए लिख रहे हैं।वो नाटक मंचित हो सकेगा या नहीं,उसमें मंचन की संभावनाएं हैं या नहीं इस बात से उन्हें कोई ज्यादा मतलब नहीं है।बस उन्होंने नाटक लिखे।वो पहले किसी पत्रिका में फिर पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो गए और उन्होंने अपना काम पूरा समझ लिया।

         

                 

                        बाल नाटकों के ऐसे ही परिदृश्य के बीच दिशा ग्रोवर के बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” का प्रकाशन हमारे समक्ष बाल नाटकों के लिए एक नई उम्मीद जगाता है।इस संकलन में दिशा ग्रोवर के कुल छह नाटक संकलित हैं।नाटकों के शीर्षक भी ऐसे हैं जो बाल पाठकों के साथ ही रंगकर्मियों के मन में भी इन्हें पढने और मंच पर नन्हें बाघू को बच्चों से रूबरू कराने की उत्सुकता जगाते हैं।“बाघू और जंगल:पहला अनुभव”,“बाघू और हाथी की सूँड़”,“बाघू ने गधे से सीखा”,“बाघू और धरती के कान”,“बाघू,छुटमुट और जादुई शब्द” और अंतिम नाटक “बाघू चला घास खाने”।    

   

                     

                      मैं प्रायः किताबें पढने में थोड़ा ज्यादा समय लगाता हूँ।लेकिन इस किताब के साथ ऐसा नहीं हुआ।किताब मिलने के बाद ही मैंने इसे पढ़ना शुरू कर दिया और जब पढ़ना शुरू किया तो दो बैठक में इसे पूरा पढ़ भी डाला।इसका पहला कारण तो ये कि ये बाल नाटकों का संकलन था।और नाटकों और मंच से जुड़ाव होने के कारण मेरे मन में घोर उत्सुकता जागनी स्वाभाविक भी थी।दूसरा जो बहुत महत्वपूर्ण कारण था वो यह कि इसके प्रमुख पात्र बाघू से पहला नाटक ख़तम होते होते ही मैंने खुद में इतना अधिक जुड़ाव महसूस किया कि देखूँ आगे-आगे ये प्यारा बाघू क्या करने वाला है?(यह एक संयोग ही था कि “बाघू के किस्से” किताब मिलने के ठीक दो दिनों पहले मैं अपने और अपनी बहन के परिवार के साथ लखनऊ चिड़ियाघर भी देखने गया था।और वहां भी हम सभी ने बाघ के चार नन्हें शावकों को उछलते-कूदते और आपस में खेलते देखा था।)शायद इसीलिए इन नाटकों को पढने के दौरान मुझे लगातार महसूस होता रहा कि अरे ये तो चिड़ियाघर में बाघू ही था अपने भाइयों बहनों के साथ।

     

                             

                                 दिशा के इन सभी नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता इन नाटकों का बाल मनोभावों के अनुकूल होना है।बाघू और उसके छोटे-छोटे भाई बहनों के माध्यम से लेखिका ने उन सभी प्रश्नों,उत्सुकताओं,शंकाओं को उठाया है जो किसी भी मनुष्य के बच्चे के मन में छुटपन या कहूँ शैशवकाल के दौरान उठती हैं।बाघू का जंगल में पहली बार निकलने पर हर चीज को हर जीव को जानने समझने की जिज्ञासा,शिकारी से मिलने जाना,हाथियों के झुण्ड तक पहुँचना,हाथी के बच्चे की सूंड खींचने की कोशिश,खरगोश के कान को धरती का कान समझना---ये सभी घटनाएँ ठीक उसी तरह घटित होती चलती हैं जैसे मनुष्य का कोई छोटा बच्चा जब पहली बार घर से बाहर निकलता है तो वो हर चीज को,हर वस्तु को छू कर,देख कर महसूस करने उन्हें समझने की कोशिश करता है।

    

                           

                           सभी नाटकों में घटित होने वाली घटनाएँ,बात चीत,दृश्य इस बात को पुख्ता करते हैं कि लेखिका को बाल मनोभावों की अच्छी समझ है और उसने उसी के अनुरूप इन छहों नाटकों के कथानक,घटनाओं,दृश्यों का तानाबाना बुना है।

     

                    

                     दिशा के ये नाटक इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इनमें कहानी और नाटक के एक नए मिक्स फार्मेट का प्रयोग किया गया है जो अपने आपमें अनूठा है और इन नाटकों को आज के समय में लिखे जा रहे अन्य बाल नाटकों से अलग करता है।दूसरी बात इनका कथानक। कथानक का तानाबाना भी इस हिसाब से है कि हर नाटक अपने आप में अलग भी है और आपस में मिला हुआ भी।यानि की मंचन के समय नाट्य निर्देशक या रंगकर्मी के लिए इस बात की भी गुंजाइश रखी गयी है कि वो चाहे तो इन नाटकों को अलग अलग भी मंचित कर सकता है या इनमें दो,तीन या चार नाटकों को  एक साथ मिला कर भी मंचित कर सकता है।

    

                             

                              वैसे तो इस संकलन के सभी नाटक एक से बढ़ कर एक मजेदार घटनाओं,संवादों से भरे हैं लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर “धरती के कान” वाला प्रसंग बेहद मजेदार लगा जिसे पढ़ते या मंच पर देखते समय निश्चित ही बच्चा आनंदित होगा और उसके अन्दर घोर उत्सुकता भी अंत तक बनी रहेगी।ये नाटक पढ़ते समय मुझे सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” याद आ गयी।उसमें भी जड़ी बूटियों की तलाश में जंगल में भटक रहे तुलसी बाबू को धरती पर एक अजीब सा अंडा दिखा था।जो उन्हीं के सामने चिटका और उसमें से एक पीले रंग का विचित्र पक्षी निकल कर उनके पीछे चल पड़ा और उनके साथ घर तक आया।

      

                               

                   खैर वो कहानी तो अलग है।लेकिन “बाघू और धरती के कान” में बाघू के बुलाने पर जमीन के अंदर से खरगोश के कान का बाहर आना तथा बाघू द्वारा उसे धरती का कान समझना और सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” की इस अंडे से चिड़िया निकलने की घटना----दोनों में सबसे बड़ी समानता है बच्चों के भीतर घोर उत्सुकता पैदा करना।और दोनों ही रचनाएं अपने इस प्रयास में पूरी तरह सफल कही जा सकती हैं।

   

                                     

                  इस मजेदार और सराहनीय नाटक संकलन में कुछ थोड़ी बहुत कमियाँ भी मुझे नजर आईं जिनका उल्लेख मैं जरूरी समझता हूँ।पहली बात तो वन अधिकारी के संवाद थोड़ा ज्यादा लम्बे लम्बे हैं उन्हें छोटा किये जाने की गुंजाइश भी है।खासतौर से वहां जहां वह बाघ के बच्चों को गधे के बारे में बता रहा है।दूसरी बात कहीं कहीं नाटकों में ड्रामेटिक एलीमेंट या कहूँ तो ड्रामेटिक सिचुएश्न की कमी।जैसे हाथी के बच्चे के सूंड वाले प्रसंग में।यहाँ पर बाघू द्वारा किसी टहनी या बड़े पत्ते को लपेट कर अपने चेहरे पर सूंड बनाने जैसी कोशिश एक अच्छी बच्चों को हंसाने वाली सिचुएशन पैदा कर सकती है।हालांकि ये काम नाटक मंचित होते समय भी किया जा सकता है।

   

                                   

                          यहाँ मैं इन नाटकों की लेखिका दिशा ग्रोवर को कुछ सुझाव भी देना चाहूँगा।पहली बात तो ये कि अगर इन नाटकों को थोड़ा लिरिकल भी बना दें मतलब बीच बीच में सिचुएशन के अनुसार कुछ संवाद गीत के रूप में लिख दें तो ये नाटक और बेहतर बन सकेंगे क्योंकि जिस उम्र के बच्चों के लिए ये नाटक लिखे गए हैं---उन्हें गीत सुनना संगीतात्मक कवितायें सुनना ज्यादा अच्छा लगेगा।

    

                          

                           दूसरा सुझाव जो मैं हर बाल नाटक लेखक के साथ ही दिशा ग्रोवर को भी दूँगा कि समय मिलने पर बाल नाटकों के मंचन जरूर देखें और अगर संभव हो तो कोई भी नाटक लिखना शुरू करने के पहले किसी अच्छे बाल नाट्य निर्देशक/रंगकर्मी जिनकी बाल नाटकों पर अच्छी पकड़ हो---उससे अपने लिखे जाने वाले नाटक की स्टोरी लाइन,दृश्य,पात्र आदि पर विचार विमर्श जरूर कर लें।इससे लिखा जाने वाला नाटक निश्चित रूप से बेहतर बन सकेगा।     

   

                          

             वैसे “बाघू के किस्से” का गहन विश्लेषण करने पर कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिन्दी बाल साहित्य को दिशा ग्रोवर जैसी एक बाल मनोभावों पर अच्छी पकड़ रखने के साथ ही नाटकों और कहानी दोनों की समझ रखने वाली एक अच्छी बाल नाट्य लेखिका मिल रही है।जिसके नाट्य लेखन में एक नयापन और प्रयोगधर्मिता साफ़ नजर आ रही है।और उम्मीद है वो भविष्य में हिंदी बाल रंगमंच को और भी अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स देकर समृद्ध करती रहेंगी।

                        

००००


समीक्षक:डा०हेमन्त कुमार                       

                     

                

Read more...

लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. Bअच्चे का विकास। Breast Feeding. Child health Child Labour. Children children. Children's Day Children's Devolpment and art. Children's Growth children's health. children's magazines. Children's Rights Children's theatre children's world. Facebook. Fader's Day. Gender issue. Girl child.. Girls Kaushal Pandey Kavita. lekh lekhh masoom Neha Shefali. perenting. Premswaroop Srivastava Primary education. Pustak samikshha. Rina's Photo World.रीना पीटर.रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया.तीसरी आंख। Teenagers Thietor Education. World Photography day Youth

हमारीवाणी

www.hamarivani.com

ब्लागवार्ता


CG Blog

ब्लागोदय


CG Blog

ब्लॉग आर्काइव

कुल पेज दृश्य

  © क्रिएटिव कोना Template "On The Road" by Ourblogtemplates.com 2009 and modified by प्राइमरी का मास्टर

Back to TOP