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बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग

शनिवार, 21 अगस्त 2021

 बाल साहित्य--पुस्तक समीक्षा



बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग



                           पुस्तक: बाघू के किस्से


                           (बाल नाटक संग्रह)





                          लेखिका: दिशा ग्रोवर


                        प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन प्रा०लि०


                          702,जे/50, एवेन्यू-जे,ग्लोबल सिटी


                           ठाणे,महाराष्ट्र-401303

      

                                   

        हिन्दी बाल साहित्य में इस समय काफी कुछ लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है।बाल कहानी,कविता,गीत,उपन्यास,चित्रात्मक कहानियां हर विधा में काफी कुछ लिखा जा रहा है बस एक विधा को छोड़ कर।और वह विधा है बाल नाटक।हिन्दी में बाल नाटक बहुत कम लिखे जा रहे हैं और लिखे भी जा रहे हैं तो उनके मंचन की गुंजाइश काफी कम या कठिन है।इसके पीछे कारण तो बहुत से हैं लेकिन मुख्य कारण है बाल नाटक लेखकों की बाल रंगमंच से दूरी।जो लेखक बाल नाटक लिख भी रहे हैं वो सिर्फ नाटक लिखने के लिए लिख रहे हैं।वो नाटक मंचित हो सकेगा या नहीं,उसमें मंचन की संभावनाएं हैं या नहीं इस बात से उन्हें कोई ज्यादा मतलब नहीं है।बस उन्होंने नाटक लिखे।वो पहले किसी पत्रिका में फिर पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो गए और उन्होंने अपना काम पूरा समझ लिया।

         

                 

                        बाल नाटकों के ऐसे ही परिदृश्य के बीच दिशा ग्रोवर के बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” का प्रकाशन हमारे समक्ष बाल नाटकों के लिए एक नई उम्मीद जगाता है।इस संकलन में दिशा ग्रोवर के कुल छह नाटक संकलित हैं।नाटकों के शीर्षक भी ऐसे हैं जो बाल पाठकों के साथ ही रंगकर्मियों के मन में भी इन्हें पढने और मंच पर नन्हें बाघू को बच्चों से रूबरू कराने की उत्सुकता जगाते हैं।“बाघू और जंगल:पहला अनुभव”,“बाघू और हाथी की सूँड़”,“बाघू ने गधे से सीखा”,“बाघू और धरती के कान”,“बाघू,छुटमुट और जादुई शब्द” और अंतिम नाटक “बाघू चला घास खाने”।    

   

                     

                      मैं प्रायः किताबें पढने में थोड़ा ज्यादा समय लगाता हूँ।लेकिन इस किताब के साथ ऐसा नहीं हुआ।किताब मिलने के बाद ही मैंने इसे पढ़ना शुरू कर दिया और जब पढ़ना शुरू किया तो दो बैठक में इसे पूरा पढ़ भी डाला।इसका पहला कारण तो ये कि ये बाल नाटकों का संकलन था।और नाटकों और मंच से जुड़ाव होने के कारण मेरे मन में घोर उत्सुकता जागनी स्वाभाविक भी थी।दूसरा जो बहुत महत्वपूर्ण कारण था वो यह कि इसके प्रमुख पात्र बाघू से पहला नाटक ख़तम होते होते ही मैंने खुद में इतना अधिक जुड़ाव महसूस किया कि देखूँ आगे-आगे ये प्यारा बाघू क्या करने वाला है?(यह एक संयोग ही था कि “बाघू के किस्से” किताब मिलने के ठीक दो दिनों पहले मैं अपने और अपनी बहन के परिवार के साथ लखनऊ चिड़ियाघर भी देखने गया था।और वहां भी हम सभी ने बाघ के चार नन्हें शावकों को उछलते-कूदते और आपस में खेलते देखा था।)शायद इसीलिए इन नाटकों को पढने के दौरान मुझे लगातार महसूस होता रहा कि अरे ये तो चिड़ियाघर में बाघू ही था अपने भाइयों बहनों के साथ।

     

                             

                                 दिशा के इन सभी नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता इन नाटकों का बाल मनोभावों के अनुकूल होना है।बाघू और उसके छोटे-छोटे भाई बहनों के माध्यम से लेखिका ने उन सभी प्रश्नों,उत्सुकताओं,शंकाओं को उठाया है जो किसी भी मनुष्य के बच्चे के मन में छुटपन या कहूँ शैशवकाल के दौरान उठती हैं।बाघू का जंगल में पहली बार निकलने पर हर चीज को हर जीव को जानने समझने की जिज्ञासा,शिकारी से मिलने जाना,हाथियों के झुण्ड तक पहुँचना,हाथी के बच्चे की सूंड खींचने की कोशिश,खरगोश के कान को धरती का कान समझना---ये सभी घटनाएँ ठीक उसी तरह घटित होती चलती हैं जैसे मनुष्य का कोई छोटा बच्चा जब पहली बार घर से बाहर निकलता है तो वो हर चीज को,हर वस्तु को छू कर,देख कर महसूस करने उन्हें समझने की कोशिश करता है।

    

                           

                           सभी नाटकों में घटित होने वाली घटनाएँ,बात चीत,दृश्य इस बात को पुख्ता करते हैं कि लेखिका को बाल मनोभावों की अच्छी समझ है और उसने उसी के अनुरूप इन छहों नाटकों के कथानक,घटनाओं,दृश्यों का तानाबाना बुना है।

     

                    

                     दिशा के ये नाटक इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इनमें कहानी और नाटक के एक नए मिक्स फार्मेट का प्रयोग किया गया है जो अपने आपमें अनूठा है और इन नाटकों को आज के समय में लिखे जा रहे अन्य बाल नाटकों से अलग करता है।दूसरी बात इनका कथानक। कथानक का तानाबाना भी इस हिसाब से है कि हर नाटक अपने आप में अलग भी है और आपस में मिला हुआ भी।यानि की मंचन के समय नाट्य निर्देशक या रंगकर्मी के लिए इस बात की भी गुंजाइश रखी गयी है कि वो चाहे तो इन नाटकों को अलग अलग भी मंचित कर सकता है या इनमें दो,तीन या चार नाटकों को  एक साथ मिला कर भी मंचित कर सकता है।

    

                             

                              वैसे तो इस संकलन के सभी नाटक एक से बढ़ कर एक मजेदार घटनाओं,संवादों से भरे हैं लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर “धरती के कान” वाला प्रसंग बेहद मजेदार लगा जिसे पढ़ते या मंच पर देखते समय निश्चित ही बच्चा आनंदित होगा और उसके अन्दर घोर उत्सुकता भी अंत तक बनी रहेगी।ये नाटक पढ़ते समय मुझे सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” याद आ गयी।उसमें भी जड़ी बूटियों की तलाश में जंगल में भटक रहे तुलसी बाबू को धरती पर एक अजीब सा अंडा दिखा था।जो उन्हीं के सामने चिटका और उसमें से एक पीले रंग का विचित्र पक्षी निकल कर उनके पीछे चल पड़ा और उनके साथ घर तक आया।

      

                               

                   खैर वो कहानी तो अलग है।लेकिन “बाघू और धरती के कान” में बाघू के बुलाने पर जमीन के अंदर से खरगोश के कान का बाहर आना तथा बाघू द्वारा उसे धरती का कान समझना और सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” की इस अंडे से चिड़िया निकलने की घटना----दोनों में सबसे बड़ी समानता है बच्चों के भीतर घोर उत्सुकता पैदा करना।और दोनों ही रचनाएं अपने इस प्रयास में पूरी तरह सफल कही जा सकती हैं।

   

                                     

                  इस मजेदार और सराहनीय नाटक संकलन में कुछ थोड़ी बहुत कमियाँ भी मुझे नजर आईं जिनका उल्लेख मैं जरूरी समझता हूँ।पहली बात तो वन अधिकारी के संवाद थोड़ा ज्यादा लम्बे लम्बे हैं उन्हें छोटा किये जाने की गुंजाइश भी है।खासतौर से वहां जहां वह बाघ के बच्चों को गधे के बारे में बता रहा है।दूसरी बात कहीं कहीं नाटकों में ड्रामेटिक एलीमेंट या कहूँ तो ड्रामेटिक सिचुएश्न की कमी।जैसे हाथी के बच्चे के सूंड वाले प्रसंग में।यहाँ पर बाघू द्वारा किसी टहनी या बड़े पत्ते को लपेट कर अपने चेहरे पर सूंड बनाने जैसी कोशिश एक अच्छी बच्चों को हंसाने वाली सिचुएशन पैदा कर सकती है।हालांकि ये काम नाटक मंचित होते समय भी किया जा सकता है।

   

                                   

                          यहाँ मैं इन नाटकों की लेखिका दिशा ग्रोवर को कुछ सुझाव भी देना चाहूँगा।पहली बात तो ये कि अगर इन नाटकों को थोड़ा लिरिकल भी बना दें मतलब बीच बीच में सिचुएशन के अनुसार कुछ संवाद गीत के रूप में लिख दें तो ये नाटक और बेहतर बन सकेंगे क्योंकि जिस उम्र के बच्चों के लिए ये नाटक लिखे गए हैं---उन्हें गीत सुनना संगीतात्मक कवितायें सुनना ज्यादा अच्छा लगेगा।

    

                          

                           दूसरा सुझाव जो मैं हर बाल नाटक लेखक के साथ ही दिशा ग्रोवर को भी दूँगा कि समय मिलने पर बाल नाटकों के मंचन जरूर देखें और अगर संभव हो तो कोई भी नाटक लिखना शुरू करने के पहले किसी अच्छे बाल नाट्य निर्देशक/रंगकर्मी जिनकी बाल नाटकों पर अच्छी पकड़ हो---उससे अपने लिखे जाने वाले नाटक की स्टोरी लाइन,दृश्य,पात्र आदि पर विचार विमर्श जरूर कर लें।इससे लिखा जाने वाला नाटक निश्चित रूप से बेहतर बन सकेगा।     

   

                          

             वैसे “बाघू के किस्से” का गहन विश्लेषण करने पर कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिन्दी बाल साहित्य को दिशा ग्रोवर जैसी एक बाल मनोभावों पर अच्छी पकड़ रखने के साथ ही नाटकों और कहानी दोनों की समझ रखने वाली एक अच्छी बाल नाट्य लेखिका मिल रही है।जिसके नाट्य लेखन में एक नयापन और प्रयोगधर्मिता साफ़ नजर आ रही है।और उम्मीद है वो भविष्य में हिंदी बाल रंगमंच को और भी अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स देकर समृद्ध करती रहेंगी।

                        

००००


समीक्षक:डा०हेमन्त कुमार                       

                     

                

5 टिप्पणियाँ:

मेरा साहित्य 21 अगस्त 2021 को 8:57 am  

दिशा जी को बहुत बहुत बधाई ल भाई हेमंत जी की समीक्षा बहुत ही उत्तम है । सही सुझाव भी हैं ।
आपको इतनी सुन्दर समीक्षा लिखने के लिए साधुवाद ।
रचना

डॉ मोहम्मद अरशद खान,  21 अगस्त 2021 को 12:18 pm  

बहुत सुंदर और सधी हुई समीक्षा

Onkar 21 अगस्त 2021 को 11:05 pm  

सुंदर समीक्षा

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