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एक महत्वपूर्ण समीक्षा

मंगलवार, 8 मार्च 2022

 एक महत्वपूर्ण समीक्षा 



   

मेरे स्व०पिता जी हिंदी के वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल नाटक संकलन “एक तमाशा ऐसा भी” पर वरिष्ठ लेखक,कवि एवं बाल साहित्यकार श्री दिविक रमेश जी की महत्वपूर्ण समीक्षा :

 



प्रिय हेमंत कुमार,

  


मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ कि आपने नेशनल बुक ट्रस्ट के द्वारा प्रकाशित प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी के बाल-नाटकों की पुस्तक एक तमाशा ऐसा भी भेजी जिसमें बेहतरीन नाटक हैं और संख्या में छ: हैं।


मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि उत्कृष्टता और योगदान की दृष्टि से आँखों का तारा, और एक तमाशा ऐसा भी जैसे नाटक तो हिन्दी साहित्य की शानदार उपलब्धि हैं।


मैं मानता रहा हूँ कि बहुत बार जानकारी देने के चक्कर में रचनात्मकता का हनन हो जाता है। लेकिन जानकारी और रचनात्मकता का जरूरी और उत्तम संगम क्या होता है इसका बेहतरीन  उदाहरण आँखों का तारा नाटक है।इस प्रेरणादायक नाटक  से शिल्प के स्तर पर भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।खासकर विज्ञान संबंधी तथा अन्य जानकारी देने के इच्छुक लेखकों के लिए  तो यह नाटक पूरी तरह उपयोगी सिद्ध होगा।यूँ ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि लिए एक अन्य नाटक वीर बालक भीमा का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया जा सकता है।“आँखों का तारा” में प्रमुख  शहरों की पात्रों के रूप में कल्पना करना ही बेहद दिलचस्प और गुदगुदाने वाला है।शहरों की संस्कृति, जीवन-शैली तथा अन्य विशेषताएँ जिस प्रकार पूरी रचनात्मकता के साथ पिरोयी या साझा की गई हैं, वह अभिव्यक्ति क्षमता की मिसाल है।मनुष्य पात्रों का चुनाव भी गहरी समझ का प्रमाण है।संबोधन, भाषा और संवाद-कला का वैभव चरम पर है।


इसी से काफी हद तक सफल टक्कर लेता, एक अन्य पृष्ठभूमि की बुनियाद पर सृजित बाल-नाटक  एक तमाशा ऐसा भी है। दो अलग-अलग धर्मों के, एक दूसरे के विरोधी सम्प्रदायों को जिस भरपूर मनोरंजन परक ढंग से सही राह पर लाया गया है,वह पढ़ते ही बनता है।यहाँ दोनों ही धर्मों के बच्चों की बेहतरीन भूमिका भारतीय परिवेश में जरूरी भी है और आनंददायी भी।बालक का सशक्तीकरण  तो है ही। इसी संदर्भ में शेर बच्चे बाल नाटक को भी पढ़ा जाना चाहिए। बच्चों की समझ और सूझबूझ पर नि:संदेह भरोसा किया जा सकता है।


नाटकों की रोचकता और पठनीयता बहुत ही प्रभावशाली है।मंचन के लिए  रंग निर्देश एकदम सटीक है।जिज्ञासा का तत्व भरपूर है।


वन की पुकार”' भी एक बहुत अच्छा नाटक है।इसमें प्रकृति, पेड़ों आदि के अस्तित्व पर मनुष्यों के द्वारा पहुँचाई जा रही चोट और दर्द को बहुत ही रचनात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।यहाँ भी स्वयं वृक्ष भी पात्र बनकर आए हैं।इन बेहतरीन नाटकों का तहेदिल से स्वागत करता हूँ।



श्री दिविक रमेश जी हिन्दी साहित्य के आज के दौर के प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक,आलोचक एवम बाल साहित्यकार हैं।आपकी अब तक कविता,आलोचनात्मक निबन्धों,बाल कहानियों, बालगीतों, अनूदित, संपादित साहित्य की 100 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।तथा आप कई राष्ट्रीय एवम अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं।फ़िलवक्त आप दिल्ली में रह कर स्वतन्त्र लेखन कर रहे हैं।



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