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बैग में क्या है---?

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

    (हिन्दी में बच्चों को लेकर कविताएं बहुत ज्यादा नहीं हैं।बहुत कम रचनाकार बच्चों को अपना विषय बनाते हैं या फ़िर उनके अन्तर्मन में झांकने की कोशिश करते हैं। जबकि आज बच्चों की हालातों के बारे में हम सभी को सोचना लिखना चाहिये। आज मैं शैलजा पाठक की एक ऐसी ही कविता प्रकाशित कर रहा हूं।       
      मुंबई---महानगरकक्षा सात में पढ़ने वाली एक मासूम लड़की की आत्महत्या की खबर किसी भी संवेदनशील मन व्यक्ति को विचलित और उद्वेलित कर देगी।इस घटना ने शैलजा पाठक के अन्तर्मन को कितना अधिक व्यथित किया था ये बात हम उनकी इस कविता में देख सकते हैं--- )


बैग में क्या है?
बिस्कुट है पानी है
परियां हैं कहानी है
(बच्चे इतना ही जानते हैं चाहते हैं)
लेकिन बैग में इनके
बिखरा सा भारत है
नदियां हैं झरने हैं
नेता के धरने हैं
बैग में मेरे
मम्मी के सपने हैं
टीचर का गुस्सा है
नम्बर हैं अक्षर हैं
पीठ पर भार सा
बिजली के तार सा
सहमा हुआ चिपका हूं
बैग के अंदर तो
आगे की सोच है
छूने से डरता हूं
हमको भी कहने दो
अपनी सी करने दो
मैं तुम्हारी जिन्दगी हूं
पर मेरी भी जिन्दगी है
जी नहीं पाऊंगा जो तुम यूं करोगे
कब कहूं कि बोझ है ये
थक गया हूं
कब कहूं कि चाहता कुछ और हूं मैं
मैं बता सकता हूं अपने मन की तुमसे
तुम जरा सा वक्त दो मुझको सुनो तुम
रोपते क्यों हो
नहीं है जिंदगी जिसमें हमारी
थोपते क्यों हो ये मुझ पर
जो नहीं बनना है मुझको
चाहते हो क्यों वही
जो दे नहीं सकता हूं तुमको
नन्हीं सी आंखों में
भविष्य का बोझ मत थोपो
अंकुर हूं पनपने से पहले
मौत की गोद में मत सौंपो------।
0000

शैलजा पाठक

24 टिप्पणियाँ:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 10 अगस्त 2012 को 10:09 pm  

जो नहीं बनना है मुझको
चाहते हो क्यों वही
जो दे नहीं सकता हूं तुमको
नन्हीं सी आंखों में
भविष्य का बोझ मत थोपो
अंकुर हूं पनपने से पहले
मौत की गोद में मत सौंपो------।

यह रोष होना स्वाभाविक है।
शैलजा जी और आपको को बधाई और धन्यवाद इतनी अच्छी रचना को इस मंच पर साझा करने के लिए।

सादर

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 10 अगस्त 2012 को 10:11 pm  

कल 12/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

वन्दना 10 अगस्त 2012 को 11:54 pm  

अंकुर हूं पनपने से पहले
मौत की गोद में मत सौंपो------।मार्मिक चित्रण

Anju (Anu) Chaudhary 11 अगस्त 2012 को 8:15 am  

बालमन की संवेदना को प्रकट करती कृति ....

Rajesh Kumari 11 अगस्त 2012 को 8:31 pm  

एक तो पीठ पर बैग का भार ऊपर से माता पिता की अपेक्षाओं का भार नन्हा दिल कैसे संभाले ???शैलजा जी की कविता दिल को छू गई

Sriprakash Dimri 11 अगस्त 2012 को 8:33 pm  

जो दे नहीं सकता हूं तुमको
नन्हीं सी आंखों में
भविष्य का बोझ मत थोपो
अंकुर हूं पनपने से पहले
मौत की गोद में मत सौंपो------।
सामजिक आकांक्षाओं का बोझ ढोते बच्चे कुम्हलाता बचपन ..
गहन भाव युक्त अभिव्यक्ति ....सादर !!!

कविता रावत 11 अगस्त 2012 को 9:20 pm  

जीवन सार है बस्ते में ..
क्या करे वजन उठाना ही पड़ता है ..
सुन्दर प्रस्तुति

संगीता स्वरुप ( गीत ) 11 अगस्त 2012 को 11:21 pm  

आज कल सच ही बहुत बोझ है बैग में ... पुस्तकों का भी और माता पिता की अपेक्षाओं का साथ ही बच्चों के अपने भविष्य का ।

Aditipoonam 12 अगस्त 2012 को 12:03 am  

बहुत सुन्दर रचना है..

Reena Maurya 12 अगस्त 2012 को 12:48 am  

मार्मिक रचना...

shashi purwar 12 अगस्त 2012 को 2:28 am  

sundar shilja ji sarthak satik rachna , badhai is tarah ki baaten baccho ko takleef hi deti hai .

yashoda agrawal 12 अगस्त 2012 को 4:22 am  

सुन्दर चित्रण

Asha Saxena 12 अगस्त 2012 को 5:40 am  

बच्चों के लिए बैग का बहुत महत्त्व है |वह उनका खजाना भी है जिसमें उनकी सहेजी हुई अनगिनत चीजें छिपी हैं |
आशा

प्रवीण पाण्डेय 12 अगस्त 2012 को 9:12 am  

अपना भविष्य सँवारने के लिये बालमन को समझना आवश्यक होगा, सुन्दर कविता।

Mamta Bajpai 12 अगस्त 2012 को 9:52 am  

थोपते क्यों हो ये मुझ पर
जो नहीं बनना है मुझको
चाहते हो क्यों वही बहुत ही अच्छा लिखा है बधाई

सदा 12 अगस्त 2012 को 10:50 pm  

सार्थकता लिए सटीक प्रस्‍तुति ... आभार

Aditipoonam 11 सितंबर 2012 को 9:09 am  

बच्चों को समझकर और समझा कर चलना बहुत जरूरी हो गया है --मन को छू लेने वाली कविता

Anupama Tripathi 15 सितंबर 2012 को 2:14 am  

bilkul sach liha hai aapne ..
sarthak bat kahati kavita ...!!

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