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पुस्तक समीक्षा : बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक

सोमवार, 24 जनवरी 2022

पुस्तक समीक्षा

 



           बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक  

     

        

                    पुस्तक:दिविक रमेश चुनिंदा नाटक


                            लेखक:दिविक रमेश

 




                     प्रकाशक:नेशनल बुक ट्रस्ट,इन्डिया


                      नेहरू भवन,5 इंस्टीट्युशनल एरिया,फेज-2


                   वसंत कुंज,नई दिल्ली-110070

 

      

                  वर्तमान हिंदी बाल साहित्य में सबसे अधिक कमी  किसी विधा में है तो वह है बाल नाटकों की।बाल कहानियों,कविताओं,उपन्यासों और सूचनात्मक साहित्य की तुलना में अच्छे बाल नाटक बहुत कम लिखे भी जा रहे और प्रकाशित भी कम हो रहे।इसीलिए अक्सर बाल नाटकों के मंचन के समय या फिर बाल रंगमंच की कार्यशालाओं में यह बात कही भी जाती है कि मंचन के लिए अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स की बहुत कमी है।

         


इसके पीछे कारण मुख्य रूप से कुछ ही हैं।पहला तो यह की बाल नाटक लिखने वाले लेखक  कम हैं,दूसरे जो इस दिशा में प्रयास कर भी रहे हैं वो बाल नाटक सिर्फ नाटक लिखने के लिए लिख देते हैं।उन नाटकों को बच्चे मंच पर प्रस्तुत कर सकेंगे या नहीं,मंचन में नाट्य निर्देशक या बच्चों को उस नाटक की प्रस्तुति के समय क्या दिक्कतें आयेंगी इस बात से उन्हें कोई मतलब नहीं।बस उन्होंने बाल नाटक लिखा उसे पैसे देकर छपवा दिया, उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गयी बस उनका काम समाप्त।उस नाटक को बच्चे रूचि से पढ़ेंगे या नहीं,उसका मंचन हो सकेगा या नहीं इन बातों से उन्हें कोई मतलब नहीं।

     


इस नजरिये से कुछ ही दिनों पहले नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित दिविक रमेश जी के बाल नाटकों क संकलन “दिविक रमेश चुनिंदा बाल नाटक”—बाल नाटकों और बाल रंगमंच की दिशा में एक नई आशा जगाते हैं।



दिविक जी के इस बाल नाटक संग्रह में कुल पांच बाल नाटक हैं–“मुसीबत की हार”,“मैं भी परी हूँ”,”बल्लू हाथी का बालघर”,“चतुराई का चमत्कार”,और “सोचूराम”।



संकलन का पहला नाटक“मुसीबत की हार”एक छोटी बच्ची की बहादुरी की कहानी है।बच्ची को उसकी मां बहादुरी की कहानियां सुनाती है।ऐसी ही एक कहानी चींटी और चिड़िया की सुनाई।बच्ची की माँ  गाँव की औरतों के साथ दूर जंगल में काम करने जाती है।एक दिन बच्ची भी ज़िद करके अपनी मां के साथ जंगल गयी और घूमते घूमते जंगल में खो गयी। पहले तो वह घने जंगल में घबरा गयी।फिर अचानक उसे माँ द्वारा सुनायी गयी बहादुर चिड़िया और साहसी चींटे की कहानी याद आ गयी।बच्ची उनकी बहदुरी को याद करती हुयी फूल दादा,नदी और संगीत दादी  की सहायता से अपने घर वापस लौट आई।छोटे छोटे दृश्यों और संवादों वाला यह नाटक बच्चों के साथ ही बड़ों को भी अच्छा लगेगा।नाटक को रोचक बनाने और बच्चों को आनंदित करने के लिए लेखक ने इसके संवादों में सुन्दर गीतों का भी प्रयोग किया है।घबराई हुयी बच्ची अपने मन की बात को फूल दादा से कुछ इस तरह कहती है---



मां ने समझाया था

पर कहाँ मानी थी

ज़िद मैंने ठानी थी

आकर यहाँ भी

बात नहीं मानी थी

दूर दूर निकल गयी

की मनमानी थी

रह गयी अकेली हूँ

बता दो फूल दादा

मेरे घर का पता।



संकलन का दूसरा नाटक “मैं भी परी हूँ” बच्चों के मन से रंग भेद,सुन्दरता-कुरूपता जैसे भावों को ख़तम करने का एक अच्छा प्रयास है।पूरा कथानक परी लोक की परियों को लेकर बुना गया है।परी लोक की कथाएं वैसे भी बच्चों की पहली पसंद होती हैं।इसलिए इस नाटक के मंचन में बच्चों को काफी आनंद आयेगा।नाटक का कथानक कुछ यूं है।परी लोक में सभी परियां,उनके परिवार के लोग,नन्हीं परियां सभी सुन्दर हैं।उन्हीं में एक परिवार में एक कुछ सांवली बच्ची पैदा हुयी।उसके माता पिता उसके सांवले रंग को लेकर बहुत चिंतित रहते थे।क्योंकि बच्ची के बड़े होने के साथ ही समस्याएँ भी बढ़ रही थीं।कोई भी परिवार उस सांवली परी के साथ अपने बच्चों को खेलने नहीं देता।मां बाप प्यार से उसे श्यामा कहने लगे।श्यामा के पिता उसे पढ़ाने के लिए चुपके से भारत देश से एक शिक्षक को ले आते हैं।शिक्षक श्यामा को ख़ूब पढ़ा लिखा कर शिक्षित कर देता है।श्यामा के पढी लिखी होने के कारण ही धीरे धीरे दूसरी नन्हीं परियां उससे काफी घुल मिल गयीं।एक दिन सभी परियां उड़ कर भारत देश पहुँच जाती हैं।वहां श्यामा ने दो बार उन नन्हीं परियों की जान बचायी।इससे सभी उसे बहुत सम्मान देने और दीदी कहने लगीं।सबके मां बाप ने भी अपनी बेटियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी श्यामा को सौंप दिया।परी लोक के सभी लोग उसे ज्ञान परी कहने लगे।इस नाटक के माध्यम से बच्चों को रंग भेद हटाने के साथ ही शिक्षा लेने की सीख भी दी गयी है।

   


संकलन का तीसरा नाटक “बल्लू हाथी का बालघर” संकलन का सबसे बेहतरीन नाटक है।नाटक एक जंगल के जीवों की पृष्ठ भूमि पर बुना गया है जहां का राजा शेर खुद को महाराज कहलाना पसंद नहीं करता बल्कि जीवों से कहता भी है कि वे उसे महोदय,महामहिम या फिर जंगलपति कहा करें।नाटक का प्रमुख पात्र एक बूढा हाथी बल्लू है।अन्य पात्रों में शेर,खरगोश,भालू,बन्दर,लोमड़ी,चीता और कुछ अन्य जानवरों के बच्चे हैं।

   


नाटक की कहानी मात्र इतनी है कि एक जंगल के जानवर इस बात को लेकर चिंतित हैं कि जब वो सब दिन में अपने कम पर चले जाते हैं तो उनके बच्चे अकेले रह जाते हैं।ऐसे में कहीं किसी दिन शिकारी आकर उनके भोले बच्चों को पकड़ न ले जाएं।इसके लिए उनकी एक सभा चल रही थी।सभा में खरगोश उन्हें बच्चों को एक सुरक्षित जगह रखने का सुझाव देता है।पर समस्या यह थी कि उनकी देख भाल कौन करेगा?उनकी सभा में कहीं से भटक कर आया हुआ एक बूढा हाथी भी था।हाथी से उसकी कहानी सुनने के बाद बल्लू हाथी को बच्चों की देखभाल की जिम्म्मेदारी सौंप दी गयी।और बच्चों के रहने की जगह को “बल्लू हाथी का बालघर” नाम दिया गया।बल्लू हाथी दिन भर बच्चों को कहानियां सुनाता,उन्हें खेल खिलाता,खाना देता और उन्हें गीत सुनाता।इस नाटक में लेखक ने जगह-जगह जीवों और जंगल के प्रति मनुष्यों की क्रूरता की भी बात उठायी है।तो दूसरी ओर बच्चों के कोमल मन और स्वभाव को भी बखूबी दर्शाया है बच्चे चाहे मनुष्य के हों या फिर अन्य जीवों के सबका मन एक ही तरह कोमलता से भरा होता है।यह बात नाटक में स्पष्ट हो जाती है जब बल्लू हाथी जानवरों की सभा में उनसे बताता है कि किस तरह उसके महावत का बेटा उसके पास आकर उसकी सूंड सहलाता और उसे प्यार से अपने खाने में से भी कुछ खिलाता था ।

      


संकलन का चौथे और पांचवें नाटक “चतुराई का चमत्कार”और “सोचूराम” अपेक्षाकृत छोटे बाल नाटक हैं और इनमें भी बच्चों के मनोरंजन और आनंद का पूरा ध्यान रखने के साथ उन्हें कुछ सीख भी दी गयी हैं।“चतुराई का चमत्कार”एक सीधे साधे गरीब किसान भोलू और दो धूर्त ठगों की कहानी है जो साधू का वेश धारण करके उसके पेड़ के सारे पके आम रोज तोड़ ले जाते हैं।बेचारा  भोलू और उसकी पत्नी इमरती बहुत परेशान होते हैं।ऐसे में एक व्यापारी उनसे एक रात के लिए घर में आश्रय मांगता है।और अगले दिन सुबह भोलू के साथ जाकर उन ठगों की पोल खोल कर उनकी पिटाई भी करवाता है।जबकि “सोचूराम”एक बहुत ही छोटा और एक बच्चे सुब्बू के मनोभावों को चित्रित करने वाला मजेदार नाटक है।सुब्बू हर समय कुछ न कुछ सोचता ही रहता था।उसकी इस सोच को ही एक लड़की पात्र “सोच”के रूप में बहुत ही कुशलता  के साथ प्रस्तुत किया  गया है।नाटक के अंत में सोच बताती है कि वह कोई परी या लड़की नहीं बल्कि सुब्बू के भीतर मन में हर वक्त चलने वाली उठा पटक की ही प्रतिमूर्ति है जो उसकी दोस्त सोच बन कर आई है ।



दिविक रमेश जी के इन पाँचों ही बाल नाटकों में कुछ ऐसे बिंदु या कहें तत्व हैं जो कि बाल नाटकों के लिए बहुत ही आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं।पहली बात है बाल मनोभावों की पकड़ और बच्चन को आनंदित करने वाला तत्व।पाँचों ही नाटकों की बुनावट ऎसी है कि हर दृश्य के बाद बच्चों को मजा आएगा।दूसरा महत्वपूर्ण और जरूरी तत्व नाटकों के छोटे छोटे और आसानी से मंच पर प्रस्तुत किये जाने वाले दृश्य।दृश्यों की संरचना ऎसी है कि उन्हें नाट्य निर्देशक आसानी से मंच पर प्रस्तुत कर सकेगा और दृश्यों को बदलने में भी ज्यादा भागदौड़ मेहनत बच्चों को नहीं करनी पड़ेगी।तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु है संवादों का छोटा छोटा और चुटीला होना।यह किसी भी बाल नाटक की प्रस्तुति का एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है।संवादों के छोटे रहने से बच्चों को उन्हें याद करने में आसानी रहती है और प्रस्तुति के समय संवाद भूलने की असुविधा से बच्चे बचे रहते।चौथी और सबसे महत्वपूर्ण खूबी इन नाटकों में गीति तत्व का मौजूद होना है जो कि बाल नाटकों का एक महत्वपूर्ण अंग है।चूंकि दिविक जी मूलतः एक कवि हैं इसलिए उनके नाटकों में भी जगह जगह संवादों में गीतात्मकता मौजूद है।बाल नाटकों में यदि गीत संगीत नहीं रहेगा तो वो बच्चों को न ही आनंदित करेंगे न ही बांधे रहने में सक्षम होंगे।इन खूबियों के साथ ही दिविक जी ने अपने इन नाटकों में बच्चों (खासकर बेटियों को)को शिक्षित करने और बच्चों तक किसी न किसी माध्यम से अच्छी किताबें पहुंचाने की(चतुराई का चमत्कार नाटक के अंत में) भी बात उठायी है।

   


इस बाल नाटक संकलन को अपने खुबसूरत चित्रों से प्रसिद्द कार्टूनिस्ट इरशाद कप्तान ने सजाया है।इरशाद कप्तान के चित्र निश्चित ही बच्चों को आकर्षित करेंगे ही साथ ही इनके मंचन के समय सेट लगाने या दृश्यों को प्रस्तुत करने में नाट्य निर्देशक के लिए भी सहायक होंगे।  

   


कुल मिला कर हम कह सकते हैं कि दिविक जी के नाटकों के इस संकलन का लाभ बच्चों के साथ ही बाल रंगमंच से जुड़े उन सभी रंगकर्मियों को भी मिलेगा जिन्हें मंचन के लिए अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स की तलाश रहती है।

                                  


००००००



समीक्षक: हेमन्त कुमार

                                                         

 

 


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कटघरे के भीतर

रविवार, 29 अगस्त 2021

ये कविता मैंने लगभग  10-12 साल पहले लिखी थी...परआज दुनिया की हालत को देख कर इसे फिर प्रकाशित कर रहा हूँ ....... 

कटघरे के भीतर

(फोटो-गूगल से साभार )


खून से रंगी सड़कों पर


अपने कदमों के निशान बनाते हुए


निकल पड़े हैं


हजारों लाखों बच्चे


पूरी दुनिया के घरों से।


 

बच्चों के हाथों में हैं मशालें


चेहरे हैं आंसुओं से तर बतर


मन में समाया है एक खौफ


कानों में गूंज रही है धमाकों की आवाजें 


और आंखों में चस्पा हैं तमाम सवाल


जिनका जवाब देना है


आपको/हम सब को/इस पूरी व्यवस्था को।


 

इन बच्चों की लाल पड़ गई सूनी आंखें


जानना चाहती हैं


अपने पैदा होने का कसूर


कि क्यों


वे सभी बना दिए गए अनाथ


चन्द मिनटों में


कुछ उन्मादियों द्वारा किए गए धमाकों


और दहशतगर्दी के खेल से


कि क्या होगा अब उनका भविष्य


कि कैसे मिटेगा उनके चेहरों पर छाया हुआ खौफ


कि कैसे उबर सकेंगे वे पूरे जीवन भर


रात में दिखने वाले भयावह सपनों के प्रहार से


कि कौन बुलाएगा अब उन्हें


बेटा कह कर


कि किसके आंचल में छुप सकेंगे वे


उनींदी आंखों से भयावह काली आकृतियां देखकर


कि कैसे बिता सकेंगे वे भी एक


सामान्य बच्चे का जीवन।


 

ये सभी सवाल पूछ रहे हैं ये


सारे बच्चे


हम सभी से


सोचिए जरा सोचिए


कुछ थोड़ा बहुत तो बोलिए


क्या जवाब है हमारे /आपके पास


इनके सवालों का।


 

हम सब खड़े होकर कटघरों में


गीता पर हाथ रख कर


सच बोलने की शपथ तो खा सकते हैं


परन्तु


क्या दे सकते हैं इन बच्चों को


कोई सबूत/कोई प्रमाण/ कोई आश्वासन


इन बच्चों के


बचपन को सुरक्षित रखने का ?


आप भी जरा विचारिए


डालिए अपने दिमाग पर कुछ जोर


कि क्या जवाब देना है इन बच्चों को


कब तक चलता रहेगा


दहशतगर्दी का ये खेल


कब तक बारूद के धमाकों


और संगीनों के साए में


खौफनाक मंजर की तस्वीरों से


आतंकित होते रहेंगे


ये बच्चे।


00000


हेमन्त कुमार

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बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग

शनिवार, 21 अगस्त 2021

 बाल साहित्य--पुस्तक समीक्षा



बाघू के किस्से----नाटक और कहानी का मिला जुला अद्भुत प्रयोग



                           पुस्तक: बाघू के किस्से


                           (बाल नाटक संग्रह)





                          लेखिका: दिशा ग्रोवर


                        प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन प्रा०लि०


                          702,जे/50, एवेन्यू-जे,ग्लोबल सिटी


                           ठाणे,महाराष्ट्र-401303

      

                                   

        हिन्दी बाल साहित्य में इस समय काफी कुछ लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है।बाल कहानी,कविता,गीत,उपन्यास,चित्रात्मक कहानियां हर विधा में काफी कुछ लिखा जा रहा है बस एक विधा को छोड़ कर।और वह विधा है बाल नाटक।हिन्दी में बाल नाटक बहुत कम लिखे जा रहे हैं और लिखे भी जा रहे हैं तो उनके मंचन की गुंजाइश काफी कम या कठिन है।इसके पीछे कारण तो बहुत से हैं लेकिन मुख्य कारण है बाल नाटक लेखकों की बाल रंगमंच से दूरी।जो लेखक बाल नाटक लिख भी रहे हैं वो सिर्फ नाटक लिखने के लिए लिख रहे हैं।वो नाटक मंचित हो सकेगा या नहीं,उसमें मंचन की संभावनाएं हैं या नहीं इस बात से उन्हें कोई ज्यादा मतलब नहीं है।बस उन्होंने नाटक लिखे।वो पहले किसी पत्रिका में फिर पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो गए और उन्होंने अपना काम पूरा समझ लिया।

         

                 

                        बाल नाटकों के ऐसे ही परिदृश्य के बीच दिशा ग्रोवर के बाल नाटक संग्रह “बाघू के किस्से” का प्रकाशन हमारे समक्ष बाल नाटकों के लिए एक नई उम्मीद जगाता है।इस संकलन में दिशा ग्रोवर के कुल छह नाटक संकलित हैं।नाटकों के शीर्षक भी ऐसे हैं जो बाल पाठकों के साथ ही रंगकर्मियों के मन में भी इन्हें पढने और मंच पर नन्हें बाघू को बच्चों से रूबरू कराने की उत्सुकता जगाते हैं।“बाघू और जंगल:पहला अनुभव”,“बाघू और हाथी की सूँड़”,“बाघू ने गधे से सीखा”,“बाघू और धरती के कान”,“बाघू,छुटमुट और जादुई शब्द” और अंतिम नाटक “बाघू चला घास खाने”।    

   

                     

                      मैं प्रायः किताबें पढने में थोड़ा ज्यादा समय लगाता हूँ।लेकिन इस किताब के साथ ऐसा नहीं हुआ।किताब मिलने के बाद ही मैंने इसे पढ़ना शुरू कर दिया और जब पढ़ना शुरू किया तो दो बैठक में इसे पूरा पढ़ भी डाला।इसका पहला कारण तो ये कि ये बाल नाटकों का संकलन था।और नाटकों और मंच से जुड़ाव होने के कारण मेरे मन में घोर उत्सुकता जागनी स्वाभाविक भी थी।दूसरा जो बहुत महत्वपूर्ण कारण था वो यह कि इसके प्रमुख पात्र बाघू से पहला नाटक ख़तम होते होते ही मैंने खुद में इतना अधिक जुड़ाव महसूस किया कि देखूँ आगे-आगे ये प्यारा बाघू क्या करने वाला है?(यह एक संयोग ही था कि “बाघू के किस्से” किताब मिलने के ठीक दो दिनों पहले मैं अपने और अपनी बहन के परिवार के साथ लखनऊ चिड़ियाघर भी देखने गया था।और वहां भी हम सभी ने बाघ के चार नन्हें शावकों को उछलते-कूदते और आपस में खेलते देखा था।)शायद इसीलिए इन नाटकों को पढने के दौरान मुझे लगातार महसूस होता रहा कि अरे ये तो चिड़ियाघर में बाघू ही था अपने भाइयों बहनों के साथ।

     

                             

                                 दिशा के इन सभी नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता इन नाटकों का बाल मनोभावों के अनुकूल होना है।बाघू और उसके छोटे-छोटे भाई बहनों के माध्यम से लेखिका ने उन सभी प्रश्नों,उत्सुकताओं,शंकाओं को उठाया है जो किसी भी मनुष्य के बच्चे के मन में छुटपन या कहूँ शैशवकाल के दौरान उठती हैं।बाघू का जंगल में पहली बार निकलने पर हर चीज को हर जीव को जानने समझने की जिज्ञासा,शिकारी से मिलने जाना,हाथियों के झुण्ड तक पहुँचना,हाथी के बच्चे की सूंड खींचने की कोशिश,खरगोश के कान को धरती का कान समझना---ये सभी घटनाएँ ठीक उसी तरह घटित होती चलती हैं जैसे मनुष्य का कोई छोटा बच्चा जब पहली बार घर से बाहर निकलता है तो वो हर चीज को,हर वस्तु को छू कर,देख कर महसूस करने उन्हें समझने की कोशिश करता है।

    

                           

                           सभी नाटकों में घटित होने वाली घटनाएँ,बात चीत,दृश्य इस बात को पुख्ता करते हैं कि लेखिका को बाल मनोभावों की अच्छी समझ है और उसने उसी के अनुरूप इन छहों नाटकों के कथानक,घटनाओं,दृश्यों का तानाबाना बुना है।

     

                    

                     दिशा के ये नाटक इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इनमें कहानी और नाटक के एक नए मिक्स फार्मेट का प्रयोग किया गया है जो अपने आपमें अनूठा है और इन नाटकों को आज के समय में लिखे जा रहे अन्य बाल नाटकों से अलग करता है।दूसरी बात इनका कथानक। कथानक का तानाबाना भी इस हिसाब से है कि हर नाटक अपने आप में अलग भी है और आपस में मिला हुआ भी।यानि की मंचन के समय नाट्य निर्देशक या रंगकर्मी के लिए इस बात की भी गुंजाइश रखी गयी है कि वो चाहे तो इन नाटकों को अलग अलग भी मंचित कर सकता है या इनमें दो,तीन या चार नाटकों को  एक साथ मिला कर भी मंचित कर सकता है।

    

                             

                              वैसे तो इस संकलन के सभी नाटक एक से बढ़ कर एक मजेदार घटनाओं,संवादों से भरे हैं लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर “धरती के कान” वाला प्रसंग बेहद मजेदार लगा जिसे पढ़ते या मंच पर देखते समय निश्चित ही बच्चा आनंदित होगा और उसके अन्दर घोर उत्सुकता भी अंत तक बनी रहेगी।ये नाटक पढ़ते समय मुझे सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” याद आ गयी।उसमें भी जड़ी बूटियों की तलाश में जंगल में भटक रहे तुलसी बाबू को धरती पर एक अजीब सा अंडा दिखा था।जो उन्हीं के सामने चिटका और उसमें से एक पीले रंग का विचित्र पक्षी निकल कर उनके पीछे चल पड़ा और उनके साथ घर तक आया।

      

                               

                   खैर वो कहानी तो अलग है।लेकिन “बाघू और धरती के कान” में बाघू के बुलाने पर जमीन के अंदर से खरगोश के कान का बाहर आना तथा बाघू द्वारा उसे धरती का कान समझना और सत्यजीत राय की कहानी “चंचुराज” की इस अंडे से चिड़िया निकलने की घटना----दोनों में सबसे बड़ी समानता है बच्चों के भीतर घोर उत्सुकता पैदा करना।और दोनों ही रचनाएं अपने इस प्रयास में पूरी तरह सफल कही जा सकती हैं।

   

                                     

                  इस मजेदार और सराहनीय नाटक संकलन में कुछ थोड़ी बहुत कमियाँ भी मुझे नजर आईं जिनका उल्लेख मैं जरूरी समझता हूँ।पहली बात तो वन अधिकारी के संवाद थोड़ा ज्यादा लम्बे लम्बे हैं उन्हें छोटा किये जाने की गुंजाइश भी है।खासतौर से वहां जहां वह बाघ के बच्चों को गधे के बारे में बता रहा है।दूसरी बात कहीं कहीं नाटकों में ड्रामेटिक एलीमेंट या कहूँ तो ड्रामेटिक सिचुएश्न की कमी।जैसे हाथी के बच्चे के सूंड वाले प्रसंग में।यहाँ पर बाघू द्वारा किसी टहनी या बड़े पत्ते को लपेट कर अपने चेहरे पर सूंड बनाने जैसी कोशिश एक अच्छी बच्चों को हंसाने वाली सिचुएशन पैदा कर सकती है।हालांकि ये काम नाटक मंचित होते समय भी किया जा सकता है।

   

                                   

                          यहाँ मैं इन नाटकों की लेखिका दिशा ग्रोवर को कुछ सुझाव भी देना चाहूँगा।पहली बात तो ये कि अगर इन नाटकों को थोड़ा लिरिकल भी बना दें मतलब बीच बीच में सिचुएशन के अनुसार कुछ संवाद गीत के रूप में लिख दें तो ये नाटक और बेहतर बन सकेंगे क्योंकि जिस उम्र के बच्चों के लिए ये नाटक लिखे गए हैं---उन्हें गीत सुनना संगीतात्मक कवितायें सुनना ज्यादा अच्छा लगेगा।

    

                          

                           दूसरा सुझाव जो मैं हर बाल नाटक लेखक के साथ ही दिशा ग्रोवर को भी दूँगा कि समय मिलने पर बाल नाटकों के मंचन जरूर देखें और अगर संभव हो तो कोई भी नाटक लिखना शुरू करने के पहले किसी अच्छे बाल नाट्य निर्देशक/रंगकर्मी जिनकी बाल नाटकों पर अच्छी पकड़ हो---उससे अपने लिखे जाने वाले नाटक की स्टोरी लाइन,दृश्य,पात्र आदि पर विचार विमर्श जरूर कर लें।इससे लिखा जाने वाला नाटक निश्चित रूप से बेहतर बन सकेगा।     

   

                          

             वैसे “बाघू के किस्से” का गहन विश्लेषण करने पर कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिन्दी बाल साहित्य को दिशा ग्रोवर जैसी एक बाल मनोभावों पर अच्छी पकड़ रखने के साथ ही नाटकों और कहानी दोनों की समझ रखने वाली एक अच्छी बाल नाट्य लेखिका मिल रही है।जिसके नाट्य लेखन में एक नयापन और प्रयोगधर्मिता साफ़ नजर आ रही है।और उम्मीद है वो भविष्य में हिंदी बाल रंगमंच को और भी अच्छे बाल नाटकों की स्क्रिप्ट्स देकर समृद्ध करती रहेंगी।

                        

००००


समीक्षक:डा०हेमन्त कुमार                       

                     

                

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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